एक साथी एक सपना …!!

एक साथी एक सपना साथ ले
हौसले संग भीड़ से संवाद के ।
०००००
हम चलें हैं हम चलेगे रोक सकते हों तो रोको
हथेली से तीर थामा क्या मिलेगा मीत सोचो ।
शब्द के ये सहज अनुनाद .. से …..!!
००००००
मन को तापस बना देने, लेके इक तारा चलूँ ।
फर्क क्या होगा जो मैं जीता या हारा चलूँ ……?
चकित हों शायद मेरे संवाद … से ……!!
००००००
चलो अपनी एक अंगुल वेदना हम भूल जाएं.
वो दु:खी है,संवेदना का, गीत उसको सुना आएं
कोई टूटे न कभी संताप से ……!!
००००००
v गिरीश बिल्लोरे मुकुल ९६९/ए,गेट न०. ०४ जबलपुर,म०प्र०

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>ये ना थी हमारी किस्मत के विसाले यार होता : नूरजहाँ और सलीम रज़ा

>मित्रों आज प्रस्तुत है आपके लिये मिरजा ग़ालिब की गज़ल ये ना थी हमारी किस्मत.. यह गज़ल आपने कई कलाकारों की आवाज में सुनी होगी। परन्तु मुझे सबसे ज्यादा बढ़िया लगती है स्व. तलत महमुद साहब के द्वारा गाई हुई भारत भूषण और सुरैया अभिनित फिल्म मिर्जा गालिब फिल्म की यही गज़ल.. ये ना थी।
कुछ दिनों पहले मैने सलीम रज़ा और मल्लिका-ए-तरन्नुम (मैडम) नूरजहां के द्वारा गाई हुई 1961 में बनी पाकिस्तानी फिल्म गालिब की यह गज़ल सुनी। सुनने के बाद इस गज़ल का संगीत भी बहुत पसन्द आया तो आज आपके लिये यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस फिल्म की एक खास बात और है, और वह ये कि यह फिल्म नूरजहाँ की आखिरी फिल्म है।
http://www.archive.org/audio/xspf_player.swf?autoload=true&playlist_url=http%3A%2F%2Fwww.archive.org%2Faudio%2Fxspf-maker.php%3Fidentifier%3DYeNaThiHamariKismat%26playlist%3Dhttp%253A%252F%252Fwww.archive.org%252Fdownload%252FYeNaThiHamariKismat%252Fformat%253DVBR%2BM3U

ये ना थी हमारी किस्मत के विसाले यार होता : नूरजहाँ और सलीम रज़ा

मित्रों आज प्रस्तुत है आपके लिये मिरजा ग़ालिब की गज़ल ये ना थी हमारी किस्मत.. यह गज़ल आपने कई कलाकारों की आवाज में सुनी होगी। परन्तु मुझे सबसे ज्यादा बढ़िया लगती है स्व. तलत महमुद साहब के द्वारा गाई हुई भारत भूषण और सुरैया अभिनित फिल्म मिर्जा गालिब फिल्म की यही गज़ल.. ये ना थी।
कुछ दिनों पहले मैने सलीम रज़ा और मल्लिका-ए-तरन्नुम (मैडम) नूरजहां के द्वारा गाई हुई 1961 में बनी पाकिस्तानी फिल्म गालिब की यह गज़ल सुनी। सुनने के बाद इस गज़ल का संगीत भी बहुत पसन्द आया तो आज आपके लिये यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस फिल्म की एक खास बात और है, और वह ये कि यह फिल्म नूरजहाँ की आखिरी फिल्म है।

>आतंकवादियों, अपराधियों के शरीर में GPS माइक्रोचिप फ़िट कर देना चाहिये… (भाग-2)

>GPS Microchips Terrorism Criminals RFID
(भाग-1 से जारी)
पिछले भाग में हमने GPS तकनीक वाली चिप के बारे में जानकारी हासिल की थी, जो कि नवीनतम है, अब थोड़ा जानते हैं एक पुरानी तकनीक RFID के बारे में, जो कि अब काफ़ी आम हो चली है (जी हाँ भारत में भी…)

RFID तकनीक वाली माइक्रोचिप –

RFID तकनीक से काम करने वाली माइक्रोचिप के डाटा को पढ़ने के लिये एक विशेष “रीडर” की आवश्यकता होती है, जिसमें से उस व्यक्ति को गुजारा जाता है (उदाहरण के तौर पर मेटल डिटेक्टर जैसी)। साथ ही इस चिप की “रेंज” मात्र कुछ किलोमीटर तक ही होती है, अर्थात इसमें से निकलने वाली “फ़्रीक्वेंसी” को कुछ दूरी तक ही पकड़ा जा सकता है। इसमें माइक्रोचिप फ़िट किये गये व्यक्ति या जानवर को “स्कैन” किया जाता है, और उसका सारा डाटा कम्प्यूटर पर हाजिर होता है। अक्सर इस तकनीक का उपयोग पालतू जानवरों के लिये किया जाता है। आमतौर पर इस माइक्रोचिप का उपयोग उच्च सुरक्षा वाले इलाकों, महत्वपूर्ण दस्तावेजों की आलमारी, या पुलिस विभाग के गोपनीय विभाग में किया जाता है। इस प्रकार के विभागों में सिर्फ़ वही व्यक्ति घुस सकता है जिसकी बाँह के नीचे यह माइक्रोचिप फ़िट किया हुआ है, कोई अवांछित व्यक्ति जब उस “रेंज” में प्रवेश करता है तो अलार्म बजने लगता है। यह तकनीक परमाणु संस्थानों और सेना के महत्वपूर्ण कार्यालयों की सुरक्षा के लिये बहुत जरूरी है।

अमेरिका में तीस वर्ष पूर्व सबसे पहले भैंस पर इसका सफ़ल प्रयोग किया गया। उस भैंस को चरागाह और जंगल में खुला छोड़ दिया गया और उन पर फ़्रीक्वेंसी के जरिये “निगाह” रखी गई, वे कहाँ जाती है, क्या-क्या खाती हैं, आदि। इस प्रयोग की सफ़लता के बाद तो मछलियों, बैलों, कुत्तों आदि को लाखों माइक्रोचिप्स लगाई जा चुकी हैं। इससे जानवर के गुम जाने पर उसे ढूँढने में आसानी हो जाती है। अब इन RFID चिप का उपयोग नाके पर ऑटोमेटिक पेमेंट के लिये कारों में (अमेरिका में चेक नाकों पर इस तकनीक से पेमेंट सीधे क्रेडिट कार्ड के जरिये कट जाता है), लाइब्रेरी की महत्वपूर्ण और कीमती पुस्तकों में (ताकि चोरी होने की स्थिति में उसका पता लगाया जा सके), यहाँ तक कि वालमार्ट जैसे बड़े मॉल में कीमती सामानों में भी लगाया जाता है (चोर तो हर जगह मौजूद होते हैं ना!!)। इस तकनीक में सुरक्षा एजेंसियों को सिर्फ़ जगह-जगह कैमरे फ़िट करने होते हैं और उन्हें इनकी रेडियो फ़्रिक्वेंसी से “तालमेल” करवा दिया जाता है, बस उन कैमरों के सामने से निकलने वाली हर माइक्रोचिप की गतिविधि, उसकी दिशा आदि का तत्काल पता चल जाता है।

