नववर्ष आपके लिये मंगलमय हो…

सजधज के जैसे ही नववर्ष मनाने हम घर से निकले,
राह मे अचानक एक बच्चे को देख कदम संभल गये,
नहीं नही वो बच्चा मामूली नही था,
वह कूडों के ढेर मे, अपना भविष्य खोज रहा था,
बचपने मे ही, बडों जैसी सिलवटे उसके माथे पर दिख रहा था.
मेरे दिल मे अचानक ख्याल आया, हर तरफ नये वर्ष की धूम है,
फिर ये छोटा सा बच्चा, क्यों इतना खामोश और गुम है??
और मैने डरते डरते उससे ये सवाल पूछ डाला,
उसने बडी मासूमियत से मुझको देखा, और बोला,
साहब हजारों की सूट पहनने के बाद, आपको खामोशी दिखती है,
पर वो भूख नही दिखता,
जो मै इन कचडों से भरने की कोशिश कर रहा हुँ,
और आप किस नये साल की बात कर रहे हैं,
हमारे लिये तो हर दिन एक भूख ले कर आता है,
और जिस दिन, बगैर गाली और मार के,
भर पेट खाना मिल जाता है,
हमारा तो नया साल उसी दिन आ जाता है.
हॉ साहब मुझे पता है, आज करोडो रुपये,
कबाब,शावाब और पार्टी के नाम पर उडाये जायेगें,
और जो नेता,अभिनेता,समाजसेवक नये वर्ष मे,
कहीं नये भारत की बात कर रहे होगें,
आज अपनी जूठन इसी कचडे मे फेंक कर जायेगें,
और कल हम भी उसी जुठन से अपने पेट को भर,
शायद नये साल का जश्न मनायेगें.
और आप जो खुद को युवा पीढी बोलते हो,
मेरी बात सुन दो मिनट के लिये शायद सोच मे पड जाओगे,
और फिर कुछ नही बदलने वाला है,ये बोल,आप भी सब कुछ भूल जाओगे.

नववर्ष आपके लिये मंगलमय हो…

नववर्ष मंगलमय हो

“महाशक्ति समूह” परिवार की ओर से आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाऐं। नववर्ष आप, आपके परिवार वह आपके मित्र जनों के लिये मंगलकारी हो। ऐसी ईश्‍वर से प्रार्थना है।

                                                 महाशक्ति समूह

महानता के लक्षण

एक बालक नित्य विद्यालय पढ़ने जाता था। घर में उसकी माता थी। मां अपने बेटे पर प्राण न्योछावर किए रहती थी, उसकी हर मांग पूरी करने में आनन्द का अनुभव करती। पुत्र भी पढ़ने-लिखने में बड़ा तेज और परिश्रमी था। खेल के समय खेलता, लेकिन पढ़ने के समय का ध्यान रखता। एक दिन दरवाजे पर किसी ने- ‘माई! ओ माई!’ पुकारते हुए आवाज लगाई तो बालक हाथ में पुस्तक पकड़े हुए द्वार पर गया, देखा कि एक फटेहाल बुढ़िया कांपते हाथ फैलाए खड़ी थी। उसने कहा, ‘बेटा! कुछ भीख दे दे। बुढ़िया के मुंह से बेटा सुनकर वह भावुक हो गया और मां से आकर कहने लगा, ‘मां! एक बेचारी गरीब मां मुझे बेटा कहकर कुछ मांग रही है!’ उस समय घर में कुछ खाने की चीज थी नहीं, इसलिए मां ने कहा, ‘बेटा! रोटी-भात तो कुछ बचा नहीं है, चाहो तो चावल दे दो।’ पर बालक ने हठ करते हुए कहा- ‘मां! चावल से क्या होगा? तुम जो अपने हाथ में सोने का कंगन पहने हो, वही दे दो न उस बेचारी को। मैं जब बड़ा होकर कमाऊंगा तो तुम्हें दो कंगन बनवा दूंगा।’ मां ने बालक का मन रखने के लिए सच में ही सोने का अपना वह कंगन कलाई से उतारा और कहा, ‘लो, दे दो’  बालक खुशी-खुशी वह कंगन उस भिखारिन को दे आया। भिखारिन को तो मानो एक खजाना ही मिल गया। कंगन बेचकर उसने परिवार के बच्चों के लिए अनाज, कपड़े आदि जुटा लिए। उसका पति अंधा था। उधर वह बालक पढ़-लिखकर बड़ा विद्वान हुआ, काफी नाम कमाया। एक दिन वह मां से बोला, ‘मां! तुम अपने हाथ का नाप दे दो, मैं कंगन बनवा दूं।’ उसे बचपन का अपना वचन याद था। पर माता ने कहा, ‘उसकी चिन्ता छोड़। मैं इतनी बूढ़ी हो गई हूं कि अब मुझे कंगन शोभा नहीं देंगे। हां, कलकत्ते केश् तमाम गरीब बालक विद्यालय और चिकित्सा के लिए मारे-मारे फिरते हैं, उनके लिए तू एक विद्यालय और एक चिकित्सालय खुलवा दे जहां नि:शुल्क पढ़ाई और चिकित्सा की व्यवस्था हो’ मां के उस पुत्र का नाम था ईश्वरचन्द्र विद्यासागर।

>फ़ुन्दीबाई सरपंच : बदलते भारत की महिला….

