जिन्दगी/मौत : एक तलाश???


मेरे जेहन मे अचानक ख्याल आया की, क्यों ना मौत की परिभाषा ढुढीं जाये। क्या सांसो के रुकने को ही मौत का नाम दिया जा सकता है या मौत की कोई और भी परिभाषा हो सकती है । पर सर्वप्रथम ये जानना जरुरी है की जिन्दगी क्या है? क्योकीं जिन्दगी और मौत एक सिक्के के दो पहलु है, और एक को जाने बिना दुसरे को जानना नामुमकिन है ।

जिन्दगी चलने का नाम है, जो कभी नही रुकती, किसी के लिये भी, चाहे शाहंशाह हो या फकीर। जिन्दगी हॅसने, खेलने, और मुस्कुराने का नाम है। कहना कितना आसान है, पर हकीकत से कोसों दुर।

जिन्दगी की शुरुआत होती है, जब बच्चा माँ के गर्भ मे आता है,हर तरफ खुशियां। प्रसवपीडा के असहनीय दर्द को सहते हुये, जब माता अपने पुत्र/पुत्री को निहारती है, तो उसे जैसे एह्सास होता है, जैसे ये दर्द तो जिन्दगी की उन खुशियों मे से है, जिसका इन्तजार वो वर्षों से कर रही हो। और शुरुआत होती है, एक नयी जिन्दगी की, सिर्फ पुत्र की नहीं वरन माता की भी। दुसरा पहलु आधुनिक युग २१वीं सदी…जहाँ माता मातृत्व के सुख से दुर होने की कोशिश कर रहीं, सिर्फ अपनी काया को बचाये रखने के लिये । अपनी ना खत्म होने वाली महत्वाकांक्षी आकाक्षओं की पुर्ति के लिये । क्या इसे भी जिन्दगी का नाम दिया जा सकता है, शायद नही, ये भी तो मौत का ही एक रुप है, जहां एक तरफ माँ की मौत हो रही है तो दुसरी तरफ उस बालक की जो इस संसार मे अपने अस्तिव को तलाशने लिये उत्सुक है।

श्रवण कुमार, जिसने अपने अँधे माता पिता को अपने काँधे पर बैठा कर तीर्थयात्रा का प्रयोजन किया और पुत्रधर्म को निभाते निभाते स्वर्गवासी हो गया । दुसरी तरफ आज का युवा, आखों मे हजारों सपने, बस वक्त नही है तो अपने मातापिता के लिये । लेकिन लेकिन लेकिन ये कहना गलत होगा की आज का युवा पुत्रधर्म नही निभाता है । पुत्रधर्म आज भी निभाया जा रहा है, वृद्धाआश्रम मे कुछ रुपयों को दे कर । फिर से एक ही चरित्र, “पुत्र “ जो एक तरफ मौत को गले लगाता है, और रिश्तों को जी जाता है, और दुसरी तरफ, दूसरा पुत्र हंस रहा है, खेल रहा है, गा रहा है, बस कुछ रुपये वृद्धाआश्रम मे दे कर। पर शायद ये भी जिन्दगी है, जो एक पुत्र रिश्तों के मौत पर जीता है।

सांसो के शुरुआत से लेकर सांसो के बंद होने तक, एक इन्सान ना जाने कितनी बार जन्म लेता है,और कितनी बार मरता है, फिर शोक हमेशा सांसो के बंद होने के बाद ही क्यों मनाया जाता है? अगर सांसो का बंद होना ही मृत्यु है, तो आज हम महात्मा गान्धी, भगत सिंह्, सुभाषचन्द्र बोस जैसे अनगिनत विभुतियों के नाम क्यों याद रखते है? क्यों हर बार अपनी बातों मे इनका जिक्र ले आते है? क्योकि शायद ये विभुतियां आज भी जिन्दा हैं ।मैने सुन रखा है, “जिन्दगी चंद सांसो की गुलाम है,जब तक सांसे है तब तक जिन्दगी है”, पर शायद ये अधुरा सच है, क्योंकि पुरे सच मे “मौत चंद सांसो की गुलाम है, जो इन्तजार करती है की कब ये सांसे रुके और मै कब अपना दामन फैलाऊं। और जिन्दगी उन कर्मों का नाम है, जो कभी खत्म नही होती, इतिहास के पन्नों मे कैद हो कर, सदा सदा के लिये जीवित रहती है”।