11 सितम्बर के हमले के बाद अमेरिका में आज तक कोई आतंकवादी हमला नहीं हो पाया, जबकि भारत में तो हर महीने एक हमला होता है और मासूम नागरिक मारे जाते हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि हरेक नागरिक को यह “चिप” लगवा लेना चाहिये तथा इसे “निजी मामलों में दखल” न समझा जाये बल्कि देश की सुरक्षा के लिहाज से इसे देखा जाना चाहिये। हालांकि “निजता (Privacy) में सरकारी निगरानी” जैसी बात को लेकर, जनता का रुख अभी नकारात्मक है, लेकिन प्रशासन लोगों को राजी करने में लगा हुआ है। इसे लगाने की तकनीक भी बेहद आसान है, एक मामूली इंजेक्शन के जरिये इसे कोहनी और कंधे के बीच में पिछले हिस्से में त्वचा के अन्दर फ़िट कर दिया जाता है। एक मिर्गी के मरीज ने इसे फ़िट करवा लिया है, जब भी उसे दौरा पड़ने की नौबत आती है, या वह बेहोशी की हालत में अस्पताल में लाया जाता है, इस “चिप” के कारण डॉक्टरों को उसके पिछले रिकॉर्ड के बारे सब कुछ पहले से मालूम रहता है और उसका इलाज तत्काल हो जाता है।

वैसे एक माइक्रोचिप की औसत उम्र 10 से 15 साल होती है, और एक बार फ़िट कर दिये जाने के बाद इसे निकालना आसान नहीं है। हरेक चिप का 16 अंकों का विशेष कोड नम्बर होता है, जिससे इसकी स्कैनिंग आसानी से हो जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन माइक्रोचिप को शरीर से निकाला जा सकता है, लेकिन उसके लिये पहले पूरे शरीर का एक्सरे करना पड़ेगा, क्योंकि वह चिप अधिकतर शरीर में स्किन के नीचे खिसकते-खिसकते कहीं की कहीं पहुँच जाती है। इसमें एक सम्भावना यह भी है कि कहीं वह अपराधी किसी मुठभेड़ में या आपसी गैंगवार में बुरी तरह घायल हो जाये, तो कहीं बहते खून के साथ यह माइक्रोचिप भी न निकल जाये।

अमेरिका की सबसे बड़ी माइक्रोचिप बनाने वाली कम्पनी “वेरीचिप कॉर्प” अब तक 7000 से ज्यादा माइक्रोचिप बना चुकी है जिसे विभिन्न पालतू जानवरों को लगाया जा चुका है, साथ ही 2000 माइक्रोचिप विभिन्न व्यक्तियों को भी लगाई जा चुकी है, जिनमें से अधिकतर गम्भीर डायबिटीज, अल्जाइमर्स पीड़ित या हृदय रोगियों को लगाई गई हैं। चूंकि यह तकनीक अभी नई है, इसलिये फ़िलहाल इसकी कीमत 200 से 300 डॉलर के आसपास होती है, लेकिन जैसे-जैसे यह आम होती जायेगी स्वाभाविक रूप से यह चिप सस्ती पड़ेगी। लेकिन जैसा कि मैंने पिछले लेख में कहा कि यदि “तरल” रूप में नैनो जीपीएस तकनीक वाली माइक्रोचिप आ जाये तो सुरक्षा एजेंसियों को जबरदस्त फ़ायदा हो जायेगा…

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आतंकवादियों, अपराधियों के शरीर में GPS माइक्रोचिप फ़िट कर देना चाहिये… (भाग-2)

GPS Microchips Terrorism Criminals RFID
(भाग-1 से जारी)
पिछले भाग में हमने GPS तकनीक वाली चिप के बारे में जानकारी हासिल की थी, जो कि नवीनतम है, अब थोड़ा जानते हैं एक पुरानी तकनीक RFID के बारे में, जो कि अब काफ़ी आम हो चली है (जी हाँ भारत में भी…)

RFID तकनीक वाली माइक्रोचिप –

RFID तकनीक से काम करने वाली माइक्रोचिप के डाटा को पढ़ने के लिये एक विशेष “रीडर” की आवश्यकता होती है, जिसमें से उस व्यक्ति को गुजारा जाता है (उदाहरण के तौर पर मेटल डिटेक्टर जैसी)। साथ ही इस चिप की “रेंज” मात्र कुछ किलोमीटर तक ही होती है, अर्थात इसमें से निकलने वाली “फ़्रीक्वेंसी” को कुछ दूरी तक ही पकड़ा जा सकता है। इसमें माइक्रोचिप फ़िट किये गये व्यक्ति या जानवर को “स्कैन” किया जाता है, और उसका सारा डाटा कम्प्यूटर पर हाजिर होता है। अक्सर इस तकनीक का उपयोग पालतू जानवरों के लिये किया जाता है। आमतौर पर इस माइक्रोचिप का उपयोग उच्च सुरक्षा वाले इलाकों, महत्वपूर्ण दस्तावेजों की आलमारी, या पुलिस विभाग के गोपनीय विभाग में किया जाता है। इस प्रकार के विभागों में सिर्फ़ वही व्यक्ति घुस सकता है जिसकी बाँह के नीचे यह माइक्रोचिप फ़िट किया हुआ है, कोई अवांछित व्यक्ति जब उस “रेंज” में प्रवेश करता है तो अलार्म बजने लगता है। यह तकनीक परमाणु संस्थानों और सेना के महत्वपूर्ण कार्यालयों की सुरक्षा के लिये बहुत जरूरी है।

अमेरिका में तीस वर्ष पूर्व सबसे पहले भैंस पर इसका सफ़ल प्रयोग किया गया। उस भैंस को चरागाह और जंगल में खुला छोड़ दिया गया और उन पर फ़्रीक्वेंसी के जरिये “निगाह” रखी गई, वे कहाँ जाती है, क्या-क्या खाती हैं, आदि। इस प्रयोग की सफ़लता के बाद तो मछलियों, बैलों, कुत्तों आदि को लाखों माइक्रोचिप्स लगाई जा चुकी हैं। इससे जानवर के गुम जाने पर उसे ढूँढने में आसानी हो जाती है। अब इन RFID चिप का उपयोग नाके पर ऑटोमेटिक पेमेंट के लिये कारों में (अमेरिका में चेक नाकों पर इस तकनीक से पेमेंट सीधे क्रेडिट कार्ड के जरिये कट जाता है), लाइब्रेरी की महत्वपूर्ण और कीमती पुस्तकों में (ताकि चोरी होने की स्थिति में उसका पता लगाया जा सके), यहाँ तक कि वालमार्ट जैसे बड़े मॉल में कीमती सामानों में भी लगाया जाता है (चोर तो हर जगह मौजूद होते हैं ना!!)। इस तकनीक में सुरक्षा एजेंसियों को सिर्फ़ जगह-जगह कैमरे फ़िट करने होते हैं और उन्हें इनकी रेडियो फ़्रिक्वेंसी से “तालमेल” करवा दिया जाता है, बस उन कैमरों के सामने से निकलने वाली हर माइक्रोचिप की गतिविधि, उसकी दिशा आदि का तत्काल पता चल जाता है।

