क्या आप भगवान को मानते हैं ?

Does GOD Exists? What is GOD? How he looks? What he is Doing?

शीर्षक पढकर आप चौंक गये होंगे… क्या मैं नास्तिक हूँ… बिलकुल नहीं… फ़िर मैं क्यों ऐसी बात कह रहा हूँ ? लेकिन जरा आगे तो पढिये जनाब, कई सवाल हैं जो मेरे दिलो-दिमाग को मथते हैं और जिनका कोई तर्कपूर्ण जवाब मुझे नहीं मिलता, एक विशिष्ट प्रकार का “कन्फ़्यूजन” (Confusion) है…, इन विषयों पर हमेशा मैनें प्रत्येक बहस में सामने वाले से जवाब माँगा है, लेकिन नतीजा सिफ़र… वही गोल-मोल जवाब… वही ऊटपटाँग तर्क… लेकिन मेरी बात कोई मानने को तैयार नहीं… सोचा कि ब्लोग पर इन प्रश्नों को डालकर देखूँ, शायद कोई विद्वान मेरी शंकाओं का समाधान कर सके… और नहीं तो मुझ से सहमत हो सके… खैर बहुत हुई प्रस्तावना….
क्या आप भगवान को मानते हैं…. क्यों मानते हैं ? … क्या आपको विश्वास है कि भगवान कहीं है ? …यदि है तो वह क्या किसी को दिखाई दिया है ? ये सवाल सबसे पहले हमारे मन में आते हैं लेकिन बाल्यकाल से हमारे मनोमस्तिष्क पर जो संस्कार कर दिये जाते हैं उनके कारण हम मानते हैं कि भगवान नाम की कोई हस्ती इस दुनिया में है जो सर्वशक्तिमान है और इस फ़ानी दुनिया को चलाती है… चलो मान लिया… हमें सिखाया जाता है कि भगवान सभी पापियों का नाश करते हैं… भगवान की मर्जी के बिना इस दुनिया में पत्ता तक नहीं हिलता… जो प्राणी सच्चे मन से भगवान की प्रार्थना करते हैं उनको सुफ़ल अवश्य मिलता है… लेकिन ईश्वर मौजूद है तो फ़िर इस दुनिया में अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार, गरीबी, बीमारी आदि क्यों बनी हुई है ? शैतान (Satan) क्या है और नरक का निर्माण किसने किया ? क्या भगवान ने ? यदि हाँ तो क्यों ? यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है तो क्यों ना उसे ईश्वर की लीला समझकर माफ़ कर दिया जाये, क्योंकि उसकी मर्जी के बिना तो कुछ हो ही नहीं सकता । बाढ, सूखा, सुनामी, भूकम्प, ज्वालामुखी सभी ईश्वर की ही देन हैं, मतलब इन्सान को प्रकृति बिगाडने का दोषी नहीं माना जाना चाहिये. कहा जाता है कि मनुष्य, भगवान की सर्वोत्तम कृति है, फ़िर यह “सर्वोत्तम कृति” क्यों इस संसार को मिटाने पर तुली है… ? इसके जवाब में लोग कहते हैं कि यह तो मनुष्य के पूर्वजन्म के कर्मों का फ़ल है… लेकिन हमें तो बताया गया था कि चौरासी लाख योनियों के पश्चात ही मनुष्य जन्म प्राप्त होता है, फ़िर इस मनुष्य ने पाप किस जन्म में किये होंगे.. जब वह गाय-बकरी या कीडे-मकोडे के जन्म में होगा तब…? लेकिन मूक प्राणी तो कोई पाप नहीं करते… फ़िर ? और मनुष्य के पाप-पुण्य का हिसाब भी बडा मजेदार है… अब देखिये…. भगवान पापी, दुराचारी, पाखण्डी को अवश्य सजा देते हैं… लेकिन कब ? भगवान की बनाई हुई दुनिया उजडी जा रही है… लेकिन वह चुप है… अन्याय, लूट-खसोट चरम पर है, लेकिन वह कुछ नहीं करता…ईश्वर के नाम पर तमाम पाखण्ड और ढोंग चल रहा है… लेकिन वह चुप है… बडे-बडे लुटेरे, कालाबाजारिये, घूसखोर अफ़सर आदि लाखों रुपये चन्दा देकर विशाल भण्डारे और प्रवचन आयोजित कर रहे हैं… लेकिन भगवान को वह भी मंजूर है… दिन भर पसीना बहाने वाला एक ठेलाचालक भी उतना ही धार्मिक है लेकिन वह ताजिन्दगी पिसता और चूसा जाता रहेगा धनवानों द्वारा, ऐसा क्यों… ? धनवान व्यक्ति के लिये हर बडे मंदिर में एक वीआईपी कतार है, जबकि आम आदमी (जो भगवान की प्रार्थना सच्चे मन से करता है) वह लम्बी-लम्बी लाईनों में खडा रहता है….क्या उसकी भक्ति उस धनवान से कम है ? या भगवान को यह अन्याय मंजूर है… नहीं… तो फ़िर वह कुछ करता क्यों नहीं ? खैर… बहुत बडा ब्लोग ना हो जाये कहीं… और पाठक मुझे कोसने लगें, इसलिये यहीं खत्म करता हूँ… अगले ब्लोग में बाबाओं, साधुओं, चमत्कारों पर कुछ लिखूँगा… क्योंकि उज्जैन में रहकर और दो-दो सिंहस्थ होशोहवास में देखकर धर्म-कर्मकांड, गुरु-घंटालों, प्रवचनकारों के बारे में कुछ तो सच्चा (जाहिर है कि कडवा) लिखने का हक तो बनता है… अन्त में एक हल्का-फ़ुल्का मजाक… बताइये भगवान दिखाई क्यों नहीं देता ? तो भईये… जैसे इन्सान उसने बनाये हैं.. उसके कारण वह किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहा….
बाकी अगले ब्लोग में… किसी की भावनाओं को चोट पहुँचती हो तो माफ़ करें… तर्कपूर्ण जवाब जरूर दें…

