>अंधविश्वासों की लहरें और पढ़ा-लिखा तबका

>Superstitions, Education and Urban Community

मध्यप्रदेश के मालवा निमाड़ अंचल में इन दिनों “हरे काँच की चूड़ियाँ पहनो” नामक अंधविश्वास चल रहा है। एक अफ़वाह के अनुसार यदि महिलायें हाथों में हरे काँच की चूड़ियाँ पहनेंगी तो उनके सुहाग, बच्चे और घर-द्वार सुरक्षित रहेगा। यदि किसी महिला ने यह नहीं पहनीं तो भारी अनिष्ट हो जायेगा। मजे की बात तो यह है कि गाँवों की अनपढ़ महिलाओं के साथ-साथ पढ़ी-लिखी, शहरी और कम्प्यूटर का उपयोग करने वाली मूर्ख महिलायें भी इस अंधविश्वास के चक्कर में पड़ रही हैं। “नारी शक्ति” और अबला-सबला आंदोलन चलाने वाली, सिन्दूर और मंगलसूत्र को गुलामी की निशानी मानने वाली कई महिलायें भी इसकी चपेट में हैं। चूड़ी निर्माता और विक्रेता जमकर माल कूट रहे हैं।

इसी प्रकार कुछ माह पहले इसी अंचल में “जलेबी” नामक अंधविश्वास चला था, जिसके अनुसार ढाई सौ ग्राम जलेबी को पूजा करके नर्मदा में विसर्जित करना था, जिससे कि महिलाओं/लड़कियों के भाईयों के जीवन पर आया संकट टल जाये। हालत यह हो गई थी कि नर्मदा नदी में जलेबी की चाशनी और मैदे की लुगदी के कारण घोर प्रदूषण के चलते प्रशासन को अन्त में यह चेतावनी देना पड़ी कि इस प्रकार की “जलेबी विसर्जन” ना किया जाये अन्यथा कड़ी कार्रवाई की जायेगी। भाई लोगों ने जमी-जमाई दुकानदारी छोड़कर नर्मदा किनारे जलेबी की दुकानें खोल ली थीं, अफ़वाह चलाई, महिलाओं को बेवकूफ़ बनाया, और अच्छा कमाया। नर्मदा नदी प्रदूषित होती है तो होती रहे, उनकी बला से, यूँ भी साल में दो बार गणेश और दुर्गा पूजा की लाखों मूर्तियाँ प्रवाहित करके पानी गन्दा करते ही हैं।

इसी प्रकार उज्जैन या आसपास के नगरों में धर्मप्राण(?) जनता को मूक प्राणियों, गाय-ढोर को चारा खिलाने का शौक होता है, उनका मानना है कि इससे पुण्य(?) मिलता है। अब यहाँ गणित यह खेला जाता है कि आवारा पशु, गाय-बैल आदि सड़क पर छोड़ दिये जाते हैं, फ़िर वही व्यक्ति खुद एक ठेला लेकर घास बेचने बैठ जाता है, घास बेच कर भी कमा लेता है, और अपने आवारा पशु को फ़ोकट में चारा भी खिलवा लेता है, सड़क पर गाय-बैल गोबर करते रहें, लोग टकरा-टकरा कर गिरते रहें, न प्रशासन को कोई मतलब होता है, ना ही धर्मालुओं(?) को, आखिर “धर्म” का मामला जो ठहरा। एक बात तो सिद्ध है, कि शिक्षा प्रसार का अंधविश्वास से कोई लेना-देना नहीं होता। हमारे एक पड़ोसी जो Ph.D. वाले डॉक्टर हैं, मुहूर्त देखकर घर से निकलते हैं, इसी प्रकार एक और MD डॉक्टर हैं जो पंचांग देखकर महत्वपूर्ण ऑपरेशन करते हैं, अब इसे क्या कहा जाये?

इस लगातार जारी मूर्खता का एक और प्रमाण हैं इंटरनेट पर सतत जारी ई-मेल अंधविश्वास अभियान, जिसमें आपसे कहा जाता है कि यह मेल जादू और चमत्कार भरी है, इसे आप बीस लोगों को Forward करेंगे तो आपको खजाना और सुख-समृद्धि प्राप्त होगी, पढ़े-लिखे लोग बगैर सोचे-समझे इसे Forward कर भी देते हैं। मेरे पास जब ऐसी कोई मेल आती है तो सबसे पहले उसे “कचरा पेटी” (Delete) का रास्ता दिखाता हूँ (वह भी Shift दबाकर)| लेकिन सिवाय माथा पीटने के या फ़िर हँसने के और क्या चारा रह जाता है? जब शिक्षित होकर भी लोगबाग इस तरह की हरकतें करते हैं तो गुस्सा भी आता है, शर्म भी आती है, और कभी-कभी लगता है कि क्यों हम खामख्वाह गाँव वालों और अनपढ़ों के पीछे पड़े रहते हैं, पहले शहरों में तो लोग छींकने और बिल्ली के रास्ता काटने जैसे घटियातम अंधविश्वासों से बाहर निकलें। लेकिन इसका कोई इलाज नहीं है।

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अंधविश्वासों की लहरें और पढ़ा-लिखा तबका

Superstitions, Education and Urban Community

मध्यप्रदेश के मालवा निमाड़ अंचल में इन दिनों “हरे काँच की चूड़ियाँ पहनो” नामक अंधविश्वास चल रहा है। एक अफ़वाह के अनुसार यदि महिलायें हाथों में हरे काँच की चूड़ियाँ पहनेंगी तो उनके सुहाग, बच्चे और घर-द्वार सुरक्षित रहेगा। यदि किसी महिला ने यह नहीं पहनीं तो भारी अनिष्ट हो जायेगा। मजे की बात तो यह है कि गाँवों की अनपढ़ महिलाओं के साथ-साथ पढ़ी-लिखी, शहरी और कम्प्यूटर का उपयोग करने वाली मूर्ख महिलायें भी इस अंधविश्वास के चक्कर में पड़ रही हैं। “नारी शक्ति” और अबला-सबला आंदोलन चलाने वाली, सिन्दूर और मंगलसूत्र को गुलामी की निशानी मानने वाली कई महिलायें भी इसकी चपेट में हैं। चूड़ी निर्माता और विक्रेता जमकर माल कूट रहे हैं।

इसी प्रकार कुछ माह पहले इसी अंचल में “जलेबी” नामक अंधविश्वास चला था, जिसके अनुसार ढाई सौ ग्राम जलेबी को पूजा करके नर्मदा में विसर्जित करना था, जिससे कि महिलाओं/लड़कियों के भाईयों के जीवन पर आया संकट टल जाये। हालत यह हो गई थी कि नर्मदा नदी में जलेबी की चाशनी और मैदे की लुगदी के कारण घोर प्रदूषण के चलते प्रशासन को अन्त में यह चेतावनी देना पड़ी कि इस प्रकार की “जलेबी विसर्जन” ना किया जाये अन्यथा कड़ी कार्रवाई की जायेगी। भाई लोगों ने जमी-जमाई दुकानदारी छोड़कर नर्मदा किनारे जलेबी की दुकानें खोल ली थीं, अफ़वाह चलाई, महिलाओं को बेवकूफ़ बनाया, और अच्छा कमाया। नर्मदा नदी प्रदूषित होती है तो होती रहे, उनकी बला से, यूँ भी साल में दो बार गणेश और दुर्गा पूजा की लाखों मूर्तियाँ प्रवाहित करके पानी गन्दा करते ही हैं।

इसी प्रकार उज्जैन या आसपास के नगरों में धर्मप्राण(?) जनता को मूक प्राणियों, गाय-ढोर को चारा खिलाने का शौक होता है, उनका मानना है कि इससे पुण्य(?) मिलता है। अब यहाँ गणित यह खेला जाता है कि आवारा पशु, गाय-बैल आदि सड़क पर छोड़ दिये जाते हैं, फ़िर वही व्यक्ति खुद एक ठेला लेकर घास बेचने बैठ जाता है, घास बेच कर भी कमा लेता है, और अपने आवारा पशु को फ़ोकट में चारा भी खिलवा लेता है, सड़क पर गाय-बैल गोबर करते रहें, लोग टकरा-टकरा कर गिरते रहें, न प्रशासन को कोई मतलब होता है, ना ही धर्मालुओं(?) को, आखिर “धर्म” का मामला जो ठहरा। एक बात तो सिद्ध है, कि शिक्षा प्रसार का अंधविश्वास से कोई लेना-देना नहीं होता। हमारे एक पड़ोसी जो Ph.D. वाले डॉक्टर हैं, मुहूर्त देखकर घर से निकलते हैं, इसी प्रकार एक और MD डॉक्टर हैं जो पंचांग देखकर महत्वपूर्ण ऑपरेशन करते हैं, अब इसे क्या कहा जाये?

