>क्रिकेट का भविष्यवादी दुःस्वप्न

>दिनांक 10 मार्च 2010
भारत की टीम पाँच देशों के टूर्नामेण्ट में खेल रही है, अन्य चार देश हैं सूडान, लीबिया, फ़िजी और आईसलैंड । आज भारत की क्रिकेट टीम का बहुत ही महत्वपूर्ण मैच है, उसे सूडान को हर हालत में हराना है, यदि वह आज का मैच जीत जाती है तो उसे 2011 में होने वाले विश्व कप में 35 वीं रैंक मिल जायेगी..मैच की सुबह गुरु ग्रेग और राहुल ने मैच की रणनीति बनाने के लिये टीम मीटिंग बुलाई । बहुत महत्वपूर्ण मैच था इसलिये गम्भीरता से टीम मीटिंग शुरु हुई… कमरे के एक कोने में ग्रेग और राहुल बैठे थे, धोनी एक तरफ़ अपने बालों में कंघी कर रहा था, सहवाग अपने गंजे सिर पर हाथ फ़ेर रहा था… तेंडुलकर अपने नये विज्ञापन का कॉन्ट्रेक्ट पढने में मशगूल था, सौरव सोच रहा था कि मुझे आज मीडिया में क्या बयान देना है… मतलब यह कि बहुत ही महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी । गुरु ग्रेग सबसे पहले बोले – बॉयज.. आज हमारा एक खास मैच है, तो आओ हम बैटिंग लाइन-अप और गेंदबाजी के बारे में अपनी रणनीति बना लें… सौरव तुम ओपनिंग करोगे ?
सौरव – यह आप मुझे बता रहे हैं या मुझसे पूछ रहे हैं ? इसका जवाब मुझे पता नहीं है, लेकिन सूडान का एक गेंदबाज लगातार मेरी छाती और कमर को निशाना बना कर गेंदें फ़ेंकता है । अब इस उमर में मैं 50-60 मील प्रति घंटा की गेंदबाजी नहीं झेल सकता हूँ ।
ग्रेग – ठीक है कोई बात नहीं.. तुम हिट विकेट आऊट होकर आ जाना और बाद में मीडिया को कोई बयान दे देना, वैसे हमारी टीम की इमेज इतनी जोरदार है कि कोई भी बॉलर शॉर्टपिच गेंद नहीं फ़ेंकेगा… फ़िर भी..राहुल सौरव के साथ किसे भेजना चाहिये ओपनिंग के लिये ?
राहुल – मुझे लगता है सहवाग सही रहेगा, क्योंकि उसने बीस मैचों के बाद पिछले मैच में चार चौके लगाये थे, इससे लगता है कि वह अपने पुराने फ़ॉर्म में लौट आया है..क्यों सहवाग ?
सहवाग – जी सर
ग्रेग – चलो बढिया.. सचिन आप नम्बर चार पर जायेंगे ? मतलब आपकी जैसी मर्जी…
सचिन – मुझे 11 बजे शॉपिंग करने जाना है तो मैं दस ओवर के बाद ही जाऊँगा..
ग्रेग – ठीक है, सहवाग और सौरव छः ओवर तो निकाल ही लेंगे, फ़िर आप चले जाना..और अपना नैसर्गिक खेल खेलना..चलो धोनी तुम कीपिंग करोगे…
धोनी – मैं इस बार कीपिंग नहीं करूँगा, पिछले मैच में मैने चार घंटे कीपिंग की थी उसके कारण मेरे धूप से मेरे बाल खराब हो गये है और उसमें जूँए पड़ गई हैं.. मैं तो बल्लेबाज के तौर पर खेलूँगा..
ग्रेग – प्लीज एक बार आज के लिये कीपर बन जाओ.. यह हमारा बहुत महत्वपूर्ण मैच है..