11 सितम्बर के हमले के बाद अमेरिका में आज तक कोई आतंकवादी हमला नहीं हो पाया, जबकि भारत में तो हर महीने एक हमला होता है और मासूम नागरिक मारे जाते हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि हरेक नागरिक को यह “चिप” लगवा लेना चाहिये तथा इसे “निजी मामलों में दखल” न समझा जाये बल्कि देश की सुरक्षा के लिहाज से इसे देखा जाना चाहिये। हालांकि “निजता (Privacy) में सरकारी निगरानी” जैसी बात को लेकर, जनता का रुख अभी नकारात्मक है, लेकिन प्रशासन लोगों को राजी करने में लगा हुआ है। इसे लगाने की तकनीक भी बेहद आसान है, एक मामूली इंजेक्शन के जरिये इसे कोहनी और कंधे के बीच में पिछले हिस्से में त्वचा के अन्दर फ़िट कर दिया जाता है। एक मिर्गी के मरीज ने इसे फ़िट करवा लिया है, जब भी उसे दौरा पड़ने की नौबत आती है, या वह बेहोशी की हालत में अस्पताल में लाया जाता है, इस “चिप” के कारण डॉक्टरों को उसके पिछले रिकॉर्ड के बारे सब कुछ पहले से मालूम रहता है और उसका इलाज तत्काल हो जाता है।

वैसे एक माइक्रोचिप की औसत उम्र 10 से 15 साल होती है, और एक बार फ़िट कर दिये जाने के बाद इसे निकालना आसान नहीं है। हरेक चिप का 16 अंकों का विशेष कोड नम्बर होता है, जिससे इसकी स्कैनिंग आसानी से हो जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन माइक्रोचिप को शरीर से निकाला जा सकता है, लेकिन उसके लिये पहले पूरे शरीर का एक्सरे करना पड़ेगा, क्योंकि वह चिप अधिकतर शरीर में स्किन के नीचे खिसकते-खिसकते कहीं की कहीं पहुँच जाती है। इसमें एक सम्भावना यह भी है कि कहीं वह अपराधी किसी मुठभेड़ में या आपसी गैंगवार में बुरी तरह घायल हो जाये, तो कहीं बहते खून के साथ यह माइक्रोचिप भी न निकल जाये।

अमेरिका की सबसे बड़ी माइक्रोचिप बनाने वाली कम्पनी “वेरीचिप कॉर्प” अब तक 7000 से ज्यादा माइक्रोचिप बना चुकी है जिसे विभिन्न पालतू जानवरों को लगाया जा चुका है, साथ ही 2000 माइक्रोचिप विभिन्न व्यक्तियों को भी लगाई जा चुकी है, जिनमें से अधिकतर गम्भीर डायबिटीज, अल्जाइमर्स पीड़ित या हृदय रोगियों को लगाई गई हैं। चूंकि यह तकनीक अभी नई है, इसलिये फ़िलहाल इसकी कीमत 200 से 300 डॉलर के आसपास होती है, लेकिन जैसे-जैसे यह आम होती जायेगी स्वाभाविक रूप से यह चिप सस्ती पड़ेगी। लेकिन जैसा कि मैंने पिछले लेख में कहा कि यदि “तरल” रूप में नैनो जीपीएस तकनीक वाली माइक्रोचिप आ जाये तो सुरक्षा एजेंसियों को जबरदस्त फ़ायदा हो जायेगा…

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आतंकवादियों, अपराधियों के शरीर में GPS माइक्रोचिप फ़िट कर देना चाहिये… (भाग-2)

GPS Microchips Terrorism Criminals RFID
(भाग-1 से जारी)
पिछले भाग में हमने GPS तकनीक वाली चिप के बारे में जानकारी हासिल की थी, जो कि नवीनतम है, अब थोड़ा जानते हैं एक पुरानी तकनीक RFID के बारे में, जो कि अब काफ़ी आम हो चली है (जी हाँ भारत में भी…)

RFID तकनीक वाली माइक्रोचिप –

RFID तकनीक से काम करने वाली माइक्रोचिप के डाटा को पढ़ने के लिये एक विशेष “रीडर” की आवश्यकता होती है, जिसमें से उस व्यक्ति को गुजारा जाता है (उदाहरण के तौर पर मेटल डिटेक्टर जैसी)। साथ ही इस चिप की “रेंज” मात्र कुछ किलोमीटर तक ही होती है, अर्थात इसमें से निकलने वाली “फ़्रीक्वेंसी” को कुछ दूरी तक ही पकड़ा जा सकता है। इसमें माइक्रोचिप फ़िट किये गये व्यक्ति या जानवर को “स्कैन” किया जाता है, और उसका सारा डाटा कम्प्यूटर पर हाजिर होता है। अक्सर इस तकनीक का उपयोग पालतू जानवरों के लिये किया जाता है। आमतौर पर इस माइक्रोचिप का उपयोग उच्च सुरक्षा वाले इलाकों, महत्वपूर्ण दस्तावेजों की आलमारी, या पुलिस विभाग के गोपनीय विभाग में किया जाता है। इस प्रकार के विभागों में सिर्फ़ वही व्यक्ति घुस सकता है जिसकी बाँह के नीचे यह माइक्रोचिप फ़िट किया हुआ है, कोई अवांछित व्यक्ति जब उस “रेंज” में प्रवेश करता है तो अलार्म बजने लगता है। यह तकनीक परमाणु संस्थानों और सेना के महत्वपूर्ण कार्यालयों की सुरक्षा के लिये बहुत जरूरी है।

