>भारत बन रहा है मानव अंगों की मंडी

>Human Body Organ Smuggling
गत कुछ वर्षों मे हमारे भारत में कुछ वीभत्स प्रकार के अपराध सामने आये हैं, जिसमें सबसे प्रमुख है निठारी काण्ड जिसमें अपराधियों ने बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार करने के बाद उनके अंग (विशेषकर किडनी) निकाल लिये। दूसरा केस डॉ अमित का है जिसे “किडनी किंग(?)” कहा जा रहा है और जिसका नेटवर्क नेपाल तक फ़ैला हुआ है, और जिसके ग्राहकों में कई विशिष्ट व्यक्ति भी शामिल हैं।

सभी को याद होगा कि इंग्लैंड निवासी स्कारलेट की गोवा में हत्या हुई थी, और जब भारतीय पुलिस और शासकीय मशीनरी के हाथों उसकी मिट्टी के चीथड़े-चीथड़े करके उधर भेजा गया था तब पाया गया था कि उसके शरीर के कई महत्वपूर्ण अंग गायब थे और स्कारलेट की माँ ने आरोप लगाया था कि उन्हें भारत में निकाल लिया गया है। अकेले उत्तरप्रदेश से गत पाँच वर्षों में 12,000 से अधिक गुमशुदगी के मामले आये हैं, जिसमें से अधिकतर बच्चे हैं। इस प्रकार की खबरें लगातार आती रहती हैं कि अपराधी तत्व कब्रिस्तानों और श्मशानों में (जहाँ बच्चों को दफ़नाया जाता है) से मानव कंकाल, खोपड़ी और मजबूत हड्डियाँ आदि खोदकर ले जाते हैं जो ऊँची कीमतों में बिकती हैं।

एक और पक्ष देखिये, दिनों-दिन नये-नये मेडिकल कॉलेज खुलते जा रहे हैं, उनके पास विद्यार्थियों को “प्रैक्टिकल” करवाने के लिये पर्याप्त मात्रा में मृत शरीर नहीं हैं, मेडिकल कॉलेज लोगों से “देहदान” के लिये लगातार अपीलें करते रहते हैं, लेकिन इस मामले में जागरूकता अभी नहीं के बराबर है (क्योंकि अभी तो नेत्रदान के लिये ही जागरूकता का अभाव है)। अब भारत में घटी या घट रही इन सब घटनाओं को आपस में जोड़कर एक विशाल चित्र देखिये/सोचिये। क्या आपको नहीं लगता कि भारत में मानव अंगों की चोरी, तस्करी, विक्रय का एक विशाल रैकेट काम कर रहा है? छिटपुट मामले कभी-कभार पकड़ में आते हैं, लेकिन निठारी या डॉ अमित जैसे बड़े केस इक्का-दुक्का ही हैं। जाहिर है कि यह “धंधा” बेहद मुनाफ़े वाला है और मुर्दे शिकायत भी नहीं करते, ऐसे में अपराधियों, दलालों, गंदे दिमाग वाले डॉक्टरों और किडनी, आँखें, लीवर आदि अंगों के विदेशी ग्राहकों का एक खतरनाक गैंग चुपचाप अपना काम जारी रखे हुए है।

कई मामलों में जाँचकर्ताओं ने पाया है कि इस प्रकार के मानव अंगों के मुख्य खरीदार अरब देशों के अमीर शेख, कनाडा, जर्मनी और अमेरिका के बेहद धनी लोग होते हैं। भारत की गरीबी और सस्ते मेडिकल इन्फ़्रास्ट्रक्चर का भरपूर दोहन करके ये लोग किडनी, आँखें, दाँत आदि प्रत्यारोपित करवाते हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष एक लाख किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता है, जबकि आधिकारिक और कानूनी रूप से सिर्फ़ 5000 किडनियाँ बदली जा रही हैं, जाहिर है कि “माँग और पूर्ति” में भारी अन्तर है और इसका फ़ायदा “स्मगलर” उठाते हैं। (सन्दर्भ)

मजे की बात तो यह है कि आमतौर पर लोग सोचते हैं कि किडनी बदलना और कार का टायर बदलना लगभग एक जैसा ही है। लेकिन ऐसा है नहीं, क्योंकि किडनी लेने वाले और देने वाले का “परफ़ेक्ट मैच” होना बहुत ही मुश्किल होता है तथा ऑपरेशन के बाद दोनों व्यक्तियों की उचित देखभाल और लम्बा इलाज जरूरी होता है। स्मग्लिंग के इन मामलों में “लेनेवाले अमीर” की देखभाल तो बेहतर हो ही जाती है, मारा जाता है बेचारा गरीब देने वाला। जो भी पैसा उसे किडनी बेचकर मिलता है वह उसके अगले पाँच साल की दवाई में ही खर्च हो जाता है (यदि तब तक वह जीवित रहा तो)। “एम्स” के डॉक्टर संदीप गुलेरिया कहते हैं कि भारत में डायलिसिस की सुविधायें अभी भी बहुत कम जगहों पर हैं और बेहद महंगी हैं, इसलिये लोग किडनी बदलवाने का “आसान रास्ता”(?) अपनाते हैं।

इस “गंदे धंधे” की जड़ में जहाँ एक ओर गरीबी और अशिक्षा है, वहीं दूसरी ओर इन मामलों में भारत के लचर कानून भी हैं। कानूनी तौर पर किडनी दान करना भी एक बेहद जटिल प्रक्रिया है, जिसका फ़ायदा “दलाल” किस्म के डॉक्टर उठाते हैं। अब जाकर सरकार इस दिशा में कोई स्पष्ट कानून बनाने के बारे में विचार कर रही है, ताकि अंगदान को आसान बनाया जा सके। चीन में भी मानव अंग खरीदना-बेचना जुर्म माना जाता है, और इसके लिये कड़ी सजा के प्रावधान भी हैं, लेकिन 1984 में चीन सरकार ने संशोधन करके एक कानून पास किया है जिसके अनुसार आजीवन कारावास प्राप्त किसी कैदी, जिसके कोई भी रिश्तेदार मरणोपरांत उसका मृत देह लेने नहीं आयें, के अंग सरकार की अनुमति से निकाले जा सकते हैं और प्रत्यारोपित किये जा सकते हैं। हालांकि धांधली वहाँ भी कम नहीं है, क्योंकि चीन सरकार के अनुसार 2002 में 1060 कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई थी, जबकि एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार इनकी संख्या 15000 से ऊपर है। इन कैदियों के महत्वपूर्ण अंग सिंगापुर और हांगकांग के अमीर चीनियों को लगाये गये।


