>गायकी में शोहरत की बुलंदियों से किराना की दुकानदारी तक: जी एम दुर्रानी

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हिन्दी फिल्मों में जिस तरह किशोर कुमार और मुकेश ने कुन्दन लाल सहगल से प्रेरित हो कर गाना शुरु किया, ठीक उसी तरह मोहम्मद रफी ने गुलाम मुस्तफा दुर्रानी यानि जी एम दुर्रानी से प्रेरित हो कर अपनी गायन शैली बनाई। शायद आपने जी एम दुर्रानी की पहाडी आवाज सुनी भी होगी।
पेशावर में 1919 में जन्मे, दुर्रानी, सोलह साल की उम्र में बम्बई भाग आये, एकाद फिल्मों में काम किया परन्तु उन्हें यह काम रास नहीं आया, और बम्बई रेडियो स्टेशन पर ड्रामा आर्टिस्ट बन गये। सन 1930 में सोहराब मोदी के मिनर्वा मूवीटोन में 35/- रुपये मासिक पर नौकरी भी की, परन्तु उनके नसीब में शायद कुछ और लिखा था। मिनर्वा मूवीटोन बंद हो गया और उसके बाद आप दिल्ली चले गय। वहाँ से एक बार फिर बम्बई तबादला हो गया और यहाँ नौशाद साहब मिले और उन्हें अपनी दर्शन में गाने का मौका दिया। इस फिल्म की नायिका थी ज्योती उर्फ सितारा बेगम! ज्योती से जी एम दुर्रानी का प्रेम हो गया और बाद में विवाह कर लिया।
विवाह के बाद यानि 1943 से 1951 तक शोहरत की बुलंदियों पर रहने के बाद अचानक, दुर्रानी ने एक बार फिर गाने से किनारा कर लिया और अल्लाह की इबादत में लग गये, सारे पैसे फकीरों को दान कर दिये। फिल्मी लोगों से मुँह चुराने लगे। तब तक उन्हीं के नक्शे कदम पर चलने वाले मोहम्मद रफी बहुत मशहूर हो चुके थे। एक दिन ऐसा आया कि एक जमाने के माने हुए गायक जी एम दुर्रानी को अपनी जीविका चलाने के लिए मित्रों से उधार लेकर छोटी सी किराना की दुकान खोलनी पड़ी और इस तरह एक जमाने का माने हुए गायक किराना के दुकानदार बन गये।

एक जमाने के माने हुए गायक जी एम दुर्रानी को अपनी जीविका चलाने के लिए मित्रों से उधार लेकर छोटी सी किराना की दुकान खोलनी पड़ी और इस तरह एक जमाने का माने हुए गायक किराना के दुकानदार बन गये।

फिलहाल आपको जी एम दुर्रानी का एक मशहूर गाना सुना रहा हूँ जो फिल्म मिर्जा साहेबान (Mirza Saheban 1947) का है और जिसके गीतकार अजीज कश्मीरी और संगीत निर्देशक पंडित अमरनाथ थे। इस गाने में जी एम दुर्रानी का साथ दिया है मल्लिका ए तरन्नुम नूरजहाँ ने। फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई थी त्रिलोक कपूर और नूरजहाँ ने। इस गाने को ध्यान से सुनने पर पता चलता है कि एक बार भी नायिका/ गायिका पूरे गाने में एक बार भी यह नहीं कहती कि हाथ सीने पे रख दो… यानि संगीतकार ने धुन बनाते समय भी मर्यादा का कितना ध्यान रखा।

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जी: हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये
दिल के उजड़े हुए गुलशन में बहार आ जाये

नू: दिल तो कहता है कि आँखो में छुपा लूं तुझको
डर यही है मुकद्दर को नकार आ जाये

जी:हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये
दिल के जख्मों में पे मेरे प्यार का मरहम रख दो
बेकरारी तो मिटे कुछ तो करार आ जाये
हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये

नू: यूं खुदा के लिये छेड़ो ना मेरे होशो हवास
ऐसी नजरों से ना देखो कि खुमार आ जाये-२

जी:हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये
छोड़ के तुम भी चली जाओगी किमत की तरह
बाद जाने तो अजल ही को ना प्यार आ जाये
हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये
दिल के उजड़े हुए गुलशन में बहार आ जाये

फोटो Down Melody lane से साभार


गायकी में शोहरत की बुलंदियों से किराना की दुकानदारी तक: जी एम दुर्रानी



हिन्दी फिल्मों में जिस तरह किशोर कुमार और मुकेश ने कुन्दन लाल सहगल से प्रेरित हो कर गाना शुरु किया, ठीक उसी तरह मोहम्मद रफी ने गुलाम मुस्तफा दुर्रानी यानि जी एम दुर्रानी से प्रेरित हो कर अपनी गायन शैली बनाई। शायद आपने जी एम दुर्रानी की पहाडी आवाज सुनी भी होगी।
पेशावर में 1919 में जन्मे, दुर्रानी, सोलह साल की उम्र में बम्बई भाग आये, एकाद फिल्मों में काम किया परन्तु उन्हें यह काम रास नहीं आया, और बम्बई रेडियो स्टेशन पर ड्रामा आर्टिस्ट बन गये। सन 1930 में सोहराब मोदी के मिनर्वा मूवीटोन में 35/- रुपये मासिक पर नौकरी भी की, परन्तु उनके नसीब में शायद कुछ और लिखा था। मिनर्वा मूवीटोन बंद हो गया और उसके बाद आप दिल्ली चले गय। वहाँ से एक बार फिर बम्बई तबादला हो गया और यहाँ नौशाद साहब मिले और उन्हें अपनी दर्शन में गाने का मौका दिया। इस फिल्म की नायिका थी ज्योती उर्फ सितारा बेगम! ज्योती से जी एम दुर्रानी का प्रेम हो गया और बाद में विवाह कर लिया।
विवाह के बाद यानि 1943 से 1951 तक शोहरत की बुलंदियों पर रहने के बाद अचानक, दुर्रानी ने एक बार फिर गाने से किनारा कर लिया और अल्लाह की इबादत में लग गये, सारे पैसे फकीरों को दान कर दिये। फिल्मी लोगों से मुँह चुराने लगे। तब तक उन्हीं के नक्शे कदम पर चलने वाले मोहम्मद रफी बहुत मशहूर हो चुके थे। एक दिन ऐसा आया कि एक जमाने के माने हुए गायक जी एम दुर्रानी को अपनी जीविका चलाने के लिए मित्रों से उधार लेकर छोटी सी किराना की दुकान खोलनी पड़ी और इस तरह एक जमाने का माने हुए गायक किराना के दुकानदार बन गये।