अमेरिका में तीस वर्ष पूर्व सबसे पहले भैंस पर इसका सफ़ल प्रयोग किया गया। उस भैंस को चरागाह और जंगल में खुला छोड़ दिया गया और उन पर फ़्रीक्वेंसी के जरिये “निगाह” रखी गई, वे कहाँ जाती है, क्या-क्या खाती हैं, आदि। इस प्रयोग की सफ़लता के बाद तो मछलियों, बैलों, कुत्तों आदि को लाखों माइक्रोचिप्स लगाई जा चुकी हैं। इससे जानवर के गुम जाने पर उसे ढूँढने में आसानी हो जाती है। अब इन RFID चिप का उपयोग नाके पर ऑटोमेटिक पेमेंट के लिये कारों में (अमेरिका में चेक नाकों पर इस तकनीक से पेमेंट सीधे क्रेडिट कार्ड के जरिये कट जाता है), लाइब्रेरी की महत्वपूर्ण और कीमती पुस्तकों में (ताकि चोरी होने की स्थिति में उसका पता लगाया जा सके), यहाँ तक कि वालमार्ट जैसे बड़े मॉल में कीमती सामानों में भी लगाया जाता है (चोर तो हर जगह मौजूद होते हैं ना!!)। इस तकनीक में सुरक्षा एजेंसियों को सिर्फ़ जगह-जगह कैमरे फ़िट करने होते हैं और उन्हें इनकी रेडियो फ़्रिक्वेंसी से “तालमेल” करवा दिया जाता है, बस उन कैमरों के सामने से निकलने वाली हर माइक्रोचिप की गतिविधि, उसकी दिशा आदि का तत्काल पता चल जाता है।

11 सितम्बर के हमले के बाद अमेरिका में आज तक कोई आतंकवादी हमला नहीं हो पाया, जबकि भारत में तो हर महीने एक हमला होता है और मासूम नागरिक मारे जाते हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि हरेक नागरिक को यह “चिप” लगवा लेना चाहिये तथा इसे “निजी मामलों में दखल” न समझा जाये बल्कि देश की सुरक्षा के लिहाज से इसे देखा जाना चाहिये। हालांकि “निजता (Privacy) में सरकारी निगरानी” जैसी बात को लेकर, जनता का रुख अभी नकारात्मक है, लेकिन प्रशासन लोगों को राजी करने में लगा हुआ है। इसे लगाने की तकनीक भी बेहद आसान है, एक मामूली इंजेक्शन के जरिये इसे कोहनी और कंधे के बीच में पिछले हिस्से में त्वचा के अन्दर फ़िट कर दिया जाता है। एक मिर्गी के मरीज ने इसे फ़िट करवा लिया है, जब भी उसे दौरा पड़ने की नौबत आती है, या वह बेहोशी की हालत में अस्पताल में लाया जाता है, इस “चिप” के कारण डॉक्टरों को उसके पिछले रिकॉर्ड के बारे सब कुछ पहले से मालूम रहता है और उसका इलाज तत्काल हो जाता है।

वैसे एक माइक्रोचिप की औसत उम्र 10 से 15 साल होती है, और एक बार फ़िट कर दिये जाने के बाद इसे निकालना आसान नहीं है। हरेक चिप का 16 अंकों का विशेष कोड नम्बर होता है, जिससे इसकी स्कैनिंग आसानी से हो जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन माइक्रोचिप को शरीर से निकाला जा सकता है, लेकिन उसके लिये पहले पूरे शरीर का एक्सरे करना पड़ेगा, क्योंकि वह चिप अधिकतर शरीर में स्किन के नीचे खिसकते-खिसकते कहीं की कहीं पहुँच जाती है। इसमें एक सम्भावना यह भी है कि कहीं वह अपराधी किसी मुठभेड़ में या आपसी गैंगवार में बुरी तरह घायल हो जाये, तो कहीं बहते खून के साथ यह माइक्रोचिप भी न निकल जाये।

अमेरिका की सबसे बड़ी माइक्रोचिप बनाने वाली कम्पनी “वेरीचिप कॉर्प” अब तक 7000 से ज्यादा माइक्रोचिप बना चुकी है जिसे विभिन्न पालतू जानवरों को लगाया जा चुका है, साथ ही 2000 माइक्रोचिप विभिन्न व्यक्तियों को भी लगाई जा चुकी है, जिनमें से अधिकतर गम्भीर डायबिटीज, अल्जाइमर्स पीड़ित या हृदय रोगियों को लगाई गई हैं। चूंकि यह तकनीक अभी नई है, इसलिये फ़िलहाल इसकी कीमत 200 से 300 डॉलर के आसपास होती है, लेकिन जैसे-जैसे यह आम होती जायेगी स्वाभाविक रूप से यह चिप सस्ती पड़ेगी। लेकिन जैसा कि मैंने पिछले लेख में कहा कि यदि “तरल” रूप में नैनो जीपीएस तकनीक वाली माइक्रोचिप आ जाये तो सुरक्षा एजेंसियों को जबरदस्त फ़ायदा हो जायेगा…

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बावरे फकीरा यूँ बना

पूत के पाँव पालने में नज़र आ जाते है। कई संगीत कारों ने अपने व्यस्त होने बड़े नामी गिरामी हो ने की वज़ह से मेरे प्रोजेक्ट को नकारा ।
मुझसे क्या मिलेगा ….?शायद यही सोचा होगा बेचारों ने
सच मिलता भी क्या हम ठहरे फोकटिए गीतकार शब्दों का धंधा वो भी पोलियो ग्रस्त बच्चों की मदद के लिए …!
संकल्प “मिसफिट” हूँ न दुनियाँ के लिए ।
मेरे भाई सह मित्र जितेन्द्र जोशी ने कहांश्रेयस कर लेगा कंपोजिंग । गीत देदो उसे । मामला तय हो गया श्रेयस की कम्पोजीशन पर आभास को गाना था , फीमेल वोईस के लिए संदीपा,कोरस के लिए दीवान साहब,योगेश,श्रद्धा,मेरी सहचर सुलभा सहित इक लम्बी कतार में लोग आगे आए । वी ओ आई में जाने की कोई सूचना न थी ।
इंदौर आडिशन में जाने के पहले आभास का प्रोजक्ट पूरा हुआ……. मेरा सपना भी आकार लेने लगा…. !
पूरी मस्ती और उछाह के साथ पूरी हुई रिकार्डिंग , यू ट्यूब पर यही मस्ती है पोस्ट कर रहा हूँ।

>आतंकवादियों, अपराधियों के शरीर में GPS माइक्रोचिप फ़िट कर देना चाहिये…

>GPS Microchips Terrorism Criminals RFID
अपराध को रोकने या आतंकवादियों के नेटवर्क को तोड़ने में विज्ञान ने बहुत बड़ा सहयोग किया है। विज्ञान की मदद से फ़िंगरप्रिंट, डीएनए (DNA) आदि तकनीकें तो चल ही रही हैं, साथ ही में एक प्रयोग “नार्को-टेस्ट” (Narcotics Test) का भी है, जिसमें अधिकतर अपराधी सच्चाई उगल देते हैं। हालांकि अभी नार्को टेस्ट की वीडियो रिकॉर्डिंग को न्यायालय में मान्यता हासिल नहीं है, क्योंकि अपराधी का उच्चारण अस्पष्ट और लड़खड़ाता हुआ होता है, लेकिन इस उगली हुई जानकारी का उपयोग पुलिस आगे अन्य जगहों पर छापे मारने या उसके साथियों के नाम-पते जानकर उन्हें गिरफ़्तार करने में करती है। इस लिहाज से “नार्को-टेस्ट” एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ है।

