>रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर दो अलबेले गीतों से पुष्पांजलि

>रफ़ी साहब की पुण्यतिथि (31 जुलाई) के अवसर पर उनके बारे में कुछ लिखने की शुरुआत करूँ तो कहाँ से करूँ, क्योंकि उनके बारे में सब कुछ तो कहा जा चुका है, फ़िर भी कम लगता है, रफ़ी साहब की आवाज, उनकी गीतों की अदायगी, उनकी भलमनसाहत के बारे में काफ़ी कुछ पहले ही लिखा जा चुका है, अब और कुछ लिखना तो मात्र सूरज को दीपक दिखाने जैसा होगा । रफ़ी साहब के हजारों खूबसूरत गीतों में से एक या दो को चुनना ठीक वैसा ही है, जैसे खिलौने की दुकान में भ्रमित सा एक बच्चा… जो सोच-सोच कर हैरान है कि “क्या चुनूँ” ! फ़िर भी रफ़ी साहब को पुष्पांजलि पेश करते हुए मैने उनके दो गीतों का चुनाव किया है । और इन गीतों का चुनाव इसलिये किया कि ये हीरो की छवि के विपरीत स्वभाव वाले गीत हैं । अक्सर कहा जाता है (और यह सच भी है) कि रफ़ी साहब हों या लता या आशा अथवा किशोर कुमार… गीत गाने से पहले फ़िल्म में यह किस हीरो पर फ़िल्माया जाना है उसके बारे में जरूर पता करते थे, फ़िर उस हीरो या हीरोईन के अन्दाजे-बयाँ और अदाओं के हिसाब से वे अपनी आवाज को ढालते थे । प्रस्तुत दोनों गीतों का चयन मैने इसी आधार पर किया है कि जिससे श्रोताओं को रफ़ी साहब की ” वाईड रेंज” के बारे में जानकारी मिल सके । नृत्य करते हुए दिलीप कुमार और बेहद गंभीर मुद्राओं में शम्मी कपूर की कल्पना करना कितना मुश्किल होता है ना… जबकि अधिकतर लोगों के दिमाग में “ट्रेजेडी किंग” और “याहू” की छवियाँ ऐसी कैद हैं कि चाहकर भी उन्हें नहीं भुलाया जा सकता । अब सोचिये कि मोहम्मद रफ़ी साहब को जब ये विपरीत स्वभाव वाले गीत गाने को कहा गया होगा तब गीत गाने से पहले उन्होंने “माइंड-सेट” कैसे किया होगा, क्योंकि वे इन गीतों को गाने से पहले इन अभिनेताओं की छवि के अनुरूप यूसुफ़ साहब के लिये बेहद दर्द भरे और शम्मी जी के लिए जोरदार उछलकूद वाले और कमर-हिलाऊ गीत गा चुके थे, लेकिन यहीं पर उनकी “मास्टरी” उभरकर सामने आती है…
पहला गीत मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ फ़िल्म “गंगा-जमुना” का लिखा है शकील बदायूँनी ने और धुन बनाई है नौशाद ने । इस फ़िल्म को पहली “अनऑफ़िशियल” भोजपुरी फ़िल्म कहा जा सकता है, क्योंकि इस फ़िल्म के नब्बे प्रतिशत संवादों और गीतों में भोजपुरी का उपयोग किया गया है । बोल हैं… “नैन लड़ जइहैं तो मनवा मा कसक होईबे करी…” यदि किसी को पता न हो कि ये गीत किस पर फ़िल्माया गया है तो उसके जेहन में दिलीप कुमार कतई नहीं आयेगा… इतनी मस्ती में यह गीत रफ़ी साहब ने गाया है कि यह सीधे आपको गाँव के मेले में ले जाता है और छेड़छाड़ भरे मासूम भोजपुरी शब्दों से आपको सराबोर कर देता है । नौशाद ने रफ़ी साहब से काफ़ी गीत गवाये हैं (अधिकतर दर्द भरे और गंभीर किस्म के), लेकिन इस गीत में दिलीप कुमार नृत्य भी करेंगे और गीत भोजपुरी में भी होगा यह रफ़ी साहब ने भी नहीं सोचा होगा… बहरहाल आप इस गीत को “यहाँ क्लिक करके” भी सुन सकते हैं और नीचे दिये विजेट में प्ले करके भी । मस्ती में खो जाईये और रफ़ी साहब को याद कीजिये…. इस बार मैं शब्दों को नहीं लिख रहा हूँ ना ही धुन पर कुछ लिख रहा हूँ, आज बात होगी सिर्फ़ रफ़ी साहब की आवाज की ।

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nain lad jai re to…

इसी प्रकार जो दूसरा गीत मैने चुना है वह है “मैं गाऊँ तुम सो जाओ…” फ़िल्म है ब्रह्मचारी, लिखा है हसरत जयपुरी ने, संगीत दिया है शंकर-जयकिशन ने और यह दर्दीली लोरी फ़िल्माई गई है शम्मी कपूर पर… शम्मी कपूर की जैसी खिलन्दड़ और याहू छवि है यह गीत उससे अलग हटकर है, फ़िल्म में अनाथ बच्चे भूखे हैं और सोने का प्रयत्न कर रहे हैं तथा शम्मी कपूर जो कि बेहद दुखी हैं, उन्हें यह लोरी गाकर सुलाने का प्रयास करते हैं । हालांकि शंकर-जयकिशन जो कि ऑर्केस्ट्रा के प्रयोग के मोह से बच नहीं पाते, इस गीत में भी साजों की काफ़ी आवाज है, फ़िर भी रफ़ी साहब ने बेहद कोमल अन्दाज और नीचे सुरों में उम्दा गीत गाया है (जैसे यह “फ़ुसफ़ुसाता सा यह गीत”, या फ़िर “यह गीत”) । इस लोरीनुमा गीत को आप “यहाँ क्लिक करके” सुन सकते हैं या विजेट में प्ले करके । आईये आवाज के इस देवदूत को सलाम करें, उनकी यादों में खो जायें और हमारी पीढी को रफ़ी-लता-आशा-किशोर-मुकेश आदि का तोहफ़ा देने के लिये ईश्वर को धन्यवाद दें ।

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Main Gaaon Tum So …

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रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर दो अलबेले गीतों से पुष्पांजलि