धोनी – ठीक सिर्फ़ आज, लेकिन शाम को मुझे मॉडलिंग के लिये रैम्प पर भी उतरना है, इसलिये आगे से ध्यान रखना
इस बीच गुरु ग्रेग ने पिछले रिकॉर्ड के अनुसार देखा कि राहुल सबसे अधिक देर तक क्रीज पर टिका रहता है, तो ग्रेग चैपल ने कहा, राहुल तुम इन्हें बताओ कि कैसे तुम क्रीज पर टिके रहते हो…
राहुल – सच बात तो यह है कि मेरी बीबी बहुत ही बदसूरत है इसलिये मैं कोशिश करता हूँ कि अधिक से अधिक देर तक उससे दूर रह सकूँ और पिच ही वह जगह है जहाँ मैं सुकून से रह सकता हूँ, आपको याद होगा कि पिछले मैच में मैने ९३ गेंदों पर 4 रन बनाये थे और मैं बहुत खुश था… सभी खिलाडियों ने तालियाँ बजाईं..
ग्रेग ने कहा – चलो ठीक है.. गेंदबाजी की शुरुआत जहीर करेगा, क्योंकि वही सबसे कम वाईड फ़ेंकता है.. पिछले मैच में उसने सिर्फ़ 12 वाईड फ़ेंकी थीं । फ़िर गुरु ने कहा कि मैं देख रहा हूँ कि राहुल पर कप्तानी का बोझ कुछ ज्यादा ही पड़ रहा है, इसलिये मैने नया प्रयोग करने की सोची है, जिसके तहत टीम में अब तीन कप्तान होंगे, बैटिंग कप्तान, फ़ील्डिंग कप्तान और बॉलिंग कप्तान.. कैसा आईडिया है.. किसी ने कोई जवाब नहीं दिया..मैने देखा कि मुनाफ़ पटेल पिछले तीन मैचों से नॉट आऊट रहा है, इसलिये उसकी बैटिंग प्रतिभा को देखते हुए उसे मैं उसे बैटिंग कप्तान बनाता हूँ..सौरव लगभग १५० रन आऊट करवाने में शामिल रहा है, लेकिन खुद कभी रन आऊट नहीं हुआ, इसलिये मैं उसे फ़ील्डिंग कप्तान बनाता हूँ.. राहुल ने आपत्ति उठाई – लेकिन सौरव ने पिछले मैच में ही तीन कैच छोडे थे…गुरु ने कहा – लेकिन उसने बिलकुल सही दिशा में डाईव किया था, यही बहुत है । मैने देखा है कि पिछले तीन साल से अनिल कुम्बले लगातार टीम से बाहर रहा है, लेकिन उसने जम्हाई लेने के अलावा अपना मुँह कभी नहीं खोला, मैं उसकी खेल भावना की कद्र करते हुए उसे बॉलिंग कप्तान बनाता हूँ…
अन्त में गुरु ग्रेग ने टीम में जोश भरते हुए कहा – उठो लड़कों तुम्हें सूडान को हराना ही होगा.. बाहर लाखों लोग यज्ञ-हवन कर रहे हैं, बाल बढा रहे हैं, मन्दिरों में मत्था टेक रहे हैं.. चलो उठो..
वैसे मीडिया की जानकारी के लिये बता दूँ कि विश्व कप के बाद भारत के अगले चार अभ्यास मैच इस प्रकार से हैं –
12 अप्रैल – सरस्वती विद्या मन्दिर
15 अप्रैल – विक्रम हाई स्कूल
17 अप्रैल – स्टेन्फ़ोर्ड गर्ल्स कॉलेज
20 अप्रैल – सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल…
इस सम्बन्ध में राहुल का कहना है कि हमारी पहली प्राथमिकता सरस्वती विद्या मन्दिर को हराने की होगी, क्योंकि मैने सुना है कि उनके पास कुछ युवा और जोशीले खिलाडी है… तो आईये हम भी हू..हा..इंडिया के लिये प्रार्थना करें…

