मल्लिका-ए- तरन्नुम नूरजहाँ के जन्मदिन पर विशेष

एक जुगलबंदी और एक दुर्लभ गीत


आज मल्लिका ए तरन्नुम नूरजहां का जन्म दिन है। अपने जीवन के २१वें साल में नूरजहाँ ने भारत और हिन्दी फिल्में छोड़ दी और बँटवारे की वजह से पाकिस्तान चली गई। पाकिस्तान में भी उन्होने कई फिल्मों में काम किया, बहुत गाया पर मेरे मन में एक टीस है कि काश नूरजहां भारत में होती तो हमारे पास दो दो अनमोल रत्न होते। लता जी और नूरजहाँ।
लता मंगेशकर भी नूरजहाँ को अपना गुरु मानती हैं। आईये नूरजहाँ के स्वर में दो बढ़िया गीत सुनते हैं। पहला एक शास्त्रीय आलाप है। नूरजहाँ ने इस में सलामत अली खाँ साहब के साथ जुगलबंदी की है। यह कौनसा राग है हमें नहीं पता, शायद पारुलजी या मानोशीजी कुछ मदद कर सकें।

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और इस दूसरे गीत को नूरजहाँ ने अपनी बुलंद आवाज में गाया है। यह फिल्म बड़ी माँ से है। यह गीत ज़िया सरहदी ने लिखा और संगीतबद्ध किया दत्ता कोरेगाँवकर (के. दत्ता) ने।

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आ इंतज़ार है तेरा, दिल बेक़रार है मेरा
आजा न सता और, आजा न रुला
और आजा कि तू ही है मेरी उम्मीद का तारा
उम्मीद का तारा संगम
मेरी ख़ुशियों का निगाहों का सहारा
आ इंतज़ार है तेरा, दिल बेक़रार है

मेरा आकर मेरी जागी हुई रातों को सुला दे
खो जाऊँ, खो जाऊँ मुझे ऐसा कोई गीत सुना दे
आ इंतज़ार है तेरा, दिल बेक़रार है मेरा

अब और सितम, अब और सितम हम से उठाए नहीं जाते
और राज़ मोहब्बत के, और राज़ मोहब्बत के छुपाए नहीं जाते
छुपाये नहीं जाते
आ इंतज़ार है तेरा, दिल बेक़रार है मेरा

अभी पता नहीं कितने ऐसे संगीतकार हैं जिन्होने इतने बढ़िया गीत रचे और हमें उनके नाम तक नहीं पता। भविष्य में ऐसे ही और संगीतकारों के गीत महफिल में सुनाये जायेंगे।

इस्लामिक आंतकवाद को संगरक्षण क्यो ?

आतंकवाद की जडे जिस प्रकार पूरे भारत में फैल रही है उससे देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में पड़ रही है। आज देश का कोई भी इलाका इस इस्‍लामिक आंतकवाद के खतरे से बचा हुआ नही है। भारत जैसे सास्‍कृतिक देश में इन आतंकवादियों ने दहसतगर्दी के बल पर लोड़ने की कोशिश कर रहे है। पिछले कुछ महिनो से जिस प्रकार भारत के कई बड़े शहर इस्‍लामिक दहशतगर्दी के शिकार हो रहे है, यह सरकार और जनता के लिये सोच का विषय होना चाहिये। 

हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है हमारी तुष्टिकरण की नीतियॉं इन नीतियों के कारण हम अपने राष्‍ट्र में विष बीच बो रहे है। आज देश में सबसे बड़ी आवाश्यकता है तो समान नागरिक सहिंता की जिससे देश के पुर्नविभाजन को रोका जा सकें। आज हमारे सामने ऐसी परिस्‍थतियॉं आ रही है कि भारत के ही कितने पाकिस्‍तान का निर्माण हो चुका है। मऊ तथा गुजरात के दंगों के दौरान यह शिद्ध भी हो चुका है। आज इन आंतकवादियों को सबसे बड़ा केन्‍द्र आजमगढ़ बन रहा है। अखिर कब तक देश की सरकार मुस्लिम वोटो के नाम पर इस्‍लामिक आंतकवाद को संगरक्षण देती रहेगी ?  

जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई

महाशक्ति समूह के युवा कवि और लेखक श्री री‍तेश रंजन जी को जन्‍मदिन की बहुत बहुत बधाई। 

>हिन्दी सप्ताह विशेष : राज ठाकरे और करुणानिधि में भेदभाव क्यों?

>Raj Thakre Mumbai Anti-Hindi Movement
सबसे पहले एक सवाल – कितने लोग हैं जिन्होंने मेगास्टार रजनीकान्त को चेन्नई शहर के किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में हिन्दी में बोलते सुना है? रजनीकान्त की मातृभाषा मराठी है, उनके जीवन का काफ़ी सारा समय कर्नाटक में बीता, फ़िर वे तमिल के सुपरस्टार बने। इसी तमिलनाडु के एक और हीरो हैं करुणानिधि, जिन्होंने हिन्दी विरोध की ही राजनीति से अपना जीवन शुरु किया था और आज इस मुकाम तक पहुँचे हैं। बहुत लोगों को याद है कि साठ के दशक में तमिलनाडु में सभी दुकानों पर तमिल भाषा के बोर्ड लगाना अनिवार्य किया गया था, और हिन्दी के साइनबोर्ड पर कालिख पोती गई थी। आज लगभग वही काम मुम्बई में राज ठाकरे करने की कोशिश कर रहे हैं (उनके सफ़ल होने की सम्भावना फ़िलहाल नहीं के बराबर है), तो उस पर इतना बवाल क्यों मचाया जा रहा है? दूसरी तरफ़ जया बच्चन हैं जो लगभग दंभी अन्दाज़ में ठाकरे का मखौल उड़ाते हुए कहती हैं कि “हम यूपी वाले लोग हैं, तो हम हिन्दी में ही बोलेंगे…”। सोचा जा सकता है कि जिस परिवार को मुम्बई में 30-40 साल होने आये, मुम्बई ने ही उन्हें पहचान दी, रोजी-रोटी दी, आज भी वह “हम यूपी वाले हैं…” की मानसिकता से बाहर नहीं आ पाया है, तो इसमें किसे दोष देना चाहिये? निश्चित रूप से यह सिर्फ़ मुम्बई में ही सम्भव है, कोलकाता या चेन्नई में नहीं।