>Panchayati Raj Illiteracy and Society

भारत के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है झाबुआ, उसके ग्राम सारंगी की सरपंच हैं श्रीमती फ़ुन्दीबाई। पूर्णतः अशिक्षित, “श्रीमती” लगाने भर से असहज हो जाने वाली, एकदम भोली-भाली, सीधी-सादी आदिवासी महिला सरपंच। आप सोच रहे होंगे कि भला यह कैसे “बदलते भारत की महिला” हो सकती हैं… लेकिन वे हैं… आरक्षण के कारण अजजा महिला सीट घोषित हुई सारंगी ग्राम से फ़ुन्दीबाई सरपंच बनीं। आजादी के साठ साल बीत जाने के बावजूद रेल की पटरी न देख पाने वाले झाबुआ के अन्दरूनी ग्रामों की हालत आज भी कुछ खास बदली नहीं है। यहाँ के आदिवासियों ने आज तक अफ़सरों और नेताओं को बड़ी-बड़ी जीपों और “चीलगाड़ी” (हेलीकॉप्टर) मे सिर्फ़ दौरे करते देखा है, आदिवासी आज भी गरीब का गरीब है, जबकि झाबुआ और आदिवासियों के नाम पर पिछले पचास वर्षों में जितना पैसा आया, उतने में कम से कम चार मुम्बई और बसाई जा सकती हैं। ऐसे भ्रष्ट माहौल में जब कोई सरपंच बनता है, तो समझो उसकी “लॉटरी” लग जाती है।

फ़ुन्दीबाई एक प्रतिबद्ध महिला सरपंच, साहसी और दबंग, जो अपने इलाके में “स्कूल वाली बाई” के नाम से मशहूर हो गई हैं

लेकिन फ़ुन्दीबाई कोई साधारण महिला नहीं हैं, सरपंच बनते ही सबसे पहले उन्होंने अपनी पंचायत में लड़कियों की ऐसी सूची बनाई जो स्कूल नहीं जा रही, फ़िर खुद उनके घर जा-जाकर उनके माता-पिता को लड़कियों को स्कूल जाने को तैयार किया। समय जरूर लगा, लगता ही है, लेकिन आज ग्राम सारंगी में बालिकाओं ने हायरसेकंडरी में कदम रख दिया है और इस साल लगभग 22 लड़कियों को शासन की तरफ़ से स्कूल जाने के लिये साइकल दिलवा दी गई है। पंचायत के सभी स्कूलों में फ़ुन्दीबाई स्वयं सुबह से भ्रमण करती हैं, जहाँ भी गंदगी या कचरा दिखाई देता है, उसे अपने हाथों से साफ़ करती हैं। लड़कियों को पढ़ाने के बारे में उनका अलग ही “फ़लसफ़ा” है, वे कहती हैं “वगर भणेली सोरी, लाकड़ा नी लोगई बणी जावे” मतलब.. “बगैर पढ़ी-लिखी लड़की काठ की पुतली बनी रह जाती है”। उनका सोचना है कि एक लड़की के पढ़ने से तीन घर सुधर जाते हैं, एक तो उसका मायका, दूसरा उसका ससुराल और तीसरा उसकी होने वाली लड़की का घर..। उच्च जाति के दबदबे वाले समाज में वह साहस और दबंगता से अपनी बात रखती हैं और नतीजा यह कि आसपास के इलाके में वे “स्कूल वाली बाई” के नाम से मशहूर हैं। वे खुद अशिक्षित हैं इसलिये इसकी हानियों से वे अच्छी तरह परिचित थीं, इसलिये उनके एजेंडे में सबसे पहला काम था शिक्षा और खासकर बालिका शिक्षा। वे अपनी तीन लड़कियों को तो पढ़ा ही रही हैं खुद भी प्रारंभिक अक्षर-ज्ञान लेने में लगी हैं। उनका अगला लक्ष्य है ग्राम में स्थित सभी पेड़-पौधों और आसपास के वृक्षों की रक्षा करना और उनकी वृद्धि करना। उनके सरपंच कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे हो चुके हैं, अब यदि उन्हें अगला कार्यकाल मिला तो निश्चित ही वे यह भी कर दिखायेंगी।

