एक "महान राष्ट्रसन्त" : सेमुअल राजशेखर रेड्डी… YSR Memorial Land Grab in AP and Anti-Hindu Activities

हाल ही में भारत ने अपने एक “राष्ट्र सन्त” को खोया है, जी हाँ, मैं बात कर रहा हूं वाय सेमुअल राजशेखर रेड्डी की… उनकी याद में, उनके गम में, उनकी जुदाई की वजह से आंध्रप्रदेश में 400 से भी अधिक गरीब किसानों ने टपाटप-टपाटप आत्महत्याएं की हैं (ऐसा तो MGR के समय भी नहीं हुआ न ही NTR के समय)… लेकिन सिर्फ़ इतने भर से यह महान राष्ट्रसन्त नहीं हो जाते, बल्कि अब आंध्रप्रदेश की राज्य सरकार ने कुरनूल जिले के नल्लामल्ला जंगलों में 1412 हेक्टेयर (जी हाँ, सही पढ़ा आपने… 1412 हेक्टेयर) के इलाके में “YSR स्मृति वनम” के नाम से उनका मेमोरियल बनाने की योजना को हरी झण्डी दे दी है। अब दिल्ली में स्थापित सारी समाधियाँ, सारे स्मारक, सारे मेमोरियल, सारे घाट, इस महाकाय स्मारक के आगे पानी भरते नज़र आयेंगे, और ऐसा तभी होता है जब कोई व्यक्ति “राष्ट्र सन्त” बने और गुज़र जाये… न सिर्फ़ गुज़र जाये, बल्कि ऐसा गुज़रे कि उसके लिये दो दिन तक सेना, वायुसेना, भारतीय सेटेलाईट, अमेरिकी उपग्रह, पुलिस, जंगल में रहने वाले आदिवासी ग्रामीण, खोजी कुत्ते… सब के सब भिड़े रहें, किसी भी खर्चे की परवाह किये बिना… क्योंकि राष्ट्र सन्त की खोज एक परम कर्तव्य था (छत्तीसगढ़ में भी एक बार एक हेलीकॉप्टर लापता हुआ था, उसे खोजने का प्रयास तक नहीं किया गया, क्योंकि उसमें दो-चार मामूली पुलिस अफ़सर बैठे थे, जबकि राष्ट्रसन्त सेमुअल तो वेटिकन के भी प्रिय हैं और इटली के भी)।

तो मित्रों, बात हो रही थी 1412 हेक्टेयर के विशाल वन क्षेत्र में फ़ैले इस प्रस्तावित मेमोरियल की। योजना के अनुसार आत्माकुर वन क्षेत्र में आने वाले नल्लामल्ला जंगल, जो कि लगभग 5 जिलों में फ़ैला है, में उस पहाड़ी पर वायएसआर स्तूप बनाया जायेगा, जहाँ उनका हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। जंगल और पहाड़ी की शुरुआत से अर्थात पवुरलागुट्टा गाँव से सैलानी लोग, सॉरी “दर्शनार्थी”… अरे फ़िर सॉरी “भक्तगण” उस पहाड़ी पर ट्रेकिंग करते हुए चढ़ेंगे, और पहाड़ी पर बने इस विशाल स्तूप तक पहुँचेंगे। कैबिनेट ने कहा है कि प्रकृति के सुरम्य वातावरण को बनाये रखा जायेगा, और वन क्षेत्र को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा (अर्थात उस जंगल में रहने वाले जीव-जन्तुओं और पक्षियों को चिंता करने की कोई बात नहीं है, “जगन बाबू” उनसे आत्महत्या करने को नहीं कहने वाले है)। इस पूरे प्रोजेक्ट पर सिर्फ़ साढ़े तीन करोड़ का खर्च होगा और इसे सितम्बर 2010 तक बना लिया जायेगा। इस सम्बन्ध में पर्यावरणवादियों और प्रकृतिप्रेमियों की आपत्तियों को खारिज करते हुए राज्य की मंत्री गीता “रेड्डी” ने कहा, कि सरकार की उस वनक्षेत्र में किसी बड़े बदलाव की योजना नहीं है और उससे पर्यावरण अथवा जंगल को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा। उन्होंने आगे कहा कि उस पहाड़ी पर किसी पेड़ को नहीं काटा जायेगा और कोई बड़ा निर्माण कार्य नहीं किया जायेगा (अब सरकार कह रही है तो मानना ही पड़ेगा), उन्होंने यह भी कहा कि कैबिनेट के अधिकतर मंत्रियों की राय यह भी है कि हैदराबाद में भी एक स्मारक बनाया जाये (यानी कि एक और बेशकीमती ज़मीन)। इस विशाल कार्य की देखरेख और उसे सुचारू रूप से चलाने के लिये 6 मंत्रियों की एक समिति बनाई गई है। कैबिनेट में पास किये गये एक और प्रस्ताव के अनुसार कडप्पा जिले का नाम बदलकर राजशेखर रेड्डी जिला रखा जायेगा… अब आप खुद ही बताईये, क्या मैं उन्हें “राष्ट्रसन्त” की उपाधि देकर कुछ गलत कर रहा हूं?

चित्र – अपने जन्मदिन पर पुलिवेन्दुला में एक चर्च में बिशप को केक खिलाते हुए…

इस खबर को आप यहाँ पढ़ सकते हैं
http://timesofindia.indiatimes.com/news/city/hyderabad/1412-hectare-Nallamala-forest-land-for-YSR-memorial/articleshow/5053354.cms

http://andhralekha.com/news/11-19619-Govt%20gets%20forest%20land%20ready%20for%20YS%20memorial

देश के इस सबसे विशालतम समाधि स्थल के लिये अधिगृहीत की जाने वाली ज़मीन और फ़िर हैदराबाद में भी एक विशाल स्मारक बनाये जाने की योजना से इस बात को बल मिलता है कि इस “राष्ट्रसन्त” और उनके लायक पुत्र के मन में ज़मीन के प्रति कितना मोह है, कितना लगाव है, कितनी चाहत है… आखिर धरतीपुत्र जो ठहरे… आईये देखते हैं कि YSR ने पिछले 5 साल के अपने मुख्यमंत्रित्व काल में गरीबों के लिये जो थोड़ा-बहुत काम किया, वह क्या-क्या हैं… ताकि इस राष्ट्रसन्त को आप सच्ची श्रद्धांजलि दे सकें…

- हैदराबाद में रहेजा कॉर्पोरेशन को इंफ़्रास्ट्रक्चर के लिये 300 एकड़ ज़मीन दी, इसमें 50% की भागीदारी जगन रेड्डी की है।
- गंगावरम बंदरगाह बनाने के लिये 1000 एकड़ ज़मीन (इसमें भी जगन की हिस्सेदारी है)।
- ब्राहमनी स्टील्स कम्पनी में धरतीपुत्र के पुत्र की हिस्सेदारी है।
- सिक्किम में चल रहे 6000 करोड़ के एक हाईड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट में जगन की आधी हिस्सेदारी है।
- जगन बाबू कुछ साल पहले तक बंगलोर में ही रहते थे, उनके पप्पा ने उन्हें हाल ही में सांसद बनवाया है, अतः बंगलोर के बाहरी इलाके में तीन करोड़ रुपये प्रति एकड़ की दर से कृषि भूमि खरीदकर फ़ार्म हाउस बनवाया है।
- बंगलोर के ही बन्नरघट्टा रोड पर एक विशाल शॉपिंग मॉल काम्पलेक्स भी जगन बाबू का ही बताया जाता है।
- हैदराबाद की कुक्कापल्ली हाउसिंग बोर्ड सोसायटी में 25 एकड़ का प्लाट
- प्रकासम जिले की मशहूर ग्रेनाइट खदानों में 150 एकड़ की खनन भूमि (एक बेनामी कम्पनी गिम्पेक्स के नाम से)
- अखबार “साक्षी” जिसके मालिक और चेयरमैन जगन रेड्डी हैं, उस अखबार ने पिछले 5 साल में कोलकाता, गुजरात, चेन्नई और बंगलोर में 600 करोड़ का निवेश किया है।
- साक्षी ग्रुप में दो मुख्य निवेशक हैं आर्टिलियन्स बायोइन्नोवेशंस तथा स्टॉकनेट इंटरनेशनल, जिन्हें विश्व के स्टॉक मार्केट में लिस्टेड किया गया है, इनकी शेयर प्राइस एक रुपये से कम है और प्रमोटर का हिस्सा 0.3 प्रतिशत है, लेकिन यह दोनों निवेशक कम्पनियाँ साक्षी की स्क्रिप पर 350 रुपये का प्रीमियम देती हैं।
- साक्षी और जगति पब्लिकेशन में निवेश करने वाली कम्पनियों को ही बड़े-बड़े सरकारी ठेके मिलते हैं, जैसे SEZ, बन्दरगाह निर्माण और ग्रेनाईट खदानों में खनन की अनुमति।
- जगति पब्लिकेशन के ऑडिटर हैं PWC, जी हाँ वही प्राइस वाटर कूपरहाउस, जिसने सत्यम के बही खातों की उम्दा जाँच करके बताया था कि “सब ठीक है”।
- इसी PWC ने साक्षी अखबार की “जाँच” करके सर्टिफ़िकेट दिया कि इसकी दैनिक खपत 12 लाख प्रतियाँ रोज़ाना की है, और साक्षी अखबार को सरकार की ओर से बड़े-बड़े विज्ञापन मिलने लगे।
- अरुणाचल प्रदेश में लगने वाले 3000 मेगावाट के प्रोजेक्ट में काम करने वाली कम्पनियों, एपी जेन्को तथा मेसर्स एथेना पावर एनर्जी की भी जगति पब्लिकेशन्स में हिस्सेदारी है।
- पुल्लिवेन्दुला में 5 एकड़ में निर्मित वायएसआर के बंगले की कीमत कम से कम 4 करोड़ रुपये है।

अब जबकि “धरतीपुत्र” को ही धरती इतनी प्रिय है तब उनके पीछे-पीछे लगे “भूमिपुत्रनुमा” रिश्तेदारों को क्यों न होगी, और वे क्यों पीछे रहें…

वायएस विवेकानन्द रेड्डी (राष्ट्रसन्त के भाई) -

- कडप्पा से सांसद विवेकानन्द रेड्डी के पास मधापुर की हाईटेक सिटी में 2000 वर्गमीटर की ज़मीन है, जो फ़िलहाल एक सॉफ़्टवेयर कम्पनी को किराये पर दी गई है (कीमत बताने का क्या फ़ायदा, सभी अन्दाज़ लगा ही लेंगे)

वायवी सुब्बा रेड्डी (राष्ट्रसन्त के एक और भाई) –

- तुंगभद्रा नदी पर बनने वाले एक हाईड्रो प्रोजेक्ट में हिस्सेदार।
- अपनी पत्नी स्वर्णलता रेड्डी के नाम पर 1000 वर्गफ़ीट का प्लाट जुबली एनक्लेव इलाके में।

सुधाकर रेड्डी (चचेरे दामाद)

- उत्तरी आंध्रप्रदेश के समुद्री तटों पर रेती की खुदाई और ढुलाई के ठेके, स्विट्ज़रलैण्ड की कम्पनी बोथलिट्रेड इंक के साथ भागीदारी में।

बी युवराज रेड्डी (राष्ट्रसन्त के भतीजे)

युवराज चिटफ़ण्ड कम्पनी बनाकर 2.60 करोड़ का घोटाला किया।

रबिन्द्रनाथ रेड्डी (YSR के साले)

- डेन्दुलुरु गाँव में फ़र्टिलाइज़र कम्पनी बनाने के नाम पर कई एकड़ भूमि हड़प की।
- गेमन इंडिया लिमिटेड (दिल्ली मेट्रो के काम में गड़बड़ी के लिये ब्लैक लिस्टेड कम्पनी) के साथ मिलकर सर्वारासागर-वामिकोण्डा नहर प्रोजेक्ट को हासिल करने के लिये सम्बन्धों का उपयोग।

अन्य रिश्तेदार –
- मधुसूदन रेड्डी, वेणुगोपाल रेड्डी, प्रताप रेड्डी ने मिलकर कडप्पा नगर सुब्बा रेड्डी कॉलेज के पास की 15 करोड़ की ज़मीन गैरकानूनी रूप से दबाई हुई है (खसरा सर्वे क्रमांक 682/4, 684/4, 700/2).

- YSR के बड़े भाई की पत्नी भारती रेड्डी ने सितम्बर 2005 में कोल्लुरू में 35 लाख की ज़मीन (सर्वे क्रमांक 148) खरीदी, जो कि अचानक “रिंग रोड” के निर्माण की वजह से 13 करोड़ की हो गई।
- इसी रिंग रोड ने कई अन्य छोटे-मोटे रिश्तेदारों के भी वारे न्यारे करवा दिये, जैसे वायवी सुब्बा रेड्डी ने इसी रोड के पास सर्वे क्रमांक 117, 119, 121, 123, 124, 125, 126, 131, 132, 134, 136, 141 को 20 करोड़ में खरीदा, और “अचानक” वहाँ रिंग रोड बनाने की घोषणा हो गई, जिससे इस ज़मीन का भाव एक साल में ही 125 करोड़ पहुँच गया।
- YSR के नज़दीकी मित्र पार्थसारथी रेड्डी जो कि हेटेरो ड्रग्स नामक दवा कम्पनी के मालिक हैं, उन्हें SEZ बनाने के लिये कौड़ियों के दाम ज़मीन दी गई और कुछ ही दिन बाद उन्होंने जगति पब्लिकेशन में 13 करोड़ का निवेश कर दिया।

(इस लिस्ट में सत्यम और मेटास कम्पनी में हुआ महाघोटाला शामिल नहीं है)

यह तो हुई एक छोटी सी बानगी इस महान राष्ट्रसन्त के खुले कारनामों की (बाकी के जो भी घोटाले छिपे हुए हैं वह अलग हैं)। यदि आप पढ़ते-पढ़ते उकता गये हों तो आपको बता दूं कि ऐसा नहीं कि अपने मुख्यमंत्रित्व काल में इन्होंने सिर्फ़ अथाह पैसा ही कमाया हो, इन्होंने “धर्म” की भी सेवा की है, और जिस स्मारक या समाधि को बनाने में इतना पैसा खर्च किया जा रहा है, और हेलीकॉप्टर दुर्घटना होने पर इनकी खोज के लिये अमेरिका सहित सोनिया गाँधी भी चिंता में दुबली हुई जा रही थीं उसका कारण इनकी “धर्म” सेवा ही है, आईये यह ज्ञान भी प्राप्त कर ही लीजिये –

- 3 दिसम्बर 2007 को एक आदेश जारी करके “सेमुअल” ने प्रदेश के सभी 1,84,000 मन्दिरों, 181 मठों और विभिन्न धार्मिक ट्रस्टों को अधिगृहीत कर लिया ताकि उनकी करोड़ों की आय पर कब्जा किया जा सके। (डेक्कन क्रानिकल 3.12.2007)
- भद्राचलम : मन्दिर की 1289 एकड़ में से 884 एकड़ ज़मीन एक चर्च को दान कर दी।
- श्रीसेलम : प्रसिद्ध मल्लिकार्जुन मन्दिर की 1600 एकड़ भूमि को विभिन्न ईसाई-आदिवासी संगठनो में बाँट दिया।
- पुरानी मस्जिदों के लिये 2 करोड़, चर्चों की मरम्मत के लिये 7 करोड़ अनुदान दिया, भारत के इतिहास में पहली बार किसी ईसाई को बेथलेहम जाने के लिये सरकारी तौर पर अनुदान दिया। महाशिवरात्रि के अवसर पर बसों में अधिक भीड़ को देखते हुए हिन्दुओं की सुविधा(?) हेतु टिकट पर अतिरिक्त प्रभार लगाया। (डेक्कन क्रानिकल 23 अगस्त 2006, 18 दिसम्बर 2006, ईनाडु 16 फ़रवरी 2007)।
- प्रसिद्ध तिरुपति मन्दिर की 7 पहाड़ियों में से 5 पहाड़ियों पर चर्च निर्माण की अनुमति। अपने परिजन के नाम पर होने वाले हॉकी टूर्नामेंट के लिये तिरुपति मन्दिर की आय से पैसा खर्च किया (द हिन्दू 17 जुलाई 2006, डेक्कन क्रानिकल 8 मार्च 2007)।
- मन्तपम में गोल्फ़ कोर्स बनाने के लिये 10 मन्दिरों को तोड़ा गया, जबकि सेमुअल रेड्डी के बेटे जगन ने अनन्तपुर में एक मन्दिर तुड़वाया ( द हिन्दू 27 अगस्त 2004, डेक्कन क्रानिकल 8 मार्च 2007)।