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क्या आप भगवान को मानते हैं ?

शीर्षक पढकर आप चौंक गये होंगे… क्या मैं नास्तिक हूँ… बिलकुल नहीं… फ़िर मैं क्यों ऐसी बात कह रहा हूँ ? लेकिन जरा आगे तो पढिये जनाब, कई सवाल हैं जो मेरे दिलो-दिमाग को मथते हैं और जिनका कोई तर्कपूर्ण जवाब मुझे नहीं मिलता, एक विशिष्ट प्रकार का “कन्फ़्यूजन” है…, इन विषयों पर हमेशा मैनें प्रत्येक बहस में सामने वाले से जवाब माँगा है, लेकिन नतीजा सिफ़र… वही गोल-मोल जवाब… वही ऊटपटाँग तर्क… लेकिन मेरी बात कोई मानने को तैयार नहीं… सोचा कि ब्लोग पर इन प्रश्नों को डालकर देखूँ, शायद कोई विद्वान मेरी शंकाओं का समाधान कर सके… और नहीं तो मुझ से सहमत हो सके… खैर बहुत हुई प्रस्तावना….
क्या आप भगवान को मानते हैं…. क्यों मानते हैं ? … क्या आपको विश्वास है कि भगवान कहीं है ? …यदि है तो वह क्या किसी को दिखाई दिया है ? ये सवाल सबसे पहले हमारे मन में आते हैं लेकिन बाल्यकाल से हमारे मनोमस्तिष्क पर जो संस्कार कर दिये जाते हैं उनके कारण हम मानते हैं कि भगवान नाम की कोई हस्ती इस दुनिया में है जो सर्वशक्तिमान है और इस फ़ानी दुनिया को चलाती है… चलो मान लिया… हमें सिखाया जाता है कि भगवान सभी पापियों का नाश करते हैं… भगवान की मर्जी के बिना इस दुनिया में पत्ता तक नहीं हिलता… जो प्राणी सच्चे मन से भगवान की प्रार्थना करते हैं उनको सुफ़ल अवश्य मिलता है… लेकिन ईश्वर मौजूद है तो फ़िर इस दुनिया में अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार, गरीबी, बीमारी आदि क्यों बनी हुई है ? शैतान क्या है और नरक का निर्माण किसने किया ? क्या भगवान ने ? यदि हाँ तो क्यों ? यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है तो क्यों ना उसे ईश्वर की लीला समझकर माफ़ कर दिया जाये, क्योंकि उसकी मर्जी के बिना तो कुछ हो ही नहीं सकता । बाढ, सूखा, सुनामी, भूकम्प, ज्वालामुखी सभी ईश्वर की ही देन हैं, मतलब इन्सान को प्रकृति बिगाडने का दोषी नहीं माना जाना चाहिये. कहा जाता है कि मनुष्य, भगवान की सर्वोत्तम कृति है, फ़िर यह “सर्वोत्तम कृति” क्यों इस संसार को मिटाने पर तुली है… ? इसके जवाब में लोग कहते हैं कि यह तो मनुष्य के पूर्वजन्म के कर्मों का फ़ल है… लेकिन हमें तो बताया गया था कि चौरासी लाख योनियों के पश्चात ही मनुष्य जन्म प्राप्त होता है, फ़िर इस मनुष्य