इस लगातार जारी मूर्खता का एक और प्रमाण हैं इंटरनेट पर सतत जारी ई-मेल अंधविश्वास अभियान, जिसमें आपसे कहा जाता है कि यह मेल जादू और चमत्कार भरी है, इसे आप बीस लोगों को Forward करेंगे तो आपको खजाना और सुख-समृद्धि प्राप्त होगी, पढ़े-लिखे लोग बगैर सोचे-समझे इसे Forward कर भी देते हैं। मेरे पास जब ऐसी कोई मेल आती है तो सबसे पहले उसे “कचरा पेटी” (Delete) का रास्ता दिखाता हूँ (वह भी Shift दबाकर)| लेकिन सिवाय माथा पीटने के या फ़िर हँसने के और क्या चारा रह जाता है? जब शिक्षित होकर भी लोगबाग इस तरह की हरकतें करते हैं तो गुस्सा भी आता है, शर्म भी आती है, और कभी-कभी लगता है कि क्यों हम खामख्वाह गाँव वालों और अनपढ़ों के पीछे पड़े रहते हैं, पहले शहरों में तो लोग छींकने और बिल्ली के रास्ता काटने जैसे घटियातम अंधविश्वासों से बाहर निकलें। लेकिन इसका कोई इलाज नहीं है।

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>ज्योतिषियों को चुनौती और अनसुलझे जवाब

>Challenge Astrology Unanswered Astro Questions

ज्योतिष के सिद्धांतों और उनकी अप्रासंगिकता तथा अवैज्ञानिकता को लेकर पिछले दो लेखों के अभी तक मुझे सन्तोषजनक जवाब प्राप्त नहीं हुए हैं। संतोषजनक मतलब तार्किक और वैज्ञानिक जवाब। जो प्रतिक्रियायें अभी तक मुझे मिली हैं, उनमें से अधिकतर का सार यही हैं कि “ज्योतिष तो एक महान शास्त्र है”, “हमारे पूर्वजों और ऋषि-मुनियों ने जिस पद्धति को विकसित किया, वह जरूर अच्छी ही होगी”, “जानकारी तो नहीं है, लेकिन ज्योतिष सत्य ही होगा”… आदि… तात्पर्य यह कि मेरे प्रश्नों का सोच-विचार कर तर्कसम्मत जवाब देने की बजाय अधिकतर लोगों ने “ज्योतिष तो सच ही है, हमारा विश्वास (या अंधविश्वास?) है, हमारे बुजुर्ग कभी गलत नहीं होते….” आदि-आदि की टेक ही लगाये रखी। एक ज्योतिषी महोदय ने समस्त ज्योतिष विरोधियों को नास्तिक ठहराते हुए तमाम चुनौतियाँ ही दे डालीं…. अस्तु। अब पुनः एक बार विद्वान ज्योतिषियों की सुविधा (या असुविधा?) के लिये मैं अपने सवाल दोहरा देता हूँ-

प्रश्न १ – यदि दूरस्थ ग्रहों का प्रभाव मानव पर पड़ता है, तो कैसे पड़ता है? क्या इस सम्बन्ध में ज्योतिषियों ने कोई अध्ययन किये हैं, यदि हाँ तो इन्हें किस जर्नल में प्रकाशित किया है? किस ग्रह का असर कितना होता है, क्या यह विस्तार से बताया गया है?

प्रश्न २ – क्या राहु-केतु नामक ग्रह होते हैं? या यह काल्पनिक हैं? यदि होते हैं, तो सौरमंडल में उनकी सही स्थिति और कोण आदि क्या है? और यदि काल्पनिक हैं, तो उनका असर कुंडलियों और जीवन पर कैसे पड़ता है? क्यों राहु और केतु का दशा काल 18 और 7 वर्ष रखा गया है? कोई अध्ययन या वैज्ञानिक ग्रन्थ हो तो “रेफ़रेन्स” दें।

प्रश्न ३ – एक ही स्थान, एक ही समय, एक ही परिवार, एक ही पृष्ठभूमि में जन्म लेने वाले दो जुड़वाँ बच्चों के कर्म, आचरण, शिक्षा, विवाह, बच्चों का जन्म और मृत्यु आदि में अन्तर क्यों आना चाहिये? (“भाग्य में लिखा है” नामक जवाब छोड़कर)

फ़लज्योतिष या भविष्यवक्ताओं को असुविधा में डालने के लिये कई ऐसे विषय हैं, जिन पर ज्योतिषी सीधे तौर कुछ भी बोलने से बचते रहते हैं, इसीलिये कई लोग अब यह मानने लगे हैं कि ज्योतिष या भविष्यकथन आदि के जो दावे किये जाते हैं वह दरअसल Law of Probability (संभाव्यता के सिद्धांत) पर आधारित होते हैं। यदि मेरे पास दस व्यक्ति प्रश्न पूछते हैं कि गुरुजी मेरी भैंस खो गई है, कहाँ मिलेगी? और मैं उन दसों व्यक्तियों को कहूँ कि जाओ बच्चा, तुम्हारी भैंस पूर्व दिशा में मिलेगी… तो इस बात की संभावना 40% से भी अधिक है कि सच में भैंस पूर्व दिशा में ही मिले, अर्थात मेरे चार भगत तो पक्के बन गये, बाकी के छः लोग भी अपने मन को किसी कारण से समझा लेंगे, लेकिन “बाबा” को दोष कतई नहीं देंगे। यदि भविष्यकथन इतना ही सही होता तो तमाम ज्योतिषी शेयर मार्केट में पैसा लगाकर रातोंरात अरबपति हो जाते, लेकिन ऐसा है नहीं, वरना मुकेश अम्बानी की जन्मपत्रिका देखकर कोई महान ज्योतिषी आसानी से बता सकता है कि “रिलायंस पेट्रोलियम” का शेयर अगले तीन साल में कितना “रिटर्न” देगा, ऐसा दावा अभी तक किसी ज्योतिषी से सुनने में तो नहीं आया है।

ज्योतिष के मूल सिद्धांत अर्थात “जन्म समय” जिस पर सारा ज्योतिष टिका हुआ है, जब वही विवादों के घेरे में हो तब सही भविष्यवाणी कैसे की जा सकती है। जन्म समय किसे माना जाये? जब गर्भ में पहली बार कोई जीव जन्म लेता है तब (यह तो खुद माँ-बाप भी नहीं बता सकते)…यदि यह समय जीवात्मा के जीवन का नहीं माना जाता तो फ़िर कम से कम गर्भधारण का आठवाँ महीना तो माना ही जाना चाहिये, क्योंकि तब तक बच्चे की सुनने-समझने की शक्ति विकसित हो चुकी होती है (वरना अभिमन्यु के चक्रव्यूह भेद वाली “थ्योरी” धराशायी हो जायेगी)… या उस समय को माना जाये जब वह गर्भाशय से बाहर आता है तब… या फ़िर उस समय को जब उसकी नाल काटी जाती है और पहली बार उसके मुँह से आवाज निकलती है तब… ज्योतिषियों में इस पर मतभेद हैं, तो पहले यह बात तो स्पष्ट हो, फ़िर बाकी की बातें… क्योंकि इन सभी समय में कहीं नौ माह का, कहीं दो चार मिनट का तो कहीं-कहीं दस पन्द्रह मिनट का अन्तर भी आना स्वाभाविक है। जब हमारे ज्योतिषी बन्धु इस बात पर जोर देते हैं कि हर पन्द्रह मिनट में ग्रहों की स्थिति बदल जाती है, तब इतने बड़े अन्तर से तो कुछ का कुछ हो सकता है। और इस बात की भी क्या गारंटी है कि नर्स ने प्रसूतिगृह से बाहर आकर जो समय बताया वही सही हो, उसमें भी हेर-फ़ेर हो ही सकता है… फ़िर कैसे सही भविष्य देखा जायेगा?