मौत तो बेवफा है,फकत चंद सांसो के ले जायेगी,
जिन्दगी तो महबुबा है, अपने कर्मों के संग,
इतिहास के पन्नों मे मुझको लिखवा कर,
सदा के लिये जीवित कर जायेगी

दु:खद समाचार

ईश्वर भी कितनी निष्ठुर हो सकता है, मुझे इसका अनुमान न था। हमारे समूह श्री आशुतोष “मासूम” जी के 21 वर्षीय छोटे भाई दीपक का दो दिनों पूर्व देहान्‍त हो गया। परिवार को जो छति हुई उसी क्षतिपूर्ति किसी भी प्रकार नही की जा सकती है। दीपक के जाने शून्‍य स्‍थापित हुआ है वह भरा नही जा सकता है। विपत्ति की इस घड़ी में ईश्‍वर से प्रार्थना है कि शोक संतप्‍त परिवार को बल प्रदान करें और दिवंगत आत्‍मा को शान्ति प्रदान करें।

>प्रिय पापा आपके बिना…….

>आज महफिल में एक बेटी का दर्द…..

हमारे साहित्य में माता को बहुत सम्मान दिया गया है, उतना शायद पिता को नहीं मिलता। परन्तु बेटियाँ पिता की ज्यादा प्यारी होती है। शायद सभी महिलाएं इस बात से सहमत होंगी… सांभळो छो लावण्या बेन..?

आज गुजराती साईट्स को खोजते समय अचानक ही एक बहुत ही मधुर गुजराती गीत मिल गया। यह गीत सुरत के प्रसिद्ध साईकियाट्रिस्ट और कवि डॉ मुकुल चोकसी ने लिखा है। मुकुल चोकसी के पिता मनहर लाल चोकसी भी गुजराती के सुप्रसिद्ध कवि थे।

प्रस्तुत गीत में एक बेटी अपने विवाह के बाद सुसराल में अपने पिता को याद करते हुए कह रही है .. प्रिय पप्पा हवे तो तमारा वगर. मनने गमतो नथी गाम, फळीयु के घर… यानि प्रिय पापा आपके बिना मेरे मन को कुछ भी अच्छा नहीं लगता ना गाँव, ना मोहल्ला और ना घर। प्रस्तुत गीत जब मैने पहली बार सुना इतना पसन्द आया कि कई बार सुनते ही रहा और यकीन मानिये अंतिम पंक्तियों को सुनते समय आंख से आंसु निकल आये। मैने फटाफट अपने गुजराती चिट्ठे पर लिखा कि मुझे इस गीत के बारे में जानकारी चाहिये, परन्तु किसी का जवाब नहीं मिला। आखिरकार मैने खुद ही कई घंटों की मेहनत के बाद इसे ढूंढ निकाला। यह गीत मिला एक गुजराती ब्लोग पर और वह भी प्लेयर के साथ। मैं जयश्रीबेन का धन्यवाद करना चाहता हूँ कि उन्होने इस गीत को टहुको नामक सुप्रसिद्ध गुजराती ब्लॉग पर लगाया, और आखिरकार यह हिन्दी के पाठकों और श्रोताऒं के लिये सुलभ हो सका।

मैं गुजराती के साथ उनका सरल हिन्दी अनुवाद लिख रहा हूँ, आशा है आपको यह गीत बहुत पसन्द आयेगा। यह गीत नयना भट्ट ने गाया है और इसके प्रतिभावान संगीतकार हैं सुरत के ही… मेहुल सुरती।

