एक साथी एक सपना …!!

एक साथी एक सपना साथ ले
हौसले संग भीड़ से संवाद के ।
०००००
हम चलें हैं हम चलेगे रोक सकते हों तो रोको
हथेली से तीर थामा क्या मिलेगा मीत सोचो ।
शब्द के ये सहज अनुनाद .. से …..!!
००००००
मन को तापस बना देने, लेके इक तारा चलूँ ।
फर्क क्या होगा जो मैं जीता या हारा चलूँ ……?
चकित हों शायद मेरे संवाद … से ……!!
००००००
चलो अपनी एक अंगुल वेदना हम भूल जाएं.
वो दु:खी है,संवेदना का, गीत उसको सुना आएं
कोई टूटे न कभी संताप से ……!!
००००००
v गिरीश बिल्लोरे मुकुल ९६९/ए,गेट न०. ०४ जबलपुर,म०प्र०

4 Comments

  1. mahendra mishra said,

    April 29, 2008 at 2:05 am

    bahut badhiya

  2. mahashakti said,

    April 29, 2008 at 4:17 am

    बेहतरीन लिखा है, शब्‍द शब्‍द में सघर्ष है।

  3. अभिषेक ओझा said,

    April 29, 2008 at 6:10 am

    बहुत अच्छी पंक्तियाँ !

  4. Anonymous said,

    April 29, 2008 at 8:26 am

    waha waha


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