रफ़ी साहब की पुण्यतिथि (31 जुलाई) के अवसर पर उनके बारे में कुछ लिखने की शुरुआत करूँ तो कहाँ से करूँ, क्योंकि उनके बारे में सब कुछ तो कहा जा चुका है, फ़िर भी कम लगता है, रफ़ी साहब की आवाज, उनकी गीतों की अदायगी, उनकी भलमनसाहत के बारे में काफ़ी कुछ पहले ही लिखा जा चुका है, अब और कुछ लिखना तो मात्र सूरज को दीपक दिखाने जैसा होगा । रफ़ी साहब के हजारों खूबसूरत गीतों में से एक या दो को चुनना ठीक वैसा ही है, जैसे खिलौने की दुकान में भ्रमित सा एक बच्चा… जो सोच-सोच कर हैरान है कि “क्या चुनूँ” ! फ़िर भी रफ़ी साहब को पुष्पांजलि पेश करते हुए मैने उनके दो गीतों का चुनाव किया है । और इन गीतों का चुनाव इसलिये किया कि ये हीरो की छवि के विपरीत स्वभाव वाले गीत हैं । अक्सर कहा जाता है (और यह सच भी है) कि रफ़ी साहब हों या लता या आशा अथवा किशोर कुमार… गीत गाने से पहले फ़िल्म में यह किस हीरो पर फ़िल्माया जाना है उसके बारे में जरूर पता करते थे, फ़िर उस हीरो या हीरोईन के अन्दाजे-बयाँ और अदाओं के हिसाब से वे अपनी आवाज को ढालते थे । प्रस्तुत दोनों गीतों का चयन मैने इसी आधार पर किया है कि जिससे श्रोताओं को रफ़ी साहब की ” वाईड रेंज” के बारे में जानकारी मिल सके । नृत्य करते हुए दिलीप कुमार और बेहद गंभीर मुद्राओं में शम्मी कपूर की कल्पना करना कितना मुश्किल होता है ना… जबकि अधिकतर लोगों के दिमाग में “ट्रेजेडी किंग” और “याहू” की छवियाँ ऐसी कैद हैं कि चाहकर भी उन्हें नहीं भुलाया जा सकता । अब सोचिये कि मोहम्मद रफ़ी साहब को जब ये विपरीत स्वभाव वाले गीत गाने को कहा गया होगा तब गीत गाने से पहले उन्होंने “माइंड-सेट” कैसे किया होगा, क्योंकि वे इन गीतों को गाने से पहले इन अभिनेताओं की छवि के अनुरूप यूसुफ़ साहब के लिये बेहद दर्द भरे और शम्मी जी के लिए जोरदार उछलकूद वाले और कमर-हिलाऊ गीत गा चुके थे, लेकिन यहीं पर उनकी “मास्टरी” उभरकर सामने आती है…
पहला गीत मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ फ़िल्म “गंगा-जमुना” का लिखा है शकील बदायूँनी ने और धुन बनाई है नौशाद ने । इस फ़िल्म को पहली “अनऑफ़िशियल” भोजपुरी फ़िल्म कहा जा सकता है, क्योंकि इस फ़िल्म के नब्बे प्रतिशत संवादों और गीतों में भोजपुरी का उपयोग किया गया है । बोल हैं… “नैन लड़ जइहैं तो मनवा मा कसक होईबे करी…” यदि किसी को पता न हो कि ये गीत किस पर फ़िल्माया गया है तो उसके जेहन में दिलीप कुमार कतई नहीं आयेगा… इतनी मस्ती में यह गीत रफ़ी साहब ने गाया है कि यह सीधे आपको गाँव के मेले में ले जाता है और छेड़छाड़ भरे मासूम भोजपुरी शब्दों से आपको सराबोर कर देता है । नौशाद ने रफ़ी साहब से काफ़ी गीत गवाये हैं (अधिकतर दर्द भरे और गंभीर किस्म के), लेकिन इस गीत में दिलीप कुमार नृत्य भी करेंगे और गीत भोजपुरी में भी होगा यह रफ़ी साहब ने भी नहीं सोचा होगा… बहरहाल आप इस गीत को “यहाँ क्लिक करके” भी सुन सकते हैं और नीचे दिये विजेट में प्ले करके भी । मस्ती में खो जाईये और रफ़ी साहब को याद कीजिये…. इस बार मैं शब्दों को नहीं लिख रहा हूँ ना ही धुन पर कुछ लिख रहा हूँ, आज बात होगी सिर्फ़ रफ़ी साहब की आवाज की ।

nain lad jai re to…

इसी प्रकार जो दूसरा गीत मैने चुना है वह है “मैं गाऊँ तुम सो जाओ…” फ़िल्म है ब्रह्मचारी, लिखा है हसरत जयपुरी ने, संगीत दिया है शंकर-जयकिशन ने और यह दर्दीली लोरी फ़िल्माई गई है शम्मी कपूर पर… शम्मी कपूर की जैसी खिलन्दड़ और याहू छवि है यह गीत उससे अलग हटकर है, फ़िल्म में अनाथ बच्चे भूखे हैं और सोने का प्रयत्न कर रहे हैं तथा शम्मी कपूर जो कि बेहद दुखी हैं, उन्हें यह लोरी गाकर सुलाने का प्रयास करते हैं । हालांकि शंकर-जयकिशन जो कि ऑर्केस्ट्रा के प्रयोग के मोह से बच नहीं पाते, इस गीत में भी साजों की काफ़ी आवाज है, फ़िर भी रफ़ी साहब ने बेहद कोमल अन्दाज और नीचे सुरों में उम्दा गीत गाया है (जैसे यह “फ़ुसफ़ुसाता सा यह गीत”, या फ़िर “यह गीत”) । इस लोरीनुमा गीत को आप “यहाँ क्लिक करके” सुन सकते हैं या विजेट में प्ले करके । आईये आवाज के इस देवदूत को सलाम करें, उनकी यादों में खो जायें और हमारी पीढी को रफ़ी-लता-आशा-किशोर-मुकेश आदि का तोहफ़ा देने के लिये ईश्वर को धन्यवाद दें ।

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रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर दो अलबेले गीतों से पुष्पांजलि