एक जमाने के माने हुए गायक जी एम दुर्रानी को अपनी जीविका चलाने के लिए मित्रों से उधार लेकर छोटी सी किराना की दुकान खोलनी पड़ी और इस तरह एक जमाने का माने हुए गायक किराना के दुकानदार बन गये।

फिलहाल आपको जी एम दुर्रानी का एक मशहूर गाना सुना रहा हूँ जो फिल्म मिर्जा साहेबान (Mirza Saheban 1947) का है और जिसके गीतकार अजीज कश्मीरी और संगीत निर्देशक पंडित अमरनाथ थे। इस गाने में जी एम दुर्रानी का साथ दिया है मल्लिका ए तरन्नुम नूरजहाँ ने। फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई थी त्रिलोक कपूर और नूरजहाँ ने। इस गाने को ध्यान से सुनने पर पता चलता है कि एक बार भी नायिका/ गायिका पूरे गाने में एक बार भी यह नहीं कहती कि हाथ सीने पे रख दो… यानि संगीतकार ने धुन बनाते समय भी मर्यादा का कितना ध्यान रखा।

जी: हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये
दिल के उजड़े हुए गुलशन में बहार आ जाये

नू: दिल तो कहता है कि आँखो में छुपा लूं तुझको
डर यही है मुकद्दर को नकार आ जाये

जी:हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये
दिल के जख्मों में पे मेरे प्यार का मरहम रख दो
बेकरारी तो मिटे कुछ तो करार आ जाये
हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये

नू: यूं खुदा के लिये छेड़ो ना मेरे होशो हवास
ऐसी नजरों से ना देखो कि खुमार आ जाये-२

जी:हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये
छोड़ के तुम भी चली जाओगी किमत की तरह
बाद जाने तो अजल ही को ना प्यार आ जाये
हाथ सीने पे रख दो तो करार आ जाये
दिल के उजड़े हुए गुलशन में बहार आ जाये

फोटो Down Melody lane से साभार


>"लिफ़्ट" में फ़िल्माये दो मधुर गीत

>Hindi film songs in LIFT

हिन्दी फ़िल्मों ने हमें लाखों मधुर गीत दिये हैं, महान गीतकारों और संगीतकारों ने एक से बढ़कर एक गाने लिखे और निर्माता-निर्देशकों ने उन्हें अपने अनोखे अंदाज में फ़िल्माया भी है। हिन्दी फ़िल्मों में लगभग प्रत्येक अवसर, हरेक जगह और हरेक चरित्र पर गीत फ़िल्माये जा चुके हैं। जंगल, बगीचा, घर, घर की छत, डिस्को, क्लब, मन्दिर, मयखाना, तुलसी का पौधा, टेलीफ़ोन, आटो, बस, रिक्शा, तांगा…. गरज कि ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ फ़िल्म निर्माताओं ने गीत को फ़िल्माने का मौका हाथ से जाने दिया हो। सहज ही मुझे दो मधुर गीत याद आते हैं जो बहुमंजिला इमारत की “लिफ़्ट” में फ़िल्माये गये हैं (“लिफ़्ट” के लिये सरलतम हिन्दी शब्द की खोज में भी हूँ)। पहला गीत है फ़िल्म “प्यार ही प्यार” का जो बनी थी सन्‌१९६८ में, फ़िल्माया गया था धर्मेन्द्र और वैजयंतीमाला पर, गीत लिखा है हसरत जयपुरी ने और संगीत है शंकर जयकिशन का और रफ़ी साहब के इस कालजयी गीत के बोल हैं “मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ, तेरे प्यार में ऐ कविता….”। गीत में धर्मेन्द्र अचानक चलती लिफ़्ट बीच में रोककर वैजयंतीमाला को छेड़ते हुए प्यार का इजहार करते हैं, और वैजयंतीमाला भी (जैसा कि हर हीरोईन करती है) इतराते हुए लिफ़्ट में ही मौजूद आईने में खुद को संवारती-निहारती हैं (इससे यह भी साबित होता है कि विकासशील भारत में १९६८ में बहुत बड़ी लिफ़्ट मौजूद थीं, जिसमें आईना और पंखा भी लगा हुआ था)। बहरहाल, पहले आप गीत के बोल देखिये कितने मधुर हैं और जनाब हसरत जयपुरी ने सोचा भी नहीं होगा कि कहानी में इसे ‘लिफ़्ट’ में फ़िल्माया जायेगा।

मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ
तेरे प्यार में ऐ कविता….
तुझे दिल के आईने में, मैंने बार-बार देखा
तेरी अँखड़ियों में देखा, तो छलकता प्यार देखा
तेरा तीर मैंने देखा, तो जिगर के पार देखा…
मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ….

तेरा रंग है सलोना, तेरे अंग में लचक है
तेरी बात में है जादू, तेरे बोल में खनक है
तेरी हर अदा मुहब्बत, तू जमीन की धनक है
मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ….

मेरा दिल लुभा रहा है, तेरा रूप सादा-सादा
ये झुकी-झुकी निगाहें, करें प्यार दिल में ज्यादा
मैं तुझी पे जान दूँगा, है यही मेरा इरादा…
मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ…..

इस मधुर गीत को नीचे दिये विजेट में प्ले करके सुन सकते हैं।

http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/dj1.swf
Main Kahin Kavi Na…

लिफ़्ट में “फ़ँसा” दूसरा गीत जो तत्काल दिमाग में आता है वह है सन्‌ १९८१ में आई फ़िल्म “एक दूजे के लिये” का, गाया है एसपी बालासुब्रह्मण्यम ने, लिखा है सदाबहार आनन्द बक्षी ने और धुन बनाई है लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने, गीत के बोल कोई कविता या गजल नहीं हैं, बल्कि फ़िल्मों के नामों को तरतीबवार जमाया गया है “मेरे जीवन साथी, प्यार किये जा….”। गीत फ़िल्माया गया है कमल हासन और रति अग्निहोत्री पर जो इन दोनों की पहली हिन्दी फ़िल्म थी। इस फ़िल्म में उत्तर-दक्षिण के द्वन्द्व को रोचक ढंग से दिखाया गया है।

मेरे जीवनसाथी, प्यार किये जा, जवानी दीवानी,
खूबसूरत, जिद्दी, पड़ोसन, सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌
सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌… सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌…
झूठा कहीं का….. हाँ हरे रामा हरे कृष्णा,
धत्‌ चार सौ बीस, आवारा…. दिल ही तो है,
आशिक हूँ बहारों का, तेरे मेरे सपने, तेरे घर के सामने,
आमने सामने, शादी के बाद…
हमारे तुम्हारे, मुन्ना, गुड्डी, टिंकू, मिली
शिनशिनाकी बबलाबू, खेल-खेल में, शोर…
जॉनी मेरा नाम, चोरी मेरा काम, राम और श्याम
धत्त बंडलबाज…. लड़की, मिलन, गीत गाता चल…
बेशरम…. प्यार का मौसम… बेशरम
सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌… सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌…

