>कुछ और ज़माना कहता है, कुछ और है जिद मेरे दिल की

>कुछ वर्षों पहले रविवार की सुबह सुबह दूरदर्शन पर रंगोली देखने का मजा ही कुछ और था। धीरे धीरे केबल टी वी आया और दिन रात फिल्म फिल्म होने लगा तब से टी वी से उब हो गई। ऐसे मैं लगबग दस बारह साल पहले एक दिन मैं रंगोली देख रहा था एक गाना शुरु हुआ और थोड़ी ही देर में करंट चला गया। गाने का कुछ ही अंश मैं सुन पाया पर उस अंश ने इतना बैचेन कर दिया कि मैं पता लगाने लगा कि आखिर वह गाना था कौनसा? क्यों कि वह आवाज लता , आशा, गीता दत्त, शमशाद बेगम, मुबारक बेगम आदि किसी भी जानी मानी गायिका की नहीं थी।
अब ऐसे तो कैसे पता चलता फिर याद आया कि उस गाने में नादिराजी नाव में बैठी गा रही थी। बस इतना सा क्लू था और गाने की वह लाईन “या बात सुनुँ अपने दिल की” बस इन दो क्लू पर बहुत मेहनत करने पर मुझे वह गाना मिला और वह था मीना कपूर की आवाज में गाया हुआ गाना : कुछ और जमाना कहता है, कुछ और है जिद मेरे दिल की” मैने उस गाने को ओडियो कैसेट में रिकार्ड करवाया और उसे एक ही दिन में इतनी बार सुना कि बार रिवाईन्ड करने की वजह से कैसेट खराब हो गई ।
कुछ दिनों पहले नैट पर से उस गाने को फिर से मैने ढूंढ़ निकाला जिसे मैं आज आप सबके लिये पेश कर रहा हूँ।
मीना कपूर अनिल विश्वास की पत्नी थी। और उन्होने राजकपूर की गोपीनाथ में सारे गाने गाये थे। उनकी आवाज उस जमाने की स्थापित गायिकाऒं से कहीं उन्नीस नहीं थी पर जैसा होता आया है उगते सूरज को सलाम सब करते है। मीनाजी ने ज्यादा गाने नहीं गाये। जितने गाये वे सब अपने आप में लाजवाब हैं।
प्रस्तुत गाना फिल्म छोटी छोटी बातें 1965 का है फिल्म के निर्देशक और मुख्य अभिनेता स्वयं मोती लाल थे और फिल्म की नायिका थी नादिरा जो उन दिनों वेम्प की भूमिका में धीरे धीरे अपने पैर जमा रही थी।
नादिरा ने फिल्म अनुपमा में भी शर्मीली शर्मिला टैगोर की वाचाल सहेली का पॉजिटिव रोल किया था और बहुत ही लाजवाब अभिनय किया था।

खैर बातें बहुत कर ली अब गाना सुन लेते हैं। पिछले कुछ गाने कुछ ज्यादा ही पुराने हो गये थे पर मुझे विश्वास है कि आपको यह गाना जरूर पसन्द आयेगा क्यों कि यह बहुत ज्यादा पुराना नहीं है। और मीना कपुर की आवाज के तो क्या कहने ???

http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/note_player.swf
MeenaKapoor-KuchhA…

कुछ और ज़माना कहता है,
कुछ और है जिद मेरे दिल की
मैं बात ज़माने की मानूँ,
या बात सुनूँ अपने दिल की
कुछ और ज़माना कहता है

दुनिया ने हमें बेरहमी से
ठुकरा जो दिया, अच्छा ही किया
नादान हम समझे बैठे थे
निभती है यहाँ दिल से दिल की
कुछ और ज़माना कहता है

इन्साफ़, मुहब्बत, सच्चाई
वो रहमो करम के दिखलावे
कुछ कहते ज़ुबाँ शरमाती है
पूछो न जलन मेरे दिल की
कुछ और ज़माना कहता है

गो बस्ती है इन्सानों की
इन्सान मगर ढूँढे न मिला
पत्थर के बुतों से क्या कीजे
फ़रियाद भला टूटे दिल की
कुछ और ज़माना कहता है

NARAD:Hindi Blog Aggregator


title=”नई प्रविष्टी”>
width=”125″ height=”30″>

Learn-Hindi, Hindi-Blogging, Hindi, Hindi-Blog, Old-Hindi-Songs, Hindi-Films-Song, Rare-Hindi-Songs, Hindi-Film-Sangeet, हिन्दी-खोज, हिन्दी-ब्लॉग, हिन्दी-चिट्ठाकारिता, सफल-हिन्दी-चिट्ठाकारिता, प्रसिद्ध-चिट्ठे, प्रसिद्ध-हिन्दी-चिट्ठे, चिट्ठा-प्रचार, चिट्ठा-प्रसार, जाल-प्रचार, जाल-सफलता, पुराने-हिन्दी-गाने, हिन्दी-फिल्म-संगीत,

कुछ और ज़माना कहता है, कुछ और है जिद मेरे दिल की

कुछ वर्षों पहले रविवार की सुबह सुबह दूरदर्शन पर रंगोली देखने का मजा ही कुछ और था। धीरे धीरे केबल टी वी आया और दिन रात फिल्म फिल्म होने लगा तब से टी वी से उब हो गई। ऐसे मैं लगबग दस बारह साल पहले एक दिन मैं रंगोली देख रहा था एक गाना शुरु हुआ और थोड़ी ही देर में करंट चला गया। गाने का कुछ ही अंश मैं सुन पाया पर उस अंश ने इतना बैचेन कर दिया कि मैं पता लगाने लगा कि आखिर वह गाना था कौनसा? क्यों कि वह आवाज लता , आशा, गीता दत्त, शमशाद बेगम, मुबारक बेगम आदि किसी भी जानी मानी गायिका की नहीं थी।
अब ऐसे तो कैसे पता चलता फिर याद आया कि उस गाने में नादिराजी नाव में बैठी गा रही थी। बस इतना सा क्लू था और गाने की वह लाईन “या बात सुनुँ अपने दिल की” बस इन दो क्लू पर बहुत मेहनत करने पर मुझे वह गाना मिला और वह था मीना कपूर की आवाज में गाया हुआ गाना : कुछ और जमाना कहता है, कुछ और है जिद मेरे दिल की” मैने उस गाने को ओडियो कैसेट में रिकार्ड करवाया और उसे एक ही दिन में इतनी बार सुना कि बार रिवाईन्ड करने की वजह से कैसेट खराब हो गई ।
कुछ दिनों पहले नैट पर से उस गाने को फिर से मैने ढूंढ़ निकाला जिसे मैं आज आप सबके लिये पेश कर रहा हूँ।
मीना कपूर अनिल विश्वास की पत्नी थी। और उन्होने राजकपूर की गोपीनाथ में सारे गाने गाये थे। उनकी आवाज उस जमाने की स्थापित गायिकाऒं से कहीं उन्नीस नहीं थी पर जैसा होता आया है उगते सूरज को सलाम सब करते है। मीनाजी ने ज्यादा गाने नहीं गाये। जितने गाये वे सब अपने आप में लाजवाब हैं।
प्रस्तुत गाना फिल्म छोटी छोटी बातें 1965 का है फिल्म के निर्देशक और मुख्य अभिनेता स्वयं मोती लाल थे और फिल्म की नायिका थी नादिरा जो उन दिनों वेम्प की भूमिका में धीरे धीरे अपने पैर जमा रही थी।
नादिरा ने फिल्म अनुपमा में भी शर्मीली शर्मिला टैगोर की वाचाल सहेली का पॉजिटिव रोल किया था और बहुत ही लाजवाब अभिनय किया था।

खैर बातें बहुत कर ली अब गाना सुन लेते हैं। पिछले कुछ गाने कुछ ज्यादा ही पुराने हो गये थे पर मुझे विश्वास है कि आपको यह गाना जरूर पसन्द आयेगा क्यों कि यह बहुत ज्यादा पुराना नहीं है। और मीना कपुर की आवाज के तो क्या कहने ???