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क्रिकेट का भविष्यवादी दुःस्वप्न

दिनांक 10 मार्च 2010
भारत की टीम पाँच देशों के टूर्नामेण्ट में खेल रही है, अन्य चार देश हैं सूडान, लीबिया, फ़िजी और आईसलैंड । आज भारत की क्रिकेट टीम का बहुत ही महत्वपूर्ण मैच है, उसे सूडान को हर हालत में हराना है, यदि वह आज का मैच जीत जाती है तो उसे 2011 में होने वाले विश्व कप में 35 वीं रैंक मिल जायेगी..मैच की सुबह गुरु ग्रेग और राहुल ने मैच की रणनीति बनाने के लिये टीम मीटिंग बुलाई । बहुत महत्वपूर्ण मैच था इसलिये गम्भीरता से टीम मीटिंग शुरु हुई… कमरे के एक कोने में ग्रेग और राहुल बैठे थे, धोनी एक तरफ़ अपने बालों में कंघी कर रहा था, सहवाग अपने गंजे सिर पर हाथ फ़ेर रहा था… तेंडुलकर अपने नये विज्ञापन का कॉन्ट्रेक्ट पढने में मशगूल था, सौरव सोच रहा था कि मुझे आज मीडिया में क्या बयान देना है… मतलब यह कि बहुत ही महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी । गुरु ग्रेग सबसे पहले बोले – बॉयज.. आज हमारा एक खास मैच है, तो आओ हम बैटिंग लाइन-अप और गेंदबाजी के बारे में अपनी रणनीति बना लें… सौरव तुम ओपनिंग करोगे ?
सौरव – यह आप मुझे बता रहे हैं या मुझसे पूछ रहे हैं ? इसका जवाब मुझे पता नहीं है, लेकिन सूडान का एक गेंदबाज लगातार मेरी छाती और कमर को निशाना बना कर गेंदें फ़ेंकता है । अब इस उमर में मैं 50-60 मील प्रति घंटा की गेंदबाजी नहीं झेल सकता हूँ ।
ग्रेग – ठीक है कोई बात नहीं.. तुम हिट विकेट आऊट होकर आ जाना और बाद में मीडिया को कोई बयान दे देना, वैसे हमारी टीम की इमेज इतनी जोरदार है कि कोई भी बॉलर शॉर्टपिच गेंद नहीं फ़ेंकेगा… फ़िर भी..राहुल सौरव के साथ किसे भेजना चाहिये ओपनिंग के लिये ?
राहुल – मुझे लगता है सहवाग सही रहेगा, क्योंकि उसने बीस मैचों के बाद पिछले मैच में चार चौके लगाये थे, इससे लगता है कि वह अपने पुराने फ़ॉर्म में लौट आया है..क्यों सहवाग ?
सहवाग – जी सर
ग्रेग – चलो बढिया.. सचिन आप नम्बर चार पर जायेंगे ? मतलब आपकी जैसी मर्जी…
सचिन – मुझे 11 बजे शॉपिंग करने जाना है तो मैं दस ओवर के बाद ही जाऊँगा..
ग्रेग – ठीक है, सहवाग और सौरव छः ओवर तो निकाल ही लेंगे, फ़िर आप चले जाना..और अपना नैसर्गिक खेल खेलना..चलो धोनी तुम कीपिंग करोगे…
धोनी – मैं इस बार कीपिंग नहीं करूँगा, पिछले मैच में मैने चार घंटे कीपिंग की थी उसके कारण मेरे धूप से मेरे बाल खराब हो गये है और उसमें जूँए पड़ गई हैं.. मैं तो बल्लेबाज के तौर पर खेलूँगा..
ग्रेग – प्लीज एक बार आज के लिये कीपर बन जाओ.. यह हमारा बहुत महत्वपूर्ण मैच है..
