कजरारी मतवारी मदभरी दो अखियां- राजकुमारी की आवाज में

कुछ दिनों पहले मैने एक पोस्ट में जिक्र किया था खान मस्ताना का।  जो एक बहुत ही उम्दा  गायक और संगीतकार होते हुए भी अपने  अंतिम दिन   भीख मांगते हुए गुजारे। ऐसी ही एक और गायिका थी राजकुमारी। राजकुमारी जी  के भी अपने जीवन के अंतिम दिन बहुत ही बुरे गुजरे।
राजकुमारी  उन कलाकारों में से एक थी जिन पर किसी दूसरी गायिका  की आवाज का प्रभाव दिखाई- सुनाई नहीं पड़ता। उनकी अपनी एक सुन्दर शैली थी। जिस शैली में राजकुमारी जीने बहुत ही सुन्दर गीत गाये।
महल फिल्म के  गीतों ने लताजी  को तो प्रसिद्धी के शिखर पर बिठा दिया पर राजकुमारी जी को वो  मुकाम कभी हासिल नहीं हुआ।  महल फिल्म में राजकुमारी ने जो गीत गाये उनमें  से खास हैं , एक तीर चला और  घबरा के जो हम सर को   टकरायें तो  अच्छा हो.., चुन चुन घुंघरवा  (जौहरा बाई के  साथ)
परन्तु आज मैं आपको एक दूसरी फिल्म का गीत सुनवाने जा रहा हूँ यह फिल्म है “नव बहार” यह फिल्म 1952  में इस फिल्म का संगीत दिया है स्व. रोशन ने।
ग्रेटा मेमसाब ने अपने ब्लॉग में इस फिल्म की पूरी सचित्र जानकारी दी है । फिल्म का ज्यादा वर्णन मैने यहां  नहीं किया है सो आप   इस लिंक पर जाकर फिल्म की कहानी पढ़ सकते हैं और चित्र भी देख सकते हैं।
मेमसाब Nau Bahar (1952)
आईये गाना सुनते और गुनगुनाते हैं।

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कजरारी  मतवारी मदभरी दो अखियां
पिया तोरी दो अंखिया
कजरारी  मतवारी मदभरी दो अखियां
पिया तोरी इन अखिंयन में 
बैठ मैने के देखी सब दुनियाँ
पिया तोरी दो अखियां
कजरारी…पिया तोरी दो अखियां
जैसे नीलकमल की कलियाँ
जैसे भँवर मतवाले
प्रीत की अन्जानी नगरी से
दो अन्जाने तारे
रंगरस की गलियाँ
पिया तोरी मतवारी  मतवारी मदभरी
कजरारी

आलाप  (कुलदीप कौर)
चपल नैन चप लागिन चमके
चंद्रपोर सी लच लच चच
अधर धरत पग धरन धरत यूं नाचत है ब्रज नारी
ततत थितता थितता थई -३

तेरी अखियंन में चंचल सागर
डूब के तर गया जियरा -२
तोरे नैनन के नीलगगन में
खो गया मेरा हियरा -२
मैं खोजूं  दिन रतियां
पिया तोरी
मतवारी मदभरी दो अखियां
कजरारी  मतवारी मदभरी दो अखियां
पिया तोरी इन अखियंन में बैठ के
देखी मैने सब दुनियाँ
पिया तोरी…..कजरारी..
मदभरी दो अखियां
पिया  तोरी कजरारी मतवारी
मदभरी दो अखियां-२

राजकुमारी के कुछ और गीत यहां सुनिये

देश तोड़ते दो नेता

आज देश किस मोड़ पर जा रहा है, आज के नेतागण देश और धर्म को चूस रहे है। महाराष्ट्र में राज ठाकरे देश को तो समाजवादी पार्टी के कुछ नेता देश और धर्म को बॉंट रहे है। आज इन नेताओं की मानसिकता बन गई है कि बन गई है कि इस देश में उसी का राज है। आज इन अर्धमियों के आगे अपना देश और सविंधान नतमस्तक  हो गया है। आखिर ये देश और देश की राजनीति को किस दिशा में ले जाना चाहते है ? 
आज जिस प्रकार महाराष्ट्र में राज ठाकरे द्वारा कुराज किया जा रहा है, वह देश बॉंटने वाला है। आज ये क्षेत्रवाद के नाम पर देश को बॉट रहे है। वह देश की संस्‍कृतिक विरासत के लिये खतरा है। अगर इसी प्रकार क्षेत्रवाद के नाम पर राष्‍ट्र को बॉंटा जायेगा तो देश का बंटाधार तो तय है। भारत को उसकी विविधा के कारण जाना जाता है। पर इस विवि‍धा वाले देश को मराठा और तमिल के नाम पर कुछ क्षेत्रिय नेता आपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे है। ये नेता क्यो भूल जाते है कि जो क्षेत्रवाद की राजनीति करते है। वे भूल जाते है कि वे जिस मराठा मनुष की बात करते है वही के मराठा मानुष भारत के अन्य राज्यों में भी रहते है। अगर उनके हितो को नुकसान पहुँचाया जायेगा तो कैसा लगेगा ? 
आज कल सपा नेताओं को भी चुनाव आते ही मुस्लित हितो का तेजी से ध्‍यान आने लगा है। जिनते आंतकवादी मिल रहे है सपा उन्हे अपना घरजमाई और दमाद बना ले रही है। अमर सिंह की तो हर आंतकवादी से रिस्‍ते दारी निकल रही है। तभी देश की रक्षा करते हुये शहीदो से ज्‍यादा सपा और उसके नेताओं को अपने घर जामईयों की ज्‍यादा याद आ रही है।
यह देश आज आत्‍मघातियों से जूझ रहा है, जो क्षण क्षण देश को तोड़ रहे है। भगवान राजठाकरे को, और अल्लाह मियॉं अमर सिंह को सद्बुद्धि दे की ये देश के बारे कुछ अच्छा सोचे और देश के विकास में सहयोग करें। इसी में सबका भला है। 

जेब ढीली हो ग ई क्या ?

