>भुतहा संयोग या कुछ और ?

>

अब्राहम लिंकन कॉंग्रेस के लिये 1846 में चुने गये,
जॉन एफ़ केनेडी कॉंग्रेस के लिये 1946 में चुने गये..

अब्राहम लिंकन 1860 में राष्ट्रपति चुने गये,
जॉन एफ़ केनेडी 1960 में राष्ट्रपति चुने गये..

दोनों नागरिक कानूनों के जोरदार पैरोकार रहे,
दोनों की पत्नियों ने अपनी-अपनी संतान खोई, जब वे व्हाईट हाऊस में थीं…

दोनों को शुक्रवार को गोली मारी गई,
दोनों के सिर में गोली मारी गई..

आगे और जबरदस्त भुतहा संयोग….

लिंकन की सेक्रेटरी का नाम था केनेडी
केनेडी की सेक्रेटरी का नाम था लिंकन..

दोनों की हत्या दक्षिणपंथियों ने की,
दोनों के उत्तराधिकारी दक्षिणपंथी जॉनसन नामधारी थे..

एण्ड्र्यू जॉनसन, जो लिंकन के उत्तराधिकारी बने, का जन्म हुआ 1808 में,
लिंडन जॉनसन, जो केनेडी के उत्तराधिकारी बने, का जन्म हुआ 1908 में..

लिंकन के हत्यारे जॉन विल्क्स बूथ का जन्म हुआ 1839 में,
केनेडी के हत्यारे ली हार्वे ओसवाल्ड का जन्म हुआ 1939 में..

दोनों के हत्यारों को तीन नामों से जाना जाता था,
दोनों के हत्यारों के नाम की स्पेलिंग में 15 अक्षर आते हैं..

अब जरा कुर्सी थाम लीजिये….

लिंकन की हत्या जिस थियेटर में हुई उसका नाम था “फ़ोर्ड”
केनेडी की हत्या जिस कार में हुई उसका नाम था “फ़ोर्ड”..

लिंकन की हत्या थियेटर में हुई और हत्यारा भागकर गोदाम में छुपा,
केनेडी की हत्या गोदाम से हुई और हत्यारा भागकर थियेटर में छुपा..

बूथ और ओसवाल्ड दोनों हत्यारों की कोर्ट में सुनवाई से पहले ही हत्या हो गई.

हत्या से एक सप्ताह पहले लिंकन की सभा जिस जगह थी उसका नाम था “मुनरो मेरीलैण्ड”
हत्या से एक सप्ताह पहले केनेडी की मुलाकात हुई उसका नाम था “मर्लिन मुनरो”

अब इन संयोगों के बारे में क्या कहा जा सकता है ? किसी इतिहासकार से पूछें या किसी बंगाली जादूगर से…

(स्रोत : ई-मेल मित्रमंडली)

भुतहा संयोग या कुछ और ?

अब्राहम लिंकन कॉंग्रेस के लिये 1846 में चुने गये,
जॉन एफ़ केनेडी कॉंग्रेस के लिये 1946 में चुने गये..

अब्राहम लिंकन 1860 में राष्ट्रपति चुने गये,
जॉन एफ़ केनेडी 1960 में राष्ट्रपति चुने गये..

दोनों नागरिक कानूनों के जोरदार पैरोकार रहे,
दोनों की पत्नियों ने अपनी-अपनी संतान खोई, जब वे व्हाईट हाऊस में थीं…

दोनों को शुक्रवार को गोली मारी गई,
दोनों के सिर में गोली मारी गई..

आगे और जबरदस्त भुतहा संयोग….

लिंकन की सेक्रेटरी का नाम था केनेडी
केनेडी की सेक्रेटरी का नाम था लिंकन..

दोनों की हत्या दक्षिणपंथियों ने की,
दोनों के उत्तराधिकारी दक्षिणपंथी जॉनसन नामधारी थे..

एण्ड्र्यू जॉनसन, जो लिंकन के उत्तराधिकारी बने, का जन्म हुआ 1808 में,
लिंडन जॉनसन, जो केनेडी के उत्तराधिकारी बने, का जन्म हुआ 1908 में..

लिंकन के हत्यारे जॉन विल्क्स बूथ का जन्म हुआ 1839 में,
केनेडी के हत्यारे ली हार्वे ओसवाल्ड का जन्म हुआ 1939 में..

दोनों के हत्यारों को तीन नामों से जाना जाता था,
दोनों के हत्यारों के नाम की स्पेलिंग में 15 अक्षर आते हैं..

अब जरा कुर्सी थाम लीजिये….

लिंकन की हत्या जिस थियेटर में हुई उसका नाम था “फ़ोर्ड”
केनेडी की हत्या जिस कार में हुई उसका नाम था “फ़ोर्ड”..

लिंकन की हत्या थियेटर में हुई और हत्यारा भागकर गोदाम में छुपा,
केनेडी की हत्या गोदाम से हुई और हत्यारा भागकर थियेटर में छुपा..

बूथ और ओसवाल्ड दोनों हत्यारों की कोर्ट में सुनवाई से पहले ही हत्या हो गई.

हत्या से एक सप्ताह पहले लिंकन की सभा जिस जगह थी उसका नाम था “मुनरो मेरीलैण्ड”
हत्या से एक सप्ताह पहले केनेडी की मुलाकात हुई उसका नाम था “मर्लिन मुनरो”

अब इन संयोगों के बारे में क्या कहा जा सकता है ? किसी इतिहासकार से पूछें या किसी बंगाली जादूगर से…

(स्रोत : ई-मेल मित्रमंडली)

भुतहा संयोग या कुछ और ?

अब्राहम लिंकन कॉंग्रेस के लिये 1846 में चुने गये,
जॉन एफ़ केनेडी कॉंग्रेस के लिये 1946 में चुने गये..

अब्राहम लिंकन 1860 में राष्ट्रपति चुने गये,
जॉन एफ़ केनेडी 1960 में राष्ट्रपति चुने गये..

दोनों नागरिक कानूनों के जोरदार पैरोकार रहे,
दोनों की पत्नियों ने अपनी-अपनी संतान खोई, जब वे व्हाईट हाऊस में थीं…

दोनों को शुक्रवार को गोली मारी गई,
दोनों के सिर में गोली मारी गई..

आगे और जबरदस्त भुतहा संयोग….

लिंकन की सेक्रेटरी का नाम था केनेडी
केनेडी की सेक्रेटरी का नाम था लिंकन..

दोनों की हत्या दक्षिणपंथियों ने की,
दोनों के उत्तराधिकारी दक्षिणपंथी जॉनसन नामधारी थे..

एण्ड्र्यू जॉनसन, जो लिंकन के उत्तराधिकारी बने, का जन्म हुआ 1808 में,
लिंडन जॉनसन, जो केनेडी के उत्तराधिकारी बने, का जन्म हुआ 1908 में..

लिंकन के हत्यारे जॉन विल्क्स बूथ का जन्म हुआ 1839 में,
केनेडी के हत्यारे ली हार्वे ओसवाल्ड का जन्म हुआ 1939 में..

दोनों के हत्यारों को तीन नामों से जाना जाता था,
दोनों के हत्यारों के नाम की स्पेलिंग में 15 अक्षर आते हैं..

