जिन्दगी/मौत : एक तलाश???


मेरे जेहन मे अचानक ख्याल आया की, क्यों ना मौत की परिभाषा ढुढीं जाये। क्या सांसो के रुकने को ही मौत का नाम दिया जा सकता है या मौत की कोई और भी परिभाषा हो सकती है । पर सर्वप्रथम ये जानना जरुरी है की जिन्दगी क्या है? क्योकीं जिन्दगी और मौत एक सिक्के के दो पहलु है, और एक को जाने बिना दुसरे को जानना नामुमकिन है ।

जिन्दगी चलने का नाम है, जो कभी नही रुकती, किसी के लिये भी, चाहे शाहंशाह हो या फकीर। जिन्दगी हॅसने, खेलने, और मुस्कुराने का नाम है। कहना कितना आसान है, पर हकीकत से कोसों दुर।

जिन्दगी की शुरुआत होती है, जब बच्चा माँ के गर्भ मे आता है,हर तरफ खुशियां। प्रसवपीडा के असहनीय दर्द को सहते हुये, जब माता अपने पुत्र/पुत्री को निहारती है, तो उसे जैसे एह्सास होता है, जैसे ये दर्द तो जिन्दगी की उन खुशियों मे से है, जिसका इन्तजार वो वर्षों से कर रही हो। और शुरुआत होती है, एक नयी जिन्दगी की, सिर्फ पुत्र की नहीं वरन माता की भी। दुसरा पहलु आधुनिक युग २१वीं सदी…जहाँ माता मातृत्व के सुख से दुर होने की कोशिश कर रहीं, सिर्फ अपनी काया को बचाये रखने के लिये । अपनी ना खत्म होने वाली महत्वाकांक्षी आकाक्षओं की पुर्ति के लिये । क्या इसे भी जिन्दगी का नाम दिया जा सकता है, शायद नही, ये भी तो मौत का ही एक रुप है, जहां एक तरफ माँ की मौत हो रही है तो दुसरी तरफ उस बालक की जो इस संसार मे अपने अस्तिव को तलाशने लिये उत्सुक है।

श्रवण कुमार, जिसने अपने अँधे माता पिता को अपने काँधे पर बैठा कर तीर्थयात्रा का प्रयोजन किया और पुत्रधर्म को निभाते निभाते स्वर्गवासी हो गया । दुसरी तरफ आज का युवा, आखों मे हजारों सपने, बस वक्त नही है तो अपने मातापिता के लिये । लेकिन लेकिन लेकिन ये कहना गलत होगा की आज का युवा पुत्रधर्म नही निभाता है । पुत्रधर्म आज भी निभाया जा रहा है, वृद्धाआश्रम मे कुछ रुपयों को दे कर । फिर से एक ही चरित्र, “पुत्र “ जो एक तरफ मौत को गले लगाता है, और रिश्तों को जी जाता है, और दुसरी तरफ, दूसरा पुत्र हंस रहा है, खेल रहा है, गा रहा है, बस कुछ रुपये वृद्धाआश्रम मे दे कर। पर शायद ये भी जिन्दगी है, जो एक पुत्र रिश्तों के मौत पर जीता है।

सांसो के शुरुआत से लेकर सांसो के बंद होने तक, एक इन्सान ना जाने कितनी बार जन्म लेता है,और कितनी बार मरता है, फिर शोक हमेशा सांसो के बंद होने के बाद ही क्यों मनाया जाता है? अगर सांसो का बंद होना ही मृत्यु है, तो आज हम महात्मा गान्धी, भगत सिंह्, सुभाषचन्द्र बोस जैसे अनगिनत विभुतियों के नाम क्यों याद रखते है? क्यों हर बार अपनी बातों मे इनका जिक्र ले आते है? क्योकि शायद ये विभुतियां आज भी जिन्दा हैं ।मैने सुन रखा है, “जिन्दगी चंद सांसो की गुलाम है,जब तक सांसे है तब तक जिन्दगी है”, पर शायद ये अधुरा सच है, क्योंकि पुरे सच मे “मौत चंद सांसो की गुलाम है, जो इन्तजार करती है की कब ये सांसे रुके और मै कब अपना दामन फैलाऊं। और जिन्दगी उन कर्मों का नाम है, जो कभी खत्म नही होती, इतिहास के पन्नों मे कैद हो कर, सदा सदा के लिये जीवित रहती है”।

मौत तो बेवफा है,फकत चंद सांसो के ले जायेगी,
जिन्दगी तो महबुबा है, अपने कर्मों के संग,
इतिहास के पन्नों मे मुझको लिखवा कर,
सदा के लिये जीवित कर जायेगी

3 Comments

  1. मीनाक्षी said,

    November 30, 2007 at 4:51 am

    जिन्दगी उन कर्मों का नाम है, जो कभी खत्म नही होती, इतिहास के पन्नों मे कैद हो कर, सदा सदा के लिये जीवित रहती है — बहुत सुन्दर सोच… आपका लेखन दूसरों को भी दर्द सहने की शक्ति रखता है. मेरी शुभकामनाएँ सदा साथ समझिएगा.

  2. Shiv Kumar Mishra said,

    November 30, 2007 at 1:07 pm

    भाई आशुतोष,

    आपके भाई के बारे में कल पढ़ा. पढ़कर लगा, क्या टिप्पणी करूं, इस पोस्ट पर. आज आपकी पोस्ट पर टिप्पणी कर रहा हूँ….भगवान् से प्रार्थना है कि दीपक की आत्मा को शान्ति दें..

    किसी शायर ने लिखा है;

    ज़िंदगी को संभालकर रखिये
    ज़िंदगी मौत की अमानत है

    आपने ठीक लिखा है कि; “मौत चाँद सासों की गुलाम है….”

  3. देवेन्‍द्र प्रताप सिंह said,

    December 1, 2007 at 2:56 am

    उम्‍दा लेख,

    कृपया मात्राओं पर ध्‍यान दीजिए


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