हरित मानव का पुनरागमन

लापोडिया (राजस्थान) में विगत वर्ष बहुत ही अल्प बारिश हुई । गाँव में वैसे तो तीन विशाल आकार के तालाब, जिनका नामकरण सौन्दर्यशास्त्र के आधार पर अन्नासागर, देवसागर और फ़ूलसागर… खाली पडे़ हुए थे । परन्तु, लापोडिया, जो सूरज की तीव्रता से झुलसता हुआ एक छोटी सी बस्ती वाला गाँव है और जयपुर से ८० किलोमीटर दूरी पर दक्षिण-पश्चिम मे स्थित है, में ना तो झुलसती हुई धरती को शांत करने के लिये कोई यज्ञ आयोजित किये गये और ना ही पानी के अतिरिक्त टैंकरों की जरूरत महसूस की गई । जो थोडे लोग गाँव छोडकर गये वे भी जयपुर में रोजगार की तलाश में गये थे ।
लेकिन आज अन्य गाँवों से भिन्न लापोडिया के कुँए पानी से लबालब भरे हुए हैं । खेत के किनारे हरी पत्तियों वाली साग-सब्जी, पालक, मैथी, आलू, मूली आदि से पटे हैं । हर परिवार के पास अलग से अतिरिक्त स्थान है, जिसमें उन्होंने पशु आहार के लिये ताजा हरा चारा उगा रखा है । गाँव से प्रतिदिन १६ हजार लीटर दूध का विक्रय होता है । यहाँ पर वृक्ष जैसे – नीम, पीपल, पान, खैर, देशी बबूल आदि की बहार है और पूरा गाँव सैकडों अजनबी पक्षियों की चहचहाहट से रोमांचित हो उठता है, जिसे एक पक्षी प्रेमी ही समझ सकता है । यह सारा दृश्य एक पक्षी अभयारण्य का रूप अख्तियार कर लेता है ।
लापोडिया को कोई दैवीय आशीर्वाद प्राप्त नहीं हो गया है, यह सब चमत्कार है श्री लक्ष्मण सिंह की बाजीगरी का । एक ऐसा ग्रामीण व्यक्ति, जो किसी महाविद्यालय में अध्ययन के लिये नहीं गया, किन्तु उसने दिन-प्रतिदिन के अपने अनुभवों एवं पारम्परिक ज्ञान को गूँथकर जल-संग्रहण की एक अनूठी पद्धति विकसित की । जिसका नाम उसने “चोका” रखा – जो एक छोटे बाँध के स्वरूप में जटिल ग्रिड वाली संरचना है, जिसमें पानी की हर बूँद जो धरा के ऊपर और भीतर मौजूद है, को संग्रहीत किया जाता है । पूर्व में जो पानी ऊपर मौजूद था, वह या तो खपत हो जाता था या सूख जाता था, किन्तु भूमिगत जल जो धरती के अन्दर है, छुपा ही रहता था । इस पानी में गाँव के १०३ कुँए कभी नहीं सूखने देने की क्षमता मौजूद थी । लक्ष्मणसिंह की इस ठेठ देशी सोच नेण दूर तक बसे लोगों का ध्यान आकर्षित किया । दो वर्ष पूर्व सूखे से झुलसते हुए अफ़गानिस्तान का एक प्रथिनिधिमण्डल पूर्वी राजस्थान के इस गाँव में लक्ष्मणसिंह से जल संग्रहण की इस तकनीक को करीब से जानने-समझने के उद्देश्य से आया था । मध्यप्रदेश शासन ने भी एक अध्ययन दल भेजा, राजस्थान सरकार भी लापोडिया के उदाहरण को लेकर एक “हैण्डबुक” निकालने जा रही है । किन्तु इन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अडोस-पडो़स के कई गाँवों जैसे जयपुर जिले के मेत, चापियाँ एवं ईटनखोई तथा टोंक जिले के बालापुरा, सेलसागर और केरिया में “चोका पद्धति” सफ़लतापूर्वक अंगीकार की गई है ।
५१ वर्षीय लक्ष्मणसिंह जो अपना स्वयं का एक एनजीओ “ग्राम विकास नवयुवक मण्डल” चलाते हैं, का कहना है कि अन्या गाँवों में भी इस काम को बखूबी अंजाम दे रहे हैं” । २०० परिवारों की बस्ती वाला यह गाँव पहले कभी ऐसा नहीं था । लापोडिया का शाब्दिक अर्थ है “झक्की लोग” जो एक सन्देहपूर्ण नाम इसके झगडालू प्रवृत्ति वाले लोगों के कारण मिला होगा । लक्ष्मण सिंह जी के पिता एक जमींदार थे, कहते हैं कि वे सब कुछ बदल देना चाहते है, जो लोग इस गाँव के बारे में धारणा बनाये हुए हैं । एक दिन टोंक जिले के समीप स्थित पारले गाँव का भ्रमण करते हुए वे एक “बुण्ड” (कच्ची मिट्टी की दीवारें) के सम्पर्क में आये । सिंह कहते हैं कि इनको देखकर ही उनके मस्तिष्क में “चोका पद्धति” को विकसित करने के बीज अंकुरित हुए । अगले पाँच वर्ष तक वे “बुण्ड” के आसपास के वातावरण का अवलोकन करते रहे और जल संरक्षण की इस तकनीक को विकसित करने में जुट गये ।
इसकी आधारभूत संरचना काफ़ी सरल है, इसमें बारिश का पानी जो धरती द्वारा सोख जाता है वाष्प बनकर उड़ता नहीं है और यदि रोका जाये तो इसका उपयोग जब जरूरत हो तब किया जा सकता है । इस तरह से धरती के भीतर मौजूद पानी की हर बूँद को संरक्षित किया जा सकता है । सिंह इस दिशा एवं विचार पर काम करना शुरू किया, और वे कहते हैं कि “मैं जिला अधिकारियों के पास सहायता के लिये गया, किन्तु वे मुझ पर हँसे और उन्होंने मुझसे कहा कि यह सम्भव नहीं है, और पूछा कि तुम किस महाविद्यालय मे अध्ययन के लिये गये हो ?” वर्ष १९९४ के लगभग सिंह ने एक “चोका मॉडल” विकसित कर लिया था । अब इसका लाभ स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, यह सब आँखों के सामने है । नंगी आँखों से चरागाह सूखे दिखाई पडते हैं, लेकिन यह छोटी घास से भरे पडे हैं, जिसमें पालतू पशु चरते हैं । विगत आठ वर्षों से बारिश नियमित नहीं है किन्तु कुँए भरे हुए हैं । गाँव वालों ने सामूहिक पद्धति और सहमति रखकर ५०% भूमि पर ही खेती-बाडी़ करने का निर्णय ले रखा है । इसी तरह कुँए भी सिंचाई के लिये सुबह के वक्त ही उपयोग में लिये जाते हैं ।
सिंह कहते हैं कि “हमें प्रकृति से वही लेना चाहिये जो वह हमें गर्व से और सहर्ष दे, यदि आप जोर-जबर्दस्ती से कुछ छीनना चाहेंगे तो प्रकृति स्वयं की संपूर्ति और आपकी आपूर्ति नहीं कर सकती” ।
परिणामस्वरूप आज लापोडिया में पक्षी बिना भय के चहचहाते हैं और खेत-खलिहान में हरियाली बिछी हुई है ।