ऐसा कहा जाता है कि रूस, भारत, कुछ दक्षिण एशियाई देश और कुछ बेहद गरीब अफ़्रीकी देशों में यह धंधा जोरों पर है। इन देशों में मानव अंगों, किडनी, आँखों के कॉर्निया, लीवर, चमड़ी आदि निकालकर बिचौलियों के जरिये बेचे जाते हैं। हाइवे पर अकेले चलने वाले ड्रायवर, नशे में हुए एक्सीडेंट जिनमें लाश लावारिस घोषित हो जाती है, अकेले रहने वाले बूढ़े जिनकी असामयिक मौत हो जाती है, गरीब, मजबूर और कर्ज से दबे हुए लोग आदि इस माफ़िया के आसान शिकार होते हैं (मुम्बई, गुड़गाँव, चेन्नई चारों तरफ़ इस प्रकार के अपराध पकड़ में आ रहे हैं, हाल ही में उज्जैन में एक किडनी रैकेट पकड़ाया है जो डॉकटरों की मिलीभगत से गरीबों और मजदूरों को किडनी बेचने के लिये फ़ुसलाता था)। “ऑर्डर” पूरा करने के चक्कर में कई बार ये अपराधी अपहरण करने से भी नहीं हिचकते। विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययन के लिये शरीर के विभिन्न अंगों माँग बनी रहती है, इसी प्रकार आयरलैण्ड और जर्मनी आदि यूरोपीय देशों में टाँगों की लम्बी और मजबूत हड्डियाँ की फ़ार्मेसी कम्पनियाँ मंगवाती हैं जिन्हें दाँतों की “फ़िलिंग” के काम में लिया जाता है।

ऊपर दिये गये तथ्य निश्चित रूप से एक भयानक दुष्चक्र की ओर इशारा करते हैं… ऐसे में हमें अत्यन्त सावधान रहने की आवश्यकता है, किसी भी अन्जान जगह पर किसी अजनबी पर एकदम विश्वास न करें न ही उसके साथ अधिक समय अकेले रहें, बच्चों को रातों में अकेले सुनसान जगहों पर जाने से हतोत्साहित करें, यदि पार्टी में ज्यादा नशा हो गया हो तो किसी दोस्त को साथ लेकर ही देर रात को घर लौटें…

और इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया हुआ न मानें, क्योंकि धरती पर सबसे खतरनाक प्राणी है “इंसान”, जिससे सभी को सावधान रहना चाहिये…

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भारत बन रहा है मानव अंगों की मंडी

Human Body Organ Smuggling
गत कुछ वर्षों मे हमारे भारत में कुछ वीभत्स प्रकार के अपराध सामने आये हैं, जिसमें सबसे प्रमुख है निठारी काण्ड जिसमें अपराधियों ने बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार करने के बाद उनके अंग (विशेषकर किडनी) निकाल लिये। दूसरा केस डॉ अमित का है जिसे “किडनी किंग(?)” कहा जा रहा है और जिसका नेटवर्क नेपाल तक फ़ैला हुआ है, और जिसके ग्राहकों में कई विशिष्ट व्यक्ति भी शामिल हैं।

सभी को याद होगा कि इंग्लैंड निवासी स्कारलेट की गोवा में हत्या हुई थी, और जब भारतीय पुलिस और शासकीय मशीनरी के हाथों उसकी मिट्टी के चीथड़े-चीथड़े करके उधर भेजा गया था तब पाया गया था कि उसके शरीर के कई महत्वपूर्ण अंग गायब थे और स्कारलेट की माँ ने आरोप लगाया था कि उन्हें भारत में निकाल लिया गया है। अकेले उत्तरप्रदेश से गत पाँच वर्षों में 12,000 से अधिक गुमशुदगी के मामले आये हैं, जिसमें से अधिकतर बच्चे हैं। इस प्रकार की खबरें लगातार आती रहती हैं कि अपराधी तत्व कब्रिस्तानों और श्मशानों में (जहाँ बच्चों को दफ़नाया जाता है) से मानव कंकाल, खोपड़ी और मजबूत हड्डियाँ आदि खोदकर ले जाते हैं जो ऊँची कीमतों में बिकती हैं।

एक और पक्ष देखिये, दिनों-दिन नये-नये मेडिकल कॉलेज खुलते जा रहे हैं, उनके पास विद्यार्थियों को “प्रैक्टिकल” करवाने के लिये पर्याप्त मात्रा में मृत शरीर नहीं हैं, मेडिकल कॉलेज लोगों से “देहदान” के लिये लगातार अपीलें करते रहते हैं, लेकिन इस मामले में जागरूकता अभी नहीं के बराबर है (क्योंकि अभी तो नेत्रदान के लिये ही जागरूकता का अभाव है)। अब भारत में घटी या घट रही इन सब घटनाओं को आपस में जोड़कर एक विशाल चित्र देखिये/सोचिये। क्या आपको नहीं लगता कि भारत में मानव अंगों की चोरी, तस्करी, विक्रय का एक विशाल रैकेट काम कर रहा है? छिटपुट मामले कभी-कभार पकड़ में आते हैं, लेकिन निठारी या डॉ अमित जैसे बड़े केस इक्का-दुक्का ही हैं। जाहिर है कि यह “धंधा” बेहद मुनाफ़े वाला है और मुर्दे शिकायत भी नहीं करते, ऐसे में अपराधियों, दलालों, गंदे दिमाग वाले डॉक्टरों और किडनी, आँखें, लीवर आदि अंगों के विदेशी ग्राहकों का एक खतरनाक गैंग चुपचाप अपना काम जारी रखे हुए है।

कई मामलों में जाँचकर्ताओं ने पाया है कि इस प्रकार के मानव अंगों के मुख्य खरीदार अरब देशों के अमीर शेख, कनाडा, जर्मनी और अमेरिका के बेहद धनी लोग होते हैं। भारत की गरीबी और सस्ते मेडिकल इन्फ़्रास्ट्रक्चर का भरपूर दोहन करके ये लोग किडनी, आँखें, दाँत आदि प्रत्यारोपित करवाते हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष एक लाख किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता है, जबकि आधिकारिक और कानूनी रूप से सिर्फ़ 5000 किडनियाँ बदली जा रही हैं, जाहिर है कि “माँग और पूर्ति” में भारी अन्तर है और इसका फ़ायदा “स्मगलर” उठाते हैं। (सन्दर्भ)