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પ્રિય પપ્પા હવે તો તમારા વગર
પ્રિય પપ્પા હવે તો તમારા વગર
(प्रिय पापा आपके बिना)
મનને ગમતું નથી, ગામ ફળિયું કે ઘર
(मन को कुछ अच्छा नहीं लगता गाँव, मोहल्ला और घर)

આ નદી જેમ હું પણ બહુ એકલી
( इस नदी की तरह मैं भी बहुत अकेली हूँ)
શી ખબર કે હું તમને ગમું કેટલી
( क्या पता मैं आपकी कितनी लाड़ की हूँ)
આપ આવો તો પળ બે રહે છે અસર
( आप जब आते हो तो पल दो पल असर रहता है)
જાઓ તો લાગે છો કે ગયા ઉમ્રભર
( जाते हो तो यों लगता है कि उम्रभरके लिये जा रहे हों)
…મનને ગમતું નથી, ગામ ફળિયું કે ઘર …

યાદ તમને હું કરતી રહું જેટલી
( आपको मैं जितनी याद करती हूँ)
સાંજ લંબાતી રહે છે અહીં એટલી
( यहाँ शाम उतनी ही लंबी होती जाती है)
વ્હાલ તમને ય જો હો અમારા ઉપર
( अगर आपको हम पर लाड़ हो)
અમને પણ લઇને ચાલો તમારે નગર
( तो हमें भी ले चलो अपने/आपके नगर)
…મનને ગમતું નથી, ગામ ફળિયું કે ઘર …

यहाँ व्हाल शब्द का अनुवाद लाड़ लिखा है… क्यों कि शायद प्रेम शब्द उतना सही नहीं होता। पिता पुत्री के बीच में जो नेह का नाता होता है उसके लिये यही शब्द ज्यादा सही लगा मुझे।

प्रिय पापा आपके बिना…….

आज महफिल में एक बेटी का दर्द…..

हमारे साहित्य में माता को बहुत सम्मान दिया गया है, उतना शायद पिता को नहीं मिलता। परन्तु बेटियाँ पिता की ज्यादा प्यारी होती है। शायद सभी महिलाएं इस बात से सहमत होंगी… सांभळो छो लावण्या बेन..?

आज गुजराती साईट्स को खोजते समय अचानक ही एक बहुत ही मधुर गुजराती गीत मिल गया। यह गीत सुरत के प्रसिद्ध साईकियाट्रिस्ट और कवि डॉ मुकुल चोकसी ने लिखा है। मुकुल चोकसी के पिता मनहर लाल चोकसी भी गुजराती के सुप्रसिद्ध कवि थे।

प्रस्तुत गीत में एक बेटी अपने विवाह के बाद सुसराल में अपने पिता को याद करते हुए कह रही है .. प्रिय पप्पा हवे तो तमारा वगर. मनने गमतो नथी गाम, फळीयु के घर… यानि प्रिय पापा आपके बिना मेरे मन को कुछ भी अच्छा नहीं लगता ना गाँव, ना मोहल्ला और ना घर। प्रस्तुत गीत जब मैने पहली बार सुना इतना पसन्द आया कि कई बार सुनते ही रहा और यकीन मानिये अंतिम पंक्तियों को सुनते समय आंख से आंसु निकल आये। मैने फटाफट अपने गुजराती चिट्ठे पर लिखा कि मुझे इस गीत के बारे में जानकारी चाहिये, परन्तु किसी का जवाब नहीं मिला। आखिरकार मैने खुद ही कई घंटों की मेहनत के बाद इसे ढूंढ निकाला। यह गीत मिला एक गुजराती ब्लोग पर और वह भी प्लेयर के साथ। मैं जयश्रीबेन का धन्यवाद करना चाहता हूँ कि उन्होने इस गीत को टहुको नामक सुप्रसिद्ध गुजराती ब्लॉग पर लगाया, और आखिरकार यह हिन्दी के पाठकों और श्रोताऒं के लिये सुलभ हो सका।

मैं गुजराती के साथ उनका सरल हिन्दी अनुवाद लिख रहा हूँ, आशा है आपको यह गीत बहुत पसन्द आयेगा। यह गीत नयना भट्ट ने गाया है और इसके प्रतिभावान संगीतकार हैं सुरत के ही… मेहुल सुरती।

