रामदेव की गंगा रक्षा-विस्फोट.काम का सच

ये ऐसा झूठ यहां देखें विस्फोट.कॉम पर छापा गया है जो आज की धङाधङ हिट पोस्टहै .सच्चाई यहां हाजिर है विस्फोट.कॉम पर अक्सर अच्छे लेख छपते हैं और मैं इसका नियमित पाठक हूं.पर अबकी बार वैबसाइट के संचालकों ने तथ्यों की सत्यता को नहींपरखा लगता है.

"जेपी इंडस्ट्रीज रामदेव के योगग्राम में पैसा लगाता है और गंगारक्षा का दावा करनेवाले बाबा रामदेव गंगा रक्षा के पांच सूत्रीय मांगोंमें गंगा एक्सप्रेस हाईवे का जिक्र करना भी भूल जाते हैं. इससे गंगा रक्षामंच और उद्योगपतियों के अन्तर्सम्बन्धों से हकीकत खुद बखुद सामने आ गई है।वैसे भी गंगा में जो भी उतरेगा उसे कपड़े उतारने पडेंगे। और कपड़े उतरेंगेको बहुत कुछ दिखेगा। दामन पर लगे दाग गंगा बाद में धोएगी पहले तो वहसार्वजनिक होगा। वही बाबा रामदेव के साथ हो रहा है।""

इसके बाद लेखक महोदय पांच सूत्रीय मांग पत्र छापते है जो आधा झूठ है और आधा सच

पहली बात। बाबा ने गंगा रक्षा मंच के बैनर तले एक हस्ताक्षर अभियान चलारखा है। हस्ताक्षर अभियान गंगा के सवाल पर केन्द्रीय एवं सम्बन्धित राज्यसरकारों के समक्ष प्रस्तुत मांग पत्र के समर्थन में है। मांग क्या है, इसपर गौर फरमाने की जरूरत है।एकगंगा को राष्ट्रीय नदी / राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाए।दोकेन्द्रीय स्तर उच्चाधिकार सम्पन्न गंगा संरक्षण प्राधिकरण गठित किया जाए।तीनप्रदूषित जल को निर्धारित मानकों के अनुरूप शोधित करने की व्यवस्था सुनिश्चित हो।चारगन्दे नालों, कल-कारखानों के प्रदूषित जल एवं लावारिस पशुओं के शव आदि को गंगा जी में डालना संज्ञेय अपराध घोषित किया जाए।पांचटिहरी बांध परियोजना के जो लाभ निर्धारित किए गए थे उनकी उपलब्धि के सम्बन्ध में केन्द्र सरकार एक श्वेत पत्र जारी करे।

नीचे जो फोटोग्राफ दिया गया है यहां देखें उस मांग पत्र की फोटो प्रतिलिपि जिसमं साफ साफ लिखा है कि गंगा रक्षा मंच की पहली और प्रमुख मांगी ही गंगा एक्सप्रेस हाईवै जैसी परियोजनाओं पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग है वह उस माग पत्र की फोटो प्रतिलिपि है जो पूरे भारतवर्ष मैं एक साथ पतंजली योग समितियों के माध्यम से जिला और प्रांत स्तर पर दी गई है.आगे ये श्रीमान लिखते हैं .

सवाल उठता है कि मंच ने, बाबा ने गंगा के अविरल बहाव की बात क्यों नहींकी? क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो भागीरथी पर, गंगा पर बनने वाले बांधों कानिर्माण रोकना पडेगा । टिहरी बांधको तोडकर गंगा की धारा को मुक्त करनापडेगा। टिहरी बांध किसने बनाया जे पी इण्डस्ट्रीज ने। जिसके पास गंगाएक्प्रेस हाइवे का भी ठेका है इसलिए मांगपत्र में गंगा एक्सप्रेस हाइवे सेसम्बन्धित कोइ बात नहीं है। सवाल है कि क्या गंगा रक्षा मंच और बाबारामदेव गंगा एक्सप्रेसवे को गंगा के लिए खतरा नहीं मानते

इस पूरे आंदोलन का मूल नारा ही निर्मल गंगा अविरल गंगा है जो कि ये स्वयेंही इसको लिखकर भूल गये और नीचे कुछ और ही लिख डाला जो कि पांचवी मांग है

बाबा रामदेव के उध्योंग पतियों से संबंध होना क्या अन्याय है,और यदि वे योग और प्राणायाम के इस यज्ञ मैं अपनी आहुति देना चाहें तो क्या गलत .बात है.

खैर मुद्दे से न भटकते हुए बाकि और भी बहुत कुछ लिखा है उसमें पर अभी सिर्फ इनका झूठ ही सामने लाना था .

आजकल प्रगतिशील कहलाने के लिए ये आवश्यक हो गया है किभारतीय सभ्यता संस्कृति या साधू संतो को बदनाम किया जाये या गालियां निकाली जाये और ये सब ब्लॉग पर करने का अर्थ है कि पोस्ट का हिट होना. भगवान इनको सद्बुध्दी दे….

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>पोप का साम्राज्य और उनका दुःख…

>Pope & Conversion in India
जी न्यूज़ पर चर्च के बारे में एक सीरिज़ आ रही है, जिसमें बताया गया है कि भारत सरकार के बाद इस देश में भूमि का सबसे बड़ा अकेला मालिक है “चर्च”, जी हाँ, “चर्च” के पास इस समय समूचे भारत में 52 लाख करोड़ की भू-सम्पत्ति है। इसमें से लगभग 50 प्रतिशत ज़मीन उसके पास अंग्रेजों के समय से है, लेकिन बाकी की ज़मीन तमाम केन्द्र और राज्य सरकारों ने उसे धर्मस्व कार्य हेतु “दान” में दी है।

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि धर्म के नाम पर सबसे अधिक रक्तपात इस्लाम और ईसाई धर्मावलम्बियों द्वारा किया गया है। ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना, सेवा करने के लिये स्कूल और अस्पताल खोलना आदि चर्च के मुख्य काम हैं, लेकिन असल में इसका मकसद ईसाईयों की संख्या में वृद्धि करना होता है। गरीब, ज़रूरतमंद, अशिक्षित लोग इनके फ़ेंके हुए झाँसे में आ जाते हैं, रही-सही कसर भारी-भरकम पैसे और नौकरी का लालच पूरी कर देता है। “चर्च” की सत्ता और धन-सम्पत्ति के अकूत भण्डार के बारे में जब-तब कई पुस्तकों और जर्नलों में प्रकाशित होता रहता है। भारत में चर्च फ़िलहाल “गलत” कारणों से चर्चा में है, ज़ाहिर है कि “धर्मान्तरण” के मामले को लेकर। इन घटनाओं पर “पोप” भी बहुत दुखी हैं और उन्होंने भारत में अपने प्रतिनिधियों और भारत सरकार (इसे सोनिया गाँधी पढ़े) के समक्ष चिन्ता जताई है।

पोप का दुखी होना स्वाभाविक भी है, जिस “एकमात्र सच्चे धर्म” का जन्म 2008 वर्ष पहले समूची धरती से “विभिन्न गलत अवधारणाओं को मिटाने के लिये” हुआ था, उस पर भारत जैसे देश में हमले हो रहे हैं। चर्च और पोप की सत्ता जिस “प्रोफ़ेशनल” तरीके से काम करती है, उसे देखकर बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनियाँ भी शर्मा जायें। जिस तरह विशाल कम्पनियों में “बिजनेस प्लान” बनाया जाता है, ठीक उसी तरह रोम में ईसाई धर्म के प्रचार के लिये “वार-प्लान” बनाया जाता है। यह “योजनायें” विभिन्न देशों, विभिन्न क्षेत्रों, विभिन्न धर्मों के लिये अलग-अलग होती हैं। इन सभी योजनाओं को “गहन मार्केटिंग रिसर्च” और विश्लेषण के बाद तैयार किया जाता है। जिस प्रकार एक कम्पनी अपने अगले आने वाले 25 वर्षों का एक “प्रोजेक्शन” तैयार करती है, उसी प्रकार इसे भी तैयार किया जाता है। ऐसा बताया जाता है कि वर्तमान में ऐसी 1590 योजनायें चल रही हैं जो कि सन् 2025 तक बढ़कर 3000 हो जायेंगी। सन् 2025 के “प्रोजेक्शन” के अनुसार बढ़ोतरी इस प्रकार की जाना है (यानी कि टारगेट यह दिया गया है) वर्तमान 35500 ईसाई संस्थायें बढ़कर 63000, धर्म परिवर्तन के मामले 35 लाख से बढ़कर 53 लाख, 4100 विभिन्न मिशनरी संस्थायें बढ़कर 6000, 56 लाख धर्मसेवकों की संख्या बढ़ाकर 65 लाख (पूरे यूरोप की समूची सेना से भी ज्यादा संख्या) किया जाना है। वर्तमान में चर्च की कुल सम्पत्ति (भारत में) 13,71,000 करोड़ है (जिसमें खाली पड़ी ज़मीन शामिल नहीं है), यह राशि भारत के GDP का 60% से भी ज्यादा है, इसे भी बढ़ाकर 2025 तक 40,00,000 करोड़ किया जाना प्रस्तावित है।