धोनी – ठीक सिर्फ़ आज, लेकिन शाम को मुझे मॉडलिंग के लिये रैम्प पर भी उतरना है, इसलिये आगे से ध्यान रखना
इस बीच गुरु ग्रेग ने पिछले रिकॉर्ड के अनुसार देखा कि राहुल सबसे अधिक देर तक क्रीज पर टिका रहता है, तो ग्रेग चैपल ने कहा, राहुल तुम इन्हें बताओ कि कैसे तुम क्रीज पर टिके रहते हो…
राहुल – सच बात तो यह है कि मेरी बीबी बहुत ही बदसूरत है इसलिये मैं कोशिश करता हूँ कि अधिक से अधिक देर तक उससे दूर रह सकूँ और पिच ही वह जगह है जहाँ मैं सुकून से रह सकता हूँ, आपको याद होगा कि पिछले मैच में मैने ९३ गेंदों पर 4 रन बनाये थे और मैं बहुत खुश था… सभी खिलाडियों ने तालियाँ बजाईं..
ग्रेग ने कहा – चलो ठीक है.. गेंदबाजी की शुरुआत जहीर करेगा, क्योंकि वही सबसे कम वाईड फ़ेंकता है.. पिछले मैच में उसने सिर्फ़ 12 वाईड फ़ेंकी थीं । फ़िर गुरु ने कहा कि मैं देख रहा हूँ कि राहुल पर कप्तानी का बोझ कुछ ज्यादा ही पड़ रहा है, इसलिये मैने नया प्रयोग करने की सोची है, जिसके तहत टीम में अब तीन कप्तान होंगे, बैटिंग कप्तान, फ़ील्डिंग कप्तान और बॉलिंग कप्तान.. कैसा आईडिया है.. किसी ने कोई जवाब नहीं दिया..मैने देखा कि मुनाफ़ पटेल पिछले तीन मैचों से नॉट आऊट रहा है, इसलिये उसकी बैटिंग प्रतिभा को देखते हुए उसे मैं उसे बैटिंग कप्तान बनाता हूँ..सौरव लगभग १५० रन आऊट करवाने में शामिल रहा है, लेकिन खुद कभी रन आऊट नहीं हुआ, इसलिये मैं उसे फ़ील्डिंग कप्तान बनाता हूँ.. राहुल ने आपत्ति उठाई – लेकिन सौरव ने पिछले मैच में ही तीन कैच छोडे थे…गुरु ने कहा – लेकिन उसने बिलकुल सही दिशा में डाईव किया था, यही बहुत है । मैने देखा है कि पिछले तीन साल से अनिल कुम्बले लगातार टीम से बाहर रहा है, लेकिन उसने जम्हाई लेने के अलावा अपना मुँह कभी नहीं खोला, मैं उसकी खेल भावना की कद्र करते हुए उसे बॉलिंग कप्तान बनाता हूँ…
अन्त में गुरु ग्रेग ने टीम में जोश भरते हुए कहा – उठो लड़कों तुम्हें सूडान को हराना ही होगा.. बाहर लाखों लोग यज्ञ-हवन कर रहे हैं, बाल बढा रहे हैं, मन्दिरों में मत्था टेक रहे हैं.. चलो उठो..
वैसे मीडिया की जानकारी के लिये बता दूँ कि विश्व कप के बाद भारत के अगले चार अभ्यास मैच इस प्रकार से हैं –
12 अप्रैल – सरस्वती विद्या मन्दिर
15 अप्रैल – विक्रम हाई स्कूल
17 अप्रैल – स्टेन्फ़ोर्ड गर्ल्स कॉलेज
20 अप्रैल – सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल…
इस सम्बन्ध में राहुल का कहना है कि हमारी पहली प्राथमिकता सरस्वती विद्या मन्दिर को हराने की होगी, क्योंकि मैने सुना है कि उनके पास कुछ युवा और जोशीले खिलाडी है… तो आईये हम भी हू..हा..इंडिया के लिये प्रार्थना करें…