પ્રિય પપ્પા હવે તો તમારા વગર
પ્રિય પપ્પા હવે તો તમારા વગર (प्रिय पापा आपके बिना)
મનને ગમતું નથી, ગામ ફળિયું કે ઘર (मन को कुछ अच्छा नहीं लगता गाँव, मोहल्ला और घर)

આ નદી જેમ હું પણ બહુ એકલી ( इस नदी की तरह मैं भी बहुत अकेली हूँ)
શી ખબર કે હું તમને ગમું કેટલી ( क्या पता मैं आपकी कितनी लाड़ की हूँ)
આપ આવો તો પળ બે રહે છે અસર ( आप जब आते हो तो पल दो पल असर रहता है)
જાઓ તો લાગે છો કે ગયા ઉમ્રભર ( जाते हो तो यों लगता है कि उम्रभरके लिये जा रहे हों)
…મનને ગમતું નથી, ગામ ફળિયું કે ઘર …

યાદ તમને હું કરતી રહું જેટલી ( आपको मैं जितनी याद करती हूँ)
સાંજ લંબાતી રહે છે અહીં એટલી ( यहाँ शाम उतनी ही लंबी होती जाती है)
વ્હાલ તમને ય જો હો અમારા ઉપર ( अगर आपको हम पर लाड़ हो)
અમને પણ લઇને ચાલો તમારે નગર ( तो हमें भी ले चलो आपके नगर)
…મનને ગમતું નથી, ગામ ફળિયું કે ઘર …

यहाँ व्हाल शब्द का अनुवाद लाड़ लिखा है… क्यों कि शायद प्रेम शब्द उतना सही नहीं होता। पिता पुत्री के बीच में जो नेह का नाता होता है उसके लिये लाड़ शब्द ज्यादा सही लगा मुझे।

और यूनिवर्सिटी के दरवाजे सदा के लिये बंद हो गये(बच्चन की जन्मशती पर विशेष)

बात उन दिनों की जब एमए का परिणाम निकला था, उन्हे द्वितीय श्रेणी मिली थी। उस वर्ष किसी को भी प्रथम श्रेणी नही मिली थी। जब वे साहस कर विभागाध्‍यक्ष श्री अमरनाथ झा के पास पहुँचे तो उन्‍होने इनसे पूछा कि आगे क्‍या करने का विचार है। बच्चन जी ने कहा कि मेरा विचार तो यूनिवर्सिटी में रह कर अध्‍यापन कार्य करने का था किन्‍तु …. । झा साहब कि ओर से कोई उत्‍तर न पा कर फिर अपने वाक्‍य को सम्‍भाल कर कहा कि अब किसी इंटर या हाई स्‍कूल में नौकरी करनी पड़ेगी। इस पर झा साहब के ये वाक्‍य उन पर पहाड़ की तरह टूट पडें कि स्‍थाईत्‍व के लिये एलटी या बीटी कर लेना। जो कुछ भी झा साहब की ओर से अपेक्षा थी उनके इस उत्‍तर से समाप्‍त हो गया। उन्हे लगा कि अब मेरे लिये यूनिवर्सिटी के दरवाजे सदा के लिये बंद हो गये। इसी के साथ उन्‍होने उनसे विदा मांगी। मन उदास हो गया पर उदासी में ही शायद मन कुठ विनोद के साधन खोजनेकी ओर प्रवृत्‍त हो चुका था। और उन्‍हे अपने एक मित्र की लिमरिक याद आई, जो उनके मित्र ने झा साहब से यूनिवर्सिटी में जगह मॉंग मॉंग कर हार जाने के बाद लिखी थी और बच्‍चन जी भी उसी को गाते हुऐ विश्‍वविद्यालय से विदा लिये।
There was a man called A Jha;
He had a very heavy Bheja;
He was a great snob,
When you asked him for job,He dolesomely uttered, ‘Achchha dekha jayega.’