इवेलैंजिकल चर्च द्वारा लाखों की संख्या में साहित्य बाँटा जाता है। वर्तमान में चर्च द्वारा 20 करोड़ बाइबल, 70 लाख बुकलेट, 1,70,000 मिशनरी साहित्य, 60000 पत्रिकायें और 18000 लेख वितरित किये जाते हैं, सन् 2025 तक इसे बढ़ाकर दोगुना करने का लक्ष्य दिया गया है। इसी प्रकार चर्च द्वारा अलग-अलग देशों में संचालित विभिन्न रेडियो और टीवी स्टेशनों की संख्या 4050 से बढ़ाकर 5000 करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। हालांकि चर्च द्वारा अपरोक्ष रूप से “खरीदे हुए” कई चैनल चल ही रहे हैं, लेकिन इससे उनका नेटवर्क और भी मजबूत होगा। बजट देखें तो हाल-फ़िलहाल प्रति व्यक्ति को ईसाई बनाने का खर्च लगभग 1.55 करोड़ रुपये आता है (सारे खर्चे मिलाकर) जिसे 2025 तक बढ़ाकर 3.05 करोड़ प्रति व्यक्ति कर दिया गया है।

दुनिया भर के चार्टर्ड अकाउंटेण्ट्स के लिये एक खुशखबरी है। चर्च द्वारा इन चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को किसी भी बड़ी से बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी से अधिक भुगतान किया जाता है। चर्च द्वारा हिसाब-किताब रखने के लिये लगभग 4800 करोड़ रुपये ऑडिट फ़ीस के रूप में दिये जाते हैं। लेकिन पोप की मुश्किलें यहीं से शुरु भी होती हैं, एक अनुमान के अनुसार चर्च के पैसों में घोटाले का आँकड़ा बेहद खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है, जिसके सन् 2025 तक बहुत ज़्यादा बढ़ जाने की आशंका है। इस प्रकार चर्च एक संगठित MNC की तरह काम करता है, भले ही इसमें आर्थिक घोटाले होते रहते हैं, अधिक जानकारी के लिये International Bulletin of Missionary Research (IBMR, जनवरी 2002 का अंक) देखा जा सकता है।

पोप की मुश्किलें भारत में और बढ़ जाती हैं जब जयललिता और नरेन्द्र मोदी जैसे “ठरकी” लोग धर्मान्तरण के खिलाफ़ अपने-अपने राज्यों में कानून लागू कर देते हैं, उनकी देखादेखी शिवराज और वसुन्धरा जैसे लोग भी ऐसा कानून बनाने की सोचने लगते हैं। यदि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जायेगी तो पोप 2000 साल पुराने इस सबसे पवित्र धर्म को कैसे बचायेंगे? उनकी विशाल “सेना” क्या करेगी? जबकि उसमें से भी 5 लाख लोग प्रतिवर्ष रिटायर हो जाते हैं, उससे अधिक की नई भरती की जाती है। “चर्च” दुनिया की सबसे बड़ी रोज़गार निर्माता “कम्पनी” है। जयललिता और मोदी दुनिया के उस इलाके से आते हैं जहाँ के गरीबों को “सेवा” और “पवित्र धर्म” की सबसे अधिक ज़रूरत है। IBMR की रिपोर्ट के अनुसार भारत में किसी भी गरीब को ईसाई बनाने का खर्च दुनिया के किसी विकसित देश के मुकाबले 700 गुना (जी हाँ 700 गुना) सस्ता है। भारत पोप के लिये सबसे “सस्ता बाजार” है, लेकिन जयललिता और मोदी जैसे लोग उनका रास्ता रोकना शुरु कर देते हैं। पोप और उनके भारतीय “भक्त” इस प्रयास में हैं कि इस प्रकार के कानून और न बनने पायें, जो बने हैं उन्हें भी हटा लिया जाये, टीवी चैनलों पर चर्च की छवि एक “सेवाभावी”, “दयालु” और “मददगार” की ही दिखाई दे (ये और बात है कि नागालैण्ड जैसे राज्य में जैसे ही ईसाई बहुसंख्यक होते हैं, हथियारों के बल पर बाकी धर्मों के लोगों को वहाँ से खदेड़ना शुरु कर देते हैं), और इस कार्य में वे सफ़ल भी हुए हैं, क्योंकि उन्हें भारत के भीतर से ही “सेकुलरिज़्म” के नाम पर बहुत लोग समर्थन(?) के लिये मिल जाते हैं।

तो कहने का तात्पर्य यह है कि पोप अपने विशाल साम्राज्य के बावजूद भारत के मामले में बहुत दुःखी हैं, आइये उन्हें सांत्वना दें… और हाँ यदि आप में भी “सेवा”(?) की भावना हिलोरें लेने लगी हो, तो एक NGO बनाईये, चर्च से पैसा लीजिये और शुरु हो जाईये… भारत जैसे देश में “सेवा” का बहुत “स्कोप” है…

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पोप का साम्राज्य और उनका दुःख…

Pope & Conversion in India
जी न्यूज़ पर चर्च के बारे में एक सीरिज़ आ रही है, जिसमें बताया गया है कि भारत सरकार के बाद इस देश में भूमि का सबसे बड़ा अकेला मालिक है “चर्च”, जी हाँ, “चर्च” के पास इस समय समूचे भारत में 52 लाख करोड़ की भू-सम्पत्ति है। इसमें से लगभग 50 प्रतिशत ज़मीन उसके पास अंग्रेजों के समय से है, लेकिन बाकी की ज़मीन तमाम केन्द्र और राज्य सरकारों ने उसे धर्मस्व कार्य हेतु “दान” में दी है।

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि धर्म के नाम पर सबसे अधिक रक्तपात इस्लाम और ईसाई धर्मावलम्बियों द्वारा किया गया है। ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना, सेवा करने के लिये स्कूल और अस्पताल खोलना आदि चर्च के मुख्य काम हैं, लेकिन असल में इसका मकसद ईसाईयों की संख्या में वृद्धि करना होता है। गरीब, ज़रूरतमंद, अशिक्षित लोग इनके फ़ेंके हुए झाँसे में आ जाते हैं, रही-सही कसर भारी-भरकम पैसे और नौकरी का लालच पूरी कर देता है। “चर्च” की सत्ता और धन-सम्पत्ति के अकूत भण्डार के बारे में जब-तब कई पुस्तकों और जर्नलों में प्रकाशित होता रहता है। भारत में चर्च फ़िलहाल “गलत” कारणों से चर्चा में है, ज़ाहिर है कि “धर्मान्तरण” के मामले को लेकर। इन घटनाओं पर “पोप” भी बहुत दुखी हैं और उन्होंने भारत में अपने प्रतिनिधियों और भारत सरकार (इसे सोनिया गाँधी पढ़े) के समक्ष चिन्ता जताई है।