ने पाप किस जन्म में किये होंगे.. जब वह गाय-बकरी या कीडे-मकोडे के जन्म में होगा तब…? लेकिन मूक प्राणी तो कोई पाप नहीं करते… फ़िर ? और मनुष्य के पाप-पुण्य का हिसाब भी बडा मजेदार है… अब देखिये…. भगवान पापी, दुराचारी, पाखण्डी को अवश्य सजा देते हैं… लेकिन कब ? भगवान की बनाई हुई दुनिया उजडी जा रही है… लेकिन वह चुप है… अन्याय, लूट-खसोट चरम पर है, लेकिन वह कुछ नहीं करता…ईश्वर के नाम पर तमाम पाखण्ड और ढोंग चल रहा है… लेकिन वह चुप है… बडे-बडे लुटेरे, कालाबाजारिये, घूसखोर अफ़सर आदि लाखों रुपये चन्दा देकर विशाल भण्डारे और प्रवचन आयोजित कर रहे हैं… लेकिन भगवान को वह भी मंजूर है… दिन भर पसीना बहाने वाला एक ठेलाचालक भी उतना ही धार्मिक है लेकिन वह ताजिन्दगी पिसता और चूसा जाता रहेगा धनवानों द्वारा, ऐसा क्यों… ? धनवान व्यक्ति के लिये हर बडे मंदिर में एक वीआईपी कतार है, जबकि आम आदमी (जो भगवान की प्रार्थना सच्चे मन से करता है) वह लम्बी-लम्बी लाईनों में खडा रहता है….क्या उसकी भक्ति उस धनवान से कम है ? या भगवान को यह अन्याय मंजूर है… नहीं… तो फ़िर वह कुछ करता क्यों नहीं ? खैर… बहुत बडा ब्लोग ना हो जाये कहीं… और पाठक मुझे कोसने लगें, इसलिये यहीं खत्म करता हूँ… अगले ब्लोग में बाबाओं, साधुओं, चमत्कारों पर कुछ लिखूँगा… क्योंकि उज्जैन में रहकर और दो-दो सिंहस्थ होशोहवास में देखकर धर्म-कर्मकांड, गुरु-घंटालों, प्रवचनकारों के बारे में कुछ तो सच्चा (जाहिर है कि कडवा) लिखने का हक तो बनता है… अन्त में एक हल्का-फ़ुल्का मजाक… बताइये भगवान दिखाई क्यों नहीं देता ? तो भईये… जैसे इन्सान उसने बनाये हैं.. उसके कारण वह किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहा….
बाकी अगले ब्लोग में… किसी की भावनाओं को चोट पहुँचती हो तो माफ़ करें… तर्कपूर्ण जवाब जरूर दें…

मुन्ना भाई का बायो-डाटा

CV of Munnabhai MBBS

मुन्नाभाई का बायो-डाटा पढें….

http://www.naidunia.com/articles.asp?article_no=11905091505&yy=2005&mm=9&dd=15&title=bwàltCtRo+fUt+ctgtu-zuxt&author=mwhuN+rav˜qlfUh

“नईदुनिया” (इन्दौर) के 15th September 2005 के अंक में प्रकाशित…

मुन्ना भाई का बायो-डाटा

मुन्नाभाई का बायो-डाटा पढें….

http://www.naidunia.com/articles.asp?article_no=11905091505&yy=2005&mm=9&dd=15&title=bwàltCtRo+fUt+ctgtu-zuxt&author=mwhuN+rav˜qlfUh

