वास्तुशास्त्र, फ़ेंगशुई की अ-वैज्ञानिकता और धंधेबाजी (भाग-2)

Vastushastra Feng-Shui Science & Business

(गतांक से आगे…)
आदिकाल से मनुष्य ने आसपास के माहौल और प्रकृति के निरीक्षण से कई निष्कर्ष निकाले, उन्हें लिपिबद्ध किया, उन्हें ग्रंथों का रूप दिया ताकि आने वाली पीढ़ी को उनके अनुभवों का लाभ मिल सके। उदाहरण के लिये “मायामत” जिसका निर्माण केरल में हुआ। केरल जो कि दक्षिण और पश्चिम में समुद्र से घिरा हुआ है, सो मायामत के लेखक (या लेखकों) ने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रगति बाकी की दो दिशाओं में ही है अर्थात उत्तर और पूर्व। जबकि दूसरी ओर उत्तर भारत के “विश्वकर्मा” ने उत्तर और पूर्व में हिमालय को देखते हुए विस्तार या तरक्की की अवधारणा दक्षिण और पश्चिम में तय की। यदि इस दृष्टि से देखा जाये तो पुरातन वास्तुशास्त्र को एक प्राथमिक विज्ञान कहा जा सकता है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, इसमें आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आने की बजाय यह और ज्यादा पोंगापंथी और ढकोसलेबाज बनता गया। विज्ञान की शब्दावली का भी वास्तु वालों ने बखूबी इस्तेमाल किया है, वास्तुविद वी.गणपति स्थापति कहते हैं कि वास्तुशास्त्र विज्ञान के तीन सिद्धांतों पर काम करता है- VRF यानी Vibration, Rhythm and Form, वे आगे कहते हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक आयताकार ब्लॉक या क्यूब के समान है, इसलिये जो भी ध्वनि या कम्पन इस धरा पर उत्पन्न होते हैं वह ब्रह्मांड में टकराकर एक परावलय (Sphere) बनाते हैं, और यही मानव और इस सृष्टि का मूल सिद्धांत है, (क्या बात है, जो बात आज तक कोई नहीं जान पाया कि ब्रह्मांड कैसा है? वे यह पहले से जानते हैं)। पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवी तक इस छद्म विज्ञान की चपेट में आ चुके हैं, एल एंड टी, जी टीवी, विक्रम इस्पात जैसी विख्यात कम्पनियाँ भी अपने परिसर वास्तु के हिसाब से बनवाने लगी हैं… लेकिन इनमें से सभी सफ़ल नहीं हैं, न हो सकती हैं (कम से कम वास्तु के बल पर तो बिलकुल नहीं)… स्वस्थ जीवन के लिये धूप और हवा आवश्यक है और इसीलिये पूर्व दिशा में खुलने वाला मकान ज्यादा धूप के लिये और खिड़कियाँ हवा के लिये जरूरी हैं, भला इसमें शुभ-अशुभ का क्या लेना-देना?

वास्तुशास्त्र का मूल आधार है आठों दिशायें। ये दिशायें प्रकृति ने पैदा नहीं की हैं, ये इन्सान ने बनाई हैं। अब भला कोई दिशा शुभ और कोई अशुभ कैसे हो सकती है? धरती अपने अक्ष पर सतत पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती रहती है, तो जब मनुष्य धरती पर खड़े होकर तारों, सूर्य को देखता है तो उसे लगता है कि ये सभी पूर्व से पश्चिम की ओर जा रहे हैं। एक उदाहरण – जब हम किसी विशाल गोल झूले पर बैठते हैं और झूला तेजी से चलने लगता है तो हमें लगता है कि दुनिया गोल घूम रही है, जबकि कुछ भी नहीं बदला होता है, सिर्फ़ हमारी स्वयं की स्थिति के अलावा। इसी प्रकार जब सूर्य पूर्व की ओर से पश्चिम की ओर जाता दिखाई देता है, तो इसमें कौन सी शुभ-अशुभ, या लाभकारी-हानिकारक स्थिति बन गई? सबसे मजेदार स्थिति तो आर्कटिक और अंटार्कटिक स्थित जगह की है, जहाँ की सूर्य लगभग छः महीने तक रात में भी दिखाई देता है, अब भला वास्तुशास्त्री अंटार्कटिका में वास्तु के सिद्धांत कैसे लागू करेंगे, यह जानने का विषय है। यह भी जानना बेहद दिलचस्प होगा कि बर्फ़ीले प्रदेशों में रहने वालों के गोलाकार मकान “इग्लू” को वास्तुविद कैसे बनायेंगे?

