देश की आतंरिक सुरक्षा के सूत्र


1. भारत में कोई भी व्यक्ति या समुदाय किसी भी स्थिति में जाति, धर्म,भाषा,क्षेत्र के आधार पर बात करे उसका बहिष्कार कीजिए ।
2. लच्छेदार बातों से गुमराह न हों ।
3. कानूनों को जेबी घड़ी बनाके चलने वालों को सबक सिखाएं ख़ुद भी भारत के संविधान का सम्मान करें ।
4. थोथे आत्म प्रचारकों से बचिए ।
5. जो आदर्श नहीं हैं उनका महिमा मंडन तुंरत बंद हो जो भी समुदाय व्यक्ति ऐसा करे उसे सम्मान न दीजिए चाहे वो पिता ही क्यों न हो।
6. ईमानदार लोक सेवकों का सम्मान करें ।उनको हताश न होनें दें
7. भारतीयता को भारतीय नज़रिए से समझें न की विदेशी विचार धाराओं के नज़रिए से
8. अंधाधुंध बेलगाम वाकविलास बंद करें
9. नकारात्मक ऊर्जा उत्पादन न होनें दें ।
10. देश का खाएं तो देश के वफादार बनें ।
11. किसी भी दशा में हुई एक मौत को सब पर हमला मानें ।
12. देश की आतंरिक बाह्य सुरक्षा को अनावश्यक बहस का मसला न बनाएं प्रेस मीडिया आत्म नियंत्रण रखें ।
13. केन्द्र/राज्य सरकारें आतंक वाद पे लगाम कसने देश में व् देश के बाहर सख्ती बरतें ।
14: वंदे मातरम कहिये

>काश, एक हथगोला मीडिया कवरेज कर रहे “गिद्धों” पर भी आ गिरता…

>Media Coverage Mumbai Terror Attack

मुम्बई में जो दर्दनाक घटनायें हुईं उसका मूर्खतापूर्ण और लज्जाजनक “लाइव” कवरेज भारत के इलेक्ट्रानिक मीडिया ने दिखाया। जरा कुछ बानगियाँ देखिये इन गिद्धों के कवरेज की…

1) एक व्यक्ति के हाथ पर गोली लगी है, खून बह रहा है, माँस गिर रहा है, लेकिन उसकी मदद करने की बजाय एक गिद्ध पत्रकार उसके हाथ की फ़ोटो खींचने को उतावला हो रहा है और उसके पीछे भाग रहा है…

2) सुबह के सात बजे – ताज होटल के भीतर हमारे जाँबाज सिपाही आतंकवादियों से लोहा ले रहे हैं, दो दिन से भूखे-प्यासे और नींद को पीछे ढकेलते हुए… और ताज के बाहर कैमरे के पिछवाड़े में लेटे हुए गिद्ध आराम से कॉफ़ी-सैण्डविच का आनन्द उठा रहे हैं मानो क्रिकेट मैच का प्रसारण करने आये हों…

3) वीटी स्टेशन पर आम आदमियों को मारा जा चुका है, लेकिन गिद्ध टिके हुए हैं ओबेरॉय होटल के बाहर कि कब कोई विदेशी निकले और कब वे उसका मोबाईल नम्बर माँगें…

4) एक और पत्रकार(?) मनोरंजन भारती एक ही वाक्य की रट लगाये हुए हैं “ताज हमारे “देस” की “सान” (शान) है… और इस “सान” का सम्मान हमें बचाये रखना है…सेना का अफ़सर कह रहा है कि अब कोई आतंकवादी नहीं बचा, लेकिन ये “खोजी” बड़बड़ाये जा रहे हैं कि नहीं एक आतंकवादी अन्दर बचा है…

5) “आपको कैसा लग रहा है…” जैसा घटिया और नीच सवाल तो न जाने कितनी बार और किस-किस परिस्थिति में पूछा जा चुका है इसका कोई हिसाब ही नहीं है, आरुषि हत्याकाण्ड में भी कुछ पत्रकार ये सवाल पूछ चुके हैं…