>मटुकनाथ और जूली कस्बा-ए-उज्जैन में

>अभी कुछ सप्ताह पहले ही इन्दौर में एक समाचार पत्र के उदघाटन समारोह में मीडिया द्वारा बहुचर्चित “लव-गुरु” (?) मटुकनाथ और उनकी प्रेमिका जूली को आमंत्रित किया गया था, समाचार पत्र का नाम है “धर्मयुद्ध”…कैसा लगा नाम और उस नाम से “मैच” करता उनका उदघाटनकर्ता । अब यह सोचने की बात है कि मटुकनाथ और जूली को सामने रखकर किस प्रकार का “धर्मयुद्ध” लड़ने की तैयारी की जा रही है ? क्या अब समाचार-पत्र भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह बेशर्म और समाज से कटे हुए होने लगे हैं ? यदि हाँ, तो यह एक राष्ट्रीय चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिये ? प्रेस काऊंसिल किस मर्ज की दवा है ? और यदि नहीं… तो फ़िर इस तरह के “आइकॉन” (? यदि वे हैं तो यह हमारा दुर्भाग्य है) को एक समाचार पत्र के उदघाटन के लिये बुलाने का क्या मकसद है ? उक्त समाचार पत्र किस तरह की खबरें अपने पाठकों को देना चाहेगा, क्या यह उसका पूर्वाभास मात्र था, या येन-केन प्रकारेण किसी भी भौंडे तरीके से क्यों ना हो…थोडा सा प्रचार हासिल करना या अपने “प्रोडक्ट” के बारे में ध्यान आकर्षित करवाना ? लेकिन जब कोई अखबार एक “प्रोडक्ट” बन जाता है तो वह आम जनता के सरोकारों से कट जाता है, उसका एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक “बिकना” होता है, जैसा कि टीवी चैनलों के “टीआरपी” से सन्दर्भ में होता है, जिसके लिये वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं… बहरहाल बात है मटुकनाथ और जूली की… चूँकि वे इन्दौर आये थे तो जैसा कि सभी लोग करते हैं वे हमारे उज्जैन भी पधारे…महाकाल के दर्शन करने और एक कार्यक्रम में भाग लेने । कार्यक्रम क्या था ?… अजी उनका सम्मान, और क्या ? चौंकिये नहीं.. उन जैसों का ही आजकल सम्मान होता है । तो वे इस कस्बानुमा, “टू बी शहर” और इन्दौर की भौंडी नकल में माहिर, स्थल पर पधारे । जैसा कि हरेक कस्बे या छोटी जगहों में होता है एक गुट विशेष के लोगों का मीडिया पर, उदघाटन समारोहों, सम्मान समारोहों आदि पर कब्जा होता है, उन्हीं मे से कुछ लोग फ़िर लायंस या रोटरी जैसे “स्टार” युक्त क्लबों के महानुभाव भी होते हैं, उनकी उपस्थिति में इन दोनों हस्तियों का सम्मान किया गया.. हँसी-ठिठोली की गई..खी-खी करके दाँत भी निपोरे गये, लोकल मीडिया ने उन्हें अच्छा कवरेज दिया (देना ही था, क्योंकि उनका ‘इंतजाम’ पूरा किया गया था)। इस पूरे तमाशे में सबसे अधिक खटकने वाली बात यह थी कि मटुकनाथ का सम्मान करने वालों में अधिकतर वे तथाकथित संभ्रांत लोग थे जो समाज के उच्च तबके के कहे जाते हैं, जिनसे उम्मीद (झूठी ही सही) की जाती है कि वे समाज में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ़ आवाज उठायेंगे… इन्हीं लोगों ने सबसे पहले फ़िल्म “निःशब्द” की आलोचना की थी, शायद वह इसलिये होगी कि अमिताभ बाबा मन्दिरों के चक्कर लगाते-लगाते जिया खान से इश्क क्यों फ़रमाने लगे, कुछ ऐसे लोग भी उस सम्मान समारोह में थे, जिन्होंने “वाटर” का विरोध किया था, कुछ ऐसे लोग भी थे जो भारत की क्रिकेट टीम के हारने पर सर मुंडवा लेंगे, लेकिन परदे की झूठी छवियों का विरोध करने वाले ये खोखले लोग उस मटुकनाथ के सम्मान समारोह में खुशी-खुशी उपस्थित थे, जो अपनी ब्याहता पत्नी और बच्चों को छोडकर अपने से आधी उम्र की एक छोकरी के साथ सरेआम बेशर्मी से घूम रहा था, हँस रहा था । उन तथाकथित सज्जनों से एक सवाल करने को जी चाहता है कि यदि उनकी पुत्री को उनकी आँखों के सामने उसी का टीचर भगा ले जाये, तो वे क्या करेंगे ? क्या संस्कृति पर खतरे वाली बात उस समय वे भूल जायेंगे ? या इसे भी हँसकर टाल देंगे और बेटी से कहेंगे “कोई बात नहीं..तू एक शादीशुदा के साथ उसकी प्रेमिका बनकर रह, हमें कोई आपत्ति नहीं है” । और आज ही एक खबर पर नजर गई…कि बिहार में एक और “लव-गुरु” (?) ने अपनी पत्नी को त्यागकर अपनी शिष्या से प्रेम विवाह कर लिया है । लगता है कि ये तो अभी शुरुआत है, आगे-आगे देखिये होता है क्या…