इश्क इश्क इश्क, नॉटी बॉय, इश्क इश्क इश्क,
ब्लफ़ मास्टर
ये रास्ते हैं प्यार के, चलते चलते, मेरे हमसफ़र, हमसफ़र
दिल तेरा दीवाना, दीवाना, मस्ताना, छलिया, अंजाना,
पगला कहीं का…
आशिक, बेगाना, लोफ़र, अनाड़ी, बढ़ती का नाम दाढ़ी…
चलती का नाम गाड़ी, जब प्यार किसी से होता है… सनम..
जब याद किसी की आती है, जाने मन, सच, बन्धन, कंगन, चन्दन, झूला,
चन्दन, झूला, बन्धन झूला, दिल दिया दर्द लिया, झनक-झनक पायल बाजे
छम छमा छम, गीत गाया पत्थरों ने, सरगम,
सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌… सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌…
मेरे जीवनसाथी, प्यार किये जा, जवानी दीवानी,
खूबसूरत, जिद्दी, पड़ोसन, सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌

शब्दों के सरलतम जादूगर आनन्द बक्षी जी ने इसमें लगभग ६७ फ़िल्मों का नाम का उपयोग किया है। एक फ़ौजी बक्षी जी गीतों को आसान शब्दों में लिखने के उस्ताद थे और लक्ष्मी-प्यारे के साथ उनकी जोड़ी लाजवाब रही, क्योंकि उनकी आपसी समझ और इन महान संगीतकारों की मेलोडी पर गहरी पकड़ थी। “अच्छा तो हम चलते हैं, फ़िर कब मिलोगे, जब तुम कहोगे, कल मिलें या परसों, परसों नहीं नरसों, अ… कहाँ, वहीं, जहाँ कोई आता जाता नहीं…” ऐसे शब्दों पर भी लक्ष्मी-प्यारे ने कर्णप्रिय धुन बनाकर गाने को सुपरहिट करवा दिया। दूसरी ओर बक्षी जी ने “चिंगारी कोई भड़के..” और “आदमी मुसाफ़िर है, आता है जाता है..” जैसे गूढ़ार्थ वाले गीत भी लिखे हैं। जब “बॉबी” फ़िल्म के लिये राजकपूर नें इस त्रिमूर्ति को पहली बार बुलवाया था, तब कार में आनन्द बक्षी ने पूछा कि आखिर “बॉबी” लड़के का नाम है या लड़की का? लक्ष्मी-प्यारे ने कहा हमें भी नहीं मालूम, फ़िर भी आप गाना तो बनाओ और दस मिनट में ही बक्षी जी ने गीत तैयार कर दिया और कहा कि यदि बॉबी लड़का हुआ तो कह देंगे, “तेरे नैनों के झूले में सजनी बॉबी झूल जाये” और यदि बॉबी लड़की हुई तो “सजनी” को बदल कर “सैंया” कर देंगे…। इस गीत को विजेट में प्ले करके सुना जा सकता है।

http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/drums.swf
Ek Duje ke Liye – …

बहरहाल, लिफ़्ट में गाये गये इन गीतों का आनन्द लीजिये और मन में उठने वाले इन प्रश्नों को दबा दीजिये कि, “दो मंजिलों के बीच में लिफ़्ट को भीतर से कितनी देर रोका जा सकता है? ज्यादा देर तक रुक जाने पर बिल्डिंग का चौकीदार क्या कर रहा था? क्या यह लिफ़्ट प्राइवेट सम्पत्ति थी और यदि नहीं तो उस वक्त बिल्डिंग के बाकी लोगों ने हल्ला क्यों नहीं मचाया? आदि..आदि.. तो भाईयों हिन्दी फ़िल्में मनोरंजन के लिये देखी जाती हैं, फ़ालतू प्रश्न नहीं किये जाते….

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"लिफ़्ट" में फ़िल्माये दो मधुर गीत

Hindi film songs in LIFT

हिन्दी फ़िल्मों ने हमें लाखों मधुर गीत दिये हैं, महान गीतकारों और संगीतकारों ने एक से बढ़कर एक गाने लिखे और निर्माता-निर्देशकों ने उन्हें अपने अनोखे अंदाज में फ़िल्माया भी है। हिन्दी फ़िल्मों में लगभग प्रत्येक अवसर, हरेक जगह और हरेक चरित्र पर गीत फ़िल्माये जा चुके हैं। जंगल, बगीचा, घर, घर की छत, डिस्को, क्लब, मन्दिर, मयखाना, तुलसी का पौधा, टेलीफ़ोन, आटो, बस, रिक्शा, तांगा…. गरज कि ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ फ़िल्म निर्माताओं ने गीत को फ़िल्माने का मौका हाथ से जाने दिया हो। सहज ही मुझे दो मधुर गीत याद आते हैं जो बहुमंजिला इमारत की “लिफ़्ट” में फ़िल्माये गये हैं (“लिफ़्ट” के लिये सरलतम हिन्दी शब्द की खोज में भी हूँ)। पहला गीत है फ़िल्म “प्यार ही प्यार” का जो बनी थी सन्‌१९६८ में, फ़िल्माया गया था धर्मेन्द्र और वैजयंतीमाला पर, गीत लिखा है हसरत जयपुरी ने और संगीत है शंकर जयकिशन का और रफ़ी साहब के इस कालजयी गीत के बोल हैं “मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ, तेरे प्यार में ऐ कविता….”। गीत में धर्मेन्द्र अचानक चलती लिफ़्ट बीच में रोककर वैजयंतीमाला को छेड़ते हुए प्यार का इजहार करते हैं, और वैजयंतीमाला भी (जैसा कि हर हीरोईन करती है) इतराते हुए लिफ़्ट में ही मौजूद आईने में खुद को संवारती-निहारती हैं (इससे यह भी साबित होता है कि विकासशील भारत में १९६८ में बहुत बड़ी लिफ़्ट मौजूद थीं, जिसमें आईना और पंखा भी लगा हुआ था)। बहरहाल, पहले आप गीत के बोल देखिये कितने मधुर हैं और जनाब हसरत जयपुरी ने सोचा भी नहीं होगा कि कहानी में इसे ‘लिफ़्ट’ में फ़िल्माया जायेगा।

मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ
तेरे प्यार में ऐ कविता….
तुझे दिल के आईने में, मैंने बार-बार देखा
तेरी अँखड़ियों में देखा, तो छलकता प्यार देखा
तेरा तीर मैंने देखा, तो जिगर के पार देखा…
मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ….