(कम से कम अन्तिम संस्कार के मामले में YSR ईमानदार रहे और ईसाई पद्धति से ही उनका अन्तिम संस्कार किया गया, जबकि कुछ “परिवार” तो ऐसे ढोंगी हैं कि उन्हें पता है कि वे हिन्दू नहीं हैं फ़िर भी राजनीति और दिखावे की खातिर उन्हें हिन्दू धार्मिक पद्धति से अन्तिम संस्कार करवाना पड़ा… बेचारे)

(तात्पर्य यह कि जब उन्होंने “धरती” और धर्म की इतनी सेवा की है, तो उनके “लायक” पुत्र का हक बनता है कि वह इसे परम्परा को आगे बढ़ाये… इसीलिये तो आंध्रप्रदेश में इस राष्ट्रसंत के दुःख में लोगों ने टपाटप-टपाटप आत्महत्याएं कीं…)

मैं जानता हूं कि इस “राष्ट्रसन्त” के इन कारनामों और मेरी इस छोटी सी पोस्ट के मद्देनज़र आपकी आँखें श्रद्धा से छलछला उठी होंगी, अतः यहीं पर समाप्त करता हूं ताकि आप भी अपनी “विनम्र” श्रद्धांजलि उन्हें अर्पित कर सकें…

अन्य स्रोत –
1) Vijaya Karnataka, a kannada daily (20-6-06)
2) Eenadu Daily, A Telgu Daily
3) Deccan Chronicle, (15-06-2006)
4) Vikrama (28-05-2006)
5) Sudarshan TV (24-06-06)
6) Pungava news Magazine (1-06-06)
तथा http://www.outlookindia.com/article.aspx?229456

http://www.christianaggression.org/item_display.php?type=ARTICLES&id=1122662970

http://www.hindujagruti.org/news/index.php?print/id:1856,pdf:1

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यदि कांग्रेस खत्म हो जाये, तो हिन्दू-मुस्लिम दंगे नहीं होंगे…- सन्दर्भ मिरज़ के दंगे Miraj Riots & Communal Politics by Congress

प्रायः सभी लोगों ने देखा होगा कि भारत में होने वाले प्रत्येक हिन्दू-मुस्लिम दंगे के लिये संघ-भाजपा को जिम्मेदार ठहराया जाता है, जब भी कभी, कहीं भी दंगा हो, आप यह वक्तव्य अवश्य देखेंगे कि “यह साम्प्रदायिक ताकतों की एक चाल है… भाजपा-शिवसेना द्वारा रचा गया एक षडयन्त्र है… देश के शान्तिप्रिय नागरिक इस फ़ूट डालने वाली राजनीति को समझ चुके हैं और चुनाव में इसका जवाब देंगे…” आदि-आदि तमाम बकवास किस्म के वक्तव्य कांग्रेसी और सेकुलर लोग लगातार दिये जाते हैं। महाराष्ट्र के सांगली जिले के मिरज़ कस्बे में हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगों के बारे में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने भी ठीक यही रटा-रटाया बयान दिया है कि “महाराष्ट्र के चुनावों को देखते हुए राजनैतिक लाभ हेतु किये गये मिरज़ दंगे साम्प्रदायिक शक्तियों का एक षडयन्त्र है…”।

कुछ दिनों पूर्व मैंने एक पोस्ट लिखी थी, जिसमें इन दंगों के लिये जिम्मेदार हालात (अफ़ज़ल-शिवाजी और स्थानीय मुस्लिमों की मानसिकता के बारे में) तथा उन घटनाओं के बारे में विस्तार से चित्रों और वीडियो सहित लिखा था, जिस कारण दंगे फ़ैले। यहाँ देखा जा सकता है http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/09/miraj-riots-ganesh-mandal-mumbai.html

आईये सबसे पहले देखते हैं कि अशोक चव्हाण मुख्यमंत्री बने कैसे, और किन परिस्थितियों में? गत 26 नवम्बर को जब पाकिस्तान से आये कुछ आतंकवादियों ने मुम्बई में हमला किया था, और उसके नतीजे में “कर्तव्यनिष्ठ”, “जिम्मेदार” और “सक्रिय” सूट-बूट वाले विलासराव देशमुख अपने बेटे रितेश और रामगोपाल वर्मा को साथ लेकर ताज होटल में तफ़रीह करने गये थे, उसके बाद शर्म के मारे उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था और अचानक अशोक चव्हाण की लाटरी लग गई थी, तो क्या हम मुम्बई हमले को अशोक चव्हाण का षडयन्त्र मान लें जो कि उन्होंने अपने राजनैतिक फ़ायदे के लिये रचा था? यदि मिरज़ दंगों के बारे में ऊपर दिये गये तर्क के अनुसार चलें, तो इस आतंकवादी घटना का सबसे अधिक राजनैतिक फ़ायदा तो अशोक चव्हाण को ही हुआ, इसलिये इसमें उनका हाथ होने का शक करना चाहिये। जब विधानसभा की दो-चार सीटें हथियाने के लिये भाजपा-शिवसेना यह दंगों का षडयन्त्र कर सकती हैं तो मुख्यमंत्री पद पाने के लिये अशोक चव्हाण आतंकवादियों का क्यों नहीं? लेकिन ऐसा नहीं है, यह हम जानते हैं। इसलिये ऐसे मूर्खतापूर्ण वक्तव्य अब बन्द किये जाने चाहिये।

एक गम्भीर सवाल उठता है कि क्या हिन्दू-मुस्लिम दंगों की वजह से भाजपा को सच में फ़ायदा होता है? जब मुम्बई में हुए भीषण पाकिस्तानी हमले के बावजूद (जो कि एक बहुत बड़ी घटना थी) तत्काल बाद हुए चुनावों में मुम्बई की लोकसभा सीटों पर भाजपा को जनता ने हरा दिया था, तब एक मिरज़ जैसे छोटे से कस्बे में हुए दंगे से सेना-भाजपा को कितनी विधानसभा सीटों पर फ़ायदा हो सकता है?

यह तथ्य स्थापित हो चुका है कि इस प्रकार के हिन्दू-मुस्लिम दंगों की वजह से कभी भी हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होता, लेकिन मुस्लिम वोट जरूर एकमुश्त थोक में एक पार्टी विशेष को मिल जाते हैं। मुसलमानों को डराने के लिये कांग्रेस और सेकुलर पार्टियाँ हमेशा भाजपा-संघ का हौवा खड़ा करती रही हैं, राजनैतिक पार्टियाँ जानती हैं कि हिन्दू वोट कभी एकत्र नहीं होता, बिखरा हुआ होता है, जबकि मुस्लिम वोट लगभग एकमुश्त ही गिरता है (भले ही वह कांग्रेस के पाले में हो या सपा या किसी अन्य के)। इसलिये जब भी हिन्दू-मुस्लिम दंगे होते हैं उसके पीछे कांग्रेसी षडयन्त्र ही होता है, भाजपा-संघ का नहीं। कांग्रेसी लोग कितने बड़े “राजनैतिक ड्रामेबाज” हैं उसका एक उदाहरण — सन् 2000 में शिवसेनाप्रमुख बाल ठाकरे को गिरफ़्तार करने का एक नाटक किया गया था, खूब प्रचार हुआ, मीडिया के कैमरे चमके, बयानबाजियाँ हुईं। कांग्रेस को न तो कुछ करना था, न किया, लेकिन मुसलमानों के बीच छवि बना ली गई। मुम्बई के भेण्डीबाजार इलाके में शिवसेना की पीठ में “छुराघोंपू” यानी छगन भुजबल का, मुस्लिम संगठनों द्वारा तलवार देकर सम्मान किया गया, एक साल के भीतर समाजवादी पार्टी के विधायक राकांपा में आ गये और उसके बाद मुम्बई महानगरपालिका में एकमुश्त मुस्लिम वोटों के कारण, शरद पवार की पार्टी के पार्षदों की संख्या 19 हो गई… इसे कहते हैं असली षडयन्त्र। इतना बढ़िया षडयन्त्र सेना-भाजपा कभी भी नहीं कर सकतीं। इससे पहले भी कई बार पश्चिमी महाराष्ट्र के मिरज़, सांगली, इचलकरंजी, कोल्हापुर आदि इलाकों में दंगे हो चुके हैं, कभी भी सेना-भाजपा का उम्मीदवार नहीं जीता, ऐसा क्यों? बल्कि हर चुनाव से पहले कांग्रेस द्वारा बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगे आदि का नाम ले-लेकर मुस्लिम वोटों को इकठ्ठा किया जाता है और फ़सल काटी जाती है।

गुजरात की जनता समझदार है जो कि हर बार कांग्रेस के इस षडयन्त्र (यानी प्रत्येक चुनाव से पहले गुजरात दंगों की बात, किसी आयोग की रिपोर्ट, किसी फ़र्जी मुठभेड़ को लेकर हल्ला-गुल्ला आदि) को विफ़ल कर रही है। मुसलमानों को एक बात हमेशा ध्यान में रखना चाहिये कि हिन्दू कभी भी “क्रियावादी” नहीं होता, नहीं हो सकता, हिन्दू हमेशा “प्रतिक्रियावादी” रहा है, यानी जब कोई उसे बहुत अधिक छेड़े-सताये तभी वह पलटकर वार करता है, वरना अपनी तरफ़ से पहले कभी नहीं। कांग्रेस हमेशा मुसलमानों को डराकर रखना चाहती है और हिन्दुओं के विरोध में पक्षपात करती जाती है, राजनीति करती रहती है, तुष्टिकरण जारी रहता है… तब कभी-कभार, बहुत देर बाद, हिन्दुओं का गुस्सा फ़ूटता है और “अयोध्या” तथा “गुजरात” जैसी परिणति होती है।

यदि अशोक चव्हाण षडयन्त्र की ही बात कर रहे हैं, तब यह भी तो हो सकता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र के इस इलाके से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का पत्ता साफ़ हो गया था, इसलिये फ़िर से मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ़ करने के लिये यह षडयन्त्र रचा गया हो (वीडियो फ़ुटेज तो यही कहते हैं)।

मिरज़ के इन दंगों के बारे में कुछ और खुलासे, तथा पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर कुछ बिन्दु निम्नलिखित हैं…

1) पुलिस की सरकारी जीप पर चढ़कर हरा झण्डा लहराने वाले शाहिद मोहम्मद बेपारी को पुलिस, दंगों के 12 दिन बाद गिरफ़्तार कर पाई (Very Efficient Work)

2) शाहिद मोहम्मद बेपारी ने इन 12 दिनों में से अपनी फ़रारी के कुछ दिन नगरनिगम के एक इंजीनियर (यानी सरकारी कर्मचारी) बापूसाहेब चौधरी के घर पर काटे। आज तक इस सरकारी कर्मचारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

3) इससे पहले इसी बापूसाहेब चौधरी ने ईदगाह मैदान पर नल के कनेक्शन को स्वीकृति दी थी, और नल लगवाया जबकि उस विवादित मैदान पर कोर्ट केस चल रहा है। इस नल कनेक्शन को लगवाने पर PHE विभाग को कोई पैसा नहीं दिया गया, और अब बात खुलने पर रातोंरात इस नल कनेक्शन को उखाड़ लिया गया है, ऐसे हैं कांग्रेसी सरकारी कर्मचारी।

4) इसके पहले इस साजिश के मुख्य मास्टरमाइंड (यानी पहले भड़काऊ भाषण देने वाले और बाद में, गणेश मूर्तियों पर पत्थर फ़ेंकने की शुरुआत की) इमरान हसन नदीफ़ को पुलिस ने आठ दिन बाद गिरफ़्तार किया (सोचिये, जिन व्यक्तियों के चित्र और वीडियो फ़ुटेज उपलब्ध हैं उसे पकड़ने में आठ दिन और बारह दिन लगते हैं, तो पाकिस्तान से आये आतंकवादियों को पकड़ने में कितने दिन लगेंगे)।

5) जब शाहिद बेपारी जीप पर चढ़कर हरा झण्डा लहरा रहा था, तब एक बार उसके हाथ से झण्डा गिर गया था, उस समय वहाँ एएसपी के सामने उपस्थित एक सब-इंस्पेक्टर ने वह झण्डा उठाकर फ़िर से ससम्मान शाहिद के हाथ में थमाया, इस “महान” सब-इंस्पेक्टर का तबादला 21 दिन बाद पुणे के एक ग्रामीण इलाके में किया गया। जबकि पिछले साल ठाणे में हुए दंगों के दौरान मुस्लिम युवकों को बलप्रयोग से खदेड़ने वाले इंस्पेक्टर साहेबराव पाटिल का तबादला अगले ही दिन हो गया था…। कांग्रेसियों की नीयत पर अब भी कोई शक बचा है?

देश में होने वाले प्रत्येक हिन्दू-मुस्लिम दंगों के पीछे रची गई कुटिल चालों को उजागर करना चाहिये, ताकि हर दंगे का ठीकरा भाजपा-संघ के सिर ही न फ़ोड़ा जाये, लेकिन अक्सर यही होता कि परदे के पीछे से चाल चलने वाली कांग्रेस तो साफ़ बच निकलती है और हिन्दुओं की “प्रतिक्रिया” व्यक्त करने वाली भाजपा-सेना-संघ सामने होते हैं और उन्हें साम्प्रदायिक करार दिया जाता है, जबकि असली साम्प्रदायिक है कांग्रेस, जो शाहबानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट को लतियाकर मुसलमानों को, तथा तुरन्त ही जन्मभूमि का ताला खुलवाकर हिन्दुओं को खुश करने के चक्कर में देश की हवा खराब करती है। मेरी यह दृढ़ मान्यता है कि यदि देश से कांग्रेस (सिर्फ़ कांग्रेस नहीं, बल्कि कांग्रेसी मानसिकता) का सफ़ाया हो जाये तो हिन्दू-मुस्लिम दंगों की सम्भावना बहुत कम हो जायेगी, और देश सुखी रहेगा… आप क्या सोचते हैं?