आने वाली है दिवाली

उसके पहले ही होगी जेबें खाली

धनतेरस पर धन जाये

एक खरीदे कंगन अगूठी

मुफ्त पायें।

बीबी की जिंद

बच्चों के कपड़े करते हैं कंगाल

हाय ये मौसम और ये त्योहार

खुश हूँ मैं भी ये दिखता है सब को

अन्दर ही अन्दर दुखता दिल है

और चुप मैं हूँ

करता हूँ मैं अब यही कामना

जाये ये त्यौहार

छूटे जेब का भार

राष्ट्रीय एकता परिषद का राजनीतिक दुरुपयोग

कांग्रेस सरकार राष्ट्रीय एकता परिषद के मंच का राजनीतिक दुरुपयोग कर रहा है। यह राष्ट्रीय एकता का ढकोसला है। विगत सप्ताह एकता परिषद की दिल्ली में हुई बैठक के एजेंडे से ही यह झलक मिल रही थी कि यह बैठक बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद को घरने के दुराग्रह के साथ आयोजित की जा रही थी क्योंकि आज देश के सामने जो सबसे गंभीर संकट है अर्थात आतंकवाद, वह इस बैठक के एजेंडे में ही नहीं था। बल्कि उड़ीसा और कर्नाटक की हिंसक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में साम्प्रदायिकता को बैठक का केन्द्रीय विषय बनाया गया। यह स्पष्ट है कि परिषद की यह बैठक आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर साम्प्रदायिकता के नाम पर हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों और भाजपा को आरोपित कर छद्म सेकुलर जमात अल्पसंख्यक समुदायों को यह संदेश देना चाहती थी कि वही उनकी हिमायती है। बजरंग दल के खिलाफ स्वर को मुखर करने के लिए समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह को परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया जबकि अमर सिंह ने आतंकवादियों के खिलाफ पुलिस मुठभेड़ में शहीद हुए पुलिस अधिकारी शहादत पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया था। अमर सिंह जैसे लोगों को परिषद में शामिल कर सरकार क्या संदेश देना चाहती है। इस बैठक की गंभीरता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि बैठक में विशष आमंत्रित के रूप में बुलाए गए कामरेड ज्योति बसु ने स्वयं उपस्थित न होकर अपना जो संदेश भेजा वह परिषद की कार्यशैली व भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। भाजपा द्वारा आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को बैठक के एजेंडे में शामिल करने के लिए जोर देने पर सरकार ने चरम पंथ को एजेंडे में शामिल किया क्यों कि संप्रग सरकार व उसके छद्म धर्मनिरपेक्ष घटक दल जानते हैं कि आतंकवाद पर व्यापक बहस हुई तो उन सबकी पोल खुलेगी और फिर देश की जनता जानेगी कि सोनिया पार्टी की सरकार और लालू,पासवान व मुलायम सिंह जैसे उसके सहयोगी किस तरह मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए न केवल आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाने से कतरा रहे हैं बल्कि आतंकवादी समूहों के पैरोकारी कर रहे हैं।
http://ckshindu.blogspot.com

कितना कठिन है सबको साथ लेकर चलना



“अनूप जी”की एक लाइना देख कर लगता है की एक दूसरे से जुड़ने में कितना आनंद है । अनपेक्षित विवाद

को लेकर जो बबाल मचा “उस पर अनूप जी ने बस इतना कहा लिखते रहिए !” वास्तव में लिखने की धारा में कमी हो उनका उद्द्येश्य है इसके पीछे । इसमें बुराई क्या है अगर बुराई है तो “इनके”कार्यो में रचनात्मकता की चेतना के अभाव को देखा जा सकता है । राज ठाकरे जैसे व्यक्तियों को कितना भी <a href="http://savysachi.mywebdunia.com/2008/09/12/1221160980000.html&quot; title="राज़ ठाकरे जी “सादर-अभिवादन””>समझाया जाए हजूर के कानों में जूँ भी न रेंगेगी तो ये भी जान लीजिए हजूर जिंदगी “से हिसाब मांगती रहेगी कल की घड़ी तब आप भौंचक रह जाएंगे और तब आपके आंसू निकल आएँगे ये तय है। ये हम नहीं लोगों का कहना है जिन को आप क्षेत्र,भाषा,धर्म,प्रांत,के नाम पर तकसीम कर रहें हैं । “वशीकरण, सम्मोहन व आकर्षण हेतु “’ किसी का या “मन्त्र”-का उपयोग करिए । “ताना-बानाबिनतीं, विघुलता का स्वागत