रफ़ी साहब की पुण्यतिथि (31 जुलाई) के अवसर पर उनके बारे में कुछ लिखने की शुरुआत करूँ तो कहाँ से करूँ, क्योंकि उनके बारे में सब कुछ तो कहा जा चुका है, फ़िर भी कम लगता है, रफ़ी साहब की आवाज, उनकी गीतों की अदायगी, उनकी भलमनसाहत के बारे में काफ़ी कुछ पहले ही लिखा जा चुका है, अब और कुछ लिखना तो मात्र सूरज को दीपक दिखाने जैसा होगा । रफ़ी साहब के हजारों खूबसूरत गीतों में से एक या दो को चुनना ठीक वैसा ही है, जैसे खिलौने की दुकान में भ्रमित सा एक बच्चा… जो सोच-सोच कर हैरान है कि “क्या चुनूँ” ! फ़िर भी रफ़ी साहब को पुष्पांजलि पेश करते हुए मैने उनके दो गीतों का चुनाव किया है । और इन गीतों का चुनाव इसलिये किया कि ये हीरो की छवि के विपरीत स्वभाव वाले गीत हैं । अक्सर कहा जाता है (और यह सच भी है) कि रफ़ी साहब हों या लता या आशा अथवा किशोर कुमार… गीत गाने से पहले फ़िल्म में यह किस हीरो पर फ़िल्माया जाना है उसके बारे में जरूर पता करते थे, फ़िर उस हीरो या हीरोईन के अन्दाजे-बयाँ और अदाओं के हिसाब से वे अपनी आवाज को ढालते थे । प्रस्तुत दोनों गीतों का चयन मैने इसी आधार पर किया है कि जिससे श्रोताओं को रफ़ी साहब की ” वाईड रेंज” के बारे में जानकारी मिल सके । नृत्य करते हुए दिलीप कुमार और बेहद गंभीर मुद्राओं में शम्मी कपूर की कल्पना करना कितना मुश्किल होता है ना… जबकि अधिकतर लोगों के दिमाग में “ट्रेजेडी किंग” और “याहू” की छवियाँ ऐसी कैद हैं कि चाहकर भी उन्हें नहीं भुलाया जा सकता । अब सोचिये कि मोहम्मद रफ़ी साहब को जब ये विपरीत स्वभाव वाले गीत गाने को कहा गया होगा तब गीत गाने से पहले उन्होंने “माइंड-सेट” कैसे किया होगा, क्योंकि वे इन गीतों को गाने से पहले इन अभिनेताओं की छवि के अनुरूप यूसुफ़ साहब के लिये बेहद दर्द भरे और शम्मी जी के लिए जोरदार उछलकूद वाले और कमर-हिलाऊ गीत गा चुके थे, लेकिन यहीं पर उनकी “मास्टरी” उभरकर सामने आती है…
पहला गीत मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ फ़िल्म “गंगा-जमुना” का लिखा है शकील बदायूँनी ने और धुन बनाई है नौशाद ने । इस फ़िल्म को पहली “अनऑफ़िशियल” भोजपुरी फ़िल्म कहा जा सकता है, क्योंकि इस फ़िल्म के नब्बे प्रतिशत संवादों और गीतों में भोजपुरी का उपयोग किया गया है । बोल हैं… “नैन लड़ जइहैं तो मनवा मा कसक होईबे करी…” यदि किसी को पता न हो कि ये गीत किस पर फ़िल्माया गया है तो उसके जेहन में दिलीप कुमार कतई नहीं आयेगा… इतनी मस्ती में यह गीत रफ़ी साहब ने गाया है कि यह सीधे आपको गाँव के मेले में ले जाता है और छेड़छाड़ भरे मासूम भोजपुरी शब्दों से आपको सराबोर कर देता है । नौशाद ने रफ़ी साहब से काफ़ी गीत गवाये हैं (अधिकतर दर्द भरे और गंभीर किस्म के), लेकिन इस गीत में दिलीप कुमार नृत्य भी करेंगे और गीत भोजपुरी में भी होगा यह रफ़ी साहब ने भी नहीं सोचा होगा… बहरहाल आप इस गीत को “यहाँ क्लिक करके” भी सुन सकते हैं और नीचे दिये विजेट में प्ले करके भी । मस्ती में खो जाईये और रफ़ी साहब को याद कीजिये…. इस बार मैं शब्दों को नहीं लिख रहा हूँ ना ही धुन पर कुछ लिख रहा हूँ, आज बात होगी सिर्फ़ रफ़ी साहब की आवाज की ।

nain lad jai re to…

इसी प्रकार जो दूसरा गीत मैने चुना है वह है “मैं गाऊँ तुम सो जाओ…” फ़िल्म है ब्रह्मचारी, लिखा है हसरत जयपुरी ने, संगीत दिया है शंकर-जयकिशन ने और यह दर्दीली लोरी फ़िल्माई गई है शम्मी कपूर पर… शम्मी कपूर की जैसी खिलन्दड़ और याहू छवि है यह गीत उससे अलग हटकर है, फ़िल्म में अनाथ बच्चे भूखे हैं और सोने का प्रयत्न कर रहे हैं तथा शम्मी कपूर जो कि बेहद दुखी हैं, उन्हें यह लोरी गाकर सुलाने का प्रयास करते हैं । हालांकि शंकर-जयकिशन जो कि ऑर्केस्ट्रा के प्रयोग के मोह से बच नहीं पाते, इस गीत में भी साजों की काफ़ी आवाज है, फ़िर भी रफ़ी साहब ने बेहद कोमल अन्दाज और नीचे सुरों में उम्दा गीत गाया है (जैसे यह “फ़ुसफ़ुसाता सा यह गीत”, या फ़िर “यह गीत”) । इस लोरीनुमा गीत को आप “यहाँ क्लिक करके” सुन सकते हैं या विजेट में प्ले करके । आईये आवाज के इस देवदूत को सलाम करें, उनकी यादों में खो जायें और हमारी पीढी को रफ़ी-लता-आशा-किशोर-मुकेश आदि का तोहफ़ा देने के लिये ईश्वर को धन्यवाद दें ।

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>"क्रेन बेदी" हार गईं ?