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क्या "नेस्ले" कम्पनी, भारत के बच्चों को "गिनीपिग" समझती है? Nestle Foods GM Content and Consumer Protection

जैसा कि सभी जानते हैं, “नेस्ले” एक खाद्य पदार्थ बनाने वाली महाकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनी है। बच्चों के दूध पावडर से लेकर, कॉफ़ी, नूडल्स और चॉकलेट तक इस कम्पनी के खाद्य पदार्थों की रेंज इतनी बड़ी है कि, भारत के लाखों बच्चे और बड़े नेस्ले कम्पनी द्वारा बनाये गये किसी न किसी खाद्य पदार्थ को कभी न कभी अवश्य चख चुके होंगे। कई परिवारों में नेस्ले की कॉफ़ी, नूडल्स, बिस्किट तथा बेबी फ़ूड नियमित रूप से उपयोग किये जाते हैं।

हाल ही में नेस्ले कम्पनी ने घोषणा की है कि वह भारत में जारी किए जाने वाले अपने उत्पादों में “जेनेटिकली इंजीनियर्ड” (GE) उप-पदार्थ और मिश्रण (Ingredients) मिलाये जाने के पक्ष में है। उल्लेखनीय है कि गत कई वर्षों से समूची दुनिया में GE या GM (जेनेटिकली मेन्यूफ़ैक्चर्ड) पदार्थों के खिलाफ़ जोरदार मुहिम चलाई जा रही है। जिन लोगों को जानकारी नहीं है उन्हें बताया जाये कि GE फ़ूड क्या होता है। सीधे-सादे शब्दों में कहा जाये तो किसी भी पदार्थ के मूल गुणधर्मों और गुणसूत्रों (Genes) में वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से छेड़छाड़ अथवा फ़ेरबदल करके बनाये गये “नये पदार्थ” को ज़ेनेटिकली इंजीनियर्ड कहा जाता है। थोड़े में इसे समझें तो उस पदार्थ के ऑर्गेनिज़्म को जेनेटिक इंजीनियरी द्वारा बदलाव करके उसके गुण बदल दिये जाते हैं, एक तरह से इसे डीएनए में छेड़छाड़ भी कहा जा सकता है (उदाहरण के तौर पर घोड़े और गधी के संगम से बना हुआ “खच्चर”)। इस पद्धति से पदार्थ के मूल स्वभाव में परिवर्तन हो जाता है।

ग्रीनपीस तथा अन्य पर्यावरण और स्वास्थ्य सम्बन्धी संगठनों की माँग है कि चूंकि इन पदार्थों के बारे में अब तक कोई ठोस परीक्षण नहीं हुए हैं और इन “अप्राकृतिक” पदार्थों की वजह से मानव जीवन और धरती के पर्यावरण को खतरा है।  कई देशों ने उनके यहाँ “जीएम” खाद्य पदार्थों को प्रतिबंधित किया हुआ है। दिक्कत यह है कि “नेस्ले” जैसी कम्पनी जो कि यूरोप में तो सभी मानकों का पालन करती है और खाद्य पदार्थों की पैकिंग पर सभी कुछ स्पष्ट लिखती है, वह भारत में कानून की आड़ लेकर खुले तौर पर कुछ भी बताने को तैयार नहीं है, यह हठधर्मिता है। एक बार पहले भी कोक और पेप्सी को ज़मीन से अत्यधिक पानी का दोहन करने की वजह से केरल में कोर्ट की फ़टकार सुननी पड़ी है, लेकिन इन कम्पनियों का अभियान और अधिक जोर पकड़ता जा रहा है। विश्व की सबसे बड़ी बीज कम्पनी मोन्सेन्टो और कारगिल ने दुनिया के कई देशों में ज़मीनें खरीदकर उस पर “जीएम” बीजों का गुपचुप परीक्षण करना शुरु कर दिया है। भारत में भी बीटी बैंगन और बीटी कपास के बीजों को खुल्लमखुल्ला बेचा गया तथा मध्यप्रदेश में निमाड़ क्षेत्र के किसान आज भी इन बीटी कपास की वजह से परेशान हैं और कर्ज़ में डूब चुके हैं।

नेस्ले कम्पनी के विपणन प्रबन्धक (एशिया प्रशांत) मिस्टर वास्ज़िक को लिखे अपने पत्र में ग्रीनपीस इंडिया ने कहा है कि चूंकि नेस्ले कम्पनी के करोड़ों ग्राहक भारत में भी रहते हैं, जिसमें बड़ी संख्या मासूम बच्चों की भी है जो आये दिन चॉकलेट और नूडल्स खाते रहते हैं, इसलिये हमें यह जानने का हक है कि क्या नेस्ले कम्पनी भारत में बेचे जाने वाले उत्पादों में जेनेटिकली मोडीफ़ाइड पदार्थ मिलाती है? यदि मिलाती है तो कितने प्रतिशत? और यदि ऐसे पदार्थ नेस्ले उपयोग कर रही है तो क्या पैकेटों पर इस बारे में जानकारी दी जा रही है? एक उपभोक्ता होने के नाते प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसे पता हो कि जो वस्तु वह खा रहा है, उसमें क्या-क्या मिला हुआ है। उल्लेखनीय है कि कई वैज्ञानिक शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि जीएम खाद्य पदार्थों के कारण मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल असर होता है। अब जबकि नेस्ले कम्पनी यूरोपियन यूनियन देशों में हर खाद्य वस्तु में “जीई-फ़्री” की नीति पर चलती है, तब भारत में वह क्यों छिपा रही है? यह भेदभाव क्यों किया जा रहा है, क्या भारत के बच्चे, वैज्ञानिक प्रयोगों में उपयोग किये जाने वाले चूहे अथवा “गिनीपिग” हैं? (गिनीपिग वह प्राणी है, जिस पर वैज्ञानिक प्रयोग किये जाते हैं) जब कई बड़ी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि उनके खाद्य पदार्थों में “जीएम” का मिश्रण नहीं किया जाता, तब नेस्ले को ऐसा घोषित करने में क्या आपत्ति है? जानवरों पर किये गये जीई फ़ूड के प्रयोगों ने सिद्ध किया है कि इसके कारण विभिन्न एलर्जी, किडनी के रोग तथा नपुंसकता में वृद्धि आदि बीमारियाँ होती हैं।

इस सम्बन्ध में ग्रीनपीस इंडिया ने एक “सेफ़ फ़ूड” (सुरक्षित खाद्य पदार्थ) की गाइड जारी की है, जिसमें 16 जाने माने ब्राण्ड्स का समावेश है। इस गाइड में “लाल सूची” और “हरी सूची” है, लाल सूची में शामिल कम्पनियाँ अपने उत्पादों में या तो जीई मिश्रण मिलाती हैं या फ़िर वे यह घोषणा करने में हिचकिचाहट दिखा रही हैं, जबकि हरी सूची में शामिल कम्पनियाँ ईमानदारी से घोषणा कर चुकी हैं कि उनके उत्पादों में किसी प्रकार का “जीएम” मिश्रण शामिल नहीं है। इस सेफ़ फ़ूड गाईड में केन्द्र सरकार द्वारा “जीएम” मिश्रण को आधिकारिक रूप से मिलाने के बारे में अनुमति के बारे में भी बताया गया है। बीटी-बैंगन की तरह ही “जीई” चावल, टमाटर, सरसों और आलू भी केन्द्र सरकार की अनुमति के इन्तज़ार में हैं।

लाल सूची में शामिल हैं, नेस्ले, कैडबरी, केल्लॉग्स, ब्रिटानिया, हिन्दुस्तान यूनिलीवर, एग्रोटेक फ़ूड्स लिमिटेड, फ़ील्डफ़्रेश (भारती ग्रुप), बेम्बिनो एग्रो इंडस्ट्रीज़, सफ़ल आदि, जबकि हरी सूची (सुरक्षित) में एमटीआर, डाबर, हल्दीराम, आईटीसी, पेप्सिको इंडिया, रुचि सोया आदि शामिल हैं। इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी सैयद महबूब (syed.mehaboob@greenpeace.org, 09731301983) से ली जा सकती है।

नेस्ले कम्पनी का पिछला रिकॉर्ड भी बहुत साफ़-सुथरा नहीं रहा है, कई बार यह कम्पनी विवादों में फ़ँस चुकी है और 1977 में एक बार तो पूरे अमेरिका की जनता ने इसके सभी उत्पादों का बहिष्कार कर दिया था, बड़ी मुश्किल से इसने वापस अपनी छवि बनाई। नेस्ले का सबसे अधिक विवादास्पद प्रचार अभियान वह था, जिसमें इसने अपने डिब्बाबंद दूध पावडर को माँ के दूध से बेहतर और उसका विकल्प बताया था। इस विज्ञापन की आँधी के प्रभाव में आकर कई पश्चिमी देशों में नवप्रसूताओं ने अपने बच्चों को दूध पावडर देना शुरु कर दिया था, जबकि चिकित्सकीय और वैज्ञानिक दृष्टि से माँ का दूध ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है। एक बार स्विट्ज़रलैण्ड में भी इसकी कॉफ़ी के बीज विवादों में फ़ँस चुके हैं, तब माफ़ी माँगकर इसने अपना पीछा छुड़ाया था। हाल ही में नेस्ले कम्पनी ने यूरोपियन यूनियन में कॉफ़ी के जीएम बीजों पर पेटेंट हासिल किया है (http://www.organicconsumers.org/ge/coffee060417.cfm) जिसका ब्राजील के कॉफ़ी उत्पादकों ने कड़ा विरोध किया है, भारत में भी केरल के कॉफ़ी उत्पादकों पर भविष्य में इसका असर पड़ सकता है।

यदि आप भी जागरूक उपभोक्ता हैं तो नेस्ले कम्पनी के भारत स्थित दफ़्तर में फ़ोन लगाकर इसके उत्पादों में जीएम मिश्रण के बारे में पूछताछ कर सकते हैं, कॉल कीजिये 0124-2389300 को। अब तक 10,000 से अधिक लोग इस बारे में पूछताछ कर चुके हैं, शायद इस प्रकार ही सही, नेस्ले कम्पनी भारत वालों के प्रति अधिक जवाबदेह बने। नेस्ले के एक उपभोक्ता ने फ़ोन पर मैगी के टू मिनट नूडल्स के विज्ञापन को लेकर आपत्ति जताई, और खुला चैलेंज दिया कि कम्पनी दो मिनट में नूडल्स बनाकर दिखाये, ताकि भारत भर में हजारों रुपये के ईंधन की बचत हो सके। एक अन्य ग्राहक ने यह अपील की, कि मैगी के पैकेट पर यह बताया जाये कि दो मिनट में नूडल्स पकाने के लिये फ़्राइंग पैन की लम्बाई-चौड़ाई और गैस की लौ कितनी बड़ी होनी चाहिये, कम से कम इस बारे में ही लिख दें… लेकिन न तो कोई जवाब आना था, न आया…।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ धड़ल्ले से भारत की ज़मीन से पानी उलीच रही हैं, कोक और पेप्सी शकर के सबसे बड़े ग्राहक हैं (शकर की कीमतें बढ़ने के पीछे एक कारण यह भी है), चीन से आने वाले दूध पावडर में “मैलामाइन” (एक जहरीला कैंसरकारक पदार्थ) होना साबित हो चुका है, सॉफ़्ट ड्रिंक्स में पेस्टीसाइड भी साबित हो चुका है, एक बार “कुरकुरे” को गरम तवे पर रखकर देखिये, अन्त में प्लास्टिक की गंध और दाग मिलेगा, मतलब ये कि इनके लिये कोई कायदा-कानून नहीं है।

कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसी कोई भी कम्पनी तब तक नहीं सुधरती जब तक कि जनता इसके उत्पादों का बहिष्कार न करने लगे, जब धंधे पर चोट पड़ती है तब ये सारे कानून-कायदे मानने लगती हैं। समस्या यह है कि भारत का उपभोक्ता संगठित होना तो दूर, जागरूक भी नहीं है, और सरकारों को व्यापार के लिये अपनी सभी सीमाएं बगैर सोचे-समझे खोलने से ही फ़ुर्सत नहीं है। इन बड़ी-बड़ी कम्पनियों का तब तक कुछ नहीं बिगड़ेगा, जब तक देश में “बिकाऊ नेता” और “भ्रष्ट अफ़सरशाही” मौजूद है, सिर्फ़ प्रचार पर लाखों डालर खर्च करने वाली कम्पनी, देश के हर नेता को खरीदने की औकात रखती हैं। रही मीडिया की बात, तो उनमें भी अधिकतर बिकाऊ हैं, कुछ जानकर भी अंजान बने रहते हैं, जबकि कुछ के लिये क्रिकेट, फ़िल्मों, सलमान, धोनी, और छिछोरेपन के अलावा कोई खबर ही नहीं है…। जनता ही जागरूक बनकर ऐसे उत्पादों का बहिष्कार करे तो शायद कुछ बात बने…

ग्रीनपीस द्वारा जारी “सेफ़ फ़ूड” गाईड की छोटी कॉपी यहाँ से डाउनलोड करें…
http://www.greenpeace.org/india/assets/binaries/pocket-guide.pdf

ग्रीनपीस द्वारा जारी “सेफ़ फ़ूड” गाईड की पूरी कॉपी यहाँ से डाउनलोड करें…
http://www.greenpeace.org/india/assets/binaries/pocket-guide.pdf

(लेख और चित्र सामग्री स्रोत – ग्रीनपीस इंडिया)

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आज भी लाईट नहीं गई, सेकुलरिज़्म की जय… (एक माइक्रो पोस्ट)

लगभग दो साल पहले ईद के दिन एक पोस्ट लिखी थी, यदि उसे आज भी ज्यों का त्यों पेश कर दूं तब भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। उज्जैन में रोज़ सुबह दो घण्टे बिजली कटौती होती है, चाहे होली हो, दिवाली हो या राखी हो, लेकिन आज सुबह लाईट नहीं गई, क्यों? इसके सही जवाब पर कोई ईनाम मिलने वाला नहीं है, क्योंकि सभी जानते हैं कि आज ईद है। (जिन्हें पता न हो, वे जान लें कि मध्यप्रदेश में एक साम्प्रदायिक पार्टी का शासन है)

कुछ नकली सेकुलरों को मेरा लिखा हुआ साम्प्रदायिक लगता है, वे पूछते हैं कि यह “नकली सेकुलरिज़्म” क्या होता है? दिवाली के दिन बिजली की कटौती होना और ईद के दिन नहीं होना… वोटों के लिये शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट को लतियाना जैसे सैकड़ों उदाहरण ही नकली सेकुलरिज़्म है, तुष्टिकरण है… आया समझ में? नहीं भी आया हो तो कौन परवाह करता है तुम्हारी…।

लेकिन समस्या यह भी है कि भाजपा में जो गंदे कांग्रेसी “कीटाणु” घुस आये हैं, उसे कैसे निकाला जाये? “डॉ भागवत” विभिन्न दवाओं से कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इतना आसान नहीं लगता इस वायरस से मुक्ति पाना। दो साल पहले जब वह पोस्ट लिखी थी उस समय मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव सिर पर थे इसलिये कहा गया कि मुसलमानों के वोट लेने के लिये ईद के दिन कटौती न करके शिवराज नौटंकी कर रहे हैं, लेकिन आज की तारीख में जब कोई चुनाव नहीं होने वाले, यदि शिवराज ईद के दिन 10 घंटे की बिजली कटौती भी कर लेते तब भी कौन क्या उखाड़ लेता? लेकिन नहीं साहब… फ़िर भी भाजपा एक साम्प्रदायिक पार्टी है… मुसलमानों से सम्बन्धित केन्द्रीय योजनाओं में उत्तरप्रदेश से अधिक धन गुजरात सरकार खर्च कर रही है, लेकिन फ़िर भी मोदी “आदमखोर” हैं।

प्रिय पाठकों, अभी एक अन्य बड़ी पोस्ट लिखने में व्यस्त हूं, इसलिये…

‘माइक्रो’ को ‘मैक्रो’ समझना |
खत को तार समझना ||
मेरी इस प्रेमपाती को सेकुलरों के मुँह पर मारना… ||

(इस घटिया तुकबन्दी को कविता समझे जाने पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है)
फ़िलहाल जय हो…

दो अफ़ज़ल, मिरज़ के दंगे, महाराष्ट्र सरकार और सेकुलर मीडिया… Miraj Riots Ganesh Mandal Mumbai Secular Media