अब जरा कुर्सी थाम लीजिये….

लिंकन की हत्या जिस थियेटर में हुई उसका नाम था “फ़ोर्ड”
केनेडी की हत्या जिस कार में हुई उसका नाम था “फ़ोर्ड”..

लिंकन की हत्या थियेटर में हुई और हत्यारा भागकर गोदाम में छुपा,
केनेडी की हत्या गोदाम से हुई और हत्यारा भागकर थियेटर में छुपा..

बूथ और ओसवाल्ड दोनों हत्यारों की कोर्ट में सुनवाई से पहले ही हत्या हो गई.

हत्या से एक सप्ताह पहले लिंकन की सभा जिस जगह थी उसका नाम था “मुनरो मेरीलैण्ड”
हत्या से एक सप्ताह पहले केनेडी की मुलाकात हुई उसका नाम था “मर्लिन मुनरो”

अब इन संयोगों के बारे में क्या कहा जा सकता है ? किसी इतिहासकार से पूछें या किसी बंगाली जादूगर से…

(स्रोत : ई-मेल मित्रमंडली)

>यह "भूख" हमें कहाँ ले जायेगी ?

>किसी ने सच ही कहा है कि जिस देश को बरबाद करना हो सबसे पहले उसकी संस्कृति पर हमला करो और वहाँ की युवा पीढी को गुमराह करो । जो समाज इनकी रक्षा नहीं कर सकता उसका पतन और सर्वनाश निश्चित हो जाता है । हमारे आसपास घटने वाली काफ़ी बातें समाज के गिरते नैतिक स्तर और खोखले होते सांस्कृतिक माहौल की ओर इशारा कर रही हैं, एक खतरे की घंटी बज रही है, लेकिन समाज और नेता लगातार इसकी अनदेखी करते जा रहे हैं । इसके लिये सामाजिक ढाँचे या पारिवारिक ढाँचे का पुनरीक्षण करने की बात अधिकतर समाजशास्त्री उठा रहे हैं, परन्तु मुख्यतः जिम्मेदार है हमारे आसपास का माहौल और लगातार तेज होती जा रही “भूख” । जी हाँ “भूख” सिर्फ़ पेट की नहीं होती, न ही सिर्फ़ तन की होती है, एक और भूख होती है “मन की भूख” । इसी विशिष्ट भूख को “बाजार” जगाता है, उसे हवा देता है, पालता-पोसता है और उकसाता है। यह भूख पैदा करना तो आसान है, लेकिन क्या हमारा समाज, हमारी राजनीति, हमारा अर्थतन्त्र इतना मजबूत और लचीला है, कि इस भूख को शान्त कर सके ।
दृश्य-श्रव्य माध्यमों का प्रभाव कोमल मन पर सर्वाधिक होता है, एक उम्र विशेष के युवक, किशोर, किशोरियाँ इसके प्रभाव में बडी जल्दी आ जाते हैं । जब यह वर्ग देखता है कि किसी सिगरेट पीने से बहादुरी के कारनामे किये जा सकते हैं, या फ़लाँ शराब पीने से तेज दौडकर चोर को पकडा जा सकता है, अथवा कोई कूल्हे मटकाती और अंग-प्रत्यंग का फ़ूहड प्रदर्शन करती हुई ख्यातनाम अभिनेत्री किसी साबुन को खरीदने की अपील (?) करे, तो वयःसन्धि के नाजुक मोड़ पर खडा किशोर मन उसकी ओर तेजी से आकृष्ट होता है । इन्तिहा तो तब हो जाती है, जब ये सारे तथाकथित कारनामे उनके पसन्दीदा हीरो-हीरोईन कर रहे होते हैं, तब वह भी उस वस्तु को पाने को लालायित हो उठता है, उसे पाने की कोशिश करता है, वह सपने और हकीकत में फ़र्क नहीं कर पाता । जब तक उसे इच्छित वस्तु मिलती रहती है, तब तक तो कोई समस्या नहीं है, परन्तु यदि उसे यह नहीं मिलती तो वह युवक कुंठाग्रस्त हो जाता है । फ़िर वह उसे पाने के लिये नाजायज तरीके अपनाता है, या अपराध कर बैठता है । और जिनको ये सुविधायें आसानी से हासिल हो जाती हैं, वे इसके आदी हो जाते हैं, उन्हें नशाखोरी या पैसा उडाने की लत लग जाती है, जिसकी परिणति अन्ततः किसी मासूम की हत्या या फ़िर चोरी-डकैती में शामिल होना होता है । ये युवक तब अपने आपको एक अन्धी गली में पाते हैं, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझता । आजकल अपने आसपास के युवकों को धडल्ले से पैसा खर्च करते देखा जा सकता है । यदि सिर्फ़ पाऊच / गुट्खे का हिसाब लगाया जाये, तो एक गुटका यदि दो रुपये का मिलता है, और दिन में पन्द्रह-बीस पाऊच खाना तो आम बात है, इस हिसाब से सिर्फ़ गुटके का तीस रुपये रोज का खर्चा है, इसमें दोस्तों को खिलाना, सिगरेट पिलाना, मोबाइल का खर्च, दिन भर यहाँ-वहाँ घूमने के लिये पेट्रोल का खर्चा, अर्थात दिन भर में कम से कम सौ रुपये का खर्च, मासिक तीन हजार रुपये । क्या भारत के युवा अचानक इतने अमीर हो गये हैं ? यह अनाप-शनाप पैसा तो कुछ को ही उपलब्ध है, परन्तु जब उनकी देखादेखी एक मध्यम या निम्नवर्गीय युवा का मन ललचाता है, तो वह रास्ता अपराध की ओर ही मुडता है । यह “बाजार” की मार्केटिंग की ताकत (?) ही है, जो इस “मन की भूख” को पैदा करती है, और यही सबसे खतरनाक बात है ।
