कोसी तेरे प्रेम में

कोसी तेरा प्रेम
तेरा निश्छल प्रेम
बन गया
निर्दयी
निर्लज्ज
की तूने फ़िर से हमें
अपने प्रेम के आगोश में
ले लिया ।
भूंखे, बेघर हो जायेंगे
तेरे
प्रेम में
इतना ज्ञान नही था।
की पूरे कुनबे को
कर दिया
तबाह ,
बर्वाद
दूर हो गए अपनों से
फ़िर वाही मौत का
मंजर
जमीं बनी बंजर
घर हो गए खंडहर
शायद , फ़िर भूंखे रहेंगे
बेघर हो जायेंगे ।
कोसी तेरे प्रेम में।

1 Comment

  1. रीतेश रंजन said,

    September 29, 2008 at 12:01 pm

    हे कोसी! उन नेताओं की गलतियों की सज़ा कृपा करके आम मनुष्यों को मत दो, क्यूंकि ये नेतागण तो मनुष्य के लिबास में पिशाच हैं, ये कभी सुधरने वाले नहीं!


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