मटुकनाथ और जूली कस्बा-ए-उज्जैन में

अभी कुछ सप्ताह पहले ही इन्दौर में एक समाचार पत्र के उदघाटन समारोह में मीडिया द्वारा बहुचर्चित “लव-गुरु” (?) मटुकनाथ और उनकी प्रेमिका जूली को आमंत्रित किया गया था, समाचार पत्र का नाम है “धर्मयुद्ध”…कैसा लगा नाम और उस नाम से “मैच” करता उनका उदघाटनकर्ता । अब यह सोचने की बात है कि मटुकनाथ और जूली को सामने रखकर किस प्रकार का “धर्मयुद्ध” लड़ने की तैयारी की जा रही है ? क्या अब समाचार-पत्र भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह बेशर्म और समाज से कटे हुए होने लगे हैं ? यदि हाँ, तो यह एक राष्ट्रीय चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिये ? प्रेस काऊंसिल किस मर्ज की दवा है ? और यदि नहीं… तो फ़िर इस तरह के “आइकॉन” (? यदि वे हैं तो यह हमारा दुर्भाग्य है) को एक समाचार पत्र के उदघाटन के लिये बुलाने का क्या मकसद है ? उक्त समाचार पत्र किस तरह की खबरें अपने पाठकों को देना चाहेगा, क्या यह उसका पूर्वाभास मात्र था, या येन-केन प्रकारेण किसी भी भौंडे तरीके से क्यों ना हो…थोडा सा प्रचार हासिल करना या अपने “प्रोडक्ट” के बारे में ध्यान आकर्षित करवाना ? लेकिन जब कोई अखबार एक “प्रोडक्ट” बन जाता है तो वह आम जनता के सरोकारों से कट जाता है, उसका एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक “बिकना” होता है, जैसा कि टीवी चैनलों के “टीआरपी” से सन्दर्भ में होता है, जिसके लिये वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं… बहरहाल बात है मटुकनाथ और जूली की… चूँकि वे इन्दौर आये थे तो जैसा कि सभी लोग करते हैं वे हमारे उज्जैन भी पधारे…महाकाल के दर्शन करने और एक कार्यक्रम में भाग लेने । कार्यक्रम क्या था ?… अजी उनका सम्मान, और क्या ? चौंकिये नहीं.. उन जैसों का ही आजकल सम्मान होता है । तो वे इस कस्बानुमा, “टू बी शहर” और इन्दौर की भौंडी नकल में माहिर, स्थल पर पधारे । जैसा कि हरेक कस्बे या छोटी जगहों में होता है एक गुट विशेष के लोगों का मीडिया पर, उदघाटन समारोहों, सम्मान समारोहों आदि पर कब्जा होता है, उन्हीं मे से कुछ लोग फ़िर लायंस या रोटरी जैसे “स्टार” युक्त क्लबों के महानुभाव भी होते हैं, उनकी उपस्थिति में इन दोनों हस्तियों का सम्मान किया गया.. हँसी-ठिठोली की गई..खी-खी करके दाँत भी निपोरे गये, लोकल मीडिया ने उन्हें अच्छा कवरेज दिया (देना ही था, क्योंकि उनका ‘इंतजाम’ पूरा किया गया था)। इस पूरे तमाशे में सबसे अधिक खटकने वाली बात यह थी कि मटुकनाथ का सम्मान करने वालों में अधिकतर वे तथाकथित संभ्रांत लोग थे जो समाज के उच्च तबके के कहे जाते हैं, जिनसे उम्मीद (झूठी ही सही) की जाती है कि वे समाज में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ़ आवाज उठायेंगे… इन्हीं लोगों ने सबसे पहले फ़िल्म “निःशब्द” की आलोचना की थी, शायद वह इसलिये होगी कि अमिताभ बाबा मन्दिरों के चक्कर लगाते-लगाते जिया खान से इश्क क्यों फ़रमाने लगे, कुछ ऐसे लोग भी उस सम्मान समारोह में थे, जिन्होंने “वाटर” का विरोध किया था, कुछ ऐसे लोग भी थे जो भारत की क्रिकेट टीम के हारने पर सर मुंडवा लेंगे, लेकिन परदे की झूठी छवियों का विरोध करने वाले ये खोखले लोग उस मटुकनाथ के सम्मान समारोह में खुशी-खुशी उपस्थित थे, जो अपनी ब्याहता पत्नी और बच्चों को छोडकर अपने से आधी उम्र की एक छोकरी के साथ सरेआम बेशर्मी से घूम रहा था, हँस रहा था । उन तथाकथित सज्जनों से एक सवाल करने को जी चाहता है कि यदि उनकी पुत्री को उनकी आँखों के सामने उसी का टीचर भगा ले जाये, तो वे क्या करेंगे ? क्या संस्कृति पर खतरे वाली बात उस समय वे भूल जायेंगे ? या इसे भी हँसकर टाल देंगे और बेटी से कहेंगे “कोई बात नहीं..तू एक शादीशुदा के साथ उसकी प्रेमिका बनकर रह, हमें कोई आपत्ति नहीं है” । और आज ही एक खबर पर नजर गई…कि बिहार में एक और “लव-गुरु” (?) ने अपनी पत्नी को त्यागकर अपनी शिष्या से प्रेम विवाह कर लिया है । लगता है कि ये तो अभी शुरुआत है, आगे-आगे देखिये होता है क्या…

>गाँधीजी के तीन आधुनिक बन्दर

>आपने गाँधीजी के तीन बन्दर तो देखे ही होंगे….

ये हैं “ओरिजिनल” वाले….

और अब देखिये आधुनिक बन्दर…


जो हमसे कह रहे हैं… “बुरा (भारत की हार) मत देखो, बुरा (प्रशंसक क्या कहते हैं) मत सुनो और बुरा (हार का स्पष्टीकरण) मत कहो”

गाँधीजी के तीन आधुनिक बन्दर

आपने गाँधीजी के तीन बन्दर तो देखे ही होंगे….

ये हैं “ओरिजिनल” वाले….

और अब देखिये आधुनिक बन्दर…


जो हमसे कह रहे हैं… “बुरा (भारत की हार) मत देखो, बुरा (प्रशंसक क्या कहते हैं) मत सुनो और बुरा (हार का स्पष्टीकरण) मत कहो”

गाँधीजी के तीन आधुनिक बन्दर

आपने गाँधीजी के तीन बन्दर तो देखे ही होंगे….

ये हैं “ओरिजिनल” वाले….

