हिन्दी फ़िल्मों में मराठी चरित्र : कितने वास्तविक ?

हिन्दी फ़िल्में हमारे यहाँ थोक में बनती हैं, और जाहिर है कि फ़िल्म है तो विभिन्न चरित्र और पात्र होंगे ही, और उन चरित्रों के नाम भी होंगे । हिन्दी फ़िल्मों पर हम जैसे फ़िल्म प्रेमियों ने अपने कई-कई घंटे बिताये हैं (हालांकि पिताजी कहते हैं कि मेरी आज की बरबादी के लिये हिन्दी फ़िल्में और क्रिकेट ही जिम्मेदार हैं), लेकिन कहते हैं ना प्यार तो अंधा होता है ना, तो अंधेपन के बावजूद फ़िल्में देखना और क्रिकेट खेलना नहीं छोडा तो नहीं छोडा, खैर…हिन्दी फ़िल्मों में वैसे तो काफ़ी नाम विभिन्न नायकों पर लगभग ट्रेण्ड बन चुके हैं, जैसे अमिताभ बच्चन के लिये “विजय”, जीतेन्द्र के लिये “रवि”, या महमूद के लिये “महेश” आदि और वे पसन्द भी किये गये, लेकिन जब फ़िल्म निर्माता किसी किरदार के साथ उसका उपनाम भी जोड देता है तब वह निपट अनाडी लगने लगता है, क्योंकि जो भी उपनाम वह हीरो या विलेन के आगे लगाता है, उस समाज या धर्म के लोग उससे अलग सा जुडाव महसूस करने लगते हैं (जाति व्यवस्था पर हजारों ब्लोग लिखे जा सकते हैं लेकिन यह एक सच्चाई है इससे कोई मुँह नहीं मोड सकता), तो बात हो रही है, फ़िल्मों में चरित्रों के नाम के आगे उपनाम जोडने की, दुर्भाग्य से हमारे हिन्दी फ़िल्म निर्माता-निर्देशक इस मामले में फ़िसड्डी ही साबित हुए हैं । यदि अमिताभ का नाम सिर्फ़ विजय रखा जाये तो कोई आपत्ति नहीं है, और दर्शक एक बार भी नहीं पूछेगा कि इस “विजय” का सरनेम क्या है, लेकिन जब निर्माता “विजय” के आगे श्रीवास्तव, वर्मा या जैन लगा दिया जाता है तो बात कुछ अलग हो जाती है…. फ़िर उस निर्माता का यह दायित्व है कि वह उस उपनाम के साथ जुडी़ संस्कृति का भी प्रदर्शन करे…। ईसाईयों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उनके समाज का सही चित्रण सच्चे अर्थों में अब तक फ़िल्मों में नहीं हो पाया है, इक्का-दुक्का “जूली” या “त्रिकाल” जैसी फ़िल्मों को छोड दिया जाये तो फ़िल्मों में अक्सर जूली, लिली, रोजी, डिसूजा, एन्थोनी, जोसेफ़ आदि जैसे बेहद घिसे-पिटे नाम ही दिये जाते हैं और वे भी उन चरित्रों को जो गले में क्रास लटकाये मामूली से गुंडे होते हैं, या फ़िर एकदम दरियादिल चर्च के फ़ादर, बस….। ठीक इसी प्रकार मराठी (महाराष्ट्र समाज) लोगों के चरित्र चित्रण में भी ये हिन्दी फ़िल्म निर्माता लगभग अन्याय की हद तक चले जाते हैं, जबकि फ़िल्म निर्माण का श्रीगणेश ही दादा साहब फ़ाल्के