विघुलता जी एक अच्छी साहित्य कार होने के साथ साथ पत्रकारिता से भी सम्बद्ध हैं तथा सभी ब्लॉगर जो आज की चर्चा में शामिल हैं उनका हार्दिक सम्मान जिनके चिट्ठे छूट गए उनसे क्षमा याचना के साथ

आपका स्नेह एवं कभी कभार कोप भाजन

गिरीश बिल्लोरे मुकुल

>लता, जयदेव और बालकवि बैरागी का एक और मधुर गीत…

>A Beautiful Song of Lata Mangeshkar, Jaidev and Balkavi Bairagi

राजस्थान के बारे में कहा जाता है कि इसके कई-कई रंग हैं, यह सुबह को अलग दिखता है, शाम को अलग और रात में और अलग। राजस्थान के चटखीले रंगों, किलों और हवेलियों को हिन्दी फ़िल्मों में कई बार सुन्दर चित्रित किया गया है, चाहे जेपी दत्ता की गुलामी, बँटवारा या बॉर्डर हो, यश चोपड़ा की लम्हे हो या सुनील दत्त की रेशमा और शेरा हो…

यहाँ फ़िल्म रेशमा और शेरा का एक गीत पेश करता हूँ, प्रस्तुत गीत रेडियो पर अमूमन बहुत कम ही सुनने में आता है, इस फ़िल्म का गीत “तू चन्दा मैं चाँदनी…” ही अधिकतर सुनने में आता है, जबकि यह गीत भी उतना ही मधुर और हिन्दी कविता से भरा हुआ है, लेकिन पता नहीं क्यों इसकी फ़रमाईश नहीं आती। गीत के बोल हैं “एक मीठी सी चुभन, एक ठंडी सी अगन…” लिखा है बालकवि बैरागी ने और संगीत दिया है जयदेव ने। इस गीत में सुनील दत्त ने राजस्थान के जिस हवेलीनुमा मन्दिर का चित्रण किया है, वह तो अपने-आप में बेजोड़ है ही, उस पर वहीदा रहमान का मासूम अभिनय और “सिचुएशन” के मुताबिक लिखे गये (और फ़िर भी दिल को छू लेने वाले) बेहतरीन शब्द इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देते हैं। पहले आप इस गीत को ऑडियो रूप में सुनिये… फ़िर आगे की बात करते हैं…

http://www.lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://sureshchip.lifelogger.com/media/audio0/865450_nsxjxzvmwc_conv.flv&autoStart=false

एक मीठी सी चुभन, एक ठंडी सी अगन
मैं आज पवन में पाऊँ, आज पवन में पाऊँ…
एक मीठी सी चुभन…
मन ही मन मैं नाच रही हूँ…. मन ही मन मुसकाऊँ…
क्योंकि मीठी-मीठी सी चुभन… ठंडी-ठंडी सी अगन…

1) जाग उठा है प्यार, झूमे सब संसार
अंगड़ाई लेते हैं सपने, धर के रूप हजार
नाच उठा है प्यार, आज मेरा आज मेरा झूम रहा संसार
मन का आँगन जो सूना था… आई है उसमें बहार
कंगना… पायल… कंगनवा खनके पायल छमके,
लट उलझी सुलझाऊँ, शरमाऊँ, मुसकाऊँ
क्योंकि एक मीठी-मीठी सी अगन…

2) ऐ मेरे भगवान, इतना कर अहसान
ये रसवन्ती हवा कहीं ना, बन जाये तूफ़ान
प्यार मेरा नादान, मन भी है अन्जान
जल ना जाये बैर अगन में जीवन के वरदान
धीरज भागे, चिन्ता जागे, मन ही मन घबराऊँ, घबराऊँ, घबराऊँ…

यह गीत प्यार की आगोश में पूरी तरह से भीगी हुई एक युवती के मन की दास्तान है। बालकवि के फ़ूलों से नाज़ुक बोल इसे एक नई ऊँचाई देते हैं। शुरुआत से ही यह गीत आपको भीतर से जकड़ने लगता है, जिसने भी एक खास उम्र में “प्यार” नाम के इस खूबसूरत अहसास को जिया है वह “एक मीठी सी चुभन, एक ठंडी सी अगन” जैसे शब्दों को शिद्दत से महसूस कर सकता है, वही व्यक्ति “रसवन्ती हवा” का मतलब भी समझ सकता है। फ़िल्म की “सिचुएशन” में बँधे होने के बावजूद एक गीतकार कैसे सुन्दर कविता कर लेता है यह इसका एक उदाहरण है। गीत के दूसरे अंतरे में नायिका (जो कि अपने दुश्मन कबीले के सरदार के बेटे के साथ प्रेम करती है) अपने भविष्य को लेकर बुरी तरह आशंकित है और वह भगवान से प्रार्थना करती है कि “ये रसवन्ती हवा कहीं ना बन जाये तूफ़ान…”। हालांकि बालकवि अधिक से अधिक हिन्दी शब्दों का प्रयोग करते हैं, लेकिन दूसरे अंतरे में “अहसान” शब्द का उपयोग शायद उन्होंने अगली पंक्तियों में आने वाले “तूफ़ान”, “अन्जान” और “वरदान” से तुकबन्दी मिलाने के लिये किया होगा, यह गीत पूरी तरह से गीतकार का ही है।