6 Comments

  1. सागर चन्द नाहर said,

    March 18, 2007 at 5:42 am

    काश हर गाँव में एक अन्ना हजारे और एक लक्ष्मण सिंह होते!
    आज तक आपके लिखॆ एक -एक लेख बहुत मेहनत कर लिखे गये हैं। जरूरी आँकड़े मुहैया कराये हैं आपने। वाकई आपकी लेखनी बहुत सशक्त है। मैं उम्मीद और आशा करता हूँ कि आने वाले समय में बेहतरीन चिट्ठा लेखकों में आपका नाम शामिल होगा।

  2. सागर चन्द नाहर said,

    March 18, 2007 at 5:42 am

    काश हर गाँव में एक अन्ना हजारे और एक लक्ष्मण सिंह होते!
    आज तक आपके लिखॆ एक -एक लेख बहुत मेहनत कर लिखे गये हैं। जरूरी आँकड़े मुहैया कराये हैं आपने। वाकई आपकी लेखनी बहुत सशक्त है। मैं उम्मीद और आशा करता हूँ कि आने वाले समय में बेहतरीन चिट्ठा लेखकों में आपका नाम शामिल होगा।

  3. March 18, 2007 at 5:42 am

    काश हर गाँव में एक अन्ना हजारे और एक लक्ष्मण सिंह होते! आज तक आपके लिखॆ एक -एक लेख बहुत मेहनत कर लिखे गये हैं। जरूरी आँकड़े मुहैया कराये हैं आपने। वाकई आपकी लेखनी बहुत सशक्त है। मैं उम्मीद और आशा करता हूँ कि आने वाले समय में बेहतरीन चिट्ठा लेखकों में आपका नाम शामिल होगा।

  4. अनुनाद सिंह said,

    March 18, 2007 at 7:13 am

    लापोडिया का वर्णन सुनकर मस्तिष्क में ‘स्वर्ग’ की छवि उतर आयी। लक्ष्मण सिंह जैसे लोगों का चरण चूमने का मन होता है। ऐसे सकारात्मक समाचारों का अधिकाधिक प्रसार किये जाने की आवश्यकता है।

  5. अनुनाद सिंह said,

    March 18, 2007 at 7:13 am

    लापोडिया का वर्णन सुनकर मस्तिष्क में ‘स्वर्ग’ की छवि उतर आयी। लक्ष्मण सिंह जैसे लोगों का चरण चूमने का मन होता है। ऐसे सकारात्मक समाचारों का अधिकाधिक प्रसार किये जाने की आवश्यकता है।

  6. March 18, 2007 at 7:13 am

    लापोडिया का वर्णन सुनकर मस्तिष्क में ‘स्वर्ग’ की छवि उतर आयी। लक्ष्मण सिंह जैसे लोगों का चरण चूमने का मन होता है। ऐसे सकारात्मक समाचारों का अधिकाधिक प्रसार किये जाने की आवश्यकता है।


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