मजे की बात तो यह है कि आमतौर पर लोग सोचते हैं कि किडनी बदलना और कार का टायर बदलना लगभग एक जैसा ही है। लेकिन ऐसा है नहीं, क्योंकि किडनी लेने वाले और देने वाले का “परफ़ेक्ट मैच” होना बहुत ही मुश्किल होता है तथा ऑपरेशन के बाद दोनों व्यक्तियों की उचित देखभाल और लम्बा इलाज जरूरी होता है। स्मग्लिंग के इन मामलों में “लेनेवाले अमीर” की देखभाल तो बेहतर हो ही जाती है, मारा जाता है बेचारा गरीब देने वाला। जो भी पैसा उसे किडनी बेचकर मिलता है वह उसके अगले पाँच साल की दवाई में ही खर्च हो जाता है (यदि तब तक वह जीवित रहा तो)। “एम्स” के डॉक्टर संदीप गुलेरिया कहते हैं कि भारत में डायलिसिस की सुविधायें अभी भी बहुत कम जगहों पर हैं और बेहद महंगी हैं, इसलिये लोग किडनी बदलवाने का “आसान रास्ता”(?) अपनाते हैं।

इस “गंदे धंधे” की जड़ में जहाँ एक ओर गरीबी और अशिक्षा है, वहीं दूसरी ओर इन मामलों में भारत के लचर कानून भी हैं। कानूनी तौर पर किडनी दान करना भी एक बेहद जटिल प्रक्रिया है, जिसका फ़ायदा “दलाल” किस्म के डॉक्टर उठाते हैं। अब जाकर सरकार इस दिशा में कोई स्पष्ट कानून बनाने के बारे में विचार कर रही है, ताकि अंगदान को आसान बनाया जा सके। चीन में भी मानव अंग खरीदना-बेचना जुर्म माना जाता है, और इसके लिये कड़ी सजा के प्रावधान भी हैं, लेकिन 1984 में चीन सरकार ने संशोधन करके एक कानून पास किया है जिसके अनुसार आजीवन कारावास प्राप्त किसी कैदी, जिसके कोई भी रिश्तेदार मरणोपरांत उसका मृत देह लेने नहीं आयें, के अंग सरकार की अनुमति से निकाले जा सकते हैं और प्रत्यारोपित किये जा सकते हैं। हालांकि धांधली वहाँ भी कम नहीं है, क्योंकि चीन सरकार के अनुसार 2002 में 1060 कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई थी, जबकि एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार इनकी संख्या 15000 से ऊपर है। इन कैदियों के महत्वपूर्ण अंग सिंगापुर और हांगकांग के अमीर चीनियों को लगाये गये।


ऐसा कहा जाता है कि रूस, भारत, कुछ दक्षिण एशियाई देश और कुछ बेहद गरीब अफ़्रीकी देशों में यह धंधा जोरों पर है। इन देशों में मानव अंगों, किडनी, आँखों के कॉर्निया, लीवर, चमड़ी आदि निकालकर बिचौलियों के जरिये बेचे जाते हैं। हाइवे पर अकेले चलने वाले ड्रायवर, नशे में हुए एक्सीडेंट जिनमें लाश लावारिस घोषित हो जाती है, अकेले रहने वाले बूढ़े जिनकी असामयिक मौत हो जाती है, गरीब, मजबूर और कर्ज से दबे हुए लोग आदि इस माफ़िया के आसान शिकार होते हैं (मुम्बई, गुड़गाँव, चेन्नई चारों तरफ़ इस प्रकार के अपराध पकड़ में आ रहे हैं, हाल ही में उज्जैन में एक किडनी रैकेट पकड़ाया है जो डॉकटरों की मिलीभगत से गरीबों और मजदूरों को किडनी बेचने के लिये फ़ुसलाता था)। “ऑर्डर” पूरा करने के चक्कर में कई बार ये अपराधी अपहरण करने से भी नहीं हिचकते। विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययन के लिये शरीर के विभिन्न अंगों माँग बनी रहती है, इसी प्रकार आयरलैण्ड और जर्मनी आदि यूरोपीय देशों में टाँगों की लम्बी और मजबूत हड्डियाँ की फ़ार्मेसी कम्पनियाँ मंगवाती हैं जिन्हें दाँतों की “फ़िलिंग” के काम में लिया जाता है।

ऊपर दिये गये तथ्य निश्चित रूप से एक भयानक दुष्चक्र की ओर इशारा करते हैं… ऐसे में हमें अत्यन्त सावधान रहने की आवश्यकता है, किसी भी अन्जान जगह पर किसी अजनबी पर एकदम विश्वास न करें न ही उसके साथ अधिक समय अकेले रहें, बच्चों को रातों में अकेले सुनसान जगहों पर जाने से हतोत्साहित करें, यदि पार्टी में ज्यादा नशा हो गया हो तो किसी दोस्त को साथ लेकर ही देर रात को घर लौटें…

और इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया हुआ न मानें, क्योंकि धरती पर सबसे खतरनाक प्राणी है “इंसान”, जिससे सभी को सावधान रहना चाहिये…

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Human Body Organ Smuggling
गत कुछ वर्षों मे हमारे भारत में कुछ वीभत्स प्रकार के अपराध सामने आये हैं, जिसमें सबसे प्रमुख है निठारी काण्ड जिसमें अपराधियों ने बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार करने के बाद उनके अंग (विशेषकर किडनी) निकाल लिये। दूसरा केस डॉ अमित का है जिसे “किडनी किंग(?)” कहा जा रहा है और जिसका नेटवर्क नेपाल तक फ़ैला हुआ है, और जिसके ग्राहकों में कई विशिष्ट व्यक्ति भी शामिल हैं।

सभी को याद होगा कि इंग्लैंड निवासी स्कारलेट की गोवा में हत्या हुई थी, और जब भारतीय पुलिस और शासकीय मशीनरी के हाथों उसकी मिट्टी के चीथड़े-चीथड़े करके उधर भेजा गया था तब पाया गया था कि उसके शरीर के कई महत्वपूर्ण अंग गायब थे और स्कारलेट की माँ ने आरोप लगाया था कि उन्हें भारत में निकाल लिया गया है। अकेले उत्तरप्रदेश से गत पाँच वर्षों में 12,000 से अधिक गुमशुदगी के मामले आये हैं, जिसमें से अधिकतर बच्चे हैं। इस प्रकार की खबरें लगातार आती रहती हैं कि अपराधी तत्व कब्रिस्तानों और श्मशानों में (जहाँ बच्चों को दफ़नाया जाता है) से मानव कंकाल, खोपड़ी और मजबूत हड्डियाँ आदि खोदकर ले जाते हैं जो ऊँची कीमतों में बिकती हैं।

