आई टी "दीवार" (Film Deewar of IT Industry)

सीन – १
रवि (शशिकपूर) अपने भाई विजय (अमिताभ) के घर पहुँचता है –
रवि – आज मुझे “आईटी” थाने वालों ने एक लिस्ट दी है, जिसमें उन लोगों के नाम हैं, जो वायरस लिखते हैं, “साईट हैकिंग” करते हैं, और भी ऐसे कई काम जो कानून की नजर में गुनाह हैं, और उस लिस्ट में एक नाम तुम्हारा भी है भा…ई…। लो इस पर साइन कर दो ।
विजय – क्या है ये ?
रवि – इसमे लिखा है कि तुम अपने सारे गुनाह कबूल करने को तैयार हो… तुम अपने उन सभी साथियों के नाम पुलिस को बताने को तैयार हो, जो “हैकिंग” करते हैं, तुम पुलिस को यह भी बताओगे कि तुमने कौन-कौन से वायरस बनाये हैं, उनका कोड क्या है… सब बताओगे…
विजय – मैं इस पर साइन करूँगा, लेकिन मैं अकेले साइन नहीं करूँगा, मैं सबसे पहले साइन नहीं करूँगा । जाओ जाकर पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ, जिसने मेरे बाप पर “पासवर्ड” चोरी करने का साइन लिया था, जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरे “मदर बोर्ड” को “रिसायकल बिन” में डाल दिया था । जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरी “वेबसाईट” को हैक करके उस पर लिख दिया था कि “इसका बाप चोर है”, उसके बाद, उसके बाद मेरे भाई तुम जिस “document” पर कहोगे मैं उस पर साइन करने को तैयार हूँ…
रवि – दूसरों के पाप गिनाने से तुम्हारे अपने पाप कम नहीं होंगे… ये सच्चाई नहीं बदल सकती कि तुम भी एक हैकर हो और जब तक ये दीवार हम दोनों के बीच है भाई… हम एक छत के नीचे नहीं रह सकते… मैं यहाँ से जा रहा हूँ…चलो माँ..
विजय – तुम जाना चहते हो तो जाओ… लेकिन माँ नहीं जायेगी (वो तो मेन सर्वर है)
माँ (निरुपा रॉय) – माँ जायेगी…
विजय – नहीं माँ तुम नहीं जा सकती, मैं जानता हूँ कि तुम मुझसे बहुत प्यार करती हो… सारी साईट्स मैनें तुम्हें खुश रखने के लिये ही हैक की थीं…
माँ – वो आदमी तेरा कौन था, जिसने तेरे बाप पर पासवर्ड चोरी का इल्जाम लगाया था, कोई नहीं…. वो आदमी तेरा कौन था जिसने तेरे मदर बोर्ड को रिसायकल बिन में डाल दिया था, कोई नही… वो आदमी तेरा कौन था जिसने तेरी साईट पर लिख दिया था कि “तेरा बाप चोर है”, कोई नही… लेकिन तू तो मेरा अपना क्लाईंट था, तूने अपने प्रोसेसर पर कैसे लिख दिया कि “ये फ़ाईल करप्ट है”…
(माँ गुस्से में लॉग आऊट कर जाती है, और विजय देखता रह जाता है)….

सीन – २
विजय (अमिताभ) अपने भाई रवि (शशिकपूर) को मिलने एक जगह पहुँचता है… (वही पुल के नीचे)
विजय – मुझे यहाँ मिलने क्यों बुलाया है ?
रवि – तुम्हारी कम्पनी में मुझे कोई घुसने नही देता है, और मेरे घर आना तुम जैसे सॉफ़्टवेयर इंजीनियर की शान के खिलाफ़ है, इसलिये हम कहीं और ही मिल सकते थे । इस इंटरनेट पार्लर में जहाँ हमारा बचपन साथ-साथ बीता, यही ठीक जगह है…
विजय – पहले मुझे ये बताओ कि इस समय मुझे सुनने वाला कौन है, एक “डाटा एन्ट्री ऑपरेटर” या एक “आईटी पुलिसवाला”…
रवि – जब तक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर बोलेगा, एक डाटा एन्ट्री ऑपरेटर सुनेगा, और जब एक हैकर बोलेगा तो “आईटी पुलिसवाला” सुनेगा…
विजय – रवि तुम नही जानते तुमने सारे हैकरों को अपना दुश्मन बना लिया है, तुम ये शहर छोडकर चले जाओ…
रवि – मेरे कम्प्यूटर आदर्श मुझे इसकी इजाजत नहीं देते…
विजय – उफ़्फ़, तुम्हारे उसूल, तुम्हारे आदर्श, क्या दिया है तुम्हारे इन उसूलों ने तुम्हें…. एक ४८६ कम्प्यूटर, एक सडा सा डॉस, एक मामूली सा अकाउंटिंग सॉफ़्टवेयर… देखो, देखो, देखो… ये वही मैं हूँ और ये वही तुम हो… हम दोनों एक साथ इस इंटरनेट पार्लर से निकले थे… लेकिन आज तुम कहाँ रह गये और मैं कहाँ आ गया… आज मेरे पास वेब साईट है, पेंटियम ४ है, ओरेकल, पावर बिल्डर है, बैंक बैलेन्स है… क्या है,,, क्या है तुम्हारे पास… ?
रवि – मेरे पास “परमानेंट सरकारी जॉब” और सर्वर का मदरबोर्ड है…
(टूँ..टूँ..टूँ… कम्प्यूटर हैंग होने की आवाज आती है… और विजय देखता रह जाता है)

2 Comments

  1. Shrish said,

    February 15, 2007 at 8:10 pm

    वाह वाह मजा आ गया आईटी दीवार देखकर, कृपया आईटी फिल्मों की यह श्रृंखला जारी रखें।”रवि – मेरे कम्प्यूटर आदर्श मुझे इसकी इजाजत नहीं देते…”क्या डायलॉग हैं। :)सुरेश भाई जी आश्चर्य की बात है आपकी इन लाजवाब पोस्टों पर अपेक्षित टिप्पणियाँ नहीं आई।पहले मैंने सोचा कि आपका चिट्ठा नारद पर पंजीकृत नहीं हैं, लेकिन जा कर देखा तो हैं। इसका मतलब है अभी आपका जनसंपर्क कमजोर है, जिसे बढ़ाए जाने की जरुरत है।इसके लिए एक तो परिचर्चा हिन्दी फोरम के सदस्य बनिए और चर्चाओं में सक्रिय रुप से भाग लीजिए।दूसरा रामबाण फॉर्मूला है नियमित रुप से सबके चिट्ठों पर जाकर ताजा प्रविष्टियों पर टिप्पणियाँ कीजिए। इसका सीधा सा फॉर्मूला है – गीव एंड टेक। जितनी ज्यादा टिप्पणियाँ आप करेंगे उतनी ही वापस मिलेंगी। फिर देखिए आवक जावक मीटर कैसे तेजी से दौड़ता है।उम्मीद है सलाह देने की मेरी धृष्टता का बुरा नहीं मानेंगे।

  2. February 16, 2007 at 6:52 am

    भई सुरेश जी सचमुच मज़ा आ गया। कहाँ थे अभी तक आप? श्रीश जी की सलाह पर अमल करके आपने बहुत अच्छा किया। देखिये मैं भी तो परिचर्चा के ज़रिये ही यहाँ तक आया हूँ।


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