लता मंगेशकर तो खैर हमेशा की तरह गीत की आत्मा में उतरकर गाती ही हैं, संगीतकार जयदेव ने भी इसमें कमाल किया है। फ़िल्म इंडस्ट्री में दो संगीतकार “रवि” और “जयदेव” हमेशा “अंडर-रेटेड” और “अंडर-एस्टीमेटेड” (इस स्थान पर उपयुक्त हिन्दी शब्द नहीं मिल रहा) ही रहे, जबकि दोनों ही बेहद प्रतिभाशाली हैं। जयदेव हमेशा कम से कम वाद्य यन्त्रों के प्रयोग के लिये जाने जाते रहे हैं। इस गीत में भी उन्होंने संतूर, जलतरंग और बाँसुरी का शानदार उपयोग किया है। गीत बेहद उतार-चढ़ाव भरा है और लता मंगेशकर ने इसके साथ पूरा न्याय किया है, खासकर “मन ही मन मुस…काऊँ” वाली लाईन में “मुस” शब्द के बाद एक सेकण्ड का विराम तो आपको उड़ाकर ले जाता है। इसी प्रकार सिनेमेटोग्राफ़र एस रामचन्द्र ने भी राजस्थान की इस लोकेशन को कैमरे से कविता की तरह दर्शकों के सामने पेश किया है चाहे वह उस हवेलीनुमा मन्दिर की भव्यता हो या पत्थरों की जाली की नक्काशी हो, वहीदा रहमान के अभिनय के साथ दोनों एकाकार हो जाते हैं और आपको अनायास ही रेगिस्तान के रंग-बिरंगे मंज़र में ले जाते हैं। इस गीत का खूबसूरत वीडियो भी देखें… आप सोचते रह जायेंगे कि हिन्दी फ़िल्मों में कितने कविता और शायरीनुमा एक से बढ़कर एक गीत हैं, जो कम सुनने में आते हैं… लेकिन हंस भी तो कभी-कभार दिखाई देते हैं, कौए तो हमेशा मौजूद रहते हैं…

इस गीत के गीतकार के बारे में मन में थोड़ा संशय था, नेट पर सर्च करने से पता चला कि कहीं-कहीं इस गीत के गीतकार का नाम “उद्धव कुमार” बताया गया है। फ़िर “महफ़िल” के सागर भाई नाहर जी से चर्चा की, उन्हें भी कुछ संशय हुआ, फ़िर क्या किया जाये? तब बालकवि बैरागी जी के छोटे भ्राता श्री विष्णु बैरागी जी (ब्लॉग एकोहम) से इस सम्बन्ध में चर्चा हुई और उन्होंने कन्फ़र्म किया कि इस गीत के गीतकार उनके और हमारे सबके प्रिय “दादा बालकवि बैरागी” ही हैं, तब यह लेख सम्पूर्ण हो सका… इन दोनों ही सज्जनों का आभार…अस्तु… अन्त भला तो सब भला… इस मधुर गीत के लिये हम सभी संगीतप्रेमी बालकवि जी, जयदेव जी और स्वर साम्राज्ञी के ॠणी रहेंगे… (जिन सज्जन को इस गीत की शूटिंग लोकेशन की एकदम सही जानकारी हो वे बतायें, उनका भी अग्रिम आभार)

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लता, जयदेव और बालकवि बैरागी का एक और मधुर गीत…

A Beautiful Song of Lata Mangeshkar, Jaidev and Balkavi Bairagi

राजस्थान के बारे में कहा जाता है कि इसके कई-कई रंग हैं, यह सुबह को अलग दिखता है, शाम को अलग और रात में और अलग। राजस्थान के चटखीले रंगों, किलों और हवेलियों को हिन्दी फ़िल्मों में कई बार सुन्दर चित्रित किया गया है, चाहे जेपी दत्ता की गुलामी, बँटवारा या बॉर्डर हो, यश चोपड़ा की लम्हे हो या सुनील दत्त की रेशमा और शेरा हो…

यहाँ फ़िल्म रेशमा और शेरा का एक गीत पेश करता हूँ, प्रस्तुत गीत रेडियो पर अमूमन बहुत कम ही सुनने में आता है, इस फ़िल्म का गीत “तू चन्दा मैं चाँदनी…” ही अधिकतर सुनने में आता है, जबकि यह गीत भी उतना ही मधुर और हिन्दी कविता से भरा हुआ है, लेकिन पता नहीं क्यों इसकी फ़रमाईश नहीं आती। गीत के बोल हैं “एक मीठी सी चुभन, एक ठंडी सी अगन…” लिखा है बालकवि बैरागी ने और संगीत दिया है जयदेव ने। इस गीत में सुनील दत्त ने राजस्थान के जिस हवेलीनुमा मन्दिर का चित्रण किया है, वह तो अपने-आप में बेजोड़ है ही, उस पर वहीदा रहमान का मासूम अभिनय और “सिचुएशन” के मुताबिक लिखे गये (और फ़िर भी दिल को छू लेने वाले) बेहतरीन शब्द इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देते हैं। पहले आप इस गीत को ऑडियो रूप में सुनिये… फ़िर आगे की बात करते हैं…

एक मीठी सी चुभन, एक ठंडी सी अगन
मैं आज पवन में पाऊँ, आज पवन में पाऊँ…
एक मीठी सी चुभन…
मन ही मन मैं नाच रही हूँ…. मन ही मन मुसकाऊँ…
क्योंकि मीठी-मीठी सी चुभन… ठंडी-ठंडी सी अगन…