एक और पक्ष देखिये, दिनों-दिन नये-नये मेडिकल कॉलेज खुलते जा रहे हैं, उनके पास विद्यार्थियों को “प्रैक्टिकल” करवाने के लिये पर्याप्त मात्रा में मृत शरीर नहीं हैं, मेडिकल कॉलेज लोगों से “देहदान” के लिये लगातार अपीलें करते रहते हैं, लेकिन इस मामले में जागरूकता अभी नहीं के बराबर है (क्योंकि अभी तो नेत्रदान के लिये ही जागरूकता का अभाव है)। अब भारत में घटी या घट रही इन सब घटनाओं को आपस में जोड़कर एक विशाल चित्र देखिये/सोचिये। क्या आपको नहीं लगता कि भारत में मानव अंगों की चोरी, तस्करी, विक्रय का एक विशाल रैकेट काम कर रहा है? छिटपुट मामले कभी-कभार पकड़ में आते हैं, लेकिन निठारी या डॉ अमित जैसे बड़े केस इक्का-दुक्का ही हैं। जाहिर है कि यह “धंधा” बेहद मुनाफ़े वाला है और मुर्दे शिकायत भी नहीं करते, ऐसे में अपराधियों, दलालों, गंदे दिमाग वाले डॉक्टरों और किडनी, आँखें, लीवर आदि अंगों के विदेशी ग्राहकों का एक खतरनाक गैंग चुपचाप अपना काम जारी रखे हुए है।

कई मामलों में जाँचकर्ताओं ने पाया है कि इस प्रकार के मानव अंगों के मुख्य खरीदार अरब देशों के अमीर शेख, कनाडा, जर्मनी और अमेरिका के बेहद धनी लोग होते हैं। भारत की गरीबी और सस्ते मेडिकल इन्फ़्रास्ट्रक्चर का भरपूर दोहन करके ये लोग किडनी, आँखें, दाँत आदि प्रत्यारोपित करवाते हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष एक लाख किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता है, जबकि आधिकारिक और कानूनी रूप से सिर्फ़ 5000 किडनियाँ बदली जा रही हैं, जाहिर है कि “माँग और पूर्ति” में भारी अन्तर है और इसका फ़ायदा “स्मगलर” उठाते हैं। (सन्दर्भ)

मजे की बात तो यह है कि आमतौर पर लोग सोचते हैं कि किडनी बदलना और कार का टायर बदलना लगभग एक जैसा ही है। लेकिन ऐसा है नहीं, क्योंकि किडनी लेने वाले और देने वाले का “परफ़ेक्ट मैच” होना बहुत ही मुश्किल होता है तथा ऑपरेशन के बाद दोनों व्यक्तियों की उचित देखभाल और लम्बा इलाज जरूरी होता है। स्मग्लिंग के इन मामलों में “लेनेवाले अमीर” की देखभाल तो बेहतर हो ही जाती है, मारा जाता है बेचारा गरीब देने वाला। जो भी पैसा उसे किडनी बेचकर मिलता है वह उसके अगले पाँच साल की दवाई में ही खर्च हो जाता है (यदि तब तक वह जीवित रहा तो)। “एम्स” के डॉक्टर संदीप गुलेरिया कहते हैं कि भारत में डायलिसिस की सुविधायें अभी भी बहुत कम जगहों पर हैं और बेहद महंगी हैं, इसलिये लोग किडनी बदलवाने का “आसान रास्ता”(?) अपनाते हैं।

इस “गंदे धंधे” की जड़ में जहाँ एक ओर गरीबी और अशिक्षा है, वहीं दूसरी ओर इन मामलों में भारत के लचर कानून भी हैं। कानूनी तौर पर किडनी दान करना भी एक बेहद जटिल प्रक्रिया है, जिसका फ़ायदा “दलाल” किस्म के डॉक्टर उठाते हैं। अब जाकर सरकार इस दिशा में कोई स्पष्ट कानून बनाने के बारे में विचार कर रही है, ताकि अंगदान को आसान बनाया जा सके। चीन में भी मानव अंग खरीदना-बेचना जुर्म माना जाता है, और इसके लिये कड़ी सजा के प्रावधान भी हैं, लेकिन 1984 में चीन सरकार ने संशोधन करके एक कानून पास किया है जिसके अनुसार आजीवन कारावास प्राप्त किसी कैदी, जिसके कोई भी रिश्तेदार मरणोपरांत उसका मृत देह लेने नहीं आयें, के अंग सरकार की अनुमति से निकाले जा सकते हैं और प्रत्यारोपित किये जा सकते हैं। हालांकि धांधली वहाँ भी कम नहीं है, क्योंकि चीन सरकार के अनुसार 2002 में 1060 कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई थी, जबकि एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार इनकी संख्या 15000 से ऊपर है। इन कैदियों के महत्वपूर्ण अंग सिंगापुर और हांगकांग के अमीर चीनियों को लगाये गये।


ऐसा कहा जाता है कि रूस, भारत, कुछ दक्षिण एशियाई देश और कुछ बेहद गरीब अफ़्रीकी देशों में यह धंधा जोरों पर है। इन देशों में मानव अंगों, किडनी, आँखों के कॉर्निया, लीवर, चमड़ी आदि निकालकर बिचौलियों के जरिये बेचे जाते हैं। हाइवे पर अकेले चलने वाले ड्रायवर, नशे में हुए एक्सीडेंट जिनमें लाश लावारिस घोषित हो जाती है, अकेले रहने वाले बूढ़े जिनकी असामयिक मौत हो जाती है, गरीब, मजबूर और कर्ज से दबे हुए लोग आदि इस माफ़िया के आसान शिकार होते हैं (मुम्बई, गुड़गाँव, चेन्नई चारों तरफ़ इस प्रकार के अपराध पकड़ में आ रहे हैं, हाल ही में उज्जैन में एक किडनी रैकेट पकड़ाया है जो डॉकटरों की मिलीभगत से गरीबों और मजदूरों को किडनी बेचने के लिये फ़ुसलाता था)। “ऑर्डर” पूरा करने के चक्कर में कई बार ये अपराधी अपहरण करने से भी नहीं हिचकते। विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययन के लिये शरीर के विभिन्न अंगों माँग बनी रहती है, इसी प्रकार आयरलैण्ड और जर्मनी आदि यूरोपीय देशों में टाँगों की लम्बी और मजबूत हड्डियाँ की फ़ार्मेसी कम्पनियाँ मंगवाती हैं जिन्हें दाँतों की “फ़िलिंग” के काम में लिया जाता है।

ऊपर दिये गये तथ्य निश्चित रूप से एक भयानक दुष्चक्र की ओर इशारा करते हैं… ऐसे में हमें अत्यन्त सावधान रहने की आवश्यकता है, किसी भी अन्जान जगह पर किसी अजनबी पर एकदम विश्वास न करें न ही उसके साथ अधिक समय अकेले रहें, बच्चों को रातों में अकेले सुनसान जगहों पर जाने से हतोत्साहित करें, यदि पार्टी में ज्यादा नशा हो गया हो तो किसी दोस्त को साथ लेकर ही देर रात को घर लौटें…

और इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया हुआ न मानें, क्योंकि धरती पर सबसे खतरनाक प्राणी है “इंसान”, जिससे सभी को सावधान रहना चाहिये…

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उड़ते पंक्षी

उड़ते पंक्षी इस जीवन में
दुनियां की सैर करते हैं।
ध्यान लगाकर उड़ते जाते,
अपनी मंजिल पर पहुंचा करते है॥

धरा अभूषण देख-देखकर
वहीं रैन बसेरा करतें है।
निश्छल भाव से उड़ते जाते,
नभ से बाते करतें है॥

सूर्य की तपती किरणों से
केवल ऊर्जा पाते जाते है।
जहां रैन बसेरा करना हो,
सुख-चैन की सांसे लेते जाते है॥

प्रेरणा देते पक्षी मानव को
तुम कर्म सदा करते जाओ।
पवित्र भाव के वशीभूत हो,
मानव की सेवा करते जाओ॥

प्रेम से मिलकर तुम रहना
कर्तव्य खूब निभाते जाना।
परस्पर बैर भाव मिटाकर,
श्रध्दा से शीश झुकाते जाना॥

पक्षी गगन में उड़ते जाते
स्वछन्द विचरण करते हैं।
कर्म को उद्देश्य मानकर,
हिमगिरी भी पार करते है॥

प्रेरणा मानव तुम भी लो
आलस्य को दूर भगाना है।
निष्ठा भाव मन में जगाकर,
कर्तव्य निष्ठ बन जाना है॥

उड़ते पंक्षी इस जीवन में
नई अनुभूति सदा करतें है।
आशा की किरणें पाकर ही,
निज कर्म सदा करतें है॥

>कौन कहता है भारत में पेट्रोल संकट है, गरीबी है?

>Crude Oil Price Crisis, Indian Politicians
अभी हाल ही में उज्जैन में देश की दो सर्वोच्च हस्तियाँ आईं (वैसे सर्वोच्च तो एक ही थी)। पहले आईं सोनिया गाँधी और उसके कुछ ही दिन बाद आईं राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल। जब से सुरेश पचौरी मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं वे लगातार इस कोशिश में थे कि सोनिया का एक दौरा मप्र में हो जाये, और आखिरकार वह हो गया। हम उज्जैनवासियों के लिये किसी वीवीवीआईपी का आगमन वैसे तो कोई खास बात नहीं, क्योंकि महाकालेश्वर के दर्शनों के लिये यहाँ नेता-अभिनेता-खिलाड़ी-उद्योगपति आते ही रहते हैं। वैसे तो हर विशिष्ट व्यक्ति चुपचाप आता है, महाकाल के दर्शन करता है और बगैर किसी “ऐरे-गैरे” से मिले, निकल लेता है, लेकिन इस बार सोनिया एक रैली को सम्बोधित करने आ रही थीं और वह उज्जैन में कम से कम तीन घंटे रुकने वाली थीं। बस फ़िर क्या था, कांग्रेसी तो कांग्रेसी, प्रशासनिक अधिकारियों को भी लगा कि “घर की शादी है”।

सोनिया गाँधी के आने-जाने का मार्ग तय किया गया, उनकी सुरक्षा के लिये अन्य जिलों से पुलिस बल, रैपिड एक्शन फ़ोर्स, एसपीजी, कमांडो आदि सभी आये, चूंकि वे महाकाल भी जाने वाली थीं, इसलिये ठेठ हवाई अड्डे और सर्किट हाउस से लेकर मन्दिर तक की रिहर्सल कम से कम दस-बीस बार की गई, आईजी-डीआईजी-एसपी के दौरे पर दौरे चले, कलेक्टर-कमिश्नर लगातार उज्जैन भर में घूमते-फ़िरते रहे… कहने का मतलब यह कि सैकड़ों सरकारी गाड़ियाँ, जीपें, ट्रक, डम्पर, नगर निगम के वाहन आदि लगातार आठ-दस दिन तक व्यवस्था में लगे रहे। हजारों लीटर पेट्रोल-डीजल सरकारी और आधिकारिक तौर पर फ़ूंका गया, खामख्वाह तमाम छोटे-बड़े अधिकारी इधर-उधर होते रहे, नगर निगम में किसी काम के लिये जाओ तो पता चलता था कि “साहब सोनियाजी की व्यवस्था में लगे हैं… दौरे पर हैं”, उठाई गाड़ी निकल गये दौरे पर, कोई देखने वाला नहीं, कोई सुनने वाला नहीं। मनमोहन सिंह गला फ़ाड़-फ़ाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि पेट्रोल में मितव्ययिता बरतो, देश संकट के दौर से गुजर रहा है, और इधर कारों का बड़ा भारी लवाजमा (शायद अंग्रेजी में इसे कारकेट कहते हैं) चला जा रहा है, बेवजह। सबसे पहले दो पायलट वाहन टां-टूं-टां-टूं… की तेज आवाज करते हुए (कि ऐ आम आदमी, ऐ कीड़े-मकोड़े रास्ते से हट), फ़िर उसके पीछे दस-बीस कारें, उसके बाद एक-दो एम्बुलेंस, एक फ़ायर ब्रिगेड, एक रैपिड एक्शन फ़ोर्स का ट्रक, और उसके बाद न जाने कितने ही छुटभैये नेता अपनी-अपनी गाड़ियों पर… आखिर यह सब क्या है? और किसके लिये है? जनता को क्या हासिल होगा इससे? कुछ नहीं, लेकिन नहीं साहब फ़िर भी लगे पड़े हैं, दौड़ाये जा रहे हैं गाड़ियाँ मानो इनके लिये मुफ़्त में ईराक से सीधे पाइप लाइन बिछी है घर तक, और मजे की बात तो यह कि इतनी सारी कवायद के बाद सोनिया ने रैली को सम्बोधित किया सिर्फ़ 13 मिनट, जिसमें उनका आना, जमाने भर का स्वागत-हार-फ़ूल-माला-गुलदस्ते-चरण वन्दन आदि भी शामिल था, और महान वचनों का सार क्या था? – कि राज्य सरकार निकम्मी और भ्रष्ट है, महंगाई रोकने में हमारा साथ नहीं दे रही, और आने वाले चुनावों के लिये कांग्रेसियों को तैयार रहना चाहिये। ये तीन बातें तो दिन में चार-चार बार इनके प्रवक्ता विभिन्न टीवी पर बकते रहते हैं, फ़िर नया क्या हुआ?

