"सुद्ध" नहीं "शुद्ध" हिन्दी बोलो / लिखो

हमारी राष्ट्रभाषा अर्थात हिन्दी, जिसकी देश में स्थापना के लिये अब तक न जाने कितने ही व्यक्तियों, विद्यालयों और संस्थाओं ने लगातार संघर्ष किया, इसमें वे काफ़ी हद तक सफ़ल भी रहे हैं । अब तो दक्षिण से भी हिन्दी के समर्थन में आवाजें उठ रही हैं, और हमारी प्यारी हिन्दी धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही है और अब इसे कोई रोक भी नहीं सकता । वैसे भी “बाजार”की ताकतें बहुत बडी हैं और हिन्दी में “माल” खींचने की काफ़ी सम्भावनायें हैं इसलिये कैसे भी हो हिन्दी का झंडा तो बुलन्द होकर रहेगा । तमाम चैनलों के चाकलेटी पत्रकार भी धन्धे की खातिर ही सही टूटी-फ़ूटी ही सही, लेकिन हमें “ईराक के इन्टेरिम प्रधानमन्त्री मिस्टर चलाबी ने यूएन के अध्यक्ष से अधिक ग्रांट की माँग की है” जैसी अंग्रेजी की बघार लगी हिन्दी हमें झिलाने लगे हैं, खैर कैसे भी हो हिन्दी का प्रसार तो हो रहा है ।
परन्तु हिन्दी बेल्ट (जी हाँ, जिसे अंग्रेजों और हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों की एक जमात ने “गोबर पट्टी” का नाम दे रखा है, पता नहीं क्यों ?) अर्थात उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश के रहवासी शुद्ध हिन्दी लिखना तो दूर, ठीक से बोल भी नहीं पाते हैं, यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है । इन प्रदेशों को हिन्दी का हृदय-स्थल कहा गया है, अनेक महान साहित्यकारों की जन्मभूमि एवं कर्मभूमि यही चारों प्रदेश रहे हैं और इस पर गर्व भी किया जाता है । हिन्दी साहित्य को अतुलनीय योगदान इन्हीं प्रदेशों की विभूतियों ने दिया है । इन्हीं चारों प्रदेशों का गठन भाषा के आधार पर नहीं हुआ, इसलिये जहाँ बाकी राज्यों की हिन्दी के अलावा कम से कम अपनी एक आधिकारिक भाषा तो है, चाहे वह मराठी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, उडिया, बंगाली, पंजाबी, मणिपुरी, कोंकणी आदि हों, वहीं दूसरी ओर से इन चारों हिन्दी प्रदेशों की आधिकारिक भाषा हिन्दी होते हुए भी आमजन में इसकी भीषण दुर्दशा साफ़ देखी जा सकती है । इन प्रदेशों में, मालवी है, बुन्देलखंडी है, बघेली, निमाडी़, भोजपुरी, अवधी और भी बहुत सी हैं…. गरज कि हिन्दी को छोडकर सभी अपनी-अपनी जगह हैं, और हिन्दी कहाँ है ? हिन्दी अर्थात जिसे हम साफ़, शुद्ध, भले ही अतिसाहित्यिक और आलंकारिक ना हो, लेकिन “सिरी बिस्वास” (श्री विश्वास) जैसी भी ना हो । ऐसी हिन्दी कहाँ है, क्या सिर्फ़ उपन्यासों में, सहायक वाचनों, बाल भारती, आओ सुलेख लिखें जैसी किताबों में । आम बोलचाल की भाषा में जो हिन्दी का रूप हमें देखने को मिलता है उससे लगता है कि कहीं ना कहीं बुनियादी गड़बडी है । यहाँ तक कि प्रायमरी और मिडिल स्कूलों में पढाने वाले कई अध्यापक / अध्यापिकायें स्नातक और स्नातकोत्तर होने के बावजूद सरेआम… “तीरंगा” और “आर्शीवाद” लिखते हैं, और यही