>एक बार फ़िर से हमारी “व्यवस्था” एक होनहार और काबिल व्यक्ति के गले की फ़ाँस बन गई, टीवी पर किरण बेदी की आँखों में आँसू देखकर किसी भी देशभक्त व्यक्ति का खून खौलना स्वाभाविक है । (जिन लोगों को जानकारी नहीं है उनके लिये – किरण बेदी से दो साल जूनियर व्यक्ति को दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बना दिया गया है, जबकि उस पर गंभीर किस्म के आरोप हैं) हमारी भ्रष्ट व्यवस्था के आगे “क्रेन बेदी” के नाम से मशहूर एक फ़ौलादी महिला को जिस कदर दरकिनार कर दिया गया, उससे एक बार फ़िर स्पष्ट हो गया है कि इटली की महिला का “महिला सशक्तिकरण” का दावा कितना खोखला है । “त्याग”, “बलिदान” और “संस्कृति” की दुहाई देने वाली एक औरत दिल्ली में सत्ता की केन्द्र है, एक और औरत उसकी रबर स्टाम्प है, एक गैर-लोकसभाई (गैर-जनाधारी)उसका “बबुआ” बना हुआ है तथा एक और महिला (शीला दीक्षित) की नाक के नीचे ये सारा खेल खेला जा रहा है, इससे बडी़ शर्म की बात इस देश के लिये नहीं हो सकती । शायद किरण बेदी का अपराध यह रहा कि वे सिर्फ़ “ईमानदारी” से काम करने में यकीन रखती हैं, उन्हें अपने अफ़सरों और मातहतों को दारू-पार्टियाँ देकर “खुश” करना नहीं आता । वे पुस्तकें लिखती हैं, कैदियों को सुधारती हैं, अनुशासन बनाती हैं, लेकिन वे यह साफ़-साफ़ भूल जाती हैं कि हमारे “कीचड़ से सने” नेताओं के लिये यह बात मायने नहीं रखती, उन्हें तो चाहिये “जी-हुजूर” करने वाले “नपुंसक और बिना रीढ़ वाले” अधिकारी, जो “खाओ और खाने दो” में यकीन रखते हैं । एक तरफ़ कलाम साहब कल ही 2020 तक देश को महाशक्ति बनाने के लिये सपने देखने की बात फ़रमा कर, सिर्फ़ दो सूटकेस लेकर राष्ट्रपति भवन से निकल गये, वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली के बंगलों पर काबिज नेताओं और उनके लगुए-भगुओं को निकाल बाहर करने में पसीना आ रहा है, और ये भी मत भूलिये कि “महिला सशक्तिकरण” तो हुआ है, क्योंकि मोनिका बेदी छूट गई ना ! किरण बेदी की नाक भले ही रगड़ दी गई हो । क्या देश है और क्या घटिया व्यवस्था है ?
आईये हम सब मिलकर जोर से कहें – “इस व्यवस्था की तो %&^$*&&%**$% (इन स्टार युक्त चिन्हों के स्थान पर अपने-अपने गुस्से, अपनी-अपनी बेबसी और अपने-अपने संस्कारों के मुताबिक शब्द भर लें) और स्वतंत्रता दिवस नजदीक आ रहा है… झूठा ही सही “मेरा भारत महान” कहने में किसी का क्या जाता है ?

"क्रेन बेदी" हार गईं ?

एक बार फ़िर से हमारी “व्यवस्था” एक होनहार और काबिल व्यक्ति के गले की फ़ाँस बन गई, टीवी पर किरण बेदी की आँखों में आँसू देखकर किसी भी देशभक्त व्यक्ति का खून खौलना स्वाभाविक है । (जिन लोगों को जानकारी नहीं है उनके लिये – किरण बेदी से दो साल जूनियर व्यक्ति को दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बना दिया गया है, जबकि उस पर गंभीर किस्म के आरोप हैं) हमारी भ्रष्ट व्यवस्था के आगे “क्रेन बेदी” के नाम से मशहूर एक फ़ौलादी महिला को जिस कदर दरकिनार कर दिया गया, उससे एक बार फ़िर स्पष्ट हो गया है कि इटली की महिला का “महिला सशक्तिकरण” का दावा कितना खोखला है । “त्याग”, “बलिदान” और “संस्कृति” की दुहाई देने वाली एक औरत दिल्ली में सत्ता की केन्द्र है, एक और औरत उसकी रबर स्टाम्प है, एक गैर-लोकसभाई (गैर-जनाधारी)उसका “बबुआ” बना हुआ है तथा एक और महिला (शीला दीक्षित) की नाक के नीचे ये सारा खेल खेला जा रहा है, इससे बडी़ शर्म की बात इस देश के लिये नहीं हो सकती । शायद किरण बेदी का अपराध यह रहा कि वे सिर्फ़ “ईमानदारी” से काम करने में यकीन रखती हैं, उन्हें अपने अफ़सरों और मातहतों को दारू-पार्टियाँ देकर “खुश” करना नहीं आता । वे पुस्तकें लिखती हैं, कैदियों को सुधारती हैं, अनुशासन बनाती हैं, लेकिन वे यह साफ़-साफ़ भूल जाती हैं कि हमारे “कीचड़ से सने” नेताओं के लिये यह बात मायने नहीं रखती, उन्हें तो चाहिये “जी-हुजूर” करने वाले “नपुंसक और बिना रीढ़ वाले” अधिकारी, जो “खाओ और खाने दो” में यकीन रखते हैं । एक तरफ़ कलाम साहब कल ही 2020 तक देश को महाशक्ति बनाने के लिये सपने देखने की बात फ़रमा कर, सिर्फ़ दो सूटकेस लेकर राष्ट्रपति भवन से निकल गये, वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली के बंगलों पर काबिज नेताओं और उनके लगुए-भगुओं को निकाल बाहर करने में पसीना आ रहा है, और ये भी मत भूलिये कि “महिला सशक्तिकरण” तो हुआ है, क्योंकि मोनिका बेदी छूट गई ना ! किरण बेदी की नाक भले ही रगड़ दी गई हो । क्या देश है और क्या घटिया व्यवस्था है ?
आईये हम सब मिलकर जोर से कहें – “इस व्यवस्था की तो %&^$*&&%**$% (इन स्टार युक्त चिन्हों के स्थान पर अपने-अपने गुस्से, अपनी-अपनी बेबसी और अपने-अपने संस्कारों के मुताबिक शब्द भर लें) और स्वतंत्रता दिवस नजदीक आ रहा है… झूठा ही सही “मेरा भारत महान” कहने में किसी का क्या जाता है ?

