>मैं “असामाजिक” नहीं रहा- अथ मोबाइल गाथा

>Mobile Usage Social & Unsocial

जी हाँ बन्धुओं और भगिनियों, कल से मैं “असामाजिकता” से बाहर आ गया हूँ, और मेरे सामाजिक होने का एकमात्र और सबसे बड़ा सबूत है “मेरे हाथ में मोबाइल”। कल से पहले तक जब भी मैं किसी नये व्यक्ति से मिलता तो सबसे पहले तपाक से मेरा नम्बर पूछता (मन में कई बार सवाल उठा कि उससे पूछूँ कि तुझे कौन सा नम्बर चाहिये, जूते का, चश्मे का, बनियान का, बाइक का, लेकिन “सामाजिकता” के नाते पूछता नहीं था), और जब मैं उसे अपना लैंडलाइन (बीएसएनएल) का नम्बर देने की “कोशिश” करता, कोशिश इसलिये लिख रहा हूँ कि, मेरे यह बताते ही कि “मेरे पास मोबाइल नहीं है” कोई व्यक्ति मुझे ऐसे देखता था जैसे मैं मंगल ग्रह का प्राणी हूँ, कोई मुझे ऐसे देखता जैसे जिन्ना हाउस में रहने वाला झुग्गी वाले को देखता है और कोई-कोई तो खामख्वाह ही ऐसे तन जाता जैसे अभी-अभी उसे प्रेस कर दिया हो… गरज यह कि मैं मोबाइलधारी नहीं हूँ, यह “कुख्याति” धीरे-धीरे आसपास के चार गाँवों में भी फ़ैलने लगी थी।

अंततः हारकर मन में विचार आया कि अब मैं “समाज” से कट कर असामाजिक तत्व नहीं रह सकता और मुझे यह घंटी अपने गले में बाँधने के अलावा कोई चारा नहीं है। लेकिन मैं मोबाइल खरीदने को जितना आसान काम समझता था, उतना वह था नहीं। हम तो भई मोबाइल की दुनिया में कदम ही पहली बार रख रहे थे, जबकि मित्र के बच्चे चार कदम चलना सीखते ही मोबाइल पर माँ से दूध माँगना सीख चुके थे, ऐसे में आपके आसपास अचानक “रायचन्दों” की भीड़ लग जाती है। मेरे मुँह से “मोबाइल” सुनते ही भाई लोग मानो टूट पड़ते थे। जीपीआरएस, जीएसएम, नेटवर्क, सिम, रिंगटोन, एमपी३, कैमरा, वीजीए, मेगापिक्सेल नामक भयानक और बड़े-बड़े शब्दों की गोलीबारी आरम्भ हो जाती थी। सामने वाले को क्या मालूम था कि वह बीन बजा रहा है और सामने नाग नहीं, भैंस है। जब रायचन्द बोलना समाप्त करता था तब तक मेरे चेहरे पर उभरने वाले भाव देखकर ही वह सारा माजरा समझ जाता था। फ़िर खीझ और झेंप मिटाने के लिये “देखो भैया चीज लो तो बढ़िया लो, अपना काम था आपको सही सलाह देना… आगे आपकी मर्जी” कहकर ये जा और वो जा।

खैर, तीन-चार दिन की मगजमारी के बाद अपने बजट का एक मोबाइल ले लिया। मैंने सोचा था कि चलो जान छूटी, लेकिन अभी कहाँ जनाब, अगला कदम था कोई कनेक्शन लेना। फ़िर सारे रायचन्द एकत्रित। बीएसएनएल मत लेना यार, मेरा तो एयरटेल है, एकदम बढ़िया, बीएसएनएल का तो फ़ुल फ़ॉर्म ही है “भाई साहब नहीं लगता”….” दूसरा राय देता कि भाई प्रायवेट कम्पनियों के चक्करों में मत पड़ो, सरकारी कम्पनी चाहे कितनी भी निकम्मी हो, लेकिन बिलिंग के मामले में ईमानदार है, आईडिया ले लिया तो फ़ँस जाओगे (आईडिया तो मैं वैसे भी नहीं लेने वाला था, क्योंकि ऐश्वर्या राय से शादी के कारण मैं अभिषेक से वैसे ही चिढ़ा हुआ था), एक दुकानदार और एक एयरटेल के सेल्समैन ने मुझे दिन भर रीचार्ज, वाउचर, कूपन, टॉकटाइम, प्रीपेड-पोस्टपेड आदि के बारे में इतना पकाया कि मुझे अपने लैंडलाइन के निर्जीव फ़ोन पर बेहद प्यार आने लगा। पचास पैसे कॉल, पच्चीस पैसे में SMS आदि सुनकर मुझे लगा कि अभी मुद्रा का इतना भी अवमूल्यन नहीं हुआ है, जितना मैं सोचता था। एक तो वैसे ही मैं गणित और अकाउंट्स में कमजोर हूँ और उस पर दो-दो लोग भिन्न-भिन्न “पैसा बचाओ” स्कीम समझाने पर उतारू हो गये।

मेरी हालत उस खरबूजे की तरह थी कि उस पर छुरी गिरे या वह छुरी पर कटना तो उसी को था, लेकिन मरता क्या न करता, “असामाजिक” नाम के धब्बे को मिटाने के लिये यह संघर्ष तो करना ही था, और आखिर मैंने मोबाइल चालू करवा ही लिया। लेकिन भाईयों अभी भी “रायचन्द” पीछा नहीं छोड़ रहे हैं, “आपने कवर लगवाया कि नहीं, धूल बहुत है अपने यहाँ…” “पुराने गानों की रिंगटोन क्यों डलवाई…”, “कमर पर बाँधने वाला वालेट ले लो, अच्छा रहता है”, “च, च, च… अरे-अरे, एयरटेल का पोस्ट पेड ले लिया, क्या यार… हमें बताते बीएसएनएल में अपनी अच्छी चलती है…”, “नेट से वॉलपेपर डाऊनलोड मत करना वायरस आ जायेगा…”…. लगता है कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है यह “राय”… ऊपर से तुर्रा यह कि यार-दोस्तों के फ़ोन आने से पहले ही, चड्डी-बनियान से लेकर हवाई जहाज के टिकट तक मुफ़्त में देने वाले विज्ञापन आने लगे हैं… अब बतायें मैं क्या करूँ… एक सामाजिक प्राणी घोषित होने की खुशी मनाऊँ या गले में पड़े इस मोबाइल नामक पट्टे को झेलता जाऊँ, झेलता जाऊँ….

आप लोग रायचन्द भले ही न हों, लेकिन चन्द “राय” अवश्य दें… 🙂

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