आतंकवादियों, अपराधियों के शरीर में GPS माइक्रोचिप फ़िट कर देना चाहिये…

GPS Microchips Terrorism Criminals RFID
अपराध को रोकने या आतंकवादियों के नेटवर्क को तोड़ने में विज्ञान ने बहुत बड़ा सहयोग किया है। विज्ञान की मदद से फ़िंगरप्रिंट, डीएनए (DNA) आदि तकनीकें तो चल ही रही हैं, साथ ही में एक प्रयोग “नार्को-टेस्ट” (Narcotics Test) का भी है, जिसमें अधिकतर अपराधी सच्चाई उगल देते हैं। हालांकि अभी नार्को टेस्ट की वीडियो रिकॉर्डिंग को न्यायालय में मान्यता हासिल नहीं है, क्योंकि अपराधी का उच्चारण अस्पष्ट और लड़खड़ाता हुआ होता है, लेकिन इस उगली हुई जानकारी का उपयोग पुलिस आगे अन्य जगहों पर छापे मारने या उसके साथियों के नाम-पते जानकर उन्हें गिरफ़्तार करने में करती है। इस लिहाज से “नार्को-टेस्ट” एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ है।

बीती सदी में विज्ञान ने निश्चित ही बहुत-बहुत तरक्की की है। वैज्ञानिकों के कई प्रयोगों के कारण आम जनता के साथ ही सरकारों को भी काफ़ी फ़ायदा हुआ है, चाहे वह हरित क्रांति हो या मोबाइल क्रांति। वैज्ञानिक हमेशा जीवन को उद्देश्यपूर्ण और सुलभ बनाने के लिये ही नित्य नये प्रयोग करते रहते हैं, इन्हीं लाखों आविष्कारों में से एक है माइक्रोचिप का आविष्कार। जैसा कि नाम से ही जाहिर है “माइक्रोचिप” मतलब एक कम्प्यूटराइज्ड डाटा चिप जो आकार में अधिकतम चावल के एक दाने के बराबर होती है। अधिकतम इसलिये बताया ताकि पाठकों को इसके आकार के बारे में सही ज्ञान हो जाये, अन्यथा यह इतनी छोटी भी होती है कि इसे इंजेक्शन के सहारे किसी के शरीर में डाला जा सकता है, और व्यक्ति को इसका पता भी नहीं चलेगा। ये माइक्रोचिप दो तरह की तकनीकों में आती है, पहली है RFID (Radio Frequency Identification Device) और दूसरी होती है GPS (Global Positioning System)।

