बरसात पर एक कालजयी गाना

देश के कुछ हिस्सों में बारिश ने अपनी खुश-आमदीद दर्ज करवा दी है, और कुछ में सौंधी खुशबुओं ने समाँ बाँधना शुरु कर दिया है । बरसात के मौसम पर हिन्दी फ़िल्मों मे दर्जनों गीत हैं, बारिश तो मानो गीतकारों के लिये एक “पार्टी” की तरह होती है, एक से बढकर एक गीत लिखे गये बरसात पर, लेकिन जब भी झूम कर बारिश होती है, यह गीत सबसे पहले जुबाँ पर आता है । गाया है सुमन कल्याणपूर और कमल बारोट ने, लिखा है साहिर साहब ने और तर्ज बनाई है रोशन ने, फ़िल्म का नाम है बरसात की रात । इस गीत का प्रारम्भ म्यूजिक के जिस टुकडे़ से होता है, बरसों तक वह धुन विविध भारती के संगीत सरिता की “सिग्नेचर ट्यून” रही । गीत कुछ इस प्रकार है –

गरजत बरसत सावन आयो रे..
गरजत बरसत सावन आयो रे..
लायो ना संग में हमरे बिछडे बलमवा
सखी का करुँ हाय..
गरजत बरसत…

(१) रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे
रिमझिम रिमझिम मेघा बरसे
बरसे, मेघा…
रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे
तरसे जियरवा मीन समान
पड गई पी की लाल चुनरिया
पिया नहीं आये
गरजत बरसत सावन आयो रे…

(२) पल-पल छिन-छिन पवन झकोरे (३ बार)
लागे तन पर तीर समान, तीर समान
सखी लागे तन पर तीर समान
नैनन ढले तो भीगी सजरिया
अगन लगाये…
गरजत-बरसत सावन आयो रे…
लायो ना संग में हमरे बिछडे बलमवा
सखी का करुँ हाय… गरजत-बरसत..

इस प्रकार हमें भिगोता हुआ यह गीत रागों के साथ समाप्त हो जाता है… फ़िर सुनने वाले को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि यह किस राग पर आधारित है, क्योंकि बारिश में अगर संगीत का साथ है तो फ़िर मन वैसे ही मोर हो जाता है । इस गीत में साहिर ने दो सहेलियों की आपसी छेड़छाड़, उनके प्रेमियों का बरसात में ना आना और उसके कारण उनके तड़पने का सुन्दर वर्णन किया है.. “पवन झकोरे तन पर तीर समान लगते हैं” और “रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसने में जिया मीन समान तडपे” एक कोमल लेकिन मन को तृप्त करने वाली शब्द रचना है, और संगीत के तो क्या कहने… रौशन साहब मानो बरसती बूँदों का अपनी धुन और साजों से एक माहौल रच देते हैं और श्रोता सुनते-सुनते स्वतः को बाहर बरामदे में भीगता हुआ पाता है.. । इस गीत में कमल बारोट की आवाज है, जिन्होंने एकल गीत कम ही गाये हैं, लेकिन युगल में लता, आशा, सुमन, महेन्द्र कपूर और रफ़ी आदि के साथ काफ़ी गीत गाये हैं । इनका एक और उल्लेखनीय गीत है पारसमणि फ़िल्म का “हँसता हुआ नूरानी चेहरा..”, उनकी आवाज एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि लिये हुए है, जो कम ही सुनने में आती है…। इसी प्रकार सुमन कल्याणपूर को एक बार लता का विकल्प कहा गया था, उन्होंने गीत भी वैसे ही गाये हैं और कहीं-कहीं तो सुमन को सुनकर लता का आभास भी होता है, जैसे “अजहुँ ना आये बालमा, सावन बीता जाये” अथवा “जूही की कली मेरी लाड़ली” जैसे गीतों में… । बहरहाल… इस गीत को यहाँ क्लिक करके सुनिये और भीगने का आनन्द लीजिये…
(प्रस्तुत चित्र एक दुर्लभ चित्र है जिसमें तलत महमूद, रफ़ी, किशोर, मुकेश, जी.एम.दुर्रानी, मीना कपूर, गीता दत्त, कमल बारोट, मुबारक बेगम इत्यादि दिखाई दे रहे हैं – चित्र http://www.talatmahmood.net से लिया गया है)

4 Comments

  1. अरुण said,

    June 22, 2007 at 7:03 am

    धन्यवाद की आपने हमारी सुनी
    भाइ मै वैसे यहा बूट पालिश का “गरज गरज तू आ रे बदरवा,सुनने की उम्मीद मे था काहे की अभी आपके यहा बारिश शुरु नही हुई ना

  2. अरुण said,

    June 22, 2007 at 7:03 am

    धन्यवाद की आपने हमारी सुनीभाइ मै वैसे यहा बूट पालिश का “गरज गरज तू आ रे बदरवा,सुनने की उम्मीद मे था काहे की अभी आपके यहा बारिश शुरु नही हुई ना

  3. Rodrigo said,

    June 23, 2007 at 1:40 am

    Oi, achei teu blog pelo google tá bem interessante gostei desse post. Quando der dá uma passada pelo meu blog, é sobre camisetas personalizadas, mostra passo a passo como criar uma camiseta personalizada bem maneira. Até mais.

  4. Rodrigo said,

    June 23, 2007 at 1:40 am

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