और अब देखिये आधुनिक बन्दर…


जो हमसे कह रहे हैं… “बुरा (भारत की हार) मत देखो, बुरा (प्रशंसक क्या कहते हैं) मत सुनो और बुरा (हार का स्पष्टीकरण) मत कहो”

>एण्ड नोबेल प्राईज गोज़ टू…इंडियन क्रिकेट टीम

>चौंकिये नहीं… नोबेल पुरस्कार क्रिकेट टीम को भी मिल सकता है… अब देखिये ना जब से हमारी क्रिकेट टीम यहाँ से विश्व कप खेलने गई थी… तो वह कोई कप जीतने-वीतने नहीं गई थी…वह तो निकली थी एक महान और पवित्र उद्देश्य…”विश्व बन्धुत्व” का प्रचार करने । जब प्रैक्टिस मैच हुए तो भारत की टीम ने दिखा दिया कि क्रिकेट कैसे खेला जाता है… लेकिन जब असली मैच शुरू हुए तो भारत की टीम पहला मैच बांग्लादेश से हार गई… बांग्लादेश से वैसे भी भारत के बहुत मधुर सम्बन्ध हैं…वहाँ से हमारे यहाँ आना-जाना लगा रहता है… वह तो हमारा छोटा भाई है… इसलिये वहाँ क्रिकेट को बढावा देने के लिये बडे भाई को तो कुर्बानी देनी ही थी, सो दे दी । फ़िर बात आई पाकिस्तान की… अब आप सोचेंगे कि वह तो हमारे ग्रुप में ही नहीं था… लेकिन भई है तो हमारा पडोसी ही ना… जैसे ही वे मैच हारे और बाहर हुए… भारत की टीम का हाजमा भी खराब हो गया… फ़िर एक बार पडोसी धर्म निभाने की बारी थी “बडे़ भाई” की… सो फ़िर निभा दिया… रह गया था तीसरा पडोसी श्रीलंका… उससे भी हमने मैच हार कर उसे भी दिलासा दिया कि तुम अपने-आप को अकेला मत समझना… “बडे़ भाई” सभी का खयाल रखते हैं… सो श्रीलंका से भी मैच हार गये । अब सोचिये एक ऐसे महान देश की महान टीम जो कि विश्व बन्धुत्व की भावना से ही मैच खेलती है, क्या उसे शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं मिलना चाहिये ? और यह तो मैने बताई सिर्फ़ एक बात जिससे नोबेल पुरस्कार मिल सकता है, मसलन…अर्थव्यवस्था की दृष्टि से भी इस महान टीम ने काम किया… अब ये लोग मैच जीतते रहते तो सट्टा चलता रहता, देशवासियों का करोडों रुपया बरबाद होने से इन वीरों ने बचाया… लोगबाग रात-बेरात जाग-जाग कर मैच देखते… अलसाये से ऑफ़िस जाते और काम-धाम नहीं करते… हमारी इस महान टीम ने अरबों घण्टों का मानव श्रम बचाया और लोगों को टीवी से दूर करने में सफ़लता हासिल की, इतना महान कार्य आज तक किसी ने किया है ? और रही बात कप की… तो ऐसे कप तो हमारे जयपुर में ही बनते हैं कभी भी जाकर ले आयेंगे… उसके लिये इतनी सारी टीमों से बुराई मोल लेना उचित नहीं है…क्या पता कल को उनमें से आडे़ वक्त पर कोई हमारे काम आ जाये… भाईचारा बनाये रखना चाहिये…
और भी ऐसी कई बातें हैं जो इसमें जोड़ दी जायें तो नोबेल पक्का… नोबेल वालों को घर पर आकर नोबेल देना पडे़गा… विश्व बन्धुत्व, अर्थव्यवस्था को एक बडा योगदान, करोडों मानव श्रम घण्टों की बचत, कोई भी एक टीम एक साथ इतने सारे क्षेत्रों में महान काम नहीं कर सकती… और तो और भारत की टीम से हमारे सदा नाराज रहने वाले वामपंथी भाई भी खुश होंगे, क्योंकि इन खिलाडियों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से पैसे तो पूरे ले लिये लेकिन जब उनका माल बिकवाने की बारी आई तो घर बैठ गये… इसे कहते हैं “चूना लगाना”….तो भाई लोगों यदि आप भी ऐसा ही समझते हैं कि नोबेल पुरस्कार भारत की क्रिकेट टीम को ही मिलना चाहिये… तो अपने मोबाईल के बॉक्स में जाकर “मू” “र” “ख” टाईप करें और 9-2-11 पर एसएमएस करें… सही जवाबों में से किसी एक विजेता को मिलेगी धोनी के बालों की एक लट, जो उन्होंने वापस आते वक्त हवाई जहाज में कटवाई थी, ताकि कहीं लोग उन्हें पहचान ना लें… तो रणबाँकुरों उठो…मोबाईल उठाओ और शुरू हो जाओ…

