मोब्लू आन्दोलन

अगर आप भी इनकी तरह मोब्लू बनना चाहते है तो देर किस बात की चिपके रहिये अपने मोबाईल से और शामिल हो जाइये मोब्लू की फेह्रित में।
भाग १

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>प्रधानमंत्री जी, “राष्ट्रीय शर्म” और भी हैं… हिन्दी ब्लॉगरों से सुनिये

>Kandhamal National Shame & Manmohan
विश्व के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे नेताओं में से एक हमारे देश के प्रधानमंत्री ने कंधमाल की घटनाओं को “राष्ट्रीय शर्म” घोषित किया है। इसके पहले एकाध बार ही “राष्ट्रीय शर्म” का नाम सुना था मैंने, जी हाँ “गुजरात दंगों” के दौरान… उस वक्त भी कई कांग्रेसियों ने और यहाँ तक कि वाजपेयी जी ने भी इसे राष्ट्रीय शर्म का नाम दिया था। सवाल उठता है कि एक देश के लिये “राष्ट्रीय शर्म” क्या होनी चाहिये? राष्ट्रीय शर्म के क्या मायने हैं? क्या इस परिभाषा के अनुसार पूरे देश को शर्म आना चाहिये, शर्म से डूब मरना चाहिये या शर्म के मारे सुधर जाना चाहिये, पश्चाताप करना चाहिये या माफ़ी माँगना चाहिये? जब राष्ट्रीय शर्म घोषित हुई है तो देश का कुछ तो फ़र्ज़ बनता ही है, जैसे कि राष्ट्रीय आपदा के दौरान हर देशवासी का फ़र्ज़ बनता है कि वह कुछ न कुछ आर्थिक सहयोग करे, उसी प्रकार देशवासी किसी राष्ट्रीय शर्म पर कम से कम मुँह लटका कर तो बैठ ही सकते हैं।

साठ साल में सिर्फ़ दो बार ही राष्ट्रीय शर्म आई? आईये अब एक लिस्ट बनाते हैं कि गुजरात और उड़ीसा के दंगों के अलावा क्या-क्या राष्ट्रीय शर्म हो सकती हैं, या होना चाहिये (लेकिन हैं नहीं)। इस सूची में आप भी अपनी तरफ़ से एक-दो शर्म डाल सकते हैं, जब शर्म की यह सूची बहुत लम्बी हो जायेगी तब इसे माननीय प्रधानमंत्री को भेजा जायेगा, इस सूची को अनुमोदन के लिये कांग्रेस और भाजपा के अन्य नेताओं को भी भेजा जायेगा और उनसे पूछा जायेगा कि इसमें से कोई मुद्दा “शर्म” की श्रेणी में आता है या नहीं? (बिलकुल निचोड़कर भेजा जायेगा साहब, क्योंकि तब तक यह लिस्ट “शर्म” से पानी-पानी होकर भीग चुकी होगी) –

1) जम्मू के तीन लाख से ज्यादा पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

2) गोधरा में कुछ हिन्दू जला दिये जाते हैं, तब किसी को शर्म नहीं आई?

3) आज़ादी के बाद 5000 से अधिक हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो चुके हैं (अधिकतर “सेकुलरों” की सरकारों में), यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

4) विश्व के कम भ्रष्ट देशों में भारत का स्थान बहुत-बहुत नीचे है और इसकी छवि एक “बिकाऊ लोगों वाले देश” के रूप में है, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

5) पिछले दस वर्षों में लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

6) 525 सांसदों में से दो तिहाई पर चोरी, हत्या, बलात्कार, लूटपाट और धोखाधड़ी के आरोप हैं, ये शर्म है या गर्व?

7) मुफ़्ती मुहम्मद और हज़रत बल के दबाव में आतंकवादी छोड़े जाते हैं, कंधार प्रकरण में घुटने टेकते हुए चार आतंकवादियों को छोड़ा गया, शर्म आती है या नहीं?

8) देश की 40 प्रतिशत से अधिक जनता गरीबी की रेखा के नीचे है, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

9) भारत नाम की “धर्मशाला” में लाखों लोग अवैध रूप से रह रहे हैं, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

10) सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद शाहबानो केस बदला, दिल्ली में अतिक्रमणकारियों को शह दी गई, जस्टिस रामास्वामी को बचाने के लिये सारे भ्रष्ट एक सुर में बोले थे, अफ़ज़ल गुरु, अबू सलेम, तेलगी सब मजे कर रहे हैं, कभी शर्म आई थी कि नहीं?

11) देश के करोड़ों बच्चों को दोनों समय का भोजन नहीं मिलता है, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

12) करोड़ों लोगों को प्राथमिक चिकित्सा तक उपलब्ध नहीं है, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

मनमोहन जी, माना कि अपने “बॉस” को खुश करने के लिये ईसाईयों पर हमले को आपने “राष्ट्रीय शर्म” बता दिया, लेकिन ज़रा कभी इस “शर्म की लिस्ट” पर भी एक निगाह डाल लीजियेगा…

तो ब्लॉगर बन्धुओं, अब क्या सब कुछ मैं ही लिखूंगा? कभी तो कोई पोस्ट “छटाँक” भर की लिखने दो यार… चलो अपनी-अपनी तरफ़ से “एक-एक बाल्टी शर्म” इस लिस्ट में डालो और “आज तक की सबसे ज़्यादा सेकुलर सरकार” (जी हाँ, क्या कहा विश्वास नहीं होता? अरे भाई, राष्ट्रपति हिन्दू, उपराष्ट्रपति मुस्लिम, प्रधानमंत्री सिख और इन सबका बॉस “ईसाई”, है ना महानतम सेकुलर) को भेजने का बन्दोबस्त करो…

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प्रधानमंत्री जी, “राष्ट्रीय शर्म” और भी हैं… हिन्दी ब्लॉगरों से सुनिये

Kandhamal National Shame & Manmohan
विश्व के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे नेताओं में से एक हमारे देश के प्रधानमंत्री ने कंधमाल की घटनाओं को “राष्ट्रीय शर्म” घोषित किया है। इसके पहले एकाध बार ही “राष्ट्रीय शर्म” का नाम सुना था मैंने, जी हाँ “गुजरात दंगों” के दौरान… उस वक्त भी कई कांग्रेसियों ने और यहाँ तक कि वाजपेयी जी ने भी इसे राष्ट्रीय शर्म का नाम दिया था। सवाल उठता है कि एक देश के लिये “राष्ट्रीय शर्म” क्या होनी चाहिये? राष्ट्रीय शर्म के क्या मायने हैं? क्या इस परिभाषा के अनुसार पूरे देश को शर्म आना चाहिये, शर्म से डूब मरना चाहिये या शर्म के मारे सुधर जाना चाहिये, पश्चाताप करना चाहिये या माफ़ी माँगना चाहिये? जब राष्ट्रीय शर्म घोषित हुई है तो देश का कुछ तो फ़र्ज़ बनता ही है, जैसे कि राष्ट्रीय आपदा के दौरान हर देशवासी का फ़र्ज़ बनता है कि वह कुछ न कुछ आर्थिक सहयोग करे, उसी प्रकार देशवासी किसी राष्ट्रीय शर्म पर कम से कम मुँह लटका कर तो बैठ ही सकते हैं।

साठ साल में सिर्फ़ दो बार ही राष्ट्रीय शर्म आई? आईये अब एक लिस्ट बनाते हैं कि गुजरात और उड़ीसा के दंगों के अलावा क्या-क्या राष्ट्रीय शर्म हो सकती हैं, या होना चाहिये (लेकिन हैं नहीं)। इस सूची में आप भी अपनी तरफ़ से एक-दो शर्म डाल सकते हैं, जब शर्म की यह सूची बहुत लम्बी हो जायेगी तब इसे माननीय प्रधानमंत्री को भेजा जायेगा, इस सूची को अनुमोदन के लिये कांग्रेस और भाजपा के अन्य नेताओं को भी भेजा जायेगा और उनसे पूछा जायेगा कि इसमें से कोई मुद्दा “शर्म” की श्रेणी में आता है या नहीं? (बिलकुल निचोड़कर भेजा जायेगा साहब, क्योंकि तब तक यह लिस्ट “शर्म” से पानी-पानी होकर भीग चुकी होगी) –

1) जम्मू के तीन लाख से ज्यादा पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

2) गोधरा में कुछ हिन्दू जला दिये जाते हैं, तब किसी को शर्म नहीं आई?

3) आज़ादी के बाद 5000 से अधिक हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो चुके हैं (अधिकतर “सेकुलरों” की सरकारों में), यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

4) विश्व के कम भ्रष्ट देशों में भारत का स्थान बहुत-बहुत नीचे है और इसकी छवि एक “बिकाऊ लोगों वाले देश” के रूप में है, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

5) पिछले दस वर्षों में लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

6) 525 सांसदों में से दो तिहाई पर चोरी, हत्या, बलात्कार, लूटपाट और धोखाधड़ी के आरोप हैं, ये शर्म है या गर्व?

7) मुफ़्ती मुहम्मद और हज़रत बल के दबाव में आतंकवादी छोड़े जाते हैं, कंधार प्रकरण में घुटने टेकते हुए चार आतंकवादियों को छोड़ा गया, शर्म आती है या नहीं?

8) देश की 40 प्रतिशत से अधिक जनता गरीबी की रेखा के नीचे है, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

9) भारत नाम की “धर्मशाला” में लाखों लोग अवैध रूप से रह रहे हैं, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

10) सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद शाहबानो केस बदला, दिल्ली में अतिक्रमणकारियों को शह दी गई, जस्टिस रामास्वामी को बचाने के लिये सारे भ्रष्ट एक सुर में बोले थे, अफ़ज़ल गुरु, अबू सलेम, तेलगी सब मजे कर रहे हैं, कभी शर्म आई थी कि नहीं?

11) देश के करोड़ों बच्चों को दोनों समय का भोजन नहीं मिलता है, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

12) करोड़ों लोगों को प्राथमिक चिकित्सा तक उपलब्ध नहीं है, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

मनमोहन जी, माना कि अपने “बॉस” को खुश करने के लिये ईसाईयों पर हमले को आपने “राष्ट्रीय शर्म” बता दिया, लेकिन ज़रा कभी इस “शर्म की लिस्ट” पर भी एक निगाह डाल लीजियेगा…

तो ब्लॉगर बन्धुओं, अब क्या सब कुछ मैं ही लिखूंगा? कभी तो कोई पोस्ट “छटाँक” भर की लिखने दो यार… चलो अपनी-अपनी तरफ़ से “एक-एक बाल्टी शर्म” इस लिस्ट में डालो और “आज तक की सबसे ज़्यादा सेकुलर सरकार” (जी हाँ, क्या कहा विश्वास नहीं होता? अरे भाई, राष्ट्रपति हिन्दू, उपराष्ट्रपति मुस्लिम, प्रधानमंत्री सिख और इन सबका बॉस “ईसाई”, है ना महानतम सेकुलर) को भेजने का बन्दोबस्त करो…

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क्या खूब लगती है

सुंदर सत्य

>ऐ “सेकुलर” उठ, जम्मू से ध्यान बँटाने के लिये कंधमाल चल…

>Secularism, Jammu Agitation & Kandhamal
इस देश में एक परम्परा स्थापित होती जा रही है कि यदि आप हिन्दू हैं और अपने धर्म के प्रति समर्पित हैं और उसकी रक्षा के लिये कुछ भी करते हैं तो आप “हिन्दू राष्ट्रवादी” कहलायेंगे, जिनकी तुलना “नाजियों” से की जायेगी, और यदि आप हिन्दू हैं और गला फ़ाड़-फ़ाड़कर हिन्दुत्व और हिन्दुओं के खिलाफ़ चिल्लायेंगे तो आप “महान सेकुलर” कहलायेंगे, यही बीते साठ सालों की भारत की राजनीतिक विडम्बना है, जो अब धीरे-धीरे वर्ग-संघर्ष का रूप लेती जा रही है। “सेकुलर” लोग जब RSS और उसके संगठनों की ओर एक उंगली उठाते हैं तो उनकी तरफ़ चार उंगलियाँ स्वयमेव उठ जाती हैं और ये चार उंगलियाँ स्वतन्त्रता के साठ वर्षों में की गई अनगिनत भूलों की गवाही होती हैं। खुद की गिरेबान में झाँकने की बजाय, “सेकुलरिज़्म” का बाना ओढ़े हुए ये “देशद्रोही” हर घटना के लिये RSS को जिम्मेदार ठहराकर मुक्त होना चाहते हैं। लेकिन यह ढोंग अब ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है, इन “सेकुलरों” की पोल खुलने लगी है।