तेरा रंग है सलोना, तेरे अंग में लचक है
तेरी बात में है जादू, तेरे बोल में खनक है
तेरी हर अदा मुहब्बत, तू जमीन की धनक है
मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ….

मेरा दिल लुभा रहा है, तेरा रूप सादा-सादा
ये झुकी-झुकी निगाहें, करें प्यार दिल में ज्यादा
मैं तुझी पे जान दूँगा, है यही मेरा इरादा…
मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ…..

इस मधुर गीत को नीचे दिये विजेट में प्ले करके सुन सकते हैं।

Main Kahin Kavi Na…

लिफ़्ट में “फ़ँसा” दूसरा गीत जो तत्काल दिमाग में आता है वह है सन्‌ १९८१ में आई फ़िल्म “एक दूजे के लिये” का, गाया है एसपी बालासुब्रह्मण्यम ने, लिखा है सदाबहार आनन्द बक्षी ने और धुन बनाई है लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने, गीत के बोल कोई कविता या गजल नहीं हैं, बल्कि फ़िल्मों के नामों को तरतीबवार जमाया गया है “मेरे जीवन साथी, प्यार किये जा….”। गीत फ़िल्माया गया है कमल हासन और रति अग्निहोत्री पर जो इन दोनों की पहली हिन्दी फ़िल्म थी। इस फ़िल्म में उत्तर-दक्षिण के द्वन्द्व को रोचक ढंग से दिखाया गया है।

मेरे जीवनसाथी, प्यार किये जा, जवानी दीवानी,
खूबसूरत, जिद्दी, पड़ोसन, सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌
सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌… सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌…
झूठा कहीं का….. हाँ हरे रामा हरे कृष्णा,
धत्‌ चार सौ बीस, आवारा…. दिल ही तो है,
आशिक हूँ बहारों का, तेरे मेरे सपने, तेरे घर के सामने,
आमने सामने, शादी के बाद…
हमारे तुम्हारे, मुन्ना, गुड्डी, टिंकू, मिली
शिनशिनाकी बबलाबू, खेल-खेल में, शोर…
जॉनी मेरा नाम, चोरी मेरा काम, राम और श्याम
धत्त बंडलबाज…. लड़की, मिलन, गीत गाता चल…
बेशरम…. प्यार का मौसम… बेशरम
सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌… सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌…

इश्क इश्क इश्क, नॉटी बॉय, इश्क इश्क इश्क,
ब्लफ़ मास्टर
ये रास्ते हैं प्यार के, चलते चलते, मेरे हमसफ़र, हमसफ़र
दिल तेरा दीवाना, दीवाना, मस्ताना, छलिया, अंजाना,
पगला कहीं का…
आशिक, बेगाना, लोफ़र, अनाड़ी, बढ़ती का नाम दाढ़ी…
चलती का नाम गाड़ी, जब प्यार किसी से होता है… सनम..
जब याद किसी की आती है, जाने मन, सच, बन्धन, कंगन, चन्दन, झूला,
चन्दन, झूला, बन्धन झूला, दिल दिया दर्द लिया, झनक-झनक पायल बाजे
छम छमा छम, गीत गाया पत्थरों ने, सरगम,
सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌… सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌…
मेरे जीवनसाथी, प्यार किये जा, जवानी दीवानी,
खूबसूरत, जिद्दी, पड़ोसन, सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌

शब्दों के सरलतम जादूगर आनन्द बक्षी जी ने इसमें लगभग ६७ फ़िल्मों का नाम का उपयोग किया है। एक फ़ौजी बक्षी जी गीतों को आसान शब्दों में लिखने के उस्ताद थे और लक्ष्मी-प्यारे के साथ उनकी जोड़ी लाजवाब रही, क्योंकि उनकी आपसी समझ और इन महान संगीतकारों की मेलोडी पर गहरी पकड़ थी। “अच्छा तो हम चलते हैं, फ़िर कब मिलोगे, जब तुम कहोगे, कल मिलें या परसों, परसों नहीं नरसों, अ… कहाँ, वहीं, जहाँ कोई आता जाता नहीं…” ऐसे शब्दों पर भी लक्ष्मी-प्यारे ने कर्णप्रिय धुन बनाकर गाने को सुपरहिट करवा दिया। दूसरी ओर बक्षी जी ने “चिंगारी कोई भड़के..” और “आदमी मुसाफ़िर है, आता है जाता है..” जैसे गूढ़ार्थ वाले गीत भी लिखे हैं। जब “बॉबी” फ़िल्म के लिये राजकपूर नें इस त्रिमूर्ति को पहली बार बुलवाया था, तब कार में आनन्द बक्षी ने पूछा कि आखिर “बॉबी” लड़के का नाम है या लड़की का? लक्ष्मी-प्यारे ने कहा हमें भी नहीं मालूम, फ़िर भी आप गाना तो बनाओ और दस मिनट में ही बक्षी जी ने गीत तैयार कर दिया और कहा कि यदि बॉबी लड़का हुआ तो कह देंगे, “तेरे नैनों के झूले में सजनी बॉबी झूल जाये” और यदि बॉबी लड़की हुई तो “सजनी” को बदल कर “सैंया” कर देंगे…। इस गीत को विजेट में प्ले करके सुना जा सकता है।

Ek Duje ke Liye – …

बहरहाल, लिफ़्ट में गाये गये इन गीतों का आनन्द लीजिये और मन में उठने वाले इन प्रश्नों को दबा दीजिये कि, “दो मंजिलों के बीच में लिफ़्ट को भीतर से कितनी देर रोका जा सकता है? ज्यादा देर तक रुक जाने पर बिल्डिंग का चौकीदार क्या कर रहा था? क्या यह लिफ़्ट प्राइवेट सम्पत्ति थी और यदि नहीं तो उस वक्त बिल्डिंग के बाकी लोगों ने हल्ला क्यों नहीं मचाया? आदि..आदि.. तो भाईयों हिन्दी फ़िल्में मनोरंजन के लिये देखी जाती हैं, फ़ालतू प्रश्न नहीं किये जाते….