पोप का दुखी होना स्वाभाविक भी है, जिस “एकमात्र सच्चे धर्म” का जन्म 2008 वर्ष पहले समूची धरती से “विभिन्न गलत अवधारणाओं को मिटाने के लिये” हुआ था, उस पर भारत जैसे देश में हमले हो रहे हैं। चर्च और पोप की सत्ता जिस “प्रोफ़ेशनल” तरीके से काम करती है, उसे देखकर बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनियाँ भी शर्मा जायें। जिस तरह विशाल कम्पनियों में “बिजनेस प्लान” बनाया जाता है, ठीक उसी तरह रोम में ईसाई धर्म के प्रचार के लिये “वार-प्लान” बनाया जाता है। यह “योजनायें” विभिन्न देशों, विभिन्न क्षेत्रों, विभिन्न धर्मों के लिये अलग-अलग होती हैं। इन सभी योजनाओं को “गहन मार्केटिंग रिसर्च” और विश्लेषण के बाद तैयार किया जाता है। जिस प्रकार एक कम्पनी अपने अगले आने वाले 25 वर्षों का एक “प्रोजेक्शन” तैयार करती है, उसी प्रकार इसे भी तैयार किया जाता है। ऐसा बताया जाता है कि वर्तमान में ऐसी 1590 योजनायें चल रही हैं जो कि सन् 2025 तक बढ़कर 3000 हो जायेंगी। सन् 2025 के “प्रोजेक्शन” के अनुसार बढ़ोतरी इस प्रकार की जाना है (यानी कि टारगेट यह दिया गया है) वर्तमान 35500 ईसाई संस्थायें बढ़कर 63000, धर्म परिवर्तन के मामले 35 लाख से बढ़कर 53 लाख, 4100 विभिन्न मिशनरी संस्थायें बढ़कर 6000, 56 लाख धर्मसेवकों की संख्या बढ़ाकर 65 लाख (पूरे यूरोप की समूची सेना से भी ज्यादा संख्या) किया जाना है। वर्तमान में चर्च की कुल सम्पत्ति (भारत में) 13,71,000 करोड़ है (जिसमें खाली पड़ी ज़मीन शामिल नहीं है), यह राशि भारत के GDP का 60% से भी ज्यादा है, इसे भी बढ़ाकर 2025 तक 40,00,000 करोड़ किया जाना प्रस्तावित है।

इवेलैंजिकल चर्च द्वारा लाखों की संख्या में साहित्य बाँटा जाता है। वर्तमान में चर्च द्वारा 20 करोड़ बाइबल, 70 लाख बुकलेट, 1,70,000 मिशनरी साहित्य, 60000 पत्रिकायें और 18000 लेख वितरित किये जाते हैं, सन् 2025 तक इसे बढ़ाकर दोगुना करने का लक्ष्य दिया गया है। इसी प्रकार चर्च द्वारा अलग-अलग देशों में संचालित विभिन्न रेडियो और टीवी स्टेशनों की संख्या 4050 से बढ़ाकर 5000 करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। हालांकि चर्च द्वारा अपरोक्ष रूप से “खरीदे हुए” कई चैनल चल ही रहे हैं, लेकिन इससे उनका नेटवर्क और भी मजबूत होगा। बजट देखें तो हाल-फ़िलहाल प्रति व्यक्ति को ईसाई बनाने का खर्च लगभग 1.55 करोड़ रुपये आता है (सारे खर्चे मिलाकर) जिसे 2025 तक बढ़ाकर 3.05 करोड़ प्रति व्यक्ति कर दिया गया है।

दुनिया भर के चार्टर्ड अकाउंटेण्ट्स के लिये एक खुशखबरी है। चर्च द्वारा इन चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को किसी भी बड़ी से बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी से अधिक भुगतान किया जाता है। चर्च द्वारा हिसाब-किताब रखने के लिये लगभग 4800 करोड़ रुपये ऑडिट फ़ीस के रूप में दिये जाते हैं। लेकिन पोप की मुश्किलें यहीं से शुरु भी होती हैं, एक अनुमान के अनुसार चर्च के पैसों में घोटाले का आँकड़ा बेहद खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है, जिसके सन् 2025 तक बहुत ज़्यादा बढ़ जाने की आशंका है। इस प्रकार चर्च एक संगठित MNC की तरह काम करता है, भले ही इसमें आर्थिक घोटाले होते रहते हैं, अधिक जानकारी के लिये International Bulletin of Missionary Research (IBMR, जनवरी 2002 का अंक) देखा जा सकता है।

पोप की मुश्किलें भारत में और बढ़ जाती हैं जब जयललिता और नरेन्द्र मोदी जैसे “ठरकी” लोग धर्मान्तरण के खिलाफ़ अपने-अपने राज्यों में कानून लागू कर देते हैं, उनकी देखादेखी शिवराज और वसुन्धरा जैसे लोग भी ऐसा कानून बनाने की सोचने लगते हैं। यदि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जायेगी तो पोप 2000 साल पुराने इस सबसे पवित्र धर्म को कैसे बचायेंगे? उनकी विशाल “सेना” क्या करेगी? जबकि उसमें से भी 5 लाख लोग प्रतिवर्ष रिटायर हो जाते हैं, उससे अधिक की नई भरती की जाती है। “चर्च” दुनिया की सबसे बड़ी रोज़गार निर्माता “कम्पनी” है। जयललिता और मोदी दुनिया के उस इलाके से आते हैं जहाँ के गरीबों को “सेवा” और “पवित्र धर्म” की सबसे अधिक ज़रूरत है। IBMR की रिपोर्ट के अनुसार भारत में किसी भी गरीब को ईसाई बनाने का खर्च दुनिया के किसी विकसित देश के मुकाबले 700 गुना (जी हाँ 700 गुना) सस्ता है। भारत पोप के लिये सबसे “सस्ता बाजार” है, लेकिन जयललिता और मोदी जैसे लोग उनका रास्ता रोकना शुरु कर देते हैं। पोप और उनके भारतीय “भक्त” इस प्रयास में हैं कि इस प्रकार के कानून और न बनने पायें, जो बने हैं उन्हें भी हटा लिया जाये, टीवी चैनलों पर चर्च की छवि एक “सेवाभावी”, “दयालु” और “मददगार” की ही दिखाई दे (ये और बात है कि नागालैण्ड जैसे राज्य में जैसे ही ईसाई बहुसंख्यक होते हैं, हथियारों के बल पर बाकी धर्मों के लोगों को वहाँ से खदेड़ना शुरु कर देते हैं), और इस कार्य में वे सफ़ल भी हुए हैं, क्योंकि उन्हें भारत के भीतर से ही “सेकुलरिज़्म” के नाम पर बहुत लोग समर्थन(?) के लिये मिल जाते हैं।

तो कहने का तात्पर्य यह है कि पोप अपने विशाल साम्राज्य के बावजूद भारत के मामले में बहुत दुःखी हैं, आइये उन्हें सांत्वना दें… और हाँ यदि आप में भी “सेवा”(?) की भावना हिलोरें लेने लगी हो, तो एक NGO बनाईये, चर्च से पैसा लीजिये और शुरु हो जाईये… भारत जैसे देश में “सेवा” का बहुत “स्कोप” है…

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पता नहीं उनको ज़टिल क्यों लगे मलय ?

जिनको मलय जटिल लगें उनको मेरा सादर प्रणाम स्वीकार्य हो मुझे डाक्टर साहब को समझाने का रास्ता दिखा ही दिया उन्होंने जिनको मेरे पड़ोसी मलय जी जटिल लगते हैं । लोगो का मत था की मलय जी पक्के प्रगतिशील हैं वे धार्मिक सामाजी संस्कारों की घोर उपेक्षा करतें हैं …..हर होली पे मलय को रंग में भीगा देखने का मौका गेट नंबर चार जहाँ मलय नामक शिव की कुटिया है में मिलेंगे इस बार तो गज़ब हो गया मेरी माता जी को पितृ में मिलाना पिताजी ने विप्र भोज के लिए मलय जी को न्योत लिया मुझे भी संदेह था किंतु समय पर दादा का आना साबित कर गया की डाक्टर मलय जटिल नहीं सहज और सरल है।
अगर मैं नवम्बर की २९वीं तारीख की ज़गह १९ को पैदा होता तो हम दौनो यानी दादा और मैं साथ-साथ जन्म दिन मनाते हर साल खैर……….!
हाँ तो जबलपुर की लाल मुरम की खदानें जहाँ थीं [अभी कुछ हैं शायद ]उसी सहसन ग्राम में १९ -११-१९२९ को जन्में मलय जी की जीवन यात्रा बेहद जटिल राहों से होकर गुज़री है किंतु दादा की यात्रा सफल है ये सभी जानते हैं । देश भर में मलय को उनकी कविता ,कहानी,की वज़ह से जाना जाता है। जो इस शहर का सौभाग्य ही तो है की मलय जबलपुर के हैं । वे वास्तव में सीधी राह पे चलते हैं , उनको रास्तों में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के
प्रबंध करते नहीं बनते। वे भगोडे भी नहीं हैं सच तो ये है कि “शिव-कुटीर,टेली ग्राफ गेट नंबर चार,कमला नेहरू नगर निवासी कोई साहित्यिक सांस्कृतिक टेंट हाउस नहीं चलाते , बस पडतें हैं लिखतें हैं जैसे हैं वैसे दिखतें हैं ।
उनसे मेरा वादा है “दादा,आपके रचना संसार पर मुझे काम करना है “
उन्होंने झट कहा “आप,जैसा चाहो ………………….!”