ताज़ा मामला है उड़ीसा में कंधमाल जिले का, जहाँ हिंसा हुई है, कुछ लोग मारे गये हैं और कई घायल हुए हैं। घटना की जड़ में है 83 वर्षीय स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की कायरतापूर्ण हत्या। स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती उड़ीसा के जंगलों में आदिवासियों के बीच 1967 से लगातार काम कर रहे थे। स्वामीजी ने कई स्कूल, अस्पताल और मन्दिर बनवाये हैं, जो आदिवासियों के बीच शिक्षा का प्रसार करने में लगे हैं। सेकुलरों को खासतौर पर यह बताने की आवश्यकता है कि आज जो कंधमाल की स्थिति है वह रातोंरात नहीं बन गई। 23 दिसम्बर 2007 को इसकी शुरुआत की गई थी, जब ब्रहमनीगाँव में ईसाईयों ने गाँव में स्थित मन्दिर के सामने ही चर्च का एक गेट बनाने की कोशिश की। वहाँ के स्थानीय निवासियों और हिन्दुओं ने इस बात का विरोध किया क्योंकि चर्च का एक गेट पहले से ही मौजूद था, जो कि मन्दिर से दूर था, लेकिन फ़िर भी जबरन वहाँ एक गेट बना ही दिया गया, जिसके बाद ईसाई-हिन्दू संघर्ष की शुरुआत हुई, चूँकि उस गाँव में ईसाईयों की संख्या ज्यादा है, अतः हिन्दुओं को बलपूर्वक दबा दिया गया। जब लक्ष्मणानन्द सरस्वती जी उस गाँव में पहुँचे तो उनकी कार पर भी हिंसक ईसाईयों द्वारा हमला किया गया जिसमें उनके दो सहायक गम्भीर रूप से घायल हुए थे (यानी कि यह घटना लगभग आठ माह पुरानी है)। स्वामीजी उस समूचे इलाके में श्रद्धा और आदर के केन्द्र हैं, उनके हजारों समर्थकों से ईसाईयों के झगड़े शुरु हो गये। कई लोग इन झगड़ों में घायल हुए, कई मकान जलाये गये और सम्पत्ति को नुकसान पहुँचा। यहाँ तक तो स्थिति नियन्त्रण में थी, लेकिन जब ब्रहमनीगाँव, झिंझिरीगुड़ा, कटिंगिया, और गोदापुर इलाकों में हुए हमलों के आरोपियों की धरपकड़ की गई तो उसमें से अधिकतर नक्सली और माओवादी उग्रवादी थे, जिनका घनिष्ठ सम्बन्ध चर्च से था। इन उग्रवादियों से 20 रायफ़लें और अन्य घातक हथियार बरामद किये गये। यह सब बढ़ते-बढ़ते आखिर इसका अन्त बुजुर्ग स्वामी जी की हत्या में हुआ, क्योंकि माओवादियों और ईसाईयों की आँखों में खटकने वाले और उनके धर्मान्तरण के रास्ते में आने वाले वही एकमात्र व्यक्ति थे। “सेकुलरवादी” वहाँ चल रहे घटनाक्रम को अल्पसंख्यकों पर हमला बता रहे हैं, लेकिन स्वामी जी की हत्या के बारे में एक भी शब्द नहीं बोलते, यह है उनका दोगलापन।

उड़ीसा के गरीब/आदिवासी जिले हों, या मध्यप्रदेश का झाबुआ/धार जिले या गुजरात का डांग… सभी जगह लगभग एक ही घटनाक्रम होता है। पहले दूरदराज के आदिवासी इलाकों में एक छोटा सा चर्च खुलता है (ज़ाहिर है कि समाजसेवा के नाम पर), फ़िर एक स्कूल, एक अस्पताल और छोटी-मोटी संस्थायें। अगला कदम होता है गरीब और अनपढ़ लोगों के “ब्रेनवॉश” का, उन्हें धीरे-धीरे बरगलाने का और उनकी झोंपड़ियों में क्रॉस और यीशु की तस्वीरें लगवाने का, फ़िर मौका पाते ही धन का लालच देकर धर्मान्तरण करवाने का। यदि जनसंख्या के आँकड़े उठाकर देख लिये जायें तो पता चलेगा कि नागालैण्ड, मिजोरम जैसे प्रदेशों में इसी नीति के तहत धीरे-धीरे ईसाईयों की संख्या बढ़ाई गई, और अब जब वे बहुसंख्यक हो गये हैं तो हिन्दुओं को वहाँ से भगाने का काम शुरु हो गया है, यह तो हिन्दू ही है जो बहुसंख्यक होने के कारंण भारत में (और अल्पसंख्यक होने के कारण बांग्लादेश, पाकिस्तान, मलेशिया, फ़िजी आदि में) जूते खाता रहता है – Courtsey Congress। और सब हो चुकने के बाद “सेकुलर” मीडिया को सबसे आखिर में सारी गलती हिन्दूवादी संगठनों की ही दिखाई देती है।

हरेक घटना का ठीकरा संघ के माथे पर फ़ोड़ना “सेकुलरों” का प्रिय शगल बन गया है, उन घटनाओं के पीछे के इतिहास, प्रमुख घटनायें, यह सब क्यों हुआ? आदि पर मीडिया ध्यान नहीं देता है और सेकुलर उसे ध्यान देने भी नहीं देते, बस गला फ़ाड़कर हिन्दूवादियों के विरुद्ध चिल्लाने लगते हैं, लिखने लगते हैं, बकवास करने लगते हैं… जानबूझकर आधी-अधूरी जानकारी दी जाती है, ताकि जनता भ्रमित हो और संघ के खिलाफ़ एक माहौल तैयार किया जा सके, यही सब पिछले साठ साल से सुनियोजित ढंग से हो रहा है। जिन्होंने संघ को जाना नहीं, समझा नहीं, करीब से देखा तक नहीं, वे भी उसकी आलोचना में जुट जाते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता है कि झाबुआ और धार जैसे इलाकों में आदिवासियों से शराब छुड़वाने का महती काम संघ ने काफ़ी सफ़लतापूर्वक किया, उन्हें यह भी पता नहीं होता कि किसी भी राष्ट्रीय आपदा या बड़ी दुर्घटना के समय सबसे पहले संघ के कार्यकर्ता वहाँ पहुँचते हैं, न ही इस बात पर कभी विचार किया जाता है कि संघ के बौद्धिक या किसी अन्य कार्यक्रम में ब्राह्मण-दलित-ठाकुर एक साथ एक पंगत में बैठकर भोजन करते हैं, बड़े कार्यक्रमों में मंच पर नेताओं के लिये जगह नहीं होती, आडवाणी जैसे नेता तक ज़मीन पर बैठे देखे जा सकते हैं, पथ संचलन जैसे विशाल कार्यक्रमों के लिये भी प्रशासन की मदद नहीं के बराबर ली जाती है, हजारों कार्यकर्ताओं का भोजन घर-घर से व्यक्तिगत रूप से जुटा लिया जाता है… कभी विचार किया है कि आखिर ऐसा क्या आकर्षण है, वह कौन सी विचारधारा है जिसके कारण व्यक्ति आजीवन संघ से बँधा हुआ रहता है, यहाँ तक कि अविवाहित रहते हुए, घर-परिवार को छोड़कर कार्यकर्ता सुदूर गाँवों में जाते हैं, क्यों?

लेकिन यह सब समझने के लिये चाहिये होती है “दृष्टि”, जो कि “नेहरूवादी मोतियाबिन्द” के कारण आ नहीं सकती। जीवन भर सिर्फ़ अपना स्वार्थ देखने और चाटुकारिता करके परिवारवाद को बढ़ावा देने वाले लोग संघ को कभी नहीं समझ सकते, और संघ को इससे कोई शिकायत भी नहीं है, संघ को “मीडिया”(?) का सहारा लेने की भी कभी आवश्यकता महसूस नहीं हुई, बल्कि संघ खुद मीडिया से दूर रहता आया है। कभी देखा है कि दशहरा पथ संचलन के अलावा संघ का कोई कार्यक्रम मीडिया में आया हो? जबकि दो कौड़ी का नेता जो पैसा देकर थोड़ी सी भीड़ जुटाता है वह “हेडलाइन” पा जाता है।

बहरहाल, यहाँ पर मसला संघ का नहीं है, बल्कि बगैर सोचे-समझे, विवाद की पृष्ठभूमि समझे-जाने बिना टिप्पणी करने, विवाद-फ़साद करने, संघ के विरुद्ध धरने-प्रदर्शन-बयानबाजी करने की “सेकुलर मानसिकता” का है। राहुल गाँधी यूँ ही नहीं अपने उड़ीसा दौरे में अचानक सुरक्षा घेरा तोड़कर आदिवासियों के इलाके में रात बिताने चले जाते हैं। हमें अक्सर बताया जाता है कि “What an IDEA Sir जी”, यानी कि जो सफ़ेद चोंगे में है वही असल में समाजसेवी है, मानवतावादी है, साक्षात ईश्वर का अवतार है और बाकी के सभी लोग शोषण और अत्याचार कर रहे हैं। सेकुलरों को पहले खुद की तरफ़ उठी हुई चारों उंगलियों का इलाज करना चाहिये, फ़िर संघ की तरफ़ उठने वाली उंगली की ज़रूरत ही नहीं रह जायेगी। संदेश साफ़ है, पहले अपनी गिरेबान में झाँको, फ़िर दूसरों को उपदेश दो, साठ साल से जो “सेकुलर” “क्रिया” चल रही है, उसकी “प्रतिक्रिया” के लिये भी तैयार रहो… लेकिन होता यह है कि लालू-मुलायम जैसे खुलेआम सिमी की तारीफ़ करने वाले लोग इनके रहनुमा बने फ़िरते हैं और “सेकुलरिस्ट” इस पर ऐतराज़ भी नहीं करते।

जल्द ही वह दिन आयेगा जब “सेकुलर” शब्द सुनते ही व्यक्ति चप्पल उतारने को झुकेगा…

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ऐ “सेकुलर” उठ, जम्मू से ध्यान बँटाने के लिये कंधमाल चल…

Secularism, Jammu Agitation & Kandhamal
इस देश में एक परम्परा स्थापित होती जा रही है कि यदि आप हिन्दू हैं और अपने धर्म के प्रति समर्पित हैं और उसकी रक्षा के लिये कुछ भी करते हैं तो आप “हिन्दू राष्ट्रवादी” कहलायेंगे, जिनकी तुलना “नाजियों” से की जायेगी, और यदि आप हिन्दू हैं और गला फ़ाड़-फ़ाड़कर हिन्दुत्व और हिन्दुओं के खिलाफ़ चिल्लायेंगे तो आप “महान सेकुलर” कहलायेंगे, यही बीते साठ सालों की भारत की राजनीतिक विडम्बना है, जो अब धीरे-धीरे वर्ग-संघर्ष का रूप लेती जा रही है। “सेकुलर” लोग जब RSS और उसके संगठनों की ओर एक उंगली उठाते हैं तो उनकी तरफ़ चार उंगलियाँ स्वयमेव उठ जाती हैं और ये चार उंगलियाँ स्वतन्त्रता के साठ वर्षों में की गई अनगिनत भूलों की गवाही होती हैं। खुद की गिरेबान में झाँकने की बजाय, “सेकुलरिज़्म” का बाना ओढ़े हुए ये “देशद्रोही” हर घटना के लिये RSS को जिम्मेदार ठहराकर मुक्त होना चाहते हैं। लेकिन यह ढोंग अब ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है, इन “सेकुलरों” की पोल खुलने लगी है।