>घनघोर चिल्लर संकट…

>हाल ही में एक समाचार आया था कि उत्तरप्रदेश के एक शहर से लाखों रुपये की चिल्लर (१ और २ रुपये के सिक्के) बरामद किये गये,वहाँ उन्हें गलाया जा रहा था और उसकी सिल्लियाँ बनाकर बांग्लादेश भेजा जा रहा था । बांग्लादेश में भारत के एक रुपये के सिक्के की चार-पाँच ब्लेड (रेजर) बनाई जाती हैं । हालांकि इस खबर में कुछ नया नहीं है, लेकिन यह बताता है कि हमारा प्रशासन किस कदर बेखबर, और सोया हुआ रहता है । बडे़ महानगरों के बारे में तो नहीं पता, लेकिन हमारे मालवा क्षेत्र में पिछले २-३ महीने से चिल्लर संकट बहुत बढ गया है, उज्जैन, रतलाम, देवास, शाजापुर जैसे छोटे कस्बों में यह समस्या कुछ अधिक है । इसके कारण सबसे अधिक तकलीफ़ में हैं वे लोग या वे छोटे व्यापारी जिनका अधिकतर काम चिल्लर से ही चलता है । सब्जी बेचने वाले, पान वाले, बूट-पॉलिश वाले, हार-फ़ूल बेचने वाले, फ़ोटोकॉपी वाले, पीसीओ चलाने वाले, मतलब हजारों-हजार लोग इस समस्या से पीडि़त हैं, परन्तु सरकारी मशीनरी कान में तेल डाले बैठी है । जनरल स्टोर वाले या किराना वाले या सब्जी वाले तो इसका सामना कर लेते हैं, क्योंकि उनके पास एक रुपये या दो रुपये वाले कई आईटम होते हैं, माचिस, आलपिन, लिफ़ाफ़े, टॉफ़ियाँ वे कुछ भी दे सकते हैं, सब्जी वाले भी आजकल “राउंड फ़िगर” में सब्जी तौलते हैं, लेकिन मैं / हम (यानी फ़ोटोकॉपी का बिजनेस करने वाले) क्या करें, क्योंकि यदि किसी व्यक्ति को चार फ़ोटोकॉपी करवानी हैं तो दो रुपये हुए (जी हाँ फ़ोटोकॉपी आज भी पचास पैसे ही है, जो दस-पन्द्रह साल पहले थी), तो क्या मैं उसे राउंड फ़िगर करने के लिये उसकी दस कॉपी कर सकता हूँ, नहीं कर सकता… कुछ दुकान वालों ने अपनी “व्यक्तिगत मुद्रा” चलन में ला दी है, कागज के एक टुकडे़ के एक-दो रुपये / आठ आने के कूपन बना दिये हैं वे कूपन उसी दुकान पर चल जायेंगे, क्या करें कुछ ना कुछ तो करना ही होगा न ! और ये आज की पीढी के नौजवानों का क्या कहना… “कॉमन सेंस” इन लोगों में बहुत “अनकॉमन” हो चला है, मुलाहिजा फ़रमायें.. घर से मार्कशीट की फ़ोटोकॉपी करवाने निकले हैं, जेब में है सौ रुपये का नोट, जैसे कि माने बैठे हैं कि दुकानदार तो चिल्लर की टकसाल खोले बैठा है…समस्या को बढाने में ATM ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसमें से पचास, बीस या दस के नोट नहीं निकलते… अब शाम को मजदूरों को पेमेंट करना है, किसी को चालीस, किसी को साठ, तो साला ATM कार्ड क्या करेगा ? क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने वालों का प्रतिशत कितना है ? सरकार कहती है कि बैंकों में चिल्लर की कोई कमी नहीं है, बैंक वालों को खुल्ले पैसे लेना होंगे… सरकार तो यह कह कर मुक्त हो गई, जरा जमीन पर उतर कर देखो अर्थशास्त्रियों.. बैंके साफ़-साफ़ मना कर देती हैं, खुल्ले के लेन-देन से, जो बन पडे़ सो कर लो… एकाध बैंक चिल्लर बाँटती भी है तो अहसान जता कर “एक हजार रुपये के सिक्के लेने होंगे कम से कम, जिसमें पाँच-पाँच के सौ सिक्के भी शामिल हैं”.. अब बताईये पाँच के सौ सिक्के लेकर मैं क्या करूँ जबकि मुझे असली आवश्यकता एक रुपये के सिक्के की है…असल समस्या है भारतीयों की रग-रग में समाया हुआ भ्रष्टाचार.. यहाँ “चिता की लकडियों” में भी कमीशन खाया जाता है तो चिल्लर (राष्ट्रीय मुद्रा) की जमाखोरी और उसे बरबाद करने में कैसी शर्म… और जो पुलिसवेश्याओं के अड्डे जानती है, सटोरियों के ठीये जानती है, अवैध शराब की भट्टियाँ जानती है, वह सिक्कों को गलाने वाले माफ़िया के बारे में अन्जान होगी.. यह बात गले उतरने वाली नहीं है । राष्ट्रीय मुद्रा का हम कितना सम्मान करते हैं यह तो नोटों पर लिखे प्रेम संदेशों, गुणा-भाग या फ़िर महिलाओं की विशिष्ट जगह पर मुडे़-तुडे़, खुँसे हुए देखकर हो जाती है..अब सरकार कह रही है कि “हम प्लास्टिक के नोट छापेंगे”… चलिये इंतजार करें उन नोटों का, “भाई लोगों” ने पहले ही उसको ठिकाने लगाने का इंतजाम सोच रखा होगा…