ज्ञानरंजन जी के पहल प्रकाशन से प्रकाशित मलय जी की पुस्तक ”शामिल होता हूँ ” में ४२ कवितायेँ इस कृति से जिसमें उनकी १९७३ से १९९१ के मध्य लिखी गई कविताओं से एक कविता के अंश का रसास्वादन आप भी कीजिए
“पानी ही बहुत आत्मीय “
पानी
अपनी तरलता में गहरा है
अपनी सिधाई में जाता है
झुकता मुड़ता
नीचे की ओर
जाकर नीचे रह लेता है
अंधे कुँए तक में
पर पानी
अपने ठंडे क्रोध में
सनाका हो जाता है
ठंडे आसमान पर चढ़ जाता है
तो हिमालय के सिर पर
बैठकर
सूरज के लिए भी
चुनौती हो जाता है
पर पानी/पानी है
बहुत आत्मीय
बहुत करोड़ों करोड़ों प्यासों का/अपना
रगों में खून का साथी /हो बहता है
पृथ्वी-व्यापी जड़ों से होकर
बादल की खोपडी तक में
वही होता है-ओर अपने
सहज स्वभाव के रंगों से
हमको नहलाता है
सूरज को भी/तो आइना दिखाता है
तब तकरीबन पानी
समय की घंटियाँ बजाता है
और शब्दों की
सकेलती दहार में कूदकर
नदी हो जाने की /हाँक लगाता है
पानी बहा जा रहा है
पिया जा रहा है जिया जा रहा है

मलय जी की यह रचना लम्बी है पाठकों के लिए एक अंश छाप रहा हूँ आप सुधि पाठक चाहेंगे तो शेष भाग अगली पोस्ट में प्रकाशित कर ही दूंगा,
मुझे यकीन है कि “रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून …”को विस्तार देती या रचना आपको पसंद आयी होगी …………और हाँ मलय जी जटिल नहीं हैं इस बात की पुष्टि आप ख़ुद ही कर सकतें हैं…….

>अविवाहित प्रधानमंत्री के बारे में क्या विचार है?

>Unmarried Prime Minister of India
किसी भी व्यक्ति का अविवाहित रहना या न रहना उसका व्यक्तिगत मामला होता है। लेकिन जब यह परिस्थिति राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वालों की होती है तब इसे मीडिया व्यक्तिगत नहीं रहने देता। फ़िलहाल देश में कुछ ऐसे राजनैतिक व्यक्तित्व उभर रहे हैं जो कि एक लक्ष्य को लेकर अविवाहित रहे हैं। कुछ उस वक्त की परिस्थितियाँ और कुछ उसकी विचारधारा का प्रवाह, लेकिन कई व्यक्तियों ने आजीवन अविवाहित रहने का फ़ैसला किया है।

देश के राजनैतिक परिदृश्य पर इस वक्त सबसे आगे और सबसे तेज तीन नाम चमक रहे हैं, और संयोग देखिये कि तीनों ही अविवाहित हैं। पहला नाम है राहुल गाँधी का जो कि 39 वर्ष के होने के बावजूद “फ़िलहाल” अविवाहित हैं, दूसरा नाम है बसपा नेत्री मायावती (53 वर्ष) का और तीसरा नाम है नरेन्द्र मोदी (59 वर्ष) का। यदि इन तीनों व्यक्तित्वों की पार्टियाँ सही समय पर सही गतिविधियाँ और राजनैतिक पैंतरेबाजी करें तो निश्चित जानिये कि भारत का अगला प्रधानमंत्री कोई “अविवाहित” होगा (जो कि न सिर्फ़ भारत बल्कि विश्व में भी काफ़ी कम ही देखने में आया है)। इन तीनों नामों में राहुल गाँधी को इस क्लब में जोड़ने का एकमात्र कारण उनका “फ़िलहाल” अविवाहित होना ही है, लेकिन उनकी उम्र काफ़ी कम है इसलिये भविष्य के बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन बाकी के दोनो व्यक्तित्वों के बारे में कहा जा सकता है कि उनके अविवाहित ही रहने की सम्भावना काफ़ी है। सवाल है कि क्या अविवाहित रहने वाले सामाजिक और राजनैतिक व्यक्तित्व अपने लक्ष्यों के प्रति अधिक समर्पित होते हैं? क्या उनका अविवाहित रहना उनकी विचारधारा और पार्टी तथा देश के लिये फ़ायदेमन्द होता है? लगता तो ऐसा ही है…

सबसे पहले बात करते हैं मायावती के बारे में। उल्लेखनीय है कि कांशीराम भी आजीवन अविवाहित रहे, उन्होंने अपना सारा जीवन समाज के दबे-कुचले वर्गों को संगठित करने में लगा दिया। सरकारी नौकरी में रहे, “बामसेफ़” नाम का संगठन तैयार किया, जिसका विस्तारित राजनैतिक रूप “बहुजन समाज पार्टी” के रूप में देश के सामने आया। कांशीराम ने सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा देकर अपने-आप को पार्टी के काम के लिये झोंक दिया। वे अपनी “पेन” वाली थ्योरी के इतने कायल थे कि हर जगह, हर सभा में, हर इंटरव्यू में वह “खड़े पेन” का उदाहरण अवश्य देते थे। बात थी विचारधारा की, सो उन्होंने पार्टी को बनाने में दिन-रात एक कर दिया, न अपनी परवाह की न अपने विवाह के बारे में सोचा। उन्होंने देश और उत्तरप्रदेश के सघन दौरे करके पार्टी को इतना मजबूत बना दिया कि अब उत्तरप्रदेश में कोई भी सरकार बसपा के बगैर बन नहीं सकती। इन्हीं कांशीराम ने जब मायावती में प्रतिभा देखी तभी उन्हें कह दिया था कि तुम IAS बनने के चक्कर में मत पड़ो, एक दिन तुम्हें मुख्यमंत्री बनना है…सैकड़ों IAS तुम्हारे आगे-पीछे हाथ बाँधे घूमते नज़र आयेंगे… कांशीराम ने जो कहा सच कर दिखाया। आज मायावती सिर्फ़ मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि प्रधानमंत्री पद की भी दावेदार हैं। बसपा नेत्री मायावती ने जब अपने उत्तराधिकारी के बारे में सार्वजनिक बयान दिया था, तो लोगों ने उस नाम के बारे में कयास लगाने शुरु कर दिये थे, खोजी पत्रकारों की बात मानें तो वह शख्स हैं राजाराम, जो कि फ़िलहाल मध्यप्रदेश के बसपा प्रभारी हैं। वे भी अविवाहित हैं और सारा जीवन बसपा को समर्पित करने का मन बना चुके हैं।

सवाल उठता है कि क्या यदि कांशीराम विवाह कर लेते तो पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारी के चलते इतना बड़ा आंदोलन वे खड़ा कर पाते? मेरे खयाल से तो नहीं… हर कोई इस बात को स्वीकार करेगा कि शादी के बाद व्यक्ति की प्राथमिकतायें बदल जाती हैं। उस व्यक्ति पर अपने परिवार की देखभाल, भरण-पोषण की जिम्मेदारी आयद होती है, रिश्तेदारियाँ निभाने का दबाव होता है जो उसे समाजसेवा या राजनीति में झोंक देने में बाधक होता है। ज़ाहिर सी बात है कि उसके अपने परिवार के प्रति कुछ कर्तव्य होते हैं जिन्हें पूरा करने के लिये उसे परिवार को समय देना ही पड़ेगा।