अपसंस्कृति की भूख फ़ैलाने में बाजार और उसके मुख्य हथियार (!) टीवी का योगदान (?) इसमें अतुलनीय है । उदारीकरण की आँधी में हमारे नेताओं द्वारा सांस्कृतिक प्रदूषण की ओर से आँखें मूंद लेने के कारण इनकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने वाला कोई न रहा, जिसके कारण ये तथाकथित “मीडिया” और अधिक उच्छृंखल और बदतर होता गया है । एक जानकारी के अनुसार फ़्रेण्डशिप डे के लिये पूरे देश के “बाजार” में लगभग चार सौ करोड़ रुपयों की (ग्रीटिंग, गुलाब के फ़ूल, चॉकलेट और उपहार मिलाकर) खरीदारी हुई । जो चार सौ करोड रुपये (जिनमें से अधिकतर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जेब में गये हैं) अगले वर्ष बढकर सात सौ करोड हो जायेंगे, इसका उन्हें पूरा विश्वास है । लेकिन “प्रेम” और “दोस्ती” के इस भौंडे प्रदर्शन में जिस “धन” की भूमिका है वही सारे पतन की जड है, और इसका सामाजिक असर क्या होगा, इस बारे में कोई सोचने को भी तैयार नहीं है । जिस तरह से भावनाओं का बाजारीकरण किया जा रहा है, युवाओं का मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है, वह गलत है, कई बार यह आर्थिक शोषण, शारीरिक शोषण में बदल जाता है । मजे की बात तो यह है कि कई बार कोई दिवस क्यों मनाया जाता है, इसका पता भी उन्हें नहीं होता, परन्तु जैसा मीडिया बता दे अथवा जैसी “भेडचाल” हो वैसा ही सही, जैसा कि वेलेण्टाइन के मामले मे है कि “जिस दिन को ये युवा प्रेम-दिवस के रूप में मनाते हैं दरअसल वह एक शहीद दिवस है, क्योंकि संयोगवश तीनों वेलेण्टाइनों को तत्कालीन राजाओं ने मरवा दिया था, और वह भी चौदह फ़रवरी को” । अब आपत्ति इस बात पर है कि जब आप जानते ही नहीं कि यह उत्सव किसलिये और क्यों मनाया जा रहा है, ऐसे दिवस का क्या औचित्य है ? मार्केटिंग के पैरोकारों की रटी-रटाई दलील होती है कि “यदि इन दिवसों का बाजारीकरण हो भी गया है तो इसमें क्या बुराई है ? क्या पैसा कमाना गलत बात है ? किसी बहाने से बाजार में तीन-चार सौ करोड रुपया आता है, तो इसमें हाय-तौबा क्यों ? जिसे खरीदना हो वह खरीदे, जिसे ना खरीदना हो ना खरीदे, क्या यह बात आपत्तिजनक है ?” नहीं साहब पैसा कमाना बिलकुल गलत बात नहीं, लेकिन जिस आक्रामक तरीके उस पूरे “पैकेज” की मार्केटिंग की जाती है, उसका उद्देश्य युवाओं से अधिक से अधिक पैसा खींचने की नीयत होती है और वह “मार्केटिंग” उस युवा के मन में भी खर्च करने के भाव जगाती है जिसकी जेब में पैसा नहीं है और ना कभी होगा, यह गलत बात है । पढने-सुनने में भले ही अजीब लगे, परन्तु सच यही है कि आज की तारीख में भारत के पचास-साठ प्रतिशत युवाओं की खुद की कोई कमाई नहीं है, और ऐसे युवाओं की संख्या भी कम ही है जिन्हें नियमित जेबखर्च मिलता हो । बाप वीआरएस और जबरन छँटनी का शिकार है, और बेटे को कोई नौकरी नहीं है, इसलिये दोनों ही बेकार हैं और टीवी उन्हें यह “भूख” परोस रहा है, पैसे की भूख, साधनों की भूख । भूख जो कि एक दावानल का रूप ले रही है । इसी मोड पर आकर “सामाजिक परिवर्तन”, “सामाजिक क्रान्ति”, “सामाजिक असर” की बात प्रासंगिक हो जाती है, लेकिन लगता है कि देश कानों में तेल डाले सो रहा है । आज हमारे चारों तरफ़ घोटाले, राजनीति, पैसे के लिये मारामारीम हत्याएं, बलात्कार हो रहे हैं, इन सभी के पीछे कारण वही “भूख” है । समाजशास्त्रियों की चिंता वाजिब है कि ऐसे लाखों युवाओं की फ़ौज समाज पर क्या असर डालेगी ? लेकिन “मदर्स डे”, “फ़ादर्स डे”, “वेलेन्टाईन”, “फ़्रेण्डशिप डे”, ये सब प्रतीक मात्र नहीं है, बल्कि इनसे आपको कमतरी का एहसास कराया जाता है कि यदि आपने कोई उपहार नहीं दिया तो आपको दोस्ती करना नहीं आता, यदि आपने कार्ड या फ़ूल नहीं खरीदा इसका मतलब है कि आप प्रेम नहीं करते, परिणाम यह होता है कि विवेकानन्द या अपने कोर्स की कोई किताब खरीदने की बजाय व्यक्ति किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी की कोई बेहूदा चॉकलेट खरीद लेता है, क्योंकि उस चॉकलेट से तथाकथित “स्टेटस” (?) जुडा है, और यही “स्टेटस” यानी एक और “भूख” । बाजार को नियन्त्रित करने वालों से यही अपेक्षा है कि उस “भूख” को भडकाने का काम ना करें, जो आज समाज के लिये “भस्मासुर” साबित हो रही है, कल उनके लिये भी खतरा बन सकती है ।