खैर यह तो हुआ सरकारी खर्चा, जिसकी पाई-पाई हम करदाताओं की जेब से गई है, अब बात करते हैं निजी पेट्रोल-डीजल फ़ूंक तमाशे की… चूंकि यह मध्यप्रदेश में चुनावी वर्ष है, इसलिये हरेक नेता विधानसभा टिकट के लिये अपना शक्ति प्रदर्शन सोनिया के सामने करना चाहता था। आसपास की तहसीलों, गाँवों से सैकड़ों वाहन भर-भर कर लोग लाये गये, जीपें, ट्रक, बस, ट्रैक्टर ट्रालियाँ जिसे जो मिला उसी में किसानों को भरकर लाया गया। मजे की बात तो यह थी कि जब कई गाड़ियाँ उज्जैन की सीमा के बाहर ही थीं, उस वक्त तक तो सोनिया अपना भाषण समाप्त करके जा चुकी थीं। ऐसे में विचारणीय है कि यह पेट्रोल-डीजल संकट असल में किसके लिये है, जाहिर है कि हम-आप जैसे लोगों के लिये जो अपनी जेब से पैसा देकर ईंधन भरवाते हैं। यदि सोनिया गाँधी का यह एक दौरा ही रद्द हो जाता तो देश का लाखों लीटर डीजल बचाया जा सकता था, लेकिन परवाह है किसे…

इसी प्रकार ठीक आठ दिन बाद राष्ट्रपति का दौरा हुआ, प्रशासन की फ़िर से वही कवायद, फ़िर वही रिहर्सल (तीन-तीन बार) सरकारी गाड़ियाँ बगैर सोचे-समझे दौड़ रही हैं, अधिकारी सारे काम-धाम छोड़कर व्यवस्था में लगे हैं, कार्यक्रम बनाये-बिगाड़े जा रहे हैं, कई जगह रंगाई-पुताई की गई, फ़र्जी डामरीकरण किया गया (जो पहली बारिश में ही धुल जायेगा), सर्किट हाउस के पर्दे बदलवाये गये, महंगी क्रॉकरी खरीदी गई (मुझे आज तक समझ में नहीं आया, कि हर प्रमुख हस्ती के दौरे के समय सर्किट हाउस में, और जब भी कोई मंत्री या बड़ा अधिकारी नये बंगले में शिफ़्ट होता है सबसे पहले पर्दे, क्रॉकरी और सोफ़े क्यों बदलवाता है… कोई बताये कि क्या इसमें कोई “छुआछूत कानून” का मामला बनता है?)। तात्पर्य यह कि लाखों रुपये एक-एक दौरे पर सरकारी और निजी तौर पर खर्च होते हैं, इस “बहती गंगा” में अधिकारी और कर्मचारी अपने हाथ-पाँव-मुँह सब धो लेते हैं।

यह देश लुंजपुंज लोकतन्त्र और सड़ी-गली न्याय व्यवस्था की बहुत भारी कीमत चुका रहा है। एक नये प्रकार के राजा-रजवाड़े पैदा हो गये हैं, जो आम आदमी से बहुत-बहुत दूर हैं (शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से)। पिछले वर्ष 11 लाख चौपहिया और 38 लाख दुपहिया वाहनों की बिक्री हुई, चारों तरफ़ हल्ला मचाया जा रहा है कि भारत में बहुत गरीबी है, लेकिन नेताओं के ऐसे भव्य दौरों, पेट्रोल-डीजल की खुलेआम बरबादी और गाड़ियों के नित नये जारी होते मॉडलों को देखकर लगता नहीं कि आज भी कई परिवार 40-50 रुपये रोजाना पर गुजर-बसर कर रहे हैं। लेकिन व्यवस्था ही कुछ ऐसी बनी हुई है कि कफ़न-दफ़न में भी पैसा खाने की जुगाड़ देखने वाले अधिकारी, बच्चों के “कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट” जारी कर रहे हैं, और जिनकी जगह जेल में होना चाहिये वे मंत्रीपद का उपभोग कर रहे हैं।

इस विद्रूप और विषम परिस्थिति में भी “पॉजिटिव” देखना हो तो वह यह है कि इस बहाने कम से कम कुछ सड़कों का, कुछ समय के लिये ही सही कायाकल्प हो जाता है, जहाँ-जहाँ ये वीवीआईपी लोग जाने वाले हों वहाँ की नालियाँ साफ़ हो जाती हैं, उस इलाके की स्ट्रीट लाईटें ठीक हो जाती हैं, उन एक-दो दिनों के लिये बिजली कटौती नहीं होती आदि-आदि, वरना…

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कौन कहता है भारत में पेट्रोल संकट है, गरीबी है?

Crude Oil Price Crisis, Indian Politicians
अभी हाल ही में उज्जैन में देश की दो सर्वोच्च हस्तियाँ आईं (वैसे सर्वोच्च तो एक ही थी)। पहले आईं सोनिया गाँधी और उसके कुछ ही दिन बाद आईं राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल। जब से सुरेश पचौरी मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं वे लगातार इस कोशिश में थे कि सोनिया का एक दौरा मप्र में हो जाये, और आखिरकार वह हो गया। हम उज्जैनवासियों के लिये किसी वीवीवीआईपी का आगमन वैसे तो कोई खास बात नहीं, क्योंकि महाकालेश्वर के दर्शनों के लिये यहाँ नेता-अभिनेता-खिलाड़ी-उद्योगपति आते ही रहते हैं। वैसे तो हर विशिष्ट व्यक्ति चुपचाप आता है, महाकाल के दर्शन करता है और बगैर किसी “ऐरे-गैरे” से मिले, निकल लेता है, लेकिन इस बार सोनिया एक रैली को सम्बोधित करने आ रही थीं और वह उज्जैन में कम से कम तीन घंटे रुकने वाली थीं। बस फ़िर क्या था, कांग्रेसी तो कांग्रेसी, प्रशासनिक अधिकारियों को भी लगा कि “घर की शादी है”।