अक्सर मुम्बई के “मेट्रो कल्चर” की दलील और दुहाई दी जाती है, क्या चेन्नई और कोलकाता मेट्रो नहीं हैं? फ़िर वहाँ जाकर रहने वाला व्यक्ति कैसे तमिल और बांग्ला को अपना लेता है? और वही व्यक्ति मुम्बई में अपना सारा जीवन मराठी का एक शब्द बोले बिना निकाल लेता है? क्या “मेट्रो कल्चर” का मतलब स्थानीय भाषा और संस्कृति की उपेक्षा करने का लाइसेंस है? आम मध्यमवर्गीय मराठी व्यक्ति मुम्बई की सीमा से लगभग बाहर हो चुका है, आज मुम्बई सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यापारियों, शेयर दलालों, धनपतियों और अन्य राज्यों से आये लोगों का शहर बन चुका है। जब राज ठाकरे इस मुद्दे को उठाते हैं तो बुद्धिजीवियों और चैनलों में तत्काल उन्हें “लगभग आतंकवादी” घोषित करने की होड़ लग जाती है, जबकि करुणानिधि यदि दिल्ली में भी प्रेस कान्फ़्रेंस आयोजित करते हैं तो भी तमिल में ही बोलते हैं, लेकिन कहीं कोई बात नहीं होती। हिन्दीभाषियों द्वारा मराठी भाषा को मुम्बई में जितने हल्के तौर पर लिया जाता है, उतना वह तमिल भाषा को चेन्नई में नहीं ले सकते, वह भी तब जबकि मराठी भाषा की लिपि देवनागरी है, तमिल या मलयालम की तरह द्रविड नहीं। तमिल के मुकाबले, मराठी सीखना बेहद आसान है, लेकिन फ़िर भी ऐसी घोर उपेक्षा? इसमें किसका दोष है? क्या राज ठाकरे का, कि वह मराठी में बोर्ड लगाने की बात कह रहे हैं और सार्वजनिक कार्यक्रमों में मराठी में बोलने का आग्रह कर रहे हैं, या फ़िर उनका जो अभी भी “हम यूपी वाले हैं…” की मानसिकता में जी रहे हैं?

एक शख्स हैं श्री साईसुरेश सिवास्वामी, तमिल हैं और लगभग 23 वर्ष पूर्व नौकरी के सिलसिले में मुम्बई आये थे। उन्होंने हाल के विवाद पर रेडिफ़.कॉम पर एक लेख लिखा है, जिसमें वे कहते हैं “जब मैं जवान था तब चेन्नई में हिन्दी साइनबोर्ड को कालिख पोतने वाला वहाँ “लोकल हीरो” समझा जाता था, और जब मैं मुम्बई आया तो यह देखकर हैरान था कि यहाँ मराठी का नामोनिशान मिटता जा रहा है और कोई भी साईनबोर्ड मराठी में नहीं है। यहाँ तक कि मुझे खुद शर्म महसूस होती है कि इतने वर्ष मुम्बई में बिताने के बावजूद मेरी हिन्दी अधिक शुद्ध है, मराठी की बनिस्बत…”। बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि “शिवसेना ने भी मराठी पर उतना जोर नहीं दिया, क्योंकि उसे महानगरपालिका से आगे बढ़कर राज्य की सत्ता चाहिये थी जो सिर्फ़ मराठी वोटों से नहीं मिल सकती थी, अन्ततः शिवसेना ने भी सिर्फ़ बम्बई को “मुम्बई” बनाकर इस मुद्दे से अपना हाथ खींच लिया…” लेकिन बाहर से आने वालों का यह फ़र्ज़ बनता था कि वह स्थानीय भाषा का सम्मान करते, उसके साथ चलते और उसे दिल से अपनाते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि मराठी माणुस स्वभावतः बेहद सहिष्णु, लोकतान्त्रिक और अपने काम से काम रखने वाला होता है। उसके सीधेपन को उसकी सहमति जानकर अन्य राज्यों के लोग आते गये, हिन्दी थोपते गये, पैसे के जोर पर मुम्बई में ज़मीनें हथियाते गये और एक आम मराठी व्यक्ति धीरे-धीरे मुम्बई से बाहर हो गया। राज ठाकरे को भी मराठी से बहुत प्रेम है ऐसा नहीं है, साफ़ है कि वह भी अपनी राजनीति को चमकाने के लिये ऐसा कर रहा है, लेकिन उसने जो मुद्दा उठाया है वह कई स्थानीय लोगों के दिल के तार हिलाता है। मंत्रालय और मुख्य कार्यालयों का कामकाज या तो हिन्दी में होता है या अंग्रेजी में, मराठी कहीं नहीं है। रोज़ाना नये अंग्रेजी स्कूल खुलते जा रहे हैं, जहाँ हिन्दी “भी” पढ़ाई जाती है, लेकिन मराठी स्कूलों की स्थिति अत्यन्त दयनीय है, ज़ाहिर है कि यह राज्य सरकार का दोष है, लेकिन जो व्यक्ति मुम्बई में रहकर इलाहाबाद में स्कूल खोल सकता है, उसका फ़र्ज़ बनता है कि वह एकाध मराठी स्कूल मुम्बई में भी खोले।

लेकिन राज ठाकरे बहुत देर कर चुके हैं, उनके इस मराठी-अमराठी मुद्दे की पकड़ बनाने के लिये मुम्बई में इतने मराठी बचे ही नहीं हैं कि राज ठाकरे की राजनीति पनप सके। पिछले “मुम्बई मनपा” चुनावों में राज ठाकरे इसका मजा चख चुके हैं। राज ठाकरे द्वारा मराठी की बात करते ही अन्य प्रान्तों के लोग उनके खिलाफ़ लामबन्द हो जाते हैं और वे अकेले पड़ जाते हैं, ऐसा ही होता रहेगा, क्योंकि मुम्बई में बाहर से आने वालों की संख्या अब इतनी ज़्यादा हो चुकी है कि अब वहाँ यह मुद्दा चलने वाला नहीं है। यह मुम्बई के स्थानीय मराठियों का दुर्भाग्य तो है, लेकिन इसके जिम्मेदार वे खुद ही हैं जो उन्होंने चेन्नई जैसा आन्दोलन नहीं चलाया और बर्दाश्त करते रहे।

हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है, सप्ताह और पखवाड़ा मनाया जा रहा है, अच्छी बात है। हिन्दी-हिन्दी भजने वाले सिर्फ़ एक बार करुणानिधि को हिन्दी सिखाकर दिखायें, हिन्दी भाषा की अलख उत्तर-पूर्व के राज्यों (जहाँ से हिन्दीभाषियों को भगाया जा रहा है) और तमिलनाडु में जलाकर दिखायें। हालांकि अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के कारण अब स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है और दक्षिण के लोग भी हिन्दी सीखना चाहते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि बगैर इसके उत्तर भारत में काम चलाना मुश्किल होगा, लेकिन यह स्थिति दक्षिण से बाहर जाने वालों की है, दक्षिण में जाकर बसने वालों को वहाँ की स्थानीय भाषा सीखना-बोलना अभी भी आवश्यक है, जबकि मुम्बई में ऐसा नहीं है। दरअसल हिन्दी प्रांतों के लोग क्षेत्रीय भाषाओं को गम्भीरता से लेते ही नहीं हैं, यदि सीखना भी पड़े तो मजबूरी में ही सीखते हैं। वे इस बात को नहीं समझते कि उस क्षेत्रीय भाषा का भी अपना विराट साहित्य संसार है। वे हिन्दी को ही श्रेष्ठ मानते हैं, और क्षेत्रीय भाषा को संख्याबल से दबाने का प्रयास करते हैं। इसके ठीक उलट मराठी व्यक्ति है जो जिस प्रान्त में जाता है वहाँ की भाषा, बोलचाल का लहजा और पहनावा तत्काल पकड़ लेता है, मैं आपको बनारस के कई मराठी परिवार दिखा सकता हूँ, जिनकी धोती, मुँह में पान और अवधी तथा खड़ी बोली को सुनकर आप विश्वास नहीं करेंगे कि यह व्यक्ति ठेठ मराठी है। मराठी व्यक्ति कभी अन्य राज्यों में “गुट” नहीं बनाता, दबंगता नहीं दिखाता, न ही राजनीति में कोई खास दिलचस्पी रखता है। एक ज़माने में कर्नाटक से लेकर अटक (अफ़गानिस्तान) तक मराठा साम्राज्य फ़ैला हुआ था, लेकिन क्या आज की तारीख में महाराष्ट्र छोड़कर किसी भी अन्य राज्य में मराठी वोट बैंक नाम की कोई चीज़ है? क्या अन्य राज्यों में मराठियों ने कभी राजनैतिक ताकत जताने या सामाजिक दबाव बनाने की कोशिश की है? महाराष्ट्र से बाहर कितने विधायक और सांसद मराठी हैं? इन प्रश्नों के जवाबों को अन्य राज्यों में बसे हुए विभिन्न राज्यों के लोगों को लेकर उसका प्रतिशत निकालिये, स्थिति साफ़ हो जायेगी।

मेरा जन्म मध्यप्रदेश में हुआ है और कर्मस्थली भी यही है और मुझे इस पर गर्व है। मेरी हिन्दी कई हिन्दीभाषियों से बेहतर है, गाँधीसागर बाँध के कारण मध्यप्रदेश के हितों को चोट लगने पर मैं राजस्थान को गरियाता हूँ, और विद्युत मंडल के बँटवारे में यदि मध्यप्रदेश के साथ अन्याय हुआ तो छत्तीसगढ़ को भी खरी-खोटी सुनाता हूँ, और ऐसा ही होना चाहिये। जो भी व्यक्ति जहाँ रहे, जिस जगह काम करे, जहाँ अपना आशियाना बनाये, रोजी-रोटी कमाये-खाये, उसे वहाँ की भाषा-संस्कृति में घुल-मिल जाना चाहिये, तभी सामाजिक समरसता बनेगी। ये नहीं कि रहते-खाते-कमाते तो दुबई में हैं, लेकिन अस्पताल खोलेंगे आज़मगढ़ में, नागरिक तो हैं कनाडा के लेकिन सड़क बनवायेंगे टिम्बकटू में…

यह थोड़ा विषयान्तर हो सकता है लेकिन इस मौके पर विदेशों में बसे भारतीयों को भी इस मुद्दे से सीखने की आवश्यकता है, ऐसा क्यों होता है कि भारतीय जिस देश में जाते हैं वहाँ के स्थानीय समाज को वे नहीं अपनाते हैं। कई परिवार ऐसे हैं जो 30-40 साल से ब्रिटेन-कनाडा-न्यूजीलैण्ड में बसे हुए हैं, वहीं नौकरी-व्यवसाय करते हैं, उनकी नागरिकता तक ब्रिटिश है, वे भविष्य में कभी भी भारत नहीं आने वाले, लेकिन ताज़िन्दगी वे “भारत-भारत” भजते रहते हैं, यहाँ की सरकार भी उन्हें भारतवंशी(?) कहकर बुलाती रहती है, आखिर क्यों? फ़िर कैसे वहाँ का स्थानीय समाज उनसे जुड़ेगा? “हम तो यूपी वाले हैं…” की मानसिकता वहाँ भी दिखाई देती है और फ़िर जर्मनी, फ़िजी, अरब देशों, मलेशिया, केन्या सभी जगहों पर भारतीयों(?) पर हमले होते रहते हैं। रहे होंगे कभी आपके वंशज भारतीय, लेकिन अब तो आप और आपके बच्चे इंग्लैण्ड के नागरिक हैं, फ़िर भारत इंग्लैण्ड को क्रिकेट में हराये तो आप तिरंगा क्यों लहराते हैं? और फ़िर अपेक्षा करते हैं कि स्थानीय व्यक्ति आपका सम्मान करे?

यह सारा खेल पेट से जुड़ा हुआ है, हर जगह स्थानीय व्यक्ति को लगता है कि बाहर से आया हुआ व्यक्ति उसकी रोजी-रोटी छीन रहा है, इसका फ़ायदा नेता उठाते हैं और इसे भाषा का मुद्दा बना डालते हैं, और दोनों व्यक्तियों में आपसी सामंजस्य न होने के कारण आग और भड़कती जाती है। राज ठाकरे और करुणानिधि में कोई अन्तर नहीं है, दोनों ही क्षेत्रीयतावाद की राजनीति करते हैं, भाषा के विवाद पैदा करते हैं, अन्तर सिर्फ़ इतना है कि राज ठाकरे गालियाँ खा रहे हैं…और करुणानिधि मलाई। राज ठाकरे को गालियों से मलाई का सफ़र तय करने में अभी काफ़ी समय लगेगा… क्योंकि मराठी लोग ही उनका साथ नहीं देने वाले… लेकिन फ़िर भी स्थानीय भाषा के सम्मान और उसे “दिल से” अपनाने का मुद्दा तो अपनी जगह पर कायम रहेगा ही…

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हिन्दी सप्ताह विशेष : राज ठाकरे और करुणानिधि में भेदभाव क्यों?

Raj Thakre Mumbai Anti-Hindi Movement
सबसे पहले एक सवाल – कितने लोग हैं जिन्होंने मेगास्टार रजनीकान्त को चेन्नई शहर के किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में हिन्दी में बोलते सुना है? रजनीकान्त की मातृभाषा मराठी है, उनके जीवन का काफ़ी सारा समय कर्नाटक में बीता, फ़िर वे तमिल के सुपरस्टार बने। इसी तमिलनाडु के एक और हीरो हैं करुणानिधि, जिन्होंने हिन्दी विरोध की ही राजनीति से अपना जीवन शुरु किया था और आज इस मुकाम तक पहुँचे हैं। बहुत लोगों को याद है कि साठ के दशक में तमिलनाडु में सभी दुकानों पर तमिल भाषा के बोर्ड लगाना अनिवार्य किया गया था, और हिन्दी के साइनबोर्ड पर कालिख पोती गई थी। आज लगभग वही काम मुम्बई में राज ठाकरे करने की कोशिश कर रहे हैं (उनके सफ़ल होने की सम्भावना फ़िलहाल नहीं के बराबर है), तो उस पर इतना बवाल क्यों मचाया जा रहा है? दूसरी तरफ़ जया बच्चन हैं जो लगभग दंभी अन्दाज़ में ठाकरे का मखौल उड़ाते हुए कहती हैं कि “हम यूपी वाले लोग हैं, तो हम हिन्दी में ही बोलेंगे…”। सोचा जा सकता है कि जिस परिवार को मुम्बई में 30-40 साल होने आये, मुम्बई ने ही उन्हें पहचान दी, रोजी-रोटी दी, आज भी वह “हम यूपी वाले हैं…” की मानसिकता से बाहर नहीं आ पाया है, तो इसमें किसे दोष देना चाहिये? निश्चित रूप से यह सिर्फ़ मुम्बई में ही सम्भव है, कोलकाता या चेन्नई में नहीं।