उँर्दू का तो था ही और हिन्दी का भी आ गया(बच्चन की जन्मशती पर विशेष)

हरिवंश राय बच्‍चन के जीवन की कुछ महत्‍वपूर्ण घटनाओं में से एक घटी। उनके पास अग्रेजी विभाग के अध्‍यक्ष पंडित अमर नाथ झा का एक पत्र की आया, जिनसे वे अपेक्षा रखते थे कि वे उन्‍हे यूनिवर्सिटी में अध्‍यापन का अवसर देगें। झा साहब ने पत्र में लिखा था कि विभाग में एक अध्यापक के अवकाश ग्रहण करने से एक अस्‍थाई स्‍थान रिक्‍त है। क्‍या आप उसमें 125 रूपये प्रति माह वेतन पर काम करना चाहेगें? यदि आप इच्छुक हो तो शीघ्र विभागाध्‍यक्ष से मिलें। यह पत्र उन्‍हे देख कर सहसा उन्‍हे विश्‍वास नही हुआ।
वह झा साहब से मिलने गये, तो उन्‍होने सलाह दिया कि मै अग्रवाल कालेज का स्‍थाई अध्‍यापन छोड़कर, इलाहाबाद विवि की अस्‍थाई अध्‍यापन स्‍वीकार करूँ। बच्‍चन जी कहते है कि मुझे अपनी क्षमता का इतना विश्‍वास न था जितनी कि झा साहब कि निर्णायक बुद्धि का। उन्‍होने मुझे एक चेतावनी भी दी कि क्‍लास में कभी मै अपनी कविताएं न सुनाऊँ और विश्‍वविद्यालय में पढ़ाई के समय अपने को हिन्‍दी का कवि नही अंग्रेजी का लेक्चरर समझूं।
उनके मन में हमेशा एक बात कौधती रहती थी कि शायद मै अध्‍यापक न होता तो एक अच्‍छा कवि होता किन्‍तु कभी कहते थे कि मै एक कवि न होता तो एक अच्‍छा अध्‍यापक होता। वे अपने बारे में कहते है कि मेरी कविता को प्रेमियों का दल कभी एक बुरा कवि नही कहेगा। और मेरे विद्यार्थियों की जमात एक बुरा अध्‍यापक। उन्‍होने अपने अध्‍यापक को कभी भी कवि पर हावी नही होने दिया।
अग्रेजी विभाग में अपने स्‍वागत के विषय में कहते है कि शायद ही कुछ हुआ हो किन्‍तु एक जिक्र अवश्‍य करते है। उन दिनों अग्रेंजी विभाग में रघुपति सहाय ‘फिराक’ हुआ करते थे, जो उँर्दू के साहित्‍यकार थे। और उन दिनों काफी चर्चा हुआ करती थी कि अंग्रेजी विभाग में उँर्दू के शायर तो थे ही अब हिन्‍दी के कवि भी आ गये।

इलाहाबाद विश्विविद्यालय ने नही कहा “डाक्टसर बच्च न”

अपनी आत्‍म कथा में इलाहाबाद वि‍श्‍वविद्यालय के बारे बाताते है कि जुलाई में विश्‍वविद्यालय खुल गया और मुझे दो महीने के तनख्‍वाह के रूप में इलाहाबाद वि‍श्‍वविद्यालय की तरफ से 1000 रूपये मिल गये। विश्‍वविद्यालय के उनके प्रति व्‍यवहार के विषय में वह कहते है कि एक बात हमेंशा खटकती है कि विश्वविद्यालय में मेरे प्रति विरोध का नही किन्‍तु असाहनुभूति और उपेक्षा का वातावरण था। जब से मेरी कैम्ब्रिज से वापसी हुई उस दिन से विभाग कदम-कदम पर मुढेमहसूर करा देना चाहता था कि तुम यहॉं वांक्षित नही हो। उन्‍होने मुझे डाक्‍टर बच्‍चन कहकर संबोधित करने में भी अपनी हीनता समझी। उन‍के लिये आज भी बच्‍चन जी था, बच्‍चन जी हिन्दी का कवि।
बच्‍चन जी आगे कहते है – विभाग का सारा तंत्र मुझे यह कटु अनुभूति करा देना चाहता था कि तुम आज भी ठीक उसी जगह हो जाहँ दो वर्ष पूर्व अपने को छोड़कर अपने को गये थे, जिममें मेरा वेतन भी सम्मिलित था। परन्‍तु मेरे सहयोगी ये दो बातें नही जानते थे कि प्रथम यह कि मेरा उद्देश्‍य किसी आर्थिक लाभ का रखकर अपने शोध कार्य को पूरा करने का नही था। दूसरी यह कि मेरा अर्जन का क्षेत्र केवल विश्‍वविद्यालय ही नही थी।