महात्मा गाँधी के पुत्र की आत्मकथा (जिस पर फ़िल्म “गाँधी माय फ़ादर” भी बनी) में उन्होंने कहा है कि गाँधीजी सामाजिक और राजनैतिक आंदोलनों में व्यस्त रहने के कारण परिवार को अधिक समय नहीं दे पाते थे और उनके बच्चे अकेलापन (पिता की कमी) महसूस करते थे। बहुत से पुरुषों और महिलाओं को जीवन में कभी न कभी ऐसा महसूस होता है कि यदि मेरे पीछे परिवार की जिम्मेदारियाँ न होतीं तो शायद मैं और बेहतर तरीके से और खुलकर काम कर सकता था, ये और बात है कि कर्तव्य और जिम्मेदारी के अहसास के कारण यह विचार कुछ ही समय के लिये आते हैं। ऐसे में सहज ही लगता है कि यदि राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वाले लोग अविवाहित रहते हैं तो वे अपने लक्ष्यों के प्रति अधिक सजग, सक्रिय और समर्पित हो सकते हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में तो यह बहुत पुरानी परम्परा है कि पूर्णकालिक स्वयंसेवक अविवाहित ही रहेंगे, और यह उचित भी है क्योंकि स्वयंसेवकों को सुदूर क्षेत्रों में अभावों में कई-कई दिनों तक प्रचार के लिये जाना पड़ता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं भाजपा के पितृपुरुष कुशाभाऊ ठाकरे। आज भाजपा जो भी है, जितनी भी है उसके पीछे कुशाभाऊ ठाकरे का अमिट योगदान है। उत्तर-पूर्व के राज्यों और दक्षिण में आज संघ का जो भी प्रसार है वह सिर्फ़ और सिर्फ़ कुशाभाऊ ठाकरे की अनथक मेहनत का नतीजा है। कुल एक सूटकेस ही जीवन भर उनकी गृहस्थी और सम्पत्ति रहा। दो-तीन जोड़ कपड़े, संघ का साहित्य और सादी चप्पलें पहन कर ताउम्र उन्होंने यात्राओं में बिता दी, रहना-खाना संघ कार्यालयों में और पूरा जीवन संघ को समर्पित। RSS में ऐसे कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है। अब तक हुए तमाम सरसंघचालक, जेपी माथुर, अटलबिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख, नरेन्द्र मोदी जैसे सैकड़ों लोग हैं जो कि शायद विवाह कर लेते तो पता नहीं संघ और भाजपा आज कहाँ होते।

कम्युनिस्ट पार्टियों में भी लगभग यही ट्रेण्ड रहा है उनके भी कई नेता अविवाहित रहे और पार्टी की विचारधारा के प्रचार-प्रसार में उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। नक्सलवादी आन्दोलन के प्रवर्तक कहे जाने वाले कानू सान्याल भी अविवाहित हैं। चर्च और ईसाईयत के प्रचार में लगे हुए पादरी और नन भी आजीवन अविवाहित रहने का व्रत लेते हैं ताकि वे अपना काम पूर्ण निष्ठा से कर सकें, क्योंकि विवाह करने से व्यक्ति कई प्रकार के बन्धनों में बँध जाता है। गाहे-बगाहे इन कार्यकर्ताओं के बारे में मीडिया और अन्य माध्यमों में यौन कदाचरण के मामले सामने आते रहते हैं। देश-विदेश में चर्च में बिशपों, पादरियों और ननों द्वारा घटित ऐसी कई घटनायें सामने आती रहती हैं (ये और बात है कि संघ का व्यक्ति यदि इसमें पाया जाये तो हल्ला ज्यादा होता है) कुछ समय पहले संघ के एक प्रचारक संजय जोशी के बारे में भी इस तरह की एक सीडी मीडिया में आई थी, उसमें कितनी सच्चाई है यह तो सम्बन्धित पक्ष ही जानें, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि इस प्रकार का व्यवहार पूर्णरूपेण एक मानव स्वभाव और मानवीय गलती है। इस दुनिया में शायद ही कोई ऐसा पुरुष या स्त्री होगी जिसमें कभी भी यौनेच्छा जागृत नहीं हुई हो, चाहे वह कितना भी बड़ा संत-महात्मा-पीर क्यों न हो। ऐसे में इन अविवाहित व्यक्तियों द्वारा जाने-अनजाने कभी-कभार इस प्रकार की गलती होना कोई भूचाल लाने वाली घटना नहीं है, यदि अपराध के दोषी हैं तो सजा अवश्य मिलना चाहिये। दिक्कत तब होती है जब “सेकुलर”(?) लोग अटलबिहारी वाजपेयी के जवानी के किस्से चटखारे ले-लेकर सुनाते हैं लेकिन नेहरू नामक “रंगीले रतन” को भूल जाते हैं। खैर यह विषय अलग ही है…

राहुल गाँधी के बारे में सुना गया है कि वे किसी कोलम्बियन कन्या से शादी करना चाहते हैं, लेकिन शायद बात कहीं अटक रही है। यदि वे विवाह कर लेते हैं तो फ़िर “अविवाहित क्लब” के नेताओं में सबसे कद्दावर दो ही लोग बचेंगे, मायावती और नरेन्द्र मोदी। दोनों ही अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित कर चुके हैं, दोनों का खासा जनाधार है, दोनों ही अपनी-अपनी पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, दोनों “चुनाव-जिताऊ” भाषणों के लिये मशहूर हैं। मायावती तो “भेंट” पर सबसे अधिक टैक्स देने वाली राजनेता बन चुकी हैं, मोदी पर भी फ़िलहाल तो कोई बड़ा भ्रष्टाचार का मामला सामने नहीं आया है। ऐसे में हो सकता है कि भारत को अगले कुछ ही समय में एक अविवाहित प्रधानमंत्री मिल जाये। अविवाहित प्रधानमंत्री होने के तीन फ़ायदे तो तत्काल दिखाई दे रहे हैं, पहला वह अपना पूरा समय काम में बितायेगा, परिवार के लिये नहीं। दूसरा यह कि उसके किसी बेटे-बेटी-बहू आदि को आतंकवादी किडनैप नहीं कर सकते (क्योंकि हैं ही नहीं), तीसरा उस व्यक्ति पर वंशवाद और भाई-भतीजावाद का आरोप भी नहीं लग सकता। मायावती ने तो पहले ही कह दिया कि उनका उत्तराधिकारी उनके परिवार का कोई व्यक्ति नहीं होगा, जो कि तारीफ़ की बात तो है। संघ के सरसंघचालकों ने कभी भी अपने परिवार के किसी व्यक्ति को उत्तराधिकारी नामज़द नहीं किया, जबकि वे चाहते तो कर सकते थे और उसे संघ के लाखों कार्यकर्ता स्वीकार भी कर लेते, लेकिन फ़िर कांग्रेस और बाकियों में क्या अन्तर रह जाता?

तो प्रिय पाठकों, देश के प्रधानमंत्री के तौर पर एक अविवाहित व्यक्ति के कुछ फ़ायदे मैंने गिना दिये हैं, कुछ आप गिना दीजिये। साथ ही राहुल गाँधी, मायावती और नरेन्द्र मोदी में से आपका वोट किसे मिलेगा यह भी बताईये…

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अविवाहित प्रधानमंत्री के बारे में क्या विचार है?