1) जाग उठा है प्यार, झूमे सब संसार
अंगड़ाई लेते हैं सपने, धर के रूप हजार
नाच उठा है प्यार, आज मेरा आज मेरा झूम रहा संसार
मन का आँगन जो सूना था… आई है उसमें बहार
कंगना… पायल… कंगनवा खनके पायल छमके,
लट उलझी सुलझाऊँ, शरमाऊँ, मुसकाऊँ
क्योंकि एक मीठी-मीठी सी अगन…

2) ऐ मेरे भगवान, इतना कर अहसान
ये रसवन्ती हवा कहीं ना, बन जाये तूफ़ान
प्यार मेरा नादान, मन भी है अन्जान
जल ना जाये बैर अगन में जीवन के वरदान
धीरज भागे, चिन्ता जागे, मन ही मन घबराऊँ, घबराऊँ, घबराऊँ…

यह गीत प्यार की आगोश में पूरी तरह से भीगी हुई एक युवती के मन की दास्तान है। बालकवि के फ़ूलों से नाज़ुक बोल इसे एक नई ऊँचाई देते हैं। शुरुआत से ही यह गीत आपको भीतर से जकड़ने लगता है, जिसने भी एक खास उम्र में “प्यार” नाम के इस खूबसूरत अहसास को जिया है वह “एक मीठी सी चुभन, एक ठंडी सी अगन” जैसे शब्दों को शिद्दत से महसूस कर सकता है, वही व्यक्ति “रसवन्ती हवा” का मतलब भी समझ सकता है। फ़िल्म की “सिचुएशन” में बँधे होने के बावजूद एक गीतकार कैसे सुन्दर कविता कर लेता है यह इसका एक उदाहरण है। गीत के दूसरे अंतरे में नायिका (जो कि अपने दुश्मन कबीले के सरदार के बेटे के साथ प्रेम करती है) अपने भविष्य को लेकर बुरी तरह आशंकित है और वह भगवान से प्रार्थना करती है कि “ये रसवन्ती हवा कहीं ना बन जाये तूफ़ान…”। हालांकि बालकवि अधिक से अधिक हिन्दी शब्दों का प्रयोग करते हैं, लेकिन दूसरे अंतरे में “अहसान” शब्द का उपयोग शायद उन्होंने अगली पंक्तियों में आने वाले “तूफ़ान”, “अन्जान” और “वरदान” से तुकबन्दी मिलाने के लिये किया होगा, यह गीत पूरी तरह से गीतकार का ही है।

लता मंगेशकर तो खैर हमेशा की तरह गीत की आत्मा में उतरकर गाती ही हैं, संगीतकार जयदेव ने भी इसमें कमाल किया है। फ़िल्म इंडस्ट्री में दो संगीतकार “रवि” और “जयदेव” हमेशा “अंडर-रेटेड” और “अंडर-एस्टीमेटेड” (इस स्थान पर उपयुक्त हिन्दी शब्द नहीं मिल रहा) ही रहे, जबकि दोनों ही बेहद प्रतिभाशाली हैं। जयदेव हमेशा कम से कम वाद्य यन्त्रों के प्रयोग के लिये जाने जाते रहे हैं। इस गीत में भी उन्होंने संतूर, जलतरंग और बाँसुरी का शानदार उपयोग किया है। गीत बेहद उतार-चढ़ाव भरा है और लता मंगेशकर ने इसके साथ पूरा न्याय किया है, खासकर “मन ही मन मुस…काऊँ” वाली लाईन में “मुस” शब्द के बाद एक सेकण्ड का विराम तो आपको उड़ाकर ले जाता है। इसी प्रकार सिनेमेटोग्राफ़र एस रामचन्द्र ने भी राजस्थान की इस लोकेशन को कैमरे से कविता की तरह दर्शकों के सामने पेश किया है चाहे वह उस हवेलीनुमा मन्दिर की भव्यता हो या पत्थरों की जाली की नक्काशी हो, वहीदा रहमान के अभिनय के साथ दोनों एकाकार हो जाते हैं और आपको अनायास ही रेगिस्तान के रंग-बिरंगे मंज़र में ले जाते हैं। इस गीत का खूबसूरत वीडियो भी देखें… आप सोचते रह जायेंगे कि हिन्दी फ़िल्मों में कितने कविता और शायरीनुमा एक से बढ़कर एक गीत हैं, जो कम सुनने में आते हैं… लेकिन हंस भी तो कभी-कभार दिखाई देते हैं, कौए तो हमेशा मौजूद रहते हैं…

इस गीत के गीतकार के बारे में मन में थोड़ा संशय था, नेट पर सर्च करने से पता चला कि कहीं-कहीं इस गीत के गीतकार का नाम “उद्धव कुमार” बताया गया है। फ़िर “महफ़िल” के सागर भाई नाहर जी से चर्चा की, उन्हें भी कुछ संशय हुआ, फ़िर क्या किया जाये? तब बालकवि बैरागी जी के छोटे भ्राता श्री विष्णु बैरागी जी (ब्लॉग एकोहम) से इस सम्बन्ध में चर्चा हुई और उन्होंने कन्फ़र्म किया कि इस गीत के गीतकार उनके और हमारे सबके प्रिय “दादा बालकवि बैरागी” ही हैं, तब यह लेख सम्पूर्ण हो सका… इन दोनों ही सज्जनों का आभार…अस्तु… अन्त भला तो सब भला… इस मधुर गीत के लिये हम सभी संगीतप्रेमी बालकवि जी, जयदेव जी और स्वर साम्राज्ञी के ॠणी रहेंगे… (जिन सज्जन को इस गीत की शूटिंग लोकेशन की एकदम सही जानकारी हो वे बतायें, उनका भी अग्रिम आभार)

