फ़ुन्दीबाई सरपंच : बदलते भारत की महिला….

Panchayati Raj Illiteracy and Society

भारत के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है झाबुआ, उसके ग्राम सारंगी की सरपंच हैं श्रीमती फ़ुन्दीबाई। पूर्णतः अशिक्षित, “श्रीमती” लगाने भर से असहज हो जाने वाली, एकदम भोली-भाली, सीधी-सादी आदिवासी महिला सरपंच। आप सोच रहे होंगे कि भला यह कैसे “बदलते भारत की महिला” हो सकती हैं… लेकिन वे हैं… आरक्षण के कारण अजजा महिला सीट घोषित हुई सारंगी ग्राम से फ़ुन्दीबाई सरपंच बनीं। आजादी के साठ साल बीत जाने के बावजूद रेल की पटरी न देख पाने वाले झाबुआ के अन्दरूनी ग्रामों की हालत आज भी कुछ खास बदली नहीं है। यहाँ के आदिवासियों ने आज तक अफ़सरों और नेताओं को बड़ी-बड़ी जीपों और “चीलगाड़ी” (हेलीकॉप्टर) मे सिर्फ़ दौरे करते देखा है, आदिवासी आज भी गरीब का गरीब है, जबकि झाबुआ और आदिवासियों के नाम पर पिछले पचास वर्षों में जितना पैसा आया, उतने में कम से कम चार मुम्बई और बसाई जा सकती हैं। ऐसे भ्रष्ट माहौल में जब कोई सरपंच बनता है, तो समझो उसकी “लॉटरी” लग जाती है।

फ़ुन्दीबाई एक प्रतिबद्ध महिला सरपंच, साहसी और दबंग, जो अपने इलाके में “स्कूल वाली बाई” के नाम से मशहूर हो गई हैं

लेकिन फ़ुन्दीबाई कोई साधारण महिला नहीं हैं, सरपंच बनते ही सबसे पहले उन्होंने अपनी पंचायत में लड़कियों की ऐसी सूची बनाई जो स्कूल नहीं जा रही, फ़िर खुद उनके घर जा-जाकर उनके माता-पिता को लड़कियों को स्कूल जाने को तैयार किया। समय जरूर लगा, लगता ही है, लेकिन आज ग्राम सारंगी में बालिकाओं ने हायरसेकंडरी में कदम रख दिया है और इस साल लगभग 22 लड़कियों को शासन की तरफ़ से स्कूल जाने के लिये साइकल दिलवा दी गई है। पंचायत के सभी स्कूलों में फ़ुन्दीबाई स्वयं सुबह से भ्रमण करती हैं, जहाँ भी गंदगी या कचरा दिखाई देता है, उसे अपने हाथों से साफ़ करती हैं। लड़कियों को पढ़ाने के बारे में उनका अलग ही “फ़लसफ़ा” है, वे कहती हैं “वगर भणेली सोरी, लाकड़ा नी लोगई बणी जावे” मतलब.. “बगैर पढ़ी-लिखी लड़की काठ की पुतली बनी रह जाती है”। उनका सोचना है कि एक लड़की के पढ़ने से तीन घर सुधर जाते हैं, एक तो उसका मायका, दूसरा उसका ससुराल और तीसरा उसकी होने वाली लड़की का घर..। उच्च जाति के दबदबे वाले समाज में वह साहस और दबंगता से अपनी बात रखती हैं और नतीजा यह कि आसपास के इलाके में वे “स्कूल वाली बाई” के नाम से मशहूर हैं। वे खुद अशिक्षित हैं इसलिये इसकी हानियों से वे अच्छी तरह परिचित थीं, इसलिये उनके एजेंडे में सबसे पहला काम था शिक्षा और खासकर बालिका शिक्षा। वे अपनी तीन लड़कियों को तो पढ़ा ही रही हैं खुद भी प्रारंभिक अक्षर-ज्ञान लेने में लगी हैं। उनका अगला लक्ष्य है ग्राम में स्थित सभी पेड़-पौधों और आसपास के वृक्षों की रक्षा करना और उनकी वृद्धि करना। उनके सरपंच कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे हो चुके हैं, अब यदि उन्हें अगला कार्यकाल मिला तो निश्चित ही वे यह भी कर दिखायेंगी।

