कौन कहता है भारत में पेट्रोल संकट है, गरीबी है?

Crude Oil Price Crisis, Indian Politicians
अभी हाल ही में उज्जैन में देश की दो सर्वोच्च हस्तियाँ आईं (वैसे सर्वोच्च तो एक ही थी)। पहले आईं सोनिया गाँधी और उसके कुछ ही दिन बाद आईं राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल। जब से सुरेश पचौरी मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं वे लगातार इस कोशिश में थे कि सोनिया का एक दौरा मप्र में हो जाये, और आखिरकार वह हो गया। हम उज्जैनवासियों के लिये किसी वीवीवीआईपी का आगमन वैसे तो कोई खास बात नहीं, क्योंकि महाकालेश्वर के दर्शनों के लिये यहाँ नेता-अभिनेता-खिलाड़ी-उद्योगपति आते ही रहते हैं। वैसे तो हर विशिष्ट व्यक्ति चुपचाप आता है, महाकाल के दर्शन करता है और बगैर किसी “ऐरे-गैरे” से मिले, निकल लेता है, लेकिन इस बार सोनिया एक रैली को सम्बोधित करने आ रही थीं और वह उज्जैन में कम से कम तीन घंटे रुकने वाली थीं। बस फ़िर क्या था, कांग्रेसी तो कांग्रेसी, प्रशासनिक अधिकारियों को भी लगा कि “घर की शादी है”।

सोनिया गाँधी के आने-जाने का मार्ग तय किया गया, उनकी सुरक्षा के लिये अन्य जिलों से पुलिस बल, रैपिड एक्शन फ़ोर्स, एसपीजी, कमांडो आदि सभी आये, चूंकि वे महाकाल भी जाने वाली थीं, इसलिये ठेठ हवाई अड्डे और सर्किट हाउस से लेकर मन्दिर तक की रिहर्सल कम से कम दस-बीस बार की गई, आईजी-डीआईजी-एसपी के दौरे पर दौरे चले, कलेक्टर-कमिश्नर लगातार उज्जैन भर में घूमते-फ़िरते रहे… कहने का मतलब यह कि सैकड़ों सरकारी गाड़ियाँ, जीपें, ट्रक, डम्पर, नगर निगम के वाहन आदि लगातार आठ-दस दिन तक व्यवस्था में लगे रहे। हजारों लीटर पेट्रोल-डीजल सरकारी और आधिकारिक तौर पर फ़ूंका गया, खामख्वाह तमाम छोटे-बड़े अधिकारी इधर-उधर होते रहे, नगर निगम में किसी काम के लिये जाओ तो पता चलता था कि “साहब सोनियाजी की व्यवस्था में लगे हैं… दौरे पर हैं”, उठाई गाड़ी निकल गये दौरे पर, कोई देखने वाला नहीं, कोई सुनने वाला नहीं। मनमोहन सिंह गला फ़ाड़-फ़ाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि पेट्रोल में मितव्ययिता बरतो, देश संकट के दौर से गुजर रहा है, और इधर कारों का बड़ा भारी लवाजमा (शायद अंग्रेजी में इसे कारकेट कहते हैं) चला जा रहा है, बेवजह। सबसे पहले दो पायलट वाहन टां-टूं-टां-टूं… की तेज आवाज करते हुए (कि ऐ आम आदमी, ऐ कीड़े-मकोड़े रास्ते से हट), फ़िर उसके पीछे दस-बीस कारें, उसके बाद एक-दो एम्बुलेंस, एक फ़ायर ब्रिगेड, एक रैपिड एक्शन फ़ोर्स का ट्रक, और उसके बाद न जाने कितने ही छुटभैये नेता अपनी-अपनी गाड़ियों पर… आखिर यह सब क्या है? और किसके लिये है? जनता को क्या हासिल होगा इससे? कुछ नहीं, लेकिन नहीं साहब फ़िर भी लगे पड़े हैं, दौड़ाये जा रहे हैं गाड़ियाँ मानो इनके लिये मुफ़्त में ईराक से सीधे पाइप लाइन बिछी है घर तक, और मजे की बात तो यह कि इतनी सारी कवायद के बाद सोनिया ने रैली को सम्बोधित किया सिर्फ़ 13 मिनट, जिसमें उनका आना, जमाने भर का स्वागत-हार-फ़ूल-माला-गुलदस्ते-चरण वन्दन आदि भी शामिल था, और महान वचनों का सार क्या था? – कि राज्य सरकार निकम्मी और भ्रष्ट है, महंगाई रोकने में हमारा साथ नहीं दे रही, और आने वाले चुनावों के लिये कांग्रेसियों को तैयार रहना चाहिये। ये तीन बातें तो दिन में चार-चार बार इनके प्रवक्ता विभिन्न टीवी पर बकते रहते हैं, फ़िर नया क्या हुआ?

