मटुकनाथ और जूली कस्बा-ए-उज्जैन में

अभी कुछ सप्ताह पहले ही इन्दौर में एक समाचार पत्र के उदघाटन समारोह में मीडिया द्वारा बहुचर्चित “लव-गुरु” (?) मटुकनाथ और उनकी प्रेमिका जूली को आमंत्रित किया गया था, समाचार पत्र का नाम है “धर्मयुद्ध”…कैसा लगा नाम और उस नाम से “मैच” करता उनका उदघाटनकर्ता । अब यह सोचने की बात है कि मटुकनाथ और जूली को सामने रखकर किस प्रकार का “धर्मयुद्ध” लड़ने की तैयारी की जा रही है ? क्या अब समाचार-पत्र भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह बेशर्म और समाज से कटे हुए होने लगे हैं ? यदि हाँ, तो यह एक राष्ट्रीय चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिये ? प्रेस काऊंसिल किस मर्ज की दवा है ? और यदि नहीं… तो फ़िर इस तरह के “आइकॉन” (? यदि वे हैं तो यह हमारा दुर्भाग्य है) को एक समाचार पत्र के उदघाटन के लिये बुलाने का क्या मकसद है ? उक्त समाचार पत्र किस तरह की खबरें अपने पाठकों को देना चाहेगा, क्या यह उसका पूर्वाभास मात्र था, या येन-केन प्रकारेण किसी भी भौंडे तरीके से क्यों ना हो…थोडा सा प्रचार हासिल करना या अपने “प्रोडक्ट” के बारे में ध्यान आकर्षित करवाना ? लेकिन जब कोई अखबार एक “प्रोडक्ट” बन जाता है तो वह आम जनता के सरोकारों से कट जाता है, उसका एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक “बिकना” होता है, जैसा कि टीवी चैनलों के “टीआरपी” से सन्दर्भ में होता है, जिसके लिये वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं… बहरहाल बात है मटुकनाथ और जूली की… चूँकि वे इन्दौर आये थे तो जैसा कि सभी लोग करते हैं वे हमारे उज्जैन भी पधारे…महाकाल के दर्शन करने और एक कार्यक्रम में भाग लेने । कार्यक्रम क्या था ?… अजी उनका सम्मान, और क्या ? चौंकिये नहीं.. उन जैसों का ही आजकल सम्मान होता है । तो वे इस कस्बानुमा, “टू बी शहर” और इन्दौर की भौंडी नकल में माहिर, स्थल पर पधारे । जैसा कि हरेक कस्बे या छोटी जगहों में होता है एक गुट विशेष के लोगों का मीडिया पर, उदघाटन समारोहों, सम्मान समारोहों आदि पर कब्जा होता है, उन्हीं मे से कुछ लोग फ़िर लायंस या रोटरी जैसे “स्टार” युक्त क्लबों के महानुभाव भी होते हैं, उनकी उपस्थिति में इन दोनों हस्तियों का सम्मान किया गया.. हँसी-ठिठोली की गई..खी-खी करके दाँत भी निपोरे गये, लोकल मीडिया ने उन्हें अच्छा कवरेज दिया (देना ही था, क्योंकि उनका ‘इंतजाम’ पूरा किया गया था)। इस पूरे तमाशे में सबसे अधिक खटकने वाली बात यह थी कि मटुकनाथ का सम्मान करने वालों में अधिकतर वे तथाकथित संभ्रांत लोग थे जो समाज के उच्च तबके के कहे जाते हैं, जिनसे उम्मीद (झूठी ही सही) की जाती है कि वे समाज में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ़ आवाज उठायेंगे… इन्हीं लोगों ने सबसे पहले फ़िल्म “निःशब्द” की आलोचना की थी, शायद वह इसलिये होगी कि अमिताभ बाबा मन्दिरों के चक्कर लगाते-लगाते जिया खान से इश्क क्यों फ़रमाने लगे, कुछ ऐसे लोग भी उस सम्मान समारोह में थे, जिन्होंने “वाटर” का विरोध किया था, कुछ ऐसे लोग भी थे जो भारत की क्रिकेट टीम के हारने पर सर मुंडवा लेंगे, लेकिन परदे की झूठी छवियों का विरोध करने वाले ये खोखले लोग उस मटुकनाथ के सम्मान समारोह में खुशी-खुशी उपस्थित थे, जो अपनी ब्याहता पत्नी और बच्चों को छोडकर अपने से आधी उम्र की एक छोकरी के साथ सरेआम बेशर्मी से घूम रहा था, हँस रहा था । उन तथाकथित सज्जनों से एक सवाल करने को जी चाहता है कि यदि उनकी पुत्री को उनकी आँखों के सामने उसी का टीचर भगा ले जाये, तो वे क्या करेंगे ? क्या संस्कृति पर खतरे वाली बात उस समय वे भूल जायेंगे ? या इसे भी हँसकर टाल देंगे और बेटी से कहेंगे “कोई बात नहीं..तू एक शादीशुदा के साथ उसकी प्रेमिका बनकर रह, हमें कोई आपत्ति नहीं है” । और आज ही एक खबर पर नजर गई…कि बिहार में एक और “लव-गुरु” (?) ने अपनी पत्नी को त्यागकर अपनी शिष्या से प्रेम विवाह कर लिया है । लगता है कि ये तो अभी शुरुआत है, आगे-आगे देखिये होता है क्या…