ने किया था, और इस बात को अलग से लिखने की आवश्यकता नहीं है कि मराठी कलाकारों ने हिन्दी फ़िल्मों को क्या और कितना योगदान दिया है । शोभना समर्थ, लीला चिटणीस से लेकर माधुरी दीक्षित और उर्मिला तक, या फ़िर दादा साहेब फ़ालके से लेकर अमोल पालेकर और नाना तक, सब एक से बढकर एक । लेकिन जब हम हिन्दी फ़िल्मों पर नजर डालते हैं तो पाते हैं कि मराठी पात्रों का चित्रण या तो हवलदार, क्लर्क, या मुम्बई के सडक छाप गुण्डे के रूप में किया जाता है, बहुत अधिक मेहरबानी हुई तो किसी को अफ़सर बता दिया जाता है । चूँकि हिन्दी फ़िल्म निर्माताओं का पाला मुम्बई पुलिस से बहुत पडता है, इसलिये हवलदारों का नाम भोंसले, पाटिल या वागले रखे जाते हैं । शिकायत इस बात से नहीं है कि इस प्रकार के चरित्र क्यों दिखाये जाते हैं, बल्कि इस बात से है कि निर्माता उस समाज की छवि के बारे में जरा भी परवाह क्यों नहीं करता । जब निर्माता फ़िल्मों में उपनाम रखता है तो स्वतः ही उनकी बोली, भाषा, हावभाव और संस्कृति उस किरदार से जुड जाते हैं । जैसे कि फ़िल्म “गर्दिश” में अमरीश पुरी का नाम है पुरुषोत्तम साठे, क्या विसंगतिपूर्ण नाम रखा गया… मुम्बई में पला-बढा और वहीं नौकरी करने वाला एक हवलदार पंजाबी स्टाईल में डॉयलाग क्यों बोलता है ? अमरीश पुरी किसी भी कोण से मराठी लगते हैं उस फ़िल्म में ? किसी फ़िल्म में शक्ति कपूर (शायद “इंसाफ़” या “सत्यमेव जयते” में) “इन्स्पेक्टर भिण्डे” बने हैं (भेण्डे नहीं) और पूरी फ़िल्म में जोकर जैसी हरकतें करते हुए “मी आहे इंस्पेक्टर भिण्डे” जैसा कुछ बडबडाते रहते हैं । तेजाब में अनिल कपूर का नाम “देशमुख” रखा गया है, ये तो गनीमत है कि उसके बाप को बैंक में कैशियर बताया गया है, लेकिन पूरी फ़िल्म में कहीं भी अनिल कपूर “देशमुख” जैसे नहीं लगते । इसके उलट हाल ही की एक फ़िल्म “हेराफ़ेरी” में परेश रावल को बाबूराव नाम के चरित्र में पेश किया है, तो वह एक “टिपिकल” मुम्बईया मराठी टोन में बोलता तो है, वही परेश रावल “हंगामा” में बिहारी टोन में बोलते हैं, तो कम से कम प्रियदर्शन ने इस बात का तो ध्यान रखा ही, “कथा” फ़िल्म में सई परांजपे ने उम्दा तरीके से एक मुम्बई की एक मराठी चाल का चित्रण किया था, महेश मांजरेकर चूंकि मुम्बईया पृष्ठभूमि से हैं इसलिये उन्होंने “वास्तव” में थोडा मराठीपन का ठीकठाक चित्रण किया । इसी प्रकार अर्धसत्य फ़िल्म में इंस्पेक्टर वेलणकर और उनकी पत्नी के रोल में स्मिता पाटिल खूब जमते हैं, और बैकग्राऊँड में जो रेडियो बजता है वह मराठी माहौल पैदा करता है । जबकि किसी एक फ़िल्म में आशीष विद्यार्थी “आयेला-जायेला” टाईप की मराठी बोलते पाये जाते हैं । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दी फ़िल्मों में कोई तमिल पात्र आता है तो सबसे पहले तो उसे “मद्रासी” का तमगा लगा दिया जाता है, फ़िर उसे लुंगी पहनाकर “अई..अई…यो… टाईप के डायलाग देकर रोल की इतिश्री कर दी जाती है । दरअसल इसके मूल में है पैसा, अधिकतर निर्माता निर्देशक गैर मराठी हैं, उन्हें न तो मराठी संस्कृति का विशेष ज्ञान होता है (इतने वर्षों तक मुम्बई में रहने के बावजूद), न उससे जुडाव, और जाहिर है कि फ़िल्म बनाने के लिये पैसा लगता है… । महेश मांजरेकर ने एक बार कहा था कि उन्हें मराठी पृष्ठभूमि पर एक जोरदार कहानी पसन्द आई थी, लेकिन फ़ायनेंसर ने कहा “यदि बनाना ही है तो हिन्दी फ़िल्म बनाओ, मराठी नहीं चलेगा”, अर्थात पंजाब की मिट्टी, सरसों का साग, खेत, राजपूती आन-बान-शान, गुजराती डांडिया सब चलेगा, लेकिन मराठी की पृष्ठभूमि नहीं चलेगी ! फ़ूलनदेवी की बाईस हत्याओं और बलात्कार की फ़िल्म के लिये निर्माता आसानी से मिल जायेगा, लेकिन वीर सावरकर की फ़िल्म के लिये सुधीर फ़डके साहब को जाने कितने पापड बेलने पडे । हिन्दी के अभिनेताओं को क्या दोष देना, मराठी के सुपर स्टार अशोक सराफ़ और लक्ष्मीकांत बेर्डे भी हिन्दी में नौकर, हीरो का दोस्त, या मुनीम जैसे दस मिनट के रोल से संतुष्ट हो जाते हैं, जबकि ये रोल उन जैसे उत्कृष्ट कलाकारों के लायक नहीं हैं । देखते हैं कब कोई चोपडा, खन्ना, कपूर या खान, मराठी माहौल और नामों को सही ढंग से चित्रित करता है… और यह शिकायत हिन्दी फ़िल्म निर्माताओं से सभी को रहेगी, जैसे किसी पारसी का चरित्र निभाते-निभाते दिनेश हिंगू बूढे हो गये, सिन्धी चरित्र “अडी… वडीं साईं” से आगे नहीं बढते, इसलिये सबसे अच्छा तरीका है कि फ़िल्मों में उपनाम रखे ही ना जायें, उससे कहानी और फ़िल्म पर कोई फ़र्क नहीं पडने वाला है…
मराठी लोग आमतौर पर मध्यमवर्गीय, अपने काम से काम रखने वाले, कानून, नैतिकता और अनुशासन का अधिकतम पालन करने वाले होते हैं (जरा अपने दोस्तों, रिश्तेदारों से मराठियों के बारे में अपने अनुभव पूछ कर देखिये, या फ़िर साक्षात किसी साठे, गोडबोले, पटवर्धन, परांजपे, देशपांडे और हाँ… चिपलूनकर से मिलकर देखिये कि हिन्दी फ़िल्मों में मराठी नामों के साथ कैसी “इमेज” दिखाई जाती है, और असल में वे कैसे हैं)…