यह "भूख" हमें कहाँ ले जायेगी ?

किसी ने सच ही कहा है कि जिस देश को बरबाद करना हो सबसे पहले उसकी संस्कृति पर हमला करो और वहाँ की युवा पीढी को गुमराह करो । जो समाज इनकी रक्षा नहीं कर सकता उसका पतन और सर्वनाश निश्चित हो जाता है । हमारे आसपास घटने वाली काफ़ी बातें समाज के गिरते नैतिक स्तर और खोखले होते सांस्कृतिक माहौल की ओर इशारा कर रही हैं, एक खतरे की घंटी बज रही है, लेकिन समाज और नेता लगातार इसकी अनदेखी करते जा रहे हैं । इसके लिये सामाजिक ढाँचे या पारिवारिक ढाँचे का पुनरीक्षण करने की बात अधिकतर समाजशास्त्री उठा रहे हैं, परन्तु मुख्यतः जिम्मेदार है हमारे आसपास का माहौल और लगातार तेज होती जा रही “भूख” । जी हाँ “भूख” सिर्फ़ पेट की नहीं होती, न ही सिर्फ़ तन की होती है, एक और भूख होती है “मन की भूख” । इसी विशिष्ट भूख को “बाजार” जगाता है, उसे हवा देता है, पालता-पोसता है और उकसाता है। यह भूख पैदा करना तो आसान है, लेकिन क्या हमारा समाज, हमारी राजनीति, हमारा अर्थतन्त्र इतना मजबूत और लचीला है, कि इस भूख को शान्त कर सके ।
दृश्य-श्रव्य माध्यमों का प्रभाव कोमल मन पर सर्वाधिक होता है, एक उम्र विशेष के युवक, किशोर, किशोरियाँ इसके प्रभाव में बडी जल्दी आ जाते हैं । जब यह वर्ग देखता है कि किसी सिगरेट पीने से बहादुरी के कारनामे किये जा सकते हैं, या फ़लाँ शराब पीने से तेज दौडकर चोर को पकडा जा सकता है, अथवा कोई कूल्हे मटकाती और अंग-प्रत्यंग का फ़ूहड प्रदर्शन करती हुई ख्यातनाम अभिनेत्री किसी साबुन को खरीदने की अपील (?) करे, तो वयःसन्धि के नाजुक मोड़ पर खडा किशोर मन उसकी ओर तेजी से आकृष्ट होता है । इन्तिहा तो तब हो जाती है, जब ये सारे तथाकथित कारनामे उनके पसन्दीदा हीरो-हीरोईन कर रहे होते हैं, तब वह भी उस वस्तु को पाने को लालायित हो उठता है, उसे पाने की कोशिश करता है, वह सपने और हकीकत में फ़र्क नहीं कर पाता । जब तक उसे इच्छित वस्तु मिलती रहती है, तब तक तो कोई समस्या नहीं है, परन्तु यदि उसे यह नहीं मिलती तो वह युवक कुंठाग्रस्त हो जाता है । फ़िर वह उसे पाने के लिये नाजायज तरीके अपनाता है, या अपराध कर बैठता है । और जिनको ये सुविधायें आसानी से हासिल हो जाती हैं, वे इसके आदी हो जाते हैं, उन्हें नशाखोरी या पैसा उडाने की लत लग जाती है, जिसकी परिणति अन्ततः किसी मासूम की हत्या या फ़िर चोरी-डकैती में शामिल होना होता है । ये युवक तब अपने आपको एक अन्धी गली में पाते हैं, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझता । आजकल अपने आसपास के युवकों को धडल्ले से पैसा खर्च करते देखा जा सकता है । यदि सिर्फ़ पाऊच / गुट्खे का हिसाब लगाया जाये, तो एक गुटका यदि दो रुपये का मिलता है, और दिन में पन्द्रह-बीस पाऊच खाना तो आम बात है, इस हिसाब से सिर्फ़ गुटके का तीस रुपये रोज का खर्चा है, इसमें दोस्तों को खिलाना, सिगरेट पिलाना, मोबाइल का खर्च, दिन भर यहाँ-वहाँ घूमने के लिये पेट्रोल का खर्चा, अर्थात दिन भर में कम से कम सौ रुपये का खर्च, मासिक तीन हजार रुपये । क्या भारत के युवा अचानक इतने अमीर हो गये हैं ? यह अनाप-शनाप पैसा तो कुछ को ही उपलब्ध है, परन्तु जब उनकी देखादेखी एक मध्यम या निम्नवर्गीय युवा का मन ललचाता है, तो वह रास्ता अपराध की ओर ही मुडता है । यह “बाजार” की मार्केटिंग की ताकत (?) ही है, जो इस “मन की भूख” को पैदा करती है, और यही सबसे खतरनाक बात है ।
अपसंस्कृति की भूख फ़ैलाने में बाजार और उसके मुख्य हथियार (!) टीवी का योगदान (?) इसमें अतुलनीय है । उदारीकरण की आँधी में हमारे नेताओं द्वारा सांस्कृतिक प्रदूषण की ओर से आँखें मूंद लेने के कारण इनकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने वाला कोई न रहा, जिसके कारण ये तथाकथित “मीडिया” और अधिक उच्छृंखल और बदतर होता गया है । एक जानकारी के अनुसार फ़्रेण्डशिप डे के लिये पूरे देश के “बाजार” में लगभग चार सौ करोड़ रुपयों की (ग्रीटिंग, गुलाब के फ़ूल, चॉकलेट और उपहार मिलाकर) खरीदारी हुई । जो चार सौ करोड रुपये (जिनमें से अधिकतर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जेब में गये हैं) अगले वर्ष बढकर सात सौ करोड हो जायेंगे, इसका उन्हें पूरा विश्वास है । लेकिन “प्रेम” और “दोस्ती” के इस भौंडे प्रदर्शन में जिस “धन” की भूमिका है वही सारे पतन की जड है, और इसका सामाजिक असर क्या होगा, इस बारे में कोई सोचने को भी तैयार नहीं है । जिस तरह से भावनाओं का बाजारीकरण किया जा रहा है, युवाओं का मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है, वह गलत है, कई बार यह आर्थिक शोषण, शारीरिक शोषण में बदल जाता है । मजे की बात तो यह है कि कई बार कोई दिवस क्यों मनाया जाता है, इसका पता भी उन्हें नहीं होता, परन्तु जैसा मीडिया बता दे अथवा जैसी “भेडचाल” हो वैसा ही सही, जैसा कि वेलेण्टाइन के मामले मे है कि “जिस दिन को ये युवा प्रेम-दिवस के रूप में मनाते हैं दरअसल वह एक शहीद दिवस है, क्योंकि संयोगवश तीनों वेलेण्टाइनों को तत्कालीन राजाओं ने मरवा दिया था, और वह भी चौदह फ़रवरी को” । अब आपत्ति इस बात पर है कि जब आप जानते ही नहीं कि यह उत्सव किसलिये और क्यों मनाया जा रहा है, ऐसे दिवस का क्या औचित्य है ? मार्केटिंग के पैरोकारों की रटी-रटाई दलील होती है कि “यदि इन दिवसों का बाजारीकरण हो भी गया है तो इसमें क्या बुराई है ? क्या पैसा कमाना गलत बात है ? किसी बहाने से बाजार में तीन-चार सौ करोड रुपया आता है, तो इसमें हाय-तौबा क्यों ? जिसे खरीदना हो वह खरीदे, जिसे ना खरीदना हो ना खरीदे, क्या यह बात आपत्तिजनक है ?” नहीं साहब पैसा कमाना बिलकुल गलत बात नहीं, लेकिन जिस आक्रामक तरीके उस पूरे “पैकेज” की मार्केटिंग की जाती है, उसका उद्देश्य युवाओं से अधिक से अधिक पैसा खींचने की नीयत होती है और वह “मार्केटिंग” उस युवा के मन में भी खर्च करने के भाव जगाती है जिसकी जेब में पैसा नहीं है और ना कभी होगा, यह गलत बात है । पढने-सुनने में भले ही अजीब लगे, परन्तु सच यही है कि आज की तारीख में भारत के पचास-साठ प्रतिशत युवाओं की खुद की कोई कमाई नहीं है, और ऐसे युवाओं की संख्या भी कम ही है जिन्हें नियमित जेबखर्च मिलता हो । बाप वीआरएस और जबरन छँटनी का शिकार है, और बेटे को कोई नौकरी नहीं है, इसलिये दोनों ही बेकार हैं और टीवी उन्हें यह “भूख” परोस रहा है, पैसे की भूख, साधनों की भूख । भूख जो कि एक दावानल का रूप ले रही है । इसी मोड पर आकर “सामाजिक परिवर्तन”, “सामाजिक क्रान्ति”, “सामाजिक असर” की बात प्रासंगिक हो जाती है, लेकिन लगता है कि देश कानों में तेल डाले सो रहा है । आज हमारे चारों तरफ़ घोटाले, राजनीति, पैसे के लिये मारामारीम हत्याएं, बलात्कार हो रहे हैं, इन सभी के पीछे कारण वही “भूख” है । समाजशास्त्रियों की चिंता वाजिब है कि ऐसे लाखों युवाओं की फ़ौज समाज पर क्या असर डालेगी ? लेकिन “मदर्स डे”, “फ़ादर्स डे”, “वेलेन्टाईन”, “फ़्रेण्डशिप डे”, ये सब प्रतीक मात्र नहीं है, बल्कि इनसे आपको कमतरी का एहसास कराया जाता है कि यदि आपने कोई उपहार नहीं दिया तो आपको दोस्ती करना नहीं आता, यदि आपने कार्ड या फ़ूल नहीं खरीदा इसका मतलब है कि आप प्रेम नहीं करते, परिणाम यह होता है कि विवेकानन्द या अपने कोर्स की कोई किताब खरीदने की बजाय व्यक्ति किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी की कोई बेहूदा चॉकलेट खरीद लेता है, क्योंकि उस चॉकलेट से तथाकथित “स्टेटस” (?) जुडा है, और यही “स्टेटस” यानी एक और “भूख” । बाजार को नियन्त्रित करने वालों से यही अपेक्षा है कि उस “भूख” को भडकाने का काम ना करें, जो आज समाज के लिये “भस्मासुर” साबित हो रही है, कल उनके लिये भी खतरा बन सकती है ।

>नौकरी में प्रमोशन पाने हेतु "गारंटीड" नुस्खे

>यदि आपको प्रमोशन चाहिये या बॉस की नजरों में चढना है तो कृपया ये आजमाये हुए नुस्खे देखें और अमल में लायें, शर्तिया फ़ायदे की गारंटी….