6) अमेरिका में हुए वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद किसी चैनल ने लाशों, रोते-बिलखते महिलाओं-बच्चों की तस्वीरें नहीं दिखाईं, लेकिन यहाँ तो होड़ लगी थी कि कौन कितनी लाशें दिखाता है, कितना बिखरा हुआ खून दिखाता है… इन गिद्धों पर सिर्फ़ लानत भेजना तो बहुत कम है, इनका कुछ और इलाज किया जाना आवश्यक है।

7) जीटीवी द्वारा 28 तारीख की रात को बड़े-बड़े अक्षरों में “कैप्शन” दिखाया गया “हम समझते हैं अपनी जिम्मेदारी…”, “सुरक्षा की खातिर लाइव प्रसारण रोका जा रहा है…” और यह अकल उन्हें तब आई, जब सेना ने अक्षरशः उन्हें “लात” मारकर ताज होटल से भगा दिया था, वरना यह “सुरक्षा हित” पहले दो दिन तक उन्हें नहीं दिखा था… “टीआरपी के भूखे एक और गिद्ध” ने आतंकवादियों के इंटरव्यू भी प्रसारित कर दिये, ठीक वैसे ही जैसे सुबह तीन बजे अमिताभ के मन्दिर जाने की खबर को वह “ब्रेकिंग न्यूज” बताता है…

क्या-क्या और कितना गिनाया जाये, ये लोग गिरे हुए और संवेदनाहीन तो पहले से ही थे, देशद्रोही भी हैं यह भी देख लिया। कई बार लगता है प्रिंट मीडिया इनसे लाख दर्जे से बेहतर है, भले ही वह भी ब्लैकमेलर है, राजनैतिक आका के चरण चूमता है, विज्ञापन पाने के लिये तरह-तरह के हथकण्डे अपनाता है, लेकिन कम से कम “सबसे तेज” बनने और पैसा कमाने के चक्कर में इतना नीचे तो नहीं गिरता… किसी चैनल ने सीएसटी स्टेशन पर मारे गये लोगों की सहायता के लिये हेल्पलाईन नहीं शुरु की, किसी चैनल ने रक्तदान की अपील नहीं की, किसी भी चैनल ने “इस खबर” को छोड़कर तीन दिन तक समूचे भारत की कोई खबर नहीं दिखाई मानो भारत भर में सिर्फ़ यही एक काम चल रहा हो…

मजे की बात तो ये कि कवरेज कर कौन रहा था, एक पूरे वाक्य में छः बार “ऐं ऐं ऐं ऐं” बोलने वाले पंकज पचौरी यानी इस्लामिक चैनल NDTV के महान पत्रकार। विनोद दुआ नाम के पद्म पुरस्कार से सम्मानित(?) एक पत्रकार, जिन्हें उपस्थित भीड़ द्वारा वन्देमातरम और भारत माता की जय बोलना रास नहीं आया और वे स्टूडियो में बैठे मेजर जनरल से खामखा “धर्म का कोई मजहब नहीं होता…” जैसी बकवास लगातार करते रहे… अमिताभ स्टाइल में हाथ रगड़ते हुए और अपने आप को “एस पी सिंह” समझते हुए पुण्यप्रसून वाजपेयी… यानी कुल मिलाकर एक से बढ़कर एक महान लोग…

सो आइये हम सब मिलकर न्यूज चैनलों का बहिष्कार करें। लोग यह तय करें कि दिन भर में सिर्फ़ पाँच या दस मिनट से ज्यादा न्यूज चैनल नहीं देखेंगे, इन गिद्धों की टीआरपी गिराओ, इन्हें विज्ञापनों का सूखा झेलने दो, इन्हें सार्वजनिक रूप से देश की जनता से माफ़ी माँगने दो कि “हाँ हमसे बहुत बड़ी गलती हुई है और इस प्रकार की राष्ट्रीय आपदा के समय आगे से हम सावधानीपूर्वक रिपोर्टिंग करेंगे… और पढ़े-लिखे पत्रकारों को नौकरी पर रखेंगे…”।

नोट – एक बात के लिये आप मुझे माफ़ करें कि बार-बार मैंने “गिद्ध” शब्द का उपयोग किया, जबकि गिद्ध तो मरे हुए जानवरों की गंदगी साफ़ करता है, लेकिन टीआरपी के भूखे गिद्ध तो……

