महाकालेश्वर मन्दिर में धर्म के नाम पर…

बारह ज्योतिर्लिंगों में से सबसे बडे़ आकार वाले और महत्वपूर्ण “महाकालेश्वर” मन्दिर का ऑडिट सम्पन्न हुआ । यह ऑडिट सिंहस्थ-२००४ के बाद में मन्दिर को मिले दान और उसके रखरखाव के बारे में था । इसमें ऑडिट दल को कई चौंकाने वाली जानकारियाँ मिलीं, दान के पैसों और आभूषणों में भारी भ्रष्टाचार और हेराफ़ेरी हुई है । ऑडिट दल यह जानकर आश्चर्यचकित हो गया कि मन्दिर को भेंट में मिले आभूषणों का वजन नहीं किया जाता, ऐसे में ऑडिट कैसे किया जाये ? ऑडिट टीम ने पहले ही दिन एक बडा़ घपला पकड़ लिया जिसमें एक रसीद कट्टे में 7000 रुपये को 700.00 रुपये कर दिया गया था, इसके लिये एक जीरो को दशमलव बना दिया गया और आगे एक जीरो लगा दिया गया, ऐसा शून्य वाली कई रसीदों में पाया गया, कभी 51 को 5/- बना दिया गया, कभी 101 को 10/- बना दिया है, कुछ रसीदों की कार्बन कॉपी को रबर से ही मिटा दिया गया है, ऐसे में यह भी नहीं पता कि उस रसीद में कितना दान मिला था । ऑडिट दल को पहले ही दिन लगभग 65000 रुपये की हेराफ़ेरी के बारे में पता चल गया जो कि मन्दिर कर्मचारियों ने हजम कर ली है । इसी प्रकार सोने के पाँच आभूषणों की रसीद है, लेकिन स्टॉक रजिस्टर में उसकी आमद दर्ज नहीं है, सात चाँदी के छत्र मिलाकर कुल २० आभूषण रसीद पर तो हैं, लेकिन स्टॉक में नहीं हैं । दान लेने वाले कर्मचारियों ने समझदारी (?) दिखाते हुए किसी भी आभूषण की रसीद पर उसका वजन अंकित नहीं किया है, ऐसे में अन्दाजा लगाना भी मुश्किल है कि वह आभूषण १०० ग्राम का था या १० ग्राम का ? ऑडिट दल को सन्देह है कि वजन नहीं लिखने के पीछे कारण यह है कि बाद में दूसरे हल्के कम वजन के आभूषणों को उसकी जगह रखा जा सके, बिछिया, नाग, छत्र, चाँदी के पाट और न जाने क्या-क्या, किसी भी रसीद पर वजन अंकित नहीं है । ऐसे ही हमारे दानवीर लोग भी हैं, दान देने वाले ने कहीं सिर्फ़ अपना नाम और कहीं सिर्फ़ जगह का नाम लिखवाया है, जैसे रुपये १०,००० रामलाल की ओर से अथवा सोने के कुंडल जोधपुर वालों की ओर से आदि… अब ऑडिट वाले यदि पता भी करना चाहें कि वाकई दानदाता ने कितनी रकम दी थी, तो वे कैसे पता करें, यानी कि पूरा का पूरा माल खल्लास । कई कर्मचारियों का तबादला हो गया, कई रिटायर हो गये, किस रसीद पर किसके हस्ताक्षर हैं, कौन-कौन से कर्मचारी उस वक्त मन्दिर काऊंटर पर तैनात थे, किसी को कुछ भी पता नहीं… प्रथम दृष्टया यह एक बडे घोटाले की ओर संकेत करता है । मजे की बात यह है कि एक “साम्प्रदायिक” (?) सरकार ने पहली बार प्रदेश के १२५ मन्दिरों का ऑडिट करवाने का निर्णय लिया और इसके लिये बाकायदा गजट नोटिफ़िकेशन जारी किया गया और महाकालेश्वर के दरबार से ही इसकी शुरुआत की, अब आगे-आगे देखिये होता है क्या ? जाँच दल अब तक कलेक्टर को इस सम्बन्ध में १६ पत्र लिख चुका है और मन्दिर प्रशासक ने जो समिति बनाई है, उसमें अकाऊंट विभाग के कर्मचारी भी हैं, जबकि ऑडिट वालों ने इन्ही कर्मचारियों को सन्देह के दायरे में रखा है, बात साफ़ है कि “भारत की महान परम्परा” (!) के अनुसार सिर्फ़ लीपापोती कर दी जायेगी, होना-जाना