भारत में पंचायती राज लागू हुए कई वर्ष हो गये। अखबारों, दृश्य-मीडिया आदि में अधिकतर पंचायतों के बारे में, पंचायती राज के बारे में नकारात्मक खबरें ही आती हैं। “फ़लाँ सरपंच अनपढ़ है, फ़लाँ सरपंच ने ऐसा किया, वैसा किया, यहाँ-वहाँ पैसा खा लिया, पैसे का दुरुपयोग किया, अपने रिश्तेदारों और अपने घर के पास निर्माण कार्य करवा लिये…. आदि-आदि। माना कि इनमें से अधिकतर सही भी होती हैं, क्योंकि वाकई में पंचायती राज ने भ्रष्टाचार को साहबों की टेबल से उठाकर गाँव-गाँव में पहुँचा दिया है। लेकिन सवाल उठता है कि मीडिया इस प्रकार की सकारात्मक खबरें क्यों नहीं देता? या सिर्फ़ नकारात्मक खबरों से ही टीआरपी बढ़ती है? या पैसा कमाने के लिये मीडिया ने अपना आत्मसम्मान गिरवी रख दिया है?

जीवन को जीना और जीवन को ढोना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आजकल का पढ़ा-लिखा युवा या मध्यमवर्गीय आदमी “जैसा है वैसा चलने दो” वाला भाव अपनाये रहता है, उसे कहते हैं जीवन को ढोना, जबकि फ़ुन्दीबाई की सृजनशीलता ही जीवन को जीना कहलाता है। कोई जरूरी नहीं कि उच्च शिक्षा, या भरपूर कमाई या कोई बड़ी महान कृति ही सब कुछ है। समाज में बड़े बदलाव लाने के लिये हमेशा छोटे बदलावों से ही शुरुआत होती है, जरूरत है सिर्फ़ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के अहसास की, उच्च शिक्षा तो उसमें मददगार हो सकती है….नितांत जरूरत नहीं।

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फ़ुन्दीबाई सरपंच : बदलते भारत की महिला….

Panchayati Raj Illiteracy and Society

भारत के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है झाबुआ, उसके ग्राम सारंगी की सरपंच हैं श्रीमती फ़ुन्दीबाई। पूर्णतः अशिक्षित, “श्रीमती” लगाने भर से असहज हो जाने वाली, एकदम भोली-भाली, सीधी-सादी आदिवासी महिला सरपंच। आप सोच रहे होंगे कि भला यह कैसे “बदलते भारत की महिला” हो सकती हैं… लेकिन वे हैं… आरक्षण के कारण अजजा महिला सीट घोषित हुई सारंगी ग्राम से फ़ुन्दीबाई सरपंच बनीं। आजादी के साठ साल बीत जाने के बावजूद रेल की पटरी न देख पाने वाले झाबुआ के अन्दरूनी ग्रामों की हालत आज भी कुछ खास बदली नहीं है। यहाँ के आदिवासियों ने आज तक अफ़सरों और नेताओं को बड़ी-बड़ी जीपों और “चीलगाड़ी” (हेलीकॉप्टर) मे सिर्फ़ दौरे करते देखा है, आदिवासी आज भी गरीब का गरीब है, जबकि झाबुआ और आदिवासियों के नाम पर पिछले पचास वर्षों में जितना पैसा आया, उतने में कम से कम चार मुम्बई और बसाई जा सकती हैं। ऐसे भ्रष्ट माहौल में जब कोई सरपंच बनता है, तो समझो उसकी “लॉटरी” लग जाती है।

फ़ुन्दीबाई एक प्रतिबद्ध महिला सरपंच, साहसी और दबंग, जो अपने इलाके में “स्कूल वाली बाई” के नाम से मशहूर हो गई हैं