बीती सदी में विज्ञान ने निश्चित ही बहुत-बहुत तरक्की की है। वैज्ञानिकों के कई प्रयोगों के कारण आम जनता के साथ ही सरकारों को भी काफ़ी फ़ायदा हुआ है, चाहे वह हरित क्रांति हो या मोबाइल क्रांति। वैज्ञानिक हमेशा जीवन को उद्देश्यपूर्ण और सुलभ बनाने के लिये ही नित्य नये प्रयोग करते रहते हैं, इन्हीं लाखों आविष्कारों में से एक है माइक्रोचिप का आविष्कार। जैसा कि नाम से ही जाहिर है “माइक्रोचिप” मतलब एक कम्प्यूटराइज्ड डाटा चिप जो आकार में अधिकतम चावल के एक दाने के बराबर होती है। अधिकतम इसलिये बताया ताकि पाठकों को इसके आकार के बारे में सही ज्ञान हो जाये, अन्यथा यह इतनी छोटी भी होती है कि इसे इंजेक्शन के सहारे किसी के शरीर में डाला जा सकता है, और व्यक्ति को इसका पता भी नहीं चलेगा। ये माइक्रोचिप दो तरह की तकनीकों में आती है, पहली है RFID (Radio Frequency Identification Device) और दूसरी होती है GPS (Global Positioning System)।

पहले हम देखेंगे GPS तकनीक वाली माइक्रोचिप के बारे में, क्योंकि यह तकनीक नई है, जबकि RFID वाली तकनीक पुरानी है। GPS (Global Positioning System) जैसा कि नाम से ही जाहिर है, एक ऐसी तकनीक है, जिसमें सम्बन्धित उपकरण हमेशा सैटेलाइट के माध्यम से जुड़ा रहता है, पूरी पृथ्वी पर जहाँ कहीं भी वह उपकरण जायेगा, उसकी “लोकेशन” का पता लगाया जा सकता है। यह तकनीक गत कुछ वर्षों में ही इतनी उन्नत हो चुकी है कि उपकरण के पाँच सौ मीटर के दायरे तक यह अचूक काम करती है (इसी तकनीक की सहायता से अमेरिका जीपीएस फ़ोन के सिग्नलों को पकड़कर, अब तक ओसामा पर कई मिसाइल आक्रमण कर चुका है)। इस तकनीक में जिस उपकरण या व्यक्ति को निगरानी में रखना है, उसकी त्वचा में एक माइक्रोचिप फ़िट कर दी जाती है, जिसका सम्बन्ध एक सामान्य जेण्ट्स पर्स के आकार के ट्रांसमीटर से होता है, यह ट्रांसमीटर लगातार सिग्नल भेजता रहता है, जिसे सैटेलाइट के माध्यम से पकड़ा जाता है। पश्चिमी देशों में आजकल कई बड़े उद्योगपतियों ने अपहरण से बचने के लिये इस तकनीक को अपनाया है, लेकिन इसका ॠणात्मक (Negative) पहलू यह है कि सिग्नल भेजने वाला वह ट्रांसमीटर सतत व्यक्ति के साथ होना चाहिये, और उसका साइज इतना बड़ा तो होता ही है कि उसे आसानी से छिपाया नहीं जा सकता (हालांकि उसमें भी ऐसे नये-नये प्रयोग हो चुके हैं कि कोई भी सिर्फ़ देखकर नहीं कह सकता कि यह “ट्रांसमीटर” है, जैसे ग्लोव्स, साबुन, पर्स, सिगरेट लाइटर आदि के आकारों में)। ऐसे में यदि अपहरणकर्ताओं को पहले से मालूम हो कि फ़लाँ व्यक्ति ने यह उपकरण लगवाया हुआ है, तो अपहरण करते ही सबसे पहले वे उस ट्रांसमीटर को पहचानने के बाद निकालकर फ़ेंक देंगे और अपने शिकार को कहीं दूर ले जायेंगे, लेकिन यदि वह ट्रांसमीटर किसी तरह से अपहृत व्यक्ति से दूर नहीं हो पाया तब तो अपराधियों की खैर नहीं, पुलिस तत्काल GPS से उस व्यक्ति की लोकेशन पता कर लेगी और अपहरणकर्ताओं पर चढ़ बैठेगी। आजकल मोबाइल या कारों में GPS तकनीक का जमकर उपयोग हो रहा है। मोबाइल गुम जाये तो ऑफ़ करने के बाद भी पता चल जायेगा कि वह कहाँ है, इसी प्रकार कार ड्रायवर के लिये रास्ता ढूँढने, टक्कर से बचाने आदि के लिये GPS का बड़ा रोल प्रारम्भ हो चुका है।

यहाँ तक तो हुई हकीकत की बात, अब मैं अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाता हूँ। सभी जानते हैं कि आजकल “नैनो-टेक्नोलॉजी” (Nano-Technology) का जोर है, “नैनो” यानी कि “बहुत ही छोटी” और वैज्ञानिकों में हरेक वस्तु छोटी से छोटी बनाने का जुनून सवार है, और यह जगह की दृष्टि से उपयोगी भी है। ऐसे में मेरे मन में एक सवाल आता है कि क्या यह GPS माइक्रोचिप भी “नैनो” आकार में लगभग “तरल द्रव्य” के रूप में नहीं बनाई जा सकती? यह इतनी “नैनो” होना चाहिये कि माइक्रोचिप और उसका ट्रांसमीटर दोनों को मानव शरीर में फ़िट कर दिया जाये और सामने वाले को इसका पता तक न चले। भविष्य की तकनीक को देखते हुए यह बिलकुल सम्भव है। अब सोचिये सुरक्षा एजेंसियों को इस “नैनो तकनीक” का कितना फ़ायदा होगा। जैसे ही कोई अपराधी या आतंकवादी पकड़ा जाये, उसे “नार्को-टेस्ट” के नाम पर बंगलोर ले जाया जाये, पहले तो “नार्को-टेस्ट” में जितना उगलवाया जा सकता है, निकलवा लिया जाये, फ़िर जाते-जाते, उस आतंकवादी के शरीर में यह GPS आधारित ट्रांसमीटर इंजेक्शन के जरिये रोपित कर दिया जाये। हमारी महान न्याय व्यवस्था, भ्रष्ट राजनेताओं और “देशद्रोही” वकीलों की मेहरबानी से आज नहीं तो कल वे खतरनाक आतंकवादी छूट ही जायेंगे, उस वक्त उन पर खास निगरानी रखने में ये माइक्रोचिप बेहद उपयोगी सिद्ध होंगी। जैसे ही कोई आतंकवादी छूटेगा, वह अपने अन्य साथियों से मिलने जरूर जायेगा, तब पुलिस GPS के जरिये उनका ठिकाना आसानी से ढूंढ लेगी, और उन पुलिसवालों में से कोई “असली देशभक्त” निकल आया तो वहीं उनके ठिकाने पर हाथोंहाथ “फ़ैसला” हो जायेगा। यदि वह अपने पुराने ठिकाने पर नहीं भी जाता, या अपने साथियों से नहीं भी मिलता, या किसी तरह से उसे पता चल जाये कि वह GPS की निगरानी में है, तब भी पुलिस को कम से कम यह तो पता रहेगा कि आज की तारीख में वह आतंकवादी भारत में है या पाकिस्तान, नेपाल, मलेशिया में है। सुरक्षा के लिहाज से इतना भी कुछ कम नहीं है।