दो अफ़ज़ल? जी हाँ चौंकिये नहीं, पहला है अफ़ज़ल गुरु और दूसरा शिवाजी द्वारा वध किया गया अफ़ज़ल खान, भले ही इन दोनों अफ़ज़लों में वर्षों का अन्तर हो, लेकिन उनके “फ़ॉलोअर्स” की मानसिकता आज इतने वर्षों के बाद भी वैसी की वैसी है।

हाल ही में सम्पन्न गणेश उत्सव के दौरान मुम्बई में “अफ़ज़ल गुरु और कसाब को फ़ाँसी कब दी जायेगी?” का सवाल उठाते हुए, कुछ झाँकियों और नाटकों में इसका प्रदर्शन किया गया। वैसे तो यह सवाल समूचे देश को मथ रहा है, लेकिन मुम्बईवासियों का दर्द ज़ाहिर है कि सर्वाधिक है, इसलिये गणेशोत्सव में इस प्रकार की झाँकियाँ होना एक आम बात थी, इसमें भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन नहीं साहब, “सेकुलरिज़्म” के झण्डाबरदार और “महारानी की गुलाम” महाराष्ट्र सरकार की वफ़ादार पुलिस ने ठाणे स्थित घनताली लालबाग गणेशोत्सव मण्डल को धारा IPC 149 के तहत एक नोटिस जारी करके पूछा है कि “मुस्लिम भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली अफ़ज़ल गुरु की झाँकियाँ क्यों निकाली गईं?”। ध्यान दीजिये कांग्रेस सरकार कह रही है कि अफ़ज़ल गुरु को फ़ाँसी लगाने की माँग करने का मतलब है मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुँचान।

महाराष्ट्र में चुनाव सिर पर हैं, उदारवादी मुसलमान खुद आगे आकर बतायें कि क्या अफ़ज़ल गुरु को फ़ाँसी देने से उनकी भावनायें आहत होती हैं? यदि नहीं, तो मुस्लिमों को कांग्रेस के इस घिनौने खेल को उजागर करने हेतु आगे आना चाहिये। उपरोक्त गणेश मण्डल ने अपने जवाब में कहा है कि “हमारी झाँकी का उद्देश्य आम जनता को आतंकवाद के खिलाफ़ जागरूक और एकजुट करना है, इसमें साम्प्रदायिकता कहाँ से आ गई? भारत सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद अफ़ज़ल गुरु की फ़ाँसी में देरी से लोगों में बेचैनी है इसलिये गणेश मण्डल की यह झाँकी कहीं से भी आपत्तिजनक और देशविरोधी नहीं है…”।

यह तो हुई पहले अफ़ज़ल की बात, अब बात करते हैं दूसरे अफ़ज़ल की यानी अफ़ज़ल खान की। कांग्रेस द्वारा देश भर में “सेकुलरिज़्म” का जो खेल खेला जाता है और मुस्लिमों की भावनाओं(?) को देशहित से ऊपर रखा जाता है, उसका एक नमूना आपने ऊपर देखा इसी कांग्रेसी नीति और चालबाजियों का घातक विस्तार महाराष्ट्र के ही सांगली जिले के मिरज तहसील में देखने को मिला। सांगली जिले के मिरज़ में महाराणा प्रताप गणेशोत्सव मंडल द्वारा एक चौराहे पर विशाल झाँकी लगाई गई थी, जिसमें शिवाजी महाराज द्वारा “बघनखा” द्वार अफ़ज़ल खान का पेट फ़ाड़ते हुए वध का दृश्य चित्रित किया गया था।

3 सितम्बर को मुस्लिमों के एक उन्मादी समूह ने इस पोस्टर पर आपत्ति जताई (पता नहीं क्यों? शायद अफ़ज़ल खान को वे अपना आदर्श मानते होंगे, मुस्लिम सेनापति रखने वाले शिवाजी को नहीं)। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने भीड़ को समझाया, लेकिन वे नहीं माने, अन्ततः कांग्रेस सरकार के दबाव में शिवाजी वाला वह पोस्टर पुलिस प्रशासन द्वारा हटाने की घोषणा की गई। भीड़ ने खुशी में पाकिस्तान के झण्डे लहराये और पुलिस की जीप पर चढ़कर हरा झण्डा घुमाया,

पुलिस चुपचाप सब देखती रही, एक युवक ने नज़दीक के खम्भे पर पाकिस्तान का एक और झण्डा लगा दिया, मुस्लिमों की भीड़ नारेबाजी करती रही, लेकिन इतने भी उन्हें संतोष नहीं हुआ और उन्होंने सुनियोजित तरीके से दंगा फ़ैलाना शुरु कर दिया, और आसपास स्थित तीन गणेश मण्डलों में गणपति की मूर्तियों को पत्थर मार-मारकर तोड़ दिया।

आप सोच रहे होंगे कि प्रशासन क्या कर रहा था, आप प्रशासन को इतना निकम्मा न समझिये, पुलिस ने शिवसेना के दो पार्षदों, गणेशोत्सव मण्डल अध्यक्षों और अन्य हिन्दूवादी नेताओं को “भावनायें भड़काने” के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया। पुलिस ने बाद में कहा कि इन्होंने झाँकियों की “आचार संहिता” का उल्लंघन किया है (यानी शिवाजी महाराज द्वारा हकीकत में घटित एक घटना को चित्रित करना आचार संहिता का उल्लंघन है)। दंगों में पुलिस की एक जीप, चार सार्वजनिक वाहन और कुछ अन्य निजी वाहन जला दिये गये। इसके विरोध में हिन्दू संगठनों ने गणेश मूर्ति विसर्जित करने से इंकार कर दिया तब पुलिस ने उन्हें धमकाया और जबरदस्ती पुलिस गाड़ी में डालकर गणेश जी का विसर्जन करवा दिया। सांगली जिले में 2 दिन तक कर्फ़्यू लगा रहा और हिन्दू संगठनों ने अभी तक गणेश विसर्जन नहीं किया है उनकी मांग है कि अफ़ज़ल खान की वह झाँकी जब तक दोबारा उसी स्थान पर नहीं लगाई जाती, गणेश विसर्जन नहीं होगा। यह सारा मामला पूर्वनियोजित और सुनियोजित था इसका सबूत यह है कि जिस रास्ते से गणेश मूर्तियाँ निकलने वाली थीं, वहाँ एक दरवाजे के सामने दो दिन पहले ही लोहे के एंगल लगाकर रास्ता सँकरा करने की कोशिश की गई थी, ताकि मूर्तियाँ न निकल सकें

यह जानकर भी बिलकुल आश्चर्य मत कीजियेगा कि उस पूरे इलाके की मुस्लिम महिलायें एक दिन पहले ही इलाका छोड़कर बाहर चली गई थीं… बाकी तो आप समझदार हैं।

इन दोनों मामलों में हमारे सबसे तेज़, सबसे सेकुलर, मीडिया ने “ब्लैक आउट” कर दिया, किसी-किसी चैनल पर सिर्फ़ एक लाइन की खबर दिखाई, क्योंकि मीडिया को सलमान खान, महेन्द्रसिंह धोनी और राखी सावन्त जैसे लोग अधिक महत्वपूर्ण लगते हैं, या फ़िर गुजरात की कोई भी मोदी विरोधी खबर या भाजपा की उठापटक। “मीडिया हिन्दूविरोधी है” इस श्रृंखला में यह एक और सबूत है, (सुना आपने “बुरका दत्त”)।

सारे झमेले से कई सवाल खड़े होते हैं कि – उदारवादी मुस्लिम इस प्रकार की हरकतों को रोकने के लिये आगे क्यों नहीं आते? यदि घटना हो ही जाये तब इसकी कड़ी आलोचना या कोई कार्रवाई क्यों नहीं करते? शाहबानो मामले में पीड़ित महिला के पक्ष में बोलने वाले आरिफ़ मोहम्मद खान को मुस्लिम समाज अपना नेता क्यों नहीं मानता, बुखारियों को क्यों मानता है? कांग्रेस की चालबाजियों को हमेशा नजर-अंदाज़ कर देते हैं, दंगों के मुख्य कारणों पर नहीं जाते और गुस्साये हुए हिन्दुओं का पक्ष रखने वाली भाजपा-शिवसेना के दोष ही याद रखते हैं? और सबसे बड़ी बात कि अफ़ज़ल खान या अफ़ज़ल गुरु का विरोध करने पर मुस्लिम भड़कते क्यों हैं? यह कैसी मानसिकता है? ऊपर से तुर्रा यह कि पुलिस हमें अनावश्यक तंग करती है, हिन्दू नफ़रत की निगाह से देखते हैं, अमेरिका जाँच करता है… आदि-आदि। उदारवादी मुस्लिम खुद अपने भीतर झाँककर देखें कि उग्रवादी मुस्लिमों की वजह से उनकी छवि कैसी बन रही है।

नीचे दिये हुए पहले वीडियो (7 मिनट) में आप देख सकते हैं कि किस तरह डीएसपी स्तर का अधिकारी मुस्लिमों की भीड़ को समझाने में लगा हुआ है, एक युवक सरकारी “ऑन ड्यूटी” जीप पर चढ़कर हरा झण्डा लहराता है, लेकिन पुलिस कुछ नहीं करती (जबकि उसी समय उसका पुठ्ठा सुजाया जाना चाहिये था)। वीडियो के अन्त में एक लड़का पाकिस्तान का झण्डा एक खम्भे पर खोंसता दिखाई देगा। पथराव करने वाली भीड़ में छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं, क्या है यह सब?

First Video (7 min.)
http://www.youtube.com/watch?v=o-J0mD8naAg

इस वीडियो में भीड़ गणेशोत्सव मण्डलों के मण्डप में मूर्ति पर पथराव करती दिखाई देगी…

Second Video (3 min.)
http://www.youtube.com/watch?v=nsX6LYdNBNw

अब अन्त में एक आसान सा “ब्लड टेस्ट” कर लीजिये… यदि यह सब पढ़कर आपका खून उबालें नहीं लेता, तो निश्चित जानिये कि या तो आप “सेकुलर” हैं या “नपुंसक” (दोनो एक साथ भी हो सकते हैं)…

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>माननीय सुप्रीम कोर्ट जी, "उन्हें" मुआवज़ा और पेंशन, हम कहाँ जायें? Compensation to Criminal and Pension to Terrorist

>पाकिस्तानी आतंकवादी अज़मल कसाब को मिलने वाली सुविधाओं और उसकी मांगों के बारे में तथा सरकार और अन्य “दानवाधिकार” संगठनों द्वारा उसके आगे बिछे जाने को लेकर पहले भी काफ़ी लिखा जा चुका है (ये और बात है कि चाहे कोई भी राष्ट्रवादी व्यक्ति कितनी ही आलोचना कर ले, कांग्रेस और हमारे हिन्दुत्वविरोधी मीडिया पर कोई असर नहीं पड़ता)। इसी प्रकार कश्मीर में मारे गये आतंकवादियों के परिवारों के आश्रितों को कांग्रेस-मुफ़्ती-फ़ारुक द्वारा आपसी सहमति से बाँटे गये पैसों पर भी काफ़ी चर्चा हो चुकी है। यह घटनायें कांग्रेस सरकारों द्वारा प्रायोजित और आयोजित होती थीं, सो इसकी जमकर आलोचना की गई, प्रत्येक देशप्रेमी को (सेकुलरों को छोड़कर) करना भी चाहिये। लेकिन अब एक नया ही मामला सामने आया है, जिसकी आलोचना भी हम-आप नहीं कर सकते।

जैसा कि सभी जानते हैं हमारे देश की न्यायपालिकाएं एक “लाजवन्ती” नारी से भी ज्यादा छुई-मुई हैं, जरा सा “छेड़” दो, तो तड़ से उनकी अवमानना हो जाती है। इसलिए पहले ही घोषणा कर दूं कि यह लेख मेरे प्रिय पाठकों के लिये सिर्फ़ “एक खबर” मानी जाये, “माननीय” न्यायालय के खिलाफ़ टिप्पणी नहीं…

11 अगस्त को “माननीय” सर्वोच्च न्यायालय की दो जजों तरुण चटर्जी और आफ़ताब आलम की खण्डपीठ ने गुजरात में नवम्बर 2005 में एनकाउंटर में मारे गये सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी के परिजनों को दस लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया है। ऐसे में “माननीय” न्यायालय से पूछने को जी चाहता है कि क्या ज्ञात और घोषित अपराधियों के परिजनों के लिये मुआवज़ा घोषित करने से गलत संदेश नहीं जायेगा? मुआवज़ा कितना मिलना चाहिये, यह निर्धारित करते समय क्या “माननीय” न्यायालय ने उस परिवार के “पाप में सहभागी होने” और उसकी आय को ध्यान में रखा है? इन अपराधियों द्वारा अब तक मारे गये निर्दोष व्यक्तियों के परिजनों को क्या ऐसा कोई मुआवज़ा “माननीय” न्यायालय ने दिया है? यदि इन अपराधियों द्वारा मारे गये लोगों के परिजन “माननीय” न्यायालय की दृष्टि के सामने नहीं आ पाये हैं तो क्या इसमें उनका दोष है, और क्या यही न्याय है? एक सामान्य और आम नागरिक इस निर्णय को किस प्रकार देखे? क्या यह निर्णय अपराधियों के परिवारों को कानूनी रूप से पालने-पोसने और उन अपराधियों द्वारा सरेआम एक न्यायप्रिय और कानून का पालन करने वाले आम नागरिक के साथ बलात्कार जैसा नहीं लगता?

उल्लेखनीय है कि सोहराबुद्दीन उज्जैन के पास उन्हेल का रहने वाला एक ट्रक चालक था, जिसे इन्दौर से कांडला बन्दरगाह माल लाने-ले जाने के दौरान अपराधियों का सम्पर्क मिला और वह बाद में दाऊद की गैंग के लिये काम करने लगा। मध्यप्रदेश, गुजरात और राजस्थान सरकारों के लिये वह एक समय सिरदर्द बन गया था और दाऊद के अपहरण रैकेट में उसकी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही। सोहराबुद्दीन को गुजरात पुलिस द्वारा मार गिराये जाने के बाद जब उसका शव उसके पैतृक गाँव लाया गया तब उसकी शवयात्रा का स्वागत एक गुट द्वारा हवा में गोलियां दाग कर किया गया था। इस व्यक्ति के परिजनों को जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई का 10 लाख रुपया देने के पीछे “माननीय” न्यायालय का क्या उद्देश्य है, यह समझ से परे है।

आज जबकि समूचा भारत आतंकवाद से जूझ रहा है, आतंकवादियों और अन्तर्राष्ट्रीय अपराधियों में खुलेआम सांठगांठ साबित हो चुकी है, ऐसे में यह उदाहरण पेश करना क्या “माननीय” न्यायालय को शोभा देता है? खासकर ऐसे में जबकि हमारे जांबाज पुलिसवाले कम से कम संसाधनों और पुराने हथियारों से काम चला रहे हों और उनकी जान पर खतरा सतत मंडराता है? सवाल यह भी है कि “माननीय” न्यायालय ने अब तक कितने पुलिसवालों और छत्तीसगढ़ में रोजाना शहीद होने वाले पुलिसवालों को दस-दस लाख रुपये दिलवाये हैं?