खैर यह तो हुआ सरकारी खर्चा, जिसकी पाई-पाई हम करदाताओं की जेब से गई है, अब बात करते हैं निजी पेट्रोल-डीजल फ़ूंक तमाशे की… चूंकि यह मध्यप्रदेश में चुनावी वर्ष है, इसलिये हरेक नेता विधानसभा टिकट के लिये अपना शक्ति प्रदर्शन सोनिया के सामने करना चाहता था। आसपास की तहसीलों, गाँवों से सैकड़ों वाहन भर-भर कर लोग लाये गये, जीपें, ट्रक, बस, ट्रैक्टर ट्रालियाँ जिसे जो मिला उसी में किसानों को भरकर लाया गया। मजे की बात तो यह थी कि जब कई गाड़ियाँ उज्जैन की सीमा के बाहर ही थीं, उस वक्त तक तो सोनिया अपना भाषण समाप्त करके जा चुकी थीं। ऐसे में विचारणीय है कि यह पेट्रोल-डीजल संकट असल में किसके लिये है, जाहिर है कि हम-आप जैसे लोगों के लिये जो अपनी जेब से पैसा देकर ईंधन भरवाते हैं। यदि सोनिया गाँधी का यह एक दौरा ही रद्द हो जाता तो देश का लाखों लीटर डीजल बचाया जा सकता था, लेकिन परवाह है किसे…

इसी प्रकार ठीक आठ दिन बाद राष्ट्रपति का दौरा हुआ, प्रशासन की फ़िर से वही कवायद, फ़िर वही रिहर्सल (तीन-तीन बार) सरकारी गाड़ियाँ बगैर सोचे-समझे दौड़ रही हैं, अधिकारी सारे काम-धाम छोड़कर व्यवस्था में लगे हैं, कार्यक्रम बनाये-बिगाड़े जा रहे हैं, कई जगह रंगाई-पुताई की गई, फ़र्जी डामरीकरण किया गया (जो पहली बारिश में ही धुल जायेगा), सर्किट हाउस के पर्दे बदलवाये गये, महंगी क्रॉकरी खरीदी गई (मुझे आज तक समझ में नहीं आया, कि हर प्रमुख हस्ती के दौरे के समय सर्किट हाउस में, और जब भी कोई मंत्री या बड़ा अधिकारी नये बंगले में शिफ़्ट होता है सबसे पहले पर्दे, क्रॉकरी और सोफ़े क्यों बदलवाता है… कोई बताये कि क्या इसमें कोई “छुआछूत कानून” का मामला बनता है?)। तात्पर्य यह कि लाखों रुपये एक-एक दौरे पर सरकारी और निजी तौर पर खर्च होते हैं, इस “बहती गंगा” में अधिकारी और कर्मचारी अपने हाथ-पाँव-मुँह सब धो लेते हैं।

यह देश लुंजपुंज लोकतन्त्र और सड़ी-गली न्याय व्यवस्था की बहुत भारी कीमत चुका रहा है। एक नये प्रकार के राजा-रजवाड़े पैदा हो गये हैं, जो आम आदमी से बहुत-बहुत दूर हैं (शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से)। पिछले वर्ष 11 लाख चौपहिया और 38 लाख दुपहिया वाहनों की बिक्री हुई, चारों तरफ़ हल्ला मचाया जा रहा है कि भारत में बहुत गरीबी है, लेकिन नेताओं के ऐसे भव्य दौरों, पेट्रोल-डीजल की खुलेआम बरबादी और गाड़ियों के नित नये जारी होते मॉडलों को देखकर लगता नहीं कि आज भी कई परिवार 40-50 रुपये रोजाना पर गुजर-बसर कर रहे हैं। लेकिन व्यवस्था ही कुछ ऐसी बनी हुई है कि कफ़न-दफ़न में भी पैसा खाने की जुगाड़ देखने वाले अधिकारी, बच्चों के “कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट” जारी कर रहे हैं, और जिनकी जगह जेल में होना चाहिये वे मंत्रीपद का उपभोग कर रहे हैं।