सवाल है कि क्या ऐसी तकनीक फ़िलहाल उपलब्ध है? यदि नहीं तो क्या वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं? और जैसा मैं सोच रहा हूँ, यदि वैसी कोई तकनीक मिल जाये तो सुरक्षा एजेंसियों का काम कितना आसान हो जाये… लेकिन शायद फ़िलहाल ऐसी कोई GPS माइक्रोचिप नहीं आती जिससे कि रोपित व्यक्ति की एकदम सही-सही स्थिति पता चल जाये। हो सकता है कि मेरा यह संदेश देश-विदेश के वैज्ञानिकों और वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों तक पहुँच जाये और वे इस पर प्रयोगों को जोर-शोर से आगे बढ़ायें… वैसे आपको ये आइडिया कैसा लगा?

अगले भाग में RFID तकनीक माइक्रोचिप के बारे में थोड़ा सा…

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आतंकवादियों, अपराधियों के शरीर में GPS माइक्रोचिप फ़िट कर देना चाहिये…

GPS Microchips Terrorism Criminals RFID
अपराध को रोकने या आतंकवादियों के नेटवर्क को तोड़ने में विज्ञान ने बहुत बड़ा सहयोग किया है। विज्ञान की मदद से फ़िंगरप्रिंट, डीएनए (DNA) आदि तकनीकें तो चल ही रही हैं, साथ ही में एक प्रयोग “नार्को-टेस्ट” (Narcotics Test) का भी है, जिसमें अधिकतर अपराधी सच्चाई उगल देते हैं। हालांकि अभी नार्को टेस्ट की वीडियो रिकॉर्डिंग को न्यायालय में मान्यता हासिल नहीं है, क्योंकि अपराधी का उच्चारण अस्पष्ट और लड़खड़ाता हुआ होता है, लेकिन इस उगली हुई जानकारी का उपयोग पुलिस आगे अन्य जगहों पर छापे मारने या उसके साथियों के नाम-पते जानकर उन्हें गिरफ़्तार करने में करती है। इस लिहाज से “नार्को-टेस्ट” एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ है।

बीती सदी में विज्ञान ने निश्चित ही बहुत-बहुत तरक्की की है। वैज्ञानिकों के कई प्रयोगों के कारण आम जनता के साथ ही सरकारों को भी काफ़ी फ़ायदा हुआ है, चाहे वह हरित क्रांति हो या मोबाइल क्रांति। वैज्ञानिक हमेशा जीवन को उद्देश्यपूर्ण और सुलभ बनाने के लिये ही नित्य नये प्रयोग करते रहते हैं, इन्हीं लाखों आविष्कारों में से एक है माइक्रोचिप का आविष्कार। जैसा कि नाम से ही जाहिर है “माइक्रोचिप” मतलब एक कम्प्यूटराइज्ड डाटा चिप जो आकार में अधिकतम चावल के एक दाने के बराबर होती है। अधिकतम इसलिये बताया ताकि पाठकों को इसके आकार के बारे में सही ज्ञान हो जाये, अन्यथा यह इतनी छोटी भी होती है कि इसे इंजेक्शन के सहारे किसी के शरीर में डाला जा सकता है, और व्यक्ति को इसका पता भी नहीं चलेगा। ये माइक्रोचिप दो तरह की तकनीकों में आती है, पहली है RFID (Radio Frequency Identification Device) और दूसरी होती है GPS (Global Positioning System)।

पहले हम देखेंगे GPS तकनीक वाली माइक्रोचिप के बारे में, क्योंकि यह तकनीक नई है, जबकि RFID वाली तकनीक पुरानी है। GPS (Global Positioning System) जैसा कि नाम से ही जाहिर है, एक ऐसी तकनीक है, जिसमें सम्बन्धित उपकरण हमेशा सैटेलाइट के माध्यम से जुड़ा रहता है, पूरी पृथ्वी पर जहाँ कहीं भी वह उपकरण जायेगा, उसकी “लोकेशन” का पता लगाया जा सकता है। यह तकनीक गत कुछ वर्षों में ही इतनी उन्नत हो चुकी है कि उपकरण के पाँच सौ मीटर के दायरे तक यह अचूक काम करती है (इसी तकनीक की सहायता से अमेरिका जीपीएस फ़ोन के सिग्नलों को पकड़कर, अब तक ओसामा पर कई मिसाइल आक्रमण कर चुका है)। इस तकनीक में जिस उपकरण या व्यक्ति को निगरानी में रखना है, उसकी त्वचा में एक माइक्रोचिप फ़िट कर दी जाती है, जिसका सम्बन्ध एक सामान्य जेण्ट्स पर्स के आकार के ट्रांसमीटर से होता है, यह ट्रांसमीटर लगातार सिग्नल भेजता रहता है, जिसे सैटेलाइट के माध्यम से पकड़ा जाता है। पश्चिमी देशों में आजकल कई बड़े उद्योगपतियों ने अपहरण से बचने के लिये इस तकनीक को अपनाया है, लेकिन इसका ॠणात्मक (Negative) पहलू यह है कि सिग्नल भेजने वाला वह ट्रांसमीटर सतत व्यक्ति के साथ होना चाहिये, और उसका साइज इतना बड़ा तो होता ही है कि उसे आसानी से छिपाया नहीं जा सकता (हालांकि उसमें भी ऐसे नये-नये प्रयोग हो चुके हैं कि कोई भी सिर्फ़ देखकर नहीं कह सकता कि यह “ट्रांसमीटर” है, जैसे ग्लोव्स, साबुन, पर्स, सिगरेट लाइटर आदि के आकारों में)। ऐसे में यदि अपहरणकर्ताओं को पहले से मालूम हो कि फ़लाँ व्यक्ति ने यह उपकरण लगवाया हुआ है, तो अपहरण करते ही सबसे पहले वे उस ट्रांसमीटर को पहचानने के बाद निकालकर फ़ेंक देंगे और अपने शिकार को कहीं दूर ले जायेंगे, लेकिन यदि वह ट्रांसमीटर किसी तरह से अपहृत व्यक्ति से दूर नहीं हो पाया तब तो अपराधियों की खैर नहीं, पुलिस तत्काल GPS से उस व्यक्ति की लोकेशन पता कर लेगी और अपहरणकर्ताओं पर चढ़ बैठेगी। आजकल मोबाइल या कारों में GPS तकनीक का जमकर उपयोग हो रहा है। मोबाइल गुम जाये तो ऑफ़ करने के बाद भी पता चल जायेगा कि वह कहाँ है, इसी प्रकार कार ड्रायवर के लिये रास्ता ढूँढने, टक्कर से बचाने आदि के लिये GPS का बड़ा रोल प्रारम्भ हो चुका है।

