ताज महल या तेजो महालय : एक प्रश्न

ताज महल (हवाई दृश्य )

गुम्बद और ध्वज का नजदीक से दृश्य

सामने से दृश्य ताज का

वो जगह जहाँ के बारे में कहा जाता है कि मुमताज़ को दफनाया गया

बर्हंपुर का महल जहाँ मुमताज़ की मृत्यु हुई

ईंटों से बंद किया हुआ दरवाज़ा जिसने सारे सबूतों को छिपाने में मदद की है

बड़ा सा बंद रोशनदान

वेदिक डिजाईन एक बंद कमरे की छत पर

एक और कमरे का अंदरूनी दृश्य

२२ गुप्त कमरों में से एक का अंदरूनी दृश्य

निचले तल के २२ गुप्त कमरों में से एक

३०० फीट लंबा गलियारा

उपरी तल पर जाने की सीढ़ी

, दीवार के फूलों में

निचले तल का संगमरमर युक्त कक्ष

उपरी तल पर एक बंद कमरा

संगीत कक्ष (एक और अपवाद )

ताज के पिछले भाग में बने खिड़की और दरवाजे जिन्हें बंद कर दिया गया है

ताज और उसके २२ भागों का पिछला दृश्यावलोकन

लाल गुलाब द्वार के ठीक ऊपर

ताज के बाहर में एक प्रतिबिम्ब ध्वज का

एक ईंटों की दीवार जिसने काफी सारे सबूत छिपा दिए हैं

अंदरूनी कुआँ

अपनी एक किताब “Taj Mahal : A True Story ” में प्रो पी एन ओक ने इसका प्रतिवाद किया है॥
उन्होंने कहा है कि ताज किसी मुमताज की कब्रगाह नहीं बल्कि हिन्दुओं का देव स्थान ” शिव मन्दिर” था। और इसका वास्तविक नाम तेजो महालय है। आपने छानबीन के दौरान उन्होंने ये जन की तेजो महालय , शाह जहाँ ने जयपुर के राजा जय सिन्ह से हड़प लिया था। ये तो अपने बादशाह-नामा में भी शाह जहाँ ने कबूला है की एक बेहद खूबसूरत इमारत उन्होंने ली थी, मुमताज की कब्रगाह बनने के लिए।
कुछ और भी बातें हैं जो इस बात को सत्यापित करतीं हैं : जैसे कि

  • किसी भी मुस्लिम राज्य में किसी इमारत (कब्रगाह की ) के नाम में महल नही होता ॥
  • किसी भी मुस्लिम कब्रगाह को किसी नदी के पास नही बनाया गया।
  • कमल वेदिक कलाकृतियों में इस्तेमाल होती थी, नाकि मुग़ल कलाकृतियों में।

पता नहीं सच्चाई क्या है, पर इतना तो जरुर सत्य है कि हमारी इतिहास कि किताबों ने हमें गुमराह ही किया है इतिहास के बारे में ।

ऐसे बहुत सारे सन्दर्भ हैं जो यह साबित करतें हैं कि हमारी इतिहास की किताबें सरकारों के अनुसार बदलती रही हैं । मसलन आप अभी के हालत भी देख सकते हैं, की देश में सत्ता परिवर्तन के बाद कैसे इतिहास की पुस्तकों में भरी फेर बदल होता है।

भारतीयों ने अगर इन सब बातों के ख़िलाफ़ आवाज़ नही उठाई तो उन्हें अपने इतिहास पर गौरव करने का अधिकार भी खोना पड़ सकता है।

तो क्या ये समय है हल्ला बोलने का ? क्या अब हम सब भारतीय एक साथ हल्ला बोलेंगे ?
इन सब सवालों का जवाब तो वक्त देगा॥


क्या अंडे तथा मशरूम शाकाहार हैं?

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अंडा मांसाहार है। ये मुर्गियों के मासिक-धर्म का रक्त है। अंडे के व्यवसाय को बढ़ावा देने वाले कहते हैं कि ‘गैर-संसेचित’ अंडे शाकाहार हैं। परन्तु चाहे कोई अंडा संसेचित हो अथवा गैर-संसेचित, यह तब भी मुर्गी का रक्त ही है, जो ठीक उसी प्रकार निकला है जिस तरह महिलाओं के मासिक धर्म में निकलता है। शाकाहार उत्पाद पौधों से निकलते हैं जबकि अंडा पशु से निकलता है। मशरूम पूर्णत: शाकाहार है, क्योंकि वह एक प्रकार का फंगस है।

अमीरी के साथ-साथ बेशर्मी, ढिठाई और असामाजिकता बढ़ती जाती है?

पहला दृश्य देखिये – पंजाब के खन्ना गाँव के अनपढ़ ग्रामीणों ने कैसा व्यवहार किया। लुधियाना से 50 किमी दूर रात के 3 बजे, खून जमा देने वाली ठंड के बीच एक रेल दुर्घटना हुई। गाँव के सारे लोग एक घंटे के भीतर इकठ्ठा हो चुके थे, गुरुद्वारे के लाउडस्पीकर से सबको जगा-जगाकर दुर्घटनास्थल भेजा जा रहा था, जिसके पास ट्रैक्टर थे उन्होंने अपने ट्रैक्टर रेल्वे लाइन के आसपास हेडलाइट जलाकर चालू हालत में छोड़ दिये ताकि वहाँ रोशनी हो सके। रेल के डिब्बों से लाशों से निकालने का काम शुरु कर दिया गया। गाँव की औरतों ने लालटेन जलाकर और खेत से फ़ूस में आग लगाकर ठंड से काँप रहे घायलों को थोड़ी गर्मी देने की कोशिश की।

जल्दी ही सैकड़ों की संख्या में आरएसएस के कार्यकर्ता वहाँ पहुँच गये, किसी भी सरकारी मदद के बिना उन्होंने गुरुद्वारे में ही एक “टेम्परेरी” अस्पताल खोल दिया और रक्तदान शुरु कर दिया। गाँव वालों ने एक समिति बनाई जिसने अगले एक सप्ताह तक घायलों और मृतकों के रिश्तेदारों और बाहर से आने वाले लगभग 30000 लोगों के लिये भोजन की व्यवस्था की। जिन्दा या मुर्दा किसी की जेब से एक रुपया भी चोरी नहीं हुआ, समिति के अध्यक्ष ने मृतकों की ज्वेलरी और लाखों रुपये कलेक्टर को सौंपे, जब मृतकों के रिश्तेदार भी उन छिन्न-भिन्न लाशों के पास जाने से घबरा रहे थे, तब आरएसएस के युवकों ने उनका सम्मान के साथ अन्तिम संस्कार किया।