इस विद्रूप और विषम परिस्थिति में भी “पॉजिटिव” देखना हो तो वह यह है कि इस बहाने कम से कम कुछ सड़कों का, कुछ समय के लिये ही सही कायाकल्प हो जाता है, जहाँ-जहाँ ये वीवीआईपी लोग जाने वाले हों वहाँ की नालियाँ साफ़ हो जाती हैं, उस इलाके की स्ट्रीट लाईटें ठीक हो जाती हैं, उन एक-दो दिनों के लिये बिजली कटौती नहीं होती आदि-आदि, वरना…

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18 Comments

  1. राज भाटिय़ा said,

    June 27, 2008 at 12:52 pm

    गुलामो की पहचान केसे होगी अगर यह सब चोचले ना हो, देश मे अभी जयं चंदो की कमी नही हे, जो गोरो को अपना भगवान समझते हे, देश जाये भाड मे….

  2. राज भाटिय़ा said,

    June 27, 2008 at 12:52 pm

    गुलामो की पहचान केसे होगी अगर यह सब चोचले ना हो, देश मे अभी जयं चंदो की कमी नही हे, जो गोरो को अपना भगवान समझते हे, देश जाये भाड मे….

  3. June 27, 2008 at 12:52 pm

    गुलामो की पहचान केसे होगी अगर यह सब चोचले ना हो, देश मे अभी जयं चंदो की कमी नही हे, जो गोरो को अपना भगवान समझते हे, देश जाये भाड मे….

  4. संजय बेंगाणी said,

    June 27, 2008 at 2:28 pm

    लुंजपुंज लोकतन्त्र और सड़ी-गली न्याय व्यवस्था की बहुत भारी कीमत चुका रहे हैं….अब और कुछ कहने को रह ही कहाँ जाता है.

  5. संजय बेंगाणी said,

    June 27, 2008 at 2:28 pm

    लुंजपुंज लोकतन्त्र और सड़ी-गली न्याय व्यवस्था की बहुत भारी कीमत चुका रहे हैं….अब और कुछ कहने को रह ही कहाँ जाता है.

  6. June 27, 2008 at 2:28 pm

    लुंजपुंज लोकतन्त्र और सड़ी-गली न्याय व्यवस्था की बहुत भारी कीमत चुका रहे हैं….अब और कुछ कहने को रह ही कहाँ जाता है.

  7. निशाचर said,

    June 27, 2008 at 2:53 pm

    सच कहा …………..एक नया वर्ग राजे रजवाडों का पैदा हो गया है…………….. इसी सन्दर्भ में किसी ने कुछ वर्ष पूर्व कहा था कि स्वतंत्रता के पूर्व और बाद में भारत कि परिस्थितिओं में केवल ये ही अंतर आया है कि पहले कुछ सौ (राजवाडे) लोग करोडों लोगों पर शासन करते थे अब कुछ हज़ार (नेता) करोडों पर शासन करने लगे हैं…………..

  8. निशाचर said,

    June 27, 2008 at 2:53 pm

    सच कहा …………..एक नया वर्ग राजे रजवाडों का पैदा हो गया है…………….. इसी सन्दर्भ में किसी ने कुछ वर्ष पूर्व कहा था कि स्वतंत्रता के पूर्व और बाद में भारत कि परिस्थितिओं में केवल ये ही अंतर आया है कि पहले कुछ सौ (राजवाडे) लोग करोडों लोगों पर शासन करते थे अब कुछ हज़ार (नेता) करोडों पर शासन करने लगे हैं…………..