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काश, एक हथगोला मीडिया कवरेज कर रहे “गिद्धों” पर भी आ गिरता…

Media Coverage Mumbai Terror Attack

मुम्बई में जो दर्दनाक घटनायें हुईं उसका मूर्खतापूर्ण और लज्जाजनक “लाइव” कवरेज भारत के इलेक्ट्रानिक मीडिया ने दिखाया। जरा कुछ बानगियाँ देखिये इन गिद्धों के कवरेज की…

1) एक व्यक्ति के हाथ पर गोली लगी है, खून बह रहा है, माँस गिर रहा है, लेकिन उसकी मदद करने की बजाय एक गिद्ध पत्रकार उसके हाथ की फ़ोटो खींचने को उतावला हो रहा है और उसके पीछे भाग रहा है…

2) सुबह के सात बजे – ताज होटल के भीतर हमारे जाँबाज सिपाही आतंकवादियों से लोहा ले रहे हैं, दो दिन से भूखे-प्यासे और नींद को पीछे ढकेलते हुए… और ताज के बाहर कैमरे के पिछवाड़े में लेटे हुए गिद्ध आराम से कॉफ़ी-सैण्डविच का आनन्द उठा रहे हैं मानो क्रिकेट मैच का प्रसारण करने आये हों…

3) वीटी स्टेशन पर आम आदमियों को मारा जा चुका है, लेकिन गिद्ध टिके हुए हैं ओबेरॉय होटल के बाहर कि कब कोई विदेशी निकले और कब वे उसका मोबाईल नम्बर माँगें…

4) एक और पत्रकार(?) मनोरंजन भारती एक ही वाक्य की रट लगाये हुए हैं “ताज हमारे “देस” की “सान” (शान) है… और इस “सान” का सम्मान हमें बचाये रखना है…सेना का अफ़सर कह रहा है कि अब कोई आतंकवादी नहीं बचा, लेकिन ये “खोजी” बड़बड़ाये जा रहे हैं कि नहीं एक आतंकवादी अन्दर बचा है…

5) “आपको कैसा लग रहा है…” जैसा घटिया और नीच सवाल तो न जाने कितनी बार और किस-किस परिस्थिति में पूछा जा चुका है इसका कोई हिसाब ही नहीं है, आरुषि हत्याकाण्ड में भी कुछ पत्रकार ये सवाल पूछ चुके हैं…

6) अमेरिका में हुए वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद किसी चैनल ने लाशों, रोते-बिलखते महिलाओं-बच्चों की तस्वीरें नहीं दिखाईं, लेकिन यहाँ तो होड़ लगी थी कि कौन कितनी लाशें दिखाता है, कितना बिखरा हुआ खून दिखाता है… इन गिद्धों पर सिर्फ़ लानत भेजना तो बहुत कम है, इनका कुछ और इलाज किया जाना आवश्यक है।

7) जीटीवी द्वारा 28 तारीख की रात को बड़े-बड़े अक्षरों में “कैप्शन” दिखाया गया “हम समझते हैं अपनी जिम्मेदारी…”, “सुरक्षा की खातिर लाइव प्रसारण रोका जा रहा है…” और यह अकल उन्हें तब आई, जब सेना ने अक्षरशः उन्हें “लात” मारकर ताज होटल से भगा दिया था, वरना यह “सुरक्षा हित” पहले दो दिन तक उन्हें नहीं दिखा था… “टीआरपी के भूखे एक और गिद्ध” ने आतंकवादियों के इंटरव्यू भी प्रसारित कर दिये, ठीक वैसे ही जैसे सुबह तीन बजे अमिताभ के मन्दिर जाने की खबर को वह “ब्रेकिंग न्यूज” बताता है…