Unmarried Prime Minister of India
किसी भी व्यक्ति का अविवाहित रहना या न रहना उसका व्यक्तिगत मामला होता है। लेकिन जब यह परिस्थिति राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वालों की होती है तब इसे मीडिया व्यक्तिगत नहीं रहने देता। फ़िलहाल देश में कुछ ऐसे राजनैतिक व्यक्तित्व उभर रहे हैं जो कि एक लक्ष्य को लेकर अविवाहित रहे हैं। कुछ उस वक्त की परिस्थितियाँ और कुछ उसकी विचारधारा का प्रवाह, लेकिन कई व्यक्तियों ने आजीवन अविवाहित रहने का फ़ैसला किया है।

देश के राजनैतिक परिदृश्य पर इस वक्त सबसे आगे और सबसे तेज तीन नाम चमक रहे हैं, और संयोग देखिये कि तीनों ही अविवाहित हैं। पहला नाम है राहुल गाँधी का जो कि 39 वर्ष के होने के बावजूद “फ़िलहाल” अविवाहित हैं, दूसरा नाम है बसपा नेत्री मायावती (53 वर्ष) का और तीसरा नाम है नरेन्द्र मोदी (59 वर्ष) का। यदि इन तीनों व्यक्तित्वों की पार्टियाँ सही समय पर सही गतिविधियाँ और राजनैतिक पैंतरेबाजी करें तो निश्चित जानिये कि भारत का अगला प्रधानमंत्री कोई “अविवाहित” होगा (जो कि न सिर्फ़ भारत बल्कि विश्व में भी काफ़ी कम ही देखने में आया है)। इन तीनों नामों में राहुल गाँधी को इस क्लब में जोड़ने का एकमात्र कारण उनका “फ़िलहाल” अविवाहित होना ही है, लेकिन उनकी उम्र काफ़ी कम है इसलिये भविष्य के बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन बाकी के दोनो व्यक्तित्वों के बारे में कहा जा सकता है कि उनके अविवाहित ही रहने की सम्भावना काफ़ी है। सवाल है कि क्या अविवाहित रहने वाले सामाजिक और राजनैतिक व्यक्तित्व अपने लक्ष्यों के प्रति अधिक समर्पित होते हैं? क्या उनका अविवाहित रहना उनकी विचारधारा और पार्टी तथा देश के लिये फ़ायदेमन्द होता है? लगता तो ऐसा ही है…

सबसे पहले बात करते हैं मायावती के बारे में। उल्लेखनीय है कि कांशीराम भी आजीवन अविवाहित रहे, उन्होंने अपना सारा जीवन समाज के दबे-कुचले वर्गों को संगठित करने में लगा दिया। सरकारी नौकरी में रहे, “बामसेफ़” नाम का संगठन तैयार किया, जिसका विस्तारित राजनैतिक रूप “बहुजन समाज पार्टी” के रूप में देश के सामने आया। कांशीराम ने सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा देकर अपने-आप को पार्टी के काम के लिये झोंक दिया। वे अपनी “पेन” वाली थ्योरी के इतने कायल थे कि हर जगह, हर सभा में, हर इंटरव्यू में वह “खड़े पेन” का उदाहरण अवश्य देते थे। बात थी विचारधारा की, सो उन्होंने पार्टी को बनाने में दिन-रात एक कर दिया, न अपनी परवाह की न अपने विवाह के बारे में सोचा। उन्होंने देश और उत्तरप्रदेश के सघन दौरे करके पार्टी को इतना मजबूत बना दिया कि अब उत्तरप्रदेश में कोई भी सरकार बसपा के बगैर बन नहीं सकती। इन्हीं कांशीराम ने जब मायावती में प्रतिभा देखी तभी उन्हें कह दिया था कि तुम IAS बनने के चक्कर में मत पड़ो, एक दिन तुम्हें मुख्यमंत्री बनना है…सैकड़ों IAS तुम्हारे आगे-पीछे हाथ बाँधे घूमते नज़र आयेंगे… कांशीराम ने जो कहा सच कर दिखाया। आज मायावती सिर्फ़ मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि प्रधानमंत्री पद की भी दावेदार हैं। बसपा नेत्री मायावती ने जब अपने उत्तराधिकारी के बारे में सार्वजनिक बयान दिया था, तो लोगों ने उस नाम के बारे में कयास लगाने शुरु कर दिये थे, खोजी पत्रकारों की बात मानें तो वह शख्स हैं राजाराम, जो कि फ़िलहाल मध्यप्रदेश के बसपा प्रभारी हैं। वे भी अविवाहित हैं और सारा जीवन बसपा को समर्पित करने का मन बना चुके हैं।

सवाल उठता है कि क्या यदि कांशीराम विवाह कर लेते तो पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारी के चलते इतना बड़ा आंदोलन वे खड़ा कर पाते? मेरे खयाल से तो नहीं… हर कोई इस बात को स्वीकार करेगा कि शादी के बाद व्यक्ति की प्राथमिकतायें बदल जाती हैं। उस व्यक्ति पर अपने परिवार की देखभाल, भरण-पोषण की जिम्मेदारी आयद होती है, रिश्तेदारियाँ निभाने का दबाव होता है जो उसे समाजसेवा या राजनीति में झोंक देने में बाधक होता है। ज़ाहिर सी बात है कि उसके अपने परिवार के प्रति कुछ कर्तव्य होते हैं जिन्हें पूरा करने के लिये उसे परिवार को समय देना ही पड़ेगा।

महात्मा गाँधी के पुत्र की आत्मकथा (जिस पर फ़िल्म “गाँधी माय फ़ादर” भी बनी) में उन्होंने कहा है कि गाँधीजी सामाजिक और राजनैतिक आंदोलनों में व्यस्त रहने के कारण परिवार को अधिक समय नहीं दे पाते थे और उनके बच्चे अकेलापन (पिता की कमी) महसूस करते थे। बहुत से पुरुषों और महिलाओं को जीवन में कभी न कभी ऐसा महसूस होता है कि यदि मेरे पीछे परिवार की जिम्मेदारियाँ न होतीं तो शायद मैं और बेहतर तरीके से और खुलकर काम कर सकता था, ये और बात है कि कर्तव्य और जिम्मेदारी के अहसास के कारण यह विचार कुछ ही समय के लिये आते हैं। ऐसे में सहज ही लगता है कि यदि राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वाले लोग अविवाहित रहते हैं तो वे अपने लक्ष्यों के प्रति अधिक सजग, सक्रिय और समर्पित हो सकते हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में तो यह बहुत पुरानी परम्परा है कि पूर्णकालिक स्वयंसेवक अविवाहित ही रहेंगे, और यह उचित भी है क्योंकि स्वयंसेवकों को सुदूर क्षेत्रों में अभावों में कई-कई दिनों तक प्रचार के लिये जाना पड़ता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं भाजपा के पितृपुरुष कुशाभाऊ ठाकरे। आज भाजपा जो भी है, जितनी भी है उसके पीछे कुशाभाऊ ठाकरे का अमिट योगदान है। उत्तर-पूर्व के राज्यों और दक्षिण में आज संघ का जो भी प्रसार है वह सिर्फ़ और सिर्फ़ कुशाभाऊ ठाकरे की अनथक मेहनत का नतीजा है। कुल एक सूटकेस ही जीवन भर उनकी गृहस्थी और सम्पत्ति रहा। दो-तीन जोड़ कपड़े, संघ का साहित्य और सादी चप्पलें पहन कर ताउम्र उन्होंने यात्राओं में बिता दी, रहना-खाना संघ कार्यालयों में और पूरा जीवन संघ को समर्पित। RSS में ऐसे कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है। अब तक हुए तमाम सरसंघचालक, जेपी माथुर, अटलबिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख, नरेन्द्र मोदी जैसे सैकड़ों लोग हैं जो कि शायद विवाह कर लेते तो पता नहीं संघ और भाजपा आज कहाँ होते।

कम्युनिस्ट पार्टियों में भी लगभग यही ट्रेण्ड रहा है उनके भी कई नेता अविवाहित रहे और पार्टी की विचारधारा के प्रचार-प्रसार में उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। नक्सलवादी आन्दोलन के प्रवर्तक कहे जाने वाले कानू सान्याल भी अविवाहित हैं। चर्च और ईसाईयत के प्रचार में लगे हुए पादरी और नन भी आजीवन अविवाहित रहने का व्रत लेते हैं ताकि वे अपना काम पूर्ण निष्ठा से कर सकें, क्योंकि विवाह करने से व्यक्ति कई प्रकार के बन्धनों में बँध जाता है। गाहे-बगाहे इन कार्यकर्ताओं के बारे में मीडिया और अन्य माध्यमों में यौन कदाचरण के मामले सामने आते रहते हैं। देश-विदेश में चर्च में बिशपों, पादरियों और ननों द्वारा घटित ऐसी कई घटनायें सामने आती रहती हैं (ये और बात है कि संघ का व्यक्ति यदि इसमें पाया जाये तो हल्ला ज्यादा होता है) कुछ समय पहले संघ के एक प्रचारक संजय जोशी के बारे में भी इस तरह की एक सीडी मीडिया में आई थी, उसमें कितनी सच्चाई है यह तो सम्बन्धित पक्ष ही जानें, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि इस प्रकार का व्यवहार पूर्णरूपेण एक मानव स्वभाव और मानवीय गलती है। इस दुनिया में शायद ही कोई ऐसा पुरुष या स्त्री होगी जिसमें कभी भी यौनेच्छा जागृत नहीं हुई हो, चाहे वह कितना भी बड़ा संत-महात्मा-पीर क्यों न हो। ऐसे में इन अविवाहित व्यक्तियों द्वारा जाने-अनजाने कभी-कभार इस प्रकार की गलती होना कोई भूचाल लाने वाली घटना नहीं है, यदि अपराध के दोषी हैं तो सजा अवश्य मिलना चाहिये। दिक्कत तब होती है जब “सेकुलर”(?) लोग अटलबिहारी वाजपेयी के जवानी के किस्से चटखारे ले-लेकर सुनाते हैं लेकिन नेहरू नामक “रंगीले रतन” को भूल जाते हैं। खैर यह विषय अलग ही है…