कुछ नहीं है । जैसा कि तिरुपति मन्दिर के लड्डू घोटाले के समय हुआ था, जिन भाईयों को जानकारी नहीं है उन्हें बता दूँ कि कुछ वर्षॊं पूर्व प्रसिद्ध तिरुपति मन्दिर में भी एक महाकाय घोटाला पकड़ में आया था । हुआ यूँ था कि तिरुपति में प्रसाद के रूप में एक किलो का विशाल लड्डू भक्तों को बेचा जाता है, ताकि वे अपने घर ले जा सकें और दूसरों में बाँट सकें, यह लड्डू सूखे मेवों, काजू, किशमिश आदि से बनता है और महंगा होता है (लागत में) और वह भक्तों को “नो प्रॉफ़िट नो लॉस” पर बेचा जाता है । अब भारतीयों का उम्दा भ्रष्टाचारी दिमाग देखिये – एक किलो के लड्डू को पापियों ने ९०० ग्राम या ९५० ग्राम का कर दिया और उस ५०-१०० ग्राम में से काजू, बदाम, पिस्ते बेच खाये, और यह वर्षों से चल रहा था, अब सोचिये कितने करोडों के वारे-न्यारे कर लिये गये होंगे वह भी धर्म और आस्था के नाम पर । कोई भक्त इतना नीच नहीं सोच सकता कि चलो लड्डू को तुलवाकर देख लें.. इसका फ़ायदा दुराचारियों ने उठाया और लाखों-करोडों रुपये सिर्फ़ लड्डू के वजन में थोडा़ सा फ़र्क करके खा लिये । देखा आपने उर्वर दिमाग ! यहाँ भ्रष्टाचार रग-रग में इतना समा चुका है कि करने वाले को शर्म आना तो दूर वह रिश्वत को अपना हक समझने लगा है । लोगबाग मन्दिर के चन्दे के पैसे खा सकते हैं, श्मशान घाट की लकडि़यों में कमीशन खा सकते हैं, विकलांग बच्चों की बैसाखियों और ट्रायसिकल में रिश्वत खा सकते हैं, मध्यान्ह भोजन योजना में गरीब बच्चों का दलिया और तेल खा जाते हैं, सरकारी अस्पतालों में रोगी कल्याण समितियों से गरीबों को मिलने वाली मुफ़्त दवा बेच खाते हैं.. गरज कि जिसे जहाँ मौका मिल रहा है सिर्फ़ खा रहा है...सरकार का तो डर पहले से ही नहीं था और अब भगवान का डर भी खत्म हो गया है, क्योंकि उसके दलाल चारों तरफ़ फ़ैले हुए हैं जो पापियों से कहते हैं “इतना दान कर दो.. तो इतने पाप धुल जायेंगे”, “यदि एक बार भंडारा करवा दिया तो तुम्हें पुण्य मिलेगा”, “नवरात्रि में विशाल कन्या भोज करवा दो, भ्रूण हत्या का पाप कम लगेगा”…मेरे मत में मन्दिरों में बढती दानदाताओं की भीड़ का अस्सी प्रतिशत हिस्सा उन लोगों का है जो भ्रष्ट, अनैतिक और गलत रास्तों से पैसा कमाते हैं और फ़िर अपनी अन्तरात्मा पर पडे बोझ को कम करने के लिये भगवान को भी रिश्वत देते हैं… किसी पण्डे/पुजारी/महाराज आदि नें कभी यह नहीं कहा कि “बच्चा तूने बहुत पाप किये हैं, जा कुछ दिन जेल में रहकर आ…” वह दलाल यही कहेगा कि भगत तू सोने का मुकुट तिरुपति को दान कर और मेरी दक्षिणा दे दे बस, तेरा काम (!) हो जायेगा…। इस दृष्टि से यदि देखा जाये तो महाकालेश्वर मन्दिर में हुई धाँधली के निहितार्थ हैं “चोरों को पड़ गये मोर”… एक ने माल कमाया, उससे भगवान को खुश (?) करने के लिये थोडा़ सा माल उधर सरकाया, उस माल को दूसरा चोर ले गया (यानी “मनी सर्कुलेशन”, जो “बाजार” को मजबूत बनाता है)… यदि देश भर के मन्दिरों को दान देने वाले महापुरुषों और उन मठों, मन्दिरों और आश्रमों की वास्तविक आय और उसके स्रोत का पता लगाने की कोशिश की जाये, तो ऐसी सडाँध उठेगी कि…