क्या-क्या और कितना गिनाया जाये, ये लोग गिरे हुए और संवेदनाहीन तो पहले से ही थे, देशद्रोही भी हैं यह भी देख लिया। कई बार लगता है प्रिंट मीडिया इनसे लाख दर्जे से बेहतर है, भले ही वह भी ब्लैकमेलर है, राजनैतिक आका के चरण चूमता है, विज्ञापन पाने के लिये तरह-तरह के हथकण्डे अपनाता है, लेकिन कम से कम “सबसे तेज” बनने और पैसा कमाने के चक्कर में इतना नीचे तो नहीं गिरता… किसी चैनल ने सीएसटी स्टेशन पर मारे गये लोगों की सहायता के लिये हेल्पलाईन नहीं शुरु की, किसी चैनल ने रक्तदान की अपील नहीं की, किसी भी चैनल ने “इस खबर” को छोड़कर तीन दिन तक समूचे भारत की कोई खबर नहीं दिखाई मानो भारत भर में सिर्फ़ यही एक काम चल रहा हो…

मजे की बात तो ये कि कवरेज कर कौन रहा था, एक पूरे वाक्य में छः बार “ऐं ऐं ऐं ऐं” बोलने वाले पंकज पचौरी यानी इस्लामिक चैनल NDTV के महान पत्रकार। विनोद दुआ नाम के पद्म पुरस्कार से सम्मानित(?) एक पत्रकार, जिन्हें उपस्थित भीड़ द्वारा वन्देमातरम और भारत माता की जय बोलना रास नहीं आया और वे स्टूडियो में बैठे मेजर जनरल से खामखा “धर्म का कोई मजहब नहीं होता…” जैसी बकवास लगातार करते रहे… अमिताभ स्टाइल में हाथ रगड़ते हुए और अपने आप को “एस पी सिंह” समझते हुए पुण्यप्रसून वाजपेयी… यानी कुल मिलाकर एक से बढ़कर एक महान लोग…

सो आइये हम सब मिलकर न्यूज चैनलों का बहिष्कार करें। लोग यह तय करें कि दिन भर में सिर्फ़ पाँच या दस मिनट से ज्यादा न्यूज चैनल नहीं देखेंगे, इन गिद्धों की टीआरपी गिराओ, इन्हें विज्ञापनों का सूखा झेलने दो, इन्हें सार्वजनिक रूप से देश की जनता से माफ़ी माँगने दो कि “हाँ हमसे बहुत बड़ी गलती हुई है और इस प्रकार की राष्ट्रीय आपदा के समय आगे से हम सावधानीपूर्वक रिपोर्टिंग करेंगे… और पढ़े-लिखे पत्रकारों को नौकरी पर रखेंगे…”।

नोट – एक बात के लिये आप मुझे माफ़ करें कि बार-बार मैंने “गिद्ध” शब्द का उपयोग किया, जबकि गिद्ध तो मरे हुए जानवरों की गंदगी साफ़ करता है, लेकिन टीआरपी के भूखे गिद्ध तो……

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मेरे देश को खिलौना मत बनाओ

तुम जो व्यवस्था पे हावी होकर मेरे देश को बिगाड़ने बरबाद करने पे तुले होमित्र इस देश को खिलौना मत बनाओ खेलो मत यहाँ खून की होलियाँ मेरे मुल्क की सियासी तासीर को मत बिगाड़ो आदमी हाड मांस से बना है , उसे सिर्फ़ वोट समझ के मरने मत छोडो , उसकी कराह को सत्ता तक जाने वाली पगडंडी से मत जोडो
मित्र ये देश तुम्हारी वजह से नहीं मज़दूरों,सिपाहियों,किसानों,युवाओं का देश है देश जो मुंबई है जिसे कई बार तुमआमची मुंबईकह कर देश को दुत्कारतें हो । तुम सभी रुको देखो मेरा देश तुम्हारा नहीं उन वीर बांकुरों का कृतज्ञ है जो मुंबई को बचाने शहीद हुए । तुमने कहा था न कि यह तुम्हारी मुंबई है ….मुर्खता पूर्ण विचार था जिसे सच मान रहे थे सच कहूं ये मुंबई,ही नही समूचा देश समूचे देश का है । एक आम आदमी – क्या सोचता है शहीदों तुम्हें आतंकियों की गोली ने नहीं मारा , । सच के करीब जा रहा है मेरा देश मित्र सुनो उनकी बोलती आंखों की आवाज़ को ,

>अब भी चेतो , ऐसा न हो की देर हो जाए ………..