(१) हमेशा आपके हाथ में काम से सम्बन्धित कागज होने चाहिये
वह कर्मचारी जिसके हाथ में सदैव काम के कागज या फ़ाईलें होती हैं, बहुत मेहनती माना जाता है (माना जाता है, होता नहीं है),इसलिये ऑफ़िस में इधर-उधर खामख्वाह घूमते हुए आपके हाथ में हमेशा कोई कागज होना चाहिये, यदि आपके हाथ में कुछ नहीं है तो लोग समझेंगे कि आप कैण्टीन जा रहे हैं, और यदि आपके हाथ में अखबार है तो ऐसा प्रतीत होगा कि आप टॉयलेट जा रहे हैं । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शाम को ऑफ़िस से जाते समय कुछ फ़ाईलें घर जरूर ले जायें, ताकि यह भ्रम बना रहे कि आप ऑफ़िस का काम घर पर भी करते हैं ।

(२) व्यस्त दिखने के लिये कम्प्य़ूटर का उपयोग करें –
जब भी आप कम्प्य़ूटर का उपयोग करते हैं तो लोगों को आप बहुत व्यस्त प्रतीत होते हैं । हालांकि मॉनिटर का मुँह ऐसी तरफ़ रखें जहाँ से कोई यह ना देख सके कि आप चैटिंग कर रहे हैं और गेम खेल रहे हैं । कम्प्य़ूटर क्रांति के इस अनोखे सामाजिक उपयोग से आप बॉस की निगाह में चढ जायेंगे । यदि भगवान ना करे आप पकडे जायें (और यह तो कभी ना कभी होकर रहेगा) तो आप बहाना बना सकते हैं कि मैं इस “सॉफ़्टवेयर” को सीख कर देख रहा था, जिससे कम्पनी का “ट्रेनिंग” का पैसा बचे ।

(३) काम करने की टेबल हमेशा भरी हुई होना चाहिये –
आपके काम करने की जगह हमेशा भरी हुई और अस्तव्यस्त होनी चाहिये । टेबल पर ढेर सारे कागज और फ़ाईलें इधर-उधर बिखरे होने चाहिये, कुछ सीडी, कुछ फ़्लॉपियाँ और आधे-अधूरे प्रिंट आऊट भी बिखरे हों तो सोने पर सुहागा । जब आपको मालूम हो कि किसी व्यक्ति को आपसे किसी फ़ाईल का काम है, तो उस खास फ़ाईल को एक बडे ढेर मे छुपा दीजिये और उसके सामने ही ढूँढिये । हो सके तो कम्प्य़ूटर से सम्बन्धित मोटी-मोटी किताबें कहीं से इकठ्ठा कर लें (पढने के लिये नहीं).. उससे आपकी इमेज विशिष्ट बनेगी । एक बात याद रखें कि पढने वाले को प्रमोशन नहीं मिलता, झाँकी जमाने वाले को मिलता है ।

(४) वॉइस (आन्सरिंग) मशीन का अधिकाधिक उपयोग करें –
संचार तकनीक के एक और वरदान “आन्सरिंग मशीन” का अधिक से अधिक उपयोग करें । जब आपका बॉस या कोई सहकर्मी आपको फ़ोन करे तो जरूरी नहीं कि वह काम आवश्यक ही हो… इसलिये भले ही आप फ़ोन के सिर पर बैठे हों, कभी सीधे जवाब ना दें, बल्कि यह काम “आन्सरिंग मशीन” को करने दें । फ़िर थोडी देर बाद सभी सन्देशों को सुनें, उसमें से मुख्य और आवश्यक को छाँटकर ठीक लंच टाईम में सामने वाले को फ़ोन करें, ताकि उसे लगे कि आप लंच टाईम में भी ऑफ़िस वर्क भूलते नहीं हैं ।

(५) हमेशा असंतुष्ट और अन्यमनस्क दिखें –
काम करते समय हमेशा असन्तुष्ट और तनावग्रस्त दिखें । जब भी कोई सहकर्मी आपसे कुछ पूछे तो सबसे पहले एक गहरी साँस लें, ताकि उसे लगे कि आप काम के बोझ से बेहद दबे हुए हैं । साथ ही अपने जूनियर को हमेशा सीख देते रहें और उससे हमेशा असन्तुष्ट रहें, जूनियर के चार कामों में से तीन में जरूर मीनमेख निकालें और एक में “हाँ.. ठीक है” कहें..

(६) ऑफ़िस से हमेशा सबसे देर से निकलें –
ऑफ़िस से हमेशा आपको देर से घर के लिये निकलना चाहिये, खासकर तब जबकि आपका बॉस ऑफ़िस में हो । आराम से मैगजीन और किताबें पढते रहें, जब तक कि जाने का समय ना हो जाये । ऑफ़िस टाईम के बाद कोशिश करें कि बॉस के कमरे के सामने से कम से कम दो-तीन बार गुजरें । यदि बॉस की गाडी खराब हो जाये और आप उसे उसके घर पर “ड्रॉप” कर सकें, इससे अधिक पुण्य आपके लिये और कुछ नहीं है, इसलिये हो सके तो साल में तीन बार कुछ ऐसा करें कि बॉस आपकी गाडी में लिफ़्ट ले । जितनी महत्वपूर्ण ई-मेल हो उसे हमेशा विषम समय पर ही भेजें, जैसे रात के साढे नौ बजे या सुबह सात बजे । बॉस की निगाह जरूर ई-मेल में पडे समय पर पडेगी, और वह बेहद “इम्प्रेस” हो जायेगा ।

(७) अपना भाषा ज्ञान और व्याकरण बढायें –
आपको अंग्रेजी के कुछ मुहावरे और लच्छेदार भाषा कंठस्थ करनी होगी । कम्प्य़ूटर और मैनेजमेंट से सम्बन्धित कुछ भारी-भरकम शब्द और वाक्य रचना यदि आप रट सकें तो बेहतर होगा, और जब भी बॉस के साथ बात करें इन शब्दों का भरपूर उपयोग करें, इस अन्दाज में कि बॉस को लगना चाहिये कि यदि यह बात नहीं मानी गई तो कम्पनी में प्रलय आ जायेगी ।

(८) हमेशा दो कोट या जैकेट (जो भी पहनते हों) रखें –
यदि आप किसी बडे ऑफ़िस में काम करते हैं, तो आपको हमेशा दो कोट रखना चाहिये । एक पहने रहें और दूसरा आपकी कुर्सी पर टंगा होना चाहिये । इससे एक तो आप आराम से घूम-फ़िर सकते हैं और दूसरे लोग समझेंगे कि आप आस-पास ही कहीं हैं, आते ही होंगे । यदि देर हो भी जाये तो आप कह सकते हैं कि जरूरी मीटिंग थी ।

तो साहेबान, इन नुस्खों को आज से ही लागू कर दीजिये, फ़िर देखिये आपका बॉस तो आपसे खुश रहेगा ही, आपके सहकर्मी भी आपके प्रमोशन को देख-देख जलेंगे…

नौकरी में प्रमोशन पाने हेतु "गारंटीड" नुस्खे

यदि आपको प्रमोशन चाहिये या बॉस की नजरों में चढना है तो कृपया ये आजमाये हुए नुस्खे देखें और अमल में लायें, शर्तिया फ़ायदे की गारंटी….