संस्कार (?) वे नौनिहालों को भी दे रहे हैं, फ़िर उनके स्नातकोत्तर होने का क्या उपयोग है ? आम तौर पर देखा गया है कि ‘श’ को ‘स’ और ‘व’ को ‘ब’ तो ऐसे बोला जाता है मानो दोनों एक ही शब्द हों और उन्हें कैसे भी बोलने पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता । “अरे बिस्नू जी जे डीस तो बासेबल है” (विष्णु जी यह डिश वाशेबल है) सुनकर भला कौन अपना सिर नहीं पीट लेगा ? लेकिन जैसा कि पहले ही कहा गया कि मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्सों में ऐसी हिन्दी बोलना कतई गलत नहीं माना जाता, बल्कि यह आम बोलचाल की भाषा बन गई है, लेकिन हिन्दी ही कहलाती है । कई स्थानीय चैनलों के समाचारों में ‘चेनल’ (चैनल), टावर चोक (चौक), बेट (बैट) और रेट (रैट) हमेशा सुनाई दे जाता है, जो कि बडा़ भद्दा लगता है । लेकिन जब “बिद्या” प्रदान करने वाले ही गलत-सलत पढायेंगे तो भविष्य में उसे ठीक करना मुश्किल हो जाता है । इसके मूल में है शुद्ध संस्कृत के अध्ययन का अभाव । जो अध्यापक या विद्यार्थी संस्कृत की तमाम क्रिया, लकारों के साथ शुद्ध बोल पायेंगे वे कभी भी हिन्दी में बोलते समय या लिखते समय “ब्योपारी”, “बिबेक” या “संबिधान संसोधन” जैसी गलती कर ही नहीं सकते । रही-सही कसर हिन्दी को “हिंग्रेजी” बना देने की फ़ूहड़ कोशिश करने वालों के कारण हो रही है । खामख्वाह अपनी विद्वत्ता झाडने के लिये हिन्दी के बीच में अंग्रेजी शब्दों को घुसेड़ना एक फ़ैशन होता जा रहा है । यदि अंग्रेजी शब्द सही ढंग और परिप्रेक्ष्य में बोला जाये तो भी आपत्ति नहीं है, लेकिन “छत पर बाऊंड्री वॉल” (अर्थात पैराफ़िट वॉल), या “सिर में हेडेक”, “सुबह मॉर्निंग में ही तो मिले थे”, “उन्हें बचपन से बहुत लेबर करने की आदत है इसीलिये आज वे एक सेक्सीफ़ुल व्यक्ति हैं” सुनकर तो कोई भी कपडे़ फ़ाडने पर मजबूर हो जायेगा । जब किसी बडे अधिकारी या पढे-लिखे व्यक्ति के मुँह से ऐसा कुछ सुनने को मिलता है तो हैरत के साथ-साथ क्षोभ भी होता है, कि वर्षों से हिन्दी क्षेत्र में रहते हुए भी वे एक सामान्य सी साफ़ हिन्दी भी नहीं बोल पाते हैं और अपने अधीनस्थों को सरेआम “सांबास-सांबास” कहते रहते हैं, किसी अल्पशिक्षित व्यक्ति या सारी जिन्दगी गाँव में बिता देने वाले किसी वृद्ध के मुँह से ऐसी हिन्दी अस्वाभाविक नहीं लगती, लेकिन किसी आईएएस अधिकारी या प्रोफ़ेसर के मुँह से नहीं । इसलिये हमें “दुध” (दूध), “लोकि” (लौकी), “शितल” (शीतल) आदि लिखे पर ध्यान देने की आवश्यकता तो है ही, बल्कि क्या और कैसे बोला जा रहा है, क्या उच्चारण किया जा रहा है, इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है । आईये प्रण करें कि भविष्य में जब कभी किसी से “पीछे का बैकग्राऊंड”, “आगे का फ़्यूचर”, “ओवरब्रिज वाला पुल”, “मेरा तो बैडलक ही खराब है”, जैसे वाक्य सुनाई दे जायें तो तत्काल उसमें सुधार करवायें, भले ही सामने वाला बुरा मान जाये…