दाऊद का एक और गुर्गा अब्दुल लतीफ़, जो कि साबरमती जेल से मोबाइल द्वारा सतत अपने साथियों के सम्पर्क में था, एक मध्यरात्रि में जेल से भागते समय पुलिस की गोली का शिकार हुआ, इस प्रकार के घोषित रूप से समाजविरोधी तत्वों को इस तरह “टपकाने” में कोई बुराई नहीं है, बल्कि इसे कानूनन जायज़ बना दिया जाना चाहिये, खासकर ऐसे मामलों में जहाँ न्यायालय द्वारा यह साबित किया जा चुका हो कि वह व्यक्ति कुख्यात अपराधी है और जेहादी संगठनों से उसकी मिलीभगत है, तभी हम आतंकवाद पर एक हद तक अंकुश लगा पाने में कामयाब होंगे।

“माननीय” न्यायालय को यह समझना चाहिये कि मुआवज़ा अवश्य दिया जाये, लेकिन सिर्फ़ उन्हीं को जो गलत पहचान के शिकार होकर पुलिस के हाथों मारे गये हैं (जैसे कनॉट प्लेस दिल्ली की घटना में वे दोनो व्यापारी)। एक अपराधी के परिजनों को मुआवज़ा देने से निश्चित रूप से गलत संदेश गया है। लेकिन यह बात हमारे सेकुलरों, लाल बन्दरों और झोला-ब्रिगेड वाले कथित मानवाधिकारवादियों को समझ नहीं आयेगी।

बाटला हाउस की जाँच में पुलिस वालों की भूमिका निर्दोष पाई गई है, लेकिन फ़िर भी सेकुलरों का “फ़र्जी मुठभेड़” राग जारी है, साध्वी प्रज्ञा के साथ अमानवीय बर्ताव जारी है लेकिन मानवाधिकार और महिला आयोग चुप्पी साधे बैठा है। अब बाटला हाउस कांड की जाँच सीबीआई से करवाने की मांग की जा रही है, यदि उसमें भी पुलिस को क्लीन चिट मिल गई तो ये सेकुलर लोग मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जायेंगे।

एक बार पहले भी “माननीय” सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों के सम्बन्ध में तीस्ता सीतलवाड द्वारा बगैर हस्ताक्षर किये कोरे हलफ़नामें स्वीकार किये हैं तथा, एक और “माननीय” हाईकोर्ट ने एक युवती इशरत जहाँ को, जिसे आतंकवादियों से गहरे सम्बन्ध होने की वजह से गुजरात पुलिस द्वारा मार गिराया गया था, उसकी न्यायिक जाँच के आदेश दिये थे, जबकि लश्कर-ए-तैयबा की वेबसाईट पर इशरतजहाँ को “शहीद” के रूप में खुलेआम चित्रित किया जा चुका था। ताज़ा समाचार के अनुसार कसाब को अण्डाकार जेल में रोज़े रखने/खोलने के लिये रोज़ाना समय बताया जायेगा ताकि उसकी धार्मिक भावनायें(?) आहत न हों, जबकि साध्वी प्रज्ञा को एक बार अंडा खिलाने की घृणित कोशिश की जा चुकी है, “सेकुलर देशद्रोहियों” के पास इस बात का भी कोई जवाब नहीं है कि यदि साध्वी प्रज्ञा जेल में गणेश मूर्ति स्थापित करने की मांग करें, तो क्या अनुमति दी जायेगी? “सेकुलरिज़्म” के कथित योद्धा इन बातों पर एक “राष्ट्रविरोधी चुप्पी” साध जाते हैं या फ़िर गोलमोल जवाब देते हैं, क्योंकि जैसा कि सभी जानते हैं, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ़ बोलना-लिखना अथवा मुसलमानों के पक्ष में कुछ भी बोलना ही सेकुलरिज़्म कहलाता है। ये दो “पैरामीटर” सेकुलर घोषित किये जाने के लिये पर्याप्त हैं। ये घटिया लोग जीवन भर “संघ और हिन्दुत्व” को गाली देने में ही अपनी ऊर्जा खपाते रहे, और इन्हें पता भी नहीं कि भारत के पिछवाड़े में डण्डा करने वाली ताकतें मजबूत होती रहीं।

शुरुआत में जिन दोनों मामलों (कसाब और कश्मीर के आतंकवादी) का जिक्र किया गया था, उनमें तो “सरकारी तंत्र” और वोट बैंक की राजनीति ने अपना घृणित खेल दिखाया था, लेकिन अब “माननीय” न्यायालय भी ऐसे निर्णय करेगा तो आम नागरिक कहाँ जाये?

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विशेष नोट - इस लेख में “माननीय” शब्द का उपयोग 12-13 बार किया है, इसी से पता चलता है कि मैं कानून का कितना घोर, घनघोर, घटाटोप सम्मान करता हूं, और “अवमानना” करने का तो कोई सवाल ही नहीं है :)। टिप्पणी करने वाले बन्धु-भगिनियाँ भी टिप्पणी करते समय माननीय शब्द का उपयोग अवश्य करें वह भी डबल कोट के साथ… वरना आप तो जानते ही हैं कि पंगेबाज के साथ क्या हुआ था।

फ़िलहाल यू-ट्यूब की यह लिंक देखें और अपना कीमती (और असली) खून जलायें… सेकुलर UPA के सौजन्य से… :)

http://www.youtube.com/watch?v=NK6xwFRQ7BQ

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अमेरिका में शाहरुख खान को रोकने के दो और मजबूत कारण… Shahrukh Khan Detention At US-Airport

गत दिनों शाहरुख को अमेरिका के नेवार्क हवाई अड्डे पर सुरक्षा जाँच के लिये रोके जाने पर खासा बावेला खड़ा किया गया था। शाहरुख खान का हास्यास्पद बयान था कि उसे मुस्लिम होने की वजह से परेशान किया गया, और भारत में सेकुलरों और हमारे भाण्ड-गवैये टाइप इलेक्ट्रानिक मीडिया को एक मुद्दा मिल गया था दो दिन तक चबाने के लिये। हालांकि इस मुद्दे पर अमेरिका के सुरक्षा अधिकारियों की तरफ़ से भी स्पष्टीकरण आ चुका है, लेकिन इस मामले में शाहरुख को वहाँ रोके रखने के दो और सम्भावित कारण सामने आये हैं।

उल्लेखनीय है कि भारत से फ़िल्मी कलाकार अक्सर अमेरिका स्टेज शो करके डालर में मोटी रकम कमाने आते-जाते रहते हैं। डालर की चकाचौंध के कारण विदेशों में इस प्रकार के कई संगठन खड़े हो गये हैं जो भारतीय फ़िल्म कलाकारों को बुलाते रहते हैं, यदि भारतीय कलाकार वहाँ सिर्फ़ “भारत के नागरिक” बनकर जायें तो उन्हें उतना पैसा नहीं मिलेगा, चूंकि हिन्दी फ़िल्मों की लोकप्रियता पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान में भी काफ़ी है, इसलिये अमेरिका, कनाडा आदि देशों में ऐसे सभी आप्रवासियों को एकत्रित करके इस प्रकार के स्टेज शो को “साउथ एशिया” के किसी संगठन का नाम दे दिया जाता है। इस चालाकी में कोई बुराई नहीं है, बल्कि यह तो भारतीय कलाकारों और हिन्दी फ़िल्मों की ताकत का प्रदर्शन है। शाहरुख खान का 15 अगस्त का दौरा ऐसे ही एक कार्यक्रम हेतु था (वे वहाँ भारत के किसी स्वाधीनता दिवस कार्यक्रम में भाग लेने नहीं गये थे, बल्कि पैसा कमाने गये थे)। 15 अगस्त को शिकागो और ह्यूस्टन में अमेरिका स्थित भारतीयों और पाकिस्तानियों के एक ग्रुप ने “साउथ एशिया कार्निवाल” का आयोजन रखा था, उसमें शाहरुख बतौर “मेहमान”(?) बुलाये गये थे। इस कार्निवाल का टिकट 25 डालर प्रति व्यक्ति था, मेले में बॉलीवुड के कई कलाकारों के नृत्य-गीत का कार्यक्रम, एक फ़ैशन शो और एक वैवाहिक आईटमों की प्रदर्शनी शामिल था (तात्पर्य यह कि “स्वतन्त्रता दिवस” जैसा कोई कार्यक्रम नहीं था, जिसका दावा शाहरुख अपनी देशभक्ति दर्शाने के लिये कर रहे थे)। इस कार्निवाल के विज्ञापन में सैफ़ अली खान, करीना, कैटरीना, दीया मिर्ज़ा और बिपाशा बसु का भी नाम दिया जा रहा था, इस कार्निवाल को भारत की एयर इंडिया तथा सहारा एवं पाकिस्तान की दो बड़ी कम्पनियाँ प्रायोजित कर रही थीं, पूरे विज्ञापन में कहीं भी भारत या पाकिस्तान (14 अगस्त) के स्वतन्त्रता दिवस का कोई उल्लेख नहीं था।

तो समस्या कहाँ से शुरु हुई होगी? अमेरिका जाते समय तो ये कलाकार भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री के प्रतिनिधि और भारत के नागरिक के तौर पर जाते हैं लेकिन अमेरिका में प्रवेश करते समय कस्टम की पहचान सम्बन्धी पूछताछ के दौरान कभी-कभी ये अपने आपको “दक्षिण एशियाई” बता देते हैं। एक सम्भावना यह है कि शाहरुख ने पहले तो जाँच के नाम पर अपनी परम्परागत भारतीय “फ़ूं-फ़ाँ” दिखाई होगी, जिससे अमेरिकी पुलिसवाला और भी शक खा गया होगा अथवा भड़क गया होगा, ऊपर से तुर्रा यह था कि शाहरुख का सामान भी उनके साथ नहीं पहुँचा था (बाद में अगली फ़्लाइट से आने वाला था), ऐसे मामलों में अमेरिकी अधिकारी और अधिक सख्त तथा शंकालु हो जाते हैं। शाहरुख और उस पुलिस वाले के बीच हुई एक काल्पनिक बातचीत का आनन्द लें (क्या बात हुई होगी, इसकी एक सम्भावना) -

अमेरिकी कस्टम अधिकारी – तो मि शाहरुख आप अमेरिका क्यों आये हैं?

शाहरुख – मुझे यहाँ “साउथ एशिया कार्निवाल” में एक भाषण देने के लिये बुलाया गया है।

अधिकारी – अच्छा, वह कैसा और क्या कार्यक्रम है?

शाहरुख – (हे ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए… बकरे की तरह मिमियाने का शाहरुखी स्टाइल) दक्षिण एशिया के लोग आपस में मेलजोल बढ़ाने के लिये एकत्रित होते हैं और स्वतन्त्रता दिवस मनाते हैं…

अधिकारी – दक्षिण एशिया, क्या वह भी कोई देश है?

शाहरुख – नहीं, नहीं, दक्षिण एशिया मतलब भारत, पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान के लोग…

सुरक्षा अधिकारी पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान का नाम सुनकर ही सतर्क हो जाता है… “वेट ए मिनट मैन्…” अधिकारी अन्दर जाकर वरिष्ठ अधिकारी के कान में फ़ुसफ़ुसाता है… यह आदमी अफ़गानिस्तान-पाकिस्तान और भाषण वगैरा बड़बड़ा रहा है, मुझे शक है… इसे और गहन जाँच के लिये रोकना होगा।

सही बात तो शाहरुख और वह जाँच करने वाला अमेरिकी अधिकारी ही बता सकता है, लेकिन जैसा कि अमेरिका की सुरक्षा जाँच सम्बन्धी मानक बन गये हैं, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान का नाम सुनते ही अमेरिकी अधिकारियों के कान खड़े हो जाते हैं। ऐसे में क्या जरूरत है अपनी अच्छी खासी भारतीय पहचान छिपाकर खामखा “दक्षिण एशियाई” की पहचान बताने की? आप भले ही कितने ही शरीफ़ हों, लेकिन यदि आप वेश्याओं के मोहल्ले में रहते हैं तो सामान्यतः शक के घेरे में आ ही जाते हैं। खुद ही सोचिये, कहाँ भारत, भारत की इमेज, भारतीयों की अमेरिका में इमेज आदि, और कहाँ पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान के साथ खुद को जोड़कर देखना? है कोई तालमेल? इन “असफ़ल और आतंकवादी देशों” के साथ खुद को खड़ा करने की क्या तुक है?

जबकि इसी काल्पनिक घटना का दूसरा रूप यह भी हो सकता था –

अधिकारी – मि शाहरुख आप अमेरिका किसलिये आये हैं?

शाहरुख – मैं यहाँ भारत के स्वतन्त्रता दिवस समारोह में एक भाषण देने आया हूं।

अधिकारी – भारत का स्वतन्त्रता दिवस?

शाहरुख – जी 15 अगस्त को भारत का 63 वां स्वतन्त्रता दिवस मनाया जा रहा है।

अधिकारी – वाह, बधाईयाँ, अमेरिका में आपका स्वागत है…

संदेश साफ़ है, हम पाकिस्तान और बांग्लादेश रूपी सूअरों के दो बाड़ों से घिरे हैं, उनकी “पहचान” के साथ भारत की गौरवशाली पहचान मिक्स करने की कोई जरूरत नहीं है, गर्व से कहो हम “भारतीय” हैं, दक्षिण एशियाई क्या होता है?
(समाचार यहाँ देखें…)

2) शाहरुख को रोकने की एक और वजह सामने आई है। बेवजह इस मामले को अन्तर्राष्ट्रीय तूल दिया गया और हमारे मूर्ख मीडिया ने इसे मुस्लिम पुट देकर बेवकूफ़ाना अन्दाज़ में इसे पेश किया, जबकि इस मामले में रंग, जाति, धर्म का कोई लेना-देना नहीं था। असल में जिस कार्निवाल की बात ऊपर बताई गई उसके आयोजकों का रिकॉर्ड अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक सन्देह के घेरे में है, भले ही वे आतंकवादी गुटों से सम्बद्ध न हों लेकिन अंडरवर्ल्ड से सम्बन्धित अवश्य हैं। इस नाच-गाने के शो का प्रमुख प्रमोटर था लन्दन निवासी फ़रहत हुसैन और शिकागो में रहने वाला उसका भाई अल्ताफ़ हुसैन, इन दोनों भाईयों की एक संस्था है लेक काउंटी साउथ एशियन एंटरटेनमेंट इन्क। इन दोनों भाईयों पर टैक्स चोरी और अंडरवर्ल्ड से सम्बन्धों के बारे में अमेरिकी अधिकारियों को शक है। जैसा कि शाहरुख खान ने बाद में प्रेस से कहा कि अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों के कुछ सवाल “अपमानजनक”, “गैर-जिम्मेदाराना”, “बेतुके” थे, असल में यह सवाल इन्हीं दोनों भाईयों के सम्बन्ध में थे। कुछ समय पहले भी ऐसी ही एक कम्पनी “एलीट एंटरटेनमेंट” के प्रमोटर विजय तनेजा नामक शख्स को अमेरिका में धोखाधड़ी और अमानत में खयानत का दोषी पाया गया और उसे बन्द करवा दिया था।