अब बात आती है चुनौतियों की, डॉ.अब्राहम कोवूर (भारत में जन्मे और फ़िलहाल श्रीलंका में स्थाई निवासरत) नामक एक वैज्ञानिक ने वर्षों पहले भारत में चल रहे अंधविश्वासों और “बाबागिरी” के चमत्कारों(?) को लेकर कुछ चुनौतियाँ दी थीं, जैसे बन्द कमरे में कथित चमत्कार दिखाना, कम से कम कपड़ों में चमत्कार दिखाना, अंगूठी, भभूत जैसी छोटी चीजों की बजाय हवा में से कद्दू, गन्ना जैसी वस्तुयें प्रकट करना आदि शामिल थीं (इन चुनौतियों को स्वीकार करने और करके दिखाने पर इनाम राशि उस वक्त एक लाख रखी थी, जो अब बढ़कर पाँच लाख कर दी गई है)। आज तक इन चुनौतियों को किसी ने स्वीकार नहीं किया है। १ से ३ दिसम्बर १९८५ को तीसरे अखिल भारतीय ज्योतिष सम्मेलन में इन्हीं डॉ.कोवूर ने ज्योतिषियों को भी निम्नलिखित चुनौतियाँ दी थीं-

(१) ज्योतिषियों को दस अचूक जन्मसमय की कुंडलियाँ दी जायेंगी और साथ ही दस हाथों के निशान कागज पर दिये जायेंगे, उन्हें सिर्फ़ यह बताना होगा कि सम्बन्धित व्यक्ति जीवित है या मृत? तथा स्त्री है या पुरुष?

(२) इसी प्रकार दूसरे दस कुंडलियों और अंगूठे के निशान के समूह के आधार पर सम्बन्धित व्यक्ति के शिक्षण, विवाह, दुर्घटनायें, नौकरी/व्यवसाय और मृत्यु की बाबत भविष्यवाणियाँ करना हैं, यदि अस्सी प्रतिशत भी सही निकल जायें तो हम (अर्थात महाराष्ट्र अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति) इसे विज्ञान मान लेंगे।

(३) ऊपर दी गई पद्धति के अनुसार विख्यात ज्योतिषियों (जिनका चयन भी ज्योतिषियों की महासमिति ही करे) को अलग-अलग कमरों में बैठाकर भविष्यकथन करवाया जायेगा। इससे यह सिद्ध होगा कि भारत के नामचीन ज्योतिषियों द्वारा एक जैसी कुंडलियों और समय के आधार पर किया गया कथन सत्य से कितना दूर होगा और उन्हीं महानुभावों के आपस में एक-दूसरे के विरोधी कथन आने पर समाज के सामने असलियत आ सकेगी।

लेकिन इस चुनौती को स्वीकार करने के लिये आज तक कोई तैयार नहीं हुआ है…फ़िर वे इसे विज्ञान कैसे कह सकते हैं? अभी तो मेरे पास कई प्रश्न हैं, फ़िलहाल लेख के शुरुआत में दिये हुए तीन प्रश्नों का उत्तर जान लूँ, और इन चुनौतियों के बारे में महान लोगों के विचार देखूँ, फ़िर आगे और सवाल होंगे… ज्योतिषीगण कृपया इनके जवाब दें, चाहे तो अपने ब्लॉग पर ही दें, या मुझे व्यक्तिगत मेल करें…
(सन्दर्भ : महाराष्ट्र अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति एवं प्रकाश घाटपांडे, पुणे)

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ज्योतिषियों को चुनौती और अनसुलझे जवाब

Challenge Astrology Unanswered Astro Questions

ज्योतिष के सिद्धांतों और उनकी अप्रासंगिकता तथा अवैज्ञानिकता को लेकर पिछले दो लेखों के अभी तक मुझे सन्तोषजनक जवाब प्राप्त नहीं हुए हैं। संतोषजनक मतलब तार्किक और वैज्ञानिक जवाब। जो प्रतिक्रियायें अभी तक मुझे मिली हैं, उनमें से अधिकतर का सार यही हैं कि “ज्योतिष तो एक महान शास्त्र है”, “हमारे पूर्वजों और ऋषि-मुनियों ने जिस पद्धति को विकसित किया, वह जरूर अच्छी ही होगी”, “जानकारी तो नहीं है, लेकिन ज्योतिष सत्य ही होगा”… आदि… तात्पर्य यह कि मेरे प्रश्नों का सोच-विचार कर तर्कसम्मत जवाब देने की बजाय अधिकतर लोगों ने “ज्योतिष तो सच ही है, हमारा विश्वास (या अंधविश्वास?) है, हमारे बुजुर्ग कभी गलत नहीं होते….” आदि-आदि की टेक ही लगाये रखी। एक ज्योतिषी महोदय ने समस्त ज्योतिष विरोधियों को नास्तिक ठहराते हुए तमाम चुनौतियाँ ही दे डालीं…. अस्तु। अब पुनः एक बार विद्वान ज्योतिषियों की सुविधा (या असुविधा?) के लिये मैं अपने सवाल दोहरा देता हूँ-

प्रश्न १ – यदि दूरस्थ ग्रहों का प्रभाव मानव पर पड़ता है, तो कैसे पड़ता है? क्या इस सम्बन्ध में ज्योतिषियों ने कोई अध्ययन किये हैं, यदि हाँ तो इन्हें किस जर्नल में प्रकाशित किया है? किस ग्रह का असर कितना होता है, क्या यह विस्तार से बताया गया है?

प्रश्न २ – क्या राहु-केतु नामक ग्रह होते हैं? या यह काल्पनिक हैं? यदि होते हैं, तो सौरमंडल में उनकी सही स्थिति और कोण आदि क्या है? और यदि काल्पनिक हैं, तो उनका असर कुंडलियों और जीवन पर कैसे पड़ता है? क्यों राहु और केतु का दशा काल 18 और 7 वर्ष रखा गया है? कोई अध्ययन या वैज्ञानिक ग्रन्थ हो तो “रेफ़रेन्स” दें।

प्रश्न ३ – एक ही स्थान, एक ही समय, एक ही परिवार, एक ही पृष्ठभूमि में जन्म लेने वाले दो जुड़वाँ बच्चों के कर्म, आचरण, शिक्षा, विवाह, बच्चों का जन्म और मृत्यु आदि में अन्तर क्यों आना चाहिये? (“भाग्य में लिखा है” नामक जवाब छोड़कर)

फ़लज्योतिष या भविष्यवक्ताओं को असुविधा में डालने के लिये कई ऐसे विषय हैं, जिन पर ज्योतिषी सीधे तौर कुछ भी बोलने से बचते रहते हैं, इसीलिये कई लोग अब यह मानने लगे हैं कि ज्योतिष या भविष्यकथन आदि के जो दावे किये जाते हैं वह दरअसल Law of Probability (संभाव्यता के सिद्धांत) पर आधारित होते हैं। यदि मेरे पास दस व्यक्ति प्रश्न पूछते हैं कि गुरुजी मेरी भैंस खो गई है, कहाँ मिलेगी? और मैं उन दसों व्यक्तियों को कहूँ कि जाओ बच्चा, तुम्हारी भैंस पूर्व दिशा में मिलेगी… तो इस बात की संभावना 40% से भी अधिक है कि सच में भैंस पूर्व दिशा में ही मिले, अर्थात मेरे चार भगत तो पक्के बन गये, बाकी के छः लोग भी अपने मन को किसी कारण से समझा लेंगे, लेकिन “बाबा” को दोष कतई नहीं देंगे। यदि भविष्यकथन इतना ही सही होता तो तमाम ज्योतिषी शेयर मार्केट में पैसा लगाकर रातोंरात अरबपति हो जाते, लेकिन ऐसा है नहीं, वरना मुकेश अम्बानी की जन्मपत्रिका देखकर कोई महान ज्योतिषी आसानी से बता सकता है कि “रिलायंस पेट्रोलियम” का शेयर अगले तीन साल में कितना “रिटर्न” देगा, ऐसा दावा अभी तक किसी ज्योतिषी से सुनने में तो नहीं आया है।