भगवान बुद्ध ने कहा है – कोई बात प्राचीन है इसलिये उस पर आँख मूंदकर भरोसा मत करो, उस बात पर भी सिर्फ़ इसलिये भरोसा मत करो कि तुम्हारी प्रजाति या समुदाय उस पर विश्वास करता है, किसी ऐसी बात का भरोसा भी मत करो जो तुम्हें बचपन से बताई-सिखाई गई है, जैसे भूत-प्रेत, जादू-टोने आदि, पहले खुद उस बात पर विचार करो, अपना दिमाग और तर्कबुद्धि लगाओ, उसके बाद भी यदि वह तुम्हें वह बात लाभकारी लगे, और समाज के उपयोगार्थ हो तभी उस पर विश्वास करो और उसके बाद लोगों से उस बात पर विश्वास करने को कहो…

प्रख्यात मराठी वैज्ञानिक जयन्त नारलीकर ने अपनी पुस्तक “आकाशाशी जड़ले नाते” मे एक अनुभव का उल्लेख किया है, जिसमें सूर्य पश्चिम से उगता हुआ दिखाई दिया। दरअसल एक बार 14 दिसम्बर सन 1963 को जब वे एक हवाई जहाज से जा रहे थे, तब कुछ क्षणों के लिये जहाज की पूर्व से पश्चिम की गति पृथ्वी की पश्चिम से पूर्व घूर्णन गति से ज्यादा हुई होगी, उस वक्त सूर्य पश्चिम से उगता दिखाई दिया। इस उदाहरण का उल्लेख इसलिये जरूरी है कि वास्तुशास्त्र में जो शुभ-अशुभ दिशायें बताई जाती हैं, असल में ऐसा कुछ है नहीं। “दिशायें” सिर्फ़ मानव द्वारा तैयार की गई एक अवधारणा मात्र है, और वह पवित्र या अपवित्र नहीं हो सकती। नारलीकर कहते हैं कि विश्व की एक बड़ी आबादी पृथ्वी के ध्रुवीय इलाकों जैसे रूस का उत्तरी भाग, कनाडा आदि में रहती है, जहाँ ग्रह, तारे, सूर्य छः-छः महीने तक दिखाई नहीं देते, भला ज्योतिषी और वास्तुविद ऐसे में वहाँ क्या करेंगे, कैसे तो कुंडली बनायेंगे, और कैसे वास्तु के नियम लागू करेंगे? लेकिन फ़िर भी उन लोगों का जीवन तो अबाध चल ही रहा है।

– वास्तु समर्थकों से अनुरोध है कि कालाहांडी (उड़ीसा) में रहने वाले लोगों के मकान वास्तुदोष से मुक्त करें, ताकि वहाँ कम से कम लोगों को दिन में एक बार का भोजन तो मिले… या फ़िर मुम्बई में स्थित एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी “धारावी” में हर घर में एक “लॉफ़िंग बुद्धा” रखा जाये, ताकि उन्हें नारकीय जीवन से मुक्ति मिले और सिर्फ़ “बुद्धा” ही नहीं वे भी मुस्करा सकें…

(तीसरे भाग में फ़ेंग शुई के “धंधे” के बारे में…)

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9 Comments

  1. Chetan said,

    January 30, 2008 at 3:51 pm

    Namaskar Sabhi ka,
    Some great information on
    http://www.vastuconsultancy.com
    Yahan par utkrushta Vastu Shastra jaankari aur consultation aapko milegi.