>कब तक मुह छिपाते फिरोगे ? हर बात की एक सीमा होती है । वर्षों से रोटी,कपड़ा, मकान , बिजली, पानी , रोजगार की समस्या झेल ही रहे थे अब ये आतंकवाद तो जान के पीछे ही पड़ गया है । देश आतंक की मार से बदहाल है ।, हमारे नेता लोग अपनी -अपनी डफली बजाने मेलगे है। हम लोग भी अपने- अपने करियर प्लानिंग मे जी जान से जुटे है । किसी को ऊँची पढ़ाई के लिए विदेश जानाहै तो कोई इन्जिनेरिंग करके मोटा माल कमाना चाहता है, कोई फैशन की दुनिया मे नाम चाहता है , मतलब हर कोई प्रोफेशनल होकर अच्छी जिन्दगी जीने की तमन्ना रखता है। आज सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़े क्षेत्रों मे कामगारों की भरी कमी है । सेना जैसे सम्माननीय विभाग को भरती के लिए विज्ञापनों का सहारा लेना पड़ रहा है । राजनीति मे युवाओ की अरुचि तो और भी चोंकाने वाली है। राजनीती जो हरेक के जीवन को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित करती है , पर निजी स्वार्थवश हम राजनीती को गंदगी मन कर ख़ुद को दूर रखने का प्रयत्न करते है । जहा भी मौका मिला तो हम युवा राजनीती को गाली देने से नही चूंकते । यूँ बाहर से आलोचना करना बहुत आसन है भाई । मन की आज दागी और भ्रष्ट लोगो की भीड़ है लेकिन प्रश्न है की उन्हें यहाँ तक लाने मेकिसका योगदान है ? बिल्कुल ये काम हम लोगो का ही to है । जब rajniti मे भाग नही लेंगे , achchhe netao को chun कर नही bhejange to ये सब होगा ही ! फ़िर घर के अन्दर baith कर bahas करने से क्या फायदा जनाब ? जो होना है होने दो । आपका और हमारा क्या जाएगा , यही कहते है न आप । जरा sochiye जब ये देश ही नही bachega to हम कहा gayenge । शायद मैं कुछ jyade दूर की बात बता रहा हूँ चलिए आज को ही देखिये पर गौर से । देश और समाज को prabhawit करने wala हर karak आपको भी utna ही prabhawit करता है । mumbai मे जो भी हुआ वो to एक छोटा नमूना है अगर जल्द ही हम नही jaage to परिणाम बहुत बुरे हो सकते हैं । भारत के wartman rajnitik paridrishya से किसी prakar की badlav की ummid नही की ja सकती है । आज hamhe एक शक्तिशाली और majboot manobal wale shasan की जरुरत है । शान्ति और sahishnuta की बात kitabo मे ही शोभा पाती है । erik kafman ने कहा था “राज्य के ३ mukhya lakshya होने चाहिए -शक्ति sanchay , शक्ति prasar, शक्ति प्रदर्शन । ” इसी सम्बन्ध मे vir savarkar ने कहा था -‘शान्ति की ichchha भी उसी की sarthak होती है जो शक्ति sampanna हो । ‘ आज आंतरिक asuraksha से jujh रहे भारत मे राजनैतिक badlav की mahti aawasyakta है । और ये badlav yuvao के rajniti मे sakriya bhagidari से ही sunishchit की ja सकती है । अब भी वक्त baki है अपनी jimmedari को pahchanna sikhiye । कही देर न हो जाए warna आने वाली pidhi को क्या muh dikhayenge आप और हम ?????////////

जियो हजारों साल, साल के दिन हो पचास हजार

आज महाशक्ति के वरिष्‍ठ सदस्‍य और हिन्‍दी चिट्ठाकारी के नामी चिट्ठकार श्री गिरीश बिल्‍लोरे ” मुकुल” जी का जन्‍म दिवस है। गिरीश जी महाशक्ति समूह ब्‍लाग के स्‍थापना के समय से जुड़े हुये है और अपना आशीष और मार्ग दर्शन हम सभी को निरन्‍तर प्रदान करते रहते है। जन्‍मदिवस पर हम सभी लोग यही कामना करते है कि वे हमेशा इसी प्रकार अपना स्‍नेह हम पर बनाये रखे। महाशक्ति समूह उन्‍हे उनके 45 जन्‍म दिवस पर बधाई देते है और कामना करते है कि जियो हजारों साल, साल के दिन हो पचास हजार