अब दूसरा दृश्य देखिये – वह 26 जनवरी 2001 की शाम थी, गुजरात में आये महाविनाशकारी भूकम्प की खबरें तब तक पूरे देश में फ़ैल चुकी थीं। लाशों के मिलने का सिलसिला जारी था और धीरे-धीरे भूकम्प की भयावहता सभी के दिमाग पर हावी होने लगी थी। लेकिन दिल्ली, जो कि देश की राजधानी है, उसके एक केन्द्रीय इलाके में चारों तरफ़ रोशनी थी, धूमधड़ाका था, मौज मस्ती चल रही थी। जब समूचा देश शोक और पीड़ा में डूबा हुआ था, वहाँ एक विशाल पार्टी चल रही थी। उस पार्टी में भारत के जाने-माने रईस, समाज के बड़े-बड़े ठेकेदार तो थे ही, वर्तमान और भूतपूर्व फ़िल्म स्टार, दागी क्रिकेटर, उद्योगपति, गुलशन कुमार की हत्या के आरोपी, नौकरशाह, बैंक अफ़सर, पत्रकार और यहाँ तक कि बुद्धिजीवी माने जाने वाले बड़े शिक्षाविद भी थे। एक बड़े कम्युनिस्ट नेता भी उस पार्टी की शोभा बढ़ा रहे थे। पार्टी का मुख्य आकर्षण था एक भव्य स्टेज जहाँ एक मुख्यमंत्री बेकाबू होकर खुद गाने-बजाने लग पड़े थे, और उनके जवान बेटे को उन्हें यह कह कर शांत करना पड़ा कि गुजरात में आज ही एक राष्ट्रीय आपदा आई है और इस तरह आपका प्रदर्शन शोभा नहीं देता।

आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह पार्टी थी किस उपलक्ष्य में? यह पार्टी एक 45 साल के बच्चे के जन्मदिन के उपलक्ष्य में थी। यह पैंतालीस साला बच्चा और कोई नहीं बल्कि एक ख्यात व्यवसायी, उद्योगपति, फ़िल्मी (खासकर हीरोईनों) और क्रिकेट हस्तियों से विशेष मेलजोल रखने वाला, और एक ऐसी पार्टी का मुख्य कर्ता-धर्ता था, जो अपने नाम के आगे “समाजवादी” लगाती है… (क्या अब नाम भी बताना पड़ेगा)। उस पार्टी में शामिल होने के लिये मुम्बई से कुछ लोग चार्टर विमान करके आये थे। यह पार्टी सिर्फ़ 26 जनवरी की रात को ही खत्म नहीं हुई, बल्कि यह 27 जनवरी को भी जारी रही, जबकि यह सभी को पता चल चुका था कि भुज-अंजार में लगभग 15000 लोग मारे गये हैं और तीन लाख से अधिक बेघर हुए हैं। 27 जनवरी की पार्टी उन लोगों के लिये थी, जो 26 जनवरी को उसमें शामिल होने से चूक गये थे। 27 जनवरी तक हालांकि तमाम राजनीतिक लोग इस पार्टी से शर्मा-शर्मी में दूर हो गये थे सिर्फ़ इसलिये कि कहीं वे मीडिया की नजर में न आ जायें, लेकिन दिल्ली और मुम्बई के कुछ प्रसिद्ध अमीर, समाज के प्रमुख स्तम्भ माने जाने वाले लोग इतने बेशर्म और ढीठ थे कि उन्होंने पार्टी स्थगित करना भी उचित नहीं समझा।

और ऐसा करने वाले अकेले दिल्ली के अमीर ही नहीं थे, मुम्बई में भी 26 जनवरी की रात को ही एक फ़ैशन शो आयोजित हुआ (जिसमें जाहिर है कि “एलीट” वर्ग ही आता है)। भविष्य की मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स चुनने के लिये यह शो आयोजित किया गया था। हमेशा की तरह विशिष्ट लोगों ने “माँस” की वह प्रदर्शनी सूट-बूट पहनकर देखी, मीडिया ने भी सुबह गुजरात में लाशों और टूटे घरों की तथा शाम को अधनंगी लड़कियों की तस्वीरें खींची और अपना कर्तव्य निभाया।

लेकिन हमारे-आपके और देश के दुर्भाग्य से दिल्ली के एक छोटे से सांध्य दैनिक के अलावा किसी राष्ट्रीय अखबार ने पंजाब के गाँववालों की इस समाजसेवा के लिये (आरएसएस की तो छोड़िये ही) तारीफ़ में कुछ नहीं छापा। कल्पना कीजिये कि यदि कोई एकाध-दो गुण्डे दो-चार यात्रियों के पैसे या चेन वगैरह लूट लेते तो “आज तक” जैसे नकली चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज क्या होती? “दुर्घटनाग्रस्त यात्रियों से लूटपाट…”, बड़े अखबारों में सम्पादकीय लिखे जाते कि कैसे यह पुलिस की असफ़लता है और कैसे गाँव वालों ने लूटपाट की।

समाज के एक तथाकथित “एलीट” वर्ग ने गाँव वालों को हमेशा “गँवई”, “अनसिविलाइज्ड” कहा और प्रचारित किया है। जबकि हकीकत यह है कि जैसे-जैसे अमीरी बढ़ती जाती है, “मैं”, “मेरा परिवार”, “मेरा पैसा”, “मेरी सुविधायें” वाली मानसिकता बढ़ती जाती है। जब समाज को कुछ योगदान देने की बात आती है तो अमीर सोचता है कि मेरा काम सिर्फ़ “पैसा” देना भर है, और पैसा भी कौन सा? जो उसने शोषण, अनैतिकता, भ्रष्टाचार, साँठगाँठ करके कमाया हुआ है। त्याग, बलिदान, समाजसेवा की बारी आयेगी तो ग्रामीण खुद-ब-खुद आगे आता है…

याद कीजिये कंधार का हवाई अपहरण कांड, कैसे अमीर लोग टीवी कैमरों के सामने अपना “छातीकूट” अभियान लगातार जारी रखे रहे, इक्का-दुक्का को छोड़कर एक भी अमीर यह कहने के लिये आगे नहीं आया, कि “सरकार एक भी आतंकवादी को न छोड़े चाहे मेरे परिजन मारे ही क्यों न जायें…” लेकिन यही अमीर वर्ग सबसे पहले करों में छूट की माँग करता है, सरकार को चूना लगाने के नये-नये तरीके ढूँढता है, बिजली चोरी करता है और बाकी सारे धतकरम भी करता है, यहाँ तक कि हवाई दुर्घटना में मरने पर दस लाख का हर्जाना और बस दुर्घटना में मरने पर एक लाख भी नहीं (यानी मौत में भी भेदभाव), ढिठाई तो इतनी कि सरेआम फ़ुटपाथ पर लोगों को कुचलने के बावजूद मुम्बई में सलमान और दिल्ली में संजीव नन्दा साफ़ बच निकलते हैं, लेकिन आलोचना की जाती है ग्रामीण वर्ग की… क्या खूब दोगलापन है।

कोई यह नहीं चाहता कि अमीरों को नुकसान पहुँचाया जाये, लेकिन कम से कम उन्हें दूसरों की तकलीफ़ों और दुःखों की समझ होनी चाहिये। कोई यह नहीं कह रहा कि वे आगे आकर अन्जान लोगों की लाशों को दफ़नायें/जलायें (वे कर भी नहीं सकते) लेकिन कम से कम जो लोग ये काम कर रहे हैं उनकी तारीफ़ तो कर सकते हैं। कोई उनसे यह नहीं कह रहा कि गुजरात या लुधियाना जाकर मृतकों/घायलों की मदद करो, लेकिन कम से कम बेशर्मी भरी पार्टियाँ तो आयोजित न करें।

माना कि जीवन चलने का नाम है और दुर्घटनाओं से देश रुक नहीं जाता, लेकिन सार्वजनिक रूप से इस प्रकार का भौंडा प्रदर्शन निहायत ही घटिया और शर्मनाक होता है। गाँवों में आज भी कोई बड़ी दुर्घटना होने पर शादी-ब्याह तक रोक दिये जाते हैं, लेकिन अमीरो को कम से कम यह खयाल तो करना ही चाहिये कि पड़ोस में लाश पड़ी हो तो दीवाली नहीं मनाया करते। ऐसे में रह-रह कर सवाल उठता है कि क्या अमीरी के साथ बेशर्मी, ढिठाई, असामाजिकता और स्वार्थीपन भी बढ़ता जाता है?

सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com

>अमीरी के साथ-साथ बेशर्मी, ढिठाई और असामाजिकता बढ़ती जाती है?

>Rich People Uncivilized Unsocial Selfish

पहला दृश्य देखिये – पंजाब के खन्ना गाँव के अनपढ़ ग्रामीणों ने कैसा व्यवहार किया। लुधियाना से 50 किमी दूर रात के 3 बजे, खून जमा देने वाली ठंड के बीच एक रेल दुर्घटना हुई। गाँव के सारे लोग एक घंटे के भीतर इकठ्ठा हो चुके थे, गुरुद्वारे के लाउडस्पीकर से सबको जगा-जगाकर दुर्घटनास्थल भेजा जा रहा था, जिसके पास ट्रैक्टर थे उन्होंने अपने ट्रैक्टर रेल्वे लाइन के आसपास हेडलाइट जलाकर चालू हालत में छोड़ दिये ताकि वहाँ रोशनी हो सके। रेल के डिब्बों से लाशों से निकालने का काम शुरु कर दिया गया। गाँव की औरतों ने लालटेन जलाकर और खेत से फ़ूस में आग लगाकर ठंड से काँप रहे घायलों को थोड़ी गर्मी देने की कोशिश की।

जल्दी ही सैकड़ों की संख्या में आरएसएस के कार्यकर्ता वहाँ पहुँच गये, किसी भी सरकारी मदद के बिना उन्होंने गुरुद्वारे में ही एक “टेम्परेरी” अस्पताल खोल दिया और रक्तदान शुरु कर दिया। गाँव वालों ने एक समिति बनाई जिसने अगले एक सप्ताह तक घायलों और मृतकों के रिश्तेदारों और बाहर से आने वाले लगभग 30000 लोगों के लिये भोजन की व्यवस्था की। जिन्दा या मुर्दा किसी की जेब से एक रुपया भी चोरी नहीं हुआ, समिति के अध्यक्ष ने मृतकों की ज्वेलरी और लाखों रुपये कलेक्टर को सौंपे, जब मृतकों के रिश्तेदार भी उन छिन्न-भिन्न लाशों के पास जाने से घबरा रहे थे, तब आरएसएस के युवकों ने उनका सम्मान के साथ अन्तिम संस्कार किया।

अब दूसरा दृश्य देखिये – वह 26 जनवरी 2001 की शाम थी, गुजरात में आये महाविनाशकारी भूकम्प की खबरें तब तक पूरे देश में फ़ैल चुकी थीं। लाशों के मिलने का सिलसिला जारी था और धीरे-धीरे भूकम्प की भयावहता सभी के दिमाग पर हावी होने लगी थी। लेकिन दिल्ली, जो कि देश की राजधानी है, उसके एक केन्द्रीय इलाके में चारों तरफ़ रोशनी थी, धूमधड़ाका था, मौज मस्ती चल रही थी। जब समूचा देश शोक और पीड़ा में डूबा हुआ था, वहाँ एक विशाल पार्टी चल रही थी। उस पार्टी में भारत के जाने-माने रईस, समाज के बड़े-बड़े ठेकेदार तो थे ही, वर्तमान और भूतपूर्व फ़िल्म स्टार, दागी क्रिकेटर, उद्योगपति, गुलशन कुमार की हत्या के आरोपी, नौकरशाह, बैंक अफ़सर, पत्रकार और यहाँ तक कि बुद्धिजीवी माने जाने वाले बड़े शिक्षाविद भी थे। एक बड़े कम्युनिस्ट नेता भी उस पार्टी की शोभा बढ़ा रहे थे। पार्टी का मुख्य आकर्षण था एक भव्य स्टेज जहाँ एक मुख्यमंत्री बेकाबू होकर खुद गाने-बजाने लग पड़े थे, और उनके जवान बेटे को उन्हें यह कह कर शांत करना पड़ा कि गुजरात में आज ही एक राष्ट्रीय आपदा आई है और इस तरह आपका प्रदर्शन शोभा नहीं देता।

आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह पार्टी थी किस उपलक्ष्य में? यह पार्टी एक 45 साल के बच्चे के जन्मदिन के उपलक्ष्य में थी। यह पैंतालीस साला बच्चा और कोई नहीं बल्कि एक ख्यात व्यवसायी, उद्योगपति, फ़िल्मी (खासकर हीरोईनों) और क्रिकेट हस्तियों से विशेष मेलजोल रखने वाला, और एक ऐसी पार्टी का मुख्य कर्ता-धर्ता था, जो अपने नाम के आगे “समाजवादी” लगाती है… (क्या अब नाम भी बताना पड़ेगा)। उस पार्टी में शामिल होने के लिये मुम्बई से कुछ लोग चार्टर विमान करके आये थे। यह पार्टी सिर्फ़ 26 जनवरी की रात को ही खत्म नहीं हुई, बल्कि यह 27 जनवरी को भी जारी रही, जबकि यह सभी को पता चल चुका था कि भुज-अंजार में लगभग 15000 लोग मारे गये हैं और तीन लाख से अधिक बेघर हुए हैं। 27 जनवरी की पार्टी उन लोगों के लिये थी, जो 26 जनवरी को उसमें शामिल होने से चूक गये थे। 27 जनवरी तक हालांकि तमाम राजनीतिक लोग इस पार्टी से शर्मा-शर्मी में दूर हो गये थे सिर्फ़ इसलिये कि कहीं वे मीडिया की नजर में न आ जायें, लेकिन दिल्ली और मुम्बई के कुछ प्रसिद्ध अमीर, समाज के प्रमुख स्तम्भ माने जाने वाले लोग इतने बेशर्म और ढीठ थे कि उन्होंने पार्टी स्थगित करना भी उचित नहीं समझा।

और ऐसा करने वाले अकेले दिल्ली के अमीर ही नहीं थे, मुम्बई में भी 26 जनवरी की रात को ही एक फ़ैशन शो आयोजित हुआ (जिसमें जाहिर है कि “एलीट” वर्ग ही आता है)। भविष्य की मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स चुनने के लिये यह शो आयोजित किया गया था। हमेशा की तरह विशिष्ट लोगों ने “माँस” की वह प्रदर्शनी सूट-बूट पहनकर देखी, मीडिया ने भी सुबह गुजरात में लाशों और टूटे घरों की तथा शाम को अधनंगी लड़कियों की तस्वीरें खींची और अपना कर्तव्य निभाया।