अक्सर मुम्बई के “मेट्रो कल्चर” की दलील और दुहाई दी जाती है, क्या चेन्नई और कोलकाता मेट्रो नहीं हैं? फ़िर वहाँ जाकर रहने वाला व्यक्ति कैसे तमिल और बांग्ला को अपना लेता है? और वही व्यक्ति मुम्बई में अपना सारा जीवन मराठी का एक शब्द बोले बिना निकाल लेता है? क्या “मेट्रो कल्चर” का मतलब स्थानीय भाषा और संस्कृति की उपेक्षा करने का लाइसेंस है? आम मध्यमवर्गीय मराठी व्यक्ति मुम्बई की सीमा से लगभग बाहर हो चुका है, आज मुम्बई सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यापारियों, शेयर दलालों, धनपतियों और अन्य राज्यों से आये लोगों का शहर बन चुका है। जब राज ठाकरे इस मुद्दे को उठाते हैं तो बुद्धिजीवियों और चैनलों में तत्काल उन्हें “लगभग आतंकवादी” घोषित करने की होड़ लग जाती है, जबकि करुणानिधि यदि दिल्ली में भी प्रेस कान्फ़्रेंस आयोजित करते हैं तो भी तमिल में ही बोलते हैं, लेकिन कहीं कोई बात नहीं होती। हिन्दीभाषियों द्वारा मराठी भाषा को मुम्बई में जितने हल्के तौर पर लिया जाता है, उतना वह तमिल भाषा को चेन्नई में नहीं ले सकते, वह भी तब जबकि मराठी भाषा की लिपि देवनागरी है, तमिल या मलयालम की तरह द्रविड नहीं। तमिल के मुकाबले, मराठी सीखना बेहद आसान है, लेकिन फ़िर भी ऐसी घोर उपेक्षा? इसमें किसका दोष है? क्या राज ठाकरे का, कि वह मराठी में बोर्ड लगाने की बात कह रहे हैं और सार्वजनिक कार्यक्रमों में मराठी में बोलने का आग्रह कर रहे हैं, या फ़िर उनका जो अभी भी “हम यूपी वाले हैं…” की मानसिकता में जी रहे हैं?

एक शख्स हैं श्री साईसुरेश सिवास्वामी, तमिल हैं और लगभग 23 वर्ष पूर्व नौकरी के सिलसिले में मुम्बई आये थे। उन्होंने हाल के विवाद पर रेडिफ़.कॉम पर एक लेख लिखा है, जिसमें वे कहते हैं “जब मैं जवान था तब चेन्नई में हिन्दी साइनबोर्ड को कालिख पोतने वाला वहाँ “लोकल हीरो” समझा जाता था, और जब मैं मुम्बई आया तो यह देखकर हैरान था कि यहाँ मराठी का नामोनिशान मिटता जा रहा है और कोई भी साईनबोर्ड मराठी में नहीं है। यहाँ तक कि मुझे खुद शर्म महसूस होती है कि इतने वर्ष मुम्बई में बिताने के बावजूद मेरी हिन्दी अधिक शुद्ध है, मराठी की बनिस्बत…”। बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि “शिवसेना ने भी मराठी पर उतना जोर नहीं दिया, क्योंकि उसे महानगरपालिका से आगे बढ़कर राज्य की सत्ता चाहिये थी जो सिर्फ़ मराठी वोटों से नहीं मिल सकती थी, अन्ततः शिवसेना ने भी सिर्फ़ बम्बई को “मुम्बई” बनाकर इस मुद्दे से अपना हाथ खींच लिया…” लेकिन बाहर से आने वालों का यह फ़र्ज़ बनता था कि वह स्थानीय भाषा का सम्मान करते, उसके साथ चलते और उसे दिल से अपनाते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि मराठी माणुस स्वभावतः बेहद सहिष्णु, लोकतान्त्रिक और अपने काम से काम रखने वाला होता है। उसके सीधेपन को उसकी सहमति जानकर अन्य राज्यों के लोग आते गये, हिन्दी थोपते गये, पैसे के जोर पर मुम्बई में ज़मीनें हथियाते गये और एक आम मराठी व्यक्ति धीरे-धीरे मुम्बई से बाहर हो गया। राज ठाकरे को भी मराठी से बहुत प्रेम है ऐसा नहीं है, साफ़ है कि वह भी अपनी राजनीति को चमकाने के लिये ऐसा कर रहा है, लेकिन उसने जो मुद्दा उठाया है वह कई स्थानीय लोगों के दिल के तार हिलाता है। मंत्रालय और मुख्य कार्यालयों का कामकाज या तो हिन्दी में होता है या अंग्रेजी में, मराठी कहीं नहीं है। रोज़ाना नये अंग्रेजी स्कूल खुलते जा रहे हैं, जहाँ हिन्दी “भी” पढ़ाई जाती है, लेकिन मराठी स्कूलों की स्थिति अत्यन्त दयनीय है, ज़ाहिर है कि यह राज्य सरकार का दोष है, लेकिन जो व्यक्ति मुम्बई में रहकर इलाहाबाद में स्कूल खोल सकता है, उसका फ़र्ज़ बनता है कि वह एकाध मराठी स्कूल मुम्बई में भी खोले।

लेकिन राज ठाकरे बहुत देर कर चुके हैं, उनके इस मराठी-अमराठी मुद्दे की पकड़ बनाने के लिये मुम्बई में इतने मराठी बचे ही नहीं हैं कि राज ठाकरे की राजनीति पनप सके। पिछले “मुम्बई मनपा” चुनावों में राज ठाकरे इसका मजा चख चुके हैं। राज ठाकरे द्वारा मराठी की बात करते ही अन्य प्रान्तों के लोग उनके खिलाफ़ लामबन्द हो जाते हैं और वे अकेले पड़ जाते हैं, ऐसा ही होता रहेगा, क्योंकि मुम्बई में बाहर से आने वालों की संख्या अब इतनी ज़्यादा हो चुकी है कि अब वहाँ यह मुद्दा चलने वाला नहीं है। यह मुम्बई के स्थानीय मराठियों का दुर्भाग्य तो है, लेकिन इसके जिम्मेदार वे खुद ही हैं जो उन्होंने चेन्नई जैसा आन्दोलन नहीं चलाया और बर्दाश्त करते रहे।

हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है, सप्ताह और पखवाड़ा मनाया जा रहा है, अच्छी बात है। हिन्दी-हिन्दी भजने वाले सिर्फ़ एक बार करुणानिधि को हिन्दी सिखाकर दिखायें, हिन्दी भाषा की अलख उत्तर-पूर्व के राज्यों (जहाँ से हिन्दीभाषियों को भगाया जा रहा है) और तमिलनाडु में जलाकर दिखायें। हालांकि अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के कारण अब स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है और दक्षिण के लोग भी हिन्दी सीखना चाहते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि बगैर इसके उत्तर भारत में काम चलाना मुश्किल होगा, लेकिन यह स्थिति दक्षिण से बाहर जाने वालों की है, दक्षिण में जाकर बसने वालों को वहाँ की स्थानीय भाषा सीखना-बोलना अभी भी आवश्यक है, जबकि मुम्बई में ऐसा नहीं है। दरअसल हिन्दी प्रांतों के लोग क्षेत्रीय भाषाओं को गम्भीरता से लेते ही नहीं हैं, यदि सीखना भी पड़े तो मजबूरी में ही सीखते हैं। वे इस बात को नहीं समझते कि उस क्षेत्रीय भाषा का भी अपना विराट साहित्य संसार है। वे हिन्दी को ही श्रेष्ठ मानते हैं, और क्षेत्रीय भाषा को संख्याबल से दबाने का प्रयास करते हैं। इसके ठीक उलट मराठी व्यक्ति है जो जिस प्रान्त में जाता है वहाँ की भाषा, बोलचाल का लहजा और पहनावा तत्काल पकड़ लेता है, मैं आपको बनारस के कई मराठी परिवार दिखा सकता हूँ, जिनकी धोती, मुँह में पान और अवधी तथा खड़ी बोली को सुनकर आप विश्वास नहीं करेंगे कि यह व्यक्ति ठेठ मराठी है। मराठी व्यक्ति कभी अन्य राज्यों में “गुट” नहीं बनाता, दबंगता नहीं दिखाता, न ही राजनीति में कोई खास दिलचस्पी रखता है। एक ज़माने में कर्नाटक से लेकर अटक (अफ़गानिस्तान) तक मराठा साम्राज्य फ़ैला हुआ था, लेकिन क्या आज की तारीख में महाराष्ट्र छोड़कर किसी भी अन्य राज्य में मराठी वोट बैंक नाम की कोई चीज़ है? क्या अन्य राज्यों में मराठियों ने कभी राजनैतिक ताकत जताने या सामाजिक दबाव बनाने की कोशिश की है? महाराष्ट्र से बाहर कितने विधायक और सांसद मराठी हैं? इन प्रश्नों के जवाबों को अन्य राज्यों में बसे हुए विभिन्न राज्यों के लोगों को लेकर उसका प्रतिशत निकालिये, स्थिति साफ़ हो जायेगी।

मेरा जन्म मध्यप्रदेश में हुआ है और कर्मस्थली भी यही है और मुझे इस पर गर्व है। मेरी हिन्दी कई हिन्दीभाषियों से बेहतर है, गाँधीसागर बाँध के कारण मध्यप्रदेश के हितों को चोट लगने पर मैं राजस्थान को गरियाता हूँ, और विद्युत मंडल के बँटवारे में यदि मध्यप्रदेश के साथ अन्याय हुआ तो छत्तीसगढ़ को भी खरी-खोटी सुनाता हूँ, और ऐसा ही होना चाहिये। जो भी व्यक्ति जहाँ रहे, जिस जगह काम करे, जहाँ अपना आशियाना बनाये, रोजी-रोटी कमाये-खाये, उसे वहाँ की भाषा-संस्कृति में घुल-मिल जाना चाहिये, तभी सामाजिक समरसता बनेगी। ये नहीं कि रहते-खाते-कमाते तो दुबई में हैं, लेकिन अस्पताल खोलेंगे आज़मगढ़ में, नागरिक तो हैं कनाडा के लेकिन सड़क बनवायेंगे टिम्बकटू में…

यह थोड़ा विषयान्तर हो सकता है लेकिन इस मौके पर विदेशों में बसे भारतीयों को भी इस मुद्दे से सीखने की आवश्यकता है, ऐसा क्यों होता है कि भारतीय जिस देश में जाते हैं वहाँ के स्थानीय समाज को वे नहीं अपनाते हैं। कई परिवार ऐसे हैं जो 30-40 साल से ब्रिटेन-कनाडा-न्यूजीलैण्ड में बसे हुए हैं, वहीं नौकरी-व्यवसाय करते हैं, उनकी नागरिकता तक ब्रिटिश है, वे भविष्य में कभी भी भारत नहीं आने वाले, लेकिन ताज़िन्दगी वे “भारत-भारत” भजते रहते हैं, यहाँ की सरकार भी उन्हें भारतवंशी(?) कहकर बुलाती रहती है, आखिर क्यों? फ़िर कैसे वहाँ का स्थानीय समाज उनसे जुड़ेगा? “हम तो यूपी वाले हैं…” की मानसिकता वहाँ भी दिखाई देती है और फ़िर जर्मनी, फ़िजी, अरब देशों, मलेशिया, केन्या सभी जगहों पर भारतीयों(?) पर हमले होते रहते हैं। रहे होंगे कभी आपके वंशज भारतीय, लेकिन अब तो आप और आपके बच्चे इंग्लैण्ड के नागरिक हैं, फ़िर भारत इंग्लैण्ड को क्रिकेट में हराये तो आप तिरंगा क्यों लहराते हैं? और फ़िर अपेक्षा करते हैं कि स्थानीय व्यक्ति आपका सम्मान करे?

यह सारा खेल पेट से जुड़ा हुआ है, हर जगह स्थानीय व्यक्ति को लगता है कि बाहर से आया हुआ व्यक्ति उसकी रोजी-रोटी छीन रहा है, इसका फ़ायदा नेता उठाते हैं और इसे भाषा का मुद्दा बना डालते हैं, और दोनों व्यक्तियों में आपसी सामंजस्य न होने के कारण आग और भड़कती जाती है। राज ठाकरे और करुणानिधि में कोई अन्तर नहीं है, दोनों ही क्षेत्रीयतावाद की राजनीति करते हैं, भाषा के विवाद पैदा करते हैं, अन्तर सिर्फ़ इतना है कि राज ठाकरे गालियाँ खा रहे हैं…और करुणानिधि मलाई। राज ठाकरे को गालियों से मलाई का सफ़र तय करने में अभी काफ़ी समय लगेगा… क्योंकि मराठी लोग ही उनका साथ नहीं देने वाले… लेकिन फ़िर भी स्थानीय भाषा के सम्मान और उसे “दिल से” अपनाने का मुद्दा तो अपनी जगह पर कायम रहेगा ही…