MeenaKapoor-KuchhA…

कुछ और ज़माना कहता है,
कुछ और है जिद मेरे दिल की
मैं बात ज़माने की मानूँ,
या बात सुनूँ अपने दिल की
कुछ और ज़माना कहता है

दुनिया ने हमें बेरहमी से
ठुकरा जो दिया, अच्छा ही किया
नादान हम समझे बैठे थे
निभती है यहाँ दिल से दिल की
कुछ और ज़माना कहता है

इन्साफ़, मुहब्बत, सच्चाई
वो रहमो करम के दिखलावे
कुछ कहते ज़ुबाँ शरमाती है
पूछो न जलन मेरे दिल की
कुछ और ज़माना कहता है

गो बस्ती है इन्सानों की
इन्सान मगर ढूँढे न मिला
पत्थर के बुतों से क्या कीजे
फ़रियाद भला टूटे दिल की
कुछ और ज़माना कहता है

NARAD:Hindi Blog Aggregator


title=”नई प्रविष्टी”>
width=”125″ height=”30″>

Learn-Hindi, Hindi-Blogging, Hindi, Hindi-Blog, Old-Hindi-Songs, Hindi-Films-Song, Rare-Hindi-Songs, Hindi-Film-Sangeet, हिन्दी-खोज, हिन्दी-ब्लॉग, हिन्दी-चिट्ठाकारिता, सफल-हिन्दी-चिट्ठाकारिता, प्रसिद्ध-चिट्ठे, प्रसिद्ध-हिन्दी-चिट्ठे, चिट्ठा-प्रचार, चिट्ठा-प्रसार, जाल-प्रचार, जाल-सफलता, पुराने-हिन्दी-गाने, हिन्दी-फिल्म-संगीत,

>हम हैं मालवा के "खवैय्ये"

>Pohe-Jalebi, Dal Bafla and Rabdi of Malwa Region

पश्चिमी मध्यप्रदेश का एक बड़ा भूभाग है जिसे कहते हैं “मालवा” जिसमें मुख्यतः इन्दौर, उज्जैन, देवास, रतलाम और मन्दसौर जिले आते हैं। “पग-पग रोटी, डग-डग नीर” यह कहावत पहले मालवा के लिये कही जाती थी (कही तो अब भी जाती हैं, लेकिन अब डग-डग नीर यहाँ मौजूद नहीं है)। लेकिन मौजूद है यहाँ की “खवैय्येगिरी” की परम्परा। दूध, सोयाबीन और हरी सब्जियों की बहुतायत वाला यह इलाका विभिन्न बेहतरीन व्यंजनों के लिये जाना जाता है। सुबह होती है नाश्ते हेतु पोहे-जलेबी से। कई लोगों को, जिन्होंने यह “कॉम्बिनेशन” नहीं खाया है वह आश्चर्य करेंगे, लेकिन भाप पर पके हुए (जी हाँ, भट्टी पर तपेले में गर्म पानी रखकर उसपर पोहे की कढाई रखी जाती है, और बिना तेल के सीधे हल्दी-मसाला-खड़े धने-अनारदाना- सेंव-प्याज मिलाकर दूर से ही लोगों की लार टपकाने हेतु सजाकर रख दिया जाता है) गरमागरम पोहे का स्वाद वही जान सकता है, जिसने खाया हो। साथ में होती हैं गरम और कड़क जलेबियाँ। एक कौर पोहे का जिसमें एक छोटा सा टुकड़ा जलेबी का, म्म्म्म्म्म मजा आ जाता है, कई बार गप्पें मारते हुए, या “जलेबी बच गई है इसलिये” एक की जगह पोहे की दो प्लेट हो जाती हैं। इतना भारी नाश्ता करने के बाद भोजन दो-तीन बजे के बाद ही होता है। भोजन के लिये हाजिर होते हैं “दाल-बाफ़ले”। दाल-बाफ़ले मालवा का शाही भोजन माना जाता है, जब कोई विशेष आयोजन (मुंडन, सूरज-पूजा, जन्मदिन पार्टी आदि) होता है तब मेजबान दाल-बाफ़ले का कार्यक्रम रखते हैं। संक्षेप में, “बाफ़ला” कहते हैं आटे के एक बड़े, घी में पके हुए गोले को, जिसे दाल में चूरा-चूरा करके खाया जाता है।

बाफ़ला बनाने के लिये रोटी के आटे से थोड़ा मोटा (दरदरा) आटा गूँथा जाता है, फ़िर उसमें नमक, हल्दी आदि मिलाकर उसके गोले बना लिये जाते हैं (आकार में टेनिस गेंद से थोड़े बड़े)। इन आटे के गोलों को कंडे के ढेर में दबा कर उन कंडों को सुलगा दिया जाता है, कंडों की धीमी-धीमी आँच से ये गोले भीतर तक पूरी तरह पक जाते हैं। फ़िर इन्हें बाहर निकालकर उस पर लगी राख आदि को कपड़े से साफ़ करके, शुद्ध घी से भरी हुई एक बड़ी परात में उन्हें हल्का सा “चीरा” लगाकर डुबाया जाता है, इससे गरम-गरम बाफ़ले अन्दर तक घी से पूरी तरह नहा जाते हैं। दाल तो जैसी आपकी मर्जी हो बना दी जाती है (आमतौर पर खट्टी-मीठी), लेकिन इन दोनो के साथ रवे-मावे के लड्डू भी होते हैं, जिसमें सूखा मेवा और मिश्री डाली जाती है, हरी मिर्ची की तीखी चटनी और गोभी या आलू की सब्जी, अब हुई पूरी “डिश” तैयार। पूरी थाली (एक बाफ़ला, दाल, एक लड्डू, चटनी और थोडी सी सब्जी) परोसने के बाद यदि कोई एक और पूरा बाफ़ला लेता है, तो मानना पड़ेगा कि उसकी खुराक बेहतरीन है। लेकिन इसकी नौबत कम ही आती है। इस शानदार और शाही भोजन के बाद शाम चार बजे से पाँच बजे तक एक नींद जरूरी हो जाती है। यह भोजन “एलीट” वर्ग के लिये नहीं है, और उन लोगों के लिये भी नहीं जो आजकल “घी” के नाम से ही चकरा जाते हैं। यह खाना खालिस देसी लोगों के लिये है (ना तो छुरी काँटे से खाया जा सकता है ना चम्मच से, सिर्फ़ भगवान के दिये हाथों से ही), पाचक भी तभी है जब आलथी-पालथी मार कर, पंगत में बैठकर, हाथ पर लगे शुद्ध घी को स्वाद लेकर खाया जाये।

इस असाधारण खाने के बाद शाम को भोजन करने की तो कोई गुंजाइश ही नहीं बनती है, इसलिये आठ-नौ बजे पैदल घूमने निकल जाईये, लम्बी-लम्बी गप्पें हाँकते जाईये, कोई बन्दिश नहीं है, उज्जैन में हों तो महाकाल का दर्शन करते हुए, इन्दौर में हों तो होलकरों के राजवाड़े आदि को देखते हुए, वापस मुख्य बाजार में आइये, जहाँ जवान होती हुई रात के दस बजे के लगभग “लच्छेदार रबड़ी” आपका इन्तजार कर रही है। ऐसी रबड़ी और कहीं नहीं खाई होगी आपने। “रबड़ी”, दूध से बना हुआ ही एक प्रकार है। एक बड़े कढ़ाव में शाम से ही दूध उबलने के लिये छोड़ दिया जाता है, आते-जाते एक हलवाई उस दूध पर एक के बाद एक आती जा रही मलाई की परतों को एक बारीक लोहे की सलाई से कढ़ाव के चारों तरफ़ इकठ्ठा करता जाता है, इससे धीरे-धीरे दूध अटते-अटते कम होता जाता है और तब तक कढ़ाव के चारों तरफ़ किनारों पर मलाई की एक मोटी परत जम चुकी होती है। बस, अन्त में थोड़े से बचे हुए दूध में (जो कि लगभग गुलाबी रंग का हो जाता है) में इस मलाई को काट-काट कर डाल दिया जाता है और उसमें थोड़ी सी शक्कर मिला दी जाती है, हो गई तैयार “रबड़ी”, बस बगल में ओटले पर बैठ जाइये (ना, ना पैंट की चिंता ना करें, ओटले पर बैठकर ही रबड़ी खाने का असली मजा आयेगा), दोने में सौ ग्राम रबड़ी मंगवाईये और (थोड़े ज्यादा हिम्मत वाले हों, तो) उंगली से धीरे-धीरे चाटकर खायें, ऐसा मजा ना मिला होगा, ना दोबारा कहीं मिलेगा। मालवा में आकर यदि आपने दाल-बाफ़ले और रबड़ी नहीं खाई तो यह ठीक वैसा ही होगा जैसे कोई आगरा जाकर ताजमहल ना देखे।