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लता, जयदेव और बालकवि बैरागी का एक और मधुर गीत…

A Beautiful Song of Lata Mangeshkar, Jaidev and Balkavi Bairagi

राजस्थान के बारे में कहा जाता है कि इसके कई-कई रंग हैं, यह सुबह को अलग दिखता है, शाम को अलग और रात में और अलग। राजस्थान के चटखीले रंगों, किलों और हवेलियों को हिन्दी फ़िल्मों में कई बार सुन्दर चित्रित किया गया है, चाहे जेपी दत्ता की गुलामी, बँटवारा या बॉर्डर हो, यश चोपड़ा की लम्हे हो या सुनील दत्त की रेशमा और शेरा हो…

यहाँ फ़िल्म रेशमा और शेरा का एक गीत पेश करता हूँ, प्रस्तुत गीत रेडियो पर अमूमन बहुत कम ही सुनने में आता है, इस फ़िल्म का गीत “तू चन्दा मैं चाँदनी…” ही अधिकतर सुनने में आता है, जबकि यह गीत भी उतना ही मधुर और हिन्दी कविता से भरा हुआ है, लेकिन पता नहीं क्यों इसकी फ़रमाईश नहीं आती। गीत के बोल हैं “एक मीठी सी चुभन, एक ठंडी सी अगन…” लिखा है बालकवि बैरागी ने और संगीत दिया है जयदेव ने। इस गीत में सुनील दत्त ने राजस्थान के जिस हवेलीनुमा मन्दिर का चित्रण किया है, वह तो अपने-आप में बेजोड़ है ही, उस पर वहीदा रहमान का मासूम अभिनय और “सिचुएशन” के मुताबिक लिखे गये (और फ़िर भी दिल को छू लेने वाले) बेहतरीन शब्द इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देते हैं। पहले आप इस गीत को ऑडियो रूप में सुनिये… फ़िर आगे की बात करते हैं…

एक मीठी सी चुभन, एक ठंडी सी अगन
मैं आज पवन में पाऊँ, आज पवन में पाऊँ…
एक मीठी सी चुभन…
मन ही मन मैं नाच रही हूँ…. मन ही मन मुसकाऊँ…
क्योंकि मीठी-मीठी सी चुभन… ठंडी-ठंडी सी अगन…

1) जाग उठा है प्यार, झूमे सब संसार
अंगड़ाई लेते हैं सपने, धर के रूप हजार
नाच उठा है प्यार, आज मेरा आज मेरा झूम रहा संसार
मन का आँगन जो सूना था… आई है उसमें बहार
कंगना… पायल… कंगनवा खनके पायल छमके,
लट उलझी सुलझाऊँ, शरमाऊँ, मुसकाऊँ
क्योंकि एक मीठी-मीठी सी अगन…

2) ऐ मेरे भगवान, इतना कर अहसान
ये रसवन्ती हवा कहीं ना, बन जाये तूफ़ान
प्यार मेरा नादान, मन भी है अन्जान
जल ना जाये बैर अगन में जीवन के वरदान
धीरज भागे, चिन्ता जागे, मन ही मन घबराऊँ, घबराऊँ, घबराऊँ…

यह गीत प्यार की आगोश में पूरी तरह से भीगी हुई एक युवती के मन की दास्तान है। बालकवि के फ़ूलों से नाज़ुक बोल इसे एक नई ऊँचाई देते हैं। शुरुआत से ही यह गीत आपको भीतर से जकड़ने लगता है, जिसने भी एक खास उम्र में “प्यार” नाम के इस खूबसूरत अहसास को जिया है वह “एक मीठी सी चुभन, एक ठंडी सी अगन” जैसे शब्दों को शिद्दत से महसूस कर सकता है, वही व्यक्ति “रसवन्ती हवा” का मतलब भी समझ सकता है। फ़िल्म की “सिचुएशन” में बँधे होने के बावजूद एक गीतकार कैसे सुन्दर कविता कर लेता है यह इसका एक उदाहरण है। गीत के दूसरे अंतरे में नायिका (जो कि अपने दुश्मन कबीले के सरदार के बेटे के साथ प्रेम करती है) अपने भविष्य को लेकर बुरी तरह आशंकित है और वह भगवान से प्रार्थना करती है कि “ये रसवन्ती हवा कहीं ना बन जाये तूफ़ान…”। हालांकि बालकवि अधिक से अधिक हिन्दी शब्दों का प्रयोग करते हैं, लेकिन दूसरे अंतरे में “अहसान” शब्द का उपयोग शायद उन्होंने अगली पंक्तियों में आने वाले “तूफ़ान”, “अन्जान” और “वरदान” से तुकबन्दी मिलाने के लिये किया होगा, यह गीत पूरी तरह से गीतकार का ही है।