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स्त्री-पुरुष चरित्र विचार -स्वामी विवेकानन्द

“”तमाम पुरुषो के लिए अपनी स्त्री के सिवा अन्य सभी स्त्री माता के समान होनी चाहिए , जब मै अपने आस-पास नजर करता हु और जिसे आप “स्त्रीसन्मान” कहते है वो देखता हू तो उसे देखकर मेरा आत्मा घृणा से भर जाता है ! जब तक आप स्त्रीपुरूष मे भेद के प्रश्नको लक्ष मे लेना छोड देके सर्वसामान्य मानवता की भूमिका पर मिलना नहीं सिखते तब तक आपका स्त्री समाज सच्चा विकास नहीं करेगा , वहा तक वो खिलौने से विशेष कुछ नही ! लग्न-विच्छेद या तलाक का कारण ये ही सब है !!
आपका पुरुष-वर्ग नीचे झुक के कुर्सी देता है और दूसरे ही पल वो उसके रुप की प्रशंसा करने लगता है और कहता है,”ओह मैडम ,तुम्हारे नैन कितने सुन्दर है ! “-ऐसा करने का आपको क्या अधिकार है ? पुरूष इतना आगे बढने की धृष्ठता कैसे कर सकता है ? और आप स्त्री-वर्ग ऐसी छुट कैसे दे सकते है ?
ऐसी घटना मानवता के अधम पक्ष को उत्तेजना देता है , उद्दात आदर्शो को ये पोषता नहीं. “—–स्वामी विवेकानन्द

पार्थ विकल है युद्ध अटल है छोड़ रूप अब श्रृंगारी

अमिय पात्र सब भरे भरे से ,नागों को पहरेदारी
गली गली को छान रहें हैं ,देखो विष के व्यापारी,
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मुखर-वक्तता,प्रखर ओज ले भरमाने कल आएँगे
मेरे तेरे सबके मन में , झूठी आस जगाएंगे
फ़िर सत्ता के मद में ये ही,बन जाएंगे अभिसारी
…………………………….देखो विष के व्यापारी,
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कैसे कह दूँ प्रिया मैं ,कब-तक लौटूंगा अब शाम ढले
बम से अटी हुई हैं सड़कें,फैला है विष गले-गले.
बस गहरा चिंतन प्रिय करना,खबरें हुईं हैं अंगारी
…………………………….देखो विष के व्यापारी,
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लिप्सा मानस में सबके देखो अपने हिस्से पाने की
देखो उसने जिद्द पकड़ ली अपनी ही धुन गाने की,
पार्थ विकल है युद्ध अटल है छोड़ रूप अब श्रृंगारी
…………………………….देखो विष के व्यापारी,

भिक्षा


छत्रपति शिवाजी के गुरुदेव, समर्थ गुरु रामदास एक दिन गुरुभिक्षा लेने जा रहे थे। उन पर शिवाजी की नजर पड़ी!मेरेगुरु और भिक्षा!मैं नहीं देख सकता!प्रणाम किया! बोले-“हे गुरदेव!मैं अपना पूरा राज पाठ आपके कटोरे में दाल रहा हूँ !..अब से मेरा राज्य आपका हुआ!”तब गुरु रामदास ने कहा-“सच्चे मन से दे रहे हो! वापस लेने की इच्छा तो नहीं?”
“बिलकुल नहीं !यह सारा राज्य आपका हुआ!”
“तो ठीक है! यह लो…!”कहते कहते गुरु ने अपना चोला फाड़ दिया! उसमे से एक टुकडा निकाला!भगवे रंग का कपडा था वह !इस कपडे को शिवाजी के मुकुट पर बाँध दिया और कहा -“लो!! मैं अपना राज्य तुम्हे सौंपता हूँ-चलाने के लिए!देखभाल के लिए!””मेरे नाम पर राज्य करो! मेरी धरोहर समझ कर! मेरी अमानत रहेगी तुम्हारे पास !”
“गुरदेव ! आप तो लौटा रहें है मेरी भेंट!” कहते कहते शिवाजी की ऑंखें गीली हो गयी!
“ऐसा नहीं!कहा न मेरी अमानत है!मेरे नाम पर राज्य करो! इसे धरम राज्य बनाए रखना, यही मेरी इच्छा है!”
“ठीक है गुरुदेव! इस राज्य का झंडा सदा भगवे रंग का रहेगा! इसे देखकर आपकी तथा आपकी आदर्शों की याद आती रहेगी!”
“सदा सुखी रहो ! कहकर गुरु रामदास भिक्षा हेतु चले दिए!

संकलित प्रेरक प्रसंग

>पुलिस वालों जलवा दिखाओ, देशद्रोही नेताओं के भरोसे रहे तो…

>Terrorist attack & Indian Police Encounter
बंगलोर, अहमदाबाद, जयपुर के बाद अब दिल्ली का नम्बर भी आ गया, साफ़ है कि कोई भी शहर अब सुरक्षित नहीं रहा, बम धमाके और मौत किसी भी समय किसी भी परिवार को उजाड़ सकते हैं। इस देश में एक गृहमंत्री भी है, जिनका नाम है शिवराज पाटिल (नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा, ठीक वैसे ही जैसे कि उपराष्ट्रपति का नाम भी कम ही लोगों को मालूम होगा)। तो हमारे गृहमंत्री साहब मीटिंग करते हैं, सेमिनार करते हैं, निर्देश देते हैं, लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है। वही बरसों पुरानी रट लगाये रहते हैं, “आतंकवादियों का कड़ा मुकाबला किया जायेगा…”, “इस तरह की कायराना हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा…”, आदि-आदि। रेड अलर्ट और हाई अलर्ट तो एक सरकारी उत्सव की तरह हो गये हैं जो हर महीने-पन्द्रह दिन में आते-जाते रहते हैं, एक कर्मकाण्ड की तरह रेड अलर्ट मनाया जाता है, एक बेगारी की तरह हाई अलर्ट टाला जाता है। फ़िर से सब उसी ढर्रे पर लौट आते हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो… फ़िर अखबार और मीडिया देश की जनता की तारीफ़ों(?) के कसीदे काढ़ते हैं कि “देखो कैसे जनजीवन सामान्य हो गया…” “देश की जनता ने अलाँ-फ़लाँ त्यौहार जोरशोर से मनाकर आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब दिया…” इन मूर्खों को कौन समझाये कि क्या जनता अगले दिन अपने काम पर न जाये? या बम विस्फ़ोट हो गया है तो अगले दिन सभी लोग भूखे सो जायें? कोई कामधाम नहीं है क्या, जनजीवन सामान्य न करें तो क्या करें? सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ अपना काम नहीं कर रही, कम से कम आम जनता तो अपना काम करे, उसमें आतंकवाद को जवाब देने की बात कहाँ से आ गई? खैर… जो हो रहा है वह ऐसे ही चलता रहेगा, अब उम्मीद की किरण बची है पुलिस वालों से…