>फिर दामादों के स्वागत में जुटी सरकार ………

>मुंबई पर फिदायीन हमले के दौरान हमारी सरकार को एक नए दामाद मिले , जिन्हें आदर पूर्वक ससम्मान जेल विभाग तक पहुचाने में लगी है शिवराज जी की टीम । अजी चोकिये मत ऐसा ही हुआ है !सैकडो मासूमों के हत्यारे इन नर पिशाचो को मेहमान बना कर रखा जाएगा। भविष्य में या तो अदालत की तारीखों से गुजरते- गुजरते मर जायेंगे या फिर कोई विमान हाइजैक कर इन्हे ले उडेगा । अथवा आवश्यक हुआ तो ये लोग इनकी अर्जी भी महामहिम राष्ट्रपति तक पंहुचा ही देंगे । वैसे भी आप सोच रहे है इसमे नया क्या है , ये तो होता ही आया है । यहाँ सवाल हमारी सुरक्षा प्रणाली , न्याय प्रणाली तथा विदेश नीतिके निर्धारण से जुदा है। विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र की न्याय प्रक्रिया इतनी धीमी और भ्रष्ट हो चुकी है कि अक्सर ऐसे आतकी छुट जाते हैं । केवल हवा हवाई दावे करने से परिस्थितियां नही बदलती है , परन्तु ये बात इन कांग्रेस्सियो को कब समझ में आएगी ? दरअसल हमारी शासन प्रणाली ही ऐसी है भ्रष्टो और दलालों की पूरी टीम संसद में पहुचती है । हर मसले में राजनीतिज्ञों की कमजोर इच्छाशक्ति और सत्ता लोलुप प्रवृतिया ही जिम्मेदार है ।सत्ता बदलते ही नियम -कानून सब बदल जाते है । बदल जाते है किताबों के पाठ्यक्रम भी । ये भी नया ,अनूठा नही है । आजादी के बाद जब भी जरुरत हुई राजनितिक स्वार्थो की पूर्ति तू संविधान की धाराओं में परिवर्तन होता रहा है । शाहबानो प्रकरण इसका प्रयाप्त नमूना है । अपने अपने वोट बैंक की खातिर “तुष्टिकरण” की राजनीती आजकल चलन में है। भविष्य में अफजल गुरु जैसे आतंकियों को बचाने के लिए भी कोई कानून बदला जाए तो कोई आश्चर्य नही । आतंकवाद को धर्म के नाम पर बाटने की शाजिस कामयाब होती दिख रही है । बतला हाउस और मालेगांव को लेकर इन राजनीतिको के दोहरे मापदंड ने आने वाले समय की दुर्दशा का अंदाजा दे दिया है । बहरहाल, इतना कुछ होने पर भी हम खामोश है और गृह mantri जी इस बात के लिए बधाई दे रहे है । ये चुप्पी हमें ले डूबेगी । किसी ने क्या खूब कहा था “ये खामोश मिजाजी तुम्हे जीने नही देगी , जिन्दा रहना है तो ज़माने में कोहराम मचा दो”।

शर्म किसे आनी चाहिये………

तलाशने गया था वह
अपनों के कातिलों को
कातिल पकड़ा गया
तो कोई
अपना ही निकला
फिर मारा गया वह
अपना कर्तव्य करते हुए,
अब तो शर्म
करो!
मेरी कल की पोस्ट पर आचार्य द्विवेदी जी की उपरोक्त टिप्पणी का जवाब मैंने प्रकाशित किया है

आदरणीय द्विवेदी जी

धन्यवाद

मेरी पोस्ट मीडिया द्वारा आतंकवाद को धर्म के नाम पर महिमांमंडित जिस तरह से
मीडिया ने किया है ..इस बात पर है..हिंदु आतंकवाद…मुस्लिम आतंकवाद….इस एपीसोड
ने आतंकवाद के खिलाफ लङाई को कमजोर किया है…..देखा जाये तो ये किसी देशद्रोह से
कम नहीं…..सिर्फ और सिर्फ हिंदु को बदनाम करने की जिद मैं वे लोग भूल गये