12 Comments

  1. संजय बेंगाणी said,

    June 20, 2007 at 7:07 am

    सही विषय उठाया है. धर्म के नाम पर घोटाला बाजो को संरक्षण मिलने के दिन अब लदने चाहिए.
    कुछ बाबाओं को टीवी वालो ने पकड़ा भी था, मगर सब की दुकनदारी आज भी मजे से चल रही है.

  2. संजय बेंगाणी said,

    June 20, 2007 at 7:07 am

    सही विषय उठाया है. धर्म के नाम पर घोटाला बाजो को संरक्षण मिलने के दिन अब लदने चाहिए.
    कुछ बाबाओं को टीवी वालो ने पकड़ा भी था, मगर सब की दुकनदारी आज भी मजे से चल रही है.

  3. June 20, 2007 at 7:07 am

    सही विषय उठाया है. धर्म के नाम पर घोटाला बाजो को संरक्षण मिलने के दिन अब लदने चाहिए.कुछ बाबाओं को टीवी वालो ने पकड़ा भी था, मगर सब की दुकनदारी आज भी मजे से चल रही है.

  4. हरिराम said,

    June 20, 2007 at 7:19 am

    लोग अपने पाप काटने (कम करने) के लिए मन्दिरों में पूजा व दान पुण्य करते हैं। कुछ लोग कौओं को, कुछ भिखारियों, कंगालों को, कुछ लोग साँड को, कुछ लोग कुत्तों को तो कुछ लोग मछलियों को खिलाते हैं। भगवान(मूर्ति) तो स्वयं कुछ खाते नहीं है, भक्त ही उनके नाम पर लगा प्रसाद खाते हैं। यदि भगवान के सेवक (उर्फ, कौवे, कंगले, कुत्ते) ऐसे बरसते पानी(दान) में से दो घूँट पी लें तो क्या खराब है, क्या यह उनका हक नहीं?

    वर्तमान युग में सबसे बड़ा पुण्य कार्य (पाप कम करने हेतु) तो होगा, कि अधिकाधिक वृक्ष लगाएँ, उनकी सिंचाईं करें, ग्लोबल वार्मिंग कम करने, भूमिगत जल के स्तर को ऊँचा उठाने में सहयोग दें। मन्दिरों, आश्रमों, मठों में दान-पुण्य करना, और किसी राजनैतिक पार्टी को चन्दा देना और किसी गुण्डे/डाकू/शराबी/दादा को दिहाड़ी (टैक्स) देना लगभग बराबर ही है। लेकिन आम जनता को सबको कुछ न कुछ देना ही पड़ता है, नहीं तो जीना दूभर हो जाएगा उसका।

  5. हरिराम said,

    June 20, 2007 at 7:19 am

    लोग अपने पाप काटने (कम करने) के लिए मन्दिरों में पूजा व दान पुण्य करते हैं। कुछ लोग कौओं को, कुछ भिखारियों, कंगालों को, कुछ लोग साँड को, कुछ लोग कुत्तों को तो कुछ लोग मछलियों को खिलाते हैं। भगवान(मूर्ति) तो स्वयं कुछ खाते नहीं है, भक्त ही उनके नाम पर लगा प्रसाद खाते हैं। यदि भगवान के सेवक (उर्फ, कौवे, कंगले, कुत्ते) ऐसे बरसते पानी(दान) में से दो घूँट पी लें तो क्या खराब है, क्या यह उनका हक नहीं?