“नईदुनिया” (इन्दौर) के 15th September 2005 के अंक में प्रकाशित…

पिता का रूपांतरण

Father’s Day Special

अपने जीवनकाल में विभिन्न पडावों पर पिता की ओर देखने का नजरिया बदलता रहता है…
चार वर्ष की आयु में – मेरे पिता महान हैं..
छह वर्ष की आयु में – मेरे पिता तो सब कुछ जानते हैं..
दस वर्ष की आयु में – मेरे पिता बहुत अच्छे हैं लेकिन गुस्सा बहुत जल्दी हो जाते हैं..
तेरह वर्ष (टीनएज) की आयु में – मेरे पिता बहुत अच्छे थे, जब मैं छोटा था…
चौदहवें वर्ष में – पिताजी तो बहुत तुनकमिजाज होते जा रहे हैं…
सोलहवें वर्ष में – पिताजी तो बहुत पुराने खयालात के हैं, नये जमाने के साथ चल ही नहीं पाते..
अठारहवें वर्ष में – पिताजी तो लगभग सनकी हो चले हैं..
बीसवें वर्ष में – हे भगवान अब तो पिताजी को झेलना बहुत मुश्किल होता जा रहा है.. पता नहीं माँ उन्हें कैसे सहन करती है…
पच्चीसवें वर्ष में – पिताजी तो मेरी हर बात का विरोध करते हैं…
तीसवें वर्ष में – मेरे बच्चे को समझाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है… जबकि मैं अपने पिताजी से बहुत डरता था…
चालीसवें वर्ष में – मेरे पिता ने मुझे बहुत अनुशासन के साथ पाला, मुझे भी अपने बच्चे के साथ ऐसा ही व्यवहार करना चाहिये…
पैंतालीसवें वर्ष में – मैं आश्चर्यचकित हूँ कि मेरे पिता ने हमें कैसे बडा किया होगा…
पचासवें वर्ष में – मेरे पिता ने हमें यहाँ तक पहुँचाने के लिये बहुत कष्ट उठाये… जबकि मैं अपने इकलौते बेटे की ठीक से देखभाल नहीं कर पाता…
पचपनवें वर्ष में – मेरे पिता ने हमारे लिये बहुत अच्छी योजनायें बनाईं और निवेश किया…वे एक उच्च कोटि के इन्सान थे… जबकि मेरा बेटा मुझे सनकी समझता है…
साठवें वर्ष में – मेरे पिता वाकई महान थे…
अर्थात “पिता महान हैं” यह समझने में व्यक्ति को पूरे छ्प्पन वर्ष लग जाते हैं….

पिता का रूपांतरण

अपने जीवनकाल में विभिन्न पडावों पर पिता की ओर देखने का नजरिया बदलता रहता है…
चार वर्ष की आयु में – मेरे पिता महान हैं..
छह वर्ष की आयु में – मेरे पिता तो सब कुछ जानते हैं..
दस वर्ष की आयु में – मेरे पिता बहुत अच्छे हैं लेकिन गुस्सा बहुत जल्दी हो जाते हैं..
तेरह वर्ष (टीनएज) की आयु में – मेरे पिता बहुत अच्छे थे, जब मैं छोटा था…
चौदहवें वर्ष में – पिताजी तो बहुत तुनकमिजाज होते जा रहे हैं…
सोलहवें वर्ष में – पिताजी तो बहुत पुराने खयालात के हैं, नये जमाने के साथ चल ही नहीं पाते..
अठारहवें वर्ष में – पिताजी तो लगभग सनकी हो चले हैं..
बीसवें वर्ष में – हे भगवान अब तो पिताजी को झेलना बहुत मुश्किल होता जा रहा है.. पता नहीं माँ उन्हें कैसे सहन करती है…
पच्चीसवें वर्ष में – पिताजी तो मेरी हर बात का विरोध करते हैं…
तीसवें वर्ष में – मेरे बच्चे को समझाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है… जबकि मैं अपने पिताजी से बहुत डरता था…
चालीसवें वर्ष में – मेरे पिता ने मुझे बहुत अनुशासन के साथ पाला, मुझे भी अपने बच्चे के साथ ऐसा ही व्यवहार करना चाहिये…
पैंतालीसवें वर्ष में – मैं आश्चर्यचकित हूँ कि मेरे पिता ने हमें कैसे बडा किया होगा…
पचासवें वर्ष में – मेरे पिता ने हमें यहाँ तक पहुँचाने के लिये बहुत कष्ट उठाये… जबकि मैं अपने इकलौते बेटे की ठीक से देखभाल नहीं कर पाता…
पचपनवें वर्ष में – मेरे पिता ने हमारे लिये बहुत अच्छी योजनायें बनाईं और निवेश किया…वे एक उच्च कोटि के इन्सान थे… जबकि मेरा बेटा मुझे सनकी समझता है…
साठवें वर्ष में – मेरे पिता वाकई महान थे…
अर्थात “पिता महान हैं” यह समझने में व्यक्ति को पूरे छ्प्पन वर्ष लग जाते हैं….