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"लिफ़्ट" में फ़िल्माये दो मधुर गीत

Hindi film songs in LIFT

हिन्दी फ़िल्मों ने हमें लाखों मधुर गीत दिये हैं, महान गीतकारों और संगीतकारों ने एक से बढ़कर एक गाने लिखे और निर्माता-निर्देशकों ने उन्हें अपने अनोखे अंदाज में फ़िल्माया भी है। हिन्दी फ़िल्मों में लगभग प्रत्येक अवसर, हरेक जगह और हरेक चरित्र पर गीत फ़िल्माये जा चुके हैं। जंगल, बगीचा, घर, घर की छत, डिस्को, क्लब, मन्दिर, मयखाना, तुलसी का पौधा, टेलीफ़ोन, आटो, बस, रिक्शा, तांगा…. गरज कि ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ फ़िल्म निर्माताओं ने गीत को फ़िल्माने का मौका हाथ से जाने दिया हो। सहज ही मुझे दो मधुर गीत याद आते हैं जो बहुमंजिला इमारत की “लिफ़्ट” में फ़िल्माये गये हैं (“लिफ़्ट” के लिये सरलतम हिन्दी शब्द की खोज में भी हूँ)। पहला गीत है फ़िल्म “प्यार ही प्यार” का जो बनी थी सन्‌१९६८ में, फ़िल्माया गया था धर्मेन्द्र और वैजयंतीमाला पर, गीत लिखा है हसरत जयपुरी ने और संगीत है शंकर जयकिशन का और रफ़ी साहब के इस कालजयी गीत के बोल हैं “मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ, तेरे प्यार में ऐ कविता….”। गीत में धर्मेन्द्र अचानक चलती लिफ़्ट बीच में रोककर वैजयंतीमाला को छेड़ते हुए प्यार का इजहार करते हैं, और वैजयंतीमाला भी (जैसा कि हर हीरोईन करती है) इतराते हुए लिफ़्ट में ही मौजूद आईने में खुद को संवारती-निहारती हैं (इससे यह भी साबित होता है कि विकासशील भारत में १९६८ में बहुत बड़ी लिफ़्ट मौजूद थीं, जिसमें आईना और पंखा भी लगा हुआ था)। बहरहाल, पहले आप गीत के बोल देखिये कितने मधुर हैं और जनाब हसरत जयपुरी ने सोचा भी नहीं होगा कि कहानी में इसे ‘लिफ़्ट’ में फ़िल्माया जायेगा।

मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ
तेरे प्यार में ऐ कविता….
तुझे दिल के आईने में, मैंने बार-बार देखा
तेरी अँखड़ियों में देखा, तो छलकता प्यार देखा
तेरा तीर मैंने देखा, तो जिगर के पार देखा…
मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ….

तेरा रंग है सलोना, तेरे अंग में लचक है
तेरी बात में है जादू, तेरे बोल में खनक है
तेरी हर अदा मुहब्बत, तू जमीन की धनक है
मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ….

मेरा दिल लुभा रहा है, तेरा रूप सादा-सादा
ये झुकी-झुकी निगाहें, करें प्यार दिल में ज्यादा
मैं तुझी पे जान दूँगा, है यही मेरा इरादा…
मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ…..

इस मधुर गीत को नीचे दिये विजेट में प्ले करके सुन सकते हैं।

Main Kahin Kavi Na…

लिफ़्ट में “फ़ँसा” दूसरा गीत जो तत्काल दिमाग में आता है वह है सन्‌ १९८१ में आई फ़िल्म “एक दूजे के लिये” का, गाया है एसपी बालासुब्रह्मण्यम ने, लिखा है सदाबहार आनन्द बक्षी ने और धुन बनाई है लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने, गीत के बोल कोई कविता या गजल नहीं हैं, बल्कि फ़िल्मों के नामों को तरतीबवार जमाया गया है “मेरे जीवन साथी, प्यार किये जा….”। गीत फ़िल्माया गया है कमल हासन और रति अग्निहोत्री पर जो इन दोनों की पहली हिन्दी फ़िल्म थी। इस फ़िल्म में उत्तर-दक्षिण के द्वन्द्व को रोचक ढंग से दिखाया गया है।

मेरे जीवनसाथी, प्यार किये जा, जवानी दीवानी,
खूबसूरत, जिद्दी, पड़ोसन, सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌
सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌… सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌…
झूठा कहीं का….. हाँ हरे रामा हरे कृष्णा,
धत्‌ चार सौ बीस, आवारा…. दिल ही तो है,
आशिक हूँ बहारों का, तेरे मेरे सपने, तेरे घर के सामने,
आमने सामने, शादी के बाद…
हमारे तुम्हारे, मुन्ना, गुड्डी, टिंकू, मिली
शिनशिनाकी बबलाबू, खेल-खेल में, शोर…
जॉनी मेरा नाम, चोरी मेरा काम, राम और श्याम
धत्त बंडलबाज…. लड़की, मिलन, गीत गाता चल…
बेशरम…. प्यार का मौसम… बेशरम
सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌… सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌…

इश्क इश्क इश्क, नॉटी बॉय, इश्क इश्क इश्क,
ब्लफ़ मास्टर
ये रास्ते हैं प्यार के, चलते चलते, मेरे हमसफ़र, हमसफ़र
दिल तेरा दीवाना, दीवाना, मस्ताना, छलिया, अंजाना,
पगला कहीं का…
आशिक, बेगाना, लोफ़र, अनाड़ी, बढ़ती का नाम दाढ़ी…
चलती का नाम गाड़ी, जब प्यार किसी से होता है… सनम..
जब याद किसी की आती है, जाने मन, सच, बन्धन, कंगन, चन्दन, झूला,
चन्दन, झूला, बन्धन झूला, दिल दिया दर्द लिया, झनक-झनक पायल बाजे
छम छमा छम, गीत गाया पत्थरों ने, सरगम,
सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌… सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌…
मेरे जीवनसाथी, प्यार किये जा, जवानी दीवानी,
खूबसूरत, जिद्दी, पड़ोसन, सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌

शब्दों के सरलतम जादूगर आनन्द बक्षी जी ने इसमें लगभग ६७ फ़िल्मों का नाम का उपयोग किया है। एक फ़ौजी बक्षी जी गीतों को आसान शब्दों में लिखने के उस्ताद थे और लक्ष्मी-प्यारे के साथ उनकी जोड़ी लाजवाब रही, क्योंकि उनकी आपसी समझ और इन महान संगीतकारों की मेलोडी पर गहरी पकड़ थी। “अच्छा तो हम चलते हैं, फ़िर कब मिलोगे, जब तुम कहोगे, कल मिलें या परसों, परसों नहीं नरसों, अ… कहाँ, वहीं, जहाँ कोई आता जाता नहीं…” ऐसे शब्दों पर भी लक्ष्मी-प्यारे ने कर्णप्रिय धुन बनाकर गाने को सुपरहिट करवा दिया। दूसरी ओर बक्षी जी ने “चिंगारी कोई भड़के..” और “आदमी मुसाफ़िर है, आता है जाता है..” जैसे गूढ़ार्थ वाले गीत भी लिखे हैं। जब “बॉबी” फ़िल्म के लिये राजकपूर नें इस त्रिमूर्ति को पहली बार बुलवाया था, तब कार में आनन्द बक्षी ने पूछा कि आखिर “बॉबी” लड़के का नाम है या लड़की का? लक्ष्मी-प्यारे ने कहा हमें भी नहीं मालूम, फ़िर भी आप गाना तो बनाओ और दस मिनट में ही बक्षी जी ने गीत तैयार कर दिया और कहा कि यदि बॉबी लड़का हुआ तो कह देंगे, “तेरे नैनों के झूले में सजनी बॉबी झूल जाये” और यदि बॉबी लड़की हुई तो “सजनी” को बदल कर “सैंया” कर देंगे…। इस गीत को विजेट में प्ले करके सुना जा सकता है।