ताज़ा मामला है उड़ीसा में कंधमाल जिले का, जहाँ हिंसा हुई है, कुछ लोग मारे गये हैं और कई घायल हुए हैं। घटना की जड़ में है 83 वर्षीय स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की कायरतापूर्ण हत्या। स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती उड़ीसा के जंगलों में आदिवासियों के बीच 1967 से लगातार काम कर रहे थे। स्वामीजी ने कई स्कूल, अस्पताल और मन्दिर बनवाये हैं, जो आदिवासियों के बीच शिक्षा का प्रसार करने में लगे हैं। सेकुलरों को खासतौर पर यह बताने की आवश्यकता है कि आज जो कंधमाल की स्थिति है वह रातोंरात नहीं बन गई। 23 दिसम्बर 2007 को इसकी शुरुआत की गई थी, जब ब्रहमनीगाँव में ईसाईयों ने गाँव में स्थित मन्दिर के सामने ही चर्च का एक गेट बनाने की कोशिश की। वहाँ के स्थानीय निवासियों और हिन्दुओं ने इस बात का विरोध किया क्योंकि चर्च का एक गेट पहले से ही मौजूद था, जो कि मन्दिर से दूर था, लेकिन फ़िर भी जबरन वहाँ एक गेट बना ही दिया गया, जिसके बाद ईसाई-हिन्दू संघर्ष की शुरुआत हुई, चूँकि उस गाँव में ईसाईयों की संख्या ज्यादा है, अतः हिन्दुओं को बलपूर्वक दबा दिया गया। जब लक्ष्मणानन्द सरस्वती जी उस गाँव में पहुँचे तो उनकी कार पर भी हिंसक ईसाईयों द्वारा हमला किया गया जिसमें उनके दो सहायक गम्भीर रूप से घायल हुए थे (यानी कि यह घटना लगभग आठ माह पुरानी है)। स्वामीजी उस समूचे इलाके में श्रद्धा और आदर के केन्द्र हैं, उनके हजारों समर्थकों से ईसाईयों के झगड़े शुरु हो गये। कई लोग इन झगड़ों में घायल हुए, कई मकान जलाये गये और सम्पत्ति को नुकसान पहुँचा। यहाँ तक तो स्थिति नियन्त्रण में थी, लेकिन जब ब्रहमनीगाँव, झिंझिरीगुड़ा, कटिंगिया, और गोदापुर इलाकों में हुए हमलों के आरोपियों की धरपकड़ की गई तो उसमें से अधिकतर नक्सली और माओवादी उग्रवादी थे, जिनका घनिष्ठ सम्बन्ध चर्च से था। इन उग्रवादियों से 20 रायफ़लें और अन्य घातक हथियार बरामद किये गये। यह सब बढ़ते-बढ़ते आखिर इसका अन्त बुजुर्ग स्वामी जी की हत्या में हुआ, क्योंकि माओवादियों और ईसाईयों की आँखों में खटकने वाले और उनके धर्मान्तरण के रास्ते में आने वाले वही एकमात्र व्यक्ति थे। “सेकुलरवादी” वहाँ चल रहे घटनाक्रम को अल्पसंख्यकों पर हमला बता रहे हैं, लेकिन स्वामी जी की हत्या के बारे में एक भी शब्द नहीं बोलते, यह है उनका दोगलापन।

उड़ीसा के गरीब/आदिवासी जिले हों, या मध्यप्रदेश का झाबुआ/धार जिले या गुजरात का डांग… सभी जगह लगभग एक ही घटनाक्रम होता है। पहले दूरदराज के आदिवासी इलाकों में एक छोटा सा चर्च खुलता है (ज़ाहिर है कि समाजसेवा के नाम पर), फ़िर एक स्कूल, एक अस्पताल और छोटी-मोटी संस्थायें। अगला कदम होता है गरीब और अनपढ़ लोगों के “ब्रेनवॉश” का, उन्हें धीरे-धीरे बरगलाने का और उनकी झोंपड़ियों में क्रॉस और यीशु की तस्वीरें लगवाने का, फ़िर मौका पाते ही धन का लालच देकर धर्मान्तरण करवाने का। यदि जनसंख्या के आँकड़े उठाकर देख लिये जायें तो पता चलेगा कि नागालैण्ड, मिजोरम जैसे प्रदेशों में इसी नीति के तहत धीरे-धीरे ईसाईयों की संख्या बढ़ाई गई, और अब जब वे बहुसंख्यक हो गये हैं तो हिन्दुओं को वहाँ से भगाने का काम शुरु हो गया है, यह तो हिन्दू ही है जो बहुसंख्यक होने के कारंण भारत में (और अल्पसंख्यक होने के कारण बांग्लादेश, पाकिस्तान, मलेशिया, फ़िजी आदि में) जूते खाता रहता है – Courtsey Congress। और सब हो चुकने के बाद “सेकुलर” मीडिया को सबसे आखिर में सारी गलती हिन्दूवादी संगठनों की ही दिखाई देती है।

हरेक घटना का ठीकरा संघ के माथे पर फ़ोड़ना “सेकुलरों” का प्रिय शगल बन गया है, उन घटनाओं के पीछे के इतिहास, प्रमुख घटनायें, यह सब क्यों हुआ? आदि पर मीडिया ध्यान नहीं देता है और सेकुलर उसे ध्यान देने भी नहीं देते, बस गला फ़ाड़कर हिन्दूवादियों के विरुद्ध चिल्लाने लगते हैं, लिखने लगते हैं, बकवास करने लगते हैं… जानबूझकर आधी-अधूरी जानकारी दी जाती है, ताकि जनता भ्रमित हो और संघ के खिलाफ़ एक माहौल तैयार किया जा सके, यही सब पिछले साठ साल से सुनियोजित ढंग से हो रहा है। जिन्होंने संघ को जाना नहीं, समझा नहीं, करीब से देखा तक नहीं, वे भी उसकी आलोचना में जुट जाते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता है कि झाबुआ और धार जैसे इलाकों में आदिवासियों से शराब छुड़वाने का महती काम संघ ने काफ़ी सफ़लतापूर्वक किया, उन्हें यह भी पता नहीं होता कि किसी भी राष्ट्रीय आपदा या बड़ी दुर्घटना के समय सबसे पहले संघ के कार्यकर्ता वहाँ पहुँचते हैं, न ही इस बात पर कभी विचार किया जाता है कि संघ के बौद्धिक या किसी अन्य कार्यक्रम में ब्राह्मण-दलित-ठाकुर एक साथ एक पंगत में बैठकर भोजन करते हैं, बड़े कार्यक्रमों में मंच पर नेताओं के लिये जगह नहीं होती, आडवाणी जैसे नेता तक ज़मीन पर बैठे देखे जा सकते हैं, पथ संचलन जैसे विशाल कार्यक्रमों के लिये भी प्रशासन की मदद नहीं के बराबर ली जाती है, हजारों कार्यकर्ताओं का भोजन घर-घर से व्यक्तिगत रूप से जुटा लिया जाता है… कभी विचार किया है कि आखिर ऐसा क्या आकर्षण है, वह कौन सी विचारधारा है जिसके कारण व्यक्ति आजीवन संघ से बँधा हुआ रहता है, यहाँ तक कि अविवाहित रहते हुए, घर-परिवार को छोड़कर कार्यकर्ता सुदूर गाँवों में जाते हैं, क्यों?

लेकिन यह सब समझने के लिये चाहिये होती है “दृष्टि”, जो कि “नेहरूवादी मोतियाबिन्द” के कारण आ नहीं सकती। जीवन भर सिर्फ़ अपना स्वार्थ देखने और चाटुकारिता करके परिवारवाद को बढ़ावा देने वाले लोग संघ को कभी नहीं समझ सकते, और संघ को इससे कोई शिकायत भी नहीं है, संघ को “मीडिया”(?) का सहारा लेने की भी कभी आवश्यकता महसूस नहीं हुई, बल्कि संघ खुद मीडिया से दूर रहता आया है। कभी देखा है कि दशहरा पथ संचलन के अलावा संघ का कोई कार्यक्रम मीडिया में आया हो? जबकि दो कौड़ी का नेता जो पैसा देकर थोड़ी सी भीड़ जुटाता है वह “हेडलाइन” पा जाता है।

बहरहाल, यहाँ पर मसला संघ का नहीं है, बल्कि बगैर सोचे-समझे, विवाद की पृष्ठभूमि समझे-जाने बिना टिप्पणी करने, विवाद-फ़साद करने, संघ के विरुद्ध धरने-प्रदर्शन-बयानबाजी करने की “सेकुलर मानसिकता” का है। राहुल गाँधी यूँ ही नहीं अपने उड़ीसा दौरे में अचानक सुरक्षा घेरा तोड़कर आदिवासियों के इलाके में रात बिताने चले जाते हैं। हमें अक्सर बताया जाता है कि “What an IDEA Sir जी”, यानी कि जो सफ़ेद चोंगे में है वही असल में समाजसेवी है, मानवतावादी है, साक्षात ईश्वर का अवतार है और बाकी के सभी लोग शोषण और अत्याचार कर रहे हैं। सेकुलरों को पहले खुद की तरफ़ उठी हुई चारों उंगलियों का इलाज करना चाहिये, फ़िर संघ की तरफ़ उठने वाली उंगली की ज़रूरत ही नहीं रह जायेगी। संदेश साफ़ है, पहले अपनी गिरेबान में झाँको, फ़िर दूसरों को उपदेश दो, साठ साल से जो “सेकुलर” “क्रिया” चल रही है, उसकी “प्रतिक्रिया” के लिये भी तैयार रहो… लेकिन होता यह है कि लालू-मुलायम जैसे खुलेआम सिमी की तारीफ़ करने वाले लोग इनके रहनुमा बने फ़िरते हैं और “सेकुलरिस्ट” इस पर ऐतराज़ भी नहीं करते।

जल्द ही वह दिन आयेगा जब “सेकुलर” शब्द सुनते ही व्यक्ति चप्पल उतारने को झुकेगा…

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>फिल्म समीक्षा: अनुराधा 1960

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ग्रेटा के ब्लॉग पर हिन्दी फिल्मों की समीक्षा पढ़ने के बाद कई दिनों से मन में एक खयाल आ रहा था कि क्यों ना महफिल पर भी किसी फिल्म के बारे में कुछ लिखा जाये। कई दिनों की उधेड़बुन के बाद मुझे वह फिल्म मिल ही गई जिसके बारे में महफिल पर लिखा जा सकता है।यह फिल्म है ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्मित और निर्देशित फिल्म अनुराधा

अनुराधा मेरी सबसे पसंदीदा फिल्मों में से एक है। इस फिल्म में भारत रत्न पडित रविशंकर ने संगीत दिया था। फिल्म के मुख्य कलाकार थे बलराज साहनी, लीला नायडू, अभिभट्टाचार्य, असित सेन, नासिर हुसैन, हरि शिवदासानी और बाल कलाकार रानू। कथा और पटकथा है सचिन भौमिक की। संवाद राजेन्द्र सिंह बेदी ने लिखे हैं और गीतकार है शैलेन्द्र। फिल्म में गीत गाये हैं लता मंगेशकर, मन्ना डे और महेन्द्र कपूर ने।

इस फिल्म में हरेक कलाकार ने अपना जबरदस्त योगदान दिया है, लीला नायडू- बलराज साहनी का अभिनय, पं रविशंकर का संगीत निर्देशन, ऋषिकेश मुखर्जी का निर्देशन.. और हाँ लीला नायडू का सादगी भरा सौंदर्य भी| लीला नायडू के बोलने का तरीका भी एक अलग तरह का है जो फिल्म में उनके पात्र को ज्यादा प्रभावशाली बना रहा है। बच्ची रानू का हिन्दी बोलने का लहजा बंगाली है वह अनुराधा की बजाय ओनुराधा रॉय बोलती है।छोटी बच्ची ने भी बहुत शानदार अभिनय किया है।

1 Title

फिल्म का निर्देशन और संपादन बहुत ही शानदार है कहां फिल्म फ्लैश बेक में चली जाती है और कहां वर्तमान में आ जाती है पता ही नहीं चलता। इस बारे मे आगे लिखा गया है।
फिल्म के नायक है डॉ निर्मल चौधरी (बलराज साहनी) अपनी पत्नी अनुराधा (लीला नायडू) और प्यारी, चुलबुली और बड़बोली बिटिया रानू के साथ एक छोटे से गाँव में रहते हैं। डॉ निर्मल के जीवन का एक ही उद्धेश्य है गरीब मरीजों के सेवा करना और इस काम में दिन रात डूबे रहते हैं। उनके पास अपनी पत्नी के लिये बिल्कुल भी समय नहीं है। जब मरीजों को देखने जाते हैं तो अपनी बिटिया रानू (रानू) को भी साथ ले जाते हैं और घर में रह जाती है अकेली अनुराधा।

गाँव में मरीजो को देखकर मुफ्त में दवा देते हुए डॉ निर्मल, मरीज कह रहा है डॉ साहब आप देवता है.. और रानू पूछती है क्यों चाचा फीस नहीं दोगे? निर्मल बच्ची को डपट देते हैं।

2

शरारती बच्चे डॉ निर्मल की सुई ( इंजेक्शन) से बचने के लिये डॉ की साइकिल के पहिये ओ सुई लगा देते हैं, और बेचारे डॉ बच्ची को गोद में उठाये पैदल घर पहुंचते हैं यहाँ अनु अकेली दोनों के इंतजार में बैचेन हो रही है। अपना समय काटने के लिये अनु घर में कभी इधर, कभी उधर घूमती रहती है। किताबें पढ़ती रहती है पर कब तक?