19 Comments

  1. मनोगत said,

    March 11, 2007 at 2:54 pm

    हिंदी को राष्ट्रभाषा कहना उचित नही है. राज्यघटना के ३४३ और ३४४ ने अनुसार भारत संघराज्य की कोई राष्ट्रभाषा नही है.
    कृपया आप नीचे का दुवा पढिये.

    http://www.manogat.com/node/2839

  2. मनोगत said,

    March 11, 2007 at 2:54 pm

    हिंदी को राष्ट्रभाषा कहना उचित नही है. राज्यघटना के ३४३ और ३४४ ने अनुसार भारत संघराज्य की कोई राष्ट्रभाषा नही है.
    कृपया आप नीचे का दुवा पढिये.

    http://www.manogat.com/node/2839

  3. मनोगत said,

    March 11, 2007 at 2:54 pm

    हिंदी को राष्ट्रभाषा कहना उचित नही है. राज्यघटना के ३४३ और ३४४ ने अनुसार भारत संघराज्य की कोई राष्ट्रभाषा नही है.
    कृपया आप नीचे का दुवा पढिये.

    http://www.manogat.com/node/2839

  4. March 11, 2007 at 2:54 pm

    हिंदी को राष्ट्रभाषा कहना उचित नही है. राज्यघटना के ३४३ और ३४४ ने अनुसार भारत संघराज्य की कोई राष्ट्रभाषा नही है.कृपया आप नीचे का दुवा पढिये.http://www.manogat.com/node/2839

  5. RC Mishra said,

    March 11, 2007 at 3:25 pm

    क्षमा कीजियेगा!
    आपने बिद्या लिखा है क्या उम्मीद कर सकता हूँ कि आपने शुद्ध हिन्दी लिखने का प्रयास किया है !

  6. RC Mishra said,

    March 11, 2007 at 3:25 pm

    क्षमा कीजियेगा!
    आपने बिद्या लिखा है क्या उम्मीद कर सकता हूँ कि आपने शुद्ध हिन्दी लिखने का प्रयास किया है !

  7. RC Mishra said,

    March 11, 2007 at 3:25 pm

    क्षमा कीजियेगा!आपने बिद्या लिखा है क्या उम्मीद कर सकता हूँ कि आपने शुद्ध हिन्दी लिखने का प्रयास किया है !

  8. सागर चन्द नाहर said,

    March 11, 2007 at 4:12 pm

    मिश्र जी
    सुरेश जी ने बिद्या लिखते समय उसे ” ” चिन्हों के बीच लिखा है, इसका तात्पर्य यह हुआ कि उन्होने किसी विशेष प्रयोजन के तहत ऐसा किया है। उन्हे इस शब्द को गहरा (Bold) करना चाहिये था|
    वैसे लेख बहुत ही मेहनत कर किहा गया है, इसलिये सुरेश जी को साधूवाद। हाँ और एक जगह आपने “आलंकारिक” लिख दिया है, शायद सही शब्द अलंकारिक है।

    ॥दस्तक॥

  9. सागर चन्द नाहर said,

    March 11, 2007 at 4:12 pm

    मिश्र जी
    सुरेश जी ने बिद्या लिखते समय उसे ” ” चिन्हों के बीच लिखा है, इसका तात्पर्य यह हुआ कि उन्होने किसी विशेष प्रयोजन के तहत ऐसा किया है। उन्हे इस शब्द को गहरा (Bold) करना चाहिये था|
    वैसे लेख बहुत ही मेहनत कर किहा गया है, इसलिये सुरेश जी को साधूवाद। हाँ और एक जगह आपने “आलंकारिक” लिख दिया है, शायद सही शब्द अलंकारिक है।

    ॥दस्तक॥

  10. March 11, 2007 at 4:12 pm

    मिश्र जीसुरेश जी ने बिद्या लिखते समय उसे ” ” चिन्हों के बीच लिखा है, इसका तात्पर्य यह हुआ कि उन्होने किसी विशेष प्रयोजन के तहत ऐसा किया है। उन्हे इस शब्द को गहरा (Bold) करना चाहिये था|वैसे लेख बहुत ही मेहनत कर किहा गया है, इसलिये सुरेश जी को साधूवाद। हाँ और एक जगह आपने “आलंकारिक” लिख दिया है, शायद सही शब्द अलंकारिक है। ॥दस्तक॥