अब इस पर ध्यान दीजिये… एक वरिष्ठ सीनेटर केनेडी अमेरिका में जाना-पहचाना नाम है, उन्हें भी कई बार सुरक्षा जाँच से गुजरना पड़ा, क्योंकि उनके नाम का उपयोग करके एक आतंकवादी ने अमेरिका में घुसने की कोशिश की थी, बाद में बार-बार होने वाली परेशानी से तंग आकर केनेडी ने राष्ट्रपति से गुहार लगाई और उनका नाम “शंकास्पद नामों” की लिस्ट से हटाया गया। पूर्व उपराष्ट्रपति अल-गोर एक बार बगैर सामान चेक करवाये ग्रीन दरवाजे से जाने लगे तब उन्हें भी रोककर खासी तलाशी ली गई थी। जिस दिन शाहरुख की जाँच की गई थी, उसी दिन एक दूसरे शहर में अमेरिका के प्रसिद्ध रॉक स्टार बॉब डिलन को दो पुलिसवालों ने जाँच के लिये रोका, (और पुलिस वाले यदि पहचान भी गये हों तब भी), जब वे अपनी पहचान प्रस्तुत नहीं कर पाये तब उन्हें पकड़कर उनके मेज़बान के घर ले जाया गया और तसदीक करके ही छोड़ा। उससे कुछ ही दिन पहले ओलम्पिक के मशहूर तैराक विश्व चैम्पियन माइकल फ़ेल्प्स, बीयर पीकर कार चलाते पकड़े गये, हालांकि फ़ेल्प्स द्वारा पी गई बीयर कानूनी सीमा के भीतर ही थी, लेकिन फ़िर भी पुलिसवाले उन्हें थाने ले गये, उन्हें एक लिखित चेतावनी दी गई फ़िर छोड़ा गया। (देखें चित्र)

दिक्कत यह हुई कि शाहरुख खान को उम्मीद ही नहीं थी कि एक “सुपर स्टार” होने के नाते उनसे ऐसी कड़ी पूछताछ हो सकती है, सो उन्होंने निश्चित ही वहाँ कुछ “अकड़-फ़ूं” दिखाई होगी, जिससे मामला और उलझ गया। जबकि अमेरिका में सुरक्षा अधिकारी न तो कैनेडी को छोड़ते हैं न ही अल गोर को, कहने का मतलब ये कि शाहरुख का नाम यदि “सेड्रिक डिसूजा” भी होता तो तब भी वे उसे बिना जाँच और पूछताछ के न छोड़ते। अमेरिका, अमेरिका है, न कि भारत जैसी कोई “धर्मशाला”। हमारे यहाँ तो कोई भी, कभी भी, कहीं से भी आ-जा सकता है और यहाँ के सरकारी कर्मचारी, कार्पोरेट्स, अमीरज़ादे और नेता, भ्रष्टाचार और चापलूसी की जीवंत मूर्तियाँ हैं, किसी को भी “कानून का राज” का मतलब ही नहीं पता।

तात्पर्य यह कि न तो शाहरुख के साथ कथित ज्यादती(?) “खान” नाम होने की वजह से हुई, न ही उस दिन शाहरुख का भारत के स्वतन्त्रता दिवस से कोई लेना-देना था, और इमरान हाशमी की तरह “रोतलापन” दिखाकर उन्होंने अमेरिका में अपनी हँसी ही उड़वाई है, जबकि भारत में “अभी भी” शाहरुख को सही मानने वालों की कमी नहीं होगी, इसका मुझे पूरा विश्वास है।

स्रोत – टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क यूएस तथा India Syndicate

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>काबा, एक शिव मन्दिर ही है… : वैदिक परम्पराओं के विचित्र संयोग (भाग-2) Kaaba a Hindu Temple

>(भाग…1 से http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/08/kaaba-hindu-temple-pn-oak.html आगे जारी…)

उन दिनों काबा में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला “ओकाज़” सिर्फ़ एक मेला या आनंदोत्सव नहीं था, बल्कि यह एक मंच था जहाँ विश्व के कोने-कोने से विद्वान आकर समूचे अरब में फ़ैली वैदिक संस्कृति द्वारा उत्पन्न सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, शैक्षणिक पहलुओं पर खुली चर्चा करते थे। “सायर-उल-ओकुल” का निष्कर्ष है कि इन चर्चाओं और निर्णयों को समूचे अरब जगत में सम्मान और सहमति प्राप्त होती थी। अतः एक प्रकार से मक्का, भारत के वाराणसी की तर्ज पर विद्वानों के बीच अतिमहत्वपूर्ण बहसों के केन्द्र के रूप में उभरा, जहाँ भक्तगण एकत्रित होकर परम-आध्यात्मिक सुख और आशीर्वाद लेते थे। वाराणसी और मक्का दोनों ही जगहों पर इन चर्चाओं और आध्यात्म का केन्द्र निश्चित रूप से शिव का मन्दिर रहा होगा। यहाँ तक कि आज भी मक्का के काबा में प्राचीन शिवलिंग के चिन्ह देखे जा सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि काबा में प्रत्येक मुस्लिम जिस काले पत्थर को छूते और चूमते हैं वह शिवलिंग ही है। हालांकि अरबी परम्परा ने अब काबा के शिव मन्दिर की स्थापना के चिन्हों को मिटा दिया है, लेकिन इसकी खोज विक्रमादित्य के उन शिलालेखों से लगाई जा सकती है जिनका उल्लेख “सायर-उल-ओकुल” में है। जैसा कि सभी जानते हैं राजा विक्रमादित्य शिव के परम भक्त थे, उज्जैन एक समय विक्रमादित्य के शासनकाल में राजधानी रही, जहाँ कि सबसे बड़े शिवलिंग महाकालेश्वर विराजमान हैं। ऐसे में जब विक्रमादित्य का शासनकाल और क्षेत्र अरब देशों तक फ़ैला था, तब क्या मक्का जैसी पवित्र जगह पर उन्होंने शिव का पुरातन मन्दिर स्थापित नहीं किया होगा?

अब हम पश्चिम एशिया और काबा में भारतीय और हिन्दू संस्कारों, संस्कृति से मिलती-जुलती परम्पराओं, प्रतीकों और शैलियों को हम एक के बाद एक देखते जाते हैं, और आप खुद ही अनुमान लगाईये कि आखिर काबा में स्थापित विशाल संरचना जिसे छिपाकर रखा गया है, प्राचीन काल में वह शिव मन्दिर क्यों नहीं हो सकता।

मक्का शहर से कुछ मील दूर एक साइनबोर्ड पर स्पष्ट उल्लेख है कि “इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का आना प्रतिबन्धित है…”। यह काबा के उन दिनों की याद ताज़ा करता है, जब नये-नये आये इस्लाम ने इस इलाके पर अपना कब्जा कर लिया था। इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश इसीलिये प्रतिबन्धित किया गया है, ताकि इस कब्जे के निशानों को छिपाया जा सके। जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है। इसके बाद वह सिर्फ़ “बिना सिले हुए दो सफ़ेद कपड़े” लपेट कर ही आगे बढ़ सकता है। जिसमें से एक कमर पर लपेटा जाता है व दूसरा कंधे पर रखा जाता है। यह दोनों ही संस्कार प्राचीन काल से हिन्दू मन्दिरों को स्वच्छ और पवित्र रखने हेतु वैदिक अभ्यास के तरीके हैं, यह मुस्लिम परम्परा में कब से आये, जबकि मुस्लिम परम्परा में दाढ़ी साफ़ करने को तो गैर-इस्लामिक बताया गया है? मक्का की मुख्य प्रतीक दरगाह जिसे काबा कहा जाता है, उसे एक बड़े से काले कपड़े से ढँका गया है। यह प्रथा भी “मूल प्रतीक” पर ध्यान न जाने देने के लिये एक छद्म-आवरण के रूप में उन्हीं दिनों से प्रारम्भ की गई होगी, वरना उसे इस तरह काले कपड़े में ढँकने की क्या आवश्यकता है?

“इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका” के अनुसार काबा में 360 मूर्तियाँ थीं। पारम्परिक अरबी आलेखों में उल्लेख है कि जब एक भीषण तूफ़ान से 360 मूर्तियाँ नष्ट हो गईं, तब भी शनि, चन्द्रमा और एक अन्य मूर्ति को प्रकृति द्वारा खण्डित नहीं किया जा सका। यह दर्शाता है कि काबा में स्थापित उस विशाल शिव मन्दिर के साथ अरब लोगों द्वारा नवग्रह की पूजा की जाती थी। भारत में आज भी नवग्रह पूजा की परम्परा जारी है और इसमें से दो मुख्य ग्रह हैं शनि और चन्द्रमा। भारतीय संस्कृति और परम्परा में भी चन्द्रमा को हमेशा शिव के माथे पर विराजित बताया गया है, और इस बात की पूरी सम्भावना है कि यह चन्द्रमा “काबा” के रास्ते इस्लाम ने, उनके झण्डे में अपनाया हो।

काबा से जुड़ी एक और हिन्दू संस्कृति परम्परा है “पवित्र गंगा” की अवधारणा। जैसा कि सभी जानते हैं भारतीय संस्कृति में शिव के साथ गंगा और चन्द्रमा के रिश्ते को कभी अलग नहीं किया जा सकता। जहाँ भी शिव होंगे, पवित्र गंगा की अवधारणा निश्चित ही मौजूद होती है। काबा के पास भी एक पवित्र झरना पाया जाता है, इसका पानी भी पवित्र माना जाता है, क्योंकि इस्लामिक काल से पहले भी इसे पवित्र (आबे ज़म-ज़म) ही माना जाता था। आज भी मुस्लिम श्रद्धालु हज के दौरान इस आबे ज़मज़म को अपने साथ बोतल में भरकर ले जाते हैं। ऐसा क्यों है कि कुम्भ में शामिल होने वाले हिन्दुओं द्वारा गंगाजल को पवित्र मानने और उसे बोतलों में भरकर घरों में ले जाने, तथा इसी प्रकार हज की इस परम्परा में इतनी समानता है? इसके पीछे क्या कारण है।

काबा में मुस्लिम श्रद्धालु उस पवित्र जगह की सात बार परिक्रमा करते हैं, दुनिया की किसी भी मस्जिद में “परिक्रमा” की कोई परम्परा नहीं है, ऐसा क्यों? हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक मन्दिर में मूर्ति की परिक्रमा करने की परम्परा सदियों पुरानी है। क्या काबा में यह “परिक्रमा परम्परा” पुरातन शिव मन्दिर होने के काल से चली आ रही है? अन्तर सिर्फ़ इतना है कि मुस्लिम श्रद्धालु ये परिक्रमा उल्टी ओर (Anticlockwise) करते हैं, जबकि हिन्दू भक्त सीधी तरफ़ यानी Clockwise। लेकिन हो सकता है कि यह बारीक सा अन्तर इस्लाम के आगमन के बाद किया गया हो, जिस प्रकार उर्दू भी दांये से बांये लिखी जाती है, उसी तर्ज पर। “सात” परिक्रमाओं की परम्परा संस्कृत में “सप्तपदी” के नाम से जानी जाती है, जो कि हिन्दुओं में पवित्र विवाह के दौरान अग्नि के चारों तरफ़ लिये जाते हैं। “मखा” का मतलब होता है “अग्नि”, और पश्चिम एशिया स्थित “मक्का” में अग्नि के सात फ़ेरे लिया जाना किस संस्कृति की ओर इशारा करता है?

यह बात तो पहले से ही स्थापित है और लगभग सभी विद्वान इस पर एकमत हैं कि विश्व की सबसे प्राचीन भाषा पाली, प्राकृत और संस्कृत हैं। कुर-आन का एक पद्य “यजुर्वेद” के एक छन्द का हूबहू अनुवाद है, यह बिन्दु विख्यात इतिहास शोधक पण्डित सातवलेकर ने अपने एक लेख में दर्शाया है। एक और विद्वान ने निम्नलिखित व्याख्या और उसकी शिक्षा को कुरान में और केन उपनिषद के 1.7 श्लोक में एक जैसा पाया है।

कुरान में उल्लेख इस प्रकार है –
“दृष्टि उसे महसूस नहीं कर सकती, लेकिन वह मनुष्य की दृष्टि को महसूस कर सकता है, वह सभी रहस्यों को जानता है और उनसे परिचित है…”

केन उपनिषद में इस प्रकार है –

“वह” आँखों से नहीं देखा जा सकता, लेकिन उसके जरिये आँखें बहुत कुछ देखती हैं, वह भगवान है या कुछ और जिसकी इस प्रकट दुनिया में हम पूजा करते हैं…”

इसका सरल सा मतलब है कि : भगवान एक है और वह किसी भी सांसारिक या ऐन्द्रिय अनुभव से परे है।

इस्लाम के अस्तित्व में आने के 1300 वर्ष हो जाने के बावजूद कई हिन्दू संस्कार, परम्परायें और विधियाँ आज भी पश्चिम एशिया में विद्यमान हैं। आईये देखते हैं कि कौन-कौन सी हिन्दू परम्परायें इस्लाम में अभी भी मौजूद हैं – हिन्दुओं की मान्यता है कि 33 करोड़ देवताओं का एक देवकुल होता है, पश्चिम एशिया में भी इस्लाम के आने से पहले 33 भगवानों की पूजा की जाती थी। चन्द्रमा आधारित कैलेण्डर पश्चिम एशिया में हिन्दू शासनकाल के दौरान ही शुरु किया गया। मुस्लिम कैलेण्डर का माह “सफ़र” हिन्दुओं का “अधिक मास” ही है, मुस्लिम माह “रबी” असल में “रवि” (अर्थात सूर्य) का अपभ्रंश है (संस्कृत में “व” प्राकृत में कई जगह पर “ब” होता है)। मुस्लिम परम्परा “ग्यारहवीं शरीफ़”, और कुछ नहीं हिन्दू “एकादशी” ही है और दोनों का अर्थ भी समान ही है। इस्लाम की परम्परा “बकरीद”, वैदिक कालीन परम्परा “गो-मेध” और “अश्व-मेध” यज्ञ से ली गई है। संस्कृत में “ईद” का अर्थ है पूजा, इस्लाम में विशेष पूजा के दिन को “ईद” कहा गया है। संस्कृत और हिन्दू राशि चक्र में “मेष” का अर्थ मेमना, भेड़, बकरा होता है, प्राचीन काल में जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता था तब मांस के सेवन की दावत दी जाती थी। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस्लाम ने इसे “बकरीद” के रूप में स्वीकार किया है (उल्लेखनीय है कि हिन्दी में भी “बकरी” का अर्थ बकरी ही होता है)। जिस प्रकार “ईद” का मतलब है पूजा, उसी प्रकार “गृह” का मतलब है घर, “ईदगृह = ईदगाह = पूजा का घर = पूजास्थल, इसी प्रकार “नमाज़” शब्द भी नम + यज्ञ से मिलकर बना है, “नम” अर्थात झुकना, “यज्ञ” अर्थात पूजा, इसलिये नम + यज्ञ = नमज्ञ = नमाज़ (पूजा के लिये झुकना)। इस्लाम में नमाज़ दिन में 5 बार पढ़ी जाती है जो कि वैदिक “पंचमहायज्ञ” का ही एक रूप है (दैनिक पाँच पूजा – पंचमहायज्ञ) जो कि वेदों में सभी व्यक्तियों के लिये दैनिक अनुष्ठान का एक हिस्सा है। वेदों में वर्णन है कि पूजा से पहले, “शरीरं शुद्धयर्थं पंचगंगा न्यासः” अर्थात पूजा से पहले शरीर के पाँचों अंगों को गंगाजल से धोया जाये, इसी प्रकार इस्लाम में नमाज़ से पहले शरीर के पाँचों भागों को स्वच्छ किया जाता है।