“तेजी” नही “श्या’मा” और मेरी शिक्षा

हरिवंश राय बच्‍चन की प्रथम पत्‍नी तेजी बच्‍चन नही थी, उनकी पहली पत्‍नी का नाम श्‍यामा था। इलाहाबाद के बाई के बाग में रहने वाले श्री राम किशोर की बड़ी बेटी के साथ बच्‍चन जी का विवाह 1926 में हुआ था। उस समय उनकी अवस्‍था 19 वर्ष की थी और श्‍यामा की उम्र 14 साल के आस-पास थी। श्‍यामा के बारे में बच्‍चन जी कहते है – श्‍यामा मेरे सामने बिल्‍कुल बच्‍ची थी भोली, नन्‍ही, नादान, हँसमुख, किसी ऐसे मधुवन की टटकी गुलाब की कली, जिसमें न कभी पतझर आया हो, और न जिसने कभी काँटों की निकटता जानी हो।
1927 में डाक्‍टर बच्‍चन इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के छात्र बन चुके थे, और उन्‍होने एच्छिक विषय में हिन्‍दी और दर्शन शास्‍त्र लिया, जबकि उन दिनों अग्रेंजी अनिवार्य हुआ करती थी। विश्‍वविद्यालय उनके घर से करीब चार मील दूर हुआ करती थी। जो वे पैदल तय करते थे, इसमें बहुत सा समय बर्बाद हुआ करता था। तो उन्‍होने चलते हुऐ पढ़ने की आदत डाल लिया। सुबह और शाम का समय ट्यूशन होता था। वे रात्रि 12 बजे तक पढ़ते थे और सुबह 4 बजे उठ जाते थे। उनके लिये 4 घन्‍टे की नींद पर्याप्‍त होती थी, किन्‍तु कभी कभी उन्‍हे दो घन्‍टे 12 से 2 के बीच ही काम चलाना पढ़ता था। जब इनके ससुर श्री रामकिशोर को पता चला कि वे पैदल विश्‍वविद्यालय जाते है तो उन्‍हो ने द्रवित होकर एक साइकिल भेज दी। साइ्रकिल से इनका समय और श्रम दोनो बचा। 1929 में ये विश्‍वविद्यालय के प्रथम 3 छात्रों में उत्‍तीर्ण होने वालों में से थे।
एक दिन इन्हे श्‍याम के बुखार के बारे में पता चलता है,जो करीब 4 माह तक नही उतरा। यह बुखार वह तपेदिक बुखार था जो श्‍यामा अपने माता जी की सेवा के दौरान अपने साथ ले आई थी। और यह श्‍यामा के साथ तब तक थी जब तक कि उसका अंत नही हो गया। डाक्‍टर बच्‍चन श्‍यामा के प्रति असीम प्रेम के बारे में कहते है- वह मेरी शरीर की संगिनी नही बन सकती थी, मेरे मन की संगिनी तो बन ही सकती थी और मेरे मन का कुछ भी ऐसा न था जो उसके मन में न उतार दिया हो। उसने मेरा नाम Suffering रख दिया था, जब हम अकेले होते थे तो वह मुणे इसी नाम से सम्‍बोधित करती थीऔर मै उसे Joy कहता।
घर की आर्थिक स्थिति ठीक नही थी, और एम.ए. प्रीवियस की परीक्षा किसी प्रकार पास हो गया किन्‍तु अगले साल इनकी पढ़ाई जारी न रह सकी और इनकी पढ़ाई छूट गई। 1930 में आयोजित एक प्रतियोगिता में इनकी एक कहानी को प्रथम पुरस्‍कार मिला। 1931 में ये विश्‍वविद्यालय के छात्र ने थे किन्‍तु अपनी कहानी ‘हृदय की आखें’ इतनी अच्‍छी थी कि प्रेमचन्‍द्र ने उसे हंस में भी छापा।