राहुल गाँधी के बारे में सुना गया है कि वे किसी कोलम्बियन कन्या से शादी करना चाहते हैं, लेकिन शायद बात कहीं अटक रही है। यदि वे विवाह कर लेते हैं तो फ़िर “अविवाहित क्लब” के नेताओं में सबसे कद्दावर दो ही लोग बचेंगे, मायावती और नरेन्द्र मोदी। दोनों ही अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित कर चुके हैं, दोनों का खासा जनाधार है, दोनों ही अपनी-अपनी पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, दोनों “चुनाव-जिताऊ” भाषणों के लिये मशहूर हैं। मायावती तो “भेंट” पर सबसे अधिक टैक्स देने वाली राजनेता बन चुकी हैं, मोदी पर भी फ़िलहाल तो कोई बड़ा भ्रष्टाचार का मामला सामने नहीं आया है। ऐसे में हो सकता है कि भारत को अगले कुछ ही समय में एक अविवाहित प्रधानमंत्री मिल जाये। अविवाहित प्रधानमंत्री होने के तीन फ़ायदे तो तत्काल दिखाई दे रहे हैं, पहला वह अपना पूरा समय काम में बितायेगा, परिवार के लिये नहीं। दूसरा यह कि उसके किसी बेटे-बेटी-बहू आदि को आतंकवादी किडनैप नहीं कर सकते (क्योंकि हैं ही नहीं), तीसरा उस व्यक्ति पर वंशवाद और भाई-भतीजावाद का आरोप भी नहीं लग सकता। मायावती ने तो पहले ही कह दिया कि उनका उत्तराधिकारी उनके परिवार का कोई व्यक्ति नहीं होगा, जो कि तारीफ़ की बात तो है। संघ के सरसंघचालकों ने कभी भी अपने परिवार के किसी व्यक्ति को उत्तराधिकारी नामज़द नहीं किया, जबकि वे चाहते तो कर सकते थे और उसे संघ के लाखों कार्यकर्ता स्वीकार भी कर लेते, लेकिन फ़िर कांग्रेस और बाकियों में क्या अन्तर रह जाता?

तो प्रिय पाठकों, देश के प्रधानमंत्री के तौर पर एक अविवाहित व्यक्ति के कुछ फ़ायदे मैंने गिना दिये हैं, कुछ आप गिना दीजिये। साथ ही राहुल गाँधी, मायावती और नरेन्द्र मोदी में से आपका वोट किसे मिलेगा यह भी बताईये…

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रामधारी सिंह ”दिनकर” की जयंती पर विशेष

छायावादी कवियों में प्रमुख नामों में रामधारी सिंह दिनकर का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। 23 सितम्बर 1908 को बिहार के मुगेर जिले सिमरिया नामक कास्बे में हुआ था। पटना विश्वविद्यालय से इन्‍होने स्‍नातक बीए की डिग्री हासिल की और तत्पश्चात वे एक सामान्‍य से विद्यालय में अध्यापक नियुक्त हो गये। रामधारी सिंह दिनकर एक ओजस्वी राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत कवि के रूप में जाने जाते थे। उनकी कविताओं में छायावादी युग का प्रभाव होने के कारण श्रृंगार के भी प्रमाण मिलते है।

दिनकर जी को सरकार के विरोधी रूप के लिये भी जाना जाता है, भारत सरकार द्वारा उन्‍हे पद्मविभूषण से अंलकृत किया गया। इनकी गद्य की प्रसिद्ध पुस्‍तक संस्‍कृ‍त के चार अध्याय के लिये साहित्‍य अकादमी तथा उर्वसी के लिये ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। 24 अप्रेल 1974 को उन्‍होने अपने आपको अपनी कवितों में हमारे बीच जीवित रखकर सदा सदा के लिये अमर हो गये।

दिनकर जी विभिन्‍न सकरकारी सेवाओं में होने के बावजूद उनके अंदर उग्र रूप प्रत्‍यक्ष देखा जा सकता था। शायद उस समय की व्‍यवस्‍था के नजदीक होने के कारण भारत की तत्कालीन दर्द को समक्ष रहे थे। तभी वे कहते है –

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;

दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

26 जनवरी,1950 ई. को लिखी गई ये पंक्तियॉं आजादी के बाद गणतंत्र बनने के दर्द को बताती है कि हम आजाद तो हो गये किन्‍तु व्‍यवस्‍था नही नही बदली। नेहरू की नीतियों के प्रखर विरोधी के रूप में भी इन्‍हे जाना जाता है तथा कर्इ मायनों में इनहोने गांधी जी से भी अपनी असहमति भी जातते दिखे है, परसुराम की प्रतीक्षा इसका प्रत्‍यक्ष उदाहरण है । यही कारण है कि आज देश में दिनकर का नाम एक कवि के रूप में नही बल्कि जनकवि के रूप में जाना जाता है।  

>माँ : खोज एक गीत की

>शायद सन 1991-92 की बात होगी, जब नरसिम्हा राव भारत के प्रधानमंत्री हुआ करते थे और एन डी ए सरकार के इण्डिया शाइनिंग की तरह उन दिनों टीवी पर एक विज्ञापन बहुत चला करता था, जिसमें बताया जाता था कि किस तरह नरसिम्हा राव ने भारत की तस्वीर बदल दी।
विज्ञापन में एक महिला खुशखुशाल भाग कर घर में आती है और अपनी संदूक में कपड़ों के नीचे से एक तस्वीर निकालकर अपनी साड़ी से पोंछती है, यह तस्वीर नरसिम्हाराव जी की होती है। पार्श्व में एक गीत भी चलता रहता है।
इस विज्ञापन के साथ उन दिनों एक गाना भी टीवी पर बहुत दिखता था। यह गाना सागरिका (मुखर्जी) के एक अल्बम का था और जिसमें सागरिका अपनी माँ के लिये कहती है…प्रेम की मूरत दया की सुरत, ऐसी और कहां है, जैसी मेरी माँ है

मुझे पॉप बिल्कुल नहीं भाते पर यह गीत एक पॉप गायिका ने गाया था और पता नहीं क्यों यह गाना मुझे बहुत पसंद था। धीरे धीरे इस गीत को सब भूलते गये, (शायद सागरिका भी) पर मैं इस गाने को बहुत खोजता रहा पर मुझे नहीं मिला। क्यों कि एल्बम का नाम पता नहीं था और सागरिका कोई बहुत बड़ी स्टार गायिका भी नहीं थी कि गीत की कुछ लाईनों से गीत खोज लिया जाता।
हैदराबाद में साईबर कॉफे चलाते हुए नेट पर भी बहुत खोजा पर यह गीत नहीं मिला, यूनुस भाई से अनुरोध किया तो उन्होने कहा, गीत छोड़िये हम सागरिका का एक इन्टर्व्यू ही कर लेते हैं। पर शायद सागरिका अपने परिवार के साथ विदेश में रहती है इस वजह से अब तक वह भी नहीं हो पाया।
कुछ दिनों पहले मैने एक सीडी की दुकान वाले को ५०/- एडवान्स दिये और उसे कहा तो उसने भी चार दिन पास पैसे वापस लौटा दिये और कहा कि भाई मुझे सीडी नहीं मिली।
मेरे एक मित्र कम ग्राहक अनुज से यह बात की तो उन्होने मुझे चैलेन्ज दिया कि वह इस गीत को दो दिन में खोज लेंगे और वाकई उन्होने खोज भी दिया। धन्यवाद अनुज भाई।
लीजिये आप भी इस गीत को सुनिये । और हाँ इस गीत को लिखा है निदा फ़ाज़ली ने। इस गीत को सागरिका ने जैसे सच्चे दिल से गाया है, अपनी माँ को याद करते हुए। तभी यह गीत इतना मधुर बन पाया है। गीत सुनते हुए मुझे मेरी माँ याद आती है। आपको आती है कि नहीं? बताईयेगा।
http://web.splashcast.net/go/so/1/c/WNOB8650CD
धूप में छाय़ा जैसी
प्यास में नदिया जैसी
तन में जीवन जैसे
मन मैं दर्पन जैसे
हाथ दुवा वाले
रोशन करे उजाले
फूल पे जैसे शबनम
साँस में जैसे सरगम
प्रेम की मूरत दया की सुरत
ऐसी और कहां है
जैसी मेरी माँ है