(१) हमेशा आपके हाथ में काम से सम्बन्धित कागज होने चाहिये
वह कर्मचारी जिसके हाथ में सदैव काम के कागज या फ़ाईलें होती हैं, बहुत मेहनती माना जाता है (माना जाता है, होता नहीं है),इसलिये ऑफ़िस में इधर-उधर खामख्वाह घूमते हुए आपके हाथ में हमेशा कोई कागज होना चाहिये, यदि आपके हाथ में कुछ नहीं है तो लोग समझेंगे कि आप कैण्टीन जा रहे हैं, और यदि आपके हाथ में अखबार है तो ऐसा प्रतीत होगा कि आप टॉयलेट जा रहे हैं । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शाम को ऑफ़िस से जाते समय कुछ फ़ाईलें घर जरूर ले जायें, ताकि यह भ्रम बना रहे कि आप ऑफ़िस का काम घर पर भी करते हैं ।

(२) व्यस्त दिखने के लिये कम्प्य़ूटर का उपयोग करें –
जब भी आप कम्प्य़ूटर का उपयोग करते हैं तो लोगों को आप बहुत व्यस्त प्रतीत होते हैं । हालांकि मॉनिटर का मुँह ऐसी तरफ़ रखें जहाँ से कोई यह ना देख सके कि आप चैटिंग कर रहे हैं और गेम खेल रहे हैं । कम्प्य़ूटर क्रांति के इस अनोखे सामाजिक उपयोग से आप बॉस की निगाह में चढ जायेंगे । यदि भगवान ना करे आप पकडे जायें (और यह तो कभी ना कभी होकर रहेगा) तो आप बहाना बना सकते हैं कि मैं इस “सॉफ़्टवेयर” को सीख कर देख रहा था, जिससे कम्पनी का “ट्रेनिंग” का पैसा बचे ।

(३) काम करने की टेबल हमेशा भरी हुई होना चाहिये –
आपके काम करने की जगह हमेशा भरी हुई और अस्तव्यस्त होनी चाहिये । टेबल पर ढेर सारे कागज और फ़ाईलें इधर-उधर बिखरे होने चाहिये, कुछ सीडी, कुछ फ़्लॉपियाँ और आधे-अधूरे प्रिंट आऊट भी बिखरे हों तो सोने पर सुहागा । जब आपको मालूम हो कि किसी व्यक्ति को आपसे किसी फ़ाईल का काम है, तो उस खास फ़ाईल को एक बडे ढेर मे छुपा दीजिये और उसके सामने ही ढूँढिये । हो सके तो कम्प्य़ूटर से सम्बन्धित मोटी-मोटी किताबें कहीं से इकठ्ठा कर लें (पढने के लिये नहीं).. उससे आपकी इमेज विशिष्ट बनेगी । एक बात याद रखें कि पढने वाले को प्रमोशन नहीं मिलता, झाँकी जमाने वाले को मिलता है ।

(४) वॉइस (आन्सरिंग) मशीन का अधिकाधिक उपयोग करें –
संचार तकनीक के एक और वरदान “आन्सरिंग मशीन” का अधिक से अधिक उपयोग करें । जब आपका बॉस या कोई सहकर्मी आपको फ़ोन करे तो जरूरी नहीं कि वह काम आवश्यक ही हो… इसलिये भले ही आप फ़ोन के सिर पर बैठे हों, कभी सीधे जवाब ना दें, बल्कि यह काम “आन्सरिंग मशीन” को करने दें । फ़िर थोडी देर बाद सभी सन्देशों को सुनें, उसमें से मुख्य और आवश्यक को छाँटकर ठीक लंच टाईम में सामने वाले को फ़ोन करें, ताकि उसे लगे कि आप लंच टाईम में भी ऑफ़िस वर्क भूलते नहीं हैं ।

(५) हमेशा असंतुष्ट और अन्यमनस्क दिखें –
काम करते समय हमेशा असन्तुष्ट और तनावग्रस्त दिखें । जब भी कोई सहकर्मी आपसे कुछ पूछे तो सबसे पहले एक गहरी साँस लें, ताकि उसे लगे कि आप काम के बोझ से बेहद दबे हुए हैं । साथ ही अपने जूनियर को हमेशा सीख देते रहें और उससे हमेशा असन्तुष्ट रहें, जूनियर के चार कामों में से तीन में जरूर मीनमेख निकालें और एक में “हाँ.. ठीक है” कहें..

(६) ऑफ़िस से हमेशा सबसे देर से निकलें –
ऑफ़िस से हमेशा आपको देर से घर के लिये निकलना चाहिये, खासकर तब जबकि आपका बॉस ऑफ़िस में हो । आराम से मैगजीन और किताबें पढते रहें, जब तक कि जाने का समय ना हो जाये । ऑफ़िस टाईम के बाद कोशिश करें कि बॉस के कमरे के सामने से कम से कम दो-तीन बार गुजरें । यदि बॉस की गाडी खराब हो जाये और आप उसे उसके घर पर “ड्रॉप” कर सकें, इससे अधिक पुण्य आपके लिये और कुछ नहीं है, इसलिये हो सके तो साल में तीन बार कुछ ऐसा करें कि बॉस आपकी गाडी में लिफ़्ट ले । जितनी महत्वपूर्ण ई-मेल हो उसे हमेशा विषम समय पर ही भेजें, जैसे रात के साढे नौ बजे या सुबह सात बजे । बॉस की निगाह जरूर ई-मेल में पडे समय पर पडेगी, और वह बेहद “इम्प्रेस” हो जायेगा ।

(७) अपना भाषा ज्ञान और व्याकरण बढायें –
आपको अंग्रेजी के कुछ मुहावरे और लच्छेदार भाषा कंठस्थ करनी होगी । कम्प्य़ूटर और मैनेजमेंट से सम्बन्धित कुछ भारी-भरकम शब्द और वाक्य रचना यदि आप रट सकें तो बेहतर होगा, और जब भी बॉस के साथ बात करें इन शब्दों का भरपूर उपयोग करें, इस अन्दाज में कि बॉस को लगना चाहिये कि यदि यह बात नहीं मानी गई तो कम्पनी में प्रलय आ जायेगी ।

(८) हमेशा दो कोट या जैकेट (जो भी पहनते हों) रखें –
यदि आप किसी बडे ऑफ़िस में काम करते हैं, तो आपको हमेशा दो कोट रखना चाहिये । एक पहने रहें और दूसरा आपकी कुर्सी पर टंगा होना चाहिये । इससे एक तो आप आराम से घूम-फ़िर सकते हैं और दूसरे लोग समझेंगे कि आप आस-पास ही कहीं हैं, आते ही होंगे । यदि देर हो भी जाये तो आप कह सकते हैं कि जरूरी मीटिंग थी ।