लेकिन फ़ुन्दीबाई कोई साधारण महिला नहीं हैं, सरपंच बनते ही सबसे पहले उन्होंने अपनी पंचायत में लड़कियों की ऐसी सूची बनाई जो स्कूल नहीं जा रही, फ़िर खुद उनके घर जा-जाकर उनके माता-पिता को लड़कियों को स्कूल जाने को तैयार किया। समय जरूर लगा, लगता ही है, लेकिन आज ग्राम सारंगी में बालिकाओं ने हायरसेकंडरी में कदम रख दिया है और इस साल लगभग 22 लड़कियों को शासन की तरफ़ से स्कूल जाने के लिये साइकल दिलवा दी गई है। पंचायत के सभी स्कूलों में फ़ुन्दीबाई स्वयं सुबह से भ्रमण करती हैं, जहाँ भी गंदगी या कचरा दिखाई देता है, उसे अपने हाथों से साफ़ करती हैं। लड़कियों को पढ़ाने के बारे में उनका अलग ही “फ़लसफ़ा” है, वे कहती हैं “वगर भणेली सोरी, लाकड़ा नी लोगई बणी जावे” मतलब.. “बगैर पढ़ी-लिखी लड़की काठ की पुतली बनी रह जाती है”। उनका सोचना है कि एक लड़की के पढ़ने से तीन घर सुधर जाते हैं, एक तो उसका मायका, दूसरा उसका ससुराल और तीसरा उसकी होने वाली लड़की का घर..। उच्च जाति के दबदबे वाले समाज में वह साहस और दबंगता से अपनी बात रखती हैं और नतीजा यह कि आसपास के इलाके में वे “स्कूल वाली बाई” के नाम से मशहूर हैं। वे खुद अशिक्षित हैं इसलिये इसकी हानियों से वे अच्छी तरह परिचित थीं, इसलिये उनके एजेंडे में सबसे पहला काम था शिक्षा और खासकर बालिका शिक्षा। वे अपनी तीन लड़कियों को तो पढ़ा ही रही हैं खुद भी प्रारंभिक अक्षर-ज्ञान लेने में लगी हैं। उनका अगला लक्ष्य है ग्राम में स्थित सभी पेड़-पौधों और आसपास के वृक्षों की रक्षा करना और उनकी वृद्धि करना। उनके सरपंच कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे हो चुके हैं, अब यदि उन्हें अगला कार्यकाल मिला तो निश्चित ही वे यह भी कर दिखायेंगी।

भारत में पंचायती राज लागू हुए कई वर्ष हो गये। अखबारों, दृश्य-मीडिया आदि में अधिकतर पंचायतों के बारे में, पंचायती राज के बारे में नकारात्मक खबरें ही आती हैं। “फ़लाँ सरपंच अनपढ़ है, फ़लाँ सरपंच ने ऐसा किया, वैसा किया, यहाँ-वहाँ पैसा खा लिया, पैसे का दुरुपयोग किया, अपने रिश्तेदारों और अपने घर के पास निर्माण कार्य करवा लिये…. आदि-आदि। माना कि इनमें से अधिकतर सही भी होती हैं, क्योंकि वाकई में पंचायती राज ने भ्रष्टाचार को साहबों की टेबल से उठाकर गाँव-गाँव में पहुँचा दिया है। लेकिन सवाल उठता है कि मीडिया इस प्रकार की सकारात्मक खबरें क्यों नहीं देता? या सिर्फ़ नकारात्मक खबरों से ही टीआरपी बढ़ती है? या पैसा कमाने के लिये मीडिया ने अपना आत्मसम्मान गिरवी रख दिया है?

जीवन को जीना और जीवन को ढोना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आजकल का पढ़ा-लिखा युवा या मध्यमवर्गीय आदमी “जैसा है वैसा चलने दो” वाला भाव अपनाये रहता है, उसे कहते हैं जीवन को ढोना, जबकि फ़ुन्दीबाई की सृजनशीलता ही जीवन को जीना कहलाता है। कोई जरूरी नहीं कि उच्च शिक्षा, या भरपूर कमाई या कोई बड़ी महान कृति ही सब कुछ है। समाज में बड़े बदलाव लाने के लिये हमेशा छोटे बदलावों से ही शुरुआत होती है, जरूरत है सिर्फ़ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के अहसास की, उच्च शिक्षा तो उसमें मददगार हो सकती है….नितांत जरूरत नहीं।

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आज रूबरू हम उनके जज्‍बात से होंगे

आज रूबरू हम उनके जज्‍बात से होंगे,
मना लेंगे अगर खफ़ा किसी बात से होगें,

आज शाम उनका दीदार करेंगें,
मिलकर उनसे कुछ इज़हार करेंगें
जो कभी नही हुए बो परेशां आज रात से होगें,
आज रूबरू…..

जब आँखों में आँखें डालकर,
शर्म का पर्दा उतारकर,
मिलेंगें हम,
वो भर कर आहें इस मुलाकात से होगें।
आज रूबरू…..

जब उड़ेगा उनका दुपट्टा हवाओं सें,
हम घायल होंगें उनकी अदाओं सें,
हम दोंनों के दिल में कुछ एक हादसें होगें
आज आज रूबरू…..

कभी बालों को बिखेरकर,
होठों पे अगुंलियॉं फेरकर,
लेकर हाथों में हाथ उनका,
आज हम आजाद से होगें,
आज रूबरू…..