14 Comments

  1. संजय बेंगाणी said,

    May 4, 2007 at 2:20 pm

    वीर सावरकर से याद आया, जब से यह फिल्म रीलिज हुई है, देखने के लिए तड़पते रहे. यहाँ न प्रदर्शित होनी थी न हुई. वीडियो भी उपलब्ध नहीं. बहुत खाजे न मिली. अंत में पंकज भाई के ससुराल वालो से जो कि पूणे में रहते है, दहेज के रूप में फिल्म की सीडी की मांग की 🙂 और फिल्म देखी.

  2. संजय बेंगाणी said,

    May 4, 2007 at 2:20 pm

    वीर सावरकर से याद आया, जब से यह फिल्म रीलिज हुई है, देखने के लिए तड़पते रहे. यहाँ न प्रदर्शित होनी थी न हुई. वीडियो भी उपलब्ध नहीं. बहुत खाजे न मिली. अंत में पंकज भाई के ससुराल वालो से जो कि पूणे में रहते है, दहेज के रूप में फिल्म की सीडी की मांग की 🙂 और फिल्म देखी.

  3. May 4, 2007 at 2:20 pm

    वीर सावरकर से याद आया, जब से यह फिल्म रीलिज हुई है, देखने के लिए तड़पते रहे. यहाँ न प्रदर्शित होनी थी न हुई. वीडियो भी उपलब्ध नहीं. बहुत खाजे न मिली. अंत में पंकज भाई के ससुराल वालो से जो कि पूणे में रहते है, दहेज के रूप में फिल्म की सीडी की मांग की 🙂 और फिल्म देखी.

  4. Mired Mirage said,

    May 4, 2007 at 8:33 pm

    आपकी शिकायत बहुत सही है । मेरा महाराष्ट्र व मराठियों से बहुत सम्बन्ध रहा है । वे आमतौर पर वैसे ही होते हैं जैसा आपने कहा । किन्तु हिन्दी फिल्मों में जो दिखाया जाता है वैसे आमतौर पर नहीं होते । किसी पात्र का चित्रण करने के लिये लेखक व अभिनेता को उस पात्र का अध्ययन करने का कष्ट करना होता है । हमारा हिन्दी फिल्म जगत इसकी आवश्यकता नहीं समझता । इसी कारण वे केवल सब चलता है की तर्ज पर फिल्में बनाते हैं और इनमें कुछ भी स्मरणीय नहीं होता ।
    घुघूती बासूती

  5. Mired Mirage said,

    May 4, 2007 at 8:33 pm

    आपकी शिकायत बहुत सही है । मेरा महाराष्ट्र व मराठियों से बहुत सम्बन्ध रहा है । वे आमतौर पर वैसे ही होते हैं जैसा आपने कहा । किन्तु हिन्दी फिल्मों में जो दिखाया जाता है वैसे आमतौर पर नहीं होते । किसी पात्र का चित्रण करने के लिये लेखक व अभिनेता को उस पात्र का अध्ययन करने का कष्ट करना होता है । हमारा हिन्दी फिल्म जगत इसकी आवश्यकता नहीं समझता । इसी कारण वे केवल सब चलता है की तर्ज पर फिल्में बनाते हैं और इनमें कुछ भी स्मरणीय नहीं होता ।
    घुघूती बासूती

  6. Mired Mirage said,

    May 4, 2007 at 8:33 pm

    आपकी शिकायत बहुत सही है । मेरा महाराष्ट्र व मराठियों से बहुत सम्बन्ध रहा है । वे आमतौर पर वैसे ही होते हैं जैसा आपने कहा । किन्तु हिन्दी फिल्मों में जो दिखाया जाता है वैसे आमतौर पर नहीं होते । किसी पात्र का चित्रण करने के लिये लेखक व अभिनेता को उस पात्र का अध्ययन करने का कष्ट करना होता है । हमारा हिन्दी फिल्म जगत इसकी आवश्यकता नहीं समझता । इसी कारण वे केवल सब चलता है की तर्ज पर फिल्में बनाते हैं और इनमें कुछ भी स्मरणीय नहीं होता ।घुघूती बासूती

  7. अरुण said,

    May 5, 2007 at 4:37 am

    अंत में पंकज भाई के ससुराल वालो से जो कि पूणे में रहते है, दहेज के रूप में फिल्म की सीडी की मांग की 🙂 और फिल्म देखी.
    तो ये तो तय हो गया कि आपने दहेज मांगा था अब बात आती है चिप्लूनकर जी के लेख की तो भाई १००% सही ये तो किसी के साथ भि न्याय करते कहा है कही का बन्दा कोई भी भाषा इस पर ध्यान देने का वक्त कहा है रोमन मे लिख कर बोलने वालो कॊ कभी हिन्दी की रोटी खाकर हिन्दी मे बोलते सुना है कभी