पहले हम देखेंगे GPS तकनीक वाली माइक्रोचिप के बारे में, क्योंकि यह तकनीक नई है, जबकि RFID वाली तकनीक पुरानी है। GPS (Global Positioning System) जैसा कि नाम से ही जाहिर है, एक ऐसी तकनीक है, जिसमें सम्बन्धित उपकरण हमेशा सैटेलाइट के माध्यम से जुड़ा रहता है, पूरी पृथ्वी पर जहाँ कहीं भी वह उपकरण जायेगा, उसकी “लोकेशन” का पता लगाया जा सकता है। यह तकनीक गत कुछ वर्षों में ही इतनी उन्नत हो चुकी है कि उपकरण के पाँच सौ मीटर के दायरे तक यह अचूक काम करती है (इसी तकनीक की सहायता से अमेरिका जीपीएस फ़ोन के सिग्नलों को पकड़कर, अब तक ओसामा पर कई मिसाइल आक्रमण कर चुका है)। इस तकनीक में जिस उपकरण या व्यक्ति को निगरानी में रखना है, उसकी त्वचा में एक माइक्रोचिप फ़िट कर दी जाती है, जिसका सम्बन्ध एक सामान्य जेण्ट्स पर्स के आकार के ट्रांसमीटर से होता है, यह ट्रांसमीटर लगातार सिग्नल भेजता रहता है, जिसे सैटेलाइट के माध्यम से पकड़ा जाता है। पश्चिमी देशों में आजकल कई बड़े उद्योगपतियों ने अपहरण से बचने के लिये इस तकनीक को अपनाया है, लेकिन इसका ॠणात्मक (Negative) पहलू यह है कि सिग्नल भेजने वाला वह ट्रांसमीटर सतत व्यक्ति के साथ होना चाहिये, और उसका साइज इतना बड़ा तो होता ही है कि उसे आसानी से छिपाया नहीं जा सकता (हालांकि उसमें भी ऐसे नये-नये प्रयोग हो चुके हैं कि कोई भी सिर्फ़ देखकर नहीं कह सकता कि यह “ट्रांसमीटर” है, जैसे ग्लोव्स, साबुन, पर्स, सिगरेट लाइटर आदि के आकारों में)। ऐसे में यदि अपहरणकर्ताओं को पहले से मालूम हो कि फ़लाँ व्यक्ति ने यह उपकरण लगवाया हुआ है, तो अपहरण करते ही सबसे पहले वे उस ट्रांसमीटर को पहचानने के बाद निकालकर फ़ेंक देंगे और अपने शिकार को कहीं दूर ले जायेंगे, लेकिन यदि वह ट्रांसमीटर किसी तरह से अपहृत व्यक्ति से दूर नहीं हो पाया तब तो अपराधियों की खैर नहीं, पुलिस तत्काल GPS से उस व्यक्ति की लोकेशन पता कर लेगी और अपहरणकर्ताओं पर चढ़ बैठेगी। आजकल मोबाइल या कारों में GPS तकनीक का जमकर उपयोग हो रहा है। मोबाइल गुम जाये तो ऑफ़ करने के बाद भी पता चल जायेगा कि वह कहाँ है, इसी प्रकार कार ड्रायवर के लिये रास्ता ढूँढने, टक्कर से बचाने आदि के लिये GPS का बड़ा रोल प्रारम्भ हो चुका है।

यहाँ तक तो हुई हकीकत की बात, अब मैं अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाता हूँ। सभी जानते हैं कि आजकल “नैनो-टेक्नोलॉजी” (Nano-Technology) का जोर है, “नैनो” यानी कि “बहुत ही छोटी” और वैज्ञानिकों में हरेक वस्तु छोटी से छोटी बनाने का जुनून सवार है, और यह जगह की दृष्टि से उपयोगी भी है। ऐसे में मेरे मन में एक सवाल आता है कि क्या यह GPS माइक्रोचिप भी “नैनो” आकार में लगभग “तरल द्रव्य” के रूप में नहीं बनाई जा सकती? यह इतनी “नैनो” होना चाहिये कि माइक्रोचिप और उसका ट्रांसमीटर दोनों को मानव शरीर में फ़िट कर दिया जाये और सामने वाले को इसका पता तक न चले। भविष्य की तकनीक को देखते हुए यह बिलकुल सम्भव है। अब सोचिये सुरक्षा एजेंसियों को इस “नैनो तकनीक” का कितना फ़ायदा होगा। जैसे ही कोई अपराधी या आतंकवादी पकड़ा जाये, उसे “नार्को-टेस्ट” के नाम पर बंगलोर ले जाया जाये, पहले तो “नार्को-टेस्ट” में जितना उगलवाया जा सकता है, निकलवा लिया जाये, फ़िर जाते-जाते, उस आतंकवादी के शरीर में यह GPS आधारित ट्रांसमीटर इंजेक्शन के जरिये रोपित कर दिया जाये। हमारी महान न्याय व्यवस्था, भ्रष्ट राजनेताओं और “देशद्रोही” वकीलों की मेहरबानी से आज नहीं तो कल वे खतरनाक आतंकवादी छूट ही जायेंगे, उस वक्त उन पर खास निगरानी रखने में ये माइक्रोचिप बेहद उपयोगी सिद्ध होंगी। जैसे ही कोई आतंकवादी छूटेगा, वह अपने अन्य साथियों से मिलने जरूर जायेगा, तब पुलिस GPS के जरिये उनका ठिकाना आसानी से ढूंढ लेगी, और उन पुलिसवालों में से कोई “असली देशभक्त” निकल आया तो वहीं उनके ठिकाने पर हाथोंहाथ “फ़ैसला” हो जायेगा। यदि वह अपने पुराने ठिकाने पर नहीं भी जाता, या अपने साथियों से नहीं भी मिलता, या किसी तरह से उसे पता चल जाये कि वह GPS की निगरानी में है, तब भी पुलिस को कम से कम यह तो पता रहेगा कि आज की तारीख में वह आतंकवादी भारत में है या पाकिस्तान, नेपाल, मलेशिया में है। सुरक्षा के लिहाज से इतना भी कुछ कम नहीं है।