लेकिन हमारे-आपके और देश के दुर्भाग्य से दिल्ली के एक छोटे से सांध्य दैनिक के अलावा किसी राष्ट्रीय अखबार ने पंजाब के गाँववालों की इस समाजसेवा के लिये (आरएसएस की तो छोड़िये ही) तारीफ़ में कुछ नहीं छापा। कल्पना कीजिये कि यदि कोई एकाध-दो गुण्डे दो-चार यात्रियों के पैसे या चेन वगैरह लूट लेते तो “आज तक” जैसे नकली चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज क्या होती? “दुर्घटनाग्रस्त यात्रियों से लूटपाट…”, बड़े अखबारों में सम्पादकीय लिखे जाते कि कैसे यह पुलिस की असफ़लता है और कैसे गाँव वालों ने लूटपाट की।

समाज के एक तथाकथित “एलीट” वर्ग ने गाँव वालों को हमेशा “गँवई”, “अनसिविलाइज्ड” कहा और प्रचारित किया है। जबकि हकीकत यह है कि जैसे-जैसे अमीरी बढ़ती जाती है, “मैं”, “मेरा परिवार”, “मेरा पैसा”, “मेरी सुविधायें” वाली मानसिकता बढ़ती जाती है। जब समाज को कुछ योगदान देने की बात आती है तो अमीर सोचता है कि मेरा काम सिर्फ़ “पैसा” देना भर है, और पैसा भी कौन सा? जो उसने शोषण, अनैतिकता, भ्रष्टाचार, साँठगाँठ करके कमाया हुआ है। त्याग, बलिदान, समाजसेवा की बारी आयेगी तो ग्रामीण खुद-ब-खुद आगे आता है…

याद कीजिये कंधार का हवाई अपहरण कांड, कैसे अमीर लोग टीवी कैमरों के सामने अपना “छातीकूट” अभियान लगातार जारी रखे रहे, इक्का-दुक्का को छोड़कर एक भी अमीर यह कहने के लिये आगे नहीं आया, कि “सरकार एक भी आतंकवादी को न छोड़े चाहे मेरे परिजन मारे ही क्यों न जायें…” लेकिन यही अमीर वर्ग सबसे पहले करों में छूट की माँग करता है, सरकार को चूना लगाने के नये-नये तरीके ढूँढता है, बिजली चोरी करता है और बाकी सारे धतकरम भी करता है, यहाँ तक कि हवाई दुर्घटना में मरने पर दस लाख का हर्जाना और बस दुर्घटना में मरने पर एक लाख भी नहीं (यानी मौत में भी भेदभाव), ढिठाई तो इतनी कि सरेआम फ़ुटपाथ पर लोगों को कुचलने के बावजूद मुम्बई में सलमान और दिल्ली में संजीव नन्दा साफ़ बच निकलते हैं, लेकिन आलोचना की जाती है ग्रामीण वर्ग की… क्या खूब दोगलापन है।

कोई यह नहीं चाहता कि अमीरों को नुकसान पहुँचाया जाये, लेकिन कम से कम उन्हें दूसरों की तकलीफ़ों और दुःखों की समझ होनी चाहिये। कोई यह नहीं कह रहा कि वे आगे आकर अन्जान लोगों की लाशों को दफ़नायें/जलायें (वे कर भी नहीं सकते) लेकिन कम से कम जो लोग ये काम कर रहे हैं उनकी तारीफ़ तो कर सकते हैं। कोई उनसे यह नहीं कह रहा कि गुजरात या लुधियाना जाकर मृतकों/घायलों की मदद करो, लेकिन कम से कम बेशर्मी भरी पार्टियाँ तो आयोजित न करें।

माना कि जीवन चलने का नाम है और दुर्घटनाओं से देश रुक नहीं जाता, लेकिन सार्वजनिक रूप से इस प्रकार का भौंडा प्रदर्शन निहायत ही घटिया और शर्मनाक होता है। गाँवों में आज भी कोई बड़ी दुर्घटना होने पर शादी-ब्याह तक रोक दिये जाते हैं, लेकिन अमीरो को कम से कम यह खयाल तो करना ही चाहिये कि पड़ोस में लाश पड़ी हो तो दीवाली नहीं मनाया करते। ऐसे में रह-रह कर सवाल उठता है कि क्या अमीरी के साथ बेशर्मी, ढिठाई, असामाजिकता और स्वार्थीपन भी बढ़ता जाता है?

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अमीरी के साथ-साथ बेशर्मी, ढिठाई और असामाजिकता बढ़ती जाती है?

Rich People Uncivilized Unsocial Selfish

पहला दृश्य देखिये – पंजाब के खन्ना गाँव के अनपढ़ ग्रामीणों ने कैसा व्यवहार किया। लुधियाना से 50 किमी दूर रात के 3 बजे, खून जमा देने वाली ठंड के बीच एक रेल दुर्घटना हुई। गाँव के सारे लोग एक घंटे के भीतर इकठ्ठा हो चुके थे, गुरुद्वारे के लाउडस्पीकर से सबको जगा-जगाकर दुर्घटनास्थल भेजा जा रहा था, जिसके पास ट्रैक्टर थे उन्होंने अपने ट्रैक्टर रेल्वे लाइन के आसपास हेडलाइट जलाकर चालू हालत में छोड़ दिये ताकि वहाँ रोशनी हो सके। रेल के डिब्बों से लाशों से निकालने का काम शुरु कर दिया गया। गाँव की औरतों ने लालटेन जलाकर और खेत से फ़ूस में आग लगाकर ठंड से काँप रहे घायलों को थोड़ी गर्मी देने की कोशिश की।

जल्दी ही सैकड़ों की संख्या में आरएसएस के कार्यकर्ता वहाँ पहुँच गये, किसी भी सरकारी मदद के बिना उन्होंने गुरुद्वारे में ही एक “टेम्परेरी” अस्पताल खोल दिया और रक्तदान शुरु कर दिया। गाँव वालों ने एक समिति बनाई जिसने अगले एक सप्ताह तक घायलों और मृतकों के रिश्तेदारों और बाहर से आने वाले लगभग 30000 लोगों के लिये भोजन की व्यवस्था की। जिन्दा या मुर्दा किसी की जेब से एक रुपया भी चोरी नहीं हुआ, समिति के अध्यक्ष ने मृतकों की ज्वेलरी और लाखों रुपये कलेक्टर को सौंपे, जब मृतकों के रिश्तेदार भी उन छिन्न-भिन्न लाशों के पास जाने से घबरा रहे थे, तब आरएसएस के युवकों ने उनका सम्मान के साथ अन्तिम संस्कार किया।

अब दूसरा दृश्य देखिये – वह 26 जनवरी 2001 की शाम थी, गुजरात में आये महाविनाशकारी भूकम्प की खबरें तब तक पूरे देश में फ़ैल चुकी थीं। लाशों के मिलने का सिलसिला जारी था और धीरे-धीरे भूकम्प की भयावहता सभी के दिमाग पर हावी होने लगी थी। लेकिन दिल्ली, जो कि देश की राजधानी है, उसके एक केन्द्रीय इलाके में चारों तरफ़ रोशनी थी, धूमधड़ाका था, मौज मस्ती चल रही थी। जब समूचा देश शोक और पीड़ा में डूबा हुआ था, वहाँ एक विशाल पार्टी चल रही थी। उस पार्टी में भारत के जाने-माने रईस, समाज के बड़े-बड़े ठेकेदार तो थे ही, वर्तमान और भूतपूर्व फ़िल्म स्टार, दागी क्रिकेटर, उद्योगपति, गुलशन कुमार की हत्या के आरोपी, नौकरशाह, बैंक अफ़सर, पत्रकार और यहाँ तक कि बुद्धिजीवी माने जाने वाले बड़े शिक्षाविद भी थे। एक बड़े कम्युनिस्ट नेता भी उस पार्टी की शोभा बढ़ा रहे थे। पार्टी का मुख्य आकर्षण था एक भव्य स्टेज जहाँ एक मुख्यमंत्री बेकाबू होकर खुद गाने-बजाने लग पड़े थे, और उनके जवान बेटे को उन्हें यह कह कर शांत करना पड़ा कि गुजरात में आज ही एक राष्ट्रीय आपदा आई है और इस तरह आपका प्रदर्शन शोभा नहीं देता।

आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह पार्टी थी किस उपलक्ष्य में? यह पार्टी एक 45 साल के बच्चे के जन्मदिन के उपलक्ष्य में थी। यह पैंतालीस साला बच्चा और कोई नहीं बल्कि एक ख्यात व्यवसायी, उद्योगपति, फ़िल्मी (खासकर हीरोईनों) और क्रिकेट हस्तियों से विशेष मेलजोल रखने वाला, और एक ऐसी पार्टी का मुख्य कर्ता-धर्ता था, जो अपने नाम के आगे “समाजवादी” लगाती है… (क्या अब नाम भी बताना पड़ेगा)। उस पार्टी में शामिल होने के लिये मुम्बई से कुछ लोग चार्टर विमान करके आये थे। यह पार्टी सिर्फ़ 26 जनवरी की रात को ही खत्म नहीं हुई, बल्कि यह 27 जनवरी को भी जारी रही, जबकि यह सभी को पता चल चुका था कि भुज-अंजार में लगभग 15000 लोग मारे गये हैं और तीन लाख से अधिक बेघर हुए हैं। 27 जनवरी की पार्टी उन लोगों के लिये थी, जो 26 जनवरी को उसमें शामिल होने से चूक गये थे। 27 जनवरी तक हालांकि तमाम राजनीतिक लोग इस पार्टी से शर्मा-शर्मी में दूर हो गये थे सिर्फ़ इसलिये कि कहीं वे मीडिया की नजर में न आ जायें, लेकिन दिल्ली और मुम्बई के कुछ प्रसिद्ध अमीर, समाज के प्रमुख स्तम्भ माने जाने वाले लोग इतने बेशर्म और ढीठ थे कि उन्होंने पार्टी स्थगित करना भी उचित नहीं समझा।

और ऐसा करने वाले अकेले दिल्ली के अमीर ही नहीं थे, मुम्बई में भी 26 जनवरी की रात को ही एक फ़ैशन शो आयोजित हुआ (जिसमें जाहिर है कि “एलीट” वर्ग ही आता है)। भविष्य की मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स चुनने के लिये यह शो आयोजित किया गया था। हमेशा की तरह विशिष्ट लोगों ने “माँस” की वह प्रदर्शनी सूट-बूट पहनकर देखी, मीडिया ने भी सुबह गुजरात में लाशों और टूटे घरों की तथा शाम को अधनंगी लड़कियों की तस्वीरें खींची और अपना कर्तव्य निभाया।

लेकिन हमारे-आपके और देश के दुर्भाग्य से दिल्ली के एक छोटे से सांध्य दैनिक के अलावा किसी राष्ट्रीय अखबार ने पंजाब के गाँववालों की इस समाजसेवा के लिये (आरएसएस की तो छोड़िये ही) तारीफ़ में कुछ नहीं छापा। कल्पना कीजिये कि यदि कोई एकाध-दो गुण्डे दो-चार यात्रियों के पैसे या चेन वगैरह लूट लेते तो “आज तक” जैसे नकली चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज क्या होती? “दुर्घटनाग्रस्त यात्रियों से लूटपाट…”, बड़े अखबारों में सम्पादकीय लिखे जाते कि कैसे यह पुलिस की असफ़लता है और कैसे गाँव वालों ने लूटपाट की।

समाज के एक तथाकथित “एलीट” वर्ग ने गाँव वालों को हमेशा “गँवई”, “अनसिविलाइज्ड” कहा और प्रचारित किया है। जबकि हकीकत यह है कि जैसे-जैसे अमीरी बढ़ती जाती है, “मैं”, “मेरा परिवार”, “मेरा पैसा”, “मेरी सुविधायें” वाली मानसिकता बढ़ती जाती है। जब समाज को कुछ योगदान देने की बात आती है तो अमीर सोचता है कि मेरा काम सिर्फ़ “पैसा” देना भर है, और पैसा भी कौन सा? जो उसने शोषण, अनैतिकता, भ्रष्टाचार, साँठगाँठ करके कमाया हुआ है। त्याग, बलिदान, समाजसेवा की बारी आयेगी तो ग्रामीण खुद-ब-खुद आगे आता है…

याद कीजिये कंधार का हवाई अपहरण कांड, कैसे अमीर लोग टीवी कैमरों के सामने अपना “छातीकूट” अभियान लगातार जारी रखे रहे, इक्का-दुक्का को छोड़कर एक भी अमीर यह कहने के लिये आगे नहीं आया, कि “सरकार एक भी आतंकवादी को न छोड़े चाहे मेरे परिजन मारे ही क्यों न जायें…” लेकिन यही अमीर वर्ग सबसे पहले करों में छूट की माँग करता है, सरकार को चूना लगाने के नये-नये तरीके ढूँढता है, बिजली चोरी करता है और बाकी सारे धतकरम भी करता है, यहाँ तक कि हवाई दुर्घटना में मरने पर दस लाख का हर्जाना और बस दुर्घटना में मरने पर एक लाख भी नहीं (यानी मौत में भी भेदभाव), ढिठाई तो इतनी कि सरेआम फ़ुटपाथ पर लोगों को कुचलने के बावजूद मुम्बई में सलमान और दिल्ली में संजीव नन्दा साफ़ बच निकलते हैं, लेकिन आलोचना की जाती है ग्रामीण वर्ग की… क्या खूब दोगलापन है।

कोई यह नहीं चाहता कि अमीरों को नुकसान पहुँचाया जाये, लेकिन कम से कम उन्हें दूसरों की तकलीफ़ों और दुःखों की समझ होनी चाहिये। कोई यह नहीं कह रहा कि वे आगे आकर अन्जान लोगों की लाशों को दफ़नायें/जलायें (वे कर भी नहीं सकते) लेकिन कम से कम जो लोग ये काम कर रहे हैं उनकी तारीफ़ तो कर सकते हैं। कोई उनसे यह नहीं कह रहा कि गुजरात या लुधियाना जाकर मृतकों/घायलों की मदद करो, लेकिन कम से कम बेशर्मी भरी पार्टियाँ तो आयोजित न करें।

माना कि जीवन चलने का नाम है और दुर्घटनाओं से देश रुक नहीं जाता, लेकिन सार्वजनिक रूप से इस प्रकार का भौंडा प्रदर्शन निहायत ही घटिया और शर्मनाक होता है। गाँवों में आज भी कोई बड़ी दुर्घटना होने पर शादी-ब्याह तक रोक दिये जाते हैं, लेकिन अमीरो को कम से कम यह खयाल तो करना ही चाहिये कि पड़ोस में लाश पड़ी हो तो दीवाली नहीं मनाया करते। ऐसे में रह-रह कर सवाल उठता है कि क्या अमीरी के साथ बेशर्मी, ढिठाई, असामाजिकता और स्वार्थीपन भी बढ़ता जाता है?