ये कागजी शेर

प्रत्येक वर्ष 6 दिसम्बर को सेकुलर समाचार पत्र एवं पत्रिकाएं बाबरी की दुहाई देते हुए लम्बेलम्बे आलेखप्रकाशित कर हिन्दुओं को नसीहत देने का प्रयास करते हैंबंगलादेश, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और मलेशियामें हिन्दुओं पर हो रहे घोर अत्याचारों पर इनकी कलम क्यों नहीं चलती? क्या इन सेकुलरों को पता नहीं है किपाकिस्तान और बंगलादेश में हिन्दुओं की संख्या निरन्तर घट रही है? इसके पीछे मुख्य कारण है जिहादीअत्याचारपूरी दुनिया जानती है कि इन देशों में अल्पसंख्यकों का क्या हाल हैकट्टरपंथी हिन्दुओं कोमतान्तरण के लिए प्रताड़ित करते हैंप्रताड़ना सहकर भी जो लोग मतान्तरण नहीं करते उनका जीना दूभर कररखा है इन कट्टरपंथियों नेबंगलादेश और पाकिस्तान में सैकड़ों मन्दिरों को 1947 और उसके बाद खण्डित और अपवित्र किया गया हैपाकिस्तान, बंगलादेश और अब मलेशिया में हिन्दुओं की स्थिति बद से बदतर हो रही है, लेकिन इनके विरुध्द लिखने वाली कितनी कलमें हैं? तस्लीमा नसरीन ने इन मुद्दों पर कलम चलायी तो उनकी कलम ही तोड़ दी गयीये सेकुलर उस समय बेजुबान क्यों हो जाते हैं जब कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीर से भगाया जाता है? क्यों नहीं चलती इनकी कलम उन आतंकवादियों के खिलाफ जो जिहाद के नाम पर हिन्दुओं के रक्त सेखूनी होली खेलते हैं? जब भी हिन्दू अंगड़ाई लेता है तो ये चिल्लाने लगते हैं कि हिन्दू जग रहा हैआखिर हिन्दुओंके जगने पर इतना बवाल क्यों? कागजों पर हिन्दुओं के शौर्य को कलंकित करने वाले ये कागजी शेर कठमुल्लाओंकी जरा सी फूंक के सामने हवा में उड़ जाते हैं, क्योंकि इन्हें पता है कि इनके खिलाफ लिखा तो अगले ही दिनफतवा जारी कर दिया जाएगाहिन्दू तो कोई फतवा निकालने वाले हैं नहीं, तो फिर हिन्दुओं के खिलाफ ही जमकर लिखा जाएइससे कुछ और नहीं तो सेकुलर सरकार का चेहरा खिल उठेगा और फिर मिलेंगे सम्मान पत्रऔर ढेरों पुरस्कारऐसी दूषित सोच ने ही भारत के सम्मान को हमेशा बट्टा लगाया है

लेखक श्री कुमुद कुमार

क्रिसमस पर 242 ईसाई परिवारों की घर वापसी

क्रिसमस के अवसर पर उत्तर प्रदेश और उड़ीसा के 242 ईसाई परिवारों ने हिंदू धर्म में वापसी की। जो यह बात दर्शाती है कि आज के दौर में धर्मान्‍तरण जबरन हो रहा है। जो भी ये ईसाई हिन्‍दू बने है भूत में उन्‍हे बरगला फुसलाकर ईसाईत्‍व का जामा पहनाया गया था। आज इनकी वापसी इसलिये हो पाई है कि इनकी आस्‍था पर आज भी राम और कृष्‍ण है और ये हृदय से भारतीय है।

खबर है कि उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के तीस गांवों के दो सौ ईसाई परिवारों ने मंगलवार को हिंदू धर्म अपनाया।ये परिवार धर्म जागरण समिति के बैनर तले सरस्वती विद्या मंदिर में जमा थे। विद्यालय परिसर में हवन यज्ञ का आयोजन हुआ। इन लोगों का कहना है कि ईसाई मिशनरी ने प्रलोभन देकर ईसाई धर्म ग्रहण कराया था।

राउरकेला से मिली खबर के अनुसार, मंगलवार को विश्व हिंदू परिषद की अगुवाई में 42 परिवारों के 187 सदस्यों ने हिंदू धर्म में वापसी की। मंगलवार को जिले के नुआगांव ब्लाक स्थित चिकिटिया गांव में विहिप ने परावर्तन कार्यक्रम का आयोजन किया था। यहां पंडितों ने इन परिवारों का शुद्धिकरण किया। उसके बाद इन लोगों को हिंदू देवी-देवताओं के लाकेट एवं फोटो दिए गए। हिंदू धर्म में वापसी करने वाले सभी आस पास के गांवों के निवासी हैं।