ज्योतिष के मूल सिद्धांत अर्थात “जन्म समय” जिस पर सारा ज्योतिष टिका हुआ है, जब वही विवादों के घेरे में हो तब सही भविष्यवाणी कैसे की जा सकती है। जन्म समय किसे माना जाये? जब गर्भ में पहली बार कोई जीव जन्म लेता है तब (यह तो खुद माँ-बाप भी नहीं बता सकते)…यदि यह समय जीवात्मा के जीवन का नहीं माना जाता तो फ़िर कम से कम गर्भधारण का आठवाँ महीना तो माना ही जाना चाहिये, क्योंकि तब तक बच्चे की सुनने-समझने की शक्ति विकसित हो चुकी होती है (वरना अभिमन्यु के चक्रव्यूह भेद वाली “थ्योरी” धराशायी हो जायेगी)… या उस समय को माना जाये जब वह गर्भाशय से बाहर आता है तब… या फ़िर उस समय को जब उसकी नाल काटी जाती है और पहली बार उसके मुँह से आवाज निकलती है तब… ज्योतिषियों में इस पर मतभेद हैं, तो पहले यह बात तो स्पष्ट हो, फ़िर बाकी की बातें… क्योंकि इन सभी समय में कहीं नौ माह का, कहीं दो चार मिनट का तो कहीं-कहीं दस पन्द्रह मिनट का अन्तर भी आना स्वाभाविक है। जब हमारे ज्योतिषी बन्धु इस बात पर जोर देते हैं कि हर पन्द्रह मिनट में ग्रहों की स्थिति बदल जाती है, तब इतने बड़े अन्तर से तो कुछ का कुछ हो सकता है। और इस बात की भी क्या गारंटी है कि नर्स ने प्रसूतिगृह से बाहर आकर जो समय बताया वही सही हो, उसमें भी हेर-फ़ेर हो ही सकता है… फ़िर कैसे सही भविष्य देखा जायेगा?

अब बात आती है चुनौतियों की, डॉ.अब्राहम कोवूर (भारत में जन्मे और फ़िलहाल श्रीलंका में स्थाई निवासरत) नामक एक वैज्ञानिक ने वर्षों पहले भारत में चल रहे अंधविश्वासों और “बाबागिरी” के चमत्कारों(?) को लेकर कुछ चुनौतियाँ दी थीं, जैसे बन्द कमरे में कथित चमत्कार दिखाना, कम से कम कपड़ों में चमत्कार दिखाना, अंगूठी, भभूत जैसी छोटी चीजों की बजाय हवा में से कद्दू, गन्ना जैसी वस्तुयें प्रकट करना आदि शामिल थीं (इन चुनौतियों को स्वीकार करने और करके दिखाने पर इनाम राशि उस वक्त एक लाख रखी थी, जो अब बढ़कर पाँच लाख कर दी गई है)। आज तक इन चुनौतियों को किसी ने स्वीकार नहीं किया है। १ से ३ दिसम्बर १९८५ को तीसरे अखिल भारतीय ज्योतिष सम्मेलन में इन्हीं डॉ.कोवूर ने ज्योतिषियों को भी निम्नलिखित चुनौतियाँ दी थीं-

(१) ज्योतिषियों को दस अचूक जन्मसमय की कुंडलियाँ दी जायेंगी और साथ ही दस हाथों के निशान कागज पर दिये जायेंगे, उन्हें सिर्फ़ यह बताना होगा कि सम्बन्धित व्यक्ति जीवित है या मृत? तथा स्त्री है या पुरुष?

(२) इसी प्रकार दूसरे दस कुंडलियों और अंगूठे के निशान के समूह के आधार पर सम्बन्धित व्यक्ति के शिक्षण, विवाह, दुर्घटनायें, नौकरी/व्यवसाय और मृत्यु की बाबत भविष्यवाणियाँ करना हैं, यदि अस्सी प्रतिशत भी सही निकल जायें तो हम (अर्थात महाराष्ट्र अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति) इसे विज्ञान मान लेंगे।

(३) ऊपर दी गई पद्धति के अनुसार विख्यात ज्योतिषियों (जिनका चयन भी ज्योतिषियों की महासमिति ही करे) को अलग-अलग कमरों में बैठाकर भविष्यकथन करवाया जायेगा। इससे यह सिद्ध होगा कि भारत के नामचीन ज्योतिषियों द्वारा एक जैसी कुंडलियों और समय के आधार पर किया गया कथन सत्य से कितना दूर होगा और उन्हीं महानुभावों के आपस में एक-दूसरे के विरोधी कथन आने पर समाज के सामने असलियत आ सकेगी।

लेकिन इस चुनौती को स्वीकार करने के लिये आज तक कोई तैयार नहीं हुआ है…फ़िर वे इसे विज्ञान कैसे कह सकते हैं? अभी तो मेरे पास कई प्रश्न हैं, फ़िलहाल लेख के शुरुआत में दिये हुए तीन प्रश्नों का उत्तर जान लूँ, और इन चुनौतियों के बारे में महान लोगों के विचार देखूँ, फ़िर आगे और सवाल होंगे… ज्योतिषीगण कृपया इनके जवाब दें, चाहे तो अपने ब्लॉग पर ही दें, या मुझे व्यक्तिगत मेल करें…
(सन्दर्भ : महाराष्ट्र अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति एवं प्रकाश घाटपांडे, पुणे)

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यह समूहिक ब्‍लाग आपका स्‍वागत करता है

आप सभी का हार्दिक स्‍वागत है, जल्‍द ही आपको इस ब्‍लाग पर काफी कुछ मिलेगा, अपना स्‍नहे बनाऐं रखिऐंगा।

हम 1 नवम्‍बर से लेखन कार्य प्रारम्‍भ कर रहे है।

>पाकिस्तान के महान गायक सलीम रज़ा का एक मधुर गाना

>

बहुत दिनों से महफिल सजी नहीं थी तो  आज  मन हुआ कुछ अच्छा सा गाना नेट से ढूंढ कर लगाया जाये और  कई घंटो की मेहनत के बाद एक ऐसा जबरदस्त गाना मिला, जिसे मैने लगातार कम से कम 20 बार सुना। गाने को सुनने पर लगता है कि इस गाने को तलत महमूद ने गाया  है। यह गाना पाकिस्तान के गायक सलीम रज़ा ( Saleem Raza) ने फिल्म सीमा Seema  (1963)के लिये गाया है। मुझे उम्मीद है आपको भी यह बहुत पसन्द आयेगा। 

सलीम रज़ा के कुछ गानों का लिंक मैने नीचे दिया है उन्हें सुनने  और देखने पर आपको यही महसूस होगा कि ये सारे गाने तलत महमूद ने ही गाये हैं।

http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://mahaphil.lifelogger.com/media/audio0/562484_hqrapbtcis_conv.flv&autoStart=false

भूल जाओगे तुम करके वादा सनम
तुम्हे दिल दिया तो ये जाना
भूल जाओगे तुम करके वादा …
तुम्हे… भूल…

दर्द का है समां गम की तन्हाई है
जिस तरफ देखिये बेकसी छाई है-२
आज  हर साँस पर होके बेताब दिल
धड़कने लगा तो ये जाना
भूल जाओगे तुम

कैसे गुजरेगी शाम कैसे होगी सहर
अब ना वो मंजिले और ना वो हमसफर-२
देखते देखते रह गुजर ए गुजर
अंधेरा हुआ तो ये जाना
भूल जाओगे तुम

चांद को देखकर हो रहा हो है गुमां
फूल के रुख  पे छाई  हो जैसे खजां 
मुस्कुराता हुआ मेरी

उम्मीद का चमन लुट गया तो

ये जाना भूल जाओगे तुम

करके वादा सनम

इस गाने को सुनने के बाद मैने गूगल पर सलीम रज़ा के बारे में जानकारी  ढूंढी तो कुछ नहीं मिला, बहुत देर सर खपाने के बाद मुझे मेरी गलती पता चली मैं रज़ा  की स्पैलिंग Raja  लिख रहा था। बाद में Raza  लिख कर सर्च किया तो बहुत सारा खजाना मिल गया। उस खजाने के कुछ अनमोल नग्में आपके लिये पेश किये हैं। भूल जाओगे तुम ….. के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली पर बहुत सारे वीडियो मिले। उनमें से एक वीडीयो यहाँ प्रस्तुत हैं। यह  गज़ल फिल्म पायल की  झंकार   से है और इसका संगीत दिया है रशीद अत्तरे ने।

 

 

सलीम रज़ा के और बहुत सारे गाने (वीडियो) देखने के लिये आप यहाँ क्लिक करें

सलीम रज़ा के बारे में  ज्यादा जानकारी के लिये यहाँ और यहाँ तथा उनके गाये हुए सारे गानों  के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें।

 इस गज़ल को हरिहरन ने अपने एल्बम सूकून में भी गाई है चलते चलते उसे भी सुन लीजिये यहाँ