इस्लाम में “ईद-उल-फ़ितर” भी मनाया जाता है, जिसका मतलब है “पितरों की ईद” या पितरों की पूजा, अर्थात पूर्वजों का स्मरण करना और उनकी पूजा करना, यह सनातन काल से हिन्दू परम्परा का एक अंग रहा है। हिन्दू लोग “पितर-पक्ष” में अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिये पूजा-हवन करते हैं उन्हें याद करते हैं यही परम्परा इस्लाम में ईद-उल-फ़ितर (पितरों की पूजा) के नाम से जानी जाती है। प्रत्येक मुख्य त्योहार और उत्सव के पहले चन्द्रमा की कलायें देखना, चन्द्रोदय और चन्द्रास्त देखना भी हिन्दू संस्कृति से ही लिया गया है, इस्लाम के आने से हजारों साल पहले से हिन्दू संकष्टी और विनायकी चतुर्थी पर चन्द्रमा के उदय के आधार पर ही उपवास तोड़ते हैं। यहाँ तक कि “अरब” शब्द भी संस्कृत की ही उत्पत्ति है, इसका मूल शब्द था “अरबस्तान” (प्राकृत में “ब” संस्कृत में “व” बनता है अतः “अरवस्तान”)। संस्कृत में “अरव” का अर्थ होता है “घोड़ा” अर्थात “घोड़ों का प्रदेश = अरवस्तान” (अरबी घोड़े आज भी विश्वप्रसिद्ध हैं) अपभ्रंश होते-होते अरवस्तान = अरबस्तान = अरब प्रदेश।

चन्द्रमा के बारे में विभिन्न नक्षत्रीय तारामंडलों और ब्रह्माण्ड की रचना के बारे में वैदिक विवरण कुरान में भी भाग 1, अध्याय 2, पैराग्राफ़ 113, 114, 115, 158 और 189 तथा अध्याय 9, पैराग्राफ़ 37 व अध्याय 10 पैराग्राफ़ 4 से 7 में वैसा ही दिया गया है। हिन्दुओं की भांति इस्लाम में भी वर्ष के चार महीने पवित्र माने जाते हैं। इस दौरान भक्तगण बुरे कर्मों से बचते हैं और अपने भगवान का ध्यान करते हैं, यह परम्परा भी हिन्दुओं के “चातुर्मास” से ली गई है। “शबे-बारात” शिवरात्रि का ही एक अपभ्रंश है, जैसा कि सिद्ध करने की कोशिश है कि काबा में एक विशाल शिव मन्दिर था, तत्कालीन लोग शिव की पूजा करते थे और शिवरात्रि मनाते थे, शिव विवाह के इस पर्व को इस्लाम में “शब-ए-बारात” का स्वरूप प्राप्त हुआ।

ब्रिटैनिका इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार काबा की दीवारों पर कई शिलालेख और स्क्रिप्ट मौजूद हैं, लेकिन किसी को भी उनका अध्ययन करने की अनुमति नहीं दी जाती है, एक अमेरिकन इतिहासकार ने इस सम्बन्ध में पत्र व्यवहार किया था, लेकिन उसे भी मना कर दिया गया। लेकिन प्रत्यक्ष देखने वालों का मानना है कि उसमें से कुछ शिलालेख संस्कृत, पाली या प्राकृत भाषा में हो सकते हैं। जब तक उनका अध्ययन नहीं किया जायेगा, विस्तार से इस सम्बन्ध में कुछ और बता पाना मुश्किल है।

(लेखमाला के तीसरे और अन्तिम भाग में संस्कृतनिष्ठ नामों और चिन्हों आदि के बारे में…)
जारी रहेगा भाग…3 में…

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>घबराने की आवश्यकता नहीं, यह "कुलकर्णी वायरस" का बुखार है… मरीज़ जल्दी ही ठीक होगा… Secularism in BJP, Muslim Votes, Defeat in Elections

>भाजपा में बहुप्रतीक्षित उठापटक आखिरकार शुरु हो ही गई। इस बात का इन्तज़ार काफ़ी समय से किया जा रहा था कि लगातार दो चुनाव हारने के बाद ही सही शायद भाजपा के सिर से “सेकुलर” नाली में लोट लगाने का भूत उतर गया हो, लेकिन शायद अभी नहीं। सबसे पहले पुस्तक के बहाने जसवन्त सिंह को बाहर किया गया, जबकि जसवन्त सिंह को बाहर करने की असली वजह है वह चिठ्ठी जिसमें उन्होंने हार के लिये जिम्मेदार व्यक्तियों को पुरस्कृत करने पर सवाल उठाया था। “बहाने से” इसलिये कह रहा हूं कि उनकी विवादित पुस्तक के रिलीज़ होने के 36 घण्टे के भीतर उन्हें अपमानजनक तरीके से निकाल दिया गया, मुझे नहीं पता कि 36 घंटे से कम समय में पार्टी ने या इसके चिन्तकों ने 700 पेज की यह पुस्तक कब पढ़ी, और कब उसमें से यह भी ढूंढ लिया कि यह पार्टी विरोधी है, लेकिन ताबड़तोड़ न कोई नोटिस, न कोई अनुशासन समिति, सीधे बाहर…।

अब हार के लिये “जिम्मेदार व्यक्ति” यानी कौन? ज़ाहिर है कि पार्टी पर काबिज एक गुट, जो कि भाजपा को सेकुलर बनाने और अपना उल्लू सीधा करके पार्टी को कांग्रेस की एक घटिया “बी” टीम बनाने पर तुला हुआ है। लेकिन “सीधी बात” कर दी अरुण शौरी ने, ऐसे व्यक्ति ने, जिसे पार्टी का बौद्धिक चेहरा समझा जाता है, ज़मीनी नहीं। ऐसे व्यक्ति ने आम कार्यकर्ताओं के मन की बात पढ़ते हुए बिना किसी लाग-लपेट के सच्ची बात कह दी अर्थात “संघ को भाजपा को टेक-ओवर कर लेना चाहिये…”, और इस बात से पार्टी में कुछ लोगों को सिर्फ़ मिर्ची नहीं लगी, बल्कि भूचाल सा आ गया है। जबकि अरुण शौरी द्वारा लगाये गये सारे आरोप, एक आम कार्यकर्ता के दिल की बात है।

लेकिन सुधीन्द्र कुलकर्णी नामक “सेकुलर वायरस” ने पार्टी को इस कदर जकड़ रखा था कि उसका असर दिमाग पर भी हो गया था, और पार्टी कुछ सोचने की स्थिति में ही नहीं थी, सिवाय एक बात के कि किस तरह मुसलमानों को खुश किया जाये, किस तरह से मुस्लिम वोट प्राप्त करने के लिये तरह-तरह के जतन किये जायें। जो छोटी सी बात एक सड़क का कार्यकर्ता समझता है कि चाहे भाजपा लगातार 2 माह तक शीर्षासन भी कर ले, मुस्लिम उसे वोट नहीं देने वाले, यह बात शीर्ष नेतृत्व को समझ नहीं आई। पहले इस कुलकर्णी वायरस ने आडवाणी को चपेट में लिया, वे जिन्ना की मज़ार पर गये, वहाँ जाकर पता नहीं क्या-क्या कसीदे काढ़ आये, जबकि बेचारे जसवन्त सिंह ने तो जिन्ना को शराबी, अय्याश और स्वार्थी बताया है। फ़िर भी चैन नहीं मिला तो आडवाणी ने पुस्तक लिख मारी और कंधार प्रकरण से खुद को अलग कर लिया, जबकि बच्चा भी समझता है कि बगैर देश के गृहमंत्री की सलाह या जानकारी के कोई भी इस प्रकार दुर्दान्त आतंकवादियों को साथ लेकर नहीं जा सकता। थोड़ी कसर बाकी रह गई थी, तो खुद को “मजबूत प्रधानमंत्री” भी घोषित करवा लिया, पुस्तक के उर्दू संस्करण के विमोचन में भाजपा-संघ को पानी पी-पीकर कोसने वाले नामवर सिंह और एक अन्य मुस्लिम लेखक को मंच पर बुला लाये। कहने का मतलब यह कि हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और पार्टी की पहचान बने सारे मुद्दे को छोड़कर भाजपा ने अपनी चाल ही बदल ली, ऐसे में आम कार्यकर्ता का दुखी और हताश होना स्वाभाविक ही था, हालांकि कार्यकर्ता बेमन से ही सही चुनाव प्रचार में जुटे, लेकिन जनता के मन में कांग्रेस के प्रति जो गुस्सा था उसे भाजपा नेतृत्व भुना नहीं पाया, क्योंकि “सेकुलर वायरस” के कारण उसकी आँखों पर हरी पट्टी बँध चुकी थी। पार्टी भूल गई कि जिस विचारधारा और मुद्दों की बदौलत वे 2 सीटों से 190 तक पहुँचे हैं, वही छोड़ देने पर उसे वापस 116 पर आना ही था। वोटिंग पैटर्न देखकर ऐसे कई उदाहरण दिये जा सकते हैं जहाँ मुसलमानों ने रणनीति के तहत “सिर्फ़ भाजपा को हराने के लिये” वोटिंग की है, उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि जीतने वाला कांग्रेसी है, या बसपाई, या सपाई, बस भाजपा को हराना था। यानी भाजपा की हालत “आधी छोड़ पूरी को धाये, आधी पाये न पूरी पाये” जैसी हो गई। जो परम्परागत हिन्दू वोट बैंक था, वह तो दरक गया, कर्मों की वजह से हाथ से खिसक गया और बदले में मिला कुछ नहीं। पार्टी पर काबिज एक गुट ने प्रश्न पूछने के लिये पैसा लेने वाल्रे सांसदों पर कड़ी कार्रवाई नहीं की, स्टिंग आपरेशन होने पर भी बेशर्मी से भ्रष्टों का बचाव करते रहे, टीवी पर चेहरा दिखाने के लालच में धुर-भाजपा विरोधी चैनलों पर चहक-चहककर बातें करते रहे, गरज यह कि पार्टी को बरबाद करने के लिये जो कुछ बन पड़ा सब किया। “हिन्दुत्व” और “राष्ट्रवाद” गये भाड़ में, तब नतीजा तो भुगतना ही था। आडवाणी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि, 2 सीटों से 190 तक ले जाने में उनके राम मन्दिर आंदोलन का बहुत बड़ा हाथ रहा और इसके लिये पार्टी कार्यकर्ता उन्हें श्रेय भी देते हैं, लेकिन वह पिछली सदी और पिछली पीढ़ी की बात थी, “हिन्दुत्व” के उस विराट आंदोलन के बाद आडवाणी को समय रहते अपना चार्ज वक्त रहते किसी युवा के हाथों में दे देना चाहिये था, लेकिन इस बात में जो देरी हुई उसका नतीजा आज पार्टी भुगत रही है।

अब जो चिन्तन-विन्तन के नाम पर जो भी हो रहा है, वह सिर्फ़ आपसी गुटबाजी और सिर-फ़ुटौव्वल है, बाकी कुछ नहीं। गोविन्दाचार्य ने बिलकुल सही कहा कि सैनिक तो लड़ने के लिये तैयार बैठे हैं, सेनापति ही आपस में लड़ रहे हैं, तो युद्ध कैसे जीतेंगे। कार्यकर्ता तो इन्तज़ार कर रहा है कि कब पार्टी गरजकर कहे कि “बस, अब बहुत हुआ!!! राम मन्दिर, धारा 370, समान नागरिक संहिता, बांग्लादेशी घुसपैठिये, उत्तर-पूर्व के राज्यों में सघन धर्मान्तरण, नकली सेकुलरिज़्म का फ़ैलता जाल, जैसे मुद्दों को लेकर जनमानस में माहौल बनाया जाये। पहले से ही महंगाई, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से त्रस्त जनता को उद्वेलित करने में अधिक समय नहीं लगेगा, लेकिन यह बात बड़े नेताओं को एक आम कार्यकर्ता कैसे समझाये? उन्हें यह कैसे समझाये कि देश की युवा पीढ़ी भी देश के नपुंसक हालात, बेरोजगारी, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि से त्रस्त है, “राष्ट्रवाद” की एक मजबूत चिंगारी भी एक बड़े वोट बैंक को भाजपा के पीछे खड़ा कर सकती है, लेकिन नेताओं को लड़ने से फ़ुर्सत मिले तब ना। मजे की बात यह भी है कि अब आरोप लग रहे हैं कि भाजपा सशक्त विपक्ष की भूमिका नहीं निभा रहा, क्यों निभाये भाई? पिछले 5 साल में देश की वाट लगी पड़ी है, अगले 5 साल और लगेगी, समस्याओं के लिये कांग्रेस को दोष नहीं देंगे, लेकिन भाजपा पर जिम्मेदार विपक्ष बनने की जिम्मेदारी ढोल रहे हैं। जब जनता ने, मीडिया ने, चुनाव आयोग ने, उद्योगपतियों ने, वोटिंग मशीनों की हेराफ़ेरी ने, सबने मिलकर कांग्रेस को जिताया है, तो अब वही जनता भुगते। भाजपा को पहले अपना घर दुरुस्त करना अधिक जरूरी है।

खैर… भले ही फ़िलहाल इस सेकुलर वायरस ने पार्टी को ICU में पहुँचा रखा हो, भाजपा के तमाम विरोधियों की बाँछें खिली हुई हों, भाजपा की पतली हालत देखकर उनके मन में लड्डू फ़ूट रहे हैं। जबकि ऐसे लोग भी मन ही मन जानते हैं कि कांग्रेस के शासनकाल में जनता अधिक कष्ट भुगतेगी, फ़िर भी उनका मन भाजपा-विरोध पर ही टिका रहता है, ऐसे भाजपा-विरोधी चाहते हैं कि कांग्रेस का विकल्प तो बने, लेकिन “कांग्रेस-बी” के रूप में, हिन्दुत्ववादी भाजपा के रूप में नहीं। ऐसा कैसे होने दिया जा सकता है? जल्दी ही पार्टी के नेताओं को समझ में आयेगा कि “कांग्रेस-बी” बनना उसकी सेहत के लिये ठीक नहीं है, उसे अपने मूल स्वरूप “भाजपा” ही बनकर रहना होगा, और यदि वे कांग्रेस-बी बनना चाहेंगे भी, तो अब आम कार्यकर्ता, भाजपा समर्थक वोटर और अन्य समूह उसे ऐसा करने नहीं देंगे। बस बहुत हुई “सेकुलर नौटंकी”, यदि यही रवैया जारी रहा तो कांग्रेस को हराने से पहले भाजपा को हराना पड़ेगा, इतनी बार हराना पड़ेगा कि वह “सेकुलरिज़्म” का नाम भी भूल जाये। अधिक से अधिक क्या होगा, कांग्रेस चुनाव जीतती रहेगी यही ना!!! क्या फ़र्क पड़ेगा, लेकिन अपनी “मूल विचारधारा” से खोखली हो चुकी भाजपा को रास्ते पर लाना अधिक महत्वपूर्ण है, बजाय कांग्रेस की जीत या हार के। पहले देखें कि इस मजमे से निपटने के बाद पार्टी क्या राह पकड़ती है, फ़िर कार्यकर्ता और भाजपा समर्थक भी अपना रुख तय करेंगे। लेकिन एक अदना सी सलाह यह है कि 2004 और 2009 के चुनाव में भाजपा को शाइनिंग इंडिया, विकास, नदी-जोड़ो योजना, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, वाजपेयी की प्रधानमंत्री सड़क योजना आदि के बावजूद जनता ने हरा दिया, तो फ़िर पार्टी को अपनी पुरानी हिन्दुत्ववादी लाइन पर लौटने में क्या हर्ज है? वैसे भी तो हारे ही, फ़िर इस लाइन को अपनाकर हारने में क्या बुराई है? यह मिथक भी सेकुलर मीडिया द्वारा ही फ़ैलाया गया है कि अब आज का युवा साम्प्रदायिक नारों से प्रभावित नहीं होता, सिर्फ़ एक बार यह लाइन सच्चाई से पकड़कर और उस पर ईमानदारी से चलकर देखो तो सही, कैसे बेरोजगारी और महंगाई से त्रस्त हिन्दू वोट बैंक तुम्हारे पीछे एकत्रित होता है, लेकिन जब “कुलकर्णी वायरस” दिमाग पर हावी हो जाता है तब कुछ सूझता नहीं है।