लव लेटर क्या होता है ….

What is Love Letter?

लव-लेटर, लव-लेटर मतलब लव-लेटर होता है..
सीधे-सीधे बोलने की बजाय आसान और better होता है…
गुलाबी मीठी ठण्ड के मौसम का sweater होता है…
अच्छी तरह से मथा हुआ नरम butter होता है…
लव-लेटर तो लव-लेटर होता है…….

लव लेटर मतलब एक song होता है..
जिसमें भाषा तो सही लेकिन व्याकरण wrong होता है..
जब कुछ नही सूझता तो दिल में pain होता है…
और जब कुछ सूझता है तो जेब में pen नहीं होता है..
लव लेटर तो लव लेटर होता है…….

लव लेटर मतलब एक dream होता है..
जीवन की पेस्ट्री का cream होता है..
आधा-आधा पीने लायक नारियल water होता है..
सिर्फ़ दो के लिये बना हुआ 70mm theater होता है…
लव लेटर तो लव लेटर होता है…….

लव लेटर एक habbit होता है..
बाहर से शेर लेकिन भीतर से rabbit होता है…
जमीन के टुकडे से भी महंगा agreement होता है…
50% पक्का और 50% judgement होता है…
लव लेटर तो लव लेटर होता है…….

लव लेटर तो शराब का पहला sip होता है…
बीयर से भरे मग को छूने को बेताब lip होता है…
तीसरे के लिये बिलकुल नहीं ऐसा matter होता है…
जिसमें दम हो.. वही नीट पिये ऐसा quarter होता है…
लव लेटर तो लव लेटर होता है……

लव-लेटर, लव-लेटर मतलब लव-लेटर होता है..

लव लेटर क्या होता है ….

लव-लेटर, लव-लेटर मतलब लव-लेटर होता है..
सीधे-सीधे बोलने की बजाय आसान और better होता है…
गुलाबी मीठी ठण्ड के मौसम का sweater होता है…
अच्छी तरह से मथा हुआ नरम butter होता है…
लव-लेटर तो लव-लेटर होता है…….

लव लेटर मतलब एक song होता है..
जिसमें भाषा तो सही लेकिन व्याकरण wrong होता है..
जब कुछ नही सूझता तो दिल में pain होता है…
और जब कुछ सूझता है तो जेब में pen नहीं होता है..
लव लेटर तो लव लेटर होता है…….

लव लेटर मतलब एक dream होता है..
जीवन की पेस्ट्री का cream होता है..
आधा-आधा पीने लायक नारियल water होता है..
सिर्फ़ दो के लिये बना हुआ 70mm theater होता है…
लव लेटर तो लव लेटर होता है…….

लव लेटर एक habbit होता है..
बाहर से शेर लेकिन भीतर से rabbit होता है…
जमीन के टुकडे से भी महंगा agreement होता है…
50% पक्का और 50% judgement होता है…
लव लेटर तो लव लेटर होता है…….

लव लेटर तो शराब का पहला sip होता है…
बीयर से भरे मग को छूने को बेताब lip होता है…
तीसरे के लिये बिलकुल नहीं ऐसा matter होता है…
जिसमें दम हो.. वही नीट पिये ऐसा quarter होता है…
लव लेटर तो लव लेटर होता है……

लव-लेटर, लव-लेटर मतलब लव-लेटर होता है..

गणतन्त्र और मीडिया (२)