सभी के हिन्‍दू धर्म में पुन: शा‍मिल होने पर हार्दिक बधाई।

हिन्‍दुओं को समाप्‍त करना जरूरी

म्‍यामार का हिन्‍दू यदि अपने अधिकारों की बात करता है तो उसे बुरे परिणाम के लिये तैयार रहने का कहा जाता है। वह समानता की बात कह नही सकता, उसे समानता मिल नही सकती, वह वहॉं पूजा करने को स्‍वतंत्र नही को‍ई सर्वाजनिक उपासना नही कर सकता है। घर में भी वह घन्‍टी नही बजा सकता है। उस पर कई तरह के प्रतिबन्‍ध है। यह प्रतिबन्‍ध एक मुस्लिम राष्‍ट्र का प्रतिबन्‍ध है। यहॉं उदारता भाई चारा सौहार्द जैसे शब्‍द नही है। यहॉं किसी की धर्मिक भावना को कोई मतलब नही, यहॉं अभिव्‍यक्ति की स्‍वत्रंत्रता भी नही, यहॉं कलाकारों की कला भी स्‍वतंत्रता नही है। इससे मिलता जुलता हाल तमाम मुस्लिम राष्‍ट्रों को है। वो जहॉं ताकत में है वहॉं दूसरो की कोई आवाज नही है।

हिन्‍दुओं को संगरक्षण देने का काम केवल भारत ही कर सकता है। किन्‍तु यहॉं के हाल अत्‍यन्‍त खराब है हजारों वर्ष से लुटता पिटता और संघर्ष करता हिन्‍दू आज सच्‍चाई समझ नही पा रहा है। वह आज भी शान्ति शद्भाव व भाई चारे की बात करता है। ‘सर्वभवन्‍तु सुखिन:’ उसका शीर्ष वाक्‍य है। ऐसे में कुछ ऐसे हिन्‍दु नाम भी है जो छुद्र लाभ के लिये हिन्‍दुओं को ही गाली देते है। कितना भी बड़ा आधात हिन्‍दुओं पर हो उन्‍हे आघात नही लगता। वह नही जनता कि शान्ति शान्ति कहने से शान्ति नही मिलती है। शान्ति निर्माध के लिये अशान्ति के विषबीज को समाप्‍त करना होता है। शायद इसी शान्ति के चाहत में हमने पा‍किस्‍तान बनाया, इसी शान्ति के चाहत में अनुच्‍छेद 370 लगाया इसी शन्ति के चाहत में अनेको तरह की छूट दी, किन्‍तु यह शान्ति हमसे दूर होती चली गई। हम अपने आपकेा अब सम्‍हाल नही सकते। हमें नही पता है कि हम सुबह घर से निकलने के बाद वापस भी आयेगे कि नही।

यह कहना अत्‍यन्‍त कठिन है कि देश में प्रचार-प्रसार पर किसका असर है? किसके इसारे पर यहॉं कि अपनी मीडिया ही अपने लोगों को डराने का काम कर रही है? हाल ही में तीन कचेहरियो में हुऐ बम विस्‍फोट के बाद मीडिया ने कहना प्रारम्‍भ किया कि आंतकवादियों ने वकीलों से बदला ले लिया। यह बदले की कार्यवाही है। वकीलों ने आंतकवादियों का केस न लड़ कर उन्‍हे नाराज कर दिया। एक ऐसा माहौल बनाया गया कि यहॉं के लोग यहॉं कि इस घटना से भयभीत हो जहॉं आतंकवादियों को जवाब देने के लिये, उनका मुकदमा न लडने के लिये साहस दिखने के लिये वकीलों की प्रशंसा होनी चाहिए थी वहॉं इनके साहस की प्रसंशा के स्‍थान पर आतंकवादियों की बुझदिली कुछ को वकीलों के मुँह पर तमाचा बताया गया1 यह बात मीडिया के भूमिका पर प्रश्‍न चिन्‍ह लगाता है।