लता मंगेशकर तो खैर हमेशा की तरह गीत की आत्मा में उतरकर गाती ही हैं, संगीतकार जयदेव ने भी इसमें कमाल किया है। फ़िल्म इंडस्ट्री में दो संगीतकार “रवि” और “जयदेव” हमेशा “अंडर-रेटेड” और “अंडर-एस्टीमेटेड” (इस स्थान पर उपयुक्त हिन्दी शब्द नहीं मिल रहा) ही रहे, जबकि दोनों ही बेहद प्रतिभाशाली हैं। जयदेव हमेशा कम से कम वाद्य यन्त्रों के प्रयोग के लिये जाने जाते रहे हैं। इस गीत में भी उन्होंने संतूर, जलतरंग और बाँसुरी का शानदार उपयोग किया है। गीत बेहद उतार-चढ़ाव भरा है और लता मंगेशकर ने इसके साथ पूरा न्याय किया है, खासकर “मन ही मन मुस…काऊँ” वाली लाईन में “मुस” शब्द के बाद एक सेकण्ड का विराम तो आपको उड़ाकर ले जाता है। इसी प्रकार सिनेमेटोग्राफ़र एस रामचन्द्र ने भी राजस्थान की इस लोकेशन को कैमरे से कविता की तरह दर्शकों के सामने पेश किया है चाहे वह उस हवेलीनुमा मन्दिर की भव्यता हो या पत्थरों की जाली की नक्काशी हो, वहीदा रहमान के अभिनय के साथ दोनों एकाकार हो जाते हैं और आपको अनायास ही रेगिस्तान के रंग-बिरंगे मंज़र में ले जाते हैं। इस गीत का खूबसूरत वीडियो भी देखें… आप सोचते रह जायेंगे कि हिन्दी फ़िल्मों में कितने कविता और शायरीनुमा एक से बढ़कर एक गीत हैं, जो कम सुनने में आते हैं… लेकिन हंस भी तो कभी-कभार दिखाई देते हैं, कौए तो हमेशा मौजूद रहते हैं…

इस गीत के गीतकार के बारे में मन में थोड़ा संशय था, नेट पर सर्च करने से पता चला कि कहीं-कहीं इस गीत के गीतकार का नाम “उद्धव कुमार” बताया गया है। फ़िर “महफ़िल” के सागर भाई नाहर जी से चर्चा की, उन्हें भी कुछ संशय हुआ, फ़िर क्या किया जाये? तब बालकवि बैरागी जी के छोटे भ्राता श्री विष्णु बैरागी जी (ब्लॉग एकोहम) से इस सम्बन्ध में चर्चा हुई और उन्होंने कन्फ़र्म किया कि इस गीत के गीतकार उनके और हमारे सबके प्रिय “दादा बालकवि बैरागी” ही हैं, तब यह लेख सम्पूर्ण हो सका… इन दोनों ही सज्जनों का आभार…अस्तु… अन्त भला तो सब भला… इस मधुर गीत के लिये हम सभी संगीतप्रेमी बालकवि जी, जयदेव जी और स्वर साम्राज्ञी के ॠणी रहेंगे… (जिन सज्जन को इस गीत की शूटिंग लोकेशन की एकदम सही जानकारी हो वे बतायें, उनका भी अग्रिम आभार)

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आतंकवादियों को मारो मत भारतरत्न का अर्वाड दो