यहाँ तक तो हुई हकीकत की बात, अब मैं अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाता हूँ। सभी जानते हैं कि आजकल “नैनो-टेक्नोलॉजी” (Nano-Technology) का जोर है, “नैनो” यानी कि “बहुत ही छोटी” और वैज्ञानिकों में हरेक वस्तु छोटी से छोटी बनाने का जुनून सवार है, और यह जगह की दृष्टि से उपयोगी भी है। ऐसे में मेरे मन में एक सवाल आता है कि क्या यह GPS माइक्रोचिप भी “नैनो” आकार में लगभग “तरल द्रव्य” के रूप में नहीं बनाई जा सकती? यह इतनी “नैनो” होना चाहिये कि माइक्रोचिप और उसका ट्रांसमीटर दोनों को मानव शरीर में फ़िट कर दिया जाये और सामने वाले को इसका पता तक न चले। भविष्य की तकनीक को देखते हुए यह बिलकुल सम्भव है। अब सोचिये सुरक्षा एजेंसियों को इस “नैनो तकनीक” का कितना फ़ायदा होगा। जैसे ही कोई अपराधी या आतंकवादी पकड़ा जाये, उसे “नार्को-टेस्ट” के नाम पर बंगलोर ले जाया जाये, पहले तो “नार्को-टेस्ट” में जितना उगलवाया जा सकता है, निकलवा लिया जाये, फ़िर जाते-जाते, उस आतंकवादी के शरीर में यह GPS आधारित ट्रांसमीटर इंजेक्शन के जरिये रोपित कर दिया जाये। हमारी महान न्याय व्यवस्था, भ्रष्ट राजनेताओं और “देशद्रोही” वकीलों की मेहरबानी से आज नहीं तो कल वे खतरनाक आतंकवादी छूट ही जायेंगे, उस वक्त उन पर खास निगरानी रखने में ये माइक्रोचिप बेहद उपयोगी सिद्ध होंगी। जैसे ही कोई आतंकवादी छूटेगा, वह अपने अन्य साथियों से मिलने जरूर जायेगा, तब पुलिस GPS के जरिये उनका ठिकाना आसानी से ढूंढ लेगी, और उन पुलिसवालों में से कोई “असली देशभक्त” निकल आया तो वहीं उनके ठिकाने पर हाथोंहाथ “फ़ैसला” हो जायेगा। यदि वह अपने पुराने ठिकाने पर नहीं भी जाता, या अपने साथियों से नहीं भी मिलता, या किसी तरह से उसे पता चल जाये कि वह GPS की निगरानी में है, तब भी पुलिस को कम से कम यह तो पता रहेगा कि आज की तारीख में वह आतंकवादी भारत में है या पाकिस्तान, नेपाल, मलेशिया में है। सुरक्षा के लिहाज से इतना भी कुछ कम नहीं है।

सवाल है कि क्या ऐसी तकनीक फ़िलहाल उपलब्ध है? यदि नहीं तो क्या वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं? और जैसा मैं सोच रहा हूँ, यदि वैसी कोई तकनीक मिल जाये तो सुरक्षा एजेंसियों का काम कितना आसान हो जाये… लेकिन शायद फ़िलहाल ऐसी कोई GPS माइक्रोचिप नहीं आती जिससे कि रोपित व्यक्ति की एकदम सही-सही स्थिति पता चल जाये। हो सकता है कि मेरा यह संदेश देश-विदेश के वैज्ञानिकों और वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों तक पहुँच जाये और वे इस पर प्रयोगों को जोर-शोर से आगे बढ़ायें… वैसे आपको ये आइडिया कैसा लगा?

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GPS Microchips Terrorism Criminals RFID
अपराध को रोकने या आतंकवादियों के नेटवर्क को तोड़ने में विज्ञान ने बहुत बड़ा सहयोग किया है। विज्ञान की मदद से फ़िंगरप्रिंट, डीएनए (DNA) आदि तकनीकें तो चल ही रही हैं, साथ ही में एक प्रयोग “नार्को-टेस्ट” (Narcotics Test) का भी है, जिसमें अधिकतर अपराधी सच्चाई उगल देते हैं। हालांकि अभी नार्को टेस्ट की वीडियो रिकॉर्डिंग को न्यायालय में मान्यता हासिल नहीं है, क्योंकि अपराधी का उच्चारण अस्पष्ट और लड़खड़ाता हुआ होता है, लेकिन इस उगली हुई जानकारी का उपयोग पुलिस आगे अन्य जगहों पर छापे मारने या उसके साथियों के नाम-पते जानकर उन्हें गिरफ़्तार करने में करती है। इस लिहाज से “नार्को-टेस्ट” एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ है।

बीती सदी में विज्ञान ने निश्चित ही बहुत-बहुत तरक्की की है। वैज्ञानिकों के कई प्रयोगों के कारण आम जनता के साथ ही सरकारों को भी काफ़ी फ़ायदा हुआ है, चाहे वह हरित क्रांति हो या मोबाइल क्रांति। वैज्ञानिक हमेशा जीवन को उद्देश्यपूर्ण और सुलभ बनाने के लिये ही नित्य नये प्रयोग करते रहते हैं, इन्हीं लाखों आविष्कारों में से एक है माइक्रोचिप का आविष्कार। जैसा कि नाम से ही जाहिर है “माइक्रोचिप” मतलब एक कम्प्यूटराइज्ड डाटा चिप जो आकार में अधिकतम चावल के एक दाने के बराबर होती है। अधिकतम इसलिये बताया ताकि पाठकों को इसके आकार के बारे में सही ज्ञान हो जाये, अन्यथा यह इतनी छोटी भी होती है कि इसे इंजेक्शन के सहारे किसी के शरीर में डाला जा सकता है, और व्यक्ति को इसका पता भी नहीं चलेगा। ये माइक्रोचिप दो तरह की तकनीकों में आती है, पहली है RFID (Radio Frequency Identification Device) और दूसरी होती है GPS (Global Positioning System)।