भारत में पंचायती राज लागू हुए कई वर्ष हो गये। अखबारों, दृश्य-मीडिया आदि में अधिकतर पंचायतों के बारे में, पंचायती राज के बारे में नकारात्मक खबरें ही आती हैं। “फ़लाँ सरपंच अनपढ़ है, फ़लाँ सरपंच ने ऐसा किया, वैसा किया, यहाँ-वहाँ पैसा खा लिया, पैसे का दुरुपयोग किया, अपने रिश्तेदारों और अपने घर के पास निर्माण कार्य करवा लिये…. आदि-आदि। माना कि इनमें से अधिकतर सही भी होती हैं, क्योंकि वाकई में पंचायती राज ने भ्रष्टाचार को साहबों की टेबल से उठाकर गाँव-गाँव में पहुँचा दिया है। लेकिन सवाल उठता है कि मीडिया इस प्रकार की सकारात्मक खबरें क्यों नहीं देता? या सिर्फ़ नकारात्मक खबरों से ही टीआरपी बढ़ती है? या पैसा कमाने के लिये मीडिया ने अपना आत्मसम्मान गिरवी रख दिया है?

जीवन को जीना और जीवन को ढोना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आजकल का पढ़ा-लिखा युवा या मध्यमवर्गीय आदमी “जैसा है वैसा चलने दो” वाला भाव अपनाये रहता है, उसे कहते हैं जीवन को ढोना, जबकि फ़ुन्दीबाई की सृजनशीलता ही जीवन को जीना कहलाता है। कोई जरूरी नहीं कि उच्च शिक्षा, या भरपूर कमाई या कोई बड़ी महान कृति ही सब कुछ है। समाज में बड़े बदलाव लाने के लिये हमेशा छोटे बदलावों से ही शुरुआत होती है, जरूरत है सिर्फ़ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के अहसास की, उच्च शिक्षा तो उसमें मददगार हो सकती है….नितांत जरूरत नहीं।

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12 Comments

  1. anitakumar said,

    December 30, 2007 at 7:04 pm

    फ़ुंदीबाई को मेरा सलाम , ऐसे लोगों की वजह से ही भारत का भविष्य आशावान लगता है। लिखते रहिए ऐसे ही, अच्छा लगता है।

  2. anitakumar said,

    December 30, 2007 at 7:04 pm

    फ़ुंदीबाई को मेरा सलाम , ऐसे लोगों की वजह से ही भारत का भविष्य आशावान लगता है। लिखते रहिए ऐसे ही, अच्छा लगता है।

  3. anitakumar said,

    December 30, 2007 at 7:04 pm

    फ़ुंदीबाई को मेरा सलाम , ऐसे लोगों की वजह से ही भारत का भविष्य आशावान लगता है। लिखते रहिए ऐसे ही, अच्छा लगता है।

  4. maithily said,

    December 31, 2007 at 12:53 am

    आपने फुन्दीबाई का परिचय हम सबसे कराकर बहुत भला काम किया है.

  5. maithily said,

    December 31, 2007 at 12:53 am

    आपने फुन्दीबाई का परिचय हम सबसे कराकर बहुत भला काम किया है.

  6. maithily said,

    December 31, 2007 at 12:53 am

    आपने फुन्दीबाई का परिचय हम सबसे कराकर बहुत भला काम किया है.

  7. अरुण said,

    December 31, 2007 at 4:59 am

    slaam aapako aur fundi bai ko ..kash aisI 1000 hotI laaKh hoti to bharat vakaI me bharat hota..

  8. अरुण said,

    December 31, 2007 at 4:59 am

    slaam aapako aur fundi bai ko ..kash aisI 1000 hotI laaKh hoti to bharat vakaI me bharat hota..

  9. अरुण said,

    December 31, 2007 at 4:59 am

    slaam aapako aur fundi bai ko ..kash aisI 1000 hotI laaKh hoti to bharat vakaI me bharat hota..

  10. Mired Mirage said,

    March 8, 2009 at 9:14 am

    फ़ुंदीबाई जी के बारे में पढ़वाने के लिए धन्यवाद। ऐसे ही कुछ और लोग हो जाएँ तो भारत का चेहरा बदल जाएगा। अच्छी सोच के लिए उच्च शिक्षा कोई गारंटी नहीं है। उन्हें मेरा सलाम।
    घुघूती बासूती

  11. Mired Mirage said,

    March 8, 2009 at 9:14 am

    फ़ुंदीबाई जी के बारे में पढ़वाने के लिए धन्यवाद। ऐसे ही कुछ और लोग हो जाएँ तो भारत का चेहरा बदल जाएगा। अच्छी सोच के लिए उच्च शिक्षा कोई गारंटी नहीं है। उन्हें मेरा सलाम।घुघूती बासूती

  12. ABHILASA said,

    October 14, 2009 at 9:33 am

    pardhne ki adat hi …aishi hai…ki ..kutch na kutch..naya mil hi jata hai………mainne apke kai post pardhi….is tarah ka lakhen abhi bhi kam ho raha hai….app acha likte hain…apni soch ki dhar banaye rakhen.dhanyawad.


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