चौतरफा के हमलों से आज भारत लड़ रहा है। इसके जीवन वृत्‍त में युद्ध एक अहम् हिस्‍सा हो गया है अपेक्षा थी कि 1947 के अलगरव के बाद अमन और होगा किन्‍तु हमसे अमन औरर शान्ति दूर ही जा रही है। इस राष्‍ट्र की राजनीति के अन्‍दर राष्‍ट्र और राजनीति के वुनाव में राष्‍ट्र काफी पीछे जा रहा है। राष्‍ट्रीय विचारों की बात करने पर मीडिया हाय तौबा मचाता है। उसे राष्‍ट्रीय विचार धारा लोगों को सताने वाली लगती है।आज की मीडिया को क्रान्तिकारियों और आतंकवादियों में कोई अन्‍तर नही समझ आता। ये क्रान्तिकारियों की तुलना आतंकवादियों से करने है, नही पता ऐसा करने से इन्‍हे कैसी शान्ति प्राप्‍त होती है? किन्‍तु इससे यह स्‍पष्‍ट होता है कि यहॉं कट्टरता बढ़ रही है। इस देश में दिल्‍ली से कन्‍याकुमारी तक का मुस्‍लमान 370 का पक्ष लेता है। इस देश के मुसलमानों के दबाव में तसलीमा की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता तार तार होती है। इस देश के मुसलमानों के डर से सलमान रूशदी को देश छोड़ना पड़ा। इस देश के मुसलमानों के भय से ही सरकार अफजल को फांसी देने से कतरा रही है किन्‍तु अतने के बाद भी मुसलमान इस देश का है। सारी घटना के लिये हिन्‍दू दोषी है। तभी तो सिर्फ और सिर्फ देश में दो ही दंगे हुऐ एक गुजराज का दूसरा मुम्‍बई का बाकी पूरा देश शान्‍त बना रहा। किसी दंगे में कोई हिन्‍दू मारा गया तो भी भी दंगा है। इसी लिये मऊ, कानपुर हैदराबाद, अलीगढ़ भोपाल, नागपुर और केरल आदि के दंका कही कोई जिक्र नही होता। खुले आम कुछ लोग आतंकवाद को सहारा दे रहे है उन पर कोई ऊँगली नही उठाता। फूलपुर के आंतकवादी की गिरफतारी के बाद घंटो जाम हुआ यह चर्चा का विषय नही होता।

आज हिन्‍दू अपने सीमित संसाधन से पूरे विश्‍व को शान्ति का संदेश दे रहा है। अनेकता में एकता का उदाहरण दे रहा है। विविध विचारों के बावजूद युद्धहीन समाज के निर्माण का अनोखा उदाहरण विश्‍वमें एक मात्र यही है। विकास-विचारों की स्‍वतंत्रता से होता है जहाँ हर किसी को सम्‍मान मिले वही प्रतिभा पनफती है इन सभी विशेषता के बावजूद हिनूद को समाप्‍त करना आज कुछ लोगों को जरूरी लग रहा है क्‍योकि यही वह विचार धारा है जो उनके मनसूबे पर पानी फेरता है। इसलिये इसे भारत में पल्‍लवित होना ही चाहिऐ और भारत को विश्‍व के किसी भी हिन्‍दू पर हो रहे अत्‍याचार के खुल का बोलना चाहिए।

21वीं सदी में मीडिया के समक्ष चुनौतियां व भविष्य

भारतीय लोकतंत्र के स्थाई स्तंभ न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका के बदलते स्वरूप से आज लोकतांत्रिक मूल्यों में दिन पर दिन गिरावट आती जा रही है, जिससे पूरा देश गंभीर संकट के बीच उलझता जा रहा है। पत्रकारिता इसी लोकतंत्र का चौथा स्थाई स्तंभ है। जिसकी सजग भूमिका इस बदलते परिवेश की पृष्ठभूमि को सकारात्मक दिशा की ओर मोड़ सकती है। ऐसे समय में मीडिया जो पत्रकारिता की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि है, के समक्ष गंभीर चुनौतियों का खड़ा होना स्वाभाविक है तथा उसकी कार्य प्रणाली पर निर्भर है इसका भविष्य। इतिहास साक्षी है। देश पर जब-जब भी गंभीर संकट आया है, पत्रकारिता की सजग पृष्ठभूमि ने ही सही दिशा में मार्ग प्रशस्त कर समूचे देकश को जागृत किया है। इसके आलोक में दुश्मनों को पहचानने एवं उससे लड़ने की उर्जा सदैव मिलती रही है। इसी कारण आज तक इस स्तंभ की साख पूरे देश ही नहीं, विश्व स्तर पर सर्वोच्च बनी हुई है। पूरा तंत्र इससे भयभीत रहता है। तथा इसकी सजग निगाहों के समक्ष खडे होने की किसी में भी गलत तरीके से हिम्मत नहीं होती।

स्वतंत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर नजर डाले तो इसके जागरूक स्वरूप को देखा जा सकता हैं जहां देश को आजाद कराने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने वाले देशभक्तों ने इसका सहारा लिया। आवाज को जनता तक पहुंचाने उन्हें जाागृत करने में प्रतिबंध लगने के बावजूद भी ऐन-केन प्रकारेण समाचार पत्र निकाले जाने तथा वितरित किये जाने का प्रकरण सभी भली भांति जानते है। लाला लाजपत राय, माखन लाल चतुर्वेदी की कलम को इतिहास कभी भूला नहीं सकता। अनेक गुमनाम एवं चर्चित नाम भी इतिहास के पृष्ठों में अमर पृष्ठभूमि बना चुकें है। जिनकी सजग कलम, प्रखर आवाज ने सदियों की दास्ता से मुक्ति दिलााई। आज फिर से देश गंभीर संकट से गुजर रहा है, जहां लोकतंत्र के स्तंभों में प्रमुख न्यायपालिका, विधायिका, एवं कार्यपालिका का मूल स्वरूप दिन पर दिन स्वार्थ की परिधि में उलझकर बदलता जा रहा है।