सवाल है कि क्या ऐसी तकनीक फ़िलहाल उपलब्ध है? यदि नहीं तो क्या वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं? और जैसा मैं सोच रहा हूँ, यदि वैसी कोई तकनीक मिल जाये तो सुरक्षा एजेंसियों का काम कितना आसान हो जाये… लेकिन शायद फ़िलहाल ऐसी कोई GPS माइक्रोचिप नहीं आती जिससे कि रोपित व्यक्ति की एकदम सही-सही स्थिति पता चल जाये। हो सकता है कि मेरा यह संदेश देश-विदेश के वैज्ञानिकों और वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों तक पहुँच जाये और वे इस पर प्रयोगों को जोर-शोर से आगे बढ़ायें… वैसे आपको ये आइडिया कैसा लगा?

अगले भाग में RFID तकनीक माइक्रोचिप के बारे में थोड़ा सा…

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5 Comments

  1. दीपक भारतदीप said,

    April 27, 2008 at 1:20 pm

    वाह! बहुत बढिया जानकारी आपने दी है!
    दीपक भारतदीप

  2. संजय बेंगाणी said,

    April 27, 2008 at 2:18 pm

    एक अन्य विचार उस दिन आया था, जब जसवंत साहब आतंकवादियों को लिए कंधार गये थे. क्या उन खतरनाक लोगो को छोड़ने से पहले ऐसा इंजेक्शन नहीं लगाया जा सकता था की उसका असर पाँच छह दिन बाद होता और बन्दे जन्नत की सैर पर निकल जाते. कोई धीमा जहर.

  3. राज भाटिय़ा said,

    April 27, 2008 at 7:39 pm

    सुरेश जी यह GPS सिस्टम सच मे बहुत कामजाब हे युरोप ओर कनाडा अमेरिका मे ९५% कारो मे यही सिस्टम लगा हे आप ने जहां भी जाना हे वहां का पता दे दे बस यह आप को पहले से ही दुरी, कितना समय लगए गा, सब कुछ बता देता हे ओर अब तो यह सिगरेट की डिब्बी से भी छोटा आ रहा हे, मोबाईल मे भी आ रहा हे बस इस का प्रोगराम इन्स्टाल करना पडता हे,जो आप ने जानकारी के साथ साथ सलह दी हे बिलकुल सही हे,धन्यवाद

  4. mahashakti said,

    April 28, 2008 at 1:37 am

    aapne bahut achchhi ray di hai. per ye bharat men nahi ho sakta hai karan hai ki yaha hitchintako ko yah baat nagvar gujregi.

  5. अरुण said,

    April 28, 2008 at 4:02 am

    अरे भाइ अभी अगर कुछ और नही हो सकता तो कम से कम उनको एड्स या ब्लड कैंसर जैसी बिमारिया तो इंजेक्शन के जरिये दी ही जा सकती है, लेकिन दिक्कत ये है कि फ़िर वो जेलो मे बंद होंगे और हमारे महान नेता तथा मानवाधिकार के प्रणेता सच्चर / महेश भट्ट जैसे लोग सरकारी खर्च पर उनका वीआई पी इलाज करायेगे ,जिससे देश को और ज्यादा भार उठाना पडेगा 🙂


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