12 Comments

  1. नितिन बागला said,

    March 28, 2007 at 1:12 pm

    इन्दौर से ही एक अन्य सांध्यकालीन अखबार प्रकाशित होता है, अग्निबाण । क्या ‘कातिलाना’ हेडलाइन्स होती हैं इसकी, जिसने पढा है, वही जान सकता है।

  2. नितिन बागला said,

    March 28, 2007 at 1:12 pm

    इन्दौर से ही एक अन्य सांध्यकालीन अखबार प्रकाशित होता है, अग्निबाण । क्या ‘कातिलाना’ हेडलाइन्स होती हैं इसकी, जिसने पढा है, वही जान सकता है।

  3. March 28, 2007 at 1:12 pm

    इन्दौर से ही एक अन्य सांध्यकालीन अखबार प्रकाशित होता है, अग्निबाण । क्या ‘कातिलाना’ हेडलाइन्स होती हैं इसकी, जिसने पढा है, वही जान सकता है।

  4. Shrish said,

    March 28, 2007 at 5:14 pm

    जानता हूँ बहुत से लोग इन लव गुरु का पक्ष लेंगे पर मेरा व्यक्तिगत विचार यही है कि यह नैतिक पतन की पराकाष्ठा है खासकर अपने से आधी उम्र की शिष्या के साथ।

  5. Shrish said,

    March 28, 2007 at 5:14 pm

    जानता हूँ बहुत से लोग इन लव गुरु का पक्ष लेंगे पर मेरा व्यक्तिगत विचार यही है कि यह नैतिक पतन की पराकाष्ठा है खासकर अपने से आधी उम्र की शिष्या के साथ।

  6. Shrish said,

    March 28, 2007 at 5:14 pm

    जानता हूँ बहुत से लोग इन लव गुरु का पक्ष लेंगे पर मेरा व्यक्तिगत विचार यही है कि यह नैतिक पतन की पराकाष्ठा है खासकर अपने से आधी उम्र की शिष्या के साथ।

  7. प्रियंकर said,

    March 30, 2007 at 1:13 pm

    इस प्रकार के प्रेम में उत्तरदायित्व बहुत कम होता है और उफ़ान ज़रा ज्यादा . बुखार थोड़े ही दिनों मे उतरता दिखाई देता है .

  8. प्रियंकर said,

    March 30, 2007 at 1:13 pm

    इस प्रकार के प्रेम में उत्तरदायित्व बहुत कम होता है और उफ़ान ज़रा ज्यादा . बुखार थोड़े ही दिनों मे उतरता दिखाई देता है .

  9. March 30, 2007 at 1:13 pm

    इस प्रकार के प्रेम में उत्तरदायित्व बहुत कम होता है और उफ़ान ज़रा ज्यादा . बुखार थोड़े ही दिनों मे उतरता दिखाई देता है .

  10. अरुण said,

    April 23, 2007 at 1:52 pm

    शुरेश जी आधे लोग मीडिया के चक्कर मे जुट्ते है कैमरे के सामने आने के लिये जो मर्जी करवा लो किसी का सिर मुडवा दो किसी की अर्थी निकलवा दो
    ये ड्रामे प्रायोजित होते है मीडिया के द्वारा

  11. अरुण said,

    April 23, 2007 at 1:52 pm

    शुरेश जी आधे लोग मीडिया के चक्कर मे जुट्ते है कैमरे के सामने आने के लिये जो मर्जी करवा लो किसी का सिर मुडवा दो किसी की अर्थी निकलवा दो
    ये ड्रामे प्रायोजित होते है मीडिया के द्वारा

  12. अरुण said,

    April 23, 2007 at 1:52 pm

    शुरेश जी आधे लोग मीडिया के चक्कर मे जुट्ते है कैमरे के सामने आने के लिये जो मर्जी करवा लो किसी का सिर मुडवा दो किसी की अर्थी निकलवा दोये ड्रामे प्रायोजित होते है मीडिया के द्वारा


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