घनघोर चिल्लर संकट…

हाल ही में एक समाचार आया था कि उत्तरप्रदेश के एक शहर से लाखों रुपये की चिल्लर (१ और २ रुपये के सिक्के) बरामद किये गये,वहाँ उन्हें गलाया जा रहा था और उसकी सिल्लियाँ बनाकर बांग्लादेश भेजा जा रहा था । बांग्लादेश में भारत के एक रुपये के सिक्के की चार-पाँच ब्लेड (रेजर) बनाई जाती हैं । हालांकि इस खबर में कुछ नया नहीं है, लेकिन यह बताता है कि हमारा प्रशासन किस कदर बेखबर, और सोया हुआ रहता है । बडे़ महानगरों के बारे में तो नहीं पता, लेकिन हमारे मालवा क्षेत्र में पिछले २-३ महीने से चिल्लर संकट बहुत बढ गया है, उज्जैन, रतलाम, देवास, शाजापुर जैसे छोटे कस्बों में यह समस्या कुछ अधिक है । इसके कारण सबसे अधिक तकलीफ़ में हैं वे लोग या वे छोटे व्यापारी जिनका अधिकतर काम चिल्लर से ही चलता है । सब्जी बेचने वाले, पान वाले, बूट-पॉलिश वाले, हार-फ़ूल बेचने वाले, फ़ोटोकॉपी वाले, पीसीओ चलाने वाले, मतलब हजारों-हजार लोग इस समस्या से पीडि़त हैं, परन्तु सरकारी मशीनरी कान में तेल डाले बैठी है । जनरल स्टोर वाले या किराना वाले या सब्जी वाले तो इसका सामना कर लेते हैं, क्योंकि उनके पास एक रुपये या दो रुपये वाले कई आईटम होते हैं, माचिस, आलपिन, लिफ़ाफ़े, टॉफ़ियाँ वे कुछ भी दे सकते हैं, सब्जी वाले भी आजकल “राउंड फ़िगर” में सब्जी तौलते हैं, लेकिन मैं / हम (यानी फ़ोटोकॉपी का बिजनेस करने वाले) क्या करें, क्योंकि यदि किसी व्यक्ति को चार फ़ोटोकॉपी करवानी हैं तो दो रुपये हुए (जी हाँ फ़ोटोकॉपी आज भी पचास पैसे ही है, जो दस-पन्द्रह साल पहले थी), तो क्या मैं उसे राउंड फ़िगर करने के लिये उसकी दस कॉपी कर सकता हूँ, नहीं कर सकता… कुछ दुकान वालों ने अपनी “व्यक्तिगत मुद्रा” चलन में ला दी है, कागज के एक टुकडे़ के एक-दो रुपये / आठ आने के कूपन बना दिये हैं वे कूपन उसी दुकान पर चल जायेंगे, क्या करें कुछ ना कुछ तो करना ही होगा न ! और ये आज की पीढी के नौजवानों का क्या कहना… “कॉमन सेंस” इन लोगों में बहुत “अनकॉमन” हो चला है, मुलाहिजा फ़रमायें.. घर से मार्कशीट की फ़ोटोकॉपी करवाने निकले हैं, जेब में है सौ रुपये का नोट, जैसे कि माने बैठे हैं कि दुकानदार तो चिल्लर की टकसाल खोले बैठा है…समस्या को बढाने में ATM ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसमें से पचास, बीस या दस के नोट नहीं निकलते… अब शाम को मजदूरों को पेमेंट करना है, किसी को चालीस, किसी को साठ, तो साला ATM कार्ड क्या करेगा ? क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने वालों का प्रतिशत कितना है ? सरकार कहती है कि बैंकों में चिल्लर की कोई कमी नहीं है, बैंक वालों को खुल्ले पैसे लेना होंगे… सरकार तो यह कह कर मुक्त हो गई, जरा जमीन पर उतर कर देखो अर्थशास्त्रियों.. बैंके साफ़-साफ़ मना कर देती हैं, खुल्ले के लेन-देन से, जो बन पडे़ सो कर लो… एकाध बैंक चिल्लर बाँटती भी है तो अहसान जता कर “एक हजार रुपये के सिक्के लेने होंगे कम से कम, जिसमें पाँच-पाँच के सौ सिक्के भी शामिल हैं”.. अब बताईये पाँच के सौ सिक्के लेकर मैं क्या करूँ जबकि मुझे असली आवश्यकता एक रुपये के सिक्के की है…असल समस्या है भारतीयों की रग-रग में समाया हुआ भ्रष्टाचार.. यहाँ “चिता की लकडियों” में भी कमीशन खाया जाता है तो चिल्लर (राष्ट्रीय मुद्रा) की जमाखोरी और उसे बरबाद करने में कैसी शर्म… और जो पुलिसवेश्याओं के अड्डे जानती है, सटोरियों के ठीये जानती है, अवैध शराब की भट्टियाँ जानती है, वह सिक्कों को गलाने वाले माफ़िया के बारे में अन्जान होगी.. यह बात गले उतरने वाली नहीं है । राष्ट्रीय मुद्रा का हम कितना सम्मान करते हैं यह तो नोटों पर लिखे प्रेम संदेशों, गुणा-भाग या फ़िर महिलाओं की विशिष्ट जगह पर मुडे़-तुडे़, खुँसे हुए देखकर हो जाती है..अब सरकार कह रही है कि “हम प्लास्टिक के नोट छापेंगे”… चलिये इंतजार करें उन नोटों का, “भाई लोगों” ने पहले ही उसको ठिकाने लगाने का इंतजाम सोच रखा होगा…

>दाऊद भाई..पधारो ना म्हारे देस

>दाऊद भाई, आपको ये पत्र लिखते हुए बहुत खुशी हो रही है, चारों तरफ़ खुशी जैसे पसरी हुई है, खुशी का कारण भी है, मोनिका “जी” को भोपाल की एक अदालत ने फ़र्जी पासपोर्ट मामले में बरी कर दिया है, जिसकी खुद मोनिका ने भी सपने में कल्पना नहीं की होगी, लेकिन कल्पना करने से क्या होता है, आप तो जानते ही हैं कि हमारे यहाँ का सिस्टम कैसा “यूजर-फ़्रेंण्डली” हो गया है (जो इस सिस्टम को “यूज़” करता है, ये सिस्टम उसका फ़्रेण्ड बन जाता है), अब आप हों या अबू भाई, कहीं भी बैठे-बैठे सारी जेलों को अपने तरीके से संचालित कर सकते हैं (मैं तो कहता हूँ कि सरकार को आपको जेल सुधार का ठेका दे देना चाहिये)… तो भाई, भूमिका बनाने का तात्पर्य यही है कि हम पलक-पाँवडे़ बिछाये बैठे हैं आपकी राहों में, क्यों खामख्वाह हमारे सीबीआई अधिकारियों को तकलीफ़ देते हो और हमारे गाढे़ पसीने की कमाई जैसी पुर्तगाल से अबू-मोनिका को लाने में बहाई गई, उसे दुबई या कहीं और बहने देना चाहते हो ? भाई सब कुछ तो आपका ही है, हमारे लिये जैसे आप, वैसे पप्पू यादव, वैसे ही शहाबुद्दीन, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता । तो भाई तारीख बताओ और आ जाओ.. मोनिका दीदी पहले ही फ़रमा चुकी हैं कि जेल से ज्यादा सुरक्षित जगह भारत में कोई नहीं है (देखा ! क्या रोशन ख्याल आया है संगत के असर से), एकदम सुरक्षित जेलें हैं यहाँ की, अदालतें भी, कानून भी, वकील भी उनके गुर्गे भी, सब से सब एकदम गऊ, आप जहाँ भी रहना चाहेंगे व्यवस्था करा दी जायेगी, अस्पताल में रहें तो भी कोई बात नहीं हम आप जैसों की सेहत का खयाल रखने वालों में से हैं, सच्ची कहता हूँ भाई खुदा ने चाहा तो एकाध साल में ही मोटे हो जाओगे, जब तक जी करे हमसे सेवा-चाकरी करवाओ, और जब जाने की इच्छा हो बोल देना, हम आपको फ़िर से हवाई जहाज का अपहरण करने की तकलीफ़ नहीं देंगे..वैसे ही छोड़ देंगे.. हाँ, लेकिन आने से पहले “मुझे भारतीय न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है” यह सूत्रवाक्य बोलना मत भूलना… फ़िर देखना कैसे हाथों-हाथ उठाये जाते हो हमारे चिरकुट मीडिया द्वारा, जो आपकी बरसों पुरानी फ़िल्में दिखा-दिखा कर ही टाईम पास कर रहा है, मुम्बई बम ब्लास्ट के चौदह साल बाद फ़ैसले आना शुरु हुए हैं और अभी सुप्रीम कोर्ट बाकी है, तो भाई आपकी बाकी की जिन्दगी तो आराम से कटना तय है यहाँ… फ़िर आपके भाई-बन्धु भी काफ़ी मौजूद हैं यहाँ पहले से ही, जहाँ चार यार मिल जायेंगे रातें गुलजार हो जायेंगी…
आपकी मदद के लिये यहाँ राजनैतिक पार्टियाँ हार-फ़ूल लिये तैयार खडी़ हैं, इधर आपने पावन धरती पर कदम रखा और उधर तड़ से आपकी संसद सदस्यता पक्की… फ़िर मानवाधिकार वाले हैं (जो सूअर के मानवाधिकार भी सुरक्षित रखते हैं)… कई “उद्दीन” जैसे शहाबुद्दीन, तस्लीमुद्दीन और सोहराबुद्दीन (कुछ सरेआम, कुछ छुपे हुए) भी मौजूद हैं जो आपको सर-माथे लेने को उतावले हो उठेंगे.. बस..बस अब मुझसे बयान नहीं किया जाता कि आपको कितनी-कितनी सुविधायें मिलने वाली हैं यहाँ…। मन पुलकित-पुलकित हो रहा है यह सोच-सोचकर ही कि जिस दिन आप इस “महान” देश में पधारेंगे क्या माहौल होगा…यहाँ पासपोर्ट की अदला-बदली आम बात है, कार से कुचलना और बरी होना तो बेहद मामूली बात है, और आप तो माशाअल्लाह.. अब आपकी तारीफ़ क्या करूँ, आपने बडे़ काम किये हैं कोई ऐरे-गैरे जेबकतरे या झुग्गी वाले थोडे़ ही ना हैं आप, अकेले मध्यप्रदेश में बडे़ उद्योगपतियों पर सिर्फ़ बिजली का हजारों करोड़ रुपया बकाया है, मतलब कि आप अकेले नहीं रहेंगे यहाँ… बस अब और मनुहार ना करवाओ… कराची, दुबई, मुम्बई पास-पास ही तो है…आ जाओ… कहीं मुशर्रफ़ का दिमाग सटक गया तो.. नहीं..नहीं.. रिस्क ना लो, आप तो दुनिया की सबसे “सेफ़” जगह पर आ ही जाओ… मैं इन्तजार कर रहा हूँ…