श्या मा का दर्द यह शुभ दिन बार बार आये

श्‍यामा को फेफडे का क्षय नही था, बल्कि उसे अंत्र-छय था। जिसे डाक्‍टर लोग छ: वर्ष नही पहचान सके थे, और जब उनहोने उसे पहचाना तो वह लाइलाज हो चुका था। अपरेशन थिएटर में जाते वक्‍त वह जिस प्रकार मुस्‍काराई थी, उसने मुझे उसकी सुहागरात की मुस्कान याद दिला दी थी। वह बच्‍चों की सी मुस्‍कान कर चेहरा मेरे हृदय पर अंकित कर विदा हुई थी। मृत्‍यु शय्या पर वह हँसती रही कहीं मै यह न समझू कि उसे मने में कष्‍ट हो रहा है।
मृत्‍यु के एक दिन पूर्व उसने मेरी आँखों में आँखे डाल कर पूछा, “मै मर जाऊँगी तो तुम बहुत दुखी होगे ?” मै चुप रहा। उसने कहा, “मेरे मरने के बाद बहुत दुखी होना तो शादी कर लेना”। और ठीक मृत्‍यु के दिन उसेने मुझसे कहा था, “ मुझ पर कोई ऐसी रचना करना जिससे, जिससे दुनिया के अंदर मेरी याद रहे।“ कहा था इसलिये कि वह न रहे तो मुझे अपने सूनेपन, अपने खालीपन को भुलाने के लिये कुछ रहे। सृजन से अधिक डुबाने वाला कुछ नही।
संकीर्ण, कट्टरपंथी और प्राय: ईष्‍या द्वेष प्रेरित आलोचकों के आरोप मुझे पत्‍युत्‍र में गीत अथवा कविता लिखने को उकसा जाते थे। ‘कवि की वासना’, ‘कवि की निराशा’, ‘कवि का उपहास’ और ‘पथभ्रष्‍ट’ श्‍यामा की रोग शैय्या के निकट लिखे गये थे। कवि का गीत, लहरों का निमंत्रण और मांझ़ी आदि भी उसी समय की है। श्‍यामा की देहावसान के बाद इन सब कविताओं का संग्रह “मधुकलश” नाम से प्रकाशित हुआ जिसे मैने श्‍यामा की स्‍मृति मे विश्‍व वृक्षकी डाल से बांध दिया, जैसे मृतकों के लिये घंट बांधा जाता है। 27 नवम्‍बर को जिस दिन श्‍यामा का दसवां था उसी दिन मेरी 29वीं वर्षगाठ थी, तार से कई बधाई संदेश मिले ‘यह शुभ दिन बार-बार आये’। समय के इस व्‍यंग पर मुस्काराने के अतिरिक्‍त और क्‍या किया जा सकता था।?