अकेली, किताबें पढ़कर अपना समय काटती अनुराधा।

3

पति आते ही गाँव की मरीजों की , मरीजों के सुख दुख: की बातें करने लगते हैं तो अनु पूछ बैठती है सबकी बीमारी देखते हो कभी मेरी बीमारी के बारे में भी सोचा है? डॉ पूछते हैं तुम्हे क्या बीमारी हुई है? तो अनु कहती है मैं दिन भर अकेली बिठी रहती हूँ, बातचीत करूं तो किससे दीवारों से?

4

अनु अनुरोध करती है कि आज पूनम का उत्सव है और गाँव वालों ने न्यौता दिया है आज शाम जल्दी घर आ जाना..इसी बहाने मैं भी तुम्हारे साथ दो घड़ी गुजार लूंगी!

अनु अति उत्साहित वही साड़ी पहनती है जिसके खरीदते समय अनु और डॉ निर्मल पहली बार मिले थे, और डॉ की पसंद पर अनु ने वह साड़ी खरीदी थी। पर निर्मल एक तो समय पर नहीं आ पाते और फिर आते ही अपनी प्रयोगशाला में काम में जुट जाते हैं। अनु पूछती है आप आज मुझे पूनम के उत्सव पर ले जाने वाले थे , निर्मल अनु को समझा देते हैं कि आज नहीं और कभी।

4.5

यहां अनु प्रयोगशाला की खिड़की से गाँव वालों का संगीत सुन रही है तो निर्मल उसे कहते हैं ” अनु तुम यह खिड़की बंद कर दो तुम्हारा यह संगीत मुझे डिस्टर्ब करता है।”

10

अनु के सर पर जैसे गाज गिरती है, इसी संगीत की वजह से तो अनु और निर्मल मिले थे, इसी संगीत के लिये निर्मल उसे चाहने लगे थे। यहाँ फिल्म फ्लैश बैक में चलती है अनु को वे दिन याद आने लगते हैं जब अनु और डॉ पहली बार मिले थे और….

अनुराधा रॉय एक सुप्रसिद्ध रेडियो आर्टिस्ट ( गायिका) है और नाचती भी बहुत अच्छा है। संयोग से अनुराधा के भाई आशिम निर्मल के मित्र भी है। एक संगीत कार्यक्रम में अनुराधा निर्मल की पसंद की हुई साड़ी पहन कर नृत्य पेश करती है। उस कार्यक्रम में निर्मल भी आये हुए हैं। समापन के बाद साड़ी में पाँव उलझ जाने की वजह से अनुराधा गिर जाती है और बेहोश हो जाती है। पाँव में मोच आ जाने और दर्द की की वजह से डॉ का अनु के घर में आना जान आ शुरु होता है और उपचार के दौरान धीरे धीरे दोनों के मन में प्रेम के अंकुर फूटने लगते हैं।

अनु का उपचार करते हुए डॉ. निर्मल

5

और आखिरकार दोनों प्रेम करने लगते हैं और अनु इस फिल्म का सबसे लोकप्रिय गीत गाती है “जाने कैसे सपनों में खो गई अखियां मैं तो हूं जागी मेरी सो गई अखियां”

8

इस बीच अनु के पिताजी के दोस्त के बेटे दीपक (अभि भट्टाचार्य) विदेश में अपनी पढ़ाई पूरी कर वापस आते हैं। दीपक अनु को चाहते भी हैं। अनु के पिताजी चाहते हैं दोनों का विवाह हो जाये परन्तु अनु दीपक को साफ साफ कह देती है कि वो किसी और को चाहती है, और उसी से विवाह करना चाहती है।

9

अनु अपने पिताजीको बता देती है कि वह डॉक्टर से शादी करना चाहती है पर पिताजी नहीं मानते और आखिरकार अनु घर छोड़ देती है और आखिरकार निर्मल और अनुराधा शादी के बंधन में बंध जाते हैं।

11

परन्तु अनु के पिताजी अनु और निर्मल के विवाह को अस्वीकार कर देते हैं।

12

इस फिल्म का संपादन बहुत ही कमाल का है, शादी की पहली रात निर्मल अपनी सेज सजाने के लिये फूल खरीदने बाजार गये हैं और अनु अपने रिकॉर्ड पर गाना सुन रही है जाने कैसे सपनों में खो गई अखिंया.. और पति का इन्तजार कर रही है, जब दरवाजा खुलता है तो कहानी अचानक ही वर्तमान में आती है।

यहां अनु अपनी बच्ची को वही गीत सुना रही है… बच्ची चिल्लाती है माँ पिताजी आ गये पिताजी आ गये.. निर्मल रिकॉर्ड पर अटकी सुई को देख कर कहते हैं “बन्द करो ना इसे गाना तो खत्म हो गया है”, तब अनु कहती है “हाँ गाना तो खत्म हो गया.. अनु के ये शब्द और आँखें इतने ही शब्दों में बहुत कुछ कह जाते है”।

तकनीक का इतना सुंदर उपयोग कि दर्शक कहानी में इतने जुड़ जाते हैं कि उन्हें यह पता ही नहीं चलता कि इस दृश्य के पहले कहानी फ्लैश बैक में चल रही थी।

निर्मल एक बार फिर किताबों में उलझ जाते हैं और अनु खाना खाने को कहती है और हाथ से किताब ले लेती है तो निर्मल को गुस्सा आ जाता है।

यह क्या मजाक है, मेरी किताब क्यों छीन ली? देखती नहीं मैं काम कर रहा हूँ, अगर इतनी ही भूख है तो तुम खाना खा लो, मैं बाद में खा लूंगा।

13

यहाँ अनु घर का सौदा लेने गई हुई है और बिटिया रानू घर में अकेली है, तभी अनु के पिताजी शहर से आते हैं यहां रानू उनसे बहुत बातें करती है। यहां नाना- दोहिती के संवाद बहुत मजेदार है।

अपने बेटे और बेटी ( खिलौने) से मिलवाती रानू- “यह है चून्नू मेरा बेटा और मुन्नी मेरा बेटी”

14

निर्मल से मिलते हुए अनु के पिताजी ” मुझे माफ कर दो बेटा”

15

यहाँ कहानी में नया मोड़ आता है। दीपक एक मित्र सीमा के साथ सैर पर निकला है। यहाँ दीपक की मित्र उससे उसकी उदासी का कारण बहुत पूछती है और अचानक गाड़ी संभल नहीं पाती और दुर्घटना हो जाती है जिसमें सीमा बहुत ज्यादा घायल हो जाती है और दीपक उससे थोड़ा कम।

16

निर्मल सीमा को जमींदार के घर भेज देते हैं यहां और दीपक को अपने घर पर ले आते हैं। दीपक को छोड़ निर्मल, सीमा का ऑपरेशन करने के लिये जमींदार के यहां चले जाते हैं। यहां अनु, घायल दीपक को देखकर चौंक जाती है।17

जब निर्मल घर आते हैं तो यह जान कर आश्चर्य चकित रह जाते हैं कि अनु और दीपक एक दूसरे को जानते हैं।

“क्या तुम एक दूसरे को जानते हो?”

18

यहां दीपक अनु को बहुत अनुरोध करता है कि वह एक गाना गाये पर अनु नहीं मानती। बाद में निर्मल के कहने पर अनु गाना गाती है ” कैसे दिन बीते कैसे बीती रतियाँ पिया जाने ना”

19

दीपक समझ जाता है कि कुछ ना कुछ गड़बड़ है। वह अनु को बहुत डाँटता है कि क्यों तुमने अपनी प्रतिभा का गला घोंटा?

20

दीपक समझाता है कि लौट चलो अपने पिताजी के पास। अब भी देर नहीं हुई। अनु नाराज होती है।

21

निर्मल पूछते हैं कि दीपक को दवाई क्यों नहीं दी? तो अनु गुस्से में कह देती है मैं तुम्हारी बीबी हूँ कम्पाउंडर नहीं।22

निर्मल एक बार फिर अनु को समझा बुझा देते हैं और उस दिन विवाह की वर्षगांठ होने पर अनु से एक बार फिर जल्दी लौटने का वादा करते हैं और एक बार फिर समय पर लौट नहीं पाते अनु जब पूछती है कि एक दिन भी तुम समय पर घर नहीं आ सकते तो निर्मल कहते हैं

“तुम समझती हो मैं वहां खेलने जाता हूँ, मैं एक डॉक्टर हूं मेरी कुछ जिम्मेदारियाँ है?

24

आखिरकार अनु का दिल टूट जाता है और वह दीपक से कहती है ” तुम सच कहते थे मैने अपनी जिंदगी बर्बाद करली, मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूँ।”

25

यहाँ निर्देशक की समझदारी देखिये अनु के मुँह से यह बात सुन कर दीपक कहता है कि “अब मेरा इस घर में रहना उचित नहीं होगा, मैं डाक बंगले में ठहर जाता हूँ, शाम को तुम्हे लेने आ जाऊंगा।

गाँव में जमींदार के यहां सीमा के पिताजी और उनके मित्र कर्नल (डॉक्टर ) त्रिवेदी आये हुए हैं। वे सीमा की पट्टियाँ खुलवा कर जब उसे देखते हैं तो चकित रह जाते हैं। क्यों कि निर्मल ने सीमा की प्लास्टिक सर्जरी कर दी थी और गाल पर निशान गायब कर दिया था। कर्नम त्रिवेदी को आश्चर्य इस बात का होता है कि इतने छोटे गाँव में निर्मल ने यह सब किया कैसे?

वे निर्मल पर बनावटी गुस्सा करते हैं तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? ओपरेशन करने की! बाद में कर्नल त्रिवेदी, निर्मल की बहुत तारीफ करते हैं। उन्हें जब पता चलता है कि निर्मल की एक छोटी सी प्रयोगशाला भी है तो वे निर्मल से कहते हैं वे उसकी प्रयोगशाला देखना चाहेंगे और हाँ उसके घर शाम का खाना भी खायेंगे।

26

निर्मल अति उत्साहित घर आकर अपनी बात बताने लगते हैं, अनु कुछ कहने लगती है तो उसे रोक देते हैं तो अनु पूछ बैठती है ” हमेशा अपनी ही सुनाओगे, कभी मेरी नहीं सुनोगे? यहाँ अनु, निमर्ल को अपना फैसला सुना देती है कि वो शाम को दीपक के साथ हमेशा के लिये अपने पिता के घर जा रही है।

27

निर्मल बहुत आहत होता है पर अनु से अनुरोध करता है कि जहां दस साल निकाले वहां एक दिन के लिये और रुक जाये क्यों कि कर्नल त्रिवेदी खाने पर आने वाले हैं। अनु एक बार फिर मान जाती है।

28

शाम को कर्नल त्रिवेदी सीमा के पिताजी के साथ घर आते हैं और जब उन्हें पता चलता है कि अनु गायिका है तो वे अनु से बहुत कहते हैं कि अनु गाना गाये तब अनु गाना गाती है ” हाय रे वो दिन क्यूं ना आये...

30

कर्नल त्रिवेदी प्रयोगशाला देखते समय अनु से कुछ बाते पूछते हैं जिससे उन्हें पता चल जाता है कि अनु, निर्मल के प्रयोगशाला में ही सो जाने के बाद उसकी सेवा करती है, कर्नल त्रिवेदी को अपनी कहानी याद आजाती है उन्होने भी तो यही सब किया था अपनी पत्नी के साथ, आज उन्हें पछतावा होता है पर जब उनकी पत्नी इस दुनियां में नहीं है।

गाने और खाने के बाद सीमा के पिताजी निर्मल के आगे नतमस्तक हो जाते हैं और बीस हजार रूपये का चेक देते हुए कहते हैं “यह आपके त्याग और मेहनत के लिये एक छोटा सा नजराना.. तब कर्नल त्रिवेदी निर्मल के हाथ से चेक ले लेते हैं और सीमा के पिताजी से कहते हैं अगर तुम वाकई त्याग और तास्या को यह चेक देना चाहते हो तो यह चेक अनु को दों, क्यों कि त्याग तो अनु ने किया है। अनु अपनी इस तारीफ से दंग रह जाती है और सीमा के पिताजी वह चैक अनु को दे देते हैं।

32

अगली सुबह अनु के जाने का समय हो गया है पर अनु घर के कामों में व्यस्त है, बाहर दीपक बार बार हॉर्न बजा रहा है। निर्मल जब अनु को पूछते है अनु तुम्हारी गाड़ी….?