Ek Duje ke Liye – …

बहरहाल, लिफ़्ट में गाये गये इन गीतों का आनन्द लीजिये और मन में उठने वाले इन प्रश्नों को दबा दीजिये कि, “दो मंजिलों के बीच में लिफ़्ट को भीतर से कितनी देर रोका जा सकता है? ज्यादा देर तक रुक जाने पर बिल्डिंग का चौकीदार क्या कर रहा था? क्या यह लिफ़्ट प्राइवेट सम्पत्ति थी और यदि नहीं तो उस वक्त बिल्डिंग के बाकी लोगों ने हल्ला क्यों नहीं मचाया? आदि..आदि.. तो भाईयों हिन्दी फ़िल्में मनोरंजन के लिये देखी जाती हैं, फ़ालतू प्रश्न नहीं किये जाते….

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शहीद भगत सिंह – महाशक्ति

बड़ी खुशनसीब होगी वह कोख और गर्व से चौडा हो गया होगा उस बाप का सीना जिस दिन देश की आजदी के खातिर उसका लाल फांसी चढ़ गया था। हॉं आज उसी माँ-बाप के लाल भगत सिंह का जन्‍म दिवस है। आज देश भगत सिंह के जन्‍मदिन की सौ‍वीं वर्ष गॉंठ मना रहा है।

लेख पढे

>गाना जो आप बार बार सुनना चाहेंगे

>NARAD:Hindi Blog Aggregator


हम जब भी गानों का जिक्र करते हैं तब हमारे ध्यान में अक्सर दो ही बातें होती है, एक तो गायक-गायिका की आवाज और दूसरा संगीत। हम गीतकार यानि गीत के बोलों पर ध्यान उतना ध्यान नहीं देते या अगर दे भी देते हैं तो देते हैं पर चर्चा नहीं करते। जबकि संगीत या
गायक-गायिका की आवाज कितनी ही मधुर हो या संगीत कितना ही कर्णप्रिय हो गाना सुनने में आनंद नहीं आता। सौभाग्य से हमारे हिन्दी की पुरानी फिल्मों के गानों में ज्यादातर गीत, संगीत और गायकी तीनों ही पक्ष सुन्दर और प्रभावशाली रहे हैं।
आज मैं आपको एक ऐसा ही गाना सुनवा रहा हूँ जिसमें संगीत के तीनों ही पक्षों ने गजब का प्रभाव छोड़ा है, या सभी ने इस गाने पर बहुत मेहनत की है।
अगर प्रेम धवन जैसे गुणी गीतकार, लता जी की मधुर गायकी और महान संगीतकार खेम चन्द प्रकाश की त्रिपुटी मिले तो जिस रचना का जन्म होगा तो उसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। खेम चन्द प्रकाश जी के बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान होगा, परन्तु फिर भी इतना तो कहना चाहूंगा कि सुजानगढ़ (राजस्थान) के ये ही संगीतकार थे जिन्होने फिल्म महल में संगीत दिया और जिसके गाने आयेगा आने वाला से लता जी को अपार प्रसिद्धी मिली। एक बात और कि वर्ष 2007 स्व. खेम चन्द प्रकाशजी की जन्मशताब्दी का वर्ष है, पता नहीं रेडियो और टीवी के लोगों को इस बारे में पता भी होगा या नहीं!! ( यूनुस भाई सुन रहे हैं ना???

1948 में बनी फिल्म जिद्दी जिसमें देवानंद और कामिनी कौशल की मुख्य भूमिकायें थी और गीत संगीत के बारे में तो आपको उपर बता ही चुके हैं। फिल्म के निर्देशक थे शाहिद लतीफ

प्रस्तुत गाने में बिरहन नायिका अपने प्रीतम की शिकायत कर रही है और चंदा से कह रही है कि मेरा यह संदेश मेरे प्रियतम को जा कर सुनाओ। हिन्दी फिल्मों में इस थीम पर कई गाने बने हैं इसमें कभी मैना , कभी चंदा तो कभी वर्षा के पहले बादलों के माध्यम से नायिका अपना संदेश भेज रही है।

http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://mahaphil.lifelogger.com/media/audio0/535134_locmibvges_conv.flv&autoStart=false

http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/note_player.swf
Chanda re ja re ja…

चंदा रे जारे जारे
चंदा रे जा रे जारे
पिया से संदेशा मोरा कहियो जा
चंदा रे..
मोरा तुम बिन जिया ना लागे रे पिया
मोहे इक पल चैन ना आये
चंदा रे जारे जारे

किस के मन में जाये बसे हो
हमरे मन में अगन लगाये
हमने तोरी याद में बालम
दीप जलाये दीप बुझाये
फिर भी तेरा मन ना पिघला
हमने कितने नीर बहाये
चंदा,…जारे जारे
चंदा रे जारे जारे

घड़ियाँ गिन गिन दिन बीतत हैं
अंखियों में कट जाये रैना
तोरी आस लिये बैठे हैं
हंसते नैना रोते नैना-२
हमने तोरी राह में प्रीतम
पग पग पे है नैन बिछाये
चंदा,…जारे जारे
चंदा रे जारे जारे

पिया से संदेशा मोरा कहियो जा
मोरा तुम बिन जिया ना लागे रे पिया
मोहे एक पल चैन ना आये
चंदा रे..