     

 

चिट्ठाजगत Tag: गाने. संगीत

पाकिस्तान के महान गायक सलीम रज़ा का एक मधुर गाना

बहुत दिनों से महफिल सजी नहीं थी तो  आज  मन हुआ कुछ अच्छा सा गाना नेट से ढूंढ कर लगाया जाये और  कई घंटो की मेहनत के बाद एक ऐसा जबरदस्त गाना मिला, जिसे मैने लगातार कम से कम 20 बार सुना। गाने को सुनने पर लगता है कि इस गाने को तलत महमूद ने गाया  है। यह गाना पाकिस्तान के गायक सलीम रज़ा ( Saleem Raza) ने फिल्म सीमा Seema  (1963)के लिये गाया है। मुझे उम्मीद है आपको भी यह बहुत पसन्द आयेगा। 

सलीम रज़ा के कुछ गानों का लिंक मैने नीचे दिया है उन्हें सुनने  और देखने पर आपको यही महसूस होगा कि ये सारे गाने तलत महमूद ने ही गाये हैं।

भूल जाओगे तुम करके वादा सनम
तुम्हे दिल दिया तो ये जाना
भूल जाओगे तुम करके वादा …
तुम्हे… भूल…

दर्द का है समां गम की तन्हाई है
जिस तरफ देखिये बेकसी छाई है-२
आज  हर साँस पर होके बेताब दिल
धड़कने लगा तो ये जाना
भूल जाओगे तुम

कैसे गुजरेगी शाम कैसे होगी सहर
अब ना वो मंजिले और ना वो हमसफर-२
देखते देखते रह गुजर ए गुजर
अंधेरा हुआ तो ये जाना
भूल जाओगे तुम

चांद को देखकर हो रहा हो है गुमां
फूल के रुख  पे छाई  हो जैसे खजां 
मुस्कुराता हुआ मेरी

उम्मीद का चमन लुट गया तो

ये जाना भूल जाओगे तुम

करके वादा सनम

इस गाने को सुनने के बाद मैने गूगल पर सलीम रज़ा के बारे में जानकारी  ढूंढी तो कुछ नहीं मिला, बहुत देर सर खपाने के बाद मुझे मेरी गलती पता चली मैं रज़ा  की स्पैलिंग Raja  लिख रहा था। बाद में Raza  लिख कर सर्च किया तो बहुत सारा खजाना मिल गया। उस खजाने के कुछ अनमोल नग्में आपके लिये पेश किये हैं। भूल जाओगे तुम ….. के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली पर बहुत सारे वीडियो मिले। उनमें से एक वीडीयो यहाँ प्रस्तुत हैं। यह  गज़ल फिल्म पायल की  झंकार   से है और इसका संगीत दिया है रशीद अत्तरे ने।

 

हुस्न को चांद जवानी को बदल कहते हैं

 

सलीम रज़ा के और बहुत सारे गाने (वीडियो) देखने के लिये आप यहाँ क्लिक करें

सलीम रज़ा के बारे में  ज्यादा जानकारी के लिये यहाँ और यहाँ तथा उनके गाये हुए सारे गानों  के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें।

 इस गज़ल को हरिहरन ने अपने एल्बम सूकून में भी गाई है चलते चलते उसे भी सुन लीजिये यहाँ

     

 

चिट्ठाजगत Tag: गाने. संगीत

>१०,००० हिट्स और मेरी ब्लॉग यात्रा

>10000 hits and Blogging

अमूमन मैं अपने ब्लॉग का “स्टैट काऊँटर” नहीं देखता (ब्लॉग पर काफ़ी नीचे लगा हुआ है, और उस पर मेरी निगाह नहीं पड़ती), लेकिन कल जब अचानक उस पर मेरी नजर पड़ी तो मैं चौंक गया क्योंकि वह दस हजार का आँकड़ा पार कर गया था। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। फ़िर मैंने हिसाब लगाना शुरु किया, कि २६ जनवरी २००७ को ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखने के बाद अभी तो मात्र नौ महीने ही हुए हैं और हिट्स का आँकड़ा दस हजार पार कर गया, मतलब लगभग औसतन एक हजार से अधिक पाठक प्रत्येक माह में। यानी लगभग ३५ पाठक रोजाना (मन में सोच रहा हूँ कि “not bad”)। मुझे इस प्रगति से सन्तुष्ट होना चाहिये, क्योंकि २३ पाठक तो मेरे “सब्स्क्राईबर” हैं (यह तो तकनीकी लोग ही बतायेंगे कि सबस्क्राईब करने वाले की हिट्स भी इसमें शामिल होती हैं या नहीं, क्योंकि आमतौर पर सब्स्क्राइब करने वाला दोबारा ब्लॉग पर हिट नहीं करता)

मैं “नेटवर्किंग” के मामले में बहुत कमजोर हूँ। जिस तन्मयता और लगन से “उड़न तश्तरी” टिप्पणियाँ करते हैं, वैसी यदि मैं करता तो न जाने यह आँकड़ा कहाँ का कहाँ होता (कई वरिष्ठ ब्लॉगरों की यह सलाह है कि यदि हिट्स की संख्या बढ़ानी हो तो दूसरों के चिठ्ठों पर जा-जाकर टिप्पणियाँ करो)। लेकिन मैं इस मामले में बहुत नालायक हूँ, ब्लॉग पढ़ तो लेता हूँ, लेकिन “बहुत अच्छा”, “अच्छा लिखा है”, “मजा आ गया” जैसी औपचारिक टिप्पणियाँ मुझसे होती ही नहीं, जब तक लिखने वाले ने ऐसा कुछ ना लिखा हो जिससे कोई नई बात सूझे, या कोई विवाद की स्थिति हो तब तक मैं टिप्पणी कर ही नहीं पाता (इसे मेरा स्वभाव कहा जा सकता है), ना ही मैंने कोई “ब्लॉग-रोल” बनाया हुआ है, ना ही मैंने अपने चिठ्ठे पर “मेरे पसन्दीदा” नामक लिस्ट लगाई हुई है (इसका समय ही नहीं मिल पाता)। अपने छोटे से काम-धन्धे में से बड़ी मुश्किल से समय चुराकर ब्लॉग लिखना पड़ता है (घर पर कम्प्यूटर नहीं है), अब ब्लॉग लिखूँ, उस ब्लॉग पर रिसर्च करूँ, फ़िर उसे तरतीबवार जमाऊँ और पोस्ट करूँ, तो फ़िर दूसरे ब्लॉग पर टिप्पणी करने का समय ही नहीं मिल पाता (आशा है मित्रगण मुझे माफ़ करेंगे)।

लेकिन इन नौ-दस माह के ब्लॉग प्रवास के दौरान “उड़न-तश्तरी”, “ई-पंडित”, “सागर भाई”, “पंगेबाज” आदि का नियमित स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहा, वरना मैं तो अखबारों में ही लिखने में मस्त था। ब्लॉगिंग नाम की “खुजली” जब से लगी है, न दिन को चैन है ना रातों को आराम…. जब कोई विषय दिमाग में घूमता है, तब से लेकर उस पर शोध, अध्ययन और उसके पोस्ट होने तक की “प्रसव-पीड़ा” का बयान करना मुश्किल है। इस कालखंड में “सोनिया गाँधी” वाली सीरिज पर खूब गालियाँ भी खाई, वहीं “उच्चारण और वर्णमाला” सीरिज के लिये काफ़ी तारीफ़ भी पाई। अब ज्योतिषियों के पीछे पड़ा हूँ…क्या करूँ…. आदत से मजबूर हूँ, छोटे-छोटे ब्लॉग लिख ही नहीं पाता (जब तक बाल की खाल ना निकाल लूँ आराम नहीं आता), इसलिये सीरिज में लिखना पड़ता है (कई मित्रों को बुरा लग सकता है, लेकिन यहाँ मैं यह उल्लेख करना उचित समझता हूँ कि मराठी ब्लॉग विश्व के मुकाबले हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में बड़े-बड़े लेख पढने का मिजाज़ अभी पाठकों में नहीं आया है, कम से कम मुझे तो ऐसा प्रतीत हुआ है)…. साथ ही हिन्दी ब्लॉगिंग में हिट्स और टिप्पणियाँ उन्हें अधिक मिलते हैं, जिनके चिठ्ठे पर कोई विवादित, सांप्रदायिक या महिलाओं से सम्बन्धित बात हो, जबकि तथ्यपरक, खोजपरक और स्वस्थ बहस को जन्म देने वाले ब्लॉग की संख्या काफ़ी कम है। बहरहाल…. ब्लॉग के सेंसेक्स के दस हजार छूने पर सभी मित्रों, पाठकों, समर्थकों और विरोधियों का आभार… ऐसे ही प्रेम बनाये रखें… मैं उम्दा लिखने की भरसक कोशिश जारी रखूँगा ही…फ़िलहाल मैं २३ सब्स्क्राइबर और रोज की औसतन ३०-३५ हिट्स से सन्तुष्ट हूँ…. देखते हैं कि आगे-आगे क्या होता है…