अनु कहती है क्या तुम् मुझ पर इतना भी अधिकार नहीं रखते? मुझे इतना भी नहीं कह सकते चली जाओ, फिर यहां कभी ना आओ।

33

इतना सुन कर निर्मल की आँखों से आँसु बह निकले और दोनो …

34

यह समीक्षा आपको कैसी लगी? अगर आपको मेरा यह प्रयास अच्छा लगा हो तो भविषय में और भी फिल्में दिखाई जायेंगी।

फिल्म समीक्षा: अनुराधा 1960

ग्रेटा के ब्लॉग पर हिन्दी फिल्मों की समीक्षा पढ़ने के बाद कई दिनों से मन में एक खयाल आ रहा था कि क्यों ना महफिल पर भी किसी फिल्म के बारे में कुछ लिखा जाये। कई दिनों की उधेड़बुन के बाद मुझे वह फिल्म मिल ही गई जिसके बारे में महफिल पर लिखा जा सकता है।यह फिल्म है ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्मित और निर्देशित फिल्म अनुराधा

अनुराधा मेरी सबसे पसंदीदा फिल्मों में से एक है। इस फिल्म में भारत रत्न पडित रविशंकर ने संगीत दिया था। फिल्म के मुख्य कलाकार थे बलराज साहनी, लीला नायडू, अभिभट्टाचार्य, असित सेन, नासिर हुसैन, हरि शिवदासानी और बाल कलाकार रानू। कथा और पटकथा है सचिन भौमिक की। संवाद राजेन्द्र सिंह बेदी ने लिखे हैं और गीतकार है शैलेन्द्र। फिल्म में गीत गाये हैं लता मंगेशकर, मन्ना डे और महेन्द्र कपूर ने।

इस फिल्म में हरेक कलाकार ने अपना जबरदस्त योगदान दिया है, लीला नायडू- बलराज साहनी का अभिनय, पं रविशंकर का संगीत निर्देशन, ऋषिकेश मुखर्जी का निर्देशन.. और हाँ लीला नायडू का सादगी भरा सौंदर्य भी| लीला नायडू के बोलने का तरीका भी एक अलग तरह का है जो फिल्म में उनके पात्र को ज्यादा प्रभावशाली बना रहा है। बच्ची रानू का हिन्दी बोलने का लहजा बंगाली है वह अनुराधा की बजाय ओनुराधा रॉय बोलती है।छोटी बच्ची ने भी बहुत शानदार अभिनय किया है।

1 Title

फिल्म का निर्देशन और संपादन बहुत ही शानदार है कहां फिल्म फ्लैश बेक में चली जाती है और कहां वर्तमान में आ जाती है पता ही नहीं चलता। इस बारे मे आगे लिखा गया है।
फिल्म के नायक है डॉ निर्मल चौधरी (बलराज साहनी) अपनी पत्नी अनुराधा (लीला नायडू) और प्यारी, चुलबुली और बड़बोली बिटिया रानू के साथ एक छोटे से गाँव में रहते हैं। डॉ निर्मल के जीवन का एक ही उद्धेश्य है गरीब मरीजों के सेवा करना और इस काम में दिन रात डूबे रहते हैं। उनके पास अपनी पत्नी के लिये बिल्कुल भी समय नहीं है। जब मरीजों को देखने जाते हैं तो अपनी बिटिया रानू (रानू) को भी साथ ले जाते हैं और घर में रह जाती है अकेली अनुराधा।

गाँव में मरीजो को देखकर मुफ्त में दवा देते हुए डॉ निर्मल, मरीज कह रहा है डॉ साहब आप देवता है.. और रानू पूछती है क्यों चाचा फीस नहीं दोगे? निर्मल बच्ची को डपट देते हैं।

2

शरारती बच्चे डॉ निर्मल की सुई ( इंजेक्शन) से बचने के लिये डॉ की साइकिल के पहिये ओ सुई लगा देते हैं, और बेचारे डॉ बच्ची को गोद में उठाये पैदल घर पहुंचते हैं यहाँ अनु अकेली दोनों के इंतजार में बैचेन हो रही है। अपना समय काटने के लिये अनु घर में कभी इधर, कभी उधर घूमती रहती है। किताबें पढ़ती रहती है पर कब तक?

अकेली, किताबें पढ़कर अपना समय काटती अनुराधा।

3

पति आते ही गाँव की मरीजों की , मरीजों के सुख दुख: की बातें करने लगते हैं तो अनु पूछ बैठती है सबकी बीमारी देखते हो कभी मेरी बीमारी के बारे में भी सोचा है? डॉ पूछते हैं तुम्हे क्या बीमारी हुई है? तो अनु कहती है मैं दिन भर अकेली बिठी रहती हूँ, बातचीत करूं तो किससे दीवारों से?

4

अनु अनुरोध करती है कि आज पूनम का उत्सव है और गाँव वालों ने न्यौता दिया है आज शाम जल्दी घर आ जाना..इसी बहाने मैं भी तुम्हारे साथ दो घड़ी गुजार लूंगी!

अनु अति उत्साहित वही साड़ी पहनती है जिसके खरीदते समय अनु और डॉ निर्मल पहली बार मिले थे, और डॉ की पसंद पर अनु ने वह साड़ी खरीदी थी। पर निर्मल एक तो समय पर नहीं आ पाते और फिर आते ही अपनी प्रयोगशाला में काम में जुट जाते हैं। अनु पूछती है आप आज मुझे पूनम के उत्सव पर ले जाने वाले थे , निर्मल अनु को समझा देते हैं कि आज नहीं और कभी।

4.5

यहां अनु प्रयोगशाला की खिड़की से गाँव वालों का संगीत सुन रही है तो निर्मल उसे कहते हैं ” अनु तुम यह खिड़की बंद कर दो तुम्हारा यह संगीत मुझे डिस्टर्ब करता है।”

10

अनु के सर पर जैसे गाज गिरती है, इसी संगीत की वजह से तो अनु और निर्मल मिले थे, इसी संगीत के लिये निर्मल उसे चाहने लगे थे। यहाँ फिल्म फ्लैश बैक में चलती है अनु को वे दिन याद आने लगते हैं जब अनु और डॉ पहली बार मिले थे और….

अनुराधा रॉय एक सुप्रसिद्ध रेडियो आर्टिस्ट ( गायिका) है और नाचती भी बहुत अच्छा है। संयोग से अनुराधा के भाई आशिम निर्मल के मित्र भी है। एक संगीत कार्यक्रम में अनुराधा निर्मल की पसंद की हुई साड़ी पहन कर नृत्य पेश करती है। उस कार्यक्रम में निर्मल भी आये हुए हैं। समापन के बाद साड़ी में पाँव उलझ जाने की वजह से अनुराधा गिर जाती है और बेहोश हो जाती है। पाँव में मोच आ जाने और दर्द की की वजह से डॉ का अनु के घर में आना जान आ शुरु होता है और उपचार के दौरान धीरे धीरे दोनों के मन में प्रेम के अंकुर फूटने लगते हैं।

अनु का उपचार करते हुए डॉ. निर्मल

5

और आखिरकार दोनों प्रेम करने लगते हैं और अनु इस फिल्म का सबसे लोकप्रिय गीत गाती है “जाने कैसे सपनों में खो गई अखियां मैं तो हूं जागी मेरी सो गई अखियां”

8

इस बीच अनु के पिताजी के दोस्त के बेटे दीपक (अभि भट्टाचार्य) विदेश में अपनी पढ़ाई पूरी कर वापस आते हैं। दीपक अनु को चाहते भी हैं। अनु के पिताजी चाहते हैं दोनों का विवाह हो जाये परन्तु अनु दीपक को साफ साफ कह देती है कि वो किसी और को चाहती है, और उसी से विवाह करना चाहती है।

9

अनु अपने पिताजीको बता देती है कि वह डॉक्टर से शादी करना चाहती है पर पिताजी नहीं मानते और आखिरकार अनु घर छोड़ देती है और आखिरकार निर्मल और अनुराधा शादी के बंधन में बंध जाते हैं।

11

परन्तु अनु के पिताजी अनु और निर्मल के विवाह को अस्वीकार कर देते हैं।

12

इस फिल्म का संपादन बहुत ही कमाल का है, शादी की पहली रात निर्मल अपनी सेज सजाने के लिये फूल खरीदने बाजार गये हैं और अनु अपने रिकॉर्ड पर गाना सुन रही है जाने कैसे सपनों में खो गई अखिंया.. और पति का इन्तजार कर रही है, जब दरवाजा खुलता है तो कहानी अचानक ही वर्तमान में आती है।

यहां अनु अपनी बच्ची को वही गीत सुना रही है… बच्ची चिल्लाती है माँ पिताजी आ गये पिताजी आ गये.. निर्मल रिकॉर्ड पर अटकी सुई को देख कर कहते हैं “बन्द करो ना इसे गाना तो खत्म हो गया है”, तब अनु कहती है “हाँ गाना तो खत्म हो गया.. अनु के ये शब्द और आँखें इतने ही शब्दों में बहुत कुछ कह जाते है”।

तकनीक का इतना सुंदर उपयोग कि दर्शक कहानी में इतने जुड़ जाते हैं कि उन्हें यह पता ही नहीं चलता कि इस दृश्य के पहले कहानी फ्लैश बैक में चल रही थी।

निर्मल एक बार फिर किताबों में उलझ जाते हैं और अनु खाना खाने को कहती है और हाथ से किताब ले लेती है तो निर्मल को गुस्सा आ जाता है।

यह क्या मजाक है, मेरी किताब क्यों छीन ली? देखती नहीं मैं काम कर रहा हूँ, अगर इतनी ही भूख है तो तुम खाना खा लो, मैं बाद में खा लूंगा।

13

यहाँ अनु घर का सौदा लेने गई हुई है और बिटिया रानू घर में अकेली है, तभी अनु के पिताजी शहर से आते हैं यहां रानू उनसे बहुत बातें करती है। यहां नाना- दोहिती के संवाद बहुत मजेदार है।

अपने बेटे और बेटी ( खिलौने) से मिलवाती रानू- “यह है चून्नू मेरा बेटा और मुन्नी मेरा बेटी”

14

निर्मल से मिलते हुए अनु के पिताजी ” मुझे माफ कर दो बेटा”

15

यहाँ कहानी में नया मोड़ आता है। दीपक एक मित्र सीमा के साथ सैर पर निकला है। यहाँ दीपक की मित्र उससे उसकी उदासी का कारण बहुत पूछती है और अचानक गाड़ी संभल नहीं पाती और दुर्घटना हो जाती है जिसमें सीमा बहुत ज्यादा घायल हो जाती है और दीपक उससे थोड़ा कम।

16

निर्मल सीमा को जमींदार के घर भेज देते हैं यहां और दीपक को अपने घर पर ले आते हैं। दीपक को छोड़ निर्मल, सीमा का ऑपरेशन करने के लिये जमींदार के यहां चले जाते हैं। यहां अनु, घायल दीपक को देखकर चौंक जाती है।17

जब निर्मल घर आते हैं तो यह जान कर आश्चर्य चकित रह जाते हैं कि अनु और दीपक एक दूसरे को जानते हैं।

“क्या तुम एक दूसरे को जानते हो?”

18

यहां दीपक अनु को बहुत अनुरोध करता है कि वह एक गाना गाये पर अनु नहीं मानती। बाद में निर्मल के कहने पर अनु गाना गाती है ” कैसे दिन बीते कैसे बीती रतियाँ पिया जाने ना”

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दीपक समझ जाता है कि कुछ ना कुछ गड़बड़ है। वह अनु को बहुत डाँटता है कि क्यों तुमने अपनी प्रतिभा का गला घोंटा?