पहले हम देखेंगे GPS तकनीक वाली माइक्रोचिप के बारे में, क्योंकि यह तकनीक नई है, जबकि RFID वाली तकनीक पुरानी है। GPS (Global Positioning System) जैसा कि नाम से ही जाहिर है, एक ऐसी तकनीक है, जिसमें सम्बन्धित उपकरण हमेशा सैटेलाइट के माध्यम से जुड़ा रहता है, पूरी पृथ्वी पर जहाँ कहीं भी वह उपकरण जायेगा, उसकी “लोकेशन” का पता लगाया जा सकता है। यह तकनीक गत कुछ वर्षों में ही इतनी उन्नत हो चुकी है कि उपकरण के पाँच सौ मीटर के दायरे तक यह अचूक काम करती है (इसी तकनीक की सहायता से अमेरिका जीपीएस फ़ोन के सिग्नलों को पकड़कर, अब तक ओसामा पर कई मिसाइल आक्रमण कर चुका है)। इस तकनीक में जिस उपकरण या व्यक्ति को निगरानी में रखना है, उसकी त्वचा में एक माइक्रोचिप फ़िट कर दी जाती है, जिसका सम्बन्ध एक सामान्य जेण्ट्स पर्स के आकार के ट्रांसमीटर से होता है, यह ट्रांसमीटर लगातार सिग्नल भेजता रहता है, जिसे सैटेलाइट के माध्यम से पकड़ा जाता है। पश्चिमी देशों में आजकल कई बड़े उद्योगपतियों ने अपहरण से बचने के लिये इस तकनीक को अपनाया है, लेकिन इसका ॠणात्मक (Negative) पहलू यह है कि सिग्नल भेजने वाला वह ट्रांसमीटर सतत व्यक्ति के साथ होना चाहिये, और उसका साइज इतना बड़ा तो होता ही है कि उसे आसानी से छिपाया नहीं जा सकता (हालांकि उसमें भी ऐसे नये-नये प्रयोग हो चुके हैं कि कोई भी सिर्फ़ देखकर नहीं कह सकता कि यह “ट्रांसमीटर” है, जैसे ग्लोव्स, साबुन, पर्स, सिगरेट लाइटर आदि के आकारों में)। ऐसे में यदि अपहरणकर्ताओं को पहले से मालूम हो कि फ़लाँ व्यक्ति ने यह उपकरण लगवाया हुआ है, तो अपहरण करते ही सबसे पहले वे उस ट्रांसमीटर को पहचानने के बाद निकालकर फ़ेंक देंगे और अपने शिकार को कहीं दूर ले जायेंगे, लेकिन यदि वह ट्रांसमीटर किसी तरह से अपहृत व्यक्ति से दूर नहीं हो पाया तब तो अपराधियों की खैर नहीं, पुलिस तत्काल GPS से उस व्यक्ति की लोकेशन पता कर लेगी और अपहरणकर्ताओं पर चढ़ बैठेगी। आजकल मोबाइल या कारों में GPS तकनीक का जमकर उपयोग हो रहा है। मोबाइल गुम जाये तो ऑफ़ करने के बाद भी पता चल जायेगा कि वह कहाँ है, इसी प्रकार कार ड्रायवर के लिये रास्ता ढूँढने, टक्कर से बचाने आदि के लिये GPS का बड़ा रोल प्रारम्भ हो चुका है।

यहाँ तक तो हुई हकीकत की बात, अब मैं अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाता हूँ। सभी जानते हैं कि आजकल “नैनो-टेक्नोलॉजी” (Nano-Technology) का जोर है, “नैनो” यानी कि “बहुत ही छोटी” और वैज्ञानिकों में हरेक वस्तु छोटी से छोटी बनाने का जुनून सवार है, और यह जगह की दृष्टि से उपयोगी भी है। ऐसे में मेरे मन में एक सवाल आता है कि क्या यह GPS माइक्रोचिप भी “नैनो” आकार में लगभग “तरल द्रव्य” के रूप में नहीं बनाई जा सकती? यह इतनी “नैनो” होना चाहिये कि माइक्रोचिप और उसका ट्रांसमीटर दोनों को मानव शरीर में फ़िट कर दिया जाये और सामने वाले को इसका पता तक न चले। भविष्य की तकनीक को देखते हुए यह बिलकुल सम्भव है। अब सोचिये सुरक्षा एजेंसियों को इस “नैनो तकनीक” का कितना फ़ायदा होगा। जैसे ही कोई अपराधी या आतंकवादी पकड़ा जाये, उसे “नार्को-टेस्ट” के नाम पर बंगलोर ले जाया जाये, पहले तो “नार्को-टेस्ट” में जितना उगलवाया जा सकता है, निकलवा लिया जाये, फ़िर जाते-जाते, उस आतंकवादी के शरीर में यह GPS आधारित ट्रांसमीटर इंजेक्शन के जरिये रोपित कर दिया जाये। हमारी महान न्याय व्यवस्था, भ्रष्ट राजनेताओं और “देशद्रोही” वकीलों की मेहरबानी से आज नहीं तो कल वे खतरनाक आतंकवादी छूट ही जायेंगे, उस वक्त उन पर खास निगरानी रखने में ये माइक्रोचिप बेहद उपयोगी सिद्ध होंगी। जैसे ही कोई आतंकवादी छूटेगा, वह अपने अन्य साथियों से मिलने जरूर जायेगा, तब पुलिस GPS के जरिये उनका ठिकाना आसानी से ढूंढ लेगी, और उन पुलिसवालों में से कोई “असली देशभक्त” निकल आया तो वहीं उनके ठिकाने पर हाथोंहाथ “फ़ैसला” हो जायेगा। यदि वह अपने पुराने ठिकाने पर नहीं भी जाता, या अपने साथियों से नहीं भी मिलता, या किसी तरह से उसे पता चल जाये कि वह GPS की निगरानी में है, तब भी पुलिस को कम से कम यह तो पता रहेगा कि आज की तारीख में वह आतंकवादी भारत में है या पाकिस्तान, नेपाल, मलेशिया में है। सुरक्षा के लिहाज से इतना भी कुछ कम नहीं है।

सवाल है कि क्या ऐसी तकनीक फ़िलहाल उपलब्ध है? यदि नहीं तो क्या वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं? और जैसा मैं सोच रहा हूँ, यदि वैसी कोई तकनीक मिल जाये तो सुरक्षा एजेंसियों का काम कितना आसान हो जाये… लेकिन शायद फ़िलहाल ऐसी कोई GPS माइक्रोचिप नहीं आती जिससे कि रोपित व्यक्ति की एकदम सही-सही स्थिति पता चल जाये। हो सकता है कि मेरा यह संदेश देश-विदेश के वैज्ञानिकों और वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों तक पहुँच जाये और वे इस पर प्रयोगों को जोर-शोर से आगे बढ़ायें… वैसे आपको ये आइडिया कैसा लगा?

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