दाऊद भाई..पधारो ना म्हारे देस

दाऊद भाई, आपको ये पत्र लिखते हुए बहुत खुशी हो रही है, चारों तरफ़ खुशी जैसे पसरी हुई है, खुशी का कारण भी है, मोनिका “जी” को भोपाल की एक अदालत ने फ़र्जी पासपोर्ट मामले में बरी कर दिया है, जिसकी खुद मोनिका ने भी सपने में कल्पना नहीं की होगी, लेकिन कल्पना करने से क्या होता है, आप तो जानते ही हैं कि हमारे यहाँ का सिस्टम कैसा “यूजर-फ़्रेंण्डली” हो गया है (जो इस सिस्टम को “यूज़” करता है, ये सिस्टम उसका फ़्रेण्ड बन जाता है), अब आप हों या अबू भाई, कहीं भी बैठे-बैठे सारी जेलों को अपने तरीके से संचालित कर सकते हैं (मैं तो कहता हूँ कि सरकार को आपको जेल सुधार का ठेका दे देना चाहिये)… तो भाई, भूमिका बनाने का तात्पर्य यही है कि हम पलक-पाँवडे़ बिछाये बैठे हैं आपकी राहों में, क्यों खामख्वाह हमारे सीबीआई अधिकारियों को तकलीफ़ देते हो और हमारे गाढे़ पसीने की कमाई जैसी पुर्तगाल से अबू-मोनिका को लाने में बहाई गई, उसे दुबई या कहीं और बहने देना चाहते हो ? भाई सब कुछ तो आपका ही है, हमारे लिये जैसे आप, वैसे पप्पू यादव, वैसे ही शहाबुद्दीन, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता । तो भाई तारीख बताओ और आ जाओ.. मोनिका दीदी पहले ही फ़रमा चुकी हैं कि जेल से ज्यादा सुरक्षित जगह भारत में कोई नहीं है (देखा ! क्या रोशन ख्याल आया है संगत के असर से), एकदम सुरक्षित जेलें हैं यहाँ की, अदालतें भी, कानून भी, वकील भी उनके गुर्गे भी, सब से सब एकदम गऊ, आप जहाँ भी रहना चाहेंगे व्यवस्था करा दी जायेगी, अस्पताल में रहें तो भी कोई बात नहीं हम आप जैसों की सेहत का खयाल रखने वालों में से हैं, सच्ची कहता हूँ भाई खुदा ने चाहा तो एकाध साल में ही मोटे हो जाओगे, जब तक जी करे हमसे सेवा-चाकरी करवाओ, और जब जाने की इच्छा हो बोल देना, हम आपको फ़िर से हवाई जहाज का अपहरण करने की तकलीफ़ नहीं देंगे..वैसे ही छोड़ देंगे.. हाँ, लेकिन आने से पहले “मुझे भारतीय न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है” यह सूत्रवाक्य बोलना मत भूलना… फ़िर देखना कैसे हाथों-हाथ उठाये जाते हो हमारे चिरकुट मीडिया द्वारा, जो आपकी बरसों पुरानी फ़िल्में दिखा-दिखा कर ही टाईम पास कर रहा है, मुम्बई बम ब्लास्ट के चौदह साल बाद फ़ैसले आना शुरु हुए हैं और अभी सुप्रीम कोर्ट बाकी है, तो भाई आपकी बाकी की जिन्दगी तो आराम से कटना तय है यहाँ… फ़िर आपके भाई-बन्धु भी काफ़ी मौजूद हैं यहाँ पहले से ही, जहाँ चार यार मिल जायेंगे रातें गुलजार हो जायेंगी…
आपकी मदद के लिये यहाँ राजनैतिक पार्टियाँ हार-फ़ूल लिये तैयार खडी़ हैं, इधर आपने पावन धरती पर कदम रखा और उधर तड़ से आपकी संसद सदस्यता पक्की… फ़िर मानवाधिकार वाले हैं (जो सूअर के मानवाधिकार भी सुरक्षित रखते हैं)… कई “उद्दीन” जैसे शहाबुद्दीन, तस्लीमुद्दीन और सोहराबुद्दीन (कुछ सरेआम, कुछ छुपे हुए) भी मौजूद हैं जो आपको सर-माथे लेने को उतावले हो उठेंगे.. बस..बस अब मुझसे बयान नहीं किया जाता कि आपको कितनी-कितनी सुविधायें मिलने वाली हैं यहाँ…। मन पुलकित-पुलकित हो रहा है यह सोच-सोचकर ही कि जिस दिन आप इस “महान” देश में पधारेंगे क्या माहौल होगा…यहाँ पासपोर्ट की अदला-बदली आम बात है, कार से कुचलना और बरी होना तो बेहद मामूली बात है, और आप तो माशाअल्लाह.. अब आपकी तारीफ़ क्या करूँ, आपने बडे़ काम किये हैं कोई ऐरे-गैरे जेबकतरे या झुग्गी वाले थोडे़ ही ना हैं आप, अकेले मध्यप्रदेश में बडे़ उद्योगपतियों पर सिर्फ़ बिजली का हजारों करोड़ रुपया बकाया है, मतलब कि आप अकेले नहीं रहेंगे यहाँ… बस अब और मनुहार ना करवाओ… कराची, दुबई, मुम्बई पास-पास ही तो है…आ जाओ… कहीं मुशर्रफ़ का दिमाग सटक गया तो.. नहीं..नहीं.. रिस्क ना लो, आप तो दुनिया की सबसे “सेफ़” जगह पर आ ही जाओ… मैं इन्तजार कर रहा हूँ…