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दीपक समझाता है कि लौट चलो अपने पिताजी के पास। अब भी देर नहीं हुई। अनु नाराज होती है।

21

निर्मल पूछते हैं कि दीपक को दवाई क्यों नहीं दी? तो अनु गुस्से में कह देती है मैं तुम्हारी बीबी हूँ कम्पाउंडर नहीं।22

निर्मल एक बार फिर अनु को समझा बुझा देते हैं और उस दिन विवाह की वर्षगांठ होने पर अनु से एक बार फिर जल्दी लौटने का वादा करते हैं और एक बार फिर समय पर लौट नहीं पाते अनु जब पूछती है कि एक दिन भी तुम समय पर घर नहीं आ सकते तो निर्मल कहते हैं

“तुम समझती हो मैं वहां खेलने जाता हूँ, मैं एक डॉक्टर हूं मेरी कुछ जिम्मेदारियाँ है?

24

आखिरकार अनु का दिल टूट जाता है और वह दीपक से कहती है ” तुम सच कहते थे मैने अपनी जिंदगी बर्बाद करली, मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूँ।”

25

यहाँ निर्देशक की समझदारी देखिये अनु के मुँह से यह बात सुन कर दीपक कहता है कि “अब मेरा इस घर में रहना उचित नहीं होगा, मैं डाक बंगले में ठहर जाता हूँ, शाम को तुम्हे लेने आ जाऊंगा।

गाँव में जमींदार के यहां सीमा के पिताजी और उनके मित्र कर्नल (डॉक्टर ) त्रिवेदी आये हुए हैं। वे सीमा की पट्टियाँ खुलवा कर जब उसे देखते हैं तो चकित रह जाते हैं। क्यों कि निर्मल ने सीमा की प्लास्टिक सर्जरी कर दी थी और गाल पर निशान गायब कर दिया था। कर्नम त्रिवेदी को आश्चर्य इस बात का होता है कि इतने छोटे गाँव में निर्मल ने यह सब किया कैसे?

वे निर्मल पर बनावटी गुस्सा करते हैं तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? ओपरेशन करने की! बाद में कर्नल त्रिवेदी, निर्मल की बहुत तारीफ करते हैं। उन्हें जब पता चलता है कि निर्मल की एक छोटी सी प्रयोगशाला भी है तो वे निर्मल से कहते हैं वे उसकी प्रयोगशाला देखना चाहेंगे और हाँ उसके घर शाम का खाना भी खायेंगे।

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निर्मल अति उत्साहित घर आकर अपनी बात बताने लगते हैं, अनु कुछ कहने लगती है तो उसे रोक देते हैं तो अनु पूछ बैठती है ” हमेशा अपनी ही सुनाओगे, कभी मेरी नहीं सुनोगे? यहाँ अनु, निमर्ल को अपना फैसला सुना देती है कि वो शाम को दीपक के साथ हमेशा के लिये अपने पिता के घर जा रही है।

27

निर्मल बहुत आहत होता है पर अनु से अनुरोध करता है कि जहां दस साल निकाले वहां एक दिन के लिये और रुक जाये क्यों कि कर्नल त्रिवेदी खाने पर आने वाले हैं। अनु एक बार फिर मान जाती है।

28

शाम को कर्नल त्रिवेदी सीमा के पिताजी के साथ घर आते हैं और जब उन्हें पता चलता है कि अनु गायिका है तो वे अनु से बहुत कहते हैं कि अनु गाना गाये तब अनु गाना गाती है ” हाय रे वो दिन क्यूं ना आये...

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कर्नल त्रिवेदी प्रयोगशाला देखते समय अनु से कुछ बाते पूछते हैं जिससे उन्हें पता चल जाता है कि अनु, निर्मल के प्रयोगशाला में ही सो जाने के बाद उसकी सेवा करती है, कर्नल त्रिवेदी को अपनी कहानी याद आजाती है उन्होने भी तो यही सब किया था अपनी पत्नी के साथ, आज उन्हें पछतावा होता है पर जब उनकी पत्नी इस दुनियां में नहीं है।

गाने और खाने के बाद सीमा के पिताजी निर्मल के आगे नतमस्तक हो जाते हैं और बीस हजार रूपये का चेक देते हुए कहते हैं “यह आपके त्याग और मेहनत के लिये एक छोटा सा नजराना.. तब कर्नल त्रिवेदी निर्मल के हाथ से चेक ले लेते हैं और सीमा के पिताजी से कहते हैं अगर तुम वाकई त्याग और तास्या को यह चेक देना चाहते हो तो यह चेक अनु को दों, क्यों कि त्याग तो अनु ने किया है। अनु अपनी इस तारीफ से दंग रह जाती है और सीमा के पिताजी वह चैक अनु को दे देते हैं।

32

अगली सुबह अनु के जाने का समय हो गया है पर अनु घर के कामों में व्यस्त है, बाहर दीपक बार बार हॉर्न बजा रहा है। निर्मल जब अनु को पूछते है अनु तुम्हारी गाड़ी….?

अनु कहती है क्या तुम् मुझ पर इतना भी अधिकार नहीं रखते? मुझे इतना भी नहीं कह सकते चली जाओ, फिर यहां कभी ना आओ।

33

इतना सुन कर निर्मल की आँखों से आँसु बह निकले और दोनो …

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यह समीक्षा आपको कैसी लगी? अगर आपको मेरा यह प्रयास अच्छा लगा हो तो भविषय में और भी फिल्में दिखाई जायेंगी।

>नरेन्द्र मोदी नाम का “पेट दर्द” और ब्लॉग में “टैग” का बहाना…

>हालांकि मुझे यह तो मालूम था कि “नरेन्द्र मोदी” का नाम लेने भर से गुजरात में कई समस्यायें हल हो जाती हैं लेकिन जिस बात का सिर्फ़ अन्देशा था कि मोदी का नाम सुनने भर से कई लोगों के “पेट में मरोड़” उठने लगती है, वह आखिरकार सच हो ही गया। हिन्दी के एक वरिष्ठ और महान ब्लॉगर हैं श्री अनिल रघुराज जी। बहुत उम्दा लिखते हैं, मैं खुद इनका सब्स्क्राइबर हूँ, शोधपूर्ण और तर्कसंगत लेखों के मालिक हैं ये साहब। इन सज्जन को मेरे लिखे हुए ब्लॉग में “टैगों” (Tags का हिन्दी बहुवचन शायद यही होता होगा) के उपयोग पर अचानक आपत्ति हो गई (जबकि यह टैग मैं पिछले 6-8 महीनों से उपयोग कर रहा हूँ) और इन्होंने मेरी हँसी उड़ाते हुए व्यंग्यात्मक शैली में उस पर लेख लिख मारा। इसमें उन्होंने सवाल उठाये हैं कि आखिर मैं ब्लॉग के अन्त में इतने टैग क्यों लगाता हूँ? और “विषयान्तर” टैग क्यों लगाता हूँ? उनका पहला वाक्य है – “काफी दिनों से देख रहा हूं कि कुछ ब्लॉगर छटांक भर की पोस्ट पर किलो भर के टैग लगा देते हैं। इधर पोस्ट का आकार तो बड़ा हो गया है, लेकिन टैग का वजन अब भी उस पर भारी पड़ता है”, उन्हें मेरी पोस्टें “छटाँक” भर की दिखती है, जबकि मित्रों का कहना है कि मैं कुछ ज्यादा ही लम्बी पोस्ट लिखता हूँ (बल्कि कई बार तो मुझे 3-4 भागों में एक पोस्ट को देना पड़ता है) इस छटाँक भर “दृष्टिदोष” पर वारी जाऊँ। फ़िर तुरन्त रघुराज जी अपने असली “दर्द” पर आ जाते हैं, व्यंग्य कसते हुए कहते हैं, “सुरेश जी झन्नाटेदार अंदाज़ में लिखते हैं, जैसे अभी कोई धमाका कर देंगे। उनकी राष्ट्रभक्ति पर उंगली उठाना पूर्णमासी के चांद में दाग खोजने जैसा है। सेकुलर बुद्धिजीवियों पर तो ऐसे उबलते हैं कि वश चलता तो सबको सूली पर लटका देते या बंगाल की खाड़ी में फेंकवा देते…”। यह है इनका असली दर्द, “टैग-वैग” वाली बात तो मुलम्मा भर था, जिसे हम “कलई” कहते हैं, जैसे कि एक पैकेट जिसमें रखकर पत्थर मारा जाये तो सामने वाले को पता न चले। टैग की आपत्ति इन्होंने यहीं पर खत्म कर दी और असली मुद्दे पर आ गये, यानी कि जिसका ज़िक्र मैंने ऊपर किया, जी हाँ “नरेन्द्र मोदी”।

लेकिन पहले वाली बात पहले की जाये (यानी कि जो कलई है, उसकी)। समझ में नहीं आया कि मेरे ज्यादा टैग लगाने से रघुराज जी को क्या आपत्ति है? क्या मैंने किसी पाठक से कहा है कि पूरी पोस्ट “टैग सहित” पढ़ो, वरना गोली मार दूंगा? ये तो कुछ ऐसा ही हुआ कि पूरा अखबार पढ़ने के बाद व्यक्ति कहे कि आखिरी पेज पर बीड़ी का विज्ञापन क्यों छापा? लोग अखबार पढ़ने आते हैं या बीड़ी खरीदने… उन्हीं का तर्क है कि “इनका मकसद अगर ज्यादा से ज्यादा पाठक खींचना है तो मान लीजिए कोई Hindi Typing on Computers सर्च करके मोदी वाली पोस्ट पर आ जाए तो क्या यह उसके साथ धोखाधड़ी नहीं है?” भाई रघुराज जी, यदि टैग लगाने से पाठक नहीं आते हैं तो भी आपको तकलीफ़ है? फ़िर लगे ही रहने दीजिये, मत आने दीजिये मेरे चिठ्ठे पर पाठकों को… आप इतने बारीक टैग पढ़कर अपनी आँखें क्यों खराब करते हैं? और यदि टैग लगे हों और इस बहाने से कोई पाठक खोजता हुआ हिन्दी ब्लॉग पर आ जाये तो भी आपको आपत्ति है? यानी चित भी मेरी पट भी मेरी? “धोखाधड़ी” शब्द का जवाब यह है कि, इसमें कुछ भी गलत नहीं है, मेरा ब्लॉग सभी विषयों पर केन्द्रित होता है, मैं विभिन्न विषयों पर लिखता हूँ, ऐसे में यदि “गलती से ही सही” किसी टैग से सर्च करके कोई अंग्रेजी पाठक मेरे हिन्दी चिठ्ठे पर आता है तो क्या इससे हिन्दी ब्लॉग जगत का नुकसान हो जायेगा? अपने चिठ्ठे की रैंकिंग बढ़ाने के लिये न तो कभी मैंने “सेक्स” नाम का टैग लगाया, न ही “एंजेलीना जोली” नाम का, फ़िर क्या दुःख है भाई? रघुराज जी यहीं नहीं थमे, अपनी बात को वज़नदार बनाने के चक्कर में बेचारे “दीपक भारतदीप” जी की एक-दो पोस्ट को मेरे साथ लपेट ले गये। दीपक जी एक बेहद सीधे-सादे इंसान हैं, रहीम, कबीर, चाणक्य आदि पर ज्ञानवर्धक लेख लिखते हैं, किसी के लेने-देने में नहीं रहते, न किसी से खामख्वाह उलझते हैं। उन दीपक जी को भी नसीहत देते हुए रघुराज जी उनके अंग्रेजी हिज्जों पर पिल पड़े (कि स्पेलिंग गलत है)। जबकि मेरे हिसाब से अंग्रेजी में यदि कोई गलती है भी तो उसे नज़र-अन्दाज़ किया जाना चाहिये, क्योंकि वह हिन्दी ब्लॉगरों की भाषा ही नहीं है, लेकिन यदि बाल की खाल न निकाली तो फ़िर महान पत्रकार कैसे कहलायेंगे?

