प्रेमगीत

प्रेमगीत
बदल-बदल के लिबास पहनो,
जो दिल बदल दो तो वाह कर लूँ !!
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न तुम चुराओ नज़र कभी भी,
न कनखियों से निहारो मुझको !
मैं चाहता हूँ प्रिया सहज हो
जहाँ भी चाहो पुकारो मुझको !!
ये इश्क गरचे गुनाह है तो, है दिल की चाहत गुनाह कर लूँ…?
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कहो कि तुमको है इश्क़ हमसे
तो पहली बारिश में जा मैं भीगूँ,!
अगरचे तुम ने कहा नहीं कुछ
तो मैं ज़हर के पियाले पीलूँ !!
ज़हर को पीना गुनाह है तो,है दिल की चाहत गुनाह कर लूँ…?

3 Comments

  1. mehek said,

    June 11, 2008 at 5:46 am

    bahut khub

  2. mahashakti said,

    June 11, 2008 at 11:24 am

    अच्‍छी कविता है, बधाई

    अच्‍छे भावों के साथ काव्य रूप में पिरोया गया है बधाई

  3. गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said,

    June 11, 2008 at 12:49 pm

    Thank’s Mahashakti


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