इन सब व्यंजनों के अलावा उज्जैन की एक खासियत और है, वह है भगवान शिव का प्रसाद यानी बूटी, या विजया, सीधी-सीधी भाषा में कहूँ तो “भाँग” (कृपया नाक-भौंह ना सिकोड़ें, क्योंकि जिसने यह “प्रसाद” चखा ही ना हो उसे कोई हक नहीं है इसकी बुराई करने का)। दिनचर्या के दो खास समय जिनका उल्लेख उपर करना रह गया वे हैं नाश्ते के बाद सुबह नौ बजे और दाल-बाफ़ले खाने के बाद शाम को, जी हाँ यही समय है “विजया” लेने का, और आपको कुछ भी नहीं करना है, मुख्य बाजार में कई भाँग-घोटे की दुकानें मिल जायेंगी, सिर्फ़ और सिर्फ़ दो रुपये की गोली घुटवा लीजिये, भोले बाबा का नाम लीजिये और गटक जाइये, बस आधे घंटे के भीतर ही आप “स्वर्गवासी” होंगे… बिलकुल… भाई जब आपको अपने आसपास मेनका, रंभा, उर्वशी नजर आने लगें तो आप “स्वर्गवासी” ही हुए ना! और सिर्फ़ दो रुपये इसलिये कहा कि एक तो सस्ता, सुन्दर और “टिकाऊ” सौदा, और साथ ही यह मात्रा इतनी होती है कि ना तो नाली में गिरने का खतरा होता है, ना ही बीबी को पता चलने का, यानी मौज ही मौज। एक बात और, कि शिवबूटी का सेवन करने पर आपकी भूख खुल जाएगी, तब या तो हँसते-हँसते आप आधा बाफ़ला ज्यादा खा जायेंगे, या फ़िर सौ ग्राम रबड़ी का एक दोना और पेट में खिसका देंगे…. राम कसम हम मालवा वाले तो खाने में ही लुट गये हैं… तो आप किस बात का इन्तजार कर रहे हैं हुजूर… चले आईये म्हारे मालवा मां…

, , , , , , , , , ,

हम हैं मालवा के "खवैय्ये"

Pohe-Jalebi, Dal Bafla and Rabdi of Malwa Region

पश्चिमी मध्यप्रदेश का एक बड़ा भूभाग है जिसे कहते हैं “मालवा” जिसमें मुख्यतः इन्दौर, उज्जैन, देवास, रतलाम और मन्दसौर जिले आते हैं। “पग-पग रोटी, डग-डग नीर” यह कहावत पहले मालवा के लिये कही जाती थी (कही तो अब भी जाती हैं, लेकिन अब डग-डग नीर यहाँ मौजूद नहीं है)। लेकिन मौजूद है यहाँ की “खवैय्येगिरी” की परम्परा। दूध, सोयाबीन और हरी सब्जियों की बहुतायत वाला यह इलाका विभिन्न बेहतरीन व्यंजनों के लिये जाना जाता है। सुबह होती है नाश्ते हेतु पोहे-जलेबी से। कई लोगों को, जिन्होंने यह “कॉम्बिनेशन” नहीं खाया है वह आश्चर्य करेंगे, लेकिन भाप पर पके हुए (जी हाँ, भट्टी पर तपेले में गर्म पानी रखकर उसपर पोहे की कढाई रखी जाती है, और बिना तेल के सीधे हल्दी-मसाला-खड़े धने-अनारदाना- सेंव-प्याज मिलाकर दूर से ही लोगों की लार टपकाने हेतु सजाकर रख दिया जाता है) गरमागरम पोहे का स्वाद वही जान सकता है, जिसने खाया हो। साथ में होती हैं गरम और कड़क जलेबियाँ। एक कौर पोहे का जिसमें एक छोटा सा टुकड़ा जलेबी का, म्म्म्म्म्म मजा आ जाता है, कई बार गप्पें मारते हुए, या “जलेबी बच गई है इसलिये” एक की जगह पोहे की दो प्लेट हो जाती हैं। इतना भारी नाश्ता करने के बाद भोजन दो-तीन बजे के बाद ही होता है। भोजन के लिये हाजिर होते हैं “दाल-बाफ़ले”। दाल-बाफ़ले मालवा का शाही भोजन माना जाता है, जब कोई विशेष आयोजन (मुंडन, सूरज-पूजा, जन्मदिन पार्टी आदि) होता है तब मेजबान दाल-बाफ़ले का कार्यक्रम रखते हैं। संक्षेप में, “बाफ़ला” कहते हैं आटे के एक बड़े, घी में पके हुए गोले को, जिसे दाल में चूरा-चूरा करके खाया जाता है।

बाफ़ला बनाने के लिये रोटी के आटे से थोड़ा मोटा (दरदरा) आटा गूँथा जाता है, फ़िर उसमें नमक, हल्दी आदि मिलाकर उसके गोले बना लिये जाते हैं (आकार में टेनिस गेंद से थोड़े बड़े)। इन आटे के गोलों को कंडे के ढेर में दबा कर उन कंडों को सुलगा दिया जाता है, कंडों की धीमी-धीमी आँच से ये गोले भीतर तक पूरी तरह पक जाते हैं। फ़िर इन्हें बाहर निकालकर उस पर लगी राख आदि को कपड़े से साफ़ करके, शुद्ध घी से भरी हुई एक बड़ी परात में उन्हें हल्का सा “चीरा” लगाकर डुबाया जाता है, इससे गरम-गरम बाफ़ले अन्दर तक घी से पूरी तरह नहा जाते हैं। दाल तो जैसी आपकी मर्जी हो बना दी जाती है (आमतौर पर खट्टी-मीठी), लेकिन इन दोनो के साथ रवे-मावे के लड्डू भी होते हैं, जिसमें सूखा मेवा और मिश्री डाली जाती है, हरी मिर्ची की तीखी चटनी और गोभी या आलू की सब्जी, अब हुई पूरी “डिश” तैयार। पूरी थाली (एक बाफ़ला, दाल, एक लड्डू, चटनी और थोडी सी सब्जी) परोसने के बाद यदि कोई एक और पूरा बाफ़ला लेता है, तो मानना पड़ेगा कि उसकी खुराक बेहतरीन है। लेकिन इसकी नौबत कम ही आती है। इस शानदार और शाही भोजन के बाद शाम चार बजे से पाँच बजे तक एक नींद जरूरी हो जाती है। यह भोजन “एलीट” वर्ग के लिये नहीं है, और उन लोगों के लिये भी नहीं जो आजकल “घी” के नाम से ही चकरा जाते हैं। यह खाना खालिस देसी लोगों के लिये है (ना तो छुरी काँटे से खाया जा सकता है ना चम्मच से, सिर्फ़ भगवान के दिये हाथों से ही), पाचक भी तभी है जब आलथी-पालथी मार कर, पंगत में बैठकर, हाथ पर लगे शुद्ध घी को स्वाद लेकर खाया जाये।

इस असाधारण खाने के बाद शाम को भोजन करने की तो कोई गुंजाइश ही नहीं बनती है, इसलिये आठ-नौ बजे पैदल घूमने निकल जाईये, लम्बी-लम्बी गप्पें हाँकते जाईये, कोई बन्दिश नहीं है, उज्जैन में हों तो महाकाल का दर्शन करते हुए, इन्दौर में हों तो होलकरों के राजवाड़े आदि को देखते हुए, वापस मुख्य बाजार में आइये, जहाँ जवान होती हुई रात के दस बजे के लगभग “लच्छेदार रबड़ी” आपका इन्तजार कर रही है। ऐसी रबड़ी और कहीं नहीं खाई होगी आपने। “रबड़ी”, दूध से बना हुआ ही एक प्रकार है। एक बड़े कढ़ाव में शाम से ही दूध उबलने के लिये छोड़ दिया जाता है, आते-जाते एक हलवाई उस दूध पर एक के बाद एक आती जा रही मलाई की परतों को एक बारीक लोहे की सलाई से कढ़ाव के चारों तरफ़ इकठ्ठा करता जाता है, इससे धीरे-धीरे दूध अटते-अटते कम होता जाता है और तब तक कढ़ाव के चारों तरफ़ किनारों पर मलाई की एक मोटी परत जम चुकी होती है। बस, अन्त में थोड़े से बचे हुए दूध में (जो कि लगभग गुलाबी रंग का हो जाता है) में इस मलाई को काट-काट कर डाल दिया जाता है और उसमें थोड़ी सी शक्कर मिला दी जाती है, हो गई तैयार “रबड़ी”, बस बगल में ओटले पर बैठ जाइये (ना, ना पैंट की चिंता ना करें, ओटले पर बैठकर ही रबड़ी खाने का असली मजा आयेगा), दोने में सौ ग्राम रबड़ी मंगवाईये और (थोड़े ज्यादा हिम्मत वाले हों, तो) उंगली से धीरे-धीरे चाटकर खायें, ऐसा मजा ना मिला होगा, ना दोबारा कहीं मिलेगा। मालवा में आकर यदि आपने दाल-बाफ़ले और रबड़ी नहीं खाई तो यह ठीक वैसा ही होगा जैसे कोई आगरा जाकर ताजमहल ना देखे।

इन सब व्यंजनों के अलावा उज्जैन की एक खासियत और है, वह है भगवान शिव का प्रसाद यानी बूटी, या विजया, सीधी-सीधी भाषा में कहूँ तो “भाँग” (कृपया नाक-भौंह ना सिकोड़ें, क्योंकि जिसने यह “प्रसाद” चखा ही ना हो उसे कोई हक नहीं है इसकी बुराई करने का)। दिनचर्या के दो खास समय जिनका उल्लेख उपर करना रह गया वे हैं नाश्ते के बाद सुबह नौ बजे और दाल-बाफ़ले खाने के बाद शाम को, जी हाँ यही समय है “विजया” लेने का, और आपको कुछ भी नहीं करना है, मुख्य बाजार में कई भाँग-घोटे की दुकानें मिल जायेंगी, सिर्फ़ और सिर्फ़ दो रुपये की गोली घुटवा लीजिये, भोले बाबा का नाम लीजिये और गटक जाइये, बस आधे घंटे के भीतर ही आप “स्वर्गवासी” होंगे… बिलकुल… भाई जब आपको अपने आसपास मेनका, रंभा, उर्वशी नजर आने लगें तो आप “स्वर्गवासी” ही हुए ना! और सिर्फ़ दो रुपये इसलिये कहा कि एक तो सस्ता, सुन्दर और “टिकाऊ” सौदा, और साथ ही यह मात्रा इतनी होती है कि ना तो नाली में गिरने का खतरा होता है, ना ही बीबी को पता चलने का, यानी मौज ही मौज। एक बात और, कि शिवबूटी का सेवन करने पर आपकी भूख खुल जाएगी, तब या तो हँसते-हँसते आप आधा बाफ़ला ज्यादा खा जायेंगे, या फ़िर सौ ग्राम रबड़ी का एक दोना और पेट में खिसका देंगे…. राम कसम हम मालवा वाले तो खाने में ही लुट गये हैं… तो आप किस बात का इन्तजार कर रहे हैं हुजूर… चले आईये म्हारे मालवा मां…

, , , , , , , , , ,

>ये किसके इशारे जहाँ चल रहा है?

>हेमंत कुमार संगीतकार के रूप में जितनी मधुर धुनें दी ही थी बतौर गायक उतने ही मधुर गाने गायेयहाँ प्रस्तुत गाना फिल्म पहली झलक (१९५४) का है फिल्म का संगीत दिया है सी रामचन्द्र ने और गीतकार है, राजेन्द्र कृष्णइस सुन्दर गाने में वाद्य यंत्रों का उपयोग बहुत कम हुआ है पर संगीतकार सी रामचन्द्र ने बांसुरी और तबले का उपयोग बहुत ही खूबसूरती से किया हैगाने के बोल नीचे दिये है

ज़मीं चल रही आसमां चल रहा है
ये किसके इशारे जहाँ चल रहा है
ज़मीं चल रही है

चली जा रही है जमाने की नय्या
नजर से ना देखा किसी ने खेवैया
ना जाने ये चक्कर कहाँ चल रहा है
ये किसके इशारे

ये हंसना ये रोना ये आशा निराशा
समझ में ना आये ये क्या है तमाशा
ये क्यों रात दिन कारवां चल रहा है
ये किसके इशारे

अजब ये महफ़िल अजब दास्तां है
ना मंजिल है कोई ना कोई निशां है
तो फिर किसके लिये कारवां चल रहा है
ये किसके इशारे….

भटकते तो देखे हजारों सयाने
मगर राज कुदरत का कोई ना जाने
ये सब सिलसिला बेनिशां चल रहा है
ये किसके इशारे जहाँ चल रहा है

http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/note_player.swf
Zameen Chal Rahi.m…

यह गाना पहले यहाँ प्रकाशित
किया था पर पोडकास्ट की फीड में कुछ तकलीफ थी अत: किसी एग्रीग्रेटर पर यह जुड़ नहीं पाया, फिर ब्लॉगस्पॉट पर नई महफिल सजानी पड़ी ।

Learn-Hindi, Hindi-Blogging, Hindi, Hindi-Blog, Old-Hindi-Songs, Hindi-Films-Song, Rare-Hindi-Songs, Hindi-Film-Sangeet, हिन्दी-खोज, हिन्दी-ब्लॉग, हिन्दी-चिट्ठाकारिता, सफल-हिन्दी-चिट्ठाकारिता, प्रसिद्ध-चिट्ठे, प्रसिद्ध-हिन्दी-चिट्ठे, चिट्ठा-प्रचार, चिट्ठा-प्रसार, जाल-प्रचार, जाल-सफलता, पुराने-हिन्दी-गाने, हिन्दी-फिल्म-संगीत,

ये किसके इशारे जहाँ चल रहा है?

हेमंत कुमार संगीतकार के रूप में जितनी मधुर धुनें दी ही थी बतौर गायक उतने ही मधुर गाने गायेयहाँ प्रस्तुत गाना फिल्म पहली झलक (१९५४) का है फिल्म का संगीत दिया है सी रामचन्द्र ने और गीतकार है, राजेन्द्र कृष्णइस सुन्दर गाने में वाद्य यंत्रों का उपयोग बहुत कम हुआ है पर संगीतकार सी रामचन्द्र ने बांसुरी और तबले का उपयोग बहुत ही खूबसूरती से किया हैगाने के बोल नीचे दिये है

ज़मीं चल रही आसमां चल रहा है
ये किसके इशारे जहाँ चल रहा है
ज़मीं चल रही है

चली जा रही है जमाने की नय्या
नजर से ना देखा किसी ने खेवैया
ना जाने ये चक्कर कहाँ चल रहा है
ये किसके इशारे

ये हंसना ये रोना ये आशा निराशा
समझ में ना आये ये क्या है तमाशा
ये क्यों रात दिन कारवां चल रहा है
ये किसके इशारे

अजब ये महफ़िल अजब दास्तां है
ना मंजिल है कोई ना कोई निशां है
तो फिर किसके लिये कारवां चल रहा है
ये किसके इशारे….

भटकते तो देखे हजारों सयाने
मगर राज कुदरत का कोई ना जाने
ये सब सिलसिला बेनिशां चल रहा है
ये किसके इशारे जहाँ चल रहा है

Zameen Chal Rahi.m…

यह गाना पहले यहाँ प्रकाशित
किया था पर पोडकास्ट की फीड में कुछ तकलीफ थी अत: किसी एग्रीग्रेटर पर यह जुड़ नहीं पाया, फिर ब्लॉगस्पॉट पर नई महफिल सजानी पड़ी ।

Learn-Hindi, Hindi-Blogging, Hindi, Hindi-Blog, Old-Hindi-Songs, Hindi-Films-Song, Rare-Hindi-Songs, Hindi-Film-Sangeet, हिन्दी-खोज, हिन्दी-ब्लॉग, हिन्दी-चिट्ठाकारिता, सफल-हिन्दी-चिट्ठाकारिता, प्रसिद्ध-चिट्ठे, प्रसिद्ध-हिन्दी-चिट्ठे, चिट्ठा-प्रचार, चिट्ठा-प्रसार, जाल-प्रचार, जाल-सफलता, पुराने-हिन्दी-गाने, हिन्दी-फिल्म-संगीत,

>सोनिया गाँधी को आप कितना जानते हैं? (भाग-४)

>Know Sonia Gandhi (Part-4)

गतांक (सोनिया…भाग-३) से आगे जारी…

राजीव से विवाह के बाद सोनिया और उनके इटालियन मित्रों को स्नैम प्रोगैती की ओट्टावियो क्वात्रोची से भारी-भरकम राशियाँ मिलीं, वह भारतीय कानूनों से बेखौफ़ होकर दलाली में रुपये कूटने लगा। कुछ ही वर्षों में माइनो परिवार जो गरीबी के भंवर में फ़ँसा था अचानक करोड़पति हो गया । लोकसभा के नयेनवेले सदस्य के रूप में मैंने 19 नवम्बर 1974 को संसद में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी से पूछा था कि “क्या आपकी बहू सोनिया गाँधी, जो कि अपने-आप को एक इंश्योरेंस एजेंट बताती हैं (वे खुद को ओरियंटल फ़ायर एंड इंश्योरेंस कम्पनी की एजेंट बताती थीं), प्रधानमंत्री आवास का पता उपयोग कर रही हैं?” जबकि यह अपराध है क्योंकि वे एक इटालियन नागरिक हैं (और यह विदेशी मुद्रा उल्लंघन) का मामला भी बनता है”, तब संसद में बहुत शोरगुल मचा, श्रीमती इन्दिरा गाँधी गुस्सा तो बहुत हुईं, लेकिन उनके सामने और कोई विकल्प नहीं था, इसलिये उन्होंने लिखित में यह बयान दिया कि “यह गलती से हो गया था और सोनिया ने इंश्योरेंस कम्पनी से इस्तीफ़ा दे दिया है” (मेरे प्रश्न पूछने के बाद), लेकिन सोनिया का भारतीय कानूनों को लतियाने और तोड़ने का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के जस्टिस ए.सी.गुप्ता के नेतृत्व में गठित आयोग ने जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसके अनुसार “मारुति” कम्पनी (जो उस वक्त गाँधी परिवार की मिल्कियत था) ने “फ़ेरा कानूनों, कम्पनी कानूनों और विदेशी पंजीकरण कानून के कई गंभीर उल्लंघन किये”, लेकिन ना तो संजय गाँधी और ना ही सोनिया गाँधी के खिलाफ़ कभी भी कोई केस दर्ज हुआ, ना मुकदमा चला। हालांकि यह अभी भी किया जा सकता है, क्योंकि भारतीय कानूनों के मुताबिक “आर्थिक घपलों” पर कार्रवाई हेतु कोई समय-सीमा तय नहीं है।

जनवरी 1980 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी पुनः सत्तासीन हुईं। सोनिया ने सबसे पहला काम यह किया कि उन्होंने अपना नाम “वोटर लिस्ट” में दर्ज करवाया, यह साफ़-साफ़ कानून का मखौल उड़ाने जैसा था और उनका वीसा रद्द किया जाना चाहिये था (क्योंकि उस वक्त भी वे इटली की नागरिक थीं)। प्रेस द्वारा हल्ला मचाने के बाद दिल्ली के चुनाव अधिकारी ने 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटाया। लेकिन फ़िर जनवरी 1983 में उन्होंने अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लिया, जबकि उस समय भी वे विदेशी ही थीं (आधिकारिक रूप से उन्होंने भारतीय नागरिकता के लिये अप्रैल 1983 में आवेद दिया था)। हाल ही में ख्यात कानूनविद, ए.जी.नूरानी ने अपनी पुस्तक “सिटीजन्स राईट्स, जजेस एंड अकाऊण्टेबिलिटी रेकॉर्ड्स” (पृष्ठ 318) पर यह दर्ज किया है कि “सोनिया गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के कुछ खास कागजात एक विदेशी को दिखाये, जो कागजात उनके पास नहीं होने चाहिये थे और उन्हें अपने पास रखने का सोनिया को कोई अधिकार नहीं था।“ इससे साफ़ जाहिर होता है उनके मन में भारतीय कानूनों के प्रति कितना सम्मान है और वे अभी भी राजतंत्र की मानसिकता से ग्रस्त हैं। सार यह कि सोनिया गाँधी के मन में भारतीय कानून के सम्बन्ध में कोई इज्जत नहीं है, वे एक महारानी की तरह व्यवहार करती हैं। यदि भविष्य में उनके खिलाफ़ कोई मुकदमा चलता है और जेल जाने की नौबत आ जाती है तो वे इटली भी भाग सकती हैं। पेरू के राष्ट्रपति फ़ूजीमोरी जीवन भर यह जपते रहे कि वे जन्म से ही पेरूवासी हैं, लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुकदमे में उन्हें दोषी पाया गया तो वे अपने गृह देश जापान भाग गये और वहाँ की नागरिकता ले ली।

भारत से घृणा करने वाले मुहम्मद गोरी, नादिर शाह और अंग्रेज रॉबर्ट क्लाइव ने भारत की धन-सम्पदा को जमकर लूटा, लेकिन सोनिया तो “भारतीय” हैं, फ़िर जब राजीव और इन्दिरा प्रधानमंत्री थे, तब बक्से के बक्से भरकर रोज-ब-रोज प्रधानमंत्री निवास से सुरक्षा गार्ड चेन्नई के हवाई अड्डे पर इटली जाने वाले हवाई जहाजों में क्या ले जाते थे? एक तो हमेशा उन बक्सों को रोम के लिये बुक किया जाता था, एयर इंडिया और अलिटालिया एयरलाईन्स को ही जिम्मा सौंपा जाता था और दूसरी बात यह कि कस्टम्स पर उन बक्सों की कोई जाँच नहीं होती थी। अर्जुन सिंह जो कि मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और संस्कृति मंत्री भी, इस मामले में विशेष रुचि लेते थे। कुछ भारतीय कलाकृतियाँ, पुरातन वस्तुयें, पिछवाई पेंटिंग्स, शहतूश शॉलें, सिक्के आदि इटली की दो दुकानों, (जिनकी मालिक सोनिया की बहन अनुस्का हैं) में आम तौर पर देखी जाती हैं। ये दुकानें इटली के आलीशान इलाकों रिवोल्टा (दुकान का नाम – एटनिका) और ओर्बेस्सानो (दुकान का नाम – गनपति) में स्थित हैं जहाँ इनका धंधा नहीं के बराबर चलता है, लेकिन दरअसल यह एक “आड़” है, इन दुकानों के नाम पर फ़र्जी बिल तैयार करवाये जाते हैं फ़िर वे बेशकीमती वस्तुयें लन्दन ले जाकर “सौथरबी और क्रिस्टीज” द्वारा नीलामी में चढ़ा दी जाती हैं, इन सबका क्या मतलब निकलता है? यह पैसा आखिर जाता कहाँ है? एक बात तो तय है कि राहुल गाँधी की हार्वर्ड की एक वर्ष की फ़ीस और अन्य खर्चों के लिये भुगतान एक बार केमैन द्वीप की किसी बैंक के खाते से हुआ था। इस सबकी शिकायत जब मैंने वाजपेयी सरकार में की तो उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया, इस पर मैंने दिल्ली हाइकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी किया, लेकिन तब तक सरकार गिर गई, फ़िर कोर्ट नें सीबीआई को निर्देश दिये कि वह इंटरपोल की मदद से इन बहुमूल्य वस्तुओं के सम्बन्ध में इटली सरकार से सहायता ले। इटालियन सरकार ने प्रक्रिया के तहत भारत सरकार से अधिकार-पत्र माँगा जिसके आधार पर इटली पुलिस एफ़आईआर दर्ज करे। अन्ततः इंटरपोल ने दो बड़ी रिपोर्टें कोर्ट और सीबीआई को सौंपी और न्यायाधीश ने मुझे उसकी एक प्रति देने को कहा, लेकिन आज तक सीबीआई ने मुझे वह नहीं दी, और यह सवाल अगली सुनवाई के दौरान फ़िर से पूछा जायेगा। सीबीआई का झूठ एक बार और तब पकड़ा गया, जब उसने कहा कि “अलेस्सान्द्रा माइनो” किसी पुरुष का नाम है, और “विया बेल्लिनी, 14, ओरबेस्सानो”, किसी गाँव का नाम है, ना कि “माईनो” परिवार का पता। बाद में सीबीआई के वकील ने कोर्ट से माफ़ी माँगी और कहा कि यह गलती से हो गया, उस वकील का “प्रमोशन” बाद में “ऎडिशनल सॉलिसिटर जनरल” के रूप में हो गया, ऐसा क्यों हुआ, इसका खुलासा तो वाजपेयी-सोनिया की आपसी “समझबूझ” और “गठजोड़” ही बता सकता है।

इन दिनों सोनिया गाँधी अपने पति हत्यारों के समर्थकों MDMK, PMK और DMK से सत्ता के लिये मधुर सम्बन्ध बनाये हुए हैं, कोई भारतीय विधवा कभी ऐसा नहीं कर सकती। उनका पूर्व आचरण भी ऐसे मामलों में संदिग्ध रहा है, जैसे कि – जब संजय गाँधी का हवाई जहाज नाक के बल गिरा तो उसमें विस्फ़ोट नहीं हुआ, क्योंकि पाया गया कि उसमें ईंधन नहीं था, जबकि फ़्लाईट रजिस्टर के अनुसार निकलते वक्त टैंक फ़ुल किया गया था, जैसे माधवराव सिंधिया की विमान दुर्घटना के ऐन पहले मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित को उनके साथ जाने से मना कर दिया गया। इन्दिरा गाँधी की मौत की वजह बना था उनका अत्यधिक रक्तस्राव, न कि सिर में गोली लगने से, फ़िर सोनिया गाँधी ने उस वक्त खून बहते हुए हालत में इन्दिरा गाँधी को लोहिया अस्पताल ले जाने की जिद की जो कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AAIMS) से बिलकुल विपरीत दिशा में है? और जबकि “ऐम्स” में तमाम सुविधायें भी उपलब्ध हैं, फ़िर लोहिया अस्पताल पहुँच कर वापस सभी लोग AAIMS पहुँचे, और इस बीच लगभग पच्चीस कीमती मिनट बरबाद हो गये? ऐसा क्यों हुआ, क्या आज तक किसी ने इसकी जाँच की? सोनिया गाँधी के विकल्प बन सकने वाले लगभग सभी युवा नेता जैसे राजेश पायलट, माधवराव सिन्धिया, जितेन्द्र प्रसाद विभिन्न हादसों में ही क्यों मारे गये? अब सोनिया की सत्ता निर्बाध रूप से चल रही है, लेकिन ऐसे कई अनसुलझे और रहस्यमयी प्रश्न चारों ओर मौजूद हैं, उनका कोई जवाब नहीं है, और कोई पूछने वाला भी नहीं है, यही इटली की स्टाइल है।

[आशा है कि मेरे कई “मित्रों” (?) को कई जवाब मिल गये होंगे, जो मैंने पिछली दोनो पोस्टों में जानबूझकर नहीं उठाये थे, यह भी आभास हुआ होगा कि कांग्रेस सांसद “सुब्बा” कैसे भारतीय नागरिक ना होते हुए भी सांसद बन गया (क्योंकि उसकी महारानी खुद कानून का सम्मान नहीं करती), क्यों बार-बार क्वात्रोच्ची सीबीआई के फ़ौलादी (!) हाथों से फ़िसल जाता है, क्यों कांग्रेस और भाजपा एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं? क्यों हमारी सीबीआई इतनी लुंज-पुंज है? आदि-आदि… मेरा सिर्फ़ यही आग्रह है कि किसी को भी तड़ से “सांप्रदायिक या फ़ासिस्ट” घोषित करने से पहले जरा ठंडे दिमाग से सोच लें, तथ्यों पर गौर करें, कई बार हमें जो दिखाई देता है सत्य उससे कहीं अधिक भयानक होता है, और सत्ता के शीर्ष शिखरों पर तो इतनी सड़ांध और षडयंत्र हैं कि हम जैसे आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकते, बल्कि यह कहना गैरवाजिब नहीं होगा कि सत्ता और धन की चोटी पर बैठे व्यक्ति के नीचे न जाने कितनी आहें होती हैं, कितने नरमुंड होते हैं, कितनी चालबाजियाँ होती हैं…. राजनीति शायद इसी का नाम है…]

सोनिया गाँधी को आप कितना जानते हैं? (भाग-४)

Know Sonia Gandhi (Part-4)

गतांक (सोनिया…भाग-३) से आगे जारी…

राजीव से विवाह के बाद सोनिया और उनके इटालियन मित्रों को स्नैम प्रोगैती की ओट्टावियो क्वात्रोची से भारी-भरकम राशियाँ मिलीं, वह भारतीय कानूनों से बेखौफ़ होकर दलाली में रुपये कूटने लगा। कुछ ही वर्षों में माइनो परिवार जो गरीबी के भंवर में फ़ँसा था अचानक करोड़पति हो गया । लोकसभा के नयेनवेले सदस्य के रूप में मैंने 19 नवम्बर 1974 को संसद में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी से पूछा था कि “क्या आपकी बहू सोनिया गाँधी, जो कि अपने-आप को एक इंश्योरेंस एजेंट बताती हैं (वे खुद को ओरियंटल फ़ायर एंड इंश्योरेंस कम्पनी की एजेंट बताती थीं), प्रधानमंत्री आवास का पता उपयोग कर रही हैं?” जबकि यह अपराध है क्योंकि वे एक इटालियन नागरिक हैं (और यह विदेशी मुद्रा उल्लंघन) का मामला भी बनता है”, तब संसद में बहुत शोरगुल मचा, श्रीमती इन्दिरा गाँधी गुस्सा तो बहुत हुईं, लेकिन उनके सामने और कोई विकल्प नहीं था, इसलिये उन्होंने लिखित में यह बयान दिया कि “यह गलती से हो गया था और सोनिया ने इंश्योरेंस कम्पनी से इस्तीफ़ा दे दिया है” (मेरे प्रश्न पूछने के बाद), लेकिन सोनिया का भारतीय कानूनों को लतियाने और तोड़ने का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के जस्टिस ए.सी.गुप्ता के नेतृत्व में गठित आयोग ने जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसके अनुसार “मारुति” कम्पनी (जो उस वक्त गाँधी परिवार की मिल्कियत था) ने “फ़ेरा कानूनों, कम्पनी कानूनों और विदेशी पंजीकरण कानून के कई गंभीर उल्लंघन किये”, लेकिन ना तो संजय गाँधी और ना ही सोनिया गाँधी के खिलाफ़ कभी भी कोई केस दर्ज हुआ, ना मुकदमा चला। हालांकि यह अभी भी किया जा सकता है, क्योंकि भारतीय कानूनों के मुताबिक “आर्थिक घपलों” पर कार्रवाई हेतु कोई समय-सीमा तय नहीं है।

जनवरी 1980 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी पुनः सत्तासीन हुईं। सोनिया ने सबसे पहला काम यह किया कि उन्होंने अपना नाम “वोटर लिस्ट” में दर्ज करवाया, यह साफ़-साफ़ कानून का मखौल उड़ाने जैसा था और उनका वीसा रद्द किया जाना चाहिये था (क्योंकि उस वक्त भी वे इटली की नागरिक थीं)। प्रेस द्वारा हल्ला मचाने के बाद दिल्ली के चुनाव अधिकारी ने 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटाया। लेकिन फ़िर जनवरी 1983 में उन्होंने अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लिया, जबकि उस समय भी वे विदेशी ही थीं (आधिकारिक रूप से उन्होंने भारतीय नागरिकता के लिये अप्रैल 1983 में आवेद दिया था)। हाल ही में ख्यात कानूनविद, ए.जी.नूरानी ने अपनी पुस्तक “सिटीजन्स राईट्स, जजेस एंड अकाऊण्टेबिलिटी रेकॉर्ड्स” (पृष्ठ 318) पर यह दर्ज किया है कि “सोनिया गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के कुछ खास कागजात एक विदेशी को दिखाये, जो कागजात उनके पास नहीं होने चाहिये थे और उन्हें अपने पास रखने का सोनिया को कोई अधिकार नहीं था।“ इससे साफ़ जाहिर होता है उनके मन में भारतीय कानूनों के प्रति कितना सम्मान है और वे अभी भी राजतंत्र की मानसिकता से ग्रस्त हैं। सार यह कि सोनिया गाँधी के मन में भारतीय कानून के सम्बन्ध में कोई इज्जत नहीं है, वे एक महारानी की तरह व्यवहार करती हैं। यदि भविष्य में उनके खिलाफ़ कोई मुकदमा चलता है और जेल जाने की नौबत आ जाती है तो वे इटली भी भाग सकती हैं। पेरू के राष्ट्रपति फ़ूजीमोरी जीवन भर यह जपते रहे कि वे जन्म से ही पेरूवासी हैं, लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुकदमे में उन्हें दोषी पाया गया तो वे अपने गृह देश जापान भाग गये और वहाँ की नागरिकता ले ली।

भारत से घृणा करने वाले मुहम्मद गोरी, नादिर शाह और अंग्रेज रॉबर्ट क्लाइव ने भारत की धन-सम्पदा को जमकर लूटा, लेकिन सोनिया तो “भारतीय” हैं, फ़िर जब राजीव और इन्दिरा प्रधानमंत्री थे, तब बक्से के बक्से भरकर रोज-ब-रोज प्रधानमंत्री निवास से सुरक्षा गार्ड चेन्नई के हवाई अड्डे पर इटली जाने वाले हवाई जहाजों में क्या ले जाते थे? एक तो हमेशा उन बक्सों को रोम के लिये बुक किया जाता था, एयर इंडिया और अलिटालिया एयरलाईन्स को ही जिम्मा सौंपा जाता था और दूसरी बात यह कि कस्टम्स पर उन बक्सों की कोई जाँच नहीं होती थी। अर्जुन सिंह जो कि मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और संस्कृति मंत्री भी, इस मामले में विशेष रुचि लेते थे। कुछ भारतीय कलाकृतियाँ, पुरातन वस्तुयें, पिछवाई पेंटिंग्स, शहतूश शॉलें, सिक्के आदि इटली की दो दुकानों, (जिनकी मालिक सोनिया की बहन अनुस्का हैं) में आम तौर पर देखी जाती हैं। ये दुकानें इटली के आलीशान इलाकों रिवोल्टा (दुकान का नाम – एटनिका) और ओर्बेस्सानो (दुकान का नाम – गनपति) में स्थित हैं जहाँ इनका धंधा नहीं के बराबर चलता है, लेकिन दरअसल यह एक “आड़” है, इन दुकानों के नाम पर फ़र्जी बिल तैयार करवाये जाते हैं फ़िर वे बेशकीमती वस्तुयें लन्दन ले जाकर “सौथरबी और क्रिस्टीज” द्वारा नीलामी में चढ़ा दी जाती हैं, इन सबका क्या मतलब निकलता है? यह पैसा आखिर जाता कहाँ है? एक बात तो तय है कि राहुल गाँधी की हार्वर्ड की एक वर्ष की फ़ीस और अन्य खर्चों के लिये भुगतान एक बार केमैन द्वीप की किसी बैंक के खाते से हुआ था। इस सबकी शिकायत जब मैंने वाजपेयी सरकार में की तो उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया, इस पर मैंने दिल्ली हाइकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी किया, लेकिन तब तक सरकार गिर गई, फ़िर कोर्ट नें सीबीआई को निर्देश दिये कि वह इंटरपोल की मदद से इन बहुमूल्य वस्तुओं के सम्बन्ध में इटली सरकार से सहायता ले। इटालियन सरकार ने प्रक्रिया के तहत भारत सरकार से अधिकार-पत्र माँगा जिसके आधार पर इटली पुलिस एफ़आईआर दर्ज करे। अन्ततः इंटरपोल ने दो बड़ी रिपोर्टें कोर्ट और सीबीआई को सौंपी और न्यायाधीश ने मुझे उसकी एक प्रति देने को कहा, लेकिन आज तक सीबीआई ने मुझे वह नहीं दी, और यह सवाल अगली सुनवाई के दौरान फ़िर से पूछा जायेगा। सीबीआई का झूठ एक बार और तब पकड़ा गया, जब उसने कहा कि “अलेस्सान्द्रा माइनो” किसी पुरुष का नाम है, और “विया बेल्लिनी, 14, ओरबेस्सानो”, किसी गाँव का नाम है, ना कि “माईनो” परिवार का पता। बाद में सीबीआई के वकील ने कोर्ट से माफ़ी माँगी और कहा कि यह गलती से हो गया, उस वकील का “प्रमोशन” बाद में “ऎडिशनल सॉलिसिटर जनरल” के रूप में हो गया, ऐसा क्यों हुआ, इसका खुलासा तो वाजपेयी-सोनिया की आपसी “समझबूझ” और “गठजोड़” ही बता सकता है।

इन दिनों सोनिया गाँधी अपने पति हत्यारों के समर्थकों MDMK, PMK और DMK से सत्ता के लिये मधुर सम्बन्ध बनाये हुए हैं, कोई भारतीय विधवा कभी ऐसा नहीं कर सकती। उनका पूर्व आचरण भी ऐसे मामलों में संदिग्ध रहा है, जैसे कि – जब संजय गाँधी का हवाई जहाज नाक के बल गिरा तो उसमें विस्फ़ोट नहीं हुआ, क्योंकि पाया गया कि उसमें ईंधन नहीं था, जबकि फ़्लाईट रजिस्टर के अनुसार निकलते वक्त टैंक फ़ुल किया गया था, जैसे माधवराव सिंधिया की विमान दुर्घटना के ऐन पहले मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित को उनके साथ जाने से मना कर दिया गया। इन्दिरा गाँधी की मौत की वजह बना था उनका अत्यधिक रक्तस्राव, न कि सिर में गोली लगने से, फ़िर सोनिया गाँधी ने उस वक्त खून बहते हुए हालत में इन्दिरा गाँधी को लोहिया अस्पताल ले जाने की जिद की जो कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AAIMS) से बिलकुल विपरीत दिशा में है? और जबकि “ऐम्स” में तमाम सुविधायें भी उपलब्ध हैं, फ़िर लोहिया अस्पताल पहुँच कर वापस सभी लोग AAIMS पहुँचे, और इस बीच लगभग पच्चीस कीमती मिनट बरबाद हो गये? ऐसा क्यों हुआ, क्या आज तक किसी ने इसकी जाँच की? सोनिया गाँधी के विकल्प बन सकने वाले लगभग सभी युवा नेता जैसे राजेश पायलट, माधवराव सिन्धिया, जितेन्द्र प्रसाद विभिन्न हादसों में ही क्यों मारे गये? अब सोनिया की सत्ता निर्बाध रूप से चल रही है, लेकिन ऐसे कई अनसुलझे और रहस्यमयी प्रश्न चारों ओर मौजूद हैं, उनका कोई जवाब नहीं है, और कोई पूछने वाला भी नहीं है, यही इटली की स्टाइल है।

[आशा है कि मेरे कई “मित्रों” (?) को कई जवाब मिल गये होंगे, जो मैंने पिछली दोनो पोस्टों में जानबूझकर नहीं उठाये थे, यह भी आभास हुआ होगा कि कांग्रेस सांसद “सुब्बा” कैसे भारतीय नागरिक ना होते हुए भी सांसद बन गया (क्योंकि उसकी महारानी खुद कानून का सम्मान नहीं करती), क्यों बार-बार क्वात्रोच्ची सीबीआई के फ़ौलादी (!) हाथों से फ़िसल जाता है, क्यों कांग्रेस और भाजपा एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं? क्यों हमारी सीबीआई इतनी लुंज-पुंज है? आदि-आदि… मेरा सिर्फ़ यही आग्रह है कि किसी को भी तड़ से “सांप्रदायिक या फ़ासिस्ट” घोषित करने से पहले जरा ठंडे दिमाग से सोच लें, तथ्यों पर गौर करें, कई बार हमें जो दिखाई देता है सत्य उससे कहीं अधिक भयानक होता है, और सत्ता के शीर्ष शिखरों पर तो इतनी सड़ांध और षडयंत्र हैं कि हम जैसे आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकते, बल्कि यह कहना गैरवाजिब नहीं होगा कि सत्ता और धन की चोटी पर बैठे व्यक्ति के नीचे न जाने कितनी आहें होती हैं, कितने नरमुंड होते हैं, कितनी चालबाजियाँ होती हैं…. राजनीति शायद इसी का नाम है…]

>क्या आपने मुबारक बेगम का यह गाना सुना है ?

>आज आपको एक ऐसी गायिका की आवाज में गाना सुनवाने जा रहा हूँ जिनको हिन्दी फिल्म जगत में उतनी सफलता नहीं मिल पाई जिसकी योग्यता उनमें थी। यानि मुबारक बेगम

मुबारक बेगम राजस्थान के झुंझनु जिले के सुजानगढ़ में जन्मी थी। जहाँ के प्रख्यात संगीतकार स्व. खेमचन्द्र प्रकाश थे। मुबारक बेगम ने शास्त्रीय संगीत की तालीम उस्ताद अब्दुल करीम खान के भतीजे समर खान रियाजुद्दीन खान से ली ,जो कि किराने घराने के थे। बाद में ऑल इण्डिया रेडियो पर गाने लगी और रेडियो पर एक बार रफीक गजनवी साहब ने उन्हें सुना और उन्हें अपनी फिल्म में गाने का आमंत्रण दिया। और जब मुबारक ने गाने की कोशिश की तो घबराहट के मारे गा ही नहीं पाई। उसके बाद श्याम सुन्दर जी ने उन्हें मौका दिया पर यहाँ भी मुबारक असफल रही।

मुबारक बेगम का पहला गाना फिल्म आईये 1949 से था जिसमें उन्होने दो गाने गाये जिसमें एक था मोहे आने लगी अंगड़ाई.. और दूसरा लताजी के साथ ड्यूएट था और उसके बोल थे आओ चले चले वहाँ

और बाद में आई फिल्म दायरा 1953 जिससे मुबारक बेगम की गायकी बुलंदियाँ छूने लगी। इस फिल्म के सारे गाने मुबारक बेगम ने गाये थे। और उसी फिल्म का गाना मैं आपको यहाँ सुना रहा हूँ मुझे विश्वास है आपको यह गाना बहुत पसन्द आयेगा। संगीतकार थे जमाल सेन जो कि खुद भी राजस्थानी थे। बोल थे कैफ भोपाली। गाने में मुबारक का साथ दिया है रफी साहब ने।

फिल्म के निर्देशक थे कमाल अमरोही और इस में अभिनय किया था मीना कुमारी और नासिर खान। इस फिल्म में एक गाना और भी था सुनो मेरे नैना- सुनो मेरे नैना जो फिर कभी सुनाया जायेगा।

लीजिये सुनिये यह मधुर गाना ( या भजन)। यहाँ मैं जो आपको गाना सुना रहा हूं उसमें अंतिम दो पैरा नहीं है अगर किसी के पास हो तो कृपया बतायें या भेजें ताकि उसे भी यहाँ जोड़ा जा सके।

मुबारक बेगम के कुछ प्रसिद्ध गाने:
कभी तन्हाईयों में- हमारी याद आयेगी (स्नेहल भाटकर)
वो ना पलट के आयेंगे- देवदास ( एस डी बर्मन)
मुझको अपने गले लगालो – हमराही ( शंकर जयकिशन)
हम हाले दिल सुनायेंगे- मधुमति ( सलिल चौधरी)
नींद उड़ जाये तेरी चैन से सोने वाले – जुआरी ( कल्याणजी आनंदजी)
बे मुर्रवत बे वफा -सुशीला

फिल्म : दायरा 1953
कलाकार:मीना कुमारी, नासिर खान
गायिका -गायक: मुबारक बेगम ,मोहम्मद रफी एवं कोरस
संगीत: जमाल सेन
गीतकार: कैफ भोपाली

डाल दी मैं ने जल-थल में नय्या
जागना हो तो जागो खेवय्या
जागना हो तो जागो खेवय्या
देवता तुम हो मेरा सहारा मैं ने थामा है दामन तुम्हारा
कोरस: – देवता तुम हो मेरा सहारा मैं ने थामा है दामन तुम्हारा

थाम लो अपनी राधा को भगवान
रुक न जाये कहीं दिल की धड़कन
ये न कहने लगी कोई बिरहन
मूँह छुपाकर साँवरिया ने मारा
देवता तुम हो मेरा सहारा
कोरस: – देवता तुम हो मेरा सहारा मैं ने थामा है दामन तुम्हारा

मेरे नैनों को तुम ऐसे पाये
दो घड़ी मुझ को निंदिया न आये
मेरी आँखों से आँखों लड़ाये
डूबता है सवेरे का तारा देवता तुम हो मेर सहारा…
कोरस: – देवता तुम हो मेरा सहारा मैं ने थामा है दामन तुम्हारा
( इससे आगे का गाना यहाँ नहीं है)
मो .रफी: रैन भरी है गेहरा अँधेरा
हाथ ले लो तुम हाथों में मेरा
सो गये मंदिरों के पुजारी गूँजती है मुरलिया तुम्हारी -२
आत्मा झूमती है हमारी

मुबारक: दिल खिंचा जा रहा है हमारा
देवता तुम हो मेरा सहारा
कोरस: – देवता तुम हो मेरा सहारा मैं ने थामा है दामन तुम्हारा- २

मुबारक :छोड़ कर मैन न भगवान को जाऊँ
रात भर यूँ ही जागूँ जगाऊँ
गीत गा गा के रोऊँ रुलाऊँ
ये वचन लूँ के मैं हूँ तुम्हारा – २
मो. रफी: मैं हूँ तुम्हारा

http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/note_player.swf
Devata tum ho mera…

http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://mahaphil.lifelogger.com/media/audio0/506418_xpgururzmp_conv.flv&autoStart=false

<a href="http://chitthajagat.in/?chittha=http://mahaphil.blogspot.com/&suchak=ha&quot;
title=”नई प्रविष्टियाँ सूचक”><img border="0" src="http://chitthajagat.in/chavi/pravashthiyasuchak.gif&quot;
width=”125″ height=”30″>

NARAD:Hindi Blog Aggregator

Learn-Hindi, Hindi-Blogging, Hindi, Hindi-Blog, Old-Hindi-Songs, Hindi-Films-Song, Rare-Hindi-Songs, Hindi-Film-Sangeet, हिन्दी-खोज, हिन्दी-ब्लॉग, हिन्दी-चिट्ठाकारिता, सफल-हिन्दी-चिट्ठाकारिता, प्रसिद्ध-चिट्ठे, प्रसिद्ध-हिन्दी-चिट्ठे, चिट्ठा-प्रचार, चिट्ठा-प्रसार, जाल-प्रचार, जाल-सफलता, पुराने-हिन्दी-गाने, हिन्दी-फिल्म-संगीत,

क्या आपने मुबारक बेगम का यह गाना सुना है ?

आज आपको एक ऐसी गायिका की आवाज में गाना सुनवाने जा रहा हूँ जिनको हिन्दी फिल्म जगत में उतनी सफलता नहीं मिल पाई जिसकी योग्यता उनमें थी। यानि मुबारक बेगम

मुबारक बेगम राजस्थान के झुंझनु जिले के सुजानगढ़ में जन्मी थी। जहाँ के प्रख्यात संगीतकार स्व. खेमचन्द्र प्रकाश थे। मुबारक बेगम ने शास्त्रीय संगीत की तालीम उस्ताद अब्दुल करीम खान के भतीजे समर खान रियाजुद्दीन खान से ली ,जो कि किराने घराने के थे। बाद में ऑल इण्डिया रेडियो पर गाने लगी और रेडियो पर एक बार रफीक गजनवी साहब ने उन्हें सुना और उन्हें अपनी फिल्म में गाने का आमंत्रण दिया। और जब मुबारक ने गाने की कोशिश की तो घबराहट के मारे गा ही नहीं पाई। उसके बाद श्याम सुन्दर जी ने उन्हें मौका दिया पर यहाँ भी मुबारक असफल रही।

मुबारक बेगम का पहला गाना फिल्म आईये 1949 से था जिसमें उन्होने दो गाने गाये जिसमें एक था मोहे आने लगी अंगड़ाई.. और दूसरा लताजी के साथ ड्यूएट था और उसके बोल थे आओ चले चले वहाँ

और बाद में आई फिल्म दायरा 1953 जिससे मुबारक बेगम की गायकी बुलंदियाँ छूने लगी। इस फिल्म के सारे गाने मुबारक बेगम ने गाये थे। और उसी फिल्म का गाना मैं आपको यहाँ सुना रहा हूँ मुझे विश्वास है आपको यह गाना बहुत पसन्द आयेगा। संगीतकार थे जमाल सेन जो कि खुद भी राजस्थानी थे। बोल थे कैफ भोपाली। गाने में मुबारक का साथ दिया है रफी साहब ने।

फिल्म के निर्देशक थे कमाल अमरोही और इस में अभिनय किया था मीना कुमारी और नासिर खान। इस फिल्म में एक गाना और भी था सुनो मेरे नैना- सुनो मेरे नैना जो फिर कभी सुनाया जायेगा।

लीजिये सुनिये यह मधुर गाना ( या भजन)। यहाँ मैं जो आपको गाना सुना रहा हूं उसमें अंतिम दो पैरा नहीं है अगर किसी के पास हो तो कृपया बतायें या भेजें ताकि उसे भी यहाँ जोड़ा जा सके।

मुबारक बेगम के कुछ प्रसिद्ध गाने:
कभी तन्हाईयों में- हमारी याद आयेगी (स्नेहल भाटकर)
वो ना पलट के आयेंगे- देवदास ( एस डी बर्मन)
मुझको अपने गले लगालो – हमराही ( शंकर जयकिशन)
हम हाले दिल सुनायेंगे- मधुमति ( सलिल चौधरी)
नींद उड़ जाये तेरी चैन से सोने वाले – जुआरी ( कल्याणजी आनंदजी)
बे मुर्रवत बे वफा -सुशीला

फिल्म : दायरा 1953
कलाकार:मीना कुमारी, नासिर खान
गायिका -गायक: मुबारक बेगम ,मोहम्मद रफी एवं कोरस
संगीत: जमाल सेन
गीतकार: कैफ भोपाली

डाल दी मैं ने जल-थल में नय्या
जागना हो तो जागो खेवय्या
जागना हो तो जागो खेवय्या
देवता तुम हो मेरा सहारा मैं ने थामा है दामन तुम्हारा
कोरस: – देवता तुम हो मेरा सहारा मैं ने थामा है दामन तुम्हारा

थाम लो अपनी राधा को भगवान
रुक न जाये कहीं दिल की धड़कन
ये न कहने लगी कोई बिरहन
मूँह छुपाकर साँवरिया ने मारा
देवता तुम हो मेरा सहारा
कोरस: – देवता तुम हो मेरा सहारा मैं ने थामा है दामन तुम्हारा

मेरे नैनों को तुम ऐसे पाये
दो घड़ी मुझ को निंदिया न आये
मेरी आँखों से आँखों लड़ाये
डूबता है सवेरे का तारा देवता तुम हो मेर सहारा…
कोरस: – देवता तुम हो मेरा सहारा मैं ने थामा है दामन तुम्हारा
( इससे आगे का गाना यहाँ नहीं है)
मो .रफी: रैन भरी है गेहरा अँधेरा
हाथ ले लो तुम हाथों में मेरा
सो गये मंदिरों के पुजारी गूँजती है मुरलिया तुम्हारी -२
आत्मा झूमती है हमारी

मुबारक: दिल खिंचा जा रहा है हमारा
देवता तुम हो मेरा सहारा
कोरस: – देवता तुम हो मेरा सहारा मैं ने थामा है दामन तुम्हारा- २

मुबारक :छोड़ कर मैन न भगवान को जाऊँ
रात भर यूँ ही जागूँ जगाऊँ
गीत गा गा के रोऊँ रुलाऊँ
ये वचन लूँ के मैं हूँ तुम्हारा – २
मो. रफी: मैं हूँ तुम्हारा

Devata tum ho mera…

</
param>

<a href="http://chitthajagat.in/?chittha=http://mahaphil.blogspot.com/&suchak=ha&quot;
title=”नई प्रविष्टियाँ सूचक”><img border="0" src="http://chitthajagat.in/chavi/pravashthiyasuchak.gif&quot;
width=”125″ height=”30″>

NARAD:Hindi Blog Aggregator

Learn-Hindi, Hindi-Blogging, Hindi, Hindi-Blog, Old-Hindi-Songs, Hindi-Films-Song, Rare-Hindi-Songs, Hindi-Film-Sangeet, हिन्दी-खोज, हिन्दी-ब्लॉग, हिन्दी-चिट्ठाकारिता, सफल-हिन्दी-चिट्ठाकारिता, प्रसिद्ध-चिट्ठे, प्रसिद्ध-हिन्दी-चिट्ठे, चिट्ठा-प्रचार, चिट्ठा-प्रसार, जाल-प्रचार, जाल-सफलता, पुराने-हिन्दी-गाने, हिन्दी-फिल्म-संगीत,

« Older entries