सीधी तरह तर्कों से बताओ कि ज्यादा “टैग” लगाने से क्या-क्या नुकसान हैं? कितने पाठक हैं जो लेख के साथ “टैग” भी पढ़ते हैं और उसके कारण उकता जाते हैं? यदि ज्यादा टैग लगायें तो क्या तूफ़ान आ गया और यदि कम टैग लगाऊँ तो क्या कहर बरपा होगा? (जवाब का इंतजार रहेगा) तो ये तो थी मुलम्मे वाली (यानी कलई, यानी नकली) बात, अब आते हैं उनके असली दर्द पर…

पहले व्यंग्यात्मक शैली में मेरी हँसी उड़ाने के बाद इन्होंने नरेन्द्र मोदी को घसीटने की कोशिश की, और उनका असली दर्द खुलकर सामने आ गया। नरेन्द्र मोदी, भाजपा या संघ की किसी भी तरह की तारीफ़ से दिल्ली/मुम्बई में बैठे कई लोगों को “पेचिश” हो जाती है, वे उस तारीफ़ करने वाले की आलोचना के बहाने ढूँढते हैं, और चूँकि ज़ाहिरा तौर पर वे “सेकुलर”(?) होते हैं इसलिये सीधे तर्कों में बात नहीं करते। ये बात वे खुद जानते हैं कि जैसे ही वे सेकुलर शब्द का उल्लेख भर करेंगे, शाहबानो केस का भूत उनका गला पकड़ लेगा, जैसे ही सेकुलर भजन शुरु किया जायेगा, कांग्रेस के 40 साला राज में हुए सैकड़ों हिन्दू-मुस्लिम दंगे एक साथ कोरस में उनका साथ देने लग जायेंगे, जैसे ही वे “फ़िलीस्तीन” नाम का मंझीरा बजायेंगे, जम्मू के विस्थापित हिन्दू उनके कपड़े उतारने को बेताब हो जायेंगे… सिलसिला अन्तहीन है, इसलिये ये लोग एक “गैंग” बनाकर अपरोक्ष रूप से हमला करते हैं, कुछ लोग पहले ईमेल भेजकर गरियाते हैं, फ़िर एकाध सेकुलर लेखक इस अदा में पोस्ट पटकता है कि “हम ही श्रेष्ठ हैं, बाकी के सब कीड़े-मकोड़े हैं…”।

अक्सर नसीहत दी जाती है कि ब्लॉग का कंटेण्ट (सामग्री) महत्वपूर्ण होता है और वही ब्लॉग आगे ज़िन्दा रहेगा, और मुझे लगता है कि डेढ़ साल में 250 से अधिक एकल ब्लॉग लिखने, 80-85 सब्स्क्राइबर होने और 34,000 से ज्यादा हिट्स आने के बाद, ब्लॉग में कण्टेण्ट सम्बन्धी किसी सेकुलर सर्टिफ़िकेट की मुझे आवश्यकता नहीं है। सांप्रदायिकता का मतलब भी मुझे समझाने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि सफ़दर नागौरी भी उज्जैन का है और सोहराबुद्दीन भी था। मैं एक आम लेखक हूँ, जो दिल से लिखता है दिमाग से नहीं। मुझे दिल्ली/मुम्बई में पत्रकारिता में कैरियर नहीं बनाना है जो मैं किसी की चमचागिरी करता फ़िरूँ, और कौन नहीं जानता कि ये तथाकथित पत्रकार किस मिट्टी के बने होते हैं। कुछ पत्रकार आरुषि हत्याकांड की “क्लिप” दिखा-दिखाकर चैनल की टीआरपी बढ़ने पर शैम्पेन की पार्टी देते हैं, तो कुछ चापलूसी में इतने गिर जाते हैं कि अपने ज़मीर का सौदा कुछेक हज़ार रुपये में कर डालते हैं। एक साहब तो विदेशी बाला से शादी रचाने के फ़ेर में अपनी देसी बीवी को जलाकर मार चुके हैं, अस्तु।

यह बात मैं पहले भी कह चुका हूँ कि मैं “नेटवर्क” बनाने के मामले में एकदम असफ़ल हूँ, मैंने अपने ब्लॉग पर कोई ब्लॉग-रोल नहीं लगाया हुआ है, ज़ाहिर है कि मेरा चिठ्ठा भी बहुत कम लोगों के ब्लॉग रोल में मौजूद है, मैं खामख्वाह की टिप्पणियाँ भी कम ही कर पाता हूँ, इतनी सारी पोस्ट लिखने के बावजूद चिठ्ठाचर्चा में मेरे चिठ्ठे की चर्चा कभी भूले-भटके ही होती है, न मुझे ऐसी “फ़ोरम” पता हैं जहाँ से अपने चिठ्ठे का प्रचार किया जाता है, लेकिन मुझे सिर्फ़ लिखने से मतलब है, कौन पढ़ता है, कौन नहीं पढ़ता, कितनी टिप्पणियाँ आती हैं, इससे कोई मतलब नहीं। यदि मुझे हिट्स का मोह होता तो मैं दिन भर सिर्फ़ टिप्पणियाँ ही करता या लम्बा-चौड़ा ब्लॉग रोल बनाता (जिससे की एक-दूसरे की पीठ खुजाने की शैली में मेरा चिठ्ठा भी कई लोग अपने ब्लॉग रोल में लगाते) और बड़े पत्रकारों की चमचागिरी करता रहता, लेकिन जैसा कि मैंने कहा, मैं “नेटवर्क” बनाने में कमज़ोर हूँ। हाँ… मेरे ब्लॉग पर सभी तरह का माल मिलेगा, “टैग” भी और विज्ञापन भी (मैं कोई संत-महात्मा नहीं हूँ जिसे ब्लॉग से कमाई बुरी लगे)। मैं ब्लॉग जगत में आया ही इसलिये हूँ कि मुझे किसी घटिया से सम्पादक की चिरौरी न करना पड़े, क्योंकि मेरे लेख छापने की ताब शायद ही किसी अखबार में हो।

इस “छटाँक भर” लेख का लब्बेलुआब ये है कि रघुराज जी का यह “टैग” वाला लेख सरासर एक बहाना था, कुछ “स्वयंभू” बड़े पत्रकारों को मेरे पिछले कुछ लेख चुभ गये हैं खासकर “सेकुलर बुद्धिजीवी…”, “धर्मनिरपेक्षों को नंगा करने के लिये जम्मूवासी…” और “राष्ट्रीय स्वाभिमान…” वाला, इससे वे तिलमिला गये हैं, लेकिन मैं इसमें क्या कर सकता हूँ? मैं तो खुल्लमखुल्ला कहता हूँ कि मैं इसी प्रयास में हूँ कि “सेकुलर” शब्द को एक गाली बना दूँ, कोई छिपाने वाली बात नहीं है। कान का मैल निकालकर साफ़-साफ़ सुनें… मैं पीठ पीछे से हमला नहीं करता, मुझे मखमल के कपड़े में लपेट कर जूता मारना नहीं आता, हम तो पानी में जूता भिगो-भिगोकर मारने वालों में से हैं। मैं हर प्रकार के और किसी भी भाषा शैली के ईमेल और लेख से निपटने में सक्षम हूँ (बल्कि यदि कुछ व्यक्तिगत ईमेल सार्वजनिक कर दूँ तो कईयों की पोल खुल जायेगी, लेकिन वह मेरी नीति के खिलाफ़ है)। जब मैं किसी से नहीं उलझता तो कोई मुझसे खामख्वाह न उलझे, बात करनी हो तो तर्कों के साथ और मुद्दे पर करे, “अ-मुद्दे” को मुद्दा बनाकर नहीं। आशा है कि दीपक भारतदीप जी भी इन सभी बिन्दुओं से सहमत होंगे। दीपक जी पहले भी एक पोस्ट में कह चुके हैं कि महानगरों में रहने वाले कुछ ब्लॉगर अपने-आपको ज़मीन से दो इंच ऊपर समझते हैं और कस्बों और छोटे शहरों से आने वाले ब्लॉगरों को अपने तरीके से हांकने की कोशिश करते हैं या नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं (श्री रवि रतलामी जी अपवाद हैं, क्योंकि उनका काम बोलता है) और इस कोशिश में “पत्रकार नाम की बिरादरी” ज्यादा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है, आशा है कि इस छटांक भर लेख में शामिल विभिन्न बिन्दुओं पर बहस के काफ़ी मुद्दे मिलेंगे और कईयों के दिमाग के जाले साफ़ होंगे।

अब अन्त में कुछ शब्द मेरे उन सब्स्क्राइबरों के लिये जो यह सोच रहे होंगे कि आखिर यह लेख क्या बला है? क्योंकि मेरे 90% सब्स्क्राईबर, ब्लॉग जगत से नावाकिफ़ हैं और वे नहीं जानते कि हिन्दी ब्लॉग-जगत में यह सब तो चलता ही रहता है। कृपया मेरे ऐसे पाठक इस लेख को “इग्नोर” करें, यह समझें कि गलती से यह लेख उनके मेल-बॉक्स में आ गया है…

अब इस पोस्ट के साथ “पचास ग्राम के टैग” भी नहीं लगाता और देखता हूँ कि इससे ट्रैफ़िक पर कोई असर पड़ता है या नहीं। तो ब्लॉगर बन्धुओं, अब इस “छटाँक” भर की पोस्ट पर किलो भर की टिप्पणियाँ मत कर दीजियेगा। आप इसे बुरा सपना मानकर भूल जाइये, क्योंकि बुरे सपने बार-बार आना अच्छी बात नहीं है…

नरेन्द्र मोदी नाम का “पेट दर्द” और ब्लॉग में “टैग” का बहाना…

हालांकि मुझे यह तो मालूम था कि “नरेन्द्र मोदी” का नाम लेने भर से गुजरात में कई समस्यायें हल हो जाती हैं लेकिन जिस बात का सिर्फ़ अन्देशा था कि मोदी का नाम सुनने भर से कई लोगों के “पेट में मरोड़” उठने लगती है, वह आखिरकार सच हो ही गया। हिन्दी के एक वरिष्ठ और महान ब्लॉगर हैं श्री अनिल रघुराज जी। बहुत उम्दा लिखते हैं, मैं खुद इनका सब्स्क्राइबर हूँ, शोधपूर्ण और तर्कसंगत लेखों के मालिक हैं ये साहब। इन सज्जन को मेरे लिखे हुए ब्लॉग में “टैगों” (Tags का हिन्दी बहुवचन शायद यही होता होगा) के उपयोग पर अचानक आपत्ति हो गई (जबकि यह टैग मैं पिछले 6-8 महीनों से उपयोग कर रहा हूँ) और इन्होंने मेरी हँसी उड़ाते हुए व्यंग्यात्मक शैली में उस पर लेख लिख मारा। इसमें उन्होंने सवाल उठाये हैं कि आखिर मैं ब्लॉग के अन्त में इतने टैग क्यों लगाता हूँ? और “विषयान्तर” टैग क्यों लगाता हूँ? उनका पहला वाक्य है – “काफी दिनों से देख रहा हूं कि कुछ ब्लॉगर छटांक भर की पोस्ट पर किलो भर के टैग लगा देते हैं। इधर पोस्ट का आकार तो बड़ा हो गया है, लेकिन टैग का वजन अब भी उस पर भारी पड़ता है”, उन्हें मेरी पोस्टें “छटाँक” भर की दिखती है, जबकि मित्रों का कहना है कि मैं कुछ ज्यादा ही लम्बी पोस्ट लिखता हूँ (बल्कि कई बार तो मुझे 3-4 भागों में एक पोस्ट को देना पड़ता है) इस छटाँक भर “दृष्टिदोष” पर वारी जाऊँ। फ़िर तुरन्त रघुराज जी अपने असली “दर्द” पर आ जाते हैं, व्यंग्य कसते हुए कहते हैं, “सुरेश जी झन्नाटेदार अंदाज़ में लिखते हैं, जैसे अभी कोई धमाका कर देंगे। उनकी राष्ट्रभक्ति पर उंगली उठाना पूर्णमासी के चांद में दाग खोजने जैसा है। सेकुलर बुद्धिजीवियों पर तो ऐसे उबलते हैं कि वश चलता तो सबको सूली पर लटका देते या बंगाल की खाड़ी में फेंकवा देते…”। यह है इनका असली दर्द, “टैग-वैग” वाली बात तो मुलम्मा भर था, जिसे हम “कलई” कहते हैं, जैसे कि एक पैकेट जिसमें रखकर पत्थर मारा जाये तो सामने वाले को पता न चले। टैग की आपत्ति इन्होंने यहीं पर खत्म कर दी और असली मुद्दे पर आ गये, यानी कि जिसका ज़िक्र मैंने ऊपर किया, जी हाँ “नरेन्द्र मोदी”।