एण्ड नोबेल प्राईज गोज़ टू…इंडियन क्रिकेट टीम

चौंकिये नहीं… नोबेल पुरस्कार क्रिकेट टीम को भी मिल सकता है… अब देखिये ना जब से हमारी क्रिकेट टीम यहाँ से विश्व कप खेलने गई थी… तो वह कोई कप जीतने-वीतने नहीं गई थी…वह तो निकली थी एक महान और पवित्र उद्देश्य…”विश्व बन्धुत्व” का प्रचार करने । जब प्रैक्टिस मैच हुए तो भारत की टीम ने दिखा दिया कि क्रिकेट कैसे खेला जाता है… लेकिन जब असली मैच शुरू हुए तो भारत की टीम पहला मैच बांग्लादेश से हार गई… बांग्लादेश से वैसे भी भारत के बहुत मधुर सम्बन्ध हैं…वहाँ से हमारे यहाँ आना-जाना लगा रहता है… वह तो हमारा छोटा भाई है… इसलिये वहाँ क्रिकेट को बढावा देने के लिये बडे भाई को तो कुर्बानी देनी ही थी, सो दे दी । फ़िर बात आई पाकिस्तान की… अब आप सोचेंगे कि वह तो हमारे ग्रुप में ही नहीं था… लेकिन भई है तो हमारा पडोसी ही ना… जैसे ही वे मैच हारे और बाहर हुए… भारत की टीम का हाजमा भी खराब हो गया… फ़िर एक बार पडोसी धर्म निभाने की बारी थी “बडे़ भाई” की… सो फ़िर निभा दिया… रह गया था तीसरा पडोसी श्रीलंका… उससे भी हमने मैच हार कर उसे भी दिलासा दिया कि तुम अपने-आप को अकेला मत समझना… “बडे़ भाई” सभी का खयाल रखते हैं… सो श्रीलंका से भी मैच हार गये । अब सोचिये एक ऐसे महान देश की महान टीम जो कि विश्व बन्धुत्व की भावना से ही मैच खेलती है, क्या उसे शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं मिलना चाहिये ? और यह तो मैने बताई सिर्फ़ एक बात जिससे नोबेल पुरस्कार मिल सकता है, मसलन…अर्थव्यवस्था की दृष्टि से भी इस महान टीम ने काम किया… अब ये लोग मैच जीतते रहते तो सट्टा चलता रहता, देशवासियों का करोडों रुपया बरबाद होने से इन वीरों ने बचाया… लोगबाग रात-बेरात जाग-जाग कर मैच देखते… अलसाये से ऑफ़िस जाते और काम-धाम नहीं करते… हमारी इस महान टीम ने अरबों घण्टों का मानव श्रम बचाया और लोगों को टीवी से दूर करने में सफ़लता हासिल की, इतना महान कार्य आज तक किसी ने किया है ? और रही बात कप की… तो ऐसे कप तो हमारे जयपुर में ही बनते हैं कभी भी जाकर ले आयेंगे… उसके लिये इतनी सारी टीमों से बुराई मोल लेना उचित नहीं है…क्या पता कल को उनमें से आडे़ वक्त पर कोई हमारे काम आ जाये… भाईचारा बनाये रखना चाहिये…
और भी ऐसी कई बातें हैं जो इसमें जोड़ दी जायें तो नोबेल पक्का… नोबेल वालों को घर पर आकर नोबेल देना पडे़गा… विश्व बन्धुत्व, अर्थव्यवस्था को एक बडा योगदान, करोडों मानव श्रम घण्टों की बचत, कोई भी एक टीम एक साथ इतने सारे क्षेत्रों में महान काम नहीं कर सकती… और तो और भारत की टीम से हमारे सदा नाराज रहने वाले वामपंथी भाई भी खुश होंगे, क्योंकि इन खिलाडियों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से पैसे तो पूरे ले लिये लेकिन जब उनका माल बिकवाने की बारी आई तो घर बैठ गये… इसे कहते हैं “चूना लगाना”….तो भाई लोगों यदि आप भी ऐसा ही समझते हैं कि नोबेल पुरस्कार भारत की क्रिकेट टीम को ही मिलना चाहिये… तो अपने मोबाईल के बॉक्स में जाकर “मू” “र” “ख” टाईप करें और 9-2-11 पर एसएमएस करें… सही जवाबों में से किसी एक विजेता को मिलेगी धोनी के बालों की एक लट, जो उन्होंने वापस आते वक्त हवाई जहाज में कटवाई थी, ताकि कहीं लोग उन्हें पहचान ना लें… तो रणबाँकुरों उठो…मोबाईल उठाओ और शुरू हो जाओ…

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