सोनिया गाँधी के आने-जाने का मार्ग तय किया गया, उनकी सुरक्षा के लिये अन्य जिलों से पुलिस बल, रैपिड एक्शन फ़ोर्स, एसपीजी, कमांडो आदि सभी आये, चूंकि वे महाकाल भी जाने वाली थीं, इसलिये ठेठ हवाई अड्डे और सर्किट हाउस से लेकर मन्दिर तक की रिहर्सल कम से कम दस-बीस बार की गई, आईजी-डीआईजी-एसपी के दौरे पर दौरे चले, कलेक्टर-कमिश्नर लगातार उज्जैन भर में घूमते-फ़िरते रहे… कहने का मतलब यह कि सैकड़ों सरकारी गाड़ियाँ, जीपें, ट्रक, डम्पर, नगर निगम के वाहन आदि लगातार आठ-दस दिन तक व्यवस्था में लगे रहे। हजारों लीटर पेट्रोल-डीजल सरकारी और आधिकारिक तौर पर फ़ूंका गया, खामख्वाह तमाम छोटे-बड़े अधिकारी इधर-उधर होते रहे, नगर निगम में किसी काम के लिये जाओ तो पता चलता था कि “साहब सोनियाजी की व्यवस्था में लगे हैं… दौरे पर हैं”, उठाई गाड़ी निकल गये दौरे पर, कोई देखने वाला नहीं, कोई सुनने वाला नहीं। मनमोहन सिंह गला फ़ाड़-फ़ाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि पेट्रोल में मितव्ययिता बरतो, देश संकट के दौर से गुजर रहा है, और इधर कारों का बड़ा भारी लवाजमा (शायद अंग्रेजी में इसे कारकेट कहते हैं) चला जा रहा है, बेवजह। सबसे पहले दो पायलट वाहन टां-टूं-टां-टूं… की तेज आवाज करते हुए (कि ऐ आम आदमी, ऐ कीड़े-मकोड़े रास्ते से हट), फ़िर उसके पीछे दस-बीस कारें, उसके बाद एक-दो एम्बुलेंस, एक फ़ायर ब्रिगेड, एक रैपिड एक्शन फ़ोर्स का ट्रक, और उसके बाद न जाने कितने ही छुटभैये नेता अपनी-अपनी गाड़ियों पर… आखिर यह सब क्या है? और किसके लिये है? जनता को क्या हासिल होगा इससे? कुछ नहीं, लेकिन नहीं साहब फ़िर भी लगे पड़े हैं, दौड़ाये जा रहे हैं गाड़ियाँ मानो इनके लिये मुफ़्त में ईराक से सीधे पाइप लाइन बिछी है घर तक, और मजे की बात तो यह कि इतनी सारी कवायद के बाद सोनिया ने रैली को सम्बोधित किया सिर्फ़ 13 मिनट, जिसमें उनका आना, जमाने भर का स्वागत-हार-फ़ूल-माला-गुलदस्ते-चरण वन्दन आदि भी शामिल था, और महान वचनों का सार क्या था? – कि राज्य सरकार निकम्मी और भ्रष्ट है, महंगाई रोकने में हमारा साथ नहीं दे रही, और आने वाले चुनावों के लिये कांग्रेसियों को तैयार रहना चाहिये। ये तीन बातें तो दिन में चार-चार बार इनके प्रवक्ता विभिन्न टीवी पर बकते रहते हैं, फ़िर नया क्या हुआ?

खैर यह तो हुआ सरकारी खर्चा, जिसकी पाई-पाई हम करदाताओं की जेब से गई है, अब बात करते हैं निजी पेट्रोल-डीजल फ़ूंक तमाशे की… चूंकि यह मध्यप्रदेश में चुनावी वर्ष है, इसलिये हरेक नेता विधानसभा टिकट के लिये अपना शक्ति प्रदर्शन सोनिया के सामने करना चाहता था। आसपास की तहसीलों, गाँवों से सैकड़ों वाहन भर-भर कर लोग लाये गये, जीपें, ट्रक, बस, ट्रैक्टर ट्रालियाँ जिसे जो मिला उसी में किसानों को भरकर लाया गया। मजे की बात तो यह थी कि जब कई गाड़ियाँ उज्जैन की सीमा के बाहर ही थीं, उस वक्त तक तो सोनिया अपना भाषण समाप्त करके जा चुकी थीं। ऐसे में विचारणीय है कि यह पेट्रोल-डीजल संकट असल में किसके लिये है, जाहिर है कि हम-आप जैसे लोगों के लिये जो अपनी जेब से पैसा देकर ईंधन भरवाते हैं। यदि सोनिया गाँधी का यह एक दौरा ही रद्द हो जाता तो देश का लाखों लीटर डीजल बचाया जा सकता था, लेकिन परवाह है किसे…

इसी प्रकार ठीक आठ दिन बाद राष्ट्रपति का दौरा हुआ, प्रशासन की फ़िर से वही कवायद, फ़िर वही रिहर्सल (तीन-तीन बार) सरकारी गाड़ियाँ बगैर सोचे-समझे दौड़ रही हैं, अधिकारी सारे काम-धाम छोड़कर व्यवस्था में लगे हैं, कार्यक्रम बनाये-बिगाड़े जा रहे हैं, कई जगह रंगाई-पुताई की गई, फ़र्जी डामरीकरण किया गया (जो पहली बारिश में ही धुल जायेगा), सर्किट हाउस के पर्दे बदलवाये गये, महंगी क्रॉकरी खरीदी गई (मुझे आज तक समझ में नहीं आया, कि हर प्रमुख हस्ती के दौरे के समय सर्किट हाउस में, और जब भी कोई मंत्री या बड़ा अधिकारी नये बंगले में शिफ़्ट होता है सबसे पहले पर्दे, क्रॉकरी और सोफ़े क्यों बदलवाता है… कोई बताये कि क्या इसमें कोई “छुआछूत कानून” का मामला बनता है?)। तात्पर्य यह कि लाखों रुपये एक-एक दौरे पर सरकारी और निजी तौर पर खर्च होते हैं, इस “बहती गंगा” में अधिकारी और कर्मचारी अपने हाथ-पाँव-मुँह सब धो लेते हैं।

यह देश लुंजपुंज लोकतन्त्र और सड़ी-गली न्याय व्यवस्था की बहुत भारी कीमत चुका रहा है। एक नये प्रकार के राजा-रजवाड़े पैदा हो गये हैं, जो आम आदमी से बहुत-बहुत दूर हैं (शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से)। पिछले वर्ष 11 लाख चौपहिया और 38 लाख दुपहिया वाहनों की बिक्री हुई, चारों तरफ़ हल्ला मचाया जा रहा है कि भारत में बहुत गरीबी है, लेकिन नेताओं के ऐसे भव्य दौरों, पेट्रोल-डीजल की खुलेआम बरबादी और गाड़ियों के नित नये जारी होते मॉडलों को देखकर लगता नहीं कि आज भी कई परिवार 40-50 रुपये रोजाना पर गुजर-बसर कर रहे हैं। लेकिन व्यवस्था ही कुछ ऐसी बनी हुई है कि कफ़न-दफ़न में भी पैसा खाने की जुगाड़ देखने वाले अधिकारी, बच्चों के “कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट” जारी कर रहे हैं, और जिनकी जगह जेल में होना चाहिये वे मंत्रीपद का उपभोग कर रहे हैं।

इस विद्रूप और विषम परिस्थिति में भी “पॉजिटिव” देखना हो तो वह यह है कि इस बहाने कम से कम कुछ सड़कों का, कुछ समय के लिये ही सही कायाकल्प हो जाता है, जहाँ-जहाँ ये वीवीआईपी लोग जाने वाले हों वहाँ की नालियाँ साफ़ हो जाती हैं, उस इलाके की स्ट्रीट लाईटें ठीक हो जाती हैं, उन एक-दो दिनों के लिये बिजली कटौती नहीं होती आदि-आदि, वरना…