आज हिन्दुस्तान में सत्ताधारी नेता बाटला हाउस में मारे गये आतंकवादियों के पझ में खडे़ हैं और जिस तरह से ब्यानबाजी कर रहें है लगता है पुलिस ने आतंकवादियों को मार कर कोई गुनाह किया हो। आमिताभ बच्चन के पिछलग्गु नेता अमर सिंह इस मामले में पुलिस बालों पर पहले अगुली उठा चुके हैं और उनका केस भी लड़ने को तौयार हैं आज सत्ता पक्ष के नेता इस होड़ में उलझें हैं कि कौन कितना ज्यादा आतंकवादियों का हिमायती है। काग्रेंस कुछ के नेता प्रधानमंत्री से मिल कर बाटला हाउस में मारे गये आतंकवादियों के मारे जाने पर पुलिस के कार्यवाही पर प्रश्नचिन्ह लगाने गये थे। वैसे पुलिस को क्लिनचीट सुरक्षा सलाहकार नारायणन दे चुके हैं। वैसे आजकल आतंकवादियों के सर्मथक नेताओ का लिस्ट कुछ ज्यादा बडा़ होता जा रहा है सबसे पहले बाटला हाउस मामलें मे अर्जुन सिंह ने आतंकियों के केस लड़ने का मनसा जाहिर किया था। तो रामविलास पासवान जो हमेशा से ओसामा बिन लादेन के हमसक्ल को साथ में लेकर चलते हैं क्यों पीछे रहते लगे हाथ उसने भी ब्यान जारी करके आतंकियों के साथ गलवहिया डालना सुरु किया फिर क्या था लालु प्रसाद कहा पीछे रहने बाले थे लगे हाथ उन्होंने भी अपनी देशभक्ति का पिटारा खोल कर रख दिया।
आखीर कब तक मुस्लिम तुस्टीकरण का खेल इस देश में चलता रहेंगा। आखिर कब तक इस देश में अल्पसंख्यक असुरक्षा के नाम पर दबाब डाल कर अपना उल्लु साधते रहेगा। हिन्दुस्तान ऎसा देश है जहा के अल्पसंख्यक सबसे ज्यादा सुरक्षीत है। पुरे विश्व में 57 मुस्लिम देश है जो किसी तरह का हज में सब्सिडी नही देता है लेकिन हिन्दुस्तान में मुस्लमानों को सब्सिडी दिया जाता है मुस्लमानों सभी हवाई अड्डा पर सिर्फ साल में कुछ दिन खुलने बाला पाँच सितारा हज हाउस बनाकर दिया गया। आतंकवाद का नर्सरी को सरकार के द्वारा पैसा मुहया किया जाता है मस्जिदों के मरम्मत के नाम पर करोडों खर्च करती है सरकार क्या ये सब सुविधा हिन्दुओ को मिलता है आज हिन्दुस्तान में हिन्दुओ के मुकाबले ज्यादा सुविधा दी जा रही है मुस्लिमानों को। हिन्दुस्तान के मुस्लिम बहुल राज्य में हिन्दु मुख्यमंत्री नही बन सकता है मुस्लिम उत्पात मचा कर रख देंगे। जैसा कि अफजल को फांसी के मामले में उन्होंने पहले सभी को चेता दिया है अगर अफजल को फांसी दिया गया तो देश में दंगा भरक जायेगा। लेकिन हिन्दु बहुल राज्य में मुस्लिम मुख्यमंत्री बने है और आगे भी बनते रहेंगे। हिन्दुस्तान के कुछ नेता के नासमझी के कारण हिन्दुस्तान अपना 30% जमीन का टुकरा अल्पसंख्यक को अलग देश के लिये दे दिया लेकिन हिन्दु अयोध्या में एक मन्दिर बनाने के लिया अल्पसंख्यक के आगे निहोरा कर कर रहा है। गोधरा में मारे गये हिन्दु के बाद भडके दंगा का नासुर आज भी सभी को जला रहा है सेकुलर इसे हिन्दु के लिये सबसे बडा़ कलंक बना दिया हो लेकिन मोपला, कलकत्ता, भागलपुर जैसे हजारों दंगा हुआ जिसमें मारे गये हिन्दुओं पर आज कोई आँसु बहाने बाला नही है। जम्मु काश्मिर से 4 लाख से ज्यादा हिन्दुओं को लात मार कर निकाल बाहर कर दिया गया किसी के आँख में आसु नही आया कोई नेता, सेकुलर एक शब्द इस मामले में नही बोला। आज पाकिस्तान और बाग्लादेश में हिन्दुओ की हालत जानवरों से भी बत्तर है उन्के 12 साल की लडकियों को घर से उठा कर बालात्कार किया जा रहा है जबरदस्ती शादी किया जा रहा है किसी ने नही बोला लेकिन दो आतंकवादियों के मरने पर इतना हायतैबा मचा रखे है जैसे इनका अपना सगा बाला मारा गया हो। मुलायम सिंह यादव और आमिताभ बच्चन के पिछल्लगु अमर सिंह अगर चिल्लम पो मचाते हैं तो समझ में आता है क्यों कि एक आतंकवादि तो उन्ही के पार्टी के जिला अध्यक्ष का बेटा था।
अब समय आ गया है यैसे नेताओ से पुछने का कब तक ये अल्पसंख्यक असुरक्षा के नाम पर ब्लैकमेलिग का खेल खेला जायेगा और देश को गर्त में ढकेलने का काम ये नेता करते रहेंगे। हिन्दुस्तान के अल्पसंख्यक से ज्यादा किसी और देश का अल्पसंख्यक सुरक्षीत नही है उन्हें जितना सहुलियत हिन्दुस्तान में मिलता है उतना और किसी देश में नही मिलता है लेकिन फिर ये क्यों दिखाने का कोशीश किया जाता है कि हिन्दुस्तान में अल्पसंख्यक असुरक्षा है। उन्हें किसी भी तरहा का सुविधा यहा नही मिल रहा है। अल्पसंख्यक को अगर ऎसा लगता है तो उन्हें किसी ने रोका नही है अपना रास्ता नापे और कही जाकर सुरक्षीत ठीकाना का खोज लें और हमें शान्ती से रहने दें।

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>जो हैं तकदीरवाले वही कुर्बान होते हैं.. लताजी की एक गज़ल

>कोठे पर गाये जाने वाले गीत हमने पहले भी सुने हैं। लीजिये आज एक मधुर गीत सुनिये फिल्म जीवन मृत्यु से। गाया है लताजी ने , लिखा है आनन्द बक्षी ने और संगीतकार हैं लक्ष्मीकांत प्यारे लाल।

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ज़माने में अजी ऐसे कई नादान होते हैं
वहाँ ले जाते हैं कश्ती जहाँ तूफ़ान होते हैं
शमा की बज़्म में आ कर के परवाने समझते हैं
यहीं पर उम्र गुज़रेगी यह दीवाने समझते हैं
मगर इक रात के
हाँ हाँ.. मगर एक रात के ये तो फ़क़त मेहमान होते हैं
ज़माने में

मोहब्बत सबकी महफ़िल में शमा बन कर नहीं जलती
हसीनों की नज़र सब पे छुरी बन कर नहीं चलती
जो हैं तक़दीर वाले बस वही क़ुर्बान होते हैं
ज़माने में

डुबो कर दूर साहिल से नज़ारा देखनेवाले
लगा कर आग चुप के से तमाशा देखनेवाले
तमाशा आप बनते हैं तो क्यों हैरान होते हैं
ज़माने में


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