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१०,००० हिट्स और मेरी ब्लॉग यात्रा

10000 hits and Blogging

अमूमन मैं अपने ब्लॉग का “स्टैट काऊँटर” नहीं देखता (ब्लॉग पर काफ़ी नीचे लगा हुआ है, और उस पर मेरी निगाह नहीं पड़ती), लेकिन कल जब अचानक उस पर मेरी नजर पड़ी तो मैं चौंक गया क्योंकि वह दस हजार का आँकड़ा पार कर गया था। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। फ़िर मैंने हिसाब लगाना शुरु किया, कि २६ जनवरी २००७ को ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखने के बाद अभी तो मात्र नौ महीने ही हुए हैं और हिट्स का आँकड़ा दस हजार पार कर गया, मतलब लगभग औसतन एक हजार से अधिक पाठक प्रत्येक माह में। यानी लगभग ३५ पाठक रोजाना (मन में सोच रहा हूँ कि “not bad”)। मुझे इस प्रगति से सन्तुष्ट होना चाहिये, क्योंकि २३ पाठक तो मेरे “सब्स्क्राईबर” हैं (यह तो तकनीकी लोग ही बतायेंगे कि सबस्क्राईब करने वाले की हिट्स भी इसमें शामिल होती हैं या नहीं, क्योंकि आमतौर पर सब्स्क्राइब करने वाला दोबारा ब्लॉग पर हिट नहीं करता)

मैं “नेटवर्किंग” के मामले में बहुत कमजोर हूँ। जिस तन्मयता और लगन से “उड़न तश्तरी” टिप्पणियाँ करते हैं, वैसी यदि मैं करता तो न जाने यह आँकड़ा कहाँ का कहाँ होता (कई वरिष्ठ ब्लॉगरों की यह सलाह है कि यदि हिट्स की संख्या बढ़ानी हो तो दूसरों के चिठ्ठों पर जा-जाकर टिप्पणियाँ करो)। लेकिन मैं इस मामले में बहुत नालायक हूँ, ब्लॉग पढ़ तो लेता हूँ, लेकिन “बहुत अच्छा”, “अच्छा लिखा है”, “मजा आ गया” जैसी औपचारिक टिप्पणियाँ मुझसे होती ही नहीं, जब तक लिखने वाले ने ऐसा कुछ ना लिखा हो जिससे कोई नई बात सूझे, या कोई विवाद की स्थिति हो तब तक मैं टिप्पणी कर ही नहीं पाता (इसे मेरा स्वभाव कहा जा सकता है), ना ही मैंने कोई “ब्लॉग-रोल” बनाया हुआ है, ना ही मैंने अपने चिठ्ठे पर “मेरे पसन्दीदा” नामक लिस्ट लगाई हुई है (इसका समय ही नहीं मिल पाता)। अपने छोटे से काम-धन्धे में से बड़ी मुश्किल से समय चुराकर ब्लॉग लिखना पड़ता है (घर पर कम्प्यूटर नहीं है), अब ब्लॉग लिखूँ, उस ब्लॉग पर रिसर्च करूँ, फ़िर उसे तरतीबवार जमाऊँ और पोस्ट करूँ, तो फ़िर दूसरे ब्लॉग पर टिप्पणी करने का समय ही नहीं मिल पाता (आशा है मित्रगण मुझे माफ़ करेंगे)।

लेकिन इन नौ-दस माह के ब्लॉग प्रवास के दौरान “उड़न-तश्तरी”, “ई-पंडित”, “सागर भाई”, “पंगेबाज” आदि का नियमित स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहा, वरना मैं तो अखबारों में ही लिखने में मस्त था। ब्लॉगिंग नाम की “खुजली” जब से लगी है, न दिन को चैन है ना रातों को आराम…. जब कोई विषय दिमाग में घूमता है, तब से लेकर उस पर शोध, अध्ययन और उसके पोस्ट होने तक की “प्रसव-पीड़ा” का बयान करना मुश्किल है। इस कालखंड में “सोनिया गाँधी” वाली सीरिज पर खूब गालियाँ भी खाई, वहीं “उच्चारण और वर्णमाला” सीरिज के लिये काफ़ी तारीफ़ भी पाई। अब ज्योतिषियों के पीछे पड़ा हूँ…क्या करूँ…. आदत से मजबूर हूँ, छोटे-छोटे ब्लॉग लिख ही नहीं पाता (जब तक बाल की खाल ना निकाल लूँ आराम नहीं आता), इसलिये सीरिज में लिखना पड़ता है (कई मित्रों को बुरा लग सकता है, लेकिन यहाँ मैं यह उल्लेख करना उचित समझता हूँ कि मराठी ब्लॉग विश्व के मुकाबले हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में बड़े-बड़े लेख पढने का मिजाज़ अभी पाठकों में नहीं आया है, कम से कम मुझे तो ऐसा प्रतीत हुआ है)…. साथ ही हिन्दी ब्लॉगिंग में हिट्स और टिप्पणियाँ उन्हें अधिक मिलते हैं, जिनके चिठ्ठे पर कोई विवादित, सांप्रदायिक या महिलाओं से सम्बन्धित बात हो, जबकि तथ्यपरक, खोजपरक और स्वस्थ बहस को जन्म देने वाले ब्लॉग की संख्या काफ़ी कम है। बहरहाल…. ब्लॉग के सेंसेक्स के दस हजार छूने पर सभी मित्रों, पाठकों, समर्थकों और विरोधियों का आभार… ऐसे ही प्रेम बनाये रखें… मैं उम्दा लिखने की भरसक कोशिश जारी रखूँगा ही…फ़िलहाल मैं २३ सब्स्क्राइबर और रोज की औसतन ३०-३५ हिट्स से सन्तुष्ट हूँ…. देखते हैं कि आगे-आगे क्या होता है…

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>ज्योतिष और दशा पद्धति की विसंगतियाँ (२)

>Contradictions in Astrological Methods
“ज्योतिष विज्ञान नहीं, कोरी कल्पना और अनुमान है” लेख में हमने देखा कि किस तरह से विज्ञान के मूल सिद्धांत पर भी ज्योतिष टिकता नहीं है और खामोश बना रहता है, अब उन “कथित” असरकारी तरंगों को देखें –

सबसे पहले याद करें ज्योतिष के मूल सिद्धांत को कि “ग्रह अपना प्रभाव धरती पर डालते हैं”, चलो मान लिया कि दूर आकाश से किसी प्रकार की किरणें मनुष्य के जन्म-स्थान तक पहुँच भी गईं, लेकिन यह समझ में नहीं आता कि वे किरणें धरती के दूसरे हिस्से में जन्म लेने वाले बच्चे तक कैसे पहुँच जाती हैं? (सभी जानते हैं कि धरती गोल है, इसलिये कोई भी ग्रह धरती के उसके सामने वाले हिस्से को ही प्रभावित कर सकता है, जैसे कि चन्द्र या सूर्यग्रहण कहीं-कहीं ही दिखाई देता है)। लेकिन ज्योतिष विज्ञान(?) के अनुसार ग्रहों और नक्षत्रों का असर धरती के उस दूसरे हिस्से पर भी होता है, जो उसके सामने नहीं है। शायद वे यह कहना चाहते हैं कि धरती तो चपटी है थाली की तरह, जिसमें सारी किरणें या जो भी कुछ है, सभी स्थानों पर जन्म लेने वालों पर समान प्रभाव डालेंगे।

(१) इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें – यह किरणें अधिकतर प्रकाश किरणों के रूप में होती हैं, और स्वाभाविक है कि ये किरणें धरती से अंधेरे वाले हिस्से में नहीं पहुँच सकतीं। न ही इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें धरती को भेदकर दूसरी तरफ़ पहुँच सकती हैं, मतलब ज्योतिष के लिये इन किरणों का कोई मतलब नहीं है।