  8. अरुण said,

    May 5, 2007 at 4:37 am

    अंत में पंकज भाई के ससुराल वालो से जो कि पूणे में रहते है, दहेज के रूप में फिल्म की सीडी की मांग की 🙂 और फिल्म देखी.
    तो ये तो तय हो गया कि आपने दहेज मांगा था अब बात आती है चिप्लूनकर जी के लेख की तो भाई १००% सही ये तो किसी के साथ भि न्याय करते कहा है कही का बन्दा कोई भी भाषा इस पर ध्यान देने का वक्त कहा है रोमन मे लिख कर बोलने वालो कॊ कभी हिन्दी की रोटी खाकर हिन्दी मे बोलते सुना है कभी

  9. अरुण said,

    May 5, 2007 at 4:37 am

    अंत में पंकज भाई के ससुराल वालो से जो कि पूणे में रहते है, दहेज के रूप में फिल्म की सीडी की मांग की 🙂 और फिल्म देखी. तो ये तो तय हो गया कि आपने दहेज मांगा था अब बात आती है चिप्लूनकर जी के लेख की तो भाई १००% सही ये तो किसी के साथ भि न्याय करते कहा है कही का बन्दा कोई भी भाषा इस पर ध्यान देने का वक्त कहा है रोमन मे लिख कर बोलने वालो कॊ कभी हिन्दी की रोटी खाकर हिन्दी मे बोलते सुना है कभी

  10. Shrish said,

    May 6, 2007 at 1:06 am

    बहुत सटीक लेख। हिन्दी फिल्मों के तौर तरीकों का एकदम सही चित्रण किया आपने। यहाँ सब चीजों की खिचड़ी बना दी जाती है।

  11. Shrish said,

    May 6, 2007 at 1:06 am

    बहुत सटीक लेख। हिन्दी फिल्मों के तौर तरीकों का एकदम सही चित्रण किया आपने। यहाँ सब चीजों की खिचड़ी बना दी जाती है।

  12. Shrish said,

    May 6, 2007 at 1:06 am

    बहुत सटीक लेख। हिन्दी फिल्मों के तौर तरीकों का एकदम सही चित्रण किया आपने। यहाँ सब चीजों की खिचड़ी बना दी जाती है।

  13. March 11, 2010 at 6:18 am

    बिलकुल सही कह रहे हैं आप. मैं उत्तर प्रदेश से हूँ सबसे अधिक अन्याय और मजाक होता है दक्षिण के पात्र से. वैसे तो मजाक ये लोग सभी जगह के लोगो का उड़ाते हैं केवल खन्ना, चोपड़ा, ओबेराय, खान, कपूर आदि उपनामो को छोड़ कर मेरा कोई इन उपनामों से बैर नहीं है पर यह है सत्य.वास्तव इस हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का कर्तव्य है कि सभी प्रदेशों के पात्रों को नायक के रूप में पेश करना चाहिए, कभी नायक या फिल्म की पृष्ठभूमि तमिलनाडु से हो तो कभी हिमाचल से हो कभी आसाम से कभी बिहार से हो , कभी महाराष्ट्र से हो तो कभी केरल से हो इत्यादि सभी राज्यों से लेनी चाहिए जिससे सभी राज्य के लोग इन फिल्मों से अपना जुड़ाव और अपनापन महसूस करेंगे ओर ये इस फिल्म उद्योग के साथ-२ देश को भी एकसूत्र में बांधेगा.पर ये तब तक संभव नहीं है जब तक इन लोगो को इन फिल्मों, अपने देश तथा अपनी संस्कृति, भाषा आदि पर गर्व और प्यार नहीं होगा. ये लोग हीन भावना से ग्रस्त हैं तभी तो हिंदी फिल्मों में काम करते हैं किन्तु फिल्मों से बाहर इनको हिंदी बोलने में शर्म आती है कैसा हास्यास्पद ढंग है ये.

  14. August 5, 2010 at 11:11 am

    मै मराठी तो नही हूँ पर मै महाराष्ट्र मे एक दशक से ज़्यादा अवश्य रहा हूँ अतः आप की भावना को महसूस कर सक्ता हूँ ।आपसे अक्षरशः सहमत ।


Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: