>आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं (भाग-३)

>Do You Know Sonia Gandhi? (Part-3)
(इस भाग में – सोनिया गाँधी का जन्म, उनका पारिवारिक इतिहास, उनके सम्बन्ध, उनके झूठ, उनके द्वारा कानून से खिलवाड़ आदि शामिल हैं)
सोनिया गाँधी से सम्बन्धित पिछले दोनों अनुवादों में हमने सोनिया गाँधी के बारे में काफ़ी कुछ जाना (क्या वाकई?) लेकिन जितना जाना उतने ही प्रश्न दिमागों में उठते गये। उन दोनो पोस्टों पर मुझे ब्लॉग पर और व्यक्तिगत रूप से कई अच्छे-बुरे मेल प्राप्त हुए, जिसका जिक्र मैंने तीसरी पोस्ट “सोनिया गाँधी की पोस्ट पर उठते सवाल-जवाब” में किया था। और जैसा कि मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूँ, कि मेरी सोनिया गाँधी से कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं है और ना ही मुझे इस बात का कोई मुगालता है कि मैं कोई बहुत बड़ा “शोधक” हूँ, फ़िर भी सोनिया भक्तों (इसे कॉंग्रेस भक्तों भी पढ़ा जा सकता है) ने ईमेल-हमले लगातार जारी रखे। मैं उनसे सिर्फ़ एक-दो सवाल पूछना चाहता था (लेकिन Anonymous मेल होने के कारण पूछ ना सका), कि इतना हल्ला मचाने वाले ये लोग जानते हैं कि सोनिया गाँधी का जन्म कहाँ हुआ? उनकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ और कितनी हुई? उनकी पृष्ठभूमि क्या है? वे किस परिवार से हैं? इसलिये डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित इस लेख का अनुवाद “सोनिया गाँधी, भाग-३” के रूप में पेश करना मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ (क्योंकि कई लोगों ने मुझे ईमेल से जवाब देने का मौका नहीं दिया)। बहरहाल, पेश है डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित एक विस्तृत लेख का हिन्दी अनुवाद, जिसमें इनमें से कई प्रश्नों के जवाब मिलते हैं (और आज तक न तो सोनिया गाँधी द्वारा अथवा कॉंग्रेस भक्तों द्वारा डॉ. स्वामी पर कोई “मानहानि” (!) का मुकदमा दायर किया गया है)

“मेरा (मतलब डॉ.स्वामी का) सोनिया गाँधी का विरोध सिर्फ़ इसी बात को लेकर नहीं है कि उनका जन्म इटली में हुआ है, क्योंकि यह कोई मुद्दा नहीं है, बल्कि इटली सहित किसी और देश में विदेशी मूल की बात का फ़ैसला वहाँ के न्यायालयों ने किया हुआ है, कि सर्वोच्च और महत्वपूर्ण पदों पर विदेशी मूल का व्यक्ति नहीं पदासीन हो सकता, लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है। 17 मई 2004 को 12.45 पर राष्ट्रपति ने मुझे मिलने का समय दिया था, उसी समय मैंने उनसे कहा था कि यदि सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री बनती हैं तो मैं इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दूँगा, और “रजिस्ट्रेशन” द्वारा नागरिकता हासिल किये जाने के कारण उसे रद्द किया भी जा सकता है।

भारतीय नागरिकों को सोनिया की पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी हासिल करना बेहद मुश्किल बात है, क्योंकि इटली के जन्म के कारण और वहाँ की भाषाई समस्याओं के कारण किसी पत्रकार के लिये भी यह मुश्किल ही है (भारत में पैदा हुए नेताओं की पृष्ठभूमि के बारे में हम कितना जानते हैं?) लेकिन नागरिकों को जानने का अधिकार तो है ही। सोनिया के बारे में तमाम जानकारी उन्हीं के द्वारा अथवा काँग्रेस के विभिन्न मुखपत्रों में जारी की हुई सामग्री पर आधारित है, जिसमें तीन झूठ साफ़ तौर पर पकड़ में आते हैं।

पहला झूठ – सोनिया गाँधी का असली नाम “सोनिया” नहीं बल्कि “ऎंटोनिया” है, यह बात इटली के राजदूत ने 27 अप्रैल 1983 को लिखे पत्र में स्वीकार की है, यह पत्र गृह मंत्रालय नें अपनी मर्जी से कभी सार्वजनिक नहीं किया। “एंटॊनिया” नाम सोनिया गाँधी के जन्म प्रमाणपत्र में अंकित है। सोनिया गाँधी को “सोनिया” नाम उनके पिता स्व.स्टेफ़ानो माईनो ने दिया था। स्टीफ़ानो माइनो द्वितीय विश्व युद्ध के वक्त रूस में युद्ध बन्दी थे। स्टीफ़ानो ने एक कार्यकर्ता के तौर पर “नाजी” सेना में काम किया था, जैसा कि कई इटालियन फ़ासिस्टों ने किया था। “सोनिया” एक रूसी नाम है न कि इटालियन। रूस में बिताये जेल के लम्हों में सोनिया के पिता धीरे-धीरे रूस समर्थक बन गये थे, खासकर तब जबकि उन समेत इटली के सभी “फ़ासिस्टों” की सम्पत्ति अमेरिकी सेनाओं द्वारा नष्ट या जब्त कर ली गई थी।

दूसरा झूठ – उनका जन्म इटली के लूसियाना में हुआ, ना कि जैसा उन्होंने संसद में दिये अपने शपथ पत्र में उल्लेख किया है कि “उनका जन्म ओरबेस्सानो में हुआ”। शायद वे अपना जन्म स्थान “लूसियाना” छुपाना चाहती हैं, क्योंकि इससे उनके पिता के नाजियों और मुसोलिनी से सम्बन्ध उजागर होते हैं, जबकि उनका परिवार लगातार नाजियों और फ़ासिस्टों के सम्पर्क में रहा, युद्ध समाप्ति के पश्चात भी। लूसियाना नाजियों के नेटवर्क का मुख्य केन्द्र था और यह इटली-स्विस सीमा पर स्थित है। इस झूठ का कोई औचित्य नजर नहीं आता और ना ही आज तक उनकी तरफ़ से इसका कोई स्पष्टीकरण दिया गया है।

तीसरा झूठ – सोनिया गाँधी का आधिकारिक शिक्षण हाई स्कूल से अधिक नहीं हुआ है। लेकिन उन्होंने रायबरेली के 2004 लोकसभा चुनाव में एक शपथ पत्र में कहा है कि उन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में डिप्लोमा किया हुआ है। यही झूठ बात उन्होंने सन 1999 में लोकसभा में अपने परिचय पत्र में कही थी, जो कि लोकसभा द्वारा “हू इज़ हू” के नाम से प्रकाशित की जाती है। बाद में जब मैंने लोकसभा के स्पीकर को लिखित शिकायत की, कि यह घोर अनैतिकता भरा कदम है, तब उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसा “टाईपिंग” की गलती की वजह से हुआ (ऐसा “टायपिंग मिस्टेक” तो गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड़्स में शामिल होने लायक है)। सच्चाई तो यह है कि सोनिया ने कॉलेज का मुँह तक नहीं देखा है। वे जिआवेनो स्थित एक कैथोलिक स्कूल जिसका नाम “मारिया ऑसिलियाट्रिस” में पढने जाती थीं (यह स्कूल उनके तथाकथित जन्म स्थान ओरबेस्सानो से 15 किमी दूर स्थित है)। गरीबी के कारण बहुत सी इटालियन लड़कियाँ उन दिनों ऐसी मिशनरी में पढने जाया करती थीं, और उनमें से बहुतों को अमेरिका में सफ़ाई कर्मचारी, वेटर आदि के कामों की नौकरी मिल जाती थी। उन दिनों माइनो परिवार बहुत गरीब हो गया था। सोनिया के पिता एक मेसन और माँ एक खेतिहर मजदूर के रूप में काम करती थीं (अब इस परिवार की सम्पत्ति करोड़ों की हो गई है!)। फ़िर सोनिया इंग्लैंड स्थित केम्ब्रिज कस्बे के “लेन्नॉक्स स्कूल” में अंग्रेजी पढने गईं, ताकि उन्हें थोड़ा सम्मानजनक काम मिल जाये। यह है उनका कुल “शिक्षण”, लेकिन भारतीय समाज को बेवकूफ़ बनाने के लिये उन्होंने संसद में झूठा बयान दिया (जो कि नैतिकता का उल्लंघन भी है) और चुनाव में झूठा शपथ पत्र भी, जो कि भारतीय दंड संहिता के अनुसार अपराध भी है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार प्रत्याशी को उसकी सम्पत्ति और शिक्षा के बारे में सही-सही जानकारी देना आवश्यक है। इन तीन झूठों से साबित होता है कि सोनिया गाँधी कुछ “छिपाना” चाहती हैं, या उनका कोई छुपा हुआ कार्यक्रम है जो किसी और मकसद से है, जाहिर है कि उनके बारे में और जानकारी जुटाना आवश्यक है।

कुमारी सोनिया गाँधी अच्छी अंग्रेजी से अवगत होने के लिये केम्ब्रिज कस्बे के वार्सिटी रेस्टोरेंट में काम करने लगीं, वहीं उनकी मुलाकात 1965 में राजीव गाँधी से पहली बार हुई। राजीव उस यूनिवर्सिटी में छात्र थे और पढ़ाई मे कुछ खास नहीं थे, इसलिये राजीव 1966 में लन्दन चले गये जहाँ उन्होंने इम्पीरियल इंजीनियरिंग कॉलेज में थोड़ी शिक्षा ग्रहण की। सोनिया भी लन्दन चली गईं जहाँ उन्हें एक पाकिस्तानी सलमान थसीर के यहाँ नौकरी मिल गई। सलमान थसीर साहब का अधिकतर बिजनेस दुबई से संचालित होता था, लेकिन वे अधिकतर समय लन्दन में ही डटे रहते थे। इस नौकरी में सोनिया गाँधी ने अच्छा पैसा कमाया, कम से कम इतना तो कमाया ही कि वे राजीव गाँधी की आर्थिक मदद कर सकें, जिनके “खर्चे” बढते ही जा रहे थे (इन्दिरा गाँधी भी उनके उन खर्चों से काफ़ी नाराज थीं और ऐसा उन्होंने खुद मुझे बताया था जब मेरी मुलाकात ब्रांडेस विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में उनसे हुई थी और उस वक्त मैं हार्वर्ड में वाणिज्य का प्रोफ़ेसर लगा ही था)। संजय गाँधी को लिखे राजीव गाँधी के पत्रों से यह स्पष्ट था कि राजीव, सोनिया के आर्थिक कर्जे में फ़ँसे हुए थे और राजीव ने संजय से मदद की गुहार की थी, क्योंकि संजय उनके कर्जों को निपटाने में सक्षम(?) थे। उस दौरान राजीव अकेले सोनिया गाँधी के मित्र नहीं थे, माधवराव सिंधिया और एक जर्मन स्टीगलर उनके अंतरंग मित्रों में से एक थे। माधवराव से उनकी दोस्ती राजीव से शादी के बाद भी जारी रही।

बहुत कम लोगों को यह पता है कि 1982 में एक रात को दो बजे माधवराव की कार का एक्सीडेंट आईआईटी दिल्ली के गेट के सामने हुआ था, और उस समय कार में दूसरी सवारी थीं सोनिया गाँधी। दोनों को बहुत चोटें आई थीं, आईआईटी के एक छात्र ने उनकी मदद की, कार से बाहर निकाला, एक ऑटो रिक्शा में सोनिया को इंदिरा गाँधी के यहाँ भेजा गया, क्योंकि अस्पताल ले जाने पर कई तरह से प्रश्न हो सकते थे, जबकि माधवराव सिन्धिया अपनी टूटी टाँग लिये बाद में अकेले अस्पताल गये। जब परिदृश्य से सोनिया पूरी तरह गायब हो गईं तब दिल्ली पुलिस ने अपनी भूमिका शुरु की। बाद के वर्षों में माधवराव सिंधिया सोनिया के आलोचक बन गये थे और मित्रों के बीच उनके बारे में “कई बातें” करने लगे थे। यह बड़े आश्चर्य और शर्म की बात है कि 2001 में माधवराव की मृत्यु और उनके विमान दुर्घटना की कोई गहन जाँच नहीं हुई, जबकि उसी विमान से मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी जाने वाले थे और उन्हें आखिरी समय पर सिंधिया के साथ न जाने की सलाह दी गई थी।

राजीव गाँधी और सोनिया का विवाह ओर्बेस्सानो में एक चर्च में हुआ था, हालांकि यह उनका व्यक्तिगत लेकिन विवादास्पद मामला है और जनता को इससे कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन जनता का जिस बात से सरोकार है वह है इन्दिरा गाँधी द्वारा उनका वैदिक रीति से पुनः विवाह करवाना, ताकि भारत की भोली जनता को बहलाया जा सके, और यह सब हुआ था एक सोवियत प्रेमी अधिकारी टी.एन.कौल की सलाह पर, जिन्होंने यह कहकर इन्दिरा गाँधी को इस बात के लिये मनाया कि “सोवियत संघ के साथ रिश्तों को मजबूत करने के लिये यह जरूरी है”, अब प्रश्न उठता है कि कौल को ऐसा कहने के लिये किसने उकसाया?

जब भारतीय प्रधानमंत्री का बेटा लन्दन में एक लड़की से प्रेम करने में लगा हो, तो भला रूसी खुफ़िया एजेंसी “केजीबी” भला चुप कैसे रह सकती थी, जबकि भारत-सोवियत रिश्ते बहुत मधुर हों, और सोनिया उस स्टीफ़ानो की पुत्री हों जो कि सोवियत भक्त बन चुका हो। इसलिये सोनिया का राजीव से विवाह भारत-सोवियत सम्बन्धों और केजीबी के हित में ही था। राजीव से शादी के बाद माइनो परिवार के सोवियत संघ से सम्बन्ध और भी मजबूत हुए और कई सौदों में उन्हें दलाली की रकम अदा की गई । डॉ.येवेग्निया अल्बाट्स (पीएच.डी. हार्वर्ड) एक ख्यात रूसी लेखिका और पत्रकार हैं, वे बोरिस येल्तसिन द्वारा सन 1991 में गठित एक आयोग की सदस्या थीं, ने अपनी पुस्तक “द स्टेट विदिन अ स्टेट : द केजीबी इन सोवियत यूनियन” में कई दस्तावेजों का उल्लेख किया है, और इन दस्तावेजों को भारत सरकार जब चाहे एक आवेदन देकर देख सकती है। रूसी सरकार ने सन 1992 में डॉ. अल्बाट्स के इन रहस्योद्घाटनों को स्वीकार किया, जो कि “हिन्दू” में 1992 में प्रकाशित हो चुका है । उस प्रवक्ता ने यह भी कहा कि “सोवियत आदर्शों और सिद्धांतों को बढावा देने के लिये” इस प्रकार का पैसा माइनो और कांग्रेस प्रत्याशियों को चुनावों के दौरान दिया जाता रहा है । 1991 में रूस के विघटन के पश्चात जब रूस आर्थिक भंवर में फ़ँस गया तब सोनिया गाँधी का पैसे का यह स्रोत सूख गया और सोनिया ने रूस से मुँह मोड़ना शुरु कर दिया। मनमोहन सिंह के सत्ता में आते ही रूस के वर्तमान राष्ट्रपति पुतिन (जो कि घुटे हुए केजीबी जासूस रह चुके हैं) ने तत्काल दिल्ली में राजदूत के तौर पर अपना एक खास आदमी नियुक्त किया जो सोनिया के इतिहास और उनके परिवार के रूसी सम्बन्धों के बारे में सब कुछ जानता था। अब फ़िलहाल जो सरकार है वह सोनिया ही चला रही हैं यह बात जब भारत में ही सब जानते हैं तो विदेशी जासूस कोई मूर्ख तो नहीं हैं, इसलिये उस राजदूत के जरिये भारत-रूस सम्बन्ध अब एक नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। हम भारतवासी रूस से प्रगाढ़ मैत्री चाहते हैं, रूस ने जब-तब हमारी मदद भी की है, लेकिन क्या सिर्फ़ इसीलिये हमें उन लोगों को स्वीकार कर लेना चाहिये जो रूसी खुफ़िया एजेंसी से जुड़े रहे हों? अमेरिका में भी किसी अधिकारी को इसराइल के लिये जासूसी करते हुए बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, भले ही अमेरिका के इसराइल से कितने ही मधुर सम्बन्ध हों। सम्बन्ध अपनी जगह हैं और राष्ट्रहित अलग बात है। दिसम्बर 2001 में मैने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर करके सभी दस्तावेज प्रस्तुत कर, केजीबी और सोनिया के सम्बन्धों की सीबीआई द्वारा जाँच की माँग की थी, जिसे वाजपेयी सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया। इससे पहले तत्कालीन राज्य मंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया ने 3 मार्च 2001 को इस केस की सीबीआई जाँच के आदेश दे दिये थे, लेकिन कांग्रेसियों द्वारा इस मुद्दे पर संसद में हल्ला-गुल्ला करने और कार्रवाई ठप करने के कारण वाजपेयी ने वसुन्धरा का वह आदेश खारिज कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2002 में सीबीआई को रूसी सम्बन्धों के बारे में जाँच करने के आदेश दिये। सीबीआई ने दो वर्ष तक “जाँच” (?) करने के बाद “बिना एफ़आईआर दर्ज किये” कोर्ट को यह बताया कि सोनिया और रूसियों में कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन सीबीआई को FIR दर्ज करने से किसने रोका, वाजपेयी सरकार ने, क्यों? यह आज तक रहस्य ही है। इस केस की अगली सुनवाई होने वाली है, लेकिन अब सोनिया “निर्देशक” की भूमिका में आ चुकी हैं और सीबीआई से किसी स्वतन्त्र कार्य की उम्मीद करना बेकार है।
………… जारी ….. है (भाग-४ शीघ्र ही), जिसमें हम पायेंगे कई अनसुलझे और बेचैन करने वाले प्रश्न…. तब तक प्रिय आलोचकों, “मेरा मेल बॉक्स खुला है खुला ही रहेगा, तुम्हारे लिये…”

, , , , ,

आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं (भाग-३)

Do You Know Sonia Gandhi? (Part-3)
(इस भाग में – सोनिया गाँधी का जन्म, उनका पारिवारिक इतिहास, उनके सम्बन्ध, उनके झूठ, उनके द्वारा कानून से खिलवाड़ आदि शामिल हैं)
सोनिया गाँधी से सम्बन्धित पिछले दोनों अनुवादों में हमने सोनिया गाँधी के बारे में काफ़ी कुछ जाना (क्या वाकई?) लेकिन जितना जाना उतने ही प्रश्न दिमागों में उठते गये। उन दोनो पोस्टों पर मुझे ब्लॉग पर और व्यक्तिगत रूप से कई अच्छे-बुरे मेल प्राप्त हुए, जिसका जिक्र मैंने तीसरी पोस्ट “सोनिया गाँधी की पोस्ट पर उठते सवाल-जवाब” में किया था। और जैसा कि मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूँ, कि मेरी सोनिया गाँधी से कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं है और ना ही मुझे इस बात का कोई मुगालता है कि मैं कोई बहुत बड़ा “शोधक” हूँ, फ़िर भी सोनिया भक्तों (इसे कॉंग्रेस भक्तों भी पढ़ा जा सकता है) ने ईमेल-हमले लगातार जारी रखे। मैं उनसे सिर्फ़ एक-दो सवाल पूछना चाहता था (लेकिन Anonymous मेल होने के कारण पूछ ना सका), कि इतना हल्ला मचाने वाले ये लोग जानते हैं कि सोनिया गाँधी का जन्म कहाँ हुआ? उनकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ और कितनी हुई? उनकी पृष्ठभूमि क्या है? वे किस परिवार से हैं? इसलिये डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित इस लेख का अनुवाद “सोनिया गाँधी, भाग-३” के रूप में पेश करना मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ (क्योंकि कई लोगों ने मुझे ईमेल से जवाब देने का मौका नहीं दिया)। बहरहाल, पेश है डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित एक विस्तृत लेख का हिन्दी अनुवाद, जिसमें इनमें से कई प्रश्नों के जवाब मिलते हैं (और आज तक न तो सोनिया गाँधी द्वारा अथवा कॉंग्रेस भक्तों द्वारा डॉ. स्वामी पर कोई “मानहानि” (!) का मुकदमा दायर किया गया है)

“मेरा (मतलब डॉ.स्वामी का) सोनिया गाँधी का विरोध सिर्फ़ इसी बात को लेकर नहीं है कि उनका जन्म इटली में हुआ है, क्योंकि यह कोई मुद्दा नहीं है, बल्कि इटली सहित किसी और देश में विदेशी मूल की बात का फ़ैसला वहाँ के न्यायालयों ने किया हुआ है, कि सर्वोच्च और महत्वपूर्ण पदों पर विदेशी मूल का व्यक्ति नहीं पदासीन हो सकता, लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है। 17 मई 2004 को 12.45 पर राष्ट्रपति ने मुझे मिलने का समय दिया था, उसी समय मैंने उनसे कहा था कि यदि सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री बनती हैं तो मैं इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दूँगा, और “रजिस्ट्रेशन” द्वारा नागरिकता हासिल किये जाने के कारण उसे रद्द किया भी जा सकता है।

भारतीय नागरिकों को सोनिया की पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी हासिल करना बेहद मुश्किल बात है, क्योंकि इटली के जन्म के कारण और वहाँ की भाषाई समस्याओं के कारण किसी पत्रकार के लिये भी यह मुश्किल ही है (भारत में पैदा हुए नेताओं की पृष्ठभूमि के बारे में हम कितना जानते हैं?) लेकिन नागरिकों को जानने का अधिकार तो है ही। सोनिया के बारे में तमाम जानकारी उन्हीं के द्वारा अथवा काँग्रेस के विभिन्न मुखपत्रों में जारी की हुई सामग्री पर आधारित है, जिसमें तीन झूठ साफ़ तौर पर पकड़ में आते हैं।

पहला झूठ – सोनिया गाँधी का असली नाम “सोनिया” नहीं बल्कि “ऎंटोनिया” है, यह बात इटली के राजदूत ने 27 अप्रैल 1983 को लिखे पत्र में स्वीकार की है, यह पत्र गृह मंत्रालय नें अपनी मर्जी से कभी सार्वजनिक नहीं किया। “एंटॊनिया” नाम सोनिया गाँधी के जन्म प्रमाणपत्र में अंकित है। सोनिया गाँधी को “सोनिया” नाम उनके पिता स्व.स्टेफ़ानो माईनो ने दिया था। स्टीफ़ानो माइनो द्वितीय विश्व युद्ध के वक्त रूस में युद्ध बन्दी थे। स्टीफ़ानो ने एक कार्यकर्ता के तौर पर “नाजी” सेना में काम किया था, जैसा कि कई इटालियन फ़ासिस्टों ने किया था। “सोनिया” एक रूसी नाम है न कि इटालियन। रूस में बिताये जेल के लम्हों में सोनिया के पिता धीरे-धीरे रूस समर्थक बन गये थे, खासकर तब जबकि उन समेत इटली के सभी “फ़ासिस्टों” की सम्पत्ति अमेरिकी सेनाओं द्वारा नष्ट या जब्त कर ली गई थी।

दूसरा झूठ – उनका जन्म इटली के लूसियाना में हुआ, ना कि जैसा उन्होंने संसद में दिये अपने शपथ पत्र में उल्लेख किया है कि “उनका जन्म ओरबेस्सानो में हुआ”। शायद वे अपना जन्म स्थान “लूसियाना” छुपाना चाहती हैं, क्योंकि इससे उनके पिता के नाजियों और मुसोलिनी से सम्बन्ध उजागर होते हैं, जबकि उनका परिवार लगातार नाजियों और फ़ासिस्टों के सम्पर्क में रहा, युद्ध समाप्ति के पश्चात भी। लूसियाना नाजियों के नेटवर्क का मुख्य केन्द्र था और यह इटली-स्विस सीमा पर स्थित है। इस झूठ का कोई औचित्य नजर नहीं आता और ना ही आज तक उनकी तरफ़ से इसका कोई स्पष्टीकरण दिया गया है।

तीसरा झूठ – सोनिया गाँधी का आधिकारिक शिक्षण हाई स्कूल से अधिक नहीं हुआ है। लेकिन उन्होंने रायबरेली के 2004 लोकसभा चुनाव में एक शपथ पत्र में कहा है कि उन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में डिप्लोमा किया हुआ है। यही झूठ बात उन्होंने सन 1999 में लोकसभा में अपने परिचय पत्र में कही थी, जो कि लोकसभा द्वारा “हू इज़ हू” के नाम से प्रकाशित की जाती है। बाद में जब मैंने लोकसभा के स्पीकर को लिखित शिकायत की, कि यह घोर अनैतिकता भरा कदम है, तब उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसा “टाईपिंग” की गलती की वजह से हुआ (ऐसा “टायपिंग मिस्टेक” तो गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड़्स में शामिल होने लायक है)। सच्चाई तो यह है कि सोनिया ने कॉलेज का मुँह तक नहीं देखा है। वे जिआवेनो स्थित एक कैथोलिक स्कूल जिसका नाम “मारिया ऑसिलियाट्रिस” में पढने जाती थीं (यह स्कूल उनके तथाकथित जन्म स्थान ओरबेस्सानो से 15 किमी दूर स्थित है)। गरीबी के कारण बहुत सी इटालियन लड़कियाँ उन दिनों ऐसी मिशनरी में पढने जाया करती थीं, और उनमें से बहुतों को अमेरिका में सफ़ाई कर्मचारी, वेटर आदि के कामों की नौकरी मिल जाती थी। उन दिनों माइनो परिवार बहुत गरीब हो गया था। सोनिया के पिता एक मेसन और माँ एक खेतिहर मजदूर के रूप में काम करती थीं (अब इस परिवार की सम्पत्ति करोड़ों की हो गई है!)। फ़िर सोनिया इंग्लैंड स्थित केम्ब्रिज कस्बे के “लेन्नॉक्स स्कूल” में अंग्रेजी पढने गईं, ताकि उन्हें थोड़ा सम्मानजनक काम मिल जाये। यह है उनका कुल “शिक्षण”, लेकिन भारतीय समाज को बेवकूफ़ बनाने के लिये उन्होंने संसद में झूठा बयान दिया (जो कि नैतिकता का उल्लंघन भी है) और चुनाव में झूठा शपथ पत्र भी, जो कि भारतीय दंड संहिता के अनुसार अपराध भी है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार प्रत्याशी को उसकी सम्पत्ति और शिक्षा के बारे में सही-सही जानकारी देना आवश्यक है। इन तीन झूठों से साबित होता है कि सोनिया गाँधी कुछ “छिपाना” चाहती हैं, या उनका कोई छुपा हुआ कार्यक्रम है जो किसी और मकसद से है, जाहिर है कि उनके बारे में और जानकारी जुटाना आवश्यक है।

कुमारी सोनिया गाँधी अच्छी अंग्रेजी से अवगत होने के लिये केम्ब्रिज कस्बे के वार्सिटी रेस्टोरेंट में काम करने लगीं, वहीं उनकी मुलाकात 1965 में राजीव गाँधी से पहली बार हुई। राजीव उस यूनिवर्सिटी में छात्र थे और पढ़ाई मे कुछ खास नहीं थे, इसलिये राजीव 1966 में लन्दन चले गये जहाँ उन्होंने इम्पीरियल इंजीनियरिंग कॉलेज में थोड़ी शिक्षा ग्रहण की। सोनिया भी लन्दन चली गईं जहाँ उन्हें एक पाकिस्तानी सलमान थसीर के यहाँ नौकरी मिल गई। सलमान थसीर साहब का अधिकतर बिजनेस दुबई से संचालित होता था, लेकिन वे अधिकतर समय लन्दन में ही डटे रहते थे। इस नौकरी में सोनिया गाँधी ने अच्छा पैसा कमाया, कम से कम इतना तो कमाया ही कि वे राजीव गाँधी की आर्थिक मदद कर सकें, जिनके “खर्चे” बढते ही जा रहे थे (इन्दिरा गाँधी भी उनके उन खर्चों से काफ़ी नाराज थीं और ऐसा उन्होंने खुद मुझे बताया था जब मेरी मुलाकात ब्रांडेस विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में उनसे हुई थी और उस वक्त मैं हार्वर्ड में वाणिज्य का प्रोफ़ेसर लगा ही था)। संजय गाँधी को लिखे राजीव गाँधी के पत्रों से यह स्पष्ट था कि राजीव, सोनिया के आर्थिक कर्जे में फ़ँसे हुए थे और राजीव ने संजय से मदद की गुहार की थी, क्योंकि संजय उनके कर्जों को निपटाने में सक्षम(?) थे। उस दौरान राजीव अकेले सोनिया गाँधी के मित्र नहीं थे, माधवराव सिंधिया और एक जर्मन स्टीगलर उनके अंतरंग मित्रों में से एक थे। माधवराव से उनकी दोस्ती राजीव से शादी के बाद भी जारी रही।

बहुत कम लोगों को यह पता है कि 1982 में एक रात को दो बजे माधवराव की कार का एक्सीडेंट आईआईटी दिल्ली के गेट के सामने हुआ था, और उस समय कार में दूसरी सवारी थीं सोनिया गाँधी। दोनों को बहुत चोटें आई थीं, आईआईटी के एक छात्र ने उनकी मदद की, कार से बाहर निकाला, एक ऑटो रिक्शा में सोनिया को इंदिरा गाँधी के यहाँ भेजा गया, क्योंकि अस्पताल ले जाने पर कई तरह से प्रश्न हो सकते थे, जबकि माधवराव सिन्धिया अपनी टूटी टाँग लिये बाद में अकेले अस्पताल गये। जब परिदृश्य से सोनिया पूरी तरह गायब हो गईं तब दिल्ली पुलिस ने अपनी भूमिका शुरु की। बाद के वर्षों में माधवराव सिंधिया सोनिया के आलोचक बन गये थे और मित्रों के बीच उनके बारे में “कई बातें” करने लगे थे। यह बड़े आश्चर्य और शर्म की बात है कि 2001 में माधवराव की मृत्यु और उनके विमान दुर्घटना की कोई गहन जाँच नहीं हुई, जबकि उसी विमान से मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी जाने वाले थे और उन्हें आखिरी समय पर सिंधिया के साथ न जाने की सलाह दी गई थी।

राजीव गाँधी और सोनिया का विवाह ओर्बेस्सानो में एक चर्च में हुआ था, हालांकि यह उनका व्यक्तिगत लेकिन विवादास्पद मामला है और जनता को इससे कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन जनता का जिस बात से सरोकार है वह है इन्दिरा गाँधी द्वारा उनका वैदिक रीति से पुनः विवाह करवाना, ताकि भारत की भोली जनता को बहलाया जा सके, और यह सब हुआ था एक सोवियत प्रेमी अधिकारी टी.एन.कौल की सलाह पर, जिन्होंने यह कहकर इन्दिरा गाँधी को इस बात के लिये मनाया कि “सोवियत संघ के साथ रिश्तों को मजबूत करने के लिये यह जरूरी है”, अब प्रश्न उठता है कि कौल को ऐसा कहने के लिये किसने उकसाया?

जब भारतीय प्रधानमंत्री का बेटा लन्दन में एक लड़की से प्रेम करने में लगा हो, तो भला रूसी खुफ़िया एजेंसी “केजीबी” भला चुप कैसे रह सकती थी, जबकि भारत-सोवियत रिश्ते बहुत मधुर हों, और सोनिया उस स्टीफ़ानो की पुत्री हों जो कि सोवियत भक्त बन चुका हो। इसलिये सोनिया का राजीव से विवाह भारत-सोवियत सम्बन्धों और केजीबी के हित में ही था। राजीव से शादी के बाद माइनो परिवार के सोवियत संघ से सम्बन्ध और भी मजबूत हुए और कई सौदों में उन्हें दलाली की रकम अदा की गई । डॉ.येवेग्निया अल्बाट्स (पीएच.डी. हार्वर्ड) एक ख्यात रूसी लेखिका और पत्रकार हैं, वे बोरिस येल्तसिन द्वारा सन 1991 में गठित एक आयोग की सदस्या थीं, ने अपनी पुस्तक “द स्टेट विदिन अ स्टेट : द केजीबी इन सोवियत यूनियन” में कई दस्तावेजों का उल्लेख किया है, और इन दस्तावेजों को भारत सरकार जब चाहे एक आवेदन देकर देख सकती है। रूसी सरकार ने सन 1992 में डॉ. अल्बाट्स के इन रहस्योद्घाटनों को स्वीकार किया, जो कि “हिन्दू” में 1992 में प्रकाशित हो चुका है । उस प्रवक्ता ने यह भी कहा कि “सोवियत आदर्शों और सिद्धांतों को बढावा देने के लिये” इस प्रकार का पैसा माइनो और कांग्रेस प्रत्याशियों को चुनावों के दौरान दिया जाता रहा है । 1991 में रूस के विघटन के पश्चात जब रूस आर्थिक भंवर में फ़ँस गया तब सोनिया गाँधी का पैसे का यह स्रोत सूख गया और सोनिया ने रूस से मुँह मोड़ना शुरु कर दिया। मनमोहन सिंह के सत्ता में आते ही रूस के वर्तमान राष्ट्रपति पुतिन (जो कि घुटे हुए केजीबी जासूस रह चुके हैं) ने तत्काल दिल्ली में राजदूत के तौर पर अपना एक खास आदमी नियुक्त किया जो सोनिया के इतिहास और उनके परिवार के रूसी सम्बन्धों के बारे में सब कुछ जानता था। अब फ़िलहाल जो सरकार है वह सोनिया ही चला रही हैं यह बात जब भारत में ही सब जानते हैं तो विदेशी जासूस कोई मूर्ख तो नहीं हैं, इसलिये उस राजदूत के जरिये भारत-रूस सम्बन्ध अब एक नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। हम भारतवासी रूस से प्रगाढ़ मैत्री चाहते हैं, रूस ने जब-तब हमारी मदद भी की है, लेकिन क्या सिर्फ़ इसीलिये हमें उन लोगों को स्वीकार कर लेना चाहिये जो रूसी खुफ़िया एजेंसी से जुड़े रहे हों? अमेरिका में भी किसी अधिकारी को इसराइल के लिये जासूसी करते हुए बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, भले ही अमेरिका के इसराइल से कितने ही मधुर सम्बन्ध हों। सम्बन्ध अपनी जगह हैं और राष्ट्रहित अलग बात है। दिसम्बर 2001 में मैने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर करके सभी दस्तावेज प्रस्तुत कर, केजीबी और सोनिया के सम्बन्धों की सीबीआई द्वारा जाँच की माँग की थी, जिसे वाजपेयी सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया। इससे पहले तत्कालीन राज्य मंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया ने 3 मार्च 2001 को इस केस की सीबीआई जाँच के आदेश दे दिये थे, लेकिन कांग्रेसियों द्वारा इस मुद्दे पर संसद में हल्ला-गुल्ला करने और कार्रवाई ठप करने के कारण वाजपेयी ने वसुन्धरा का वह आदेश खारिज कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2002 में सीबीआई को रूसी सम्बन्धों के बारे में जाँच करने के आदेश दिये। सीबीआई ने दो वर्ष तक “जाँच” (?) करने के बाद “बिना एफ़आईआर दर्ज किये” कोर्ट को यह बताया कि सोनिया और रूसियों में कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन सीबीआई को FIR दर्ज करने से किसने रोका, वाजपेयी सरकार ने, क्यों? यह आज तक रहस्य ही है। इस केस की अगली सुनवाई होने वाली है, लेकिन अब सोनिया “निर्देशक” की भूमिका में आ चुकी हैं और सीबीआई से किसी स्वतन्त्र कार्य की उम्मीद करना बेकार है।
………… जारी ….. है (भाग-४ शीघ्र ही), जिसमें हम पायेंगे कई अनसुलझे और बेचैन करने वाले प्रश्न…. तब तक प्रिय आलोचकों, “मेरा मेल बॉक्स खुला है खुला ही रहेगा, तुम्हारे लिये…”

, , , , ,

>अन्न्पूर्णाजी की फरमाईश पर सरस्वतीदेवी का दुर्लभ गाना

>मैं तो बम्बई से दुल्हन लाया रे।

महफिल की पहली कड़ी में अन्नपूर्णा जी ने फरमाईश की थी कि उन्हें सरस्वती देवी का गाना सुनाया जाये। अन्नपूर्णाजी ने बताया था कि सरस्वती देवी पहली महिला संगीतकार थी। जी यह बात बिल्कुल सही है; परन्तु आपने जिस गाने का जिक्र किया ” चल चल रे नौजवान” यह फिल्म बंधन का है और इस फिल्म का संगीत सरस्वती देवी और राम चन्द्र पाल दोनों ने ही दिया था परन्तु चल चल रे का संगीत रामचन्द्र पाल ने दिया था।

सरस्वती देवी ने बहुत सी फिल्मों में संगीत दिया था, उनमें से प्रमुख है अछूत कन्या, झूला, बंधन , कंगन, नया संसार, जीवन नैया आदि प्रमुख है।

चल चल रे नौजवान तो जाना माना गाना है, लगभग यह गाना हम अक्सर रेडियो और टीवी पर सुनते हैं, पर मेरी कोशिश रहती है कि आपको दुर्लभ गाना सुनाऊं। आज इस कड़ी में आपके लिये प्रस्तुत कर रहा हूँ झूला फिल्म का गाना – मैं तो बम्बई से दुल्हन लाया रे ए बाबूजी। आशा है अन्न्पूर्णा जी को यह गाना पसन्द आयेगा।

अगली कड़ियों में सरस्वती देवी के एक ऐसा गाने को सुनाने का प्रयास करूंगा जिसके संगीत से प्रेरणा ( या नकल ? ) ले कर राहुल देव बर्मन ने पड़ोसन फिल्म के एक चतुर नार, कर के सिंगार… की रचना की थी, और किशोर दा के इस गाये इस गाने ने धूम मचा दी थी और आज तक यह गाना, हिन्दी के सबसे हिट गानों में से एक माना जाता है।

आज जो गाना मैं सुना रहा हूँ वह फिल्म झूला 1941 का है और इसे अशोक कुमार तथा रहमत बानो ने गाया है। सबसे पहले गीत के बोल और बाद में गाना। गाना बहुत पुराना है और उस जमाने में साऊंड प्रूफ रिकार्डिंग स्टूडियो नहीं होती थी, अत: हो सकता है गाने की क्वालिटी आपको उतनी अच्छी ना लगे, पर गाना आपको जरूर पसन्द आयेगा।

अ. कु. – मैं तो दिल्ली से दुलहन लाया रे ऐ बाबू जी -२
र. बा. – मेरा बम्बई से बालम आया रे ऐ बाबू जी -२
अ. कु.- मैं तो दिल्ली से दुलहन लाया रे ऐ बाबू जी

अ. कु. -बीवी मेरी नाज़ुक
र. बा. – सजन अलबेला -२
दोनों- नये ज़माने के मजनूं ओ लैला -२
सोने में सुहागा मिलाया रे ऐ बाबू जी-२

र. बा.- बाबू जी मैं हूँ सौदागर की छोरी -२
हाय सैंया ने कर ली मेरे धन की चोरी
अ. कु. – हें चोरी कैसी चोरी
र. बा.- इनने गुपचुप – इनने गुपचुप मेरा दिल चुराया रे ऐ बाबू जी -२
मेरा बम्बई से बालम आया रे ऐ बाबू जी

अ. कु. – बाबू जी इतनी अरज सुनो मोरी -२
अरे मैने कल ही तो दिल्ली में
इसके बाप का करजा चुकाया रे ऐ बाबू जी -२

र. बा.- मेरे बाप का नाम न लेना झूठों के सरदार
वरना ताना दूँगी गाली बीस हज़ार
देखो – देखो जी, देखो-देखो जी हज़ार
हमको छेड़ो ना बेकार
वरना मेरा भी गुस्सा सवाया रे ऐ बाबू जी -२

अ. कु. – प्यारी गुइयाँ आओ आओ सारी बातें भूल जाओ -२
र. बा. – बोलो मेरी क़सम,
अ. कु. – हाँ हाँ
र. बा. हाँ हाँ हाँ बोलों मेरी क़सम
अ. कु. हाँ हाँ तेरी क़सम
तेरे भाई की क़सम तेरी अम्मा की क़सम तेरे बाप की क़सम

दोनों- आज मौसम सलोना आया रे ऐ बाबू जी -२
आज मौसम सलोना – सलोना रे – हाँ सलोना रे
दिन सलोना रुत सलोनी मौसम सलोना रे
चमके चमाचम मेरे सपने -२ जैसे चांदी सोना रे
आज मौसम सलोना – सलोना रे
दिन सलोनी रुत सलोनी मौसम सलोना रे ..

http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://mahaphil.lifelogger.com/media/audio0/506447_ivorudmief_conv.flv&autoStart=false

मैं तो दिल्ली से दुल्हन लाया रे ए बाबूजी

Learn-Hindi, Hindi-Blogging, Hindi, Hindi-Blog, Old-Hindi-Songs, Hindi-Films-Song, Rare-Hindi-Songs, Hindi-Film-Sangeet, हिन्दी-खोज, हिन्दी-ब्लॉग, हिन्दी-चिट्ठाकारिता, सफल-हिन्दी-चिट्ठाकारिता, प्रसिद्ध-चिट्ठे, प्रसिद्ध-हिन्दी-चिट्ठे, चिट्ठा-प्रचार, चिट्ठा-प्रसार, जाल-प्रचार, जाल-सफलता, पुराने-हिन्दी-गाने, हिन्दी-फिल्म-संगीत,

अन्न्पूर्णाजी की फरमाईश पर सरस्वतीदेवी का दुर्लभ गाना

मैं तो बम्बई से दुल्हन लाया रे।

महफिल की पहली कड़ी में अन्नपूर्णा जी ने फरमाईश की थी कि उन्हें सरस्वती देवी का गाना सुनाया जाये। अन्नपूर्णाजी ने बताया था कि सरस्वती देवी पहली महिला संगीतकार थी। जी यह बात बिल्कुल सही है; परन्तु आपने जिस गाने का जिक्र किया ” चल चल रे नौजवान” यह फिल्म बंधन का है और इस फिल्म का संगीत सरस्वती देवी और राम चन्द्र पाल दोनों ने ही दिया था परन्तु चल चल रे का संगीत रामचन्द्र पाल ने दिया था।

सरस्वती देवी ने बहुत सी फिल्मों में संगीत दिया था, उनमें से प्रमुख है अछूत कन्या, झूला, बंधन , कंगन, नया संसार, जीवन नैया आदि प्रमुख है।

चल चल रे नौजवान तो जाना माना गाना है, लगभग यह गाना हम अक्सर रेडियो और टीवी पर सुनते हैं, पर मेरी कोशिश रहती है कि आपको दुर्लभ गाना सुनाऊं। आज इस कड़ी में आपके लिये प्रस्तुत कर रहा हूँ झूला फिल्म का गाना – मैं तो बम्बई से दुल्हन लाया रे ए बाबूजी। आशा है अन्न्पूर्णा जी को यह गाना पसन्द आयेगा।

अगली कड़ियों में सरस्वती देवी के एक ऐसा गाने को सुनाने का प्रयास करूंगा जिसके संगीत से प्रेरणा ( या नकल ? ) ले कर राहुल देव बर्मन ने पड़ोसन फिल्म के एक चतुर नार, कर के सिंगार… की रचना की थी, और किशोर दा के इस गाये इस गाने ने धूम मचा दी थी और आज तक यह गाना, हिन्दी के सबसे हिट गानों में से एक माना जाता है।

आज जो गाना मैं सुना रहा हूँ वह फिल्म झूला 1941 का है और इसे अशोक कुमार तथा रहमत बानो ने गाया है। सबसे पहले गीत के बोल और बाद में गाना। गाना बहुत पुराना है और उस जमाने में साऊंड प्रूफ रिकार्डिंग स्टूडियो नहीं होती थी, अत: हो सकता है गाने की क्वालिटी आपको उतनी अच्छी ना लगे, पर गाना आपको जरूर पसन्द आयेगा।

अ. कु. – मैं तो दिल्ली से दुलहन लाया रे ऐ बाबू जी -२
र. बा. – मेरा बम्बई से बालम आया रे ऐ बाबू जी -२
अ. कु.- मैं तो दिल्ली से दुलहन लाया रे ऐ बाबू जी

अ. कु. -बीवी मेरी नाज़ुक
र. बा. – सजन अलबेला -२
दोनों- नये ज़माने के मजनूं ओ लैला -२
सोने में सुहागा मिलाया रे ऐ बाबू जी-२

र. बा.- बाबू जी मैं हूँ सौदागर की छोरी -२
हाय सैंया ने कर ली मेरे धन की चोरी
अ. कु. – हें चोरी कैसी चोरी
र. बा.- इनने गुपचुप – इनने गुपचुप मेरा दिल चुराया रे ऐ बाबू जी -२
मेरा बम्बई से बालम आया रे ऐ बाबू जी

अ. कु. – बाबू जी इतनी अरज सुनो मोरी -२
अरे मैने कल ही तो दिल्ली में
इसके बाप का करजा चुकाया रे ऐ बाबू जी -२

र. बा.- मेरे बाप का नाम न लेना झूठों के सरदार
वरना ताना दूँगी गाली बीस हज़ार
देखो – देखो जी, देखो-देखो जी हज़ार
हमको छेड़ो ना बेकार
वरना मेरा भी गुस्सा सवाया रे ऐ बाबू जी -२

अ. कु. – प्यारी गुइयाँ आओ आओ सारी बातें भूल जाओ -२
र. बा. – बोलो मेरी क़सम,
अ. कु. – हाँ हाँ
र. बा. हाँ हाँ हाँ बोलों मेरी क़सम
अ. कु. हाँ हाँ तेरी क़सम
तेरे भाई की क़सम तेरी अम्मा की क़सम तेरे बाप की क़सम

दोनों- आज मौसम सलोना आया रे ऐ बाबू जी -२
आज मौसम सलोना – सलोना रे – हाँ सलोना रे
दिन सलोना रुत सलोनी मौसम सलोना रे
चमके चमाचम मेरे सपने -२ जैसे चांदी सोना रे
आज मौसम सलोना – सलोना रे
दिन सलोनी रुत सलोनी मौसम सलोना रे ..

मैं तो दिल्ली से दुल्हन लाया रे ए बाबूजी

Learn-Hindi, Hindi-Blogging, Hindi, Hindi-Blog, Old-Hindi-Songs, Hindi-Films-Song, Rare-Hindi-Songs, Hindi-Film-Sangeet, हिन्दी-खोज, हिन्दी-ब्लॉग, हिन्दी-चिट्ठाकारिता, सफल-हिन्दी-चिट्ठाकारिता, प्रसिद्ध-चिट्ठे, प्रसिद्ध-हिन्दी-चिट्ठे, चिट्ठा-प्रचार, चिट्ठा-प्रसार, जाल-प्रचार, जाल-सफलता, पुराने-हिन्दी-गाने, हिन्दी-फिल्म-संगीत,

>ज्युथिका रॉय का गाया एक गाना – चुपके चुपके बोल

>

महफिल के इस अंक में आज मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ एक ऐसी गायिका की आवाज में गाया हुआ एक गाना जिन्हें आधुनिक मीरां भी कहा जाता था, मैं बात कर रहा हूँ पदम श्री ज्यूथिका रॉय की ज्यूथिका रॉय जी ने बहुत से फिल्मी और गैर फिल्मी गाने गाये परन्तु वे सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हुई मीरां बाई के भजनों से। आपको इस महफिल के अगले अंको में ज्यूथिका जी के गाये मीरा के भजन भी सुनाये जायेंगे।

ज्यूथिका जी ने सात वर्ष की उम्र में गाना शुरु कर दिया था और मात्र १२ वर्ष की उम्र में तो उनका पहला भजन रिकार्ड भी हो चुका था। १५ अगस्त १९४७ को सुबह प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू की गाड़ियों का काफिला तीन मूर्ति भवन से लाल किला की और जाने के लिये निकल चुका था और आल इण्डिया रेडियो के स्टूडियो में ज्युथिका जी अपना गाना समाप्त कर चुकी थी , तभी पं जवाहर लाल नेहरू जी का एक संदेश वाहक दौड़ता हुआ आया और नेहरू जी का सदेश उन्हें दिया की जब तके वे लाल किला तक झंडारोहण करने नहीं पहुँच जाते तब तक गाना जारी रखा जाये और ज्यूथिका जी ने वापस गाना शुरु किया सोने का हिन्दुस्तान…( The Telegraph 10th December 2005)

यानि ज्यूथिका रॉय के प्रशंषकों में महात्मा गांधी से लेकर पंडित जवाहर लाल नेहरु तक थे। The Statesman के 6 अगस्त 2006 के अंक में अपनी महात्मा गांधी और सरोजिनी नाय़डू से मुलाकात का पूरा वर्णन किया है। अब ज्यादा ना लिखते हुए आपको सीधे गाने पर ले चलते हैं पहले गाने के बोल और बाद में गाना।

प्रस्तुत गाने का संगीत दिया है कमल दास गुप्ता ने,
और गाने में नायिका – मैना से चुप रह कर बोलने को कह कर अपने साजन की विरह व्यथा कह रही है। लीजिये इस मधुर गाने का आनन्द और टिप्प्णी से अवगत करायें कि आपको महफिल कैसी लगी?


चुपके चुपके बोल मैना, चुपके बोल
तू चुपके चुपके बोल , चुपके चुपके बोल
साजन कब घर आयेंगे
, मोरे साजन

मोरे साजन कब घर आयेंगे तू चुपके तू चूपकेतू चुपके चुपके बोल मैना, चुपके चुपके बोल


सोने की बिंदिया मोतियन माला, नथन(?) कब घर लायेंगे
तू चुपके तू चुपके
….

जरी की साड़ी, हाथ हाथ का कंगना कब मुझको पहनायेंगे
अपनी अपनी प्रेम की बतियाँ मिल जुल हम दोहरायेंगे
साजन कब घर आयेंगे
, तू चुपके

लुटी है भेद ये खुलने ना पाये ए मैना ,ना तेरे चेहरे(?)कोई रुलाये मैना
तू जानती है किस देस में वो साजन है
बता- बता दे मुझे चैन आये अ मैना
फिर ना बिसरने दूंगी उनको , चैन से दिन कट जायेंगे
साजन कब घर आयेंगे तू चुपके चुपके बोल

http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/note_player.swf
chupke chupke bol …


Learn-Hindi, Hindi-Blogging, Hindi, Hindi-Blog, Old-Hindi-Songs, Hindi-Films-Song, Rare-Hindi-Songs, Hindi-Film-Sangeet, हिन्दी-खोज, हिन्दी-ब्लॉग, हिन्दी-चिट्ठाकारिता, सफल-हिन्दी-चिट्ठाकारिता, प्रसिद्ध-चिट्ठे, प्रसिद्ध-हिन्दी-चिट्ठे, चिट्ठा-प्रचार, चिट्ठा-प्रसार, जाल-प्रचार, जाल-सफलता, पुराने-हिन्दी-गाने, हिन्दी-फिल्म-संगीत,

ज्युथिका रॉय का गाया एक गाना – चुपके चुपके बोल

महफिल के इस अंक में आज मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ एक ऐसी गायिका की आवाज में गाया हुआ एक गाना जिन्हें आधुनिक मीरां भी कहा जाता था, मैं बात कर रहा हूँ पदम श्री ज्यूथिका रॉय की ज्यूथिका रॉय जी ने बहुत से फिल्मी और गैर फिल्मी गाने गाये परन्तु वे सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हुई मीरां बाई के भजनों से। आपको इस महफिल के अगले अंको में ज्यूथिका जी के गाये मीरा के भजन भी सुनाये जायेंगे।

ज्यूथिका जी ने सात वर्ष की उम्र में गाना शुरु कर दिया था और मात्र १२ वर्ष की उम्र में तो उनका पहला भजन रिकार्ड भी हो चुका था। १५ अगस्त १९४७ को सुबह प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू की गाड़ियों का काफिला तीन मूर्ति भवन से लाल किला की और जाने के लिये निकल चुका था और आल इण्डिया रेडियो के स्टूडियो में ज्युथिका जी अपना गाना समाप्त कर चुकी थी , तभी पं जवाहर लाल नेहरू जी का एक संदेश वाहक दौड़ता हुआ आया और नेहरू जी का सदेश उन्हें दिया की जब तके वे लाल किला तक झंडारोहण करने नहीं पहुँच जाते तब तक गाना जारी रखा जाये और ज्यूथिका जी ने वापस गाना शुरु किया सोने का हिन्दुस्तान…( The Telegraph 10th December 2005)

यानि ज्यूथिका रॉय के प्रशंषकों में महात्मा गांधी से लेकर पंडित जवाहर लाल नेहरु तक थे। The Statesman के 6 अगस्त 2006 के अंक में अपनी महात्मा गांधी और सरोजिनी नाय़डू से मुलाकात का पूरा वर्णन किया है। अब ज्यादा ना लिखते हुए आपको सीधे गाने पर ले चलते हैं पहले गाने के बोल और बाद में गाना।

प्रस्तुत गाने का संगीत दिया है कमल दास गुप्ता ने,
और गाने में नायिका – मैना से चुप रह कर बोलने को कह कर अपने साजन की विरह व्यथा कह रही है। लीजिये इस मधुर गाने का आनन्द और टिप्प्णी से अवगत करायें कि आपको महफिल कैसी लगी?


चुपके चुपके बोल मैना, चुपके बोल
तू चुपके चुपके बोल , चुपके चुपके बोल
साजन कब घर आयेंगे
, मोरे साजन

मोरे साजन कब घर आयेंगे तू चुपके तू चूपकेतू चुपके चुपके बोल मैना, चुपके चुपके बोल


सोने की बिंदिया मोतियन माला, नथन(?) कब घर लायेंगे
तू चुपके तू चुपके
….

जरी की साड़ी, हाथ हाथ का कंगना कब मुझको पहनायेंगे
अपनी अपनी प्रेम की बतियाँ मिल जुल हम दोहरायेंगे
साजन कब घर आयेंगे
, तू चुपके

लुटी है भेद ये खुलने ना पाये ए मैना ,ना तेरे चेहरे(?)कोई रुलाये मैना
तू जानती है किस देस में वो साजन है
बता- बता दे मुझे चैन आये अ मैना
फिर ना बिसरने दूंगी उनको , चैन से दिन कट जायेंगे
साजन कब घर आयेंगे तू चुपके चुपके बोल

chupke chupke bol …


Learn-Hindi, Hindi-Blogging, Hindi, Hindi-Blog, Old-Hindi-Songs, Hindi-Films-Song, Rare-Hindi-Songs, Hindi-Film-Sangeet, हिन्दी-खोज, हिन्दी-ब्लॉग, हिन्दी-चिट्ठाकारिता, सफल-हिन्दी-चिट्ठाकारिता, प्रसिद्ध-चिट्ठे, प्रसिद्ध-हिन्दी-चिट्ठे, चिट्ठा-प्रचार, चिट्ठा-प्रसार, जाल-प्रचार, जाल-सफलता, पुराने-हिन्दी-गाने, हिन्दी-फिल्म-संगीत,

>एक दुर्लभ गाना पहाड़ी सान्याल/ कानन देवी की आवाज में

>
चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

नमस्ते मित्रों! गीत संगीत की महफिल में आपका स्वागत है। यह जाल स्थल उन लोगों के लिये बनाया गया है जिन्हें भारतीय भाषाओं के पुराने और दुर्लभ गाने पसन्द हैं। जिसमें नामी और अनामी गायकों के और फिल्मी गैर- फिल्मी गाने भी शामिल होंगे। यह जाल स्थल निर्माण करने में गिरिराज जोशी ने बहुत सहायता की अत: उनका धन्यवाद। आप भी इस जाल स्थल पर अगर इस तरह के दुर्लभ गाने लगाना चाहते हैं तो संपर्क करें। ( टिप्प्णी दें) ताकि आपको आमंत्रण भिजवाया जा सके।

इस महफ़िल के पहले अंक में एक बहुत ही दुर्लभ गाना प्रस्तुत कर रहे हैं।
पुराने गानों कभी प्रीलूड होता था जैसे आयेगा आने वाला से गाने से पहले खामोश है जमाना और एक मैं हूँ एक मेरी बेकसी की शाम है गाने से पहले जली जो शाखे चमन….। इस तरह कई गानों में पहले कुछ देर तक सिर्फ संगीत बजता था जैसे एक बंगला बने न्यारा। प्रस्तुत गाने में भी गाना शुरु होने से पहले कुछ देर तक संगीत ही बजता है और उसके बाद गायक गाना शुरु करते हैं।
जब तक आप गायकों की आवाज नहीं सुनेंगे विश्वास ही नहीं कर सकते कि यह गाना सन 1940 में बनी फिल्म का है। यानि एकदम पाश्चात्य संगीत सी धुन लगती है। कुछ हद तक यूं कहा जा सकता है कि हिन्दी फिल्म के गानों में पाश्चात्य संगीत का प्रभाव सबसे पहले आर सी बोराल ने शुरु किया।

प्रस्तुत गाना फिल्म हार जीत का है जिसे संगीतबद्ध किया है आर सी बोराल यानि राय चन्द बोराल ने और गाया है कानन देवी तथा पहाड़ी सान्याल ने। लीजिये लुत्फ उठाईये इस मधुर गाने का। मुझे विश्वास है कि नये गानों को पसन्द करने वालों को यह गाना निराश नहीं करेगा।

मस्त पवन शाख़ें, लहराये
बन हे मस्त पवन शाख़ें, लहरायें
बन-बन मोर पपीहे गायें
हे मस्त पवन शाख़ें, लहरायें
फूल,फूल -फूल पर भँवरे जायें
जाकर , प्रीत के, गीत सुनायें
फुल-फूल पर भँवरे जायें जाकर प्रीत के गीत सुनायें
जो हृदय में गीत है व्याकुल तू भी उसे सुना सुना-२
गा सजनवा गा सनवा गा सजनवा गा
मस्त पवन शाख़ें लहरायें बन-बन मोर पपीहे गायेंऽऽऽ
हे मस्त पवन शाख़ें

http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/note_player.swf
Mast pwan shakhen….

NARAD:Hindi Blog Aggregator

Learn-Hindi, Hindi-Blogging, Hindi, Hindi-Blog, Old-Hindi-Songs, Hindi-Films-Song, Rare-Hindi-Songs, Hindi-Film-Sangeet, हिन्दी-खोज, हिन्दी-ब्लॉग, हिन्दी-चिट्ठाकारिता, सफल-हिन्दी-चिट्ठाकारिता, प्रसिद्ध-चिट्ठे, प्रसिद्ध-हिन्दी-चिट्ठे, चिट्ठा-प्रचार, चिट्ठा-प्रसार, जाल-प्रचार, जाल-सफलता, पुराने-हिन्दी-गाने, हिन्दी-फिल्म-संगीत,

>नोकिया वालों लगे रहो….

>जब से नोकिया वालों ने “ईमानदारी” दिखाई है और फ़ोकट में बैटरी बदलने की बात कर दी है, मेरे कस्बे में मानो उफ़ान ही आ गया है। जमाने के साथ चलते हुए हमारे कस्बे में भी अब हजारों-हजार मोबाइल और मोबाइलधारी पैदा हो गये हैं, जाहिर है कि उसमें “नोकिया” वालों की संख्या ही सबसे ज्यादा है। अब भले ही नोकिया वाले गला फ़ाड़-फ़ाड़कर चिल्लाते रहे हों कि “सिर्फ़ नवम्बर 2005 से दिसम्बर 2006 के बीच बनी कुछ बैटरियाँ, और वो भी मात्सुशिता कम्पनी की, ही खराब हैं, लेकिन यहाँ पर भाई लोगों को हरेक फ़ोन में खराबी दिखाई देने लगी है, लेकिन अपने तो मजे ही मजे हैं, आप सोचेंगे कि क्या बात कर रहा है यार, यहाँ जान पर आ बनी है, पता नहीं कब मोबाइल कान के पास ही फ़ट जाये और दिमाग की पाव-भाजी बन जाये या पैंट की जेब में रखे-रखे फ़ूट जाये और जनसंख्या बढाने का साधन ही समाप्त हो जाये और ये साला मजे की बात कर रहा है, तो भाईयों मैं समझाता हूँ कि बात क्या है, दरअसल अपन भी एक छोटा सा इंटरनेट पार्लर चलाते हैं, तो पिछले दस दिनों में ही बैटरी का नम्बर चेक करने के बहाने अपन ने पाँच-सात सौ रुपये कूट लिये। हर ऐरा-गैरा चला आ रहा है, भाई साहब जरा चेक तो करना कहीं मेरा मोबाइल फ़टने वाला तो नहीं है….लाओ पाँच रुपये अभी चेक कर देता हूँ (अभी तक मैंने चेक की हुई डेढ सौ बैटरियों में से सिर्फ़ एक ने ही खराब वाला “स्टेटस” दिखाया है नेट पर)। सबसे ज्यादा मजे तो आ रहे हैं देसी लोगों के “कमेंट्स” सुनने में, जरा मुलाहिजा फ़रमाईये – “ये सब नोकिया वालों की चाल है, अपनी मार्केटिंग करने की” (मुझे पता ही नहीं था कि नोकिया की भारत में बिक्री कम हो गई), “जापान की बैटरियाँ खराब बता रहे हैं ये लोग चाइना की घटिया बैटरियाँ लगवाना चाहते होंगे” (जॉर्ज फ़र्नांडीस के मुरीद होंगे), एक पहलवान तो दो महीने पहले खरीदे हुए मोबाईल की बैटरी भी बदलवा लाये। तो नोकिया के ऑफ़िस में माराकूटी हो ही रही है, बहती गंगा में हमने भी हाथ धो लिये, ठीक वैसे ही जैसे “ताज” के समय धोये थे, हमारे पार्लर से ठेले वाले, पान वाले, पंचर वाले, चाय पहुँचाने वाले, सभी ने “ताज” को वोट किया था (मतलब हमारे द्वारा करवाया था), तो भैया नोकिया हो या ताज वाले हों, ऐसे ही लगे रहो, हर दो महीने में कुछ नया लेकर आओ, ताकि हम गरीबों की दाल-रोटी भी चलती रहे। जय नोकिया…
विशेष नोट : तमाम मित्रों की पहले “हिकारत” भरी और अब “रश्क और तारीफ़” भरी निगाहों के बावजूद मैंने अभी तक मोबाइल नाम की बीमारी को बुलावा नहीं दिया है

, , , ,

AddThis Social Bookmark Button

नोकिया वालों लगे रहो….