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बांग्लादेशी घुसपैठ : देशद्रोहि नेता हैं गुनाहगार

धर्म और राजनीति इस्लाम रुपी सिक्के के दो पहलू हैं। यह कथन आज भी उतना ही सही है जितना पहले था। अत: यदि बांग्लादेशी मुसलमान अपने धर्मप्रेरित राजनैतिक उद्देश्यों के लिये भारत में घुसपैठ करते हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि इस्लाम वस्तुत: प्रारम्भ से ही एक राजनैतिक आन्दोलन रहा है।हिन्दुस्तान में बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ कोई नयी बात नही है। यह एक दुरगामी राजनैतिक षड्य्न्त्र का अंग है, जिसका लम्बा इतिहास है। हिन्दुस्तान में बांग्लादेशी मुसलमानों का आसानी से लगातार घुसपैठ होते रहने का मुख्य कारण हिन्दुस्तान-बाग्लादेश की 4096 की.मी. लम्बी साझी सीमा है, जिसमें से 2217 कि.मी. पश्चिम बंगाल के दस जिलों को, 262 कि.मी. असम के 3 जिलों, 443, कि.मी. मेघालय के 5 जिलों, 858 कि.मी. त्रिपुरा और 318 कि.मी. मिजोरम के 3-3 जिलों को प्रभावित करती है।हिन्दुस्तान सरकार के बोर्डर मैनेजमेण्ट टास्क फोर्स की वर्ष कि 2000 रिपोर्ट के अनुसार 1.5 करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठ कर चुके हैं और लगभग तीन लाख प्रतिवर्ष घुसपैठ कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार हिन्दुस्तान में बांग्लादेशी मुसलमानों घुसपैठीयों की संख्या इस प्रकार है : पश्चिम बंगाल 54 लाख, असम 40 लाख, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र आदि में 5-5 लाख से ज्यादा दिल्ली में 3 लाख हैं; मगर वर्त्तमान आकलनों के अनुसार हिन्दुस्तान में करीब 3 करोड़ बांग्लादेशी मुसलमानों घुसपैठिए हैं।इस घुसपैठ मे हिन्दुस्तान के देशद्रोहियों का पूरा सहयोग एवं खुला समर्थन प्राप्त है। काग्रेस ने प्रारम्भ से ही नहीं की, उसे खुला बढावा दिया। सबसे पहले 1950 में नेहरु-लियाकत अली पैक्ट के अन्तर्गत 31.12-1950 तक हिन्दुस्तान में बसे बांग्लादेशी मुस्लमानों को यहाँ का नागरिक मान लिया। इसी प्रकार 1972 में इन्दिरा-मुजीब पैक्ट के अन्तर्गत जो भी बांग्लादेशी मुस्लमान 25 मार्च, 1971 तक हिन्दुस्तान में आया उसे विधिवत बसने दिया गया। हालाँकि आज सुप्रीम कोर्ट ने घुसपैठ रोकने एवं गैर कानूनी घुसपैठयों को निकालने के आदेश दिये हैं; मगर काग्रेस, सी.पी.एम. और इनके पीछल्लग्गु राजनैतिक दल किसी न किसी प्रकार इन आदेशों की उपेक्षा कर रहा हैं, इन घुसपैठयों को हिन्दुस्तान में रहने का जरुरी इन्तजाम, राशन कार्ड, वोटीग कार्ड भी बनवा कर दे रहा है। जिसके फलस्वरुप बांग्लादेशी मुसलमान घुसपैठीया इन्हें अपना वोट देकर चुनाव में इनके प्रत्यासी को जिताते भी हैं।बांग्लादेशी मुसलमान घुसपैठीया इस्लाम के सच्चे सिपाही हैं। वे शेष हिन्दुस्तान को मुस्लीम बहुल कर इसे इस्लामी राज्य बनाना चाहते हैं, ताकि यहाँ के हिन्दु धर्म को समाप्त किया जा सके; क्योकि इस्लाम विश्व भर अन्य धर्म के समाप्त कर केवल इस्लाम को हि देखना चाहता है। हिन्दुस्तान के सरकार ने भी माना है कि “हिन्दुस्तान में बांग्लादेशी घुसपैठ के लिये धार्मीक और आर्थिक कारणों सहित अनेक कारण हैं”।

जहाँगीर खाँ के मुगलस्तान रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बांग्लादेश ने एक नक्शा प्रकाशित किया है, जिसके अनुसार पूर्वि और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच हिन्दुस्तान क्षेत्र में घुसपैठ आदि के द्वारा एवं मुस्लीम जन्संख्या बढाकर इसे एक नया इस्लामी राज्य बना देना है। इसमें पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, कश्मीर, उत्तराखण्ड, दिल्ली, हरियाणा और मध्य प्रदेश के क्षेत्र को सम्मिलित करने कि योजना है। इसलिये इन उपर्युक्त क्षेत्रो में बांग्लादेशी मुसलमानों का घुसपैठ प्रमुखता से है।बंगाल के गवर्नर टी.वी. राजेश्वर (18.3.96) एवं असम के गवर्नर एस. के. सिन्हा (1998) और अजय सिंह (15.5.2005) अपनी रिपोर्टं में घुसपैठ से उत्पन्न राजनैतिक समस्याओं एवं हिन्दुस्तान की सुरक्षा की ओर ध्यान आकर्षित किया था; मगर मुस्लिम वोट बैंक ने इन देशद्रोही गतिविधियों को भी उपेक्षित कर दिया। जबकि वास्तव में बांग्लादेशी घुसपैठ को, पार्टी हित से उपर उठकर, राष्ट्र की सुरक्षा एवं अखण्डता की् दृष्टि से सोचना और इस देशद्रोही गतिविधियों को समाप्त करने में हि हिन्दुस्तान का हित है।पाकिस्तान में विदेशियों को घुसपैठ की 2 से 10 साल की सजा है। सऊदी अरेबिया ने 1994-1995 में एक लाख घुसपैठियों को निकाला जिसमें 27588 बांग्लादेशी मुस्लमान थे स्वयं बांग्लादेश ने 1,92,274 रोहिंगा वर्मी को अपने देश से निकाल बाहर किया फिर हिन्दुस्तान में रह रहे बांग्लादेशी को क्यों नही निकाला जा सकता। क्या मुस्लीम वोट बैंक राष्ट्रीय सुरक्षा से भी अधिक आवश्यक और महत्त्वपूर्ण है? यदि हाँ ! तो ऎसे देशद्रोहियों का वर्चस्व एवं राजनैतिक अस्तित्व मिटाना ही देश हित में होगा। इसमे लिये हमें एक जुटता दिखानी होगी और आपस की वैर भावना को छोर कर देश हित में काम करना होगा।

अच्छाई और बुराई

जो अच्छाईयाँ हैं तुममें –
सर्वत्र बिखेर दो !
महका दो –
गुलाब की तरह!
जो पाये –
अपना ले !
महक मिले जिसे –
बहक जाए !
बस अच्छाईयाँ बिखराए।
.
जो बुराईयाँ हैं तुममें –
उन्हें समेट लो !
दबा दो –
कफन में !
सुला दो –
चिर निद्रा में !
न उठने पाएं,
न दिखने पाएं,
न दूसरों को बहका पाएं!
.
कवि कुलवंत सिंह