title=”नई प्रविष्टी”> width=”125″ height=”30″>

गाना जो आप बार बार सुनना चाहेंगे

NARAD:Hindi Blog Aggregator


हम जब भी गानों का जिक्र करते हैं तब हमारे ध्यान में अक्सर दो ही बातें होती है, एक तो गायक-गायिका की आवाज और दूसरा संगीत। हम गीतकार यानि गीत के बोलों पर ध्यान उतना ध्यान नहीं देते या अगर दे भी देते हैं तो देते हैं पर चर्चा नहीं करते। जबकि संगीत या
गायक-गायिका की आवाज कितनी ही मधुर हो या संगीत कितना ही कर्णप्रिय हो गाना सुनने में आनंद नहीं आता। सौभाग्य से हमारे हिन्दी की पुरानी फिल्मों के गानों में ज्यादातर गीत, संगीत और गायकी तीनों ही पक्ष सुन्दर और प्रभावशाली रहे हैं।
आज मैं आपको एक ऐसा ही गाना सुनवा रहा हूँ जिसमें संगीत के तीनों ही पक्षों ने गजब का प्रभाव छोड़ा है, या सभी ने इस गाने पर बहुत मेहनत की है।
अगर प्रेम धवन जैसे गुणी गीतकार, लता जी की मधुर गायकी और महान संगीतकार खेम चन्द प्रकाश की त्रिपुटी मिले तो जिस रचना का जन्म होगा तो उसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। खेम चन्द प्रकाश जी के बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान होगा, परन्तु फिर भी इतना तो कहना चाहूंगा कि सुजानगढ़ (राजस्थान) के ये ही संगीतकार थे जिन्होने फिल्म महल में संगीत दिया और जिसके गाने आयेगा आने वाला से लता जी को अपार प्रसिद्धी मिली। एक बात और कि वर्ष 2007 स्व. खेम चन्द प्रकाशजी की जन्मशताब्दी का वर्ष है, पता नहीं रेडियो और टीवी के लोगों को इस बारे में पता भी होगा या नहीं!! ( यूनुस भाई सुन रहे हैं ना???

1948 में बनी फिल्म जिद्दी जिसमें देवानंद और कामिनी कौशल की मुख्य भूमिकायें थी और गीत संगीत के बारे में तो आपको उपर बता ही चुके हैं। फिल्म के निर्देशक थे शाहिद लतीफ

प्रस्तुत गाने में बिरहन नायिका अपने प्रीतम की शिकायत कर रही है और चंदा से कह रही है कि मेरा यह संदेश मेरे प्रियतम को जा कर सुनाओ। हिन्दी फिल्मों में इस थीम पर कई गाने बने हैं इसमें कभी मैना , कभी चंदा तो कभी वर्षा के पहले बादलों के माध्यम से नायिका अपना संदेश भेज रही है।

Chanda re ja re ja…

चंदा रे जारे जारे
चंदा रे जा रे जारे
पिया से संदेशा मोरा कहियो जा
चंदा रे..
मोरा तुम बिन जिया ना लागे रे पिया
मोहे इक पल चैन ना आये
चंदा रे जारे जारे

किस के मन में जाये बसे हो
हमरे मन में अगन लगाये
हमने तोरी याद में बालम
दीप जलाये दीप बुझाये
फिर भी तेरा मन ना पिघला
हमने कितने नीर बहाये
चंदा,…जारे जारे
चंदा रे जारे जारे

घड़ियाँ गिन गिन दिन बीतत हैं
अंखियों में कट जाये रैना
तोरी आस लिये बैठे हैं
हंसते नैना रोते नैना-२
हमने तोरी राह में प्रीतम
पग पग पे है नैन बिछाये
चंदा,…जारे जारे
चंदा रे जारे जारे

पिया से संदेशा मोरा कहियो जा
मोरा तुम बिन जिया ना लागे रे पिया
मोहे एक पल चैन ना आये
चंदा रे..

title=”नई प्रविष्टी”> width=”125″ height=”30″>

>मूर्खतापूर्ण, निरर्थक और ऊलजलूल वक्तव्यों का देश

>Ridiculous Foolish Statements

स्वतंत्रता के साठ वर्षों का जश्न हमने अभी-अभी ही मनाया। देश के पिछले साठ सालों पर सरसरी नजर डालें तो सबसे ज्यादा खटकने वाली बात हम पाते हैं नेताओं और प्रशासन द्वारा दिये गये मूर्खतापूर्ण, निरर्थक, ऊटपटाँग और उलजलूल वक्तव्य। नेता क्या बोलते हैं, क्यों बोलते हैं, प्रेस विज्ञप्ति क्यों जारी की जाती है, इस बात का न तो उन्हें कोई मतलब होता है, न ही जनता को इससे कुछ मिलता है। हम सभी रोज अखबार पढते हैं, उसमें प्रथम पृष्ठ पर स्थित कुछ “हेडलाइनों” पर नजर पड़ती ही हैं, लेकिन इतने सालों के बाद अब समाचार पर नजर पड़ते ही समझ में आ जाता है कि भीतर क्या लिखा होगा, कुछ वाक्यों की तो आदत सी पड़ गई है । आइये नजर डालें ऐसे ही कुछ बेवकूफ़ी भरे वाक्यों पर – “विकास का फ़ल आम आदमी को मिलना चाहिये”, “गरीबों और अमीरों के बीच की खाई कम होनी चाहिये”, “हमें गरीबी हटाना है”, “विकास की प्रक्रिया में सभी को समाहित करना आवश्यक है”, “आम आदमी का भला होना ही चाहिये”…. इस प्रकार के कुछ अनर्गल से वाक्य देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग गाहे-बगाहे अपने मुखारविन्द से उवाचते रहते हैं, सतत और अनथक रूप से। बस भाषण देना है इसलिये देना है और इन वाक्यों का समावेश किये बगैर भाषण पूरा नहीं होगा, फ़िर उस “खास” (?) व्यक्ति ने बोला है तो अखबारों को छापना ही है, छपा है तो हम जैसों को पढ़ना ही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इन नेताओं को ये रटे-रटाये और निरर्थक वाक्य बोलने में शर्म नहीं आती? स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात लोकतंत्र स्वीकार करने के बाद आम जनता के लिये न्यायपालिका, प्रेस, अफ़सरशाही और विधायिका का गठन हो गया है, तो अब आम आदमी का भला करने से इन्हें कौन रोक रहा है, जनता ने चुनाव में वोट देकर सरकार बनवा दी तो अब विकास की दौड़ में सभी को शामिल करना उनका कर्तव्य है, इसके लिये लाऊडस्पीकर पर जोर-जोर से चिल्लाने की क्या जरूरत है? अब तो पन्द्रह अगस्त का प्रधानमंत्री का भाषण हो या छब्बीस जनवरी का राष्ट्रपति का भाषण, अव्वल तो कोई सुनता ही नहीं, सुनता भी है तो हँसी ही आती है, उसमें भी ऐसे ही वाक्यों की भरमार होती है, “ऐसी ऊँची-ऊँची रख-रख के देते हैं कि कनपटी सुन्न हो जाती है”, अरे भाई करके दिखा ना, कि बस यूँ ही बोलता रहेगा…लेकिन नहीं…साठ साल हो गये बकबक जारी है। साठ साल बाद भी प्रधानमंत्री यह कहें कि हमें गरीबी मिटाना है और आम आदमी का भला होना चाहिये तो बात कुछ समझ नहीं आती। ये तो ऐसे ही हुआ कि अंबानी अपने कर्मचारियों से कहे कि कंपनी की प्रगति होना चाहिये, सबको वेतनवृद्धि मिलनी चाहिये, लेकिन खुद मुकेश अंबानी कुछ ना करे। ये सब होना चाहिये, इसीलिये तो वह मालिक है, तमाम मैनेजर हैं, शेयर होल्डर हैं, मजदूर तो सिर्फ़ वही करेगा जो उसे कहा जायेगा। लेकिन “आम आदमी”… शब्द का उपयोग करके नेता सोचते हैं कि वे अपनी “इमेज” बना रहे हैं, जबकि लोग मन-ही-मन गालियाँ निकाल रहे होते हैं। यही हाल प्रत्येक आतंकवादी हमले के बाद आने वाली वक्तव्यों की बाढ़ का है – “सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है” (हँसी), “रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है” (तेज हँसी), “हम आतंकवाद के सामने नहीं झुकेंगे”, “दोषी को सजा दिला कर रहेंगे” (ठहाके मार कर दोहरा होने लायक), “आम जनता से शांति बनाये रखने की अपील की है”, “मरने वाले को इतना और घायल को उतना मुआवजा दिया जायेगा”… अगड़म-बगड़म-तगड़म… क्या बकवास है यह सब? न उन्हें शर्म आती है, न हमें, न उन्हें गुस्सा आता है, न हमें। जेड श्रेणी की सुरक्षा में बैठा हुआ नेता यह सब बोलता रहता है, अखबारों में छपता है, हम पढ़ते हैं, फ़िर उसी अखबार में बच्चे को हगवा कर उसे नाली में फ़ेंक देते हैं, अगले दिन के अखबार की “हेडिंग” पढ़ने के इंतजार में…..