पुलिस वालों, अब तुम्हारे जागने का वक्त आ गया है यदि देशद्रोही नेताओं के भरोसे बैठे रहे और उनके घटिया आदेशों का पालन करते रहे तो एक दिन तुम्हारा परिवार भी ऐसे ही किसी बम विस्फ़ोट में मारा जायेगा तब हाथ मलने के सिवा कोई चारा न होगा। इस लेख के माध्यम से पुलिस वालों से एक अनुरोध है, विनती है, करबद्ध प्रार्थना है कि अब अपना पुलिसिया जलवा दिखाओ, अपने मुखबिरों की नकेल कसो, उनका नेटवर्क मजबूत करो, सूचनायें एकत्रित करो और “व्यक्तिगत स्तर पर देश की खातिर” मुठभेड़ों का जोरदार दौरदौरा चलाओ। चार-छः महीनों में पकड़े जा सकने वाले आतंकवादियों और देशद्रोहियों की लाशें बिछाओ। भले ही उसे आधिकारिक मुठभेड़ न दिखाओ, लेकिन देश के भले के लिये हर पुलिस वाला कम से कम दो-चार समाजविरोधी काँटों को तो साफ़ कर ही सकता है। “सेफ़ मुठभेड़” कैसे की जाती है, यह अनुभवी पुलिस वालों को बताने की ज़रूरत नहीं है, बस इस बात का ध्यान रखना होगा कि कहीं कोई बेगुनाह न मारा जाये, पहले पक्की सूचनायें इकठ्ठा करो, उनको जाँच-परख लो, फ़िर उस आतंकवादी को उड़ा दो। ऐसा दमनचक्र चलाओ कि देशद्रोहियों को पनाह देने वालों का सर चकरा जाये कि आखिर यह हो क्या रहा है? जिसके पास AK-47 बरामद हो वह कोई सन्त तो नहीं हो सकता, जिस घर से RDX और डिटोनेटर बरामद हो रहे हों वह कोई महात्मा का आश्रम तो हो नहीं सकता, उसे वहीं मार गिराओ, उस घर को नेस्तनाबूद कर दो, उस घर में रहने वाले पूरे परिवार को पुलिस की थर्ड डिग्री का मजा चखाओ। सेकुलर लोग कहेंगे कि उस परिवार का क्या दोष है वह तो निर्दोष है, लेकिन बम विस्फ़ोट में मारे जाने वाले भी तो निर्दोष ही होते हैं।

प्रिय पुलिस वालों, हम एक युद्धकाल में जी रहे हैं यहाँ शान्तिकाल के नियम लागू नहीं होते। हो सकता है कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाये, लेकिन अभी गेहूँ का पिसना अधिक महत्वपूर्ण है, अपनी तरफ़ से सावधानी बरतो, लेकिन यदि कोई बेगुनाह मारा भी जाता है तो उसमें छाती कूटने की आवश्यकता नहीं है, रोजाना कई बेगुनाह सड़कों पर कारों-ट्रकों द्वारा कुचले जाते हैं और अमीरज़ादे पैसा देकर छूट जाते हैं, और फ़िर यह तो देश की सुरक्षा का मामला है, गर्व का मामला है। हे पुलिस वालों, तुम नाकों-चौराहों पर पैसा खाते हो, मर्डर-झगड़ा होने पर दोनों पार्टियों से पैसा खाते हो, तुम FIR लिखने तक का पैसा खाते हो, ये काम तो तुम छोड़ने से रहे तो कम से कम एक नेक काम करो, महीने-दो महीने में एकाध बड़े गुण्डे का एनकाउंटर करो, यदि वह गुण्डा देशविरोधी काम में लिप्त पाया जाये तो जल्दी से जल्दी करो। एक बात होती है “राजदण्ड”, दिखने में यह हवलदार के हाथ में एक मामूली डण्डे जैसा दिखता है, लेकिन उस डण्डे का जलाल ही अपराधियों में खौफ़ पैदा करता है। आतंकवादियों के दिलोदिमाग में इस राजदण्ड का ऐसा खौफ़ पैदा करो कि वे कुछ भी करने से पहले दस बार सोचें। हमारे देश की न्याय व्यवस्था पर भी भरोसा रखो, जो न्याय व्यवस्था अबू सलेम, दाऊद इब्राहीम, तेलगी, शहाबुद्दीन जैसों की “मददगार” है, वह कई एनकाउंटर करने के बावजूद तुम्हारी भी “मदद” करेगी, यदि देशद्रोही वकील हैं तो देशप्रेमी वकील भी हैं इस देश में… इसलिये बेखौफ़ होकर इस युद्धकाल में अपना कर्तव्य निभाओ, लोग यह नहीं याद रखते कि पंजाब में कितने बेगुनाह मारे गये, लोग याद रखते हैं केपीएस गिल को…।

और एक अन्तिम बात… “सेकुलर” और “मानवाधिकारवादी” नाम के दो आस्तीन के साँपों (ये साँप अफ़ज़ल को गले लगाये रहेंगे, बांग्लादेशी घुसपैठियों की राशनकार्ड और पैसों से मदद करते रहेंगे, आतंकवादियों को बिरयानी खिलाकर छोड़ते रहेंगे) से दूर रहने की कोशिश करना… जनता तुम्हें लाख-लाख दुआयें देगी जो तुम्हारे बच्चों के ही काम आयेगी। तो उठो और काम में जुट जाओ, शुरुआत जेल में बन्द आतंकवादियों से ही करो… सबसे पहले उन्हें एक दिन छोड़कर खाने में जुलाब की चार गोली खिलाओ…, चुपके से एड्स के इंजेक्शन लगाओ… “असली गोली” बाद में, फ़िर आगे क्या और कैसे करना है यह भी मुझे बताना पड़ेगा क्या???

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पुलिस वालों जलवा दिखाओ, देशद्रोही नेताओं के भरोसे रहे तो…