एक और सच

आये दिन देश में मुस्लिमों की दशा को लेकर आराक्षण का खेल खेला जाता है और इस खेल में पिसला है बहुसंख्‍यक वर्ग का अधिकार। आज ये आकड़े अपने आप में बहुत कुछ बायन कर रहे है कि देश की वर्तमान स्थिति क्‍या है? मुस्लिमो की संख्‍या में बृद्धि का दो कारण है कि उनकी धर्मिक रूढिवादिता तथा दूसरी है घुसपैठ अगर इन दोनो विषयों से निपट लिया जाये तो निश्चित रूप से मुस्लिमों को देशा की मुख्‍य धारा से जुड़ने से कोई रोक नही सकता है।  इन आकड़ो पर गौर करें-  

 

1991 से 2001 के बीच बंगलादेश से सटे असम
सीमावर्ती: जिलों का जनसंख्या वृ
द्धि प्रतिशत

सीमावर्ती जिले

मुस्लिम

गैर मुस्लिम

कुल

धुबरी

29.5

7.1

22.9

ग्वालपाड़ा

31.7

14.4

23.0

हैलाकांडी

27.2

13.3

20.9

करीमगंज

29.4

14.5

21.9

कछार

24.6

16.0

18.9

अन्य जिले

बरपेटा

25.8

10.0

18.9

नगांव

32.1

11.3

22.2

मारीगांव

27.2

16.3

21.2

दरांग

28.9

9.6

15.8

 

असम की जनसंख्या में मुसलमानों का बढ़ता प्रतिशत

सीमावर्ती जिले

1991

2001

धुबरी

70.4

74.3

ग्वालपाड़ा

50.2

53.6

हैलाकांडी

54.8

57.6

करीमगंज

49.2

52.3

कछार

34.5

36.1

अन्य जिले

बरपेटा

56.1

59.4

नगांव

47.2

51.0

मारीगांव

46.0

47.6

दरांग

32.0

35.6

पश्‍िचम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में बढ़ती मुस्लिम जनसंख्या (प्रतिशत में)

सीमावर्ती जिले

1991

2001

दक्षि24 परगना

29.9

33.2

उत्तर 24 परगना

24.2

24.2

नादिया

24.9

25.4

मुर्तिशाबाद

61.4

63.7

मालदा

47.5

49.7

कोलकाता

17.7

20.3

दक्षिण दिनाजपुर

36.8

38.4

उत्तर दिनाजपुर

36.8

38.4

जलपाईगुड़ी

10.0

10.8

कूच बिहार

23.4

24.2

कुल

23.6

25.2

 

यदि आज कोई सच में मुस्लिमों का हितचिन्‍तक है और उनकी दशा और दिशा की चिन्‍ता करता है तो इन आकड़ो पर गौर करे और उन्‍हे धार्मिक अंधविश्वास से दूर कर, उनके समुचित जीवन के निर्माण की वयवस्‍था की जा सकती है, और घुटपैठ पर पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिऐ क्‍योकि घुसपैठी न तो हिन्‍दू न मुस्लमान, घुटपैठियॉं घुटपैठियॉं होता है तभी अरब के देशों में भी घुटपैठिये मुस्लिमों के साथ अ‍त्‍यधिक कड़ा रूख रखा जाता है।

>क्या शादीशुदा मर्दों में विशेष आकर्षण होता है?

>Indian Heroines Wedding Married Men

आज ही खबर आई है कि रानी मुखर्जी और आदित्य चोपड़ा का विवाह होने वाला है। हालांकि इस खबर पर कोई आश्चर्य करने वाली कोई बात नहीं है, क्योंकि इसमें कोई अजूबा नहीं है, और यह उनका व्यक्तिगत मामला है। पहले भी भारतीय हीरोईनें “समय आने पर” अपना घर बसाती रही हैं। लेकिन इस बनने वाली जोड़ी में एक बात है, जो कि चर्चा और जिक्र के काबिल है, वह है आदित्य चोपड़ा का शादीशुदा होना। वे अपनी पत्नी से तलाक लेने जा रहे हैं और रानी मुखर्जी से शादी करेंगे।

शादीशुदा, तलाकशुदा, दुहाजू या बल्कि तिहाजू पुरुष से शादी करने का हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में रिवाज रहा है। ज्यादा पीछे न जायें तो हेमामालिनी ने धर्मेन्द्र से उनकी पत्नी जीवित रहते और तलाक न देने के बावजूद रोमांस किया और शादी भी की। हेमामालिनी का मामला ज्यादा अलग इसलिये भी है कि उस वक्त धर्मेन्द्र दो बच्चों के पिता भी थे। रेखा और अमिताभ के किस्से तो सभी को मालूम ही हैं, अमिताभ भी उस वक्त शादीशुदा थे और दो बच्चों के बाप थे, लेकिन फ़िर भी रेखा उन पर मर मिटी थीं और लगभग हाथ-पाँव धोकर उनके पीछे पड़ी थीं। यदि “कुली” फ़िल्म की दुर्घटना न हुई होती, जया भादुड़ी ने अमिताभ की सेवा करके उन्हें मौत के मुँह से खीच न लिया होता तो शायद अमिताभ भी रेखा के पति बन सकते थे। सारिका ने भी कमल हासन से उनके शादीशुदा रहते विवाह किया, उसके बाद सुना है कि उनमें भी तलाक हो गया है और कमल हासन को तीसरी औरत मिल गई है (शायद हीरोइन ही है)। हालांकि दक्षिण में दूसरी शादी का रिवाज सा है, और इसे “विशेष” निगाह से देखा भी नहीं जाता, लेकिन उत्तर भारत में इसे गत दशक तक “खुसुर-पुसुर” निगाहों से देखा जाता था। बीते दस वर्षों में, जबसे समाज में “खुलापन” बढ़ा है, यह संख्या तेजी से बढ़ी है, और चूँकि ये हीरोईने लड़कियों की “आइकॉन” होती हैं, इसलिये फ़िल्मों से बाहर के समाज में भी यह रिवाज पसरता जा रहा है।

हाल के वर्षों में यह ट्रेण्ड कुछ ज्यादा ही चल पड़ा है, पिछली पीढ़ी की हीरोइनों से शुरु करें तो सबसे पहले श्रीदेवी ने शादीशुदा और बच्चेदार बोनी कपूर से शादी की, फ़िर करिश्मा कपूर, रवीना टंडन, ॠचा शर्मा, मान्यता (आमिर खान की दूसरी बीवी हीरोइन नहीं हैं, लेकिन आमिर खुद दुहाजू ही हैं, फ़िरोज खान ने भी बुढ़ौती में एक जवान लड़की से शादी की थी) आदि भी उनकी ही राह चलीं। ताजा मामला आदित्य और रानी मुखर्जी का है, लेकिन उससे पहले करीना और सैफ़ का जिक्र करना भी आवश्यक है, खबरें हैं कि उनमें जोरों का रोमांस चल रहा है, लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री के “अफ़वाह रिवाज” पर तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता जब तक कि वाकई में शादी न हो जाये, फ़िर भी यदि करीना-सैफ़ की शादी हुई तो यह शाहिद कपूर के साथ अन्याय तो होगा ही, सैफ़ जैसे अधेड़ और “तिहाजू” से करीना कैसे फ़ँस गई, यह भी शोध का विषय होगा।

बहरहाल, लेख का उद्देश्य इन हीरोइनों की आलोचना करना नहीं है, क्योंकि शादी उनका व्यक्तिगत मामला है, लेकिन प्रश्न उठते हैं कि आखिर इन शादीशुदा मर्दों में ऐसा क्या आकर्षण होता है कि हीरोईनें अपने हम-उम्र लड़कों का साथ छोड़कर इनके साथ शादी रचा लेती हैं?