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मूर्खतापूर्ण, निरर्थक और ऊलजलूल वक्तव्यों का देश

Ridiculous Foolish Statements

स्वतंत्रता के साठ वर्षों का जश्न हमने अभी-अभी ही मनाया। देश के पिछले साठ सालों पर सरसरी नजर डालें तो सबसे ज्यादा खटकने वाली बात हम पाते हैं नेताओं और प्रशासन द्वारा दिये गये मूर्खतापूर्ण, निरर्थक, ऊटपटाँग और उलजलूल वक्तव्य। नेता क्या बोलते हैं, क्यों बोलते हैं, प्रेस विज्ञप्ति क्यों जारी की जाती है, इस बात का न तो उन्हें कोई मतलब होता है, न ही जनता को इससे कुछ मिलता है। हम सभी रोज अखबार पढते हैं, उसमें प्रथम पृष्ठ पर स्थित कुछ “हेडलाइनों” पर नजर पड़ती ही हैं, लेकिन इतने सालों के बाद अब समाचार पर नजर पड़ते ही समझ में आ जाता है कि भीतर क्या लिखा होगा, कुछ वाक्यों की तो आदत सी पड़ गई है । आइये नजर डालें ऐसे ही कुछ बेवकूफ़ी भरे वाक्यों पर – “विकास का फ़ल आम आदमी को मिलना चाहिये”, “गरीबों और अमीरों के बीच की खाई कम होनी चाहिये”, “हमें गरीबी हटाना है”, “विकास की प्रक्रिया में सभी को समाहित करना आवश्यक है”, “आम आदमी का भला होना ही चाहिये”…. इस प्रकार के कुछ अनर्गल से वाक्य देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग गाहे-बगाहे अपने मुखारविन्द से उवाचते रहते हैं, सतत और अनथक रूप से। बस भाषण देना है इसलिये देना है और इन वाक्यों का समावेश किये बगैर भाषण पूरा नहीं होगा, फ़िर उस “खास” (?) व्यक्ति ने बोला है तो अखबारों को छापना ही है, छपा है तो हम जैसों को पढ़ना ही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इन नेताओं को ये रटे-रटाये और निरर्थक वाक्य बोलने में शर्म नहीं आती? स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात लोकतंत्र स्वीकार करने के बाद आम जनता के लिये न्यायपालिका, प्रेस, अफ़सरशाही और विधायिका का गठन हो गया है, तो अब आम आदमी का भला करने से इन्हें कौन रोक रहा है, जनता ने चुनाव में वोट देकर सरकार बनवा दी तो अब विकास की दौड़ में सभी को शामिल करना उनका कर्तव्य है, इसके लिये लाऊडस्पीकर पर जोर-जोर से चिल्लाने की क्या जरूरत है? अब तो पन्द्रह अगस्त का प्रधानमंत्री का भाषण हो या छब्बीस जनवरी का राष्ट्रपति का भाषण, अव्वल तो कोई सुनता ही नहीं, सुनता भी है तो हँसी ही आती है, उसमें भी ऐसे ही वाक्यों की भरमार होती है, “ऐसी ऊँची-ऊँची रख-रख के देते हैं कि कनपटी सुन्न हो जाती है”, अरे भाई करके दिखा ना, कि बस यूँ ही बोलता रहेगा…लेकिन नहीं…साठ साल हो गये बकबक जारी है। साठ साल बाद भी प्रधानमंत्री यह कहें कि हमें गरीबी मिटाना है और आम आदमी का भला होना चाहिये तो बात कुछ समझ नहीं आती। ये तो ऐसे ही हुआ कि अंबानी अपने कर्मचारियों से कहे कि कंपनी की प्रगति होना चाहिये, सबको वेतनवृद्धि मिलनी चाहिये, लेकिन खुद मुकेश अंबानी कुछ ना करे। ये सब होना चाहिये, इसीलिये तो वह मालिक है, तमाम मैनेजर हैं, शेयर होल्डर हैं, मजदूर तो सिर्फ़ वही करेगा जो उसे कहा जायेगा। लेकिन “आम आदमी”… शब्द का उपयोग करके नेता सोचते हैं कि वे अपनी “इमेज” बना रहे हैं, जबकि लोग मन-ही-मन गालियाँ निकाल रहे होते हैं। यही हाल प्रत्येक आतंकवादी हमले के बाद आने वाली वक्तव्यों की बाढ़ का है – “सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है” (हँसी), “रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है” (तेज हँसी), “हम आतंकवाद के सामने नहीं झुकेंगे”, “दोषी को सजा दिला कर रहेंगे” (ठहाके मार कर दोहरा होने लायक), “आम जनता से शांति बनाये रखने की अपील की है”, “मरने वाले को इतना और घायल को उतना मुआवजा दिया जायेगा”… अगड़म-बगड़म-तगड़म… क्या बकवास है यह सब? न उन्हें शर्म आती है, न हमें, न उन्हें गुस्सा आता है, न हमें। जेड श्रेणी की सुरक्षा में बैठा हुआ नेता यह सब बोलता रहता है, अखबारों में छपता है, हम पढ़ते हैं, फ़िर उसी अखबार में बच्चे को हगवा कर उसे नाली में फ़ेंक देते हैं, अगले दिन के अखबार की “हेडिंग” पढ़ने के इंतजार में…..

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