तो साहेबान, इन नुस्खों को आज से ही लागू कर दीजिये, फ़िर देखिये आपका बॉस तो आपसे खुश रहेगा ही, आपके सहकर्मी भी आपके प्रमोशन को देख-देख जलेंगे…

>दो मजेदार कहानियाँ

>(१) मजाक
एक मैनेजर साहब अपने मातहतों के साथ अक्सर मजाक किया करते थे और मजाक करते वक्त वे इस बात का ध्यान नहीं रखते थे कि उनके मजाक से किसी को बुरा लग सकता है । इसके कारण कर्मचारी उस मैनेजर से परेशान रहते थे । एक बार क्रिसमस की पार्टी में लोगों ने उन्हे सबक सिखाने का तय किया । जब पार्टी शबाब पर थी मैनेजर साहब दो मिनट के लिये टॉयलेट गये तो एक व्यक्ति ने उनके कोट की जेब से पर्स निकाला और देखा कि उसमें क्या-क्या सामान है, उसके हाथ उसी रात घोषित होने वाली लॉटरी का टिकट लगा, उन्होंने उसका नम्बर नोट करके उसे वापस उनके कोट की जेब में रख दिया । अब वे लोग मजाक के लिये तैयार थे । फ़िर उन्होंने होटल के बैरे को एक कोने में ले जाकर कुछ गुफ़्तगू की । मैनेजर साहब टॉयलेट से वापस आकर पार्टी का आनन्द उठाने लगे ।
अचानक थोडी देर बाद एक वेटर ने हॉल में आकर घोषणा की कि आज रात को जो महालॉटरी खुलने वाली थी उसकी घोषणा हो गई है, और उसने एक नम्बर बताया और कहा कि इस नम्बर के मालिक को दस करोड़ रुपये मिलने वाले हैं । मैनेजर साहब ने चुपचाप पर्स निकालकर नम्बरों का मिलान किया और मन-ही-मन बहुत खुश हुआ, लेकिन जैसी कि उसकी आदत थी, उसने यह किसी पर जाहिर नहीं किया, हालांकि मजाक करने वाले कर्मचारी सब कुछ जानते थे । सभी ने देखा कि मैनेजर साहब बहुत मस्त हो गये हैं और बहुत पीने लगे हैं । कुछ देर बाद मैनेजर साहब उठे और जोर-जोर से उन्होंने घोषणा की – इस कम्पनी का मालिक बेहद खूसट है और उसका लडका जो कि मेरा बॉस भी है बेहद निकम्मा और नालायक है । इस कम्पनी के सभी कर्मचारी कामचोर और चमचागिरी में माहिर हैं । मेरी सेक्रेटरी को मैं बहुत चाहता हूँ और उससे शादी करने वाला हूँ, इसलिये मेरी पत्नी सहित तुम सभी भाड़ में जाओ, मैं इस घटिया कम्पनी को लात मारता हूँ…
अगली सुबह न नौकरी थी, न बीवी, न सेक्रेटरी और जाहिर है कि न ही लॉटरी का पैसा भी ।
सबक : या तो किसी के साथ बुरा मजाक मत करो या फ़िर अपने साथ भी वैसा ही होने के लिये तैयार रहो ।

(२) गरीब पर एक शॉर्ट नोट
हाल ही में जारी आँकडों के मुताबिक भारत में अमीरों और करोडपतियों की संख्या तेजी से बढ रही है, कुछ कम्पनियों में कुछ लोगों के वेतन एक करोड रुपये से भी ऊपर निकल गये हैं… दस-पन्द्रह वर्षों में तो कई नौनिहाल पैदा होते ही करोडपति और युवा होते-होते अरबपति हो जायेंगे । गरीबी या अभाव क्या होता है वे कभी भी नहीं जान पायेंगे । ऐसे माहौल (?) सन २०४० में कक्षा पाँचवीं के एक बालक से “एक गरीब परिवार” पर “शॉर्ट नोट” लिखने को कहा गया, उसने लिखा – …”एक बार एक बहुत ही गरीब फ़ैमिली थी, पति और पत्नी दोनों बहुत गरीब थे, दो बच्चे थे वे भी बहुत गरीब थे । उनके घर के सारे नौकर भी गरीब थे, माली, ड्रायवर और गार्ड भी बहुत गरीब थे । तीन मर्सिडीज में से दो की सर्विसिंग छः महीने से नहीं हुई थी और एक गाडी का एसी काम नहीं कर रहा था । पाँच कलर टीवी में से दो खराब पडे थे । उस गरीब फ़ैमिली ने दो साल से घर में फ़र्नीचर और “रेनोवेशन” नहीं करवाया था । यहाँ तक कि छुट्टियाँ बिताने सिंगापुर और मलेशिया तक गये एक साल से ऊपर हो गया था । दोनों बच्चे जो कि मेरी उम्र के हैं उनके पास क्रेडिट कार्ड तक नहीं है, उनके कुत्तों को चार दिन से चिकन खाने को नहीं मिला था । मतलब यह कि “ऑल-इन-ऑल” वह एक बहुत ही गरीब परिवार है ।…

दो मजेदार कहानियाँ

(१) मजाक
एक मैनेजर साहब अपने मातहतों के साथ अक्सर मजाक किया करते थे और मजाक करते वक्त वे इस बात का ध्यान नहीं रखते थे कि उनके मजाक से किसी को बुरा लग सकता है । इसके कारण कर्मचारी उस मैनेजर से परेशान रहते थे । एक बार क्रिसमस की पार्टी में लोगों ने उन्हे सबक सिखाने का तय किया । जब पार्टी शबाब पर थी मैनेजर साहब दो मिनट के लिये टॉयलेट गये तो एक व्यक्ति ने उनके कोट की जेब से पर्स निकाला और देखा कि उसमें क्या-क्या सामान है, उसके हाथ उसी रात घोषित होने वाली लॉटरी का टिकट लगा, उन्होंने उसका नम्बर नोट करके उसे वापस उनके कोट की जेब में रख दिया । अब वे लोग मजाक के लिये तैयार थे । फ़िर उन्होंने होटल के बैरे को एक कोने में ले जाकर कुछ गुफ़्तगू की । मैनेजर साहब टॉयलेट से वापस आकर पार्टी का आनन्द उठाने लगे ।
अचानक थोडी देर बाद एक वेटर ने हॉल में आकर घोषणा की कि आज रात को जो महालॉटरी खुलने वाली थी उसकी घोषणा हो गई है, और उसने एक नम्बर बताया और कहा कि इस नम्बर के मालिक को दस करोड़ रुपये मिलने वाले हैं । मैनेजर साहब ने चुपचाप पर्स निकालकर नम्बरों का मिलान किया और मन-ही-मन बहुत खुश हुआ, लेकिन जैसी कि उसकी आदत थी, उसने यह किसी पर जाहिर नहीं किया, हालांकि मजाक करने वाले कर्मचारी सब कुछ जानते थे । सभी ने देखा कि मैनेजर साहब बहुत मस्त हो गये हैं और बहुत पीने लगे हैं । कुछ देर बाद मैनेजर साहब उठे और जोर-जोर से उन्होंने घोषणा की – इस कम्पनी का मालिक बेहद खूसट है और उसका लडका जो कि मेरा बॉस भी है बेहद निकम्मा और नालायक है । इस कम्पनी के सभी कर्मचारी कामचोर और चमचागिरी में माहिर हैं । मेरी सेक्रेटरी को मैं बहुत चाहता हूँ और उससे शादी करने वाला हूँ, इसलिये मेरी पत्नी सहित तुम सभी भाड़ में जाओ, मैं इस घटिया कम्पनी को लात मारता हूँ…
अगली सुबह न नौकरी थी, न बीवी, न सेक्रेटरी और जाहिर है कि न ही लॉटरी का पैसा भी ।
सबक : या तो किसी के साथ बुरा मजाक मत करो या फ़िर अपने साथ भी वैसा ही होने के लिये तैयार रहो ।