जहान में रात छाये
वो दीपक बन जाये
जब कभी रात जगाये
वो सपना बन जाये
अंदर नीर बहाये
बाहर से मुस्काये
काया वो पावन सी
मथुरा वृंदावन जैसी
जिसके दर्शन मैं हो भगवन
ऐसी और कहां है
जैसी मेरी माँ है
( इस प्लेयर को लगाने का सुझाव श्री अफलातूनजी ने दिया। वर्डप्रेस.कॉम पर गाने चढ़ाना बहुत मुश्किल काम है। यह जुगाड़ अच्छा है पर इसकी प्रक्रिया बहुत ही लम्बी है, फिर भी एक शुरुआत तो हुई, धन्यवाद अफलातूनजी।)

माँ : खोज एक गीत की

शायद सन 1991-92 की बात होगी, जब नरसिम्हा राव भारत के प्रधानमंत्री हुआ करते थे और एन डी ए सरकार के इण्डिया शाइनिंग की तरह उन दिनों टीवी पर एक विज्ञापन बहुत चला करता था, जिसमें बताया जाता था कि किस तरह नरसिम्हा राव ने भारत की तस्वीर बदल दी।
विज्ञापन में एक महिला खुशखुशाल भाग कर घर में आती है और अपनी संदूक में कपड़ों के नीचे से एक तस्वीर निकालकर अपनी साड़ी से पोंछती है, यह तस्वीर नरसिम्हाराव जी की होती है। पार्श्व में एक गीत भी चलता रहता है।
इस विज्ञापन के साथ उन दिनों एक गाना भी टीवी पर बहुत दिखता था। यह गाना सागरिका (मुखर्जी) के एक अल्बम का था और जिसमें सागरिका अपनी माँ के लिये कहती है…प्रेम की मूरत दया की सुरत, ऐसी और कहां है, जैसी मेरी माँ है

मुझे पॉप बिल्कुल नहीं भाते पर यह गीत एक पॉप गायिका ने गाया था और पता नहीं क्यों यह गाना मुझे बहुत पसंद था। धीरे धीरे इस गीत को सब भूलते गये, (शायद सागरिका भी) पर मैं इस गाने को बहुत खोजता रहा पर मुझे नहीं मिला। क्यों कि एल्बम का नाम पता नहीं था और सागरिका कोई बहुत बड़ी स्टार गायिका भी नहीं थी कि गीत की कुछ लाईनों से गीत खोज लिया जाता।
हैदराबाद में साईबर कॉफे चलाते हुए नेट पर भी बहुत खोजा पर यह गीत नहीं मिला, यूनुस भाई से अनुरोध किया तो उन्होने कहा, गीत छोड़िये हम सागरिका का एक इन्टर्व्यू ही कर लेते हैं। पर शायद सागरिका अपने परिवार के साथ विदेश में रहती है इस वजह से अब तक वह भी नहीं हो पाया।
कुछ दिनों पहले मैने एक सीडी की दुकान वाले को ५०/- एडवान्स दिये और उसे कहा तो उसने भी चार दिन पास पैसे वापस लौटा दिये और कहा कि भाई मुझे सीडी नहीं मिली।
मेरे एक मित्र कम ग्राहक अनुज से यह बात की तो उन्होने मुझे चैलेन्ज दिया कि वह इस गीत को दो दिन में खोज लेंगे और वाकई उन्होने खोज भी दिया। धन्यवाद अनुज भाई।
लीजिये आप भी इस गीत को सुनिये । और हाँ इस गीत को लिखा है निदा फ़ाज़ली ने। इस गीत को सागरिका ने जैसे सच्चे दिल से गाया है, अपनी माँ को याद करते हुए। तभी यह गीत इतना मधुर बन पाया है। गीत सुनते हुए मुझे मेरी माँ याद आती है। आपको आती है कि नहीं? बताईयेगा।

धूप में छाय़ा जैसी
प्यास में नदिया जैसी
तन में जीवन जैसे
मन मैं दर्पन जैसे
हाथ दुवा वाले
रोशन करे उजाले
फूल पे जैसे शबनम
साँस में जैसे सरगम
प्रेम की मूरत दया की सुरत
ऐसी और कहां है
जैसी मेरी माँ है

जहान में रात छाये
वो दीपक बन जाये
जब कभी रात जगाये
वो सपना बन जाये
अंदर नीर बहाये
बाहर से मुस्काये
काया वो पावन सी
मथुरा वृंदावन जैसी
जिसके दर्शन मैं हो भगवन
ऐसी और कहां है
जैसी मेरी माँ है
( इस प्लेयर को लगाने का सुझाव श्री अफलातूनजी ने दिया। वर्डप्रेस.कॉम पर गाने चढ़ाना बहुत मुश्किल काम है। यह जुगाड़ अच्छा है पर इसकी प्रक्रिया बहुत ही लम्बी है, फिर भी एक शुरुआत तो हुई, धन्यवाद अफलातूनजी।)

>मल्लिका-ए- तरन्नुम नूरजहाँ के जन्मदिन पर विशेष

>एक जुगलबंदी और एक दुर्लभ गीत


आज मल्लिका ए तरन्नुम नूरजहां का जन्म दिन है। अपने जीवन के २१वें साल में नूरजहाँ ने भारत और हिन्दी फिल्में छोड़ दी और बँटवारे की वजह से पाकिस्तान चली गई। पाकिस्तान में भी उन्होने कई फिल्मों में काम किया, बहुत गाया पर मेरे मन में एक टीस है कि काश नूरजहां भारत में होती तो हमारे पास दो दो अनमोल रत्न होते। लता जी और नूरजहाँ।
लता मंगेशकर भी नूरजहाँ को अपना गुरु मानती हैं। आईये नूरजहाँ के स्वर में दो बढ़िया गीत सुनते हैं। पहला एक शास्त्रीय आलाप है। नूरजहाँ ने इस में सलामत अली खाँ साहब के साथ जुगलबंदी की है। यह कौनसा राग है हमें नहीं पता, शायद पारुलजी या मानोशीजी कुछ मदद कर सकें।

http://sagarnahar.googlepages.com/player.swf
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और इस दूसरे गीत को नूरजहाँ ने अपनी बुलंद आवाज में गाया है। यह फिल्म बड़ी माँ से है। यह गीत ज़िया सरहदी ने लिखा और संगीतबद्ध किया दत्ता कोरेगाँवकर (के. दत्ता) ने।

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आ इंतज़ार है तेरा, दिल बेक़रार है मेरा
आजा न सता और, आजा न रुला
और आजा कि तू ही है मेरी उम्मीद का तारा
उम्मीद का तारा संगम
मेरी ख़ुशियों का निगाहों का सहारा
आ इंतज़ार है तेरा, दिल बेक़रार है

मेरा आकर मेरी जागी हुई रातों को सुला दे
खो जाऊँ, खो जाऊँ मुझे ऐसा कोई गीत सुना दे
आ इंतज़ार है तेरा, दिल बेक़रार है मेरा

अब और सितम, अब और सितम हम से उठाए नहीं जाते
और राज़ मोहब्बत के, और राज़ मोहब्बत के छुपाए नहीं जाते
छुपाये नहीं जाते
आ इंतज़ार है तेरा, दिल बेक़रार है मेरा

अभी पता नहीं कितने ऐसे संगीतकार हैं जिन्होने इतने बढ़िया गीत रचे और हमें उनके नाम तक नहीं पता। भविष्य में ऐसे ही और संगीतकारों के गीत महफिल में सुनाये जायेंगे।

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