  9. June 27, 2008 at 2:53 pm

    सच कहा …………..एक नया वर्ग राजे रजवाडों का पैदा हो गया है…………….. इसी सन्दर्भ में किसी ने कुछ वर्ष पूर्व कहा था कि स्वतंत्रता के पूर्व और बाद में भारत कि परिस्थितिओं में केवल ये ही अंतर आया है कि पहले कुछ सौ (राजवाडे) लोग करोडों लोगों पर शासन करते थे अब कुछ हज़ार (नेता) करोडों पर शासन करने लगे हैं…………..

  10. भुवनेश शर्मा said,

    June 27, 2008 at 5:49 pm

    ऐसे न कहिए…आखिर आप कैसे उनका महान त्‍याग, देशसेवा के जज्‍बे को यूं ही भुला सकते हैं 🙂
    और ऐसी महान हस्तियों पर पेट्रोल जैसी मामूली चीज के हजारों टैंकर कुर्बान

    वैसे महारानी की रबर स्‍टांप परसों ग्‍वालियर आ रही है..कुछ सौ ड्रम उनकी सेवा में भी तो अर्पित किये जाएंगे

  11. भुवनेश शर्मा said,

    June 27, 2008 at 5:49 pm

    ऐसे न कहिए…आखिर आप कैसे उनका महान त्‍याग, देशसेवा के जज्‍बे को यूं ही भुला सकते हैं 🙂
    और ऐसी महान हस्तियों पर पेट्रोल जैसी मामूली चीज के हजारों टैंकर कुर्बान

    वैसे महारानी की रबर स्‍टांप परसों ग्‍वालियर आ रही है..कुछ सौ ड्रम उनकी सेवा में भी तो अर्पित किये जाएंगे

  12. June 27, 2008 at 5:49 pm

    ऐसे न कहिए…आखिर आप कैसे उनका महान त्‍याग, देशसेवा के जज्‍बे को यूं ही भुला सकते हैं :)और ऐसी महान हस्तियों पर पेट्रोल जैसी मामूली चीज के हजारों टैंकर कुर्बानवैसे महारानी की रबर स्‍टांप परसों ग्‍वालियर आ रही है..कुछ सौ ड्रम उनकी सेवा में भी तो अर्पित किये जाएंगे

  13. अरुण said,

    June 28, 2008 at 5:44 am

    आजाद भारत मे गुलाम प्रजा को महारानी दर्शन देने आ रही हो तो ये तो सामान्य बात है जी ,महंगाई अगर बढी है तो बडे लोगो के खर्च भी बढेगे ही ना और वो उठाना तो हमे आपको ही है इसमे उनका क्या दोष ? 🙂

  14. अरुण said,

    June 28, 2008 at 5:44 am

    आजाद भारत मे गुलाम प्रजा को महारानी दर्शन देने आ रही हो तो ये तो सामान्य बात है जी ,महंगाई अगर बढी है तो बडे लोगो के खर्च भी बढेगे ही ना और वो उठाना तो हमे आपको ही है इसमे उनका क्या दोष ? 🙂

  15. अरुण said,

    June 28, 2008 at 5:44 am

    आजाद भारत मे गुलाम प्रजा को महारानी दर्शन देने आ रही हो तो ये तो सामान्य बात है जी ,महंगाई अगर बढी है तो बडे लोगो के खर्च भी बढेगे ही ना और वो उठाना तो हमे आपको ही है इसमे उनका क्या दोष ? 🙂

  16. anup said,

    June 29, 2008 at 5:10 am

    Sonial Gandhi planned her visit to Ujjain, after her programme was made public congressmen forced her to add DARSHAN to MAHANKAAL temple.
    this was done later on.
    After her forced darshan to baba mahankaal next day mayawati took her support back from UPA govt..

  17. anup said,

    June 29, 2008 at 5:10 am

    Sonial Gandhi planned her visit to Ujjain, after her programme was made public congressmen forced her to add DARSHAN to MAHANKAAL temple.
    this was done later on.
    After her forced darshan to baba mahankaal next day mayawati took her support back from UPA govt..

  18. anup said,

    June 29, 2008 at 5:10 am

    Sonial Gandhi planned her visit to Ujjain, after her programme was made public congressmen forced her to add DARSHAN to MAHANKAAL temple.this was done later on.After her forced darshan to baba mahankaal next day mayawati took her support back from UPA govt..


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