(२) गरीब पर एक शॉर्ट नोट
हाल ही में जारी आँकडों के मुताबिक भारत में अमीरों और करोडपतियों की संख्या तेजी से बढ रही है, कुछ कम्पनियों में कुछ लोगों के वेतन एक करोड रुपये से भी ऊपर निकल गये हैं… दस-पन्द्रह वर्षों में तो कई नौनिहाल पैदा होते ही करोडपति और युवा होते-होते अरबपति हो जायेंगे । गरीबी या अभाव क्या होता है वे कभी भी नहीं जान पायेंगे । ऐसे माहौल (?) सन २०४० में कक्षा पाँचवीं के एक बालक से “एक गरीब परिवार” पर “शॉर्ट नोट” लिखने को कहा गया, उसने लिखा – …”एक बार एक बहुत ही गरीब फ़ैमिली थी, पति और पत्नी दोनों बहुत गरीब थे, दो बच्चे थे वे भी बहुत गरीब थे । उनके घर के सारे नौकर भी गरीब थे, माली, ड्रायवर और गार्ड भी बहुत गरीब थे । तीन मर्सिडीज में से दो की सर्विसिंग छः महीने से नहीं हुई थी और एक गाडी का एसी काम नहीं कर रहा था । पाँच कलर टीवी में से दो खराब पडे थे । उस गरीब फ़ैमिली ने दो साल से घर में फ़र्नीचर और “रेनोवेशन” नहीं करवाया था । यहाँ तक कि छुट्टियाँ बिताने सिंगापुर और मलेशिया तक गये एक साल से ऊपर हो गया था । दोनों बच्चे जो कि मेरी उम्र के हैं उनके पास क्रेडिट कार्ड तक नहीं है, उनके कुत्तों को चार दिन से चिकन खाने को नहीं मिला था । मतलब यह कि “ऑल-इन-ऑल” वह एक बहुत ही गरीब परिवार है ।…

>इन्दीवर : नदिया चले, चले रे धारा

>यह गीत उन लोगों के लिये है जो हमेशा हिन्दी फ़िल्मी गीतों की यह कर आलोचना करते हैं कि “ये तो चलताऊ गीत होते हैं, इनमें रस-कविता कहाँ”, कविता की बात ही कुछ और है, हिन्दी फ़िल्मी गाने तो भांडों – ठलुओं के लिये हैं”, लेकिन इन्दीवर एक ऐसे गीतकार हुए हैं जो कविता और शब्दों को हमेशा प्रधानता देते रहे हैं, उनके गीतों में अधिकतर हिन्दी के शब्दों का प्रयोग हुआ है और साहिर, शकील और हसरत के वजनदार उर्दू लफ़्जों की शायरी के बीच भी इन्दीवर हमेशा खम ठोंक कर खडे रहे । इन्दीवर का जन्म झाँसी(उप्र) में हुआ उनका असली नाम था – श्यामलाल राय । इनका शुरुआती गीत “बडे अरमानों से रखा है बलम तेरी कसम” बहुत हिट रहा और कल्याणजी-आनन्दजी के साथ इनकी जोडी खूब जमी ।
हिन्दी फ़िल्मी गीतों को इन्दीवर ने कविता के रूप में लिखकर उन्हें एक नया आयाम दिया है, कविता भी ऐसी कि शब्द बहुत क्लिष्ट ना हों और आम आदमी कि जुबान पर आसानी से चढ़ जायें । फ़िर इस गीत में कल्याणजी भाई ने नाव, नदी और नाविक का जो माहौल तैयार किया है वह अद्वितीय है..और मन्ना डे साहब की आवाज उसमें चार चाँद लगा देती है.. परन्तु मुख्य बात हैं शब्द जो कि एक कैन्सर पीडित (राजेश खन्ना) के लिये एक सकारात्मक सन्देश लाते हैं…

नदिया चले, चले रे धारा
चन्दा चले, चले रे तारा
तुझको चलना होगा…

जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है
आँधी से तूफ़ाँ से डरता नहीं है
नाव तो क्या, बह जाये किनारा
बडी ही तेज समय की है धारा
तुझको चलना होगा…

पार हुआ वो रहा जो सफ़र में
जो भी रुका, फ़िर गया वो भँवर में
तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें
मंजिल को तरसेंगी तेरी निगाहें..
तुझको चलना होगा..

कितने आसान शब्दों में छोटी सी कविता में वे अपना सन्देश हम तक पहुँचा देते हैं और वह भी फ़िल्म की तमाम बन्दिशों के बावजूद । इन्दीवर साहब की हिन्दी कविताओं की कुछ बानगियाँ पेश हैं, ताकि पाठक समझ सकें कि उनमें कितनी “वेरायटी” थी, और यहाँ तक कि फ़िल्म “तोहफ़ा” में भी उन्होंने जंपिंग जैक (जीतेन्द्र) और थंडर थाईज़ (श्रीदेवी) के होते हुए भी हिन्दी कविता का साथ नहीं छोडा…

प्यार का तोहफ़ा तेरा, बना है जीवन मेरा,
दिल के सहारे मैने पा लिये, जीने को और क्या चाहिये

इसी तरह से फ़िल्मों के “मैचो मैन” सुनील शेट्टी पर फ़िल्माया गया “मोहरा” का गीत –

ना कजरे की धार ना मोतियों के हार
ना कोई किया सिंगार, फ़िर भी कितनी सुन्दर हो…

कुछ और विशुद्ध कवितायें –
“आओ मिल जायें हम सुगन्ध और सुमन की तरह” (फ़िल्म – प्रेमगीत)
“चन्दन सा बदन चंचल चितवन” (फ़िल्म – सरस्वतीचन्द्र)
“एक अंधेरा लाख सितारे, एक निराशा लाख सहारे” (फ़िल्म – आखिर क्यों)
“कोई जब तुम्हारा हृदय तोड दे, तडपता हुआ जब कोई छोड दे” (पूरब और पश्चिम)
“मधुबन खुशबू देता है, सागर सावन देता है” (साजन बिना सुहागन)

ऐसे सैकडों उदाहरण दिये जा सकते है इन्दीवर साहब सशक्त की लेखनी के लिये… ऐसे महान हिन्दी सेवक को हमारा सलाम…

« Older entries