(२) गुरुत्वाकर्षण – विज्ञान के अनुसार दो पिंडों के बीच की दूरी पर यह बल निर्भर होता है, लेकिन ज्योतिष विज्ञान को गुरुत्वाकर्षण से भी कोई लेना-देना नहीं होता। प्रत्येक ग्रह और धरती की दूरी समयानुसार थोड़ी-बहुत घटती-बढती रहती है, सो उसका असर भी कम-ज्यादा होना चाहिये, लेकिन ज्योतिष इस बात को नहीं मानता।

(३) चुम्बकीय किरणें – इनका प्रभाव एक बहुत ही सीमित हिस्से तक होता है, ये अधिक दूरी तक प्रवास नहीं कर सकतीं। करोड़ों मील दूर किसी ग्रह से चुम्बकीय किरणें यहाँ तक पहुँचना नितांत असम्भव है। इसी प्रकार वैदिक ज्योतिष के “खास” कमाई वाले ग्रह राहु-केतु की उपस्थिति के बारे में अभी तक तो विज्ञान को नहीं पता, कि वे धरती के किस कोण पर, कितनी दूरी पर स्थित हैं, राहु और केतु की तारामंडल में निश्चित स्थिति क्या है? न ही ज्योतिष विज्ञान ने किसी तरह से हमें यह बताने की जहमत उठाई है। क्या राहु-केतु कोई चुम्बकीय प्रभाव डाल सकते हैं? पता नहीं..। मतलब चुम्बकीय प्रभाव वाली “थ्योरी” भी नहीं लागू हो रही… तात्पर्य यह है कि यदि हम मान भी लें कि ग्रहों या नक्षत्रों का कोई प्रभाव होता भी है, तो कृपया बताया जाये कि वह पृथ्वी तक पहुँचता किस प्रणाली से है? स्वाभाविकतः एक सवाल मन में उठता है कि कहीं ये किरणें ग्रहों की बजाय ज्योतिषियों के दिमाग की तरंगें तो नहीं?

इस मोड़ पर आकर तमाम ज्योतिषी दैवी शक्ति, पुराण, पवित्रता, आदि की दुहाई देने लग जाते हैं। वे कुतर्क देने लग जाते हैं कि “ज्योतिष” कोई ऐसा-वैसा या ऐरा-गैरा विषय नहीं है, यह विषय विज्ञान के आगे की चीज है, जहाँ भौतिक विज्ञान समाप्त होता है, वहाँ से ज्योतिष आरम्भ होता है…आदि-आदि, और तारों-ग्रहों-नक्षत्रों का प्रभाव धरती के प्राणियों पर अवश्य पड़ता है। यह प्रभाव रहस्यमयी तरीके से यहाँ तक पहुँचता है। ऊपर दिये गये तर्कों को काटने के लिये कुछ प्रसिद्ध ज्योतिषियों ने इस प्रभाव को दैवीय और गुप्त रूप से उत्पन्न भी बताया है। वे सीधे कह देते हैं कि ग्रहों की स्थितियों के अनुसार पड़ने वाले प्रभावों को वैज्ञानिक तरीके से साबित नहीं किया जा सकता।

इन तर्कों के आधार पर ज्योतिषियों का दोमुँहापन साफ़-साफ़ उजागर हो जाता है, जब हम कहते हैं कि ज्योतिष शास्त्र दैवीय शक्तियों, चमत्कार आदि की बातें करता रहता है तो वे कहते हैं कि नहीं यह एक विज्ञान है, और जब विज्ञान सम्बन्धी उनके तर्क नहीं चलते तो वे गुप्त, रहस्यमयी, पाप-पुण्य, भाग्य आदि की बातें करके कहते हैं कि इसे विज्ञान द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता, अब इसे क्या कहा जाये?

वैदिक ज्योतिष में “दशा-पद्धति” की विसंगतियाँ और उठते प्रश्न –
“ज्योतिष” विज्ञान का मूल सिद्धान्त है “जैसा ऊपर, वैसा ही नीचे” अर्थात जैसा अन्तरिक्ष या सुदूर ब्रह्माण्ड में घटित होगा उसका असर धरती पर पड़ेगा। अर्थात ऐसी उनकी मान्यता होती है, और उसी के अनुसार वे भविष्य में आने वाली घटनाओं की गणना करके “ग्राहक” को बताते हैं। हमें देखना होगा कि जिस “ऊपर” नाम की चीज या “ब्रह्माण्ड” की बातें ये करते हैं और उसी के आधार पर राशियों और जन्म-कुण्डली का निर्धारण करते हैं, दर-असल वहाँ वैज्ञानिक समय पद्धति से क्या-क्या घट रहा है, जिसके आधार पर यहाँ “नीचे” मनुष्यों के भविष्य, भाग्य(?) और दुर्भाग्य(?) का निर्धारण वे सतत्‌ करते रहते हैं। ज्योतिष के मूल सिद्धान्त “दशा-पद्धति” में साफ़-साफ़ असंगत नजर आते हैं। “दशा-पद्धति” सिर्फ़ “मानो या ना मानो” के सिद्धान्त पर काम करती है, इसका ग्रहों या तारों से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता, न ही राशियों और जन्म-नक्षत्रों से। अद्‌भुत तरीके से यह “गणनायें” की जाती हैं और इसमें सिर्फ़ ग्रह का नाम देना ही पर्याप्त होता है, राशि का नाम जरूरी नहीं है। “दशा-पद्धति” ऐसी अनोखी पद्धति है जिसमें तारों और ग्रहों की कोई आवश्यकता नहीं है, सिर्फ़ उनका नाम लेना काफ़ी है।

दशा-पद्धति के आधारभूत तत्व-
इस पद्धति में ग्रह का नाम होता है, एक “प्रॉक्सी” के तौर पर, यह नाम ही उस ग्रह की तमाम “पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी” लेकर चलता है, इसलिये ध्यान दें कि “ग्रह” मतलब सिर्फ़ एक नाम है, असली ग्रह नहीं। यह पद्धति मानकर चलती है हरेक ग्रह का अपना-अपना पूर्वनिर्धारित “स्वभाव” और “प्रभाव” होता है और ये ग्रह उसी के अनुसार मनुष्य पर कुछ वर्षों तक अपना असर डालते हैं, जिसे वे “दशा-काल” कहते हैं। ग्रहों के नाम और स्थान मनमाने तरीके से संयोजित किये हुए प्रतीत होते हैं, क्योंकि ये ग्रह उसी निर्धारित क्रम पर चलते हैं। वे एक के बाद एक आते हैं और मनुष्य के जीवन पर अपने निर्धारित वर्षों तक प्रभाव डालते हैं, फ़िर अगला ग्रह दूसरे ग्रह से “चार्ज” ग्रहण करता है और यह प्रक्रिया चलती रहती है। १२० वर्षों की दशा को “विंशोत्तरी” कहा जाता है जिसमें ग्रहों का क्रम इस प्रकार है – केतु (एक काल्पनिक ग्रह), शुक्र (Venus), सूर्य (Sun), चन्द्र (Moon), मंगल (Mars), राहु (काल्पनिक), गुरु (Jupiter), शनि (Saturn) और बुध (Merquery). इन ग्रहों का दशा-काल (प्रभाव समय) इस प्रकार मान लिया गया है – 7, 20, 6, 10, 7, 18, 16, 19, और 17 कुल मिलाकर 120 वर्ष। जबकि 108 वर्षों के दशा-काल, जिसे “अष्टोत्तरी” कहा जाता है, इसमें ‘केतु’ को निकाल दिया गया है। इस काल में शुक्र से मंगल तक तो क्रम वही है, लेकिन बाकी के चार ग्रहों को उलटे क्रम में लगा दिया जाता है, पता नहीं क्यों (जाहिर है कि ज्योतिष के विद्वान मेरे जैसे अज्ञानी और अधर्मी को इस बात का भी जवाब देंगे)। निश्चित तौर पर इन सबका कोई ठोस कारण नहीं नजर आता। जब राहु और केतु दोनों काल्पनिक ग्रह हैं फ़िर राहु का दशा काल 18 वर्ष और केतु का 7 वर्ष क्यों? दशा पद्धति का सम्बन्ध हमारे जीवन पर ऐसा माना गया है – बच्चे का जन्म नक्षत्र (Zodiac Birth) कुण्डली के आधार पर तय किया जाता है, इस जन्म-नक्षत्र का एक ‘स्वामी’ (Boss) या भगवान होता है। जब इसका कार्यकाल समाप्त हो जाता है तब अगल ग्रह आकर उसका स्थान ले लेता है और यह क्रम सम्पूर्ण जीवन तक चलता रहता है।

कुछ ज्योतिषी और पुराने लोग तो यह दावे भी करते रहते हैं कि – “कुछ प्राचीन ऋषियों ने हजारों साल पहले ताड़पत्रों पर समूची मानव जाति का भविष्य लिख दिया था”, “उन ऋषियों ने तो सारे अनुमान और जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य का भूत-भविष्य पहले ही देख लिया था”, “उन ताड़पत्रों को सिर्फ़ विशेषज्ञ लोग ही पढ़ सकते हैं क्योंकि वे एक विशिष्ट भाषा में लिखे हुए हैं”, तात्पर्य यह कि सब कुछ रहस्यमयी, मनमाना, अगणितीय, अवैज्ञानिक है। यदि नहीं, तो महान लोग बताने का कष्ट करें कि- एक ही स्थान और एक ही समय पर, यहाँ तक कि लगभग एक ही पारिवारिक पृष्ठभूमि रखने वाले दो बच्चों (यहाँ तक कि जुड़वाँ बच्चों) के कर्म, उनके भविष्य, उनकी नौकरी/व्यवसाय, उनकी शादी, उनके बच्चे, उनकी मृत्यु के बीच समानता क्यों नहीं होती? क्यों सुनामी में मारे गये लाखों लोगों की कुण्डली एक जैसी नहीं थी?

जब विज्ञान कहता है कि H2 और O को मिलाकर पानी बनता है तो वह पानी साइबेरिया में भी बनता है और ऑस्ट्रेलिया में भी बनता है। विज्ञान कभी भी यह नहीं कहता कि अब हम यह टेलीफ़ोन चालू कर रहे हैं, यदि आपका “कर्म” अच्छा होगा तो यह चलेगा, नहीं तो नहीं चलेगा। विज्ञान ने यह भी कभी नहीं कहा कि हम यह मोटर चालू कर रहे हैं, यदि आपका “भाग्य” साथ देता रहा तो यह चलती रहेगी, हो सकता है कि न भी चले, यह भी हो सकता है कि आपके पूर्वजन्म के कारण यह मोटर जल जाये। लेकिन ज्योतिषियों के पास इस बाबत्‌ तमाम कुतर्क होते हैं, और भोला भगत इस बात पर विश्वास कर लेता है कि “पंडित” जी ने तो भविष्य एकदम सही बताया था, लेकिन क्या करें “भाग्य में यही लिखा था”, “जो होना है वह होकर ही रहता है”, “हो सकता है कि हमारे कर्मों में कोई खोट हो” आदि-आदि। मतलब ज्योतिषी महोदय माल अंटी करके भी साफ़ बरी।

हाल ही में तमिलनाडु में एक व्यक्ति ने कोर्ट में धोखाधड़ी का मुकदमा दायर किया था जिसमें ज्योतिषी महोदय एक मृत व्यक्ति की कुण्डली देखकर उसके उज्जवल भविष्य और चमकदार कैरियर की भविष्यवाणियाँ करते पकड़े गये थे। जब कुण्डली देखकर वे यह भी नहीं बता सकते कि मौत हो चुकी है तब वे विवाह, गृहप्रवेश, परीक्षा में पास/फ़ेल होने जैसी बातों के बारे में एकदम सही कैसे बता सकते हैं। एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल (जो कि ज्योतिष, ज्योतिषियों, पंडों और पुजारियों के लिये मशहूर है) के एक प्रसिद्ध ज्योतिषी की लड़की ने घर से भागकर एक दूसरे धर्म के लड़के से शादी कर ली, ज्योतिषी महाशय को पता ही नहीं चल सका। दूसरे एक और महान ज्योतिषी ने अपनी लड़की की पचासों कुंडलियाँ मिलाकर, तमाम ठोक-बजाकर उसकी शादी की लेकिन “जमाईराजा” दारुकुट्टे और जुआरी निकले, उनकी लड़की को आत्महत्या करनी पड़ी, ऐसा क्यों? यदि वे पचास कुंडलियाँ देखकर भी अपने लिये एक सही दामाद नहीं ढूँढ सकते तो फ़िर उन्हें ज़माने को ‘ज्ञान’ बाँटने का क्या हक है? इसलिये इसे विज्ञान कहना तो कम से कम बन्द किया जाये, हाँ, यह जरूर कहा जा सकता है कि यह सिर्फ़ एक अनुमान है, जिसके सही या गलत होने की पूरी सम्भावना है, और यही तो हम कह रहे हैं… दिक्कत यह है कि “खगोल विज्ञान” का विस्तार करके स्वार्थी तत्वों ने उसे “ज्योतिष विज्ञान” बना दिया है।

दुनिया के बड़े-बड़े और विद्वान ज्योतिषी सेमिनार करें, गोष्ठियाँ करें, सभायें करें, कुछ उपकरणों की मदद लें और सभी मिलकर बतायें कि फ़लाँ लड़की की कुण्डली में भयानक सा “मंगल” बैठा हुआ है, अव्वल तो इसकी शादी होगी ही नहीं या यदि किसी ने इससे शादी की तो उसकी इतने-इतने समय में मृत्यु हो जायेगी, और वाकई में वैसा ही हो तब तो इसे विज्ञान माना जायेगा… और ऐसा एक कुंडली में नहीं बल्कि सर्वमान्य रूप से एक जैसी कुण्डलियों में होना चाहिये, यही तो विज्ञान का सिद्धान्त है कि जो एक जगह और एक व्यक्ति के लिये लागू है वही सभी के लिये लागू होगा। लेकिन नहीं, जहाँ आपने तर्क-वितर्क करने की कोशिश की, तत्काल आप अधर्मी, नालायक, बड़बोले आदि घोषित कर दिये जाते हैं, ताकि सच्चाई (जो अभी साबित होना बाकी है) सामने न आ सके, धन्धा-पानी बदस्तूर जारी रहे।

हाल ही में हरियाणा के रोहतक में एक डॉक्टर दंपति ने तथाकथित तन्त्र-मंत्र के चक्कर में अपने एक बेटे की बलि चढ़ा दी, यह निश्चित तौर पर झकझोरने वाली और समर्थ सोच रखने वाले लोगों के लिये वाकई चिन्ता की बात है। एक पढ़े-लिखे पति-पत्नी भी जब तंत्र-मंत्र के चक्कर में इस हद तक गिर जाते हैं तो बेचारे अनपढ़ और गाँव वाले लोगों को क्या दोष दिया जा सकता है? तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत, ज्योतिष-कुण्डली, धर्म-कर्म, भाग्य, अंधविश्वास आदि से हमारा समाज इतना प्रभावित है कि उच्च और वैज्ञानिक शिक्षा भी उसे “बाबागिरी”, “कर्मकाण्ड” आदि कुचक्रों से बाहर नहीं निकाल पा रही है।

ज्योतिषी जरा नील आर्मस्ट्रॉंग की कुंडली देखकर बतायें कि उस पर चन्द्रमा का कितना असर हुआ? और सुनीता विलियम्स की कुंडली भी देखें कि लगभग दो सौ दिन पृथ्वी से दूर रहने से मंगल का कितना प्रभाव उस पर कम-ज्यादा हुआ, क्योंकि पृथ्वी के चक्कर लगाने के दौरान सुनीता की दूरी रोज-ब-रोज मंगल और चन्द्रमा से घटती-बढ़ती रही थी? फ़िर वैज्ञानिक आँकड़ों के साथ विश्व के सामने आयें और बतायें। वरना यूँ ही ज्योतिष को ‘विज्ञान’ कह देने भर से विज्ञान मान लेना भी एक अज्ञानता होगी।

अधर्मी, विधर्मी, नालायक, बड़बोला, अज्ञानी, बेवकूफ़ आदि शब्दों को अग्रिम में ग्रहण करते हुए वैज्ञानिक और गणितीय तर्कों के इन्तजार में हूँ….. ताकि उनका भी सकारात्मक जवाब दिया जा सके। अगले भाग में कुछ और तार्किक प्रश्न होंगे, जाहिर है कि मुझमें अक्ल की कमी है…

(लेख में सन्दर्भ – महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के साहित्य से)

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