मेरे पिछले चिट्ठे के जवाब में मुझे बहुत सारे ई-पत्र प्राप्त हुए. जिसमें से भाई सत्यम रविन्द्र नें कहा कि सिर्फ़ आलोचना नहीं करें, उसका समाधान भी सुझायें… बिलकुल सही कहा… तो मेरी निगाह में मीडिया (Media) को सुधारने के लिये जनता को ही आगे आना होगा… उदाहरण के तौर पर म.प्र. के मालवा (Malwa) क्षेत्र में एक अखबार है “नईदुनिया”… इस अखबार ने एक नई पहल शुरू की है, कि प्रत्येक सोमवार को “सकारात्मक सोमवार” के नाम से अखबार का मुख्पृष्ठ सिर्फ़ सकारात्मक समाचारों से भरा होता है… पर्यावरण, जनचेतना, समाजसेवा आदि, ना कोई खून-खराबे, बलात्कार, अपहरण, नेतागिरी आदि की खबरों से सप्ताह का आरम्भ नहीं किया जाता… यह एक उम्दा पहल है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिये… तडक-भडक वाले, मिर्च-मसाले वाले, समाचार पत्रों का बहिष्कार करके उन्हें सीधे रास्ते पर लाने की कोशिश की जानी चाहिये.. उन चैनलों को लोगों को देखने से हतोत्साहित करना चाहिये (शुरुआत अपने परिवार से करें… हमारे परिवार ने भी लगभग सारे समाचार चैनल देखना बन्द कर दिया है सिर्फ़ दूरदर्शन पर दस मिनट खबरें देख लेते हैं बस… हमें अभिषेक की शादी से क्या लेना-देना, या सौरव गांगुली टीम में रहें या नहीं हम क्यों दुबले हों)… सिर्फ़ सकारात्मक चैनल / कार्यक्रम (डिस्कवरी, अंताक्षरी, सारेगामा, सब टीवी के कुछ कार्यक्रम आदि) और सकारात्मक समाचार पत्र पढने की आदत डालनी होगी… और सिर्फ़ बहिष्कार से काम चलने वाला नहीं है… गाहे-बगाहे इन प्रतिकूल चैनलों की कडी से कडी आलोचना भी करना होगा… (Mouth Publicity is the Best Publicity)… अपने मिलने-जुलने वालों, रिश्तेदारों के साथ चर्चा में ऐसे चैनलों और अखबारों की आलोचना करें… लोगों को उन्हें ऐसे कार्यक्रम देखने से हतोत्साहित करें… धीरे-धीरे ही सही माहौल बनेगा… सरकार इस मामले में कुछ नहीं करने वाली… लोगों को अपना नजरिया बदलना होगा (टेस्ट बदलना होगा)…. तभी कुछ हो सकता है…

गणतन्त्र और मीडिया (२)

मेरे पिछले चिट्ठे के जवाब में मुझे बहुत सारे ई-पत्र प्राप्त हुए. जिसमें से भाई सत्यम रविन्द्र नें कहा कि सिर्फ़ आलोचना नहीं करें, उसका समाधान भी सुझायें… बिलकुल सही कहा… तो मेरी निगाह में मीडिया को सुधारने के लिये जनता को ही आगे आना होगा… उदाहरण के तौर पर म.प्र. के मालवा क्षेत्र में एक अखबार है “नईदुनिया”… इस अखबार ने एक नई पहल शुरू की है, कि प्रत्येक सोमवार को “सकारात्मक सोमवार” के नाम से अखबार का मुख्पृष्ठ सिर्फ़ सकारात्मक समाचारों से भरा होता है… पर्यावरण, जनचेतना, समाजसेवा आदि, ना कोई खून-खराबे, बलात्कार, अपहरण, नेतागिरी आदि की खबरों से सप्ताह का आरम्भ नहीं किया जाता… यह एक उम्दा पहल है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिये… तडक-भडक वाले, मिर्च-मसाले वाले, समाचार पत्रों का बहिष्कार करके उन्हें सीधे रास्ते पर लाने की कोशिश की जानी चाहिये.. उन चैनलों को लोगों को देखने से हतोत्साहित करना चाहिये (शुरुआत अपने परिवार से करें… हमारे परिवार ने भी लगभग सारे समाचार चैनल देखना बन्द कर दिया है सिर्फ़ दूरदर्शन पर दस मिनट खबरें देख लेते हैं बस… हमें अभिषेक की शादी से क्या लेना-देना, या सौरव गांगुली टीम में रहें या नहीं हम क्यों दुबले हों)… सिर्फ़ सकारात्मक चैनल / कार्यक्रम (डिस्कवरी, अंताक्षरी, सारेगामा, सब टीवी के कुछ कार्यक्रम आदि) और सकारात्मक समाचार पत्र पढने की आदत डालनी होगी… और सिर्फ़ बहिष्कार से काम चलने वाला नहीं है… गाहे-बगाहे इन प्रतिकूल चैनलों की कडी से कडी आलोचना भी करना होगा… (माऊथ पब्लिसिटी इस द बेस्ट पब्लिसिटी)… अपने मिलने-जुलने वालों, रिश्तेदारों के साथ चर्चा में ऐसे चैनलों और अखबारों की आलोचना करें… लोगों को उन्हें ऐसे कार्यक्रम देखने से हतोत्साहित करें… धीरे-धीरे ही सही माहौल बनेगा… सरकार इस मामले में कुछ नहीं करने वाली… लोगों को अपना नजरिया बदलना होगा (टेस्ट बदलना होगा)…. तभी कुछ हो सकता है…

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