  2. Chetan said,

    January 30, 2008 at 3:51 pm

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  3. Chetan said,

    January 30, 2008 at 3:51 pm

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  4. Neeraj Rohilla said,

    January 30, 2008 at 5:05 pm

    बहुत बढिया,
    पूरा आलेख पढकर मन प्रसन्न हो गया ।

  5. Neeraj Rohilla said,

    January 30, 2008 at 5:05 pm

    बहुत बढिया,
    पूरा आलेख पढकर मन प्रसन्न हो गया ।

  6. January 30, 2008 at 5:05 pm

    बहुत बढिया,पूरा आलेख पढकर मन प्रसन्न हो गया ।

  7. दीपक भारतदीप said,

    January 30, 2008 at 6:16 pm

    मैं आपके दोनों लेख पढ़कर एक बात कह सकता हूँ कि कई चीजों को घालमेल कर कुछ शास्त्रों का विस्तार किया गया है और उनमें इसलिए दोष भी आया है. अगर मकान का मुख पूर्वाभिमुख या दक्षिणाभिमुख हो तो इसके फायदे हैं कि गर्मी में सूर्य के उत्तरायण में होने से धूप अधिक नहीं लगती और सर्दी में दक्षिणायन होने से सबसे पहले सुबह धूप मिलती है, दोनों स्थितियों में अंतर यूं भी पता लगता है कि सर्दी में सामने पडोसी भी मानते हैं कि आपको धूप मिल जाती हैं अब आप यह मत कहैं कि सबके मकान ऐसे हों. बहरहाल कुछ विज्ञान है तो कुछ अंधविश्वास.एकदम नकारना मुश्किल है.
    दीपक भारतदीप

  8. दीपक भारतदीप said,

    January 30, 2008 at 6:16 pm

    मैं आपके दोनों लेख पढ़कर एक बात कह सकता हूँ कि कई चीजों को घालमेल कर कुछ शास्त्रों का विस्तार किया गया है और उनमें इसलिए दोष भी आया है. अगर मकान का मुख पूर्वाभिमुख या दक्षिणाभिमुख हो तो इसके फायदे हैं कि गर्मी में सूर्य के उत्तरायण में होने से धूप अधिक नहीं लगती और सर्दी में दक्षिणायन होने से सबसे पहले सुबह धूप मिलती है, दोनों स्थितियों में अंतर यूं भी पता लगता है कि सर्दी में सामने पडोसी भी मानते हैं कि आपको धूप मिल जाती हैं अब आप यह मत कहैं कि सबके मकान ऐसे हों. बहरहाल कुछ विज्ञान है तो कुछ अंधविश्वास.एकदम नकारना मुश्किल है.
    दीपक भारतदीप

  9. January 30, 2008 at 6:16 pm

    मैं आपके दोनों लेख पढ़कर एक बात कह सकता हूँ कि कई चीजों को घालमेल कर कुछ शास्त्रों का विस्तार किया गया है और उनमें इसलिए दोष भी आया है. अगर मकान का मुख पूर्वाभिमुख या दक्षिणाभिमुख हो तो इसके फायदे हैं कि गर्मी में सूर्य के उत्तरायण में होने से धूप अधिक नहीं लगती और सर्दी में दक्षिणायन होने से सबसे पहले सुबह धूप मिलती है, दोनों स्थितियों में अंतर यूं भी पता लगता है कि सर्दी में सामने पडोसी भी मानते हैं कि आपको धूप मिल जाती हैं अब आप यह मत कहैं कि सबके मकान ऐसे हों. बहरहाल कुछ विज्ञान है तो कुछ अंधविश्वास.एकदम नकारना मुश्किल है. दीपक भारतदीप


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