विधायिका के बदलते जा रहे स्वरूप का साक्षात प्रमाण यहां के संसद एवं विधायक भवन दे रहें है। जहां गंभीर चिन्तन की जगह असभ्यता के पांव पसारते जा रहे है। दागी ही दगा से पूछ रहा है दागी कौन है। बाहुबल एवं अर्थबल के बढ़ते प्रभाव ने इसकी काया ही बदल गई है। अपराध पर अपराध करते जाइये और जब तक न्यायालय अंतिम रूप से अपराधों न मान लें किसे हिम्मत है जो अपराधी कह दे। न्यायालय भी जब कब्जे मे हो तो निर्णय का मजबूरन पक्ष में होना भी स्वाभाविक है। इस तरह की बदलती पृष्ठभूमि से भी सभी भलीं भांति परिचित है।

जहां न्याय पालिका की बदलती पृष्ठभूमि को आसानी से देखा जा सकता है। आने वाले समय में पक्ष विपक्ष की एकात्मक भूमिका न्यायपालिका के स्वतंत्र वजूद को लील जाने को तैयार बैठी है। कार्य पालिका का स्वरूप भी किसी से अपरिचित नहीं, जिस पर ऐन-केन प्रकारेण विधायिका का वर्चस्व स्वहित में देखा जा सकता है। वैसे कार्य पालिका पर नियन्त्रण हेतु विधायिका होती है, यह पहलू राष्ट्रहित एवं जनहित में सही तो माना जा सकता है। परन्तु जब विधायिका का कार्यपालिका पर नियन्त्रण राष्ट्रहित एवं जनहित को ताक पर रखकर स्वहित में होने लगे तो इस तरह का परिवेश निश्चित रूप से लोकतंत्र के लिए घातक है। आजकल कुछ इसी तरह की पृष्ठभूमि ज्यादा बनती जा रही है। जिसके कारण सरकार बदलते ही कार्यपालिका का स्वरूप बदल जाता है। ऐसे परिवेश में सही कार्य को मूर्त रूप दे पाना कतई संभव नही हो पाता। इस तरह के परिवेश 21वीं सदी की ओर बढ़ते कदम में स्वतंन्त्र सर्वाधिक बनते जा रहे हैं, जहां लोकतंत्र के अस्तित्व के समक्ष गंभीर संकट खड़ा है।

देश में बढ़ता आतंकवाद, भ्रष्टाचार, लूटपाट अनैतिक गतिविधिंयों की भरमार इस बदलते परिवेश की देन हैं। जहां न्यायपालिका भी जब स्वतंत्र पृष्ठभूमि नहीं बना पा रही है। विधायिका क्षेत्र में बढ़ते अनैतिक कदम लोकतंत्र के वास्तविक स्वरूप को ही बदलते जा रहे है। जहां देश का बुध्दिजीवी वर्ग कुंठित हो चला है। यह स्थिति निश्चित रूप से सभी के लिए घातक है। ऐसे परिवेश में जहां विधायिका हर प्रकार से लोकतंत्र के सजग स्तंभों पर हावी होती जा रही है, पत्रकारिता को इस दूषित वातावरण से अपने आपको अलग खड़ा कर अपनी पहचान बनानी होगी, तभी 21वीं सदी में पत्रकारिता का भविष्य सुरक्षित हो पायेगा। आज अर्थयुग का परिवेश चारों तरफ हावी नजर आ रहा है। इस परिवेश के बीच अपने वास्तविक स्वरूप को खड़ा करना एवं उजागर कर पाना मीडिया के समक्ष गंभीर चुनौतिया है, जिसे लीलने को विधायिका तैयार बैठी है। आज समूचा देश फिर से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता की ओर आत्मविश्वास के साथ आत्मरक्षा कवच पाने की लालस देख रहा है। जहां इस भ्रष्ट होती जा रही व्यवस्था को दूर करने का मार्ग प्रशस्त हो सके। यह आजादी पाने की दिशा मेें नई जग की शुरूआत मानी जाएगी। जहां मीडिया को आज तड़क-भड़क आर्थिक युग की पृष्ठभूमि में अपनी पहचान बनाये रखनी होगी। यही 21वीं सदी की मीडिया के समक्ष गंभीर चुनौतियां है। तथा इसकी सफलता में उसका भविष्य सुरक्षित है।

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