    वर्तमान युग में सबसे बड़ा पुण्य कार्य (पाप कम करने हेतु) तो होगा, कि अधिकाधिक वृक्ष लगाएँ, उनकी सिंचाईं करें, ग्लोबल वार्मिंग कम करने, भूमिगत जल के स्तर को ऊँचा उठाने में सहयोग दें। मन्दिरों, आश्रमों, मठों में दान-पुण्य करना, और किसी राजनैतिक पार्टी को चन्दा देना और किसी गुण्डे/डाकू/शराबी/दादा को दिहाड़ी (टैक्स) देना लगभग बराबर ही है। लेकिन आम जनता को सबको कुछ न कुछ देना ही पड़ता है, नहीं तो जीना दूभर हो जाएगा उसका।

  6. June 20, 2007 at 7:19 am

    लोग अपने पाप काटने (कम करने) के लिए मन्दिरों में पूजा व दान पुण्य करते हैं। कुछ लोग कौओं को, कुछ भिखारियों, कंगालों को, कुछ लोग साँड को, कुछ लोग कुत्तों को तो कुछ लोग मछलियों को खिलाते हैं। भगवान(मूर्ति) तो स्वयं कुछ खाते नहीं है, भक्त ही उनके नाम पर लगा प्रसाद खाते हैं। यदि भगवान के सेवक (उर्फ, कौवे, कंगले, कुत्ते) ऐसे बरसते पानी(दान) में से दो घूँट पी लें तो क्या खराब है, क्या यह उनका हक नहीं?वर्तमान युग में सबसे बड़ा पुण्य कार्य (पाप कम करने हेतु) तो होगा, कि अधिकाधिक वृक्ष लगाएँ, उनकी सिंचाईं करें, ग्लोबल वार्मिंग कम करने, भूमिगत जल के स्तर को ऊँचा उठाने में सहयोग दें। मन्दिरों, आश्रमों, मठों में दान-पुण्य करना, और किसी राजनैतिक पार्टी को चन्दा देना और किसी गुण्डे/डाकू/शराबी/दादा को दिहाड़ी (टैक्स) देना लगभग बराबर ही है। लेकिन आम जनता को सबको कुछ न कुछ देना ही पड़ता है, नहीं तो जीना दूभर हो जाएगा उसका।

  7. Sanjeet Tripathi said,

    June 20, 2007 at 9:46 am

    जे हुई ना बात, सही मुद्दे पे लिखा भाया आपने!!

    यह हाल देश के तकरीबन सभी मंदिरों का है!!

  8. Sanjeet Tripathi said,

    June 20, 2007 at 9:46 am

    जे हुई ना बात, सही मुद्दे पे लिखा भाया आपने!!

    यह हाल देश के तकरीबन सभी मंदिरों का है!!

  9. June 20, 2007 at 9:46 am

    जे हुई ना बात, सही मुद्दे पे लिखा भाया आपने!!यह हाल देश के तकरीबन सभी मंदिरों का है!!

  10. अरुण said,

    June 20, 2007 at 4:26 pm

    भाइ मदर डेरी से लेकर मंदिरो तक मे यही हाल है हम कब समझेगे ये सब धंधा है,अब धंधा है तो गंदा है,आप सिर्फ़ भक्ती भावना रखो ,पुजारियो पर नजर नही

  11. अरुण said,

    June 20, 2007 at 4:26 pm

    भाइ मदर डेरी से लेकर मंदिरो तक मे यही हाल है हम कब समझेगे ये सब धंधा है,अब धंधा है तो गंदा है,आप सिर्फ़ भक्ती भावना रखो ,पुजारियो पर नजर नही

  12. अरुण said,

    June 20, 2007 at 4:26 pm

    भाइ मदर डेरी से लेकर मंदिरो तक मे यही हाल है हम कब समझेगे ये सब धंधा है,अब धंधा है तो गंदा है,आप सिर्फ़ भक्ती भावना रखो ,पुजारियो पर नजर नही


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