>प्रिये प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी – शुद्ध हिन्दी गाना

>हिन्दी फ़िल्मों में अक्सर गीतों को लिखते समय या उनके चित्रीकरण के समय कोई जरूरी नहीं है कि उनका आपस में कोई तालमेल हो ही…हिन्दी फ़िल्मी गीतों के इतिहास को देखें तो हिन्दी के शब्दों का अधिकतम प्रयोग करने वाले गीतकार कम ही हुए हैं, जैसे भरत व्यास, प्रदीप आदि । यह लगभग परम्परा का ही रूप ले चुका है कि उर्दू शब्दों का उपयोग तो गीतों में होगा ही (आजकल तो अंग्रेजी के शब्दों के बिना हिन्दी गीत नहीं बन पा रहे गीतकारों से) इसलिये यह गीत कुछ “अलग हट के” बनता है, क्योंकि इस गीत में शुद्ध हिन्दी शब्दों का खूबसूरती का प्रयोग किया गया है, और कई लोगों को जानकर आश्चर्य होगा कि गीत लिखा है वर्मा मलिक साहब ने (इन्हीं वर्मा मलिक साहब ने शादियों में बजने वाला कालजयी गीत “आज मेरे यार की शादी है” भी लिखा है, इनका दुर्भाग्य यह रहा कि इन्हें अधिकतर “बी” और “सी” ग्रेड की फ़िल्में ही मिलीं जिन्हें फ़िल्मी भाषा में “सुपरहिट” कहा जाता है, वैसी नहीं), गीत को धुनों में बाँधा है कल्याणजी-आनन्दजी ने, फ़िल्म है “हम तुम और वो” (१९७१) तथा गीत को बडे़ मजे लेकर गाया है किशोर दा ने । फ़िल्म में यह गीत फ़िल्माया गया है विनोद खन्ना और भारती पर (दक्षिण की हीरोइन – कुंवारा बाप, मस्ताना, पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण आदि हिन्दी फ़िल्मों में ये दिखाई दी हैं) । मुझे हमेशा लगता है कि यह गीत वर्मा मलिक ने काफ़ी पहले लिख लिया होगा एक कविता के रूप में, लेकिन फ़िल्म की सिचुएशन को देखते हुए शायद कल्याणजी भाई को गीत के रूप में दिया होगा… फ़िल्म में विनोद खन्ना हिन्दी अध्यापक के रोल में भारती से प्रणय निवेदन करते हैं, इसलिये इस गीत को थोडा़ मजाहिया अन्दाज में फ़िल्माया गया है, बीच-बीच में कल्याणजी-आनन्दजी ने जो “बीट्स” दिये हैं, वे दक्षिण के “मृदंगम” का अहसास कराते हैं, लेकिन यदि हम शब्दों पर गौर करें तो पाते हैं कि यह तो एक विलक्षण कविता है.. जिसे गीत का रूप दिया गया है… कई शब्द ऐसे हैं जो अब लगभग सुनाई देना तो दूर “दिखाई” देना भी बन्द हो गये हैं, जैसे चक्षु (आँखें), कुंतल (बालों की लट), श्यामल (काला), अधर (होंठ), भ्रमर (भंवरा), याचक (माँगने वाला), व्यथित (परेशान)… तात्पर्य यह कि कोई-कोई उम्दा शब्दों वाला गीत कई बार अनदेखा रह जाता है…या फ़िल्म में उसके चित्रीकरण से उस गीत के बारे में विशेष धारणा बन जाती है, या फ़िर फ़िल्म के पिट जाने पर लगभग गुमनामी में खो जाते हैं, ऐसे कई गीत हैं…
बहरहाल पहले आप गीत (या कविता) पढिये, इसका तीसरा अन्तरा अधिकतर सुनने में नहीं आता, और मैं भी प्रयास करके दो ही अन्तरे आपको सुनवा सकूँगा..

प्रिये… प्रिये…
प्रिये प्राणेश्वरी.. हृदयेश्वरी, यदि आप हमें आदेश करें तो
प्रेम का हम श्रीगणेश करें… यदि आप हमें आदेश करें तो
प्रेम का हम श्रीगणेश करें…
(१) ये चक्षु तेरे चंचल-चंचल, ये चक्षु तेरे चंचल-चंचल
ये कुंतल भी श्यामल-श्यामल…
ये अधर धरे जीवन ज्वाला, ये रूप चन्द्र शीतल-शीतल
ओ कामिनी… ओ कामिनी मन में प्रवेश करें
यदि आप आदेश करें तो प्रेम का हम श्रीगणेश करें…
(२) हम भ्रमर नहीं इस यौवन के
हम याचक हैं मन उपवन के..
हम भाव पुष्प कर दें अर्पण
स्वीकार करो सपने मन के…
मन मोहिनी… मन मोहिनी, मन में प्रवेश करें…
यदि आप हमें आदेश करें …
(३) हों संचित पुण्यों की आशा
सुन व्यथित हृदय की मृदुभाषा
सर्वस्व समर्पण कर दें हम
करो पूर्ण हमारी अभिलाषा..
गज गामिनी… गजगामिनी दूर क्लेश करें..
यदि आप हमें आदेश करें तो प्रेम का श्रीगणेश करें…

नीचे दिये गये विजेट में “प्ले” बटन पर चूहे का चटका लगायें

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PriyePraneshwari.m…

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