जब से नोकिया वालों ने “ईमानदारी” दिखाई है और फ़ोकट में बैटरी बदलने की बात कर दी है, मेरे कस्बे में मानो उफ़ान ही आ गया है। जमाने के साथ चलते हुए हमारे कस्बे में भी अब हजारों-हजार मोबाइल और मोबाइलधारी पैदा हो गये हैं, जाहिर है कि उसमें “नोकिया” वालों की संख्या ही सबसे ज्यादा है। अब भले ही नोकिया वाले गला फ़ाड़-फ़ाड़कर चिल्लाते रहे हों कि “सिर्फ़ नवम्बर 2005 से दिसम्बर 2006 के बीच बनी कुछ बैटरियाँ, और वो भी मात्सुशिता कम्पनी की, ही खराब हैं, लेकिन यहाँ पर भाई लोगों को हरेक फ़ोन में खराबी दिखाई देने लगी है, लेकिन अपने तो मजे ही मजे हैं, आप सोचेंगे कि क्या बात कर रहा है यार, यहाँ जान पर आ बनी है, पता नहीं कब मोबाइल कान के पास ही फ़ट जाये और दिमाग की पाव-भाजी बन जाये या पैंट की जेब में रखे-रखे फ़ूट जाये और जनसंख्या बढाने का साधन ही समाप्त हो जाये और ये साला मजे की बात कर रहा है, तो भाईयों मैं समझाता हूँ कि बात क्या है, दरअसल अपन भी एक छोटा सा इंटरनेट पार्लर चलाते हैं, तो पिछले दस दिनों में ही बैटरी का नम्बर चेक करने के बहाने अपन ने पाँच-सात सौ रुपये कूट लिये। हर ऐरा-गैरा चला आ रहा है, भाई साहब जरा चेक तो करना कहीं मेरा मोबाइल फ़टने वाला तो नहीं है….लाओ पाँच रुपये अभी चेक कर देता हूँ (अभी तक मैंने चेक की हुई डेढ सौ बैटरियों में से सिर्फ़ एक ने ही खराब वाला “स्टेटस” दिखाया है नेट पर)। सबसे ज्यादा मजे तो आ रहे हैं देसी लोगों के “कमेंट्स” सुनने में, जरा मुलाहिजा फ़रमाईये – “ये सब नोकिया वालों की चाल है, अपनी मार्केटिंग करने की” (मुझे पता ही नहीं था कि नोकिया की भारत में बिक्री कम हो गई), “जापान की बैटरियाँ खराब बता रहे हैं ये लोग चाइना की घटिया बैटरियाँ लगवाना चाहते होंगे” (जॉर्ज फ़र्नांडीस के मुरीद होंगे), एक पहलवान तो दो महीने पहले खरीदे हुए मोबाईल की बैटरी भी बदलवा लाये। तो नोकिया के ऑफ़िस में माराकूटी हो ही रही है, बहती गंगा में हमने भी हाथ धो लिये, ठीक वैसे ही जैसे “ताज” के समय धोये थे, हमारे पार्लर से ठेले वाले, पान वाले, पंचर वाले, चाय पहुँचाने वाले, सभी ने “ताज” को वोट किया था (मतलब हमारे द्वारा करवाया था), तो भैया नोकिया हो या ताज वाले हों, ऐसे ही लगे रहो, हर दो महीने में कुछ नया लेकर आओ, ताकि हम गरीबों की दाल-रोटी भी चलती रहे। जय नोकिया…
विशेष नोट : तमाम मित्रों की पहले “हिकारत” भरी और अब “रश्क और तारीफ़” भरी निगाहों के बावजूद मैंने अभी तक मोबाइल नाम की बीमारी को बुलावा नहीं दिया है

, , , ,

AddThis Social Bookmark Button

>गर्भावस्था के दो सुन्दर, सपनीले, मधुर गीत….

>हिन्दी फ़िल्मों ने हमें कई-कई अविस्मरणीय गीत दिये हैं। फ़िल्म संगीतप्रेमी सोते-जागते, उठते-बैठते इन गीतों को गुनगुनाते रहते हैं। हमारे महान गीतकारों और फ़िल्मकारों ने जीवन के हरेक मौके, अवसर और उत्सव के लिये गीत लिखे हैं और खूब लिखे हैं। जन्म, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रेम, विवाह, बिदाई, बच्चे, बुढापा, मौत… सभी-सभी के लिये गीत हमें मिल जायेंगे। जो दो गीत मैंने आज चुने हैं, वे जीवन के एक विशेष कालखंड अर्थात गर्भावस्था और मातृत्व प्राप्त करने के बीच का स्वप्निल समय। जैसे मातृत्व स्त्रियों के लिये जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण होता है, ठीक वैसे ही पुरुषों के लिये पितृत्व भी एक गौरवशाली क्षण होता है। हालांकि माँ बनने के दौरान और प्रसूति के बाद स्त्री का योगदान तो अतुलनीय होता ही है, लेकिन इस भागमभाग में लोग “बाप” को भूल जाते हैं, दवाईयों के लिये भागदौड़ करता, रक्त की बोतलों की जुगाड़ में लगा बदहवास सा, बेचैनी से अस्पताल के बरामदे में टहलता बाप लोग अक्सर नजर-अंदाज कर जाते हैं, और वह भी “मर्द” होने के नाते अपनी व्यथा किसी से कहता नहीं। बहरहाल… प्रस्तुत दोनों गीत गर्भावस्था के उस सपनीले दौर के हैं, जब पति-पत्नी सपने देखने में मगन होते हैं, और यह दौर लगभग हरेक के जीवन में आता है, जब वह अपने होने वाले बच्चे के लिये न जाने क्या-क्या सोचा करता है। यह गीत खास इसीलिये हैं कि इनमें माता-पिता दोनों की भावनाओं को बराबरी से व्यक्त किया गया है। पहला गीत है फ़िल्म “मन-मन्दिर” का, जो सन १९७१ में आई थी, लिखा है राजेन्द्र कृष्ण ने और संगीत दिया है लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने, गीत गाया है मुकेश और लता मंगेशकर ने…. गीत के बोल हैं “ऐ मेरी आँखों के पहले सपने…”, गीत क्या है, चार पंक्तियों की मधुर कविता है, ध्यान से सुनें तो दो लाईन लता के लिये और दो लाईन मुकेश के लिये, बस… इतने में ही लक्ष्मी-प्यारे ने पूरा गीत बाँध दिया है-

लता – ऐ मेरी आँखों के पहले सपने, रंगीन सपने मासूम सपने
पलकों का पलना झुलाऊँ तुझे, गा-गा के लोरी सुलाऊँ तुझे…
(१) एक-एक पल गिनूँ, उस घड़ी के लिये
जिसकी उम्मीद में हर कोई माँ जिये (२)
ऐ मेरी आँखों के पहले सपने….

इस अंतरे के बाद मुकेश कमान संभाल लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई दौड़ के दौरान अपने ‘पार्टनर’ को हौले से “बेटन” थमाता है…

ऐ मेरी आँखों के पहले सपने…
(२) मैं अभी से तेरी सुन रहा हूँ सदा,
दूर जैसे कहीं साज हो बज रहा (२)
फ़िर दोनों गाते हैं
ऐ मेरी आँखों के पहले सपने, रंगीन सपने मासूम सपने
पलकों का पलना झुलाऊँ तुझे, गा-गा के लोरी सुलाऊँ तुझे…

एक विशिष्ट भावना में छोड़ जाता है यह मधुर गीत आपको….. इसे सुनने के लिये आप नीचे दिये विजेट में “प्ले” पर चटकायें…

http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/chello.swf
AYE MERI AANKHON K…

दूसरा गीत भी कालजयी है, लिखा है कवि नीरज ने, धुन बनाई है सचिन देव बर्मन ने, गाया है किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने, फ़िल्म है तेरे-मेरे सपने और बोल हैं, “जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी…”। पूरा गीत पति-पत्नी के आपसी सामंजस्य, उनके सपनों, आने वाले बच्चे के बारे में उनकी कल्पनाओं में डूबा हुआ है। इस गीत में सचिन दा और नीरज ने मिलकर अनोखा संसार रचा है। इस गीत के बोल इस प्रकार हैं –

जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी
खुशियों की कलियाँ, झूमेंगी, झूलेंगी, फ़ूलेंगी
जीवन की बगिया….
वो मेरा होगा, वो सपना तेरा होगा
मिलजुल के माँगा, वो तेरा-मेरा होगा
जब-जब वो मुस्कुरायेगा, अपना सवेरा होगा
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा….
जीवन की बगिया…
हम और बँधेंगे, हम तुम कुछ और बँधेंगे
होगा कोई बीच तो हम तुम और बँधेंगे
बाँधेगा धागा कच्चा, हम तुम तब और बँधेंगे
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा….
जीवन की बगिया…
मेरा राजदुलारा, वो जीवन प्राण हमारा
फ़ूलेगा एक फ़ूल, खिलेगा प्यार हमारा
दिन का वो सूरज होगा, रातों का चाँद सितारा…
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा….
जीवन की बगिया…

जैसे पहले गीत में एक पंक्ति “एक-एक पल गिनूँ उस घड़ी के लिये, जिसकी उम्मीद में हर कोई माँ जिये” है वैसे ही इस गीत में “हम और बँधेंगे, हम-तुम कुछ और बँधेंगे, बाँधेगा धागा कच्चा… होगा कोई बीच तो हम तुम और बँधेंगे..” ये पंक्तियाँ कितने गूढ़ार्थ लिये हुए है, क्या खूब शब्द हैं। यही है हमारे पुराने फ़िल्मी गीतों का जादू… एक बार दिल लगाकर ध्यान से सुन लिया तो फ़िर व्यक्ति दूसरी दुनिया में खो जाता है। इस गीत को नीचे दिये विजेट में प्ले करके भी सुन सकते हैं, और यदि तेजगति इंटरनेट के मालिक हैं तो “यू-ट्यूब” पर इसका बेहतरीन वीडियो भी देख सकते हैं, जिसमें देव आनन्द और मुमताज एक शोख लेकिन परिपक्व अन्दाज में दिखाई देंगे। आनन्द लीजिये, मुझे उम्मीद है कि हमारे कुँवारे पाठक भी इसका भरपूर रसास्वादन करेंगे, क्योंकि कल नहीं तो परसों उन्हें भी इस क्षण से गुज़रना ही होगा। यही तो जीवन है….

http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/chello.swf
Jeevan Ki Bagia Ma…

, , , , , , , , ,

« Older entries Newer entries »