लेकिन पहले वाली बात पहले की जाये (यानी कि जो कलई है, उसकी)। समझ में नहीं आया कि मेरे ज्यादा टैग लगाने से रघुराज जी को क्या आपत्ति है? क्या मैंने किसी पाठक से कहा है कि पूरी पोस्ट “टैग सहित” पढ़ो, वरना गोली मार दूंगा? ये तो कुछ ऐसा ही हुआ कि पूरा अखबार पढ़ने के बाद व्यक्ति कहे कि आखिरी पेज पर बीड़ी का विज्ञापन क्यों छापा? लोग अखबार पढ़ने आते हैं या बीड़ी खरीदने… उन्हीं का तर्क है कि “इनका मकसद अगर ज्यादा से ज्यादा पाठक खींचना है तो मान लीजिए कोई Hindi Typing on Computers सर्च करके मोदी वाली पोस्ट पर आ जाए तो क्या यह उसके साथ धोखाधड़ी नहीं है?” भाई रघुराज जी, यदि टैग लगाने से पाठक नहीं आते हैं तो भी आपको तकलीफ़ है? फ़िर लगे ही रहने दीजिये, मत आने दीजिये मेरे चिठ्ठे पर पाठकों को… आप इतने बारीक टैग पढ़कर अपनी आँखें क्यों खराब करते हैं? और यदि टैग लगे हों और इस बहाने से कोई पाठक खोजता हुआ हिन्दी ब्लॉग पर आ जाये तो भी आपको आपत्ति है? यानी चित भी मेरी पट भी मेरी? “धोखाधड़ी” शब्द का जवाब यह है कि, इसमें कुछ भी गलत नहीं है, मेरा ब्लॉग सभी विषयों पर केन्द्रित होता है, मैं विभिन्न विषयों पर लिखता हूँ, ऐसे में यदि “गलती से ही सही” किसी टैग से सर्च करके कोई अंग्रेजी पाठक मेरे हिन्दी चिठ्ठे पर आता है तो क्या इससे हिन्दी ब्लॉग जगत का नुकसान हो जायेगा? अपने चिठ्ठे की रैंकिंग बढ़ाने के लिये न तो कभी मैंने “सेक्स” नाम का टैग लगाया, न ही “एंजेलीना जोली” नाम का, फ़िर क्या दुःख है भाई? रघुराज जी यहीं नहीं थमे, अपनी बात को वज़नदार बनाने के चक्कर में बेचारे “दीपक भारतदीप” जी की एक-दो पोस्ट को मेरे साथ लपेट ले गये। दीपक जी एक बेहद सीधे-सादे इंसान हैं, रहीम, कबीर, चाणक्य आदि पर ज्ञानवर्धक लेख लिखते हैं, किसी के लेने-देने में नहीं रहते, न किसी से खामख्वाह उलझते हैं। उन दीपक जी को भी नसीहत देते हुए रघुराज जी उनके अंग्रेजी हिज्जों पर पिल पड़े (कि स्पेलिंग गलत है)। जबकि मेरे हिसाब से अंग्रेजी में यदि कोई गलती है भी तो उसे नज़र-अन्दाज़ किया जाना चाहिये, क्योंकि वह हिन्दी ब्लॉगरों की भाषा ही नहीं है, लेकिन यदि बाल की खाल न निकाली तो फ़िर महान पत्रकार कैसे कहलायेंगे?

सीधी तरह तर्कों से बताओ कि ज्यादा “टैग” लगाने से क्या-क्या नुकसान हैं? कितने पाठक हैं जो लेख के साथ “टैग” भी पढ़ते हैं और उसके कारण उकता जाते हैं? यदि ज्यादा टैग लगायें तो क्या तूफ़ान आ गया और यदि कम टैग लगाऊँ तो क्या कहर बरपा होगा? (जवाब का इंतजार रहेगा) तो ये तो थी मुलम्मे वाली (यानी कलई, यानी नकली) बात, अब आते हैं उनके असली दर्द पर…

पहले व्यंग्यात्मक शैली में मेरी हँसी उड़ाने के बाद इन्होंने नरेन्द्र मोदी को घसीटने की कोशिश की, और उनका असली दर्द खुलकर सामने आ गया। नरेन्द्र मोदी, भाजपा या संघ की किसी भी तरह की तारीफ़ से दिल्ली/मुम्बई में बैठे कई लोगों को “पेचिश” हो जाती है, वे उस तारीफ़ करने वाले की आलोचना के बहाने ढूँढते हैं, और चूँकि ज़ाहिरा तौर पर वे “सेकुलर”(?) होते हैं इसलिये सीधे तर्कों में बात नहीं करते। ये बात वे खुद जानते हैं कि जैसे ही वे सेकुलर शब्द का उल्लेख भर करेंगे, शाहबानो केस का भूत उनका गला पकड़ लेगा, जैसे ही सेकुलर भजन शुरु किया जायेगा, कांग्रेस के 40 साला राज में हुए सैकड़ों हिन्दू-मुस्लिम दंगे एक साथ कोरस में उनका साथ देने लग जायेंगे, जैसे ही वे “फ़िलीस्तीन” नाम का मंझीरा बजायेंगे, जम्मू के विस्थापित हिन्दू उनके कपड़े उतारने को बेताब हो जायेंगे… सिलसिला अन्तहीन है, इसलिये ये लोग एक “गैंग” बनाकर अपरोक्ष रूप से हमला करते हैं, कुछ लोग पहले ईमेल भेजकर गरियाते हैं, फ़िर एकाध सेकुलर लेखक इस अदा में पोस्ट पटकता है कि “हम ही श्रेष्ठ हैं, बाकी के सब कीड़े-मकोड़े हैं…”।

अक्सर नसीहत दी जाती है कि ब्लॉग का कंटेण्ट (सामग्री) महत्वपूर्ण होता है और वही ब्लॉग आगे ज़िन्दा रहेगा, और मुझे लगता है कि डेढ़ साल में 250 से अधिक एकल ब्लॉग लिखने, 80-85 सब्स्क्राइबर होने और 34,000 से ज्यादा हिट्स आने के बाद, ब्लॉग में कण्टेण्ट सम्बन्धी किसी सेकुलर सर्टिफ़िकेट की मुझे आवश्यकता नहीं है। सांप्रदायिकता का मतलब भी मुझे समझाने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि सफ़दर नागौरी भी उज्जैन का है और सोहराबुद्दीन भी था। मैं एक आम लेखक हूँ, जो दिल से लिखता है दिमाग से नहीं। मुझे दिल्ली/मुम्बई में पत्रकारिता में कैरियर नहीं बनाना है जो मैं किसी की चमचागिरी करता फ़िरूँ, और कौन नहीं जानता कि ये तथाकथित पत्रकार किस मिट्टी के बने होते हैं। कुछ पत्रकार आरुषि हत्याकांड की “क्लिप” दिखा-दिखाकर चैनल की टीआरपी बढ़ने पर शैम्पेन की पार्टी देते हैं, तो कुछ चापलूसी में इतने गिर जाते हैं कि अपने ज़मीर का सौदा कुछेक हज़ार रुपये में कर डालते हैं। एक साहब तो विदेशी बाला से शादी रचाने के फ़ेर में अपनी देसी बीवी को जलाकर मार चुके हैं, अस्तु।

यह बात मैं पहले भी कह चुका हूँ कि मैं “नेटवर्क” बनाने के मामले में एकदम असफ़ल हूँ, मैंने अपने ब्लॉग पर कोई ब्लॉग-रोल नहीं लगाया हुआ है, ज़ाहिर है कि मेरा चिठ्ठा भी बहुत कम लोगों के ब्लॉग रोल में मौजूद है, मैं खामख्वाह की टिप्पणियाँ भी कम ही कर पाता हूँ, इतनी सारी पोस्ट लिखने के बावजूद चिठ्ठाचर्चा में मेरे चिठ्ठे की चर्चा कभी भूले-भटके ही होती है, न मुझे ऐसी “फ़ोरम” पता हैं जहाँ से अपने चिठ्ठे का प्रचार किया जाता है, लेकिन मुझे सिर्फ़ लिखने से मतलब है, कौन पढ़ता है, कौन नहीं पढ़ता, कितनी टिप्पणियाँ आती हैं, इससे कोई मतलब नहीं। यदि मुझे हिट्स का मोह होता तो मैं दिन भर सिर्फ़ टिप्पणियाँ ही करता या लम्बा-चौड़ा ब्लॉग रोल बनाता (जिससे की एक-दूसरे की पीठ खुजाने की शैली में मेरा चिठ्ठा भी कई लोग अपने ब्लॉग रोल में लगाते) और बड़े पत्रकारों की चमचागिरी करता रहता, लेकिन जैसा कि मैंने कहा, मैं “नेटवर्क” बनाने में कमज़ोर हूँ। हाँ… मेरे ब्लॉग पर सभी तरह का माल मिलेगा, “टैग” भी और विज्ञापन भी (मैं कोई संत-महात्मा नहीं हूँ जिसे ब्लॉग से कमाई बुरी लगे)। मैं ब्लॉग जगत में आया ही इसलिये हूँ कि मुझे किसी घटिया से सम्पादक की चिरौरी न करना पड़े, क्योंकि मेरे लेख छापने की ताब शायद ही किसी अखबार में हो।

इस “छटाँक भर” लेख का लब्बेलुआब ये है कि रघुराज जी का यह “टैग” वाला लेख सरासर एक बहाना था, कुछ “स्वयंभू” बड़े पत्रकारों को मेरे पिछले कुछ लेख चुभ गये हैं खासकर “सेकुलर बुद्धिजीवी…”, “धर्मनिरपेक्षों को नंगा करने के लिये जम्मूवासी…” और “राष्ट्रीय स्वाभिमान…” वाला, इससे वे तिलमिला गये हैं, लेकिन मैं इसमें क्या कर सकता हूँ? मैं तो खुल्लमखुल्ला कहता हूँ कि मैं इसी प्रयास में हूँ कि “सेकुलर” शब्द को एक गाली बना दूँ, कोई छिपाने वाली बात नहीं है। कान का मैल निकालकर साफ़-साफ़ सुनें… मैं पीठ पीछे से हमला नहीं करता, मुझे मखमल के कपड़े में लपेट कर जूता मारना नहीं आता, हम तो पानी में जूता भिगो-भिगोकर मारने वालों में से हैं। मैं हर प्रकार के और किसी भी भाषा शैली के ईमेल और लेख से निपटने में सक्षम हूँ (बल्कि यदि कुछ व्यक्तिगत ईमेल सार्वजनिक कर दूँ तो कईयों की पोल खुल जायेगी, लेकिन वह मेरी नीति के खिलाफ़ है)। जब मैं किसी से नहीं उलझता तो कोई मुझसे खामख्वाह न उलझे, बात करनी हो तो तर्कों के साथ और मुद्दे पर करे, “अ-मुद्दे” को मुद्दा बनाकर नहीं। आशा है कि दीपक भारतदीप जी भी इन सभी बिन्दुओं से सहमत होंगे। दीपक जी पहले भी एक पोस्ट में कह चुके हैं कि महानगरों में रहने वाले कुछ ब्लॉगर अपने-आपको ज़मीन से दो इंच ऊपर समझते हैं और कस्बों और छोटे शहरों से आने वाले ब्लॉगरों को अपने तरीके से हांकने की कोशिश करते हैं या नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं (श्री रवि रतलामी जी अपवाद हैं, क्योंकि उनका काम बोलता है) और इस कोशिश में “पत्रकार नाम की बिरादरी” ज्यादा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है, आशा है कि इस छटांक भर लेख में शामिल विभिन्न बिन्दुओं पर बहस के काफ़ी मुद्दे मिलेंगे और कईयों के दिमाग के जाले साफ़ होंगे।

अब अन्त में कुछ शब्द मेरे उन सब्स्क्राइबरों के लिये जो यह सोच रहे होंगे कि आखिर यह लेख क्या बला है? क्योंकि मेरे 90% सब्स्क्राईबर, ब्लॉग जगत से नावाकिफ़ हैं और वे नहीं जानते कि हिन्दी ब्लॉग-जगत में यह सब तो चलता ही रहता है। कृपया मेरे ऐसे पाठक इस लेख को “इग्नोर” करें, यह समझें कि गलती से यह लेख उनके मेल-बॉक्स में आ गया है…

अब इस पोस्ट के साथ “पचास ग्राम के टैग” भी नहीं लगाता और देखता हूँ कि इससे ट्रैफ़िक पर कोई असर पड़ता है या नहीं। तो ब्लॉगर बन्धुओं, अब इस “छटाँक” भर की पोस्ट पर किलो भर की टिप्पणियाँ मत कर दीजियेगा। आप इसे बुरा सपना मानकर भूल जाइये, क्योंकि बुरे सपने बार-बार आना अच्छी बात नहीं है…

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