1) क्या यह दैहिक आकर्षण है? (यदि ऐसा है तो मर्दों की दाद देनी होगी)
2) इसमें रुपये-पैसे का रोल और एक सुरक्षित भविष्य की कामना दबी होती है? (लेकिन वे खुद भी काफ़ी पैसे वाली होती हैं)
3) क्या वाकई ये हीरोइनें अपने-आपको इतनी असुरक्षित समझती हैं कि वे दूसरी औरत का घर उजाड़ने में कोई कोताही नहीं बरततीं? (उन्हें यह डर भी नहीं होता कि कल कोई और लड़की उसे बेदखल कर देगी?)
4) क्या वे “अनुभव” को प्राथमिकता देती हैं? (लेकिन यदि पुरुष को जीवन का अनुभव होता तो पहला तलाक ही क्यों होता?)
5) क्या आधुनिक समझे जाने वाली उस सोसायटी में भी मर्दों का राज ही चलता है? (चोखेर बालियाँ ध्यान दें…)
6) क्या यह कोई मनोवैज्ञानिक समस्या है?

आखिर क्या बात है… ?

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क्या शादीशुदा मर्दों में विशेष आकर्षण होता है?

Indian Heroines Wedding Married Men

आज ही खबर आई है कि रानी मुखर्जी और आदित्य चोपड़ा का विवाह होने वाला है। हालांकि इस खबर पर कोई आश्चर्य करने वाली कोई बात नहीं है, क्योंकि इसमें कोई अजूबा नहीं है, और यह उनका व्यक्तिगत मामला है। पहले भी भारतीय हीरोईनें “समय आने पर” अपना घर बसाती रही हैं। लेकिन इस बनने वाली जोड़ी में एक बात है, जो कि चर्चा और जिक्र के काबिल है, वह है आदित्य चोपड़ा का शादीशुदा होना। वे अपनी पत्नी से तलाक लेने जा रहे हैं और रानी मुखर्जी से शादी करेंगे।

शादीशुदा, तलाकशुदा, दुहाजू या बल्कि तिहाजू पुरुष से शादी करने का हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में रिवाज रहा है। ज्यादा पीछे न जायें तो हेमामालिनी ने धर्मेन्द्र से उनकी पत्नी जीवित रहते और तलाक न देने के बावजूद रोमांस किया और शादी भी की। हेमामालिनी का मामला ज्यादा अलग इसलिये भी है कि उस वक्त धर्मेन्द्र दो बच्चों के पिता भी थे। रेखा और अमिताभ के किस्से तो सभी को मालूम ही हैं, अमिताभ भी उस वक्त शादीशुदा थे और दो बच्चों के बाप थे, लेकिन फ़िर भी रेखा उन पर मर मिटी थीं और लगभग हाथ-पाँव धोकर उनके पीछे पड़ी थीं। यदि “कुली” फ़िल्म की दुर्घटना न हुई होती, जया भादुड़ी ने अमिताभ की सेवा करके उन्हें मौत के मुँह से खीच न लिया होता तो शायद अमिताभ भी रेखा के पति बन सकते थे। सारिका ने भी कमल हासन से उनके शादीशुदा रहते विवाह किया, उसके बाद सुना है कि उनमें भी तलाक हो गया है और कमल हासन को तीसरी औरत मिल गई है (शायद हीरोइन ही है)। हालांकि दक्षिण में दूसरी शादी का रिवाज सा है, और इसे “विशेष” निगाह से देखा भी नहीं जाता, लेकिन उत्तर भारत में इसे गत दशक तक “खुसुर-पुसुर” निगाहों से देखा जाता था। बीते दस वर्षों में, जबसे समाज में “खुलापन” बढ़ा है, यह संख्या तेजी से बढ़ी है, और चूँकि ये हीरोईने लड़कियों की “आइकॉन” होती हैं, इसलिये फ़िल्मों से बाहर के समाज में भी यह रिवाज पसरता जा रहा है।

हाल के वर्षों में यह ट्रेण्ड कुछ ज्यादा ही चल पड़ा है, पिछली पीढ़ी की हीरोइनों से शुरु करें तो सबसे पहले श्रीदेवी ने शादीशुदा और बच्चेदार बोनी कपूर से शादी की, फ़िर करिश्मा कपूर, रवीना टंडन, ॠचा शर्मा, मान्यता (आमिर खान की दूसरी बीवी हीरोइन नहीं हैं, लेकिन आमिर खुद दुहाजू ही हैं, फ़िरोज खान ने भी बुढ़ौती में एक जवान लड़की से शादी की थी) आदि भी उनकी ही राह चलीं। ताजा मामला आदित्य और रानी मुखर्जी का है, लेकिन उससे पहले करीना और सैफ़ का जिक्र करना भी आवश्यक है, खबरें हैं कि उनमें जोरों का रोमांस चल रहा है, लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री के “अफ़वाह रिवाज” पर तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता जब तक कि वाकई में शादी न हो जाये, फ़िर भी यदि करीना-सैफ़ की शादी हुई तो यह शाहिद कपूर के साथ अन्याय तो होगा ही, सैफ़ जैसे अधेड़ और “तिहाजू” से करीना कैसे फ़ँस गई, यह भी शोध का विषय होगा।

बहरहाल, लेख का उद्देश्य इन हीरोइनों की आलोचना करना नहीं है, क्योंकि शादी उनका व्यक्तिगत मामला है, लेकिन प्रश्न उठते हैं कि आखिर इन शादीशुदा मर्दों में ऐसा क्या आकर्षण होता है कि हीरोईनें अपने हम-उम्र लड़कों का साथ छोड़कर इनके साथ शादी रचा लेती हैं?

1) क्या यह दैहिक आकर्षण है? (यदि ऐसा है तो मर्दों की दाद देनी होगी)
2) इसमें रुपये-पैसे का रोल और एक सुरक्षित भविष्य की कामना दबी होती है? (लेकिन वे खुद भी काफ़ी पैसे वाली होती हैं)
3) क्या वाकई ये हीरोइनें अपने-आपको इतनी असुरक्षित समझती हैं कि वे दूसरी औरत का घर उजाड़ने में कोई कोताही नहीं बरततीं? (उन्हें यह डर भी नहीं होता कि कल कोई और लड़की उसे बेदखल कर देगी?)
4) क्या वे “अनुभव” को प्राथमिकता देती हैं? (लेकिन यदि पुरुष को जीवन का अनुभव होता तो पहला तलाक ही क्यों होता?)
5) क्या आधुनिक समझे जाने वाली उस सोसायटी में भी मर्दों का राज ही चलता है? (चोखेर बालियाँ ध्यान दें…)
6) क्या यह कोई मनोवैज्ञानिक समस्या है?

आखिर क्या बात है… ?

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