  11. अनुनाद सिंह said,

    March 12, 2007 at 4:49 am

    मुझे आलंकारिक शुद्ध लग रहा है।

    अंचाल — आंचलिक

    असुर — आसुरी

    इतिहास — ऐतिहासिक

    भूगोल — भौगोलिक

  12. अनुनाद सिंह said,

    March 12, 2007 at 4:49 am

    मुझे आलंकारिक शुद्ध लग रहा है।

    अंचाल — आंचलिक

    असुर — आसुरी

    इतिहास — ऐतिहासिक

    भूगोल — भौगोलिक

  13. March 12, 2007 at 4:49 am

    मुझे आलंकारिक शुद्ध लग रहा है।अंचाल — आंचलिकअसुर — आसुरीइतिहास — ऐतिहासिकभूगोल — भौगोलिक

  14. Shrish said,

    March 13, 2007 at 12:44 am

    सुरेश जी पूर्ण सहमत हूँ आपसे अशुद्ध वर्तनी के कारण भाषा की संपूर्ण सुन्दरता नष्ट हो जाती है। मैं खुद शुद्ध वर्तनी का प्रबल समर्थक हूँ और अक्सर साथी चिट्ठाकारों को इस बारे में टोकता रहता हूँ।

    हाँ मैं हिन्दी में विदेशज शब्दों और नए शब्दों के आने का विरोधी नहीं। अब कुछ शब्द हिन्दी में ऐसे घुल मिल गए हैं कि उन्हें अलग करना ही मुश्किल है जैसे ‘टाइम’। हम सब कहते हैं कि टाइम क्या हुआ, ‘समय’ क्या हुआ है कोई नहीं कहता।

  15. Shrish said,

    March 13, 2007 at 12:44 am

    सुरेश जी पूर्ण सहमत हूँ आपसे अशुद्ध वर्तनी के कारण भाषा की संपूर्ण सुन्दरता नष्ट हो जाती है। मैं खुद शुद्ध वर्तनी का प्रबल समर्थक हूँ और अक्सर साथी चिट्ठाकारों को इस बारे में टोकता रहता हूँ।

    हाँ मैं हिन्दी में विदेशज शब्दों और नए शब्दों के आने का विरोधी नहीं। अब कुछ शब्द हिन्दी में ऐसे घुल मिल गए हैं कि उन्हें अलग करना ही मुश्किल है जैसे ‘टाइम’। हम सब कहते हैं कि टाइम क्या हुआ, ‘समय’ क्या हुआ है कोई नहीं कहता।

  16. Shrish said,

    March 13, 2007 at 12:44 am

    सुरेश जी पूर्ण सहमत हूँ आपसे अशुद्ध वर्तनी के कारण भाषा की संपूर्ण सुन्दरता नष्ट हो जाती है। मैं खुद शुद्ध वर्तनी का प्रबल समर्थक हूँ और अक्सर साथी चिट्ठाकारों को इस बारे में टोकता रहता हूँ।हाँ मैं हिन्दी में विदेशज शब्दों और नए शब्दों के आने का विरोधी नहीं। अब कुछ शब्द हिन्दी में ऐसे घुल मिल गए हैं कि उन्हें अलग करना ही मुश्किल है जैसे ‘टाइम’। हम सब कहते हैं कि टाइम क्या हुआ, ‘समय’ क्या हुआ है कोई नहीं कहता।

  17. July 21, 2009 at 10:46 pm

    अच्छा प्रयास है आपका | लगे रहिये |

  18. February 16, 2010 at 1:06 pm

    हिन्दी की वर्तमान दशा-दिशा को रेखांकित करता आपका यह आलेख काफी अच्छा लगा. 🙂

  19. shishir said,

    August 21, 2010 at 7:13 pm

    meri to hindi hi kaam nahi kar rahi hai. lekin time me ee me deergh ee ki matra rahegi, na ki laghu ee ki matra. lekh hindi bhasha ki tarakki ke liye meel ka patthar saabit hogi.


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