Terrorist attack & Indian Police Encounter
बंगलोर, अहमदाबाद, जयपुर के बाद अब दिल्ली का नम्बर भी आ गया, साफ़ है कि कोई भी शहर अब सुरक्षित नहीं रहा, बम धमाके और मौत किसी भी समय किसी भी परिवार को उजाड़ सकते हैं। इस देश में एक गृहमंत्री भी है, जिनका नाम है शिवराज पाटिल (नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा, ठीक वैसे ही जैसे कि उपराष्ट्रपति का नाम भी कम ही लोगों को मालूम होगा)। तो हमारे गृहमंत्री साहब मीटिंग करते हैं, सेमिनार करते हैं, निर्देश देते हैं, लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है। वही बरसों पुरानी रट लगाये रहते हैं, “आतंकवादियों का कड़ा मुकाबला किया जायेगा…”, “इस तरह की कायराना हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा…”, आदि-आदि। रेड अलर्ट और हाई अलर्ट तो एक सरकारी उत्सव की तरह हो गये हैं जो हर महीने-पन्द्रह दिन में आते-जाते रहते हैं, एक कर्मकाण्ड की तरह रेड अलर्ट मनाया जाता है, एक बेगारी की तरह हाई अलर्ट टाला जाता है। फ़िर से सब उसी ढर्रे पर लौट आते हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो… फ़िर अखबार और मीडिया देश की जनता की तारीफ़ों(?) के कसीदे काढ़ते हैं कि “देखो कैसे जनजीवन सामान्य हो गया…” “देश की जनता ने अलाँ-फ़लाँ त्यौहार जोरशोर से मनाकर आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब दिया…” इन मूर्खों को कौन समझाये कि क्या जनता अगले दिन अपने काम पर न जाये? या बम विस्फ़ोट हो गया है तो अगले दिन सभी लोग भूखे सो जायें? कोई कामधाम नहीं है क्या, जनजीवन सामान्य न करें तो क्या करें? सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ अपना काम नहीं कर रही, कम से कम आम जनता तो अपना काम करे, उसमें आतंकवाद को जवाब देने की बात कहाँ से आ गई? खैर… जो हो रहा है वह ऐसे ही चलता रहेगा, अब उम्मीद की किरण बची है पुलिस वालों से…

पुलिस वालों, अब तुम्हारे जागने का वक्त आ गया है यदि देशद्रोही नेताओं के भरोसे बैठे रहे और उनके घटिया आदेशों का पालन करते रहे तो एक दिन तुम्हारा परिवार भी ऐसे ही किसी बम विस्फ़ोट में मारा जायेगा तब हाथ मलने के सिवा कोई चारा न होगा। इस लेख के माध्यम से पुलिस वालों से एक अनुरोध है, विनती है, करबद्ध प्रार्थना है कि अब अपना पुलिसिया जलवा दिखाओ, अपने मुखबिरों की नकेल कसो, उनका नेटवर्क मजबूत करो, सूचनायें एकत्रित करो और “व्यक्तिगत स्तर पर देश की खातिर” मुठभेड़ों का जोरदार दौरदौरा चलाओ। चार-छः महीनों में पकड़े जा सकने वाले आतंकवादियों और देशद्रोहियों की लाशें बिछाओ। भले ही उसे आधिकारिक मुठभेड़ न दिखाओ, लेकिन देश के भले के लिये हर पुलिस वाला कम से कम दो-चार समाजविरोधी काँटों को तो साफ़ कर ही सकता है। “सेफ़ मुठभेड़” कैसे की जाती है, यह अनुभवी पुलिस वालों को बताने की ज़रूरत नहीं है, बस इस बात का ध्यान रखना होगा कि कहीं कोई बेगुनाह न मारा जाये, पहले पक्की सूचनायें इकठ्ठा करो, उनको जाँच-परख लो, फ़िर उस आतंकवादी को उड़ा दो। ऐसा दमनचक्र चलाओ कि देशद्रोहियों को पनाह देने वालों का सर चकरा जाये कि आखिर यह हो क्या रहा है? जिसके पास AK-47 बरामद हो वह कोई सन्त तो नहीं हो सकता, जिस घर से RDX और डिटोनेटर बरामद हो रहे हों वह कोई महात्मा का आश्रम तो हो नहीं सकता, उसे वहीं मार गिराओ, उस घर को नेस्तनाबूद कर दो, उस घर में रहने वाले पूरे परिवार को पुलिस की थर्ड डिग्री का मजा चखाओ। सेकुलर लोग कहेंगे कि उस परिवार का क्या दोष है वह तो निर्दोष है, लेकिन बम विस्फ़ोट में मारे जाने वाले भी तो निर्दोष ही होते हैं।

प्रिय पुलिस वालों, हम एक युद्धकाल में जी रहे हैं यहाँ शान्तिकाल के नियम लागू नहीं होते। हो सकता है कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाये, लेकिन अभी गेहूँ का पिसना अधिक महत्वपूर्ण है, अपनी तरफ़ से सावधानी बरतो, लेकिन यदि कोई बेगुनाह मारा भी जाता है तो उसमें छाती कूटने की आवश्यकता नहीं है, रोजाना कई बेगुनाह सड़कों पर कारों-ट्रकों द्वारा कुचले जाते हैं और अमीरज़ादे पैसा देकर छूट जाते हैं, और फ़िर यह तो देश की सुरक्षा का मामला है, गर्व का मामला है। हे पुलिस वालों, तुम नाकों-चौराहों पर पैसा खाते हो, मर्डर-झगड़ा होने पर दोनों पार्टियों से पैसा खाते हो, तुम FIR लिखने तक का पैसा खाते हो, ये काम तो तुम छोड़ने से रहे तो कम से कम एक नेक काम करो, महीने-दो महीने में एकाध बड़े गुण्डे का एनकाउंटर करो, यदि वह गुण्डा देशविरोधी काम में लिप्त पाया जाये तो जल्दी से जल्दी करो। एक बात होती है “राजदण्ड”, दिखने में यह हवलदार के हाथ में एक मामूली डण्डे जैसा दिखता है, लेकिन उस डण्डे का जलाल ही अपराधियों में खौफ़ पैदा करता है। आतंकवादियों के दिलोदिमाग में इस राजदण्ड का ऐसा खौफ़ पैदा करो कि वे कुछ भी करने से पहले दस बार सोचें। हमारे देश की न्याय व्यवस्था पर भी भरोसा रखो, जो न्याय व्यवस्था अबू सलेम, दाऊद इब्राहीम, तेलगी, शहाबुद्दीन जैसों की “मददगार” है, वह कई एनकाउंटर करने के बावजूद तुम्हारी भी “मदद” करेगी, यदि देशद्रोही वकील हैं तो देशप्रेमी वकील भी हैं इस देश में… इसलिये बेखौफ़ होकर इस युद्धकाल में अपना कर्तव्य निभाओ, लोग यह नहीं याद रखते कि पंजाब में कितने बेगुनाह मारे गये, लोग याद रखते हैं केपीएस गिल को…।

और एक अन्तिम बात… “सेकुलर” और “मानवाधिकारवादी” नाम के दो आस्तीन के साँपों (ये साँप अफ़ज़ल को गले लगाये रहेंगे, बांग्लादेशी घुसपैठियों की राशनकार्ड और पैसों से मदद करते रहेंगे, आतंकवादियों को बिरयानी खिलाकर छोड़ते रहेंगे) से दूर रहने की कोशिश करना… जनता तुम्हें लाख-लाख दुआयें देगी जो तुम्हारे बच्चों के ही काम आयेगी। तो उठो और काम में जुट जाओ, शुरुआत जेल में बन्द आतंकवादियों से ही करो… सबसे पहले उन्हें एक दिन छोड़कर खाने में जुलाब की चार गोली खिलाओ…, चुपके से एड्स के इंजेक्शन लगाओ… “असली गोली” बाद में, फ़िर आगे क्या और कैसे करना है यह भी मुझे बताना पड़ेगा क्या???

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