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इश्क

वफाओं को हमने चाहा,
वफाओं का साथ मिला।
इश्‍क की गलियो में भटकते रहे,
घर आये तो बाबू जी का लात मिला।।

 

घर लातों को तो हम झेल गये,
क्‍योकि यें अन्‍दर की बात थी।
पर इश्‍क का इन्‍ताहँ तब हुई जब,
गर्डेन में उसके भाई का हाथ पड़ा।।

 

इश्‍क का भूत हमनें देखा है,
जब हमारे बाबू जी ने उतारा था।
फिछली द‍ीवाली में पर,
जूतों चप्‍पलों से हमारा भूत उतारा था।।

 

इश्‍क हमारी फितरत में है,
इश्‍क हमारी नस-नस में है।
बाबू की की ध‍मकियों से हम नही डरेगें,
हम तो खुल्‍लम खुल्‍ला प्‍यार करेगें।।

 

अब आये चाहे उसका भाई,
चाहे साथ लेकर चला आये भौजाई।
इश्‍क किया है कोई चोरी नही की,
तुम्हारे बाप के सिवा किसी से सीना जोरी नही की।।

 

कई अरसें से कोई कविता नही लिखी, मित्र शिव ने कहा कि कुछ लिख डालों कुछ भाव नही मिल नही रहे थे किन्‍तु एक शब्द ने पूरी रचना तैयार कर दी, मै इसे कविता नही मानता हूँ, क्‍योकि यह कविता कोटि में नही है, आप चाहे जो कुछ भी इसे नाम दे सकतें है, यह बस किसी के मन को रखने के लिये लिखा गया।

>ऐ मेरे हमसफर: अभिनेत्री नूतन का गाया एक दुर्लभ गीत

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महफिल ब्लॉग शुरु करते समय मेरी इच्छा थी कि इसपर दुर्लभ गीत ही सुनायें जायें। इस कड़ी में मैने कई दुर्लभ और मधुर गीत सुनाये भी। इस कड़ी में अभिनेता दिलीपकुमार का गाया हुआ गीत लागी नाही छूटे भी शामिल था।

कुछ सालों पहले मैने मेरी पसंदीदा अभिनेत्री नूतन की आवाज में एक गीत सुना था। (जी हाँ नूतन ने भी कुछ गीत गाये हुए हैं) उस गीत को मैने बाद में बहुत खोजा पर वह कहीं नहीं मिला। कल परसों नेट पर आखिरकार वह गीत मिल ही गया। अब यह गीत मुझे जहाँ से मिला वह आप जब जानेंगे तो आश्चर्यचकित रह जायेंगे। ( इस का खुलासा एक दो दिन में ॥दस्तक॥ पर होगा)

तो लीजिये प्रस्तुत है नूतन जी का गाया हुआ गीत, यह गीत नूतनजी की माँ शोभना समर्थ द्वारा निर्देशित फिल्म छबीली 1960 का है। इस गीत को संगीतबद्ध किया है स्नेहल भाटकर ने।

लीजिये सुनिये।

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http://www.archive.org/audio/xspf_player.swf?autoload=true&playlist_url=http%3A%2F%2Fwww.archive.org%2Faudio%2Fxspf-maker.php%3Fidentifier%3DAiMereHumsafar%26playlist%3Dhttp%253A%252F%252Fwww.archive.org%252Fdownload%252FAiMereHumsafar%252Fformat%253DVBR%2BM3U

ऐ मेरे हम सफर
ले रोक अपनी नजर
ना देख इस कदर
ये दिल है बड़ा बेसबर

चांद तारों से पूछ ले
या किनारो से पूछ ले
दिल के मारो से पूछ ले
क्या हो रहा है असर

ले रोक अपनी नजर
ना देख इस कदर
ये दिल है बड़ा बेसबर

मुस्कुराती है चांदनी
छा जाती है खामोशी
गुनगुनाती है जिंदगी
ऐसे में हो कैसे गुजर

ले रोक अपनी नजर
ना देख इस कदर
ये दिल है बड़ा बेसबर

जब याद आयी घर की

जब याद आयी घर की,
घुट घुट कर रोने लगे।
गिरा कर कुछ बूँदे आसूँओं की,
हम चेहरा भिगोने लगे।
जब नींद टूटी सारी दुनियाँ की,
सिमट कर चादर में हम सोने लगे।
जब याद…………….
करके टुकड़े हजार दिल के,
बीती यादों को पिरोने लगे।
जब याद…………….
न छूटे दाग दिल के बारिस की बूँदों से,
लेकर आँसूओं का सहारा,हर दाग दिल का धोने लगे।
जब याद…………….
बिजलियों का खौफ़,
अब तो रहा ही नही।हो के तन्‍हा,
जिन्‍दगी हम ढ़ोने लगे।
जब याद…………….
ले लिया ग़म को,
अपने आगोश में,
जब कभी दूर अपनो से होने लगे।
जब याद…………….
खुल गई सारी जंजीरे,
बदन से हमारे,
जब धुये की तरह,ह
वा में खोने लगे।
जब याद…………….
Dated – 27 मार्च 2005 by प्रलयनाथ जालिम

बदस्‍तूर एक छोटी सी

बदस्‍तूर एक छोटी सी,

चिन्‍गारी को हवा दिया।

जो आग लगी सारे शहर में,

पानी से बुझा दिया।।

वो चिल्‍लाते रहे हमारी गली,

पर हमारी आवाज को।

सबने गुस्‍से में दबा दिया।।

बदस्‍तूर ……………

घुट-घुट कर जीना हमें भी आता है,

गर्मियों में पसीना हमें भी आता है।

पर क्‍या करें जब जब दी सलाह हमने,

अपने ही लोगों ने हर मर्तबा ठुकरा दिया।।

बदस्‍तूर ……………

हम शराब को पानी समझे,

हकीकत को कहानी समझे।

जो कोई परिन्‍दा लाया पैगाम,

उसको मुन्‍डेर से हमने ही उड़ा दिया।।

दिन भर जगाया महताब,

रात में सुला दिया।

बदस्‍तूर ……………

चिल्‍लाने से तकदीर नही बदलती,

हाथ कटने से तहरीर नही बदलती।

हमें याद थे सारे किस्से अतीत के,

एक एक करके सबको भुला दिया।।

हमने हर हक़ीकत के जाम में,

ज़हर मिला दिया।।

बदस्‍तूर ……………

Dated – 1 अप्रेल 2005 by प्रलयनाथ जालिम

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