सो फ़िलहाल कार्यकर्ता चिन्ता ना करें, अभी जो हो रहा है होने दिया जाये, कम से कम यह भी पार्टी-लोकतन्त्र का एक हिस्सा ही है, अभी इतनी गिरावट भी नहीं आई कि महारानी या युवराज के एक इशारे पर किसी पार्टी के लोग ज़मीन पर लोट लगाने लगें। सेकुलर बुखार से पीड़ित इस मरीज को अभी थोड़े और झटके सहने पड़ेंगे, लेकिन एक बार यह वायरस उसके शरीर से पूरी तरह निकल जाये, तब “ताज़ा खून” संचारित होते देर नहीं लगेगी, और मरीज फ़िर से चलने-फ़िरने-दौड़ने लगेगा…। आज की तारीख में संघ-भाजपा-हिन्दुत्व विरोधियों का “पार्टी-टाइम” चल रहा है, उन्हें मनाने दो…

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>काबा, एक शिव मन्दिर ही है… : कुछ तथ्य, कुछ विचित्र संयोग (भाग-1) Kaaba a Hindu Temple – PN Oak

>हाल ही में एक सेमिनार में प्रख्यात लेखिका कुसुमलता केडिया ने विभिन्न पश्चिमी पुस्तकों और शोधों के हवाले से यह तर्कसिद्ध किया कि विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में बहुत गहरे अन्तर्सम्बन्ध रहे हैं। पुस्तक “फ़िंगरप्रिंट्स ऑफ़ द गॉड – लेखक ग्राहम हैन्नोक” तथा एक अन्य पुस्तक “1434” (लेखक – गेविन मेनजीस) का “रेफ़रेंस” देते हुए उन्होंने बताया कि पश्चिम के शोधकर्ताओं को “सभ्यताओं” सम्बन्धी खोज करते समय अंटार्कटिका क्षेत्र के नक्शे भी प्राप्त हुए हैं, जो कि बेहद कुशलता से तैयार किये गये थे, इसी प्रकार कई बेहद प्राचीन नक्शों में कहीं-कहीं चीन को “वृहत्तर भारत” का हिस्सा भी चित्रित किया गया है। अब इस सम्बन्ध में पश्चिमी लेखकों और शोधकर्ताओं में आम सहमति बनती जा रही है कि पृथ्वी पर मानव का अस्तित्व 12,000 वर्ष से भी पुराना है, और उस समय की कई सभ्यताएं पूर्ण विकसित थीं।

हालांकि “काबा एक शिव मन्दिर है”, इस लेखमाला का ऊपर उल्लेखित तथ्यों से कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन जैसा कि केडिया जी ने कहा है कि विश्व का इतिहास जो हमें पढ़ाया जाता है या बताया जाता है अथवा दर्शाया जाता है, वह असल में ईसा पूर्व 4000 वर्ष का ही कालखण्ड है और Pre-Christianity काल को ही विश्व का इतिहास मानता है। लेकिन जब आर्कियोलॉजिस्ट और प्रागैतिहासिक काल के शोधकर्ता इस 4000 वर्ष से और पीछे जाकर खोजबीन करते हैं तब उन्हें कई आश्चर्यजनक बातें पता चलती हैं।

यह प्रश्न कई बार और कई जगहों पर पूछा गया है कि क्या मुस्लिमों का तीर्थ स्थल “काबा” एक हिन्दू मन्दिर है या था? इस बारे में काफ़ी लोगों को शक है कि आखिर काबा के बाहर चांदी की गोलाईदार फ़्रेम में जड़ा हुआ काला पत्थर क्या है? काबा में काले परदे से ढँकी हुई उस विशाल संरचना के भीतर क्या है? क्यों काबा के कुछ इलाके गैर-मुस्लिमों के लिये प्रतिबन्धित हैं? आखिर मुस्लिम काबा में परिक्रमा क्यों करते हैं? इन सवालों के जवाब में सबसे प्रामाणिक और ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों के साथ भारतीय इतिहासकार पीएन ओक तथा हिन्दू धर्म के प्रखर विद्वान अमेरिकी इतिहासकार स्टीफ़न नैप की साईटों पर कुछ सामग्री मिलती है। इतिहासकारों में पीएन ओक के निष्कर्षों को लेकर गहरे मतभेद हैं, लेकिन जैसे-जैसे नये-नये तथ्य, नक्शे और प्राचीन ग्रन्थों के सन्दर्भ सामने आते जा रहे हैं, हिन्दू वैदिक संस्कृति का प्रभाव समूचे पश्चिम एशिया और अरब देशों में था यह सिद्ध होता जायेगा। कम्बोडिया और इंडोनेशिया में पहले से मौजूद मंदिर तथा बामियान में ध्वस्त की गई बुद्ध की मूर्ति इस बात की ओर स्पष्ट संकेत तो करती ही है। हिन्दू संस्कृति के धुर-विरोधी इतिहासकार भी इस बात को तो मानते ही हैं कि इस्लाम के प्रादुर्भाव के पश्चात कई-कई मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ा गया, लेकिन फ़िर भी संस्कृति की एक अन्तर्धारा सतत मौजूद रही जो कि विभिन्न परम्पराओं में दिखाई भी देती है।

पीएन ओक ने अपने एक विस्तृत लेख में इस बात पर बिन्दुवार चर्चा की है। पीएन ओक पहले सेना में कार्यरत थे और सेना की नौकरी छोड़कर उन्होंने प्राचीन भारत के इतिहास पर शोध किया और विभिन्न देशों में घूम-घूम कर कई प्रकार के लेख, शिलालेखों के नमूने, ताड़पत्र आदि का अध्ययन किया। पीएन ओक की मृत्यु से कुछ ही समय पहले की बात है, कुवैत में एक गहरी खुदाई के दौरान कांसे की स्वर्णजड़ित गणेश की मूर्ति प्राप्त हुई थी। कुवैत के उस मुस्लिम रहवासी ने उस मूर्ति को लेकर कौतूहल जताया था तथा इतिहासकारों से हिन्दू सभ्यता और अरब सभ्यता के बीच क्या अन्तर्सम्बन्ध हैं यह स्पष्ट करने का आग्रह किया था।

जब पीएन ओक ने इस सम्बन्ध में गहराई से छानबीन करने का निश्चय किया तो उन्हें कई चौंकाने वाली जानकारियाँ मिली। तुर्की के इस्ताम्बुल शहर की प्रसिद्ध लायब्रेरी मकतब-ए-सुल्तानिया में एक ऐतिहासिक ग्रन्थ है “सायर-उल-ओकुल”, उसके पेज 315 पर राजा विक्रमादित्य से सम्बन्धित एक शिलालेख का उल्लेख है, जिसमें कहा गया है कि “…वे लोग भाग्यशाली हैं जो उस समय जन्मे और राजा विक्रम के राज्य में जीवन व्यतीत किया, वह बहुत ही दयालु, उदार और कर्तव्यनिष्ठ शासक था जो हरे व्यक्ति के कल्याण के बारे में सोचता था। लेकिन हम अरब लोग भगवान से बेखबर अपने कामुक और इन्द्रिय आनन्द में खोये हुए थे, बड़े पैमाने पर अत्याचार करते थे, अज्ञानता का अंधकार हमारे चारों तरफ़ छाया हुआ था। जिस तरह एक भेड़ अपने जीवन के लिये भेड़िये से संघर्ष करती है, उसी प्रकार हम अरब लोग अज्ञानता से संघर्षरत थे, चारों ओर गहन अंधकार था। लेकिन विदेशी होने के बावजूद, शिक्षा की उजाले भरी सुबह के जो दर्शन हमें राजा विक्रमादित्य ने करवाये वे क्षण अविस्मरणीय थे। उसने अपने पवित्र धर्म को हमारे बीच फ़ैलाया, अपने देश के सूर्य से भी तेज विद्वानों को इस देश में भेजा ताकि शिक्षा का उजाला फ़ैल सके। इन विद्वानों और ज्ञाताओं ने हमें भगवान की उपस्थिति और सत्य के सही मार्ग के बारे में बताकर एक परोपकार किया है। ये तमाम विद्वान, राजा विक्रमादित्य के निर्देश पर अपने धर्म की शिक्षा देने यहाँ आये…”।

उस शिलालेख के अरेबिक शब्दों का रोमन लिपि में उल्लेख यहाँ किया जाना आवश्यक है…उस स्र्किप्ट के अनुसार, “…इट्राशाफ़ई सन्तु इबिक्रामतुल फ़ाहालामीन करीमुन यात्राफ़ीहा वायोसास्सारु बिहिल्लाहाया समाइनि एला मोताकाब्बेरेन सिहिल्लाहा युही किद मिन होवा यापाखारा फाज्जल असारी नाहोने ओसिरोम बायिआय्हालम। युन्दान ब्लाबिन कज़ान ब्लानाया सादुन्या कानातेफ़ नेतेफ़ि बेजेहालिन्। अतादारि बिलामासा-रतीन फ़ाकेफ़तासाबुहु कौन्निएज़ा माज़ेकाराल्हादा वालादोर। अश्मिमान बुरुकन्कद तोलुहो वातासारु हिहिला याकाजिबाय्माना बालाय कुल्क अमारेना फानेया जौनाबिलामारि बिक्रामातुम…” (पेज 315 साया-उल-ओकुल, जिसका मतलब होता है “यादगार शब्द”)। एक अरब लायब्रेरी में इस शिलालेख के उल्लेख से स्पष्ट है कि विक्रमादित्य का शासन या पहुँच अरब प्रायद्वीप तक निश्चित ही थी।

उपरिलिखित शिलालेख का गहन अध्ययन करने पर कुछ बातें स्वतः ही स्पष्ट होती हैं जैसे कि प्राचीन काल में विक्रमादित्य का साम्राज्य अरब देशों तक फ़ैला हुआ था और विक्रमादित्य ही वह पहला राजा था जिसने अरब में अपना परचम फ़हराया, क्योंकि उल्लिखित शिलालेख कहता है कि “राजा विक्रमादित्य ने हमें अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकाला…” अर्थात उस समय जो भी उनका धर्म या विश्वास था, उसकी बजाय विक्रमादित्य के भेजे हुए विद्वानों ने वैदिक जीवन पद्धति का प्रचार तत्कालीन अरब देशों में किया। अरबों के लिये भारतीय कला और विज्ञान की सीख भारतीय संस्कृति द्वारा स्थापित स्कूलों, अकादमियों और विभिन्न सांस्कृतिक केन्द्रों के द्वारा मिली।

इस निष्कर्ष का सहायक निष्कर्ष इस प्रकार हैं कि दिल्ली स्थित कुतुब मीनार विक्रमादित्य के अरब देशों की विजय के जश्न को मनाने हेतु बनाया एक स्मारक भी हो सकता है। इसके पीछे दो मजबूत कारण हैं, पहला यह कि तथाकथित कुतुब-मीनार के पास स्थित लोहे के खम्भे पर शिलालेख दर्शाता है कि विजेता राजा विक्रमादित्य की शादी राजकुमारी बाल्हिका से हुई। यह “बाल्हिका” कोई और नहीं पश्चिम एशिया के बाल्ख क्षेत्र की राजकुमारी हो सकती है। ऐसा हो सकता है कि विक्रमादित्य द्वारा बाल्ख राजाओं पर विजय प्राप्त करने के बाद उन्होंने उनकी पुत्री का विवाह विक्रमादित्य से करवा दिया हो।

अथवा, दूसरा तथ्य यह कि कुतुब-मीनार के पास स्थित नगर “महरौली”, इस महरौली का नाम विक्रमादित्य के दरबार में प्रसिद्ध गणित ज्योतिषी मिहिरा के नाम पर रखा गया है। “महरौली” शब्द संस्कृत के शब्द “मिहिरा-अवली” से निकला हुआ है, जिसका अर्थ है “मिहिरा” एवं उसके सहायकों के लिये बनाये गये मकानों की श्रृंखला। इस प्रसिद्ध गणित ज्योतिषी को तारों और ग्रहों के अध्ययन के लिये इस टावर का निर्माण करवाया गया हो सकता है, जिसे कुतुब मीनार कहा जाता है।

अपनी खोज को दूर तक पहुँचाने के लिये अरब में मिले विक्रमादित्य के उल्लेख वाले शिलालेख के निहितार्थ को मिलाया जाये तो उस कहानी के बिखरे टुकड़े जोड़ने में मदद मिलती है कि आखिर यह शिलालेख मक्का के काबा में कैसे आया और टिका रहा? ऐसे कौन से अन्य सबूत हैं जिनसे यह पता चल सके कि एक कालखण्ड में अरब देश, भारतीय वैदिक संस्कृति के अनुयायी थे? और वह शान्ति और शिक्षा अरब में विक्रमादित्य के विद्बानों के साथ ही आई, जिसका उल्लेख शिलालेख में “अज्ञानता और उथलपुथल” के रूप में वर्णित है? इस्ताम्बुल स्थित प्रसिद्ध लायब्रेरी मखतब-ए-सुल्तानिया, जिसकी ख्याति पश्चिम एशिया के सबसे बड़े प्राचीन इतिहास और साहित्य का संग्रहालय के रूप में है। लायब्रेरी के अरेबिक खण्ड में प्राचीन अरबी कविताओं का भी विशाल संग्रह है। यह संकलन तुर्की के शासक सुल्तान सलीम के आदेशों के तहत शुरु किया गया था। उस ग्रन्थ के भाग “हरीर” पर लिखे हुए हैं जो कि एक प्रकार का रेशमी कपड़ा है। प्रत्येक पृष्ठ को एक सजावटी बॉर्डर से सजाया गया है। यही संकलन “साया-उल-ओकुल” के नाम से जाना जाता है जो कि तीन खण्डों में विभाजित किया गया है। इस संकलन के पहले भाग में पूर्व-इस्लामिक अरब काल के कवियों का जीवन वर्णन और उनकी काव्य रचनाओं को संकलित किया गया है। दूसरे भाग में उन कवियों के बारे में वर्णन है जो पैगम्बर मुहम्मद के काल में रहे और कवियों की यह श्रृंखला बनी-उम-मय्या राजवंश तक चलती है। तीसरे भाग में इसके बाद खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद के काल तक के कवियों को संकलित किया गया है। इस संग्रह का सम्पादन और संकलन तैयार किया है अबू आमिर असामाई ने जो कि हारुन-अल-रशीद के दरबार में एक भाट था। “साया-उल-ओकुल” का सबसे पहला आधुनिक संस्करण बर्लिन में 1864 में प्रकाशित हुआ, इसके बाद एक और संस्करण 1932 में बेरूत से प्रकाशित किया गया।

यह संग्रह प्राचीन अरबी कविताओं का सबसे आधिकारिक, सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण संकलन माना जाता है। यह प्राचीन अरब जीवन के सामाजिक पहलू, प्रथाओं, परम्पराओं, तरीकों, मनोरंजन के तरीकों आदि पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। इस प्राचीन पुस्तक में प्रतिवर्ष मक्का में आयोजित होने वाले समागम जिसे “ओकाज़” के नाम से जाना जाता है, और जो कि काबा के चारों ओर आयोजित किया जाता है, के बारे में विस्तार से जानकारियाँ दी गई हैं। काबा में वार्षिक “मेले” (जिसे आज हज कहा जाता है) की प्रक्रिया इस्लामिक काल से पहले ही मौजूद थी, यह बात इस पुस्तक को सूक्ष्मता से देखने पर साफ़ पता चल जाती है।

(इस लेखमाला के भाग-2 में हम देखेंगे हिन्दू संस्कृति से मिलती-जुलती इस्लामिक पद्धतियाँ… और भारतीय वैदिक संस्कृति और परम्पराओं का अरब पर प्रभाव) जारी रहेगा भाग…2 में…

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