हरिवंश राय बच्चजन – प्रारम्भिक जीवन

डाक्टर हरिवंश राय बच्‍चन मूलत: उत्‍तर प्रदेश के बस्ती के अमोढ़ा नामक ग्राम था। बाद में इनका पूरा परिवार प्रतापगढ़ जिले के बाबूपट्टी गाँव में आ गया। इनका पूरा परिवार बाद में इलाहाबाद चला आया, प्रतापगढ़ से इलाहाबाद आने वाले प्रथम मनसा व्‍यक्ति थें। इनके पिता का नाम श्री प्रतापनारायण था और इनके दो पुत्र श्री शालिग्राम और श्री हरिवंशराय बच्चन था। इनके पिता का विवाह इश्वरीप्रसाद की कन्‍या सुरसती देवी के साथ तय हुआ।
बच्‍चन जी अपने बच्‍चन के बारे में कहते है कि – मेरे माता-पिता ने मुझे जिस नाम से घर में पुकारा था, उसी को मैने अपने लेखक के लिए स्‍वीकार किया, उसी को मैंने अपने लेखक के लिये स्‍वीकार किया, हालांकि उन दिनों जैसे साहित्यिक और श्रुति-मधुर उपनाम लोग अपने लिए चुनते थे, उनके मेरे बच्‍चन जैसे छोटे लघुप्राण, अप्रभावकारी, घरेलू नाम का कोई मेल न था।
इनके पिता श्री अंग्रेजी पायनियर में क्‍लार्क पद पर कार्यरत थें, इन्‍होने पायनियर में सबसे छोटे पद से लेकर सबसे ऊँचे पद पर कार्यरत किये। जब वे रिटायर हुऐ तो उनकी तनख्‍वाह 200 रूपये से ज्‍यादा थी। इनके सहयोगियों ने इन्‍हे “पायनियर कार्यालय का आधार स्‍तंम्‍भ” (Pillar of the support of the Pioneer Office) कहा था।
बच्‍चन जी का जन्म 27 नवम्‍बर 1907 को हुआ, ओर इनके माता‍-पिता ने नाम हरिवंश रखा किनतु दुलार से इन्‍हे बच्‍चन कह कर पुकारते थे। इनकी प्रारम्भि शिक्षा घर पर ही हुई हिन्‍दी बड़ी बहनों से सीखा तो उर्दू की शिक्षा दीक्षा मॉं ने दी। बचपन के दिनों की बात बताते हुऐ, बच्‍चन जी कहते है कि एक बार इलाहाबाद में लोकमान्‍य तिलक और एनी बेसेंट का आगमन हुआ था और मैने इनके बारे में बहुत कुछ सुना था। टमटम के बैठा कर उनका जूलूस निकाला जाना था। और जब टमटम रूकी तो हिन्‍दू बोर्डिग हाऊस के छात्रों ने घोडें खोल दिये और स्‍वयं उनकी गाड़ी को खीचा। अगर मै अपने जीवन में कुछ न कर पाता तो मुझे अपने जीवन में एक बात पर गर्व करने के लिये पर्याप्‍त होता कि जिन लड़को ने उनकी गाड़ी खीची उनमें मै भी था। एक बार जब यह छोटे थे तो इन्हे पता चला कि विद्या मन्दिर में स्‍वामी सत्‍य देव परिव्राजक का व्याख्‍यान है। और यह भी उन्‍हे सुनने के लिये गये, भाषण में उनकी ओजस्विता से काफी प्रभावित हुए, उनकी आवाज़ दूर तक साफ साफ सुनाई देती थी। उनका भाषण हिन्‍दी हमारी राष्‍ट्रभाषा पर था। फिर उन्‍होन भी निर्णण किया कि मै हिन्‍दी माध्‍यम से शिक्षा ग्रहण करूँगा। उन दिनों स्‍कूलों में माध्‍यम बदलने के लिये डिप्‍टी इंस्‍पेक्‍टर से अनुमति लेना जरूरी होता था। उस समय डिप्‍टी इन्‍स्‍पेक्‍टर बाबू शिव कुमार सिंह थे। हिन्‍दी के प्रति इनका उत्‍साह देख का डिप्‍टी इंस्‍पेक्‍टर ने इन्‍हे हिन्‍दी की अनुमति दे दी। परीक्षा में प्रथम स्‍थान की अपेक्षा थी किन्‍तु हिन्‍दी माध्‍यम के कारण इन्‍हे द्वितीय स्‍थान से ही संतोष करना पड़ा। परन्‍तु इस सम्‍बन्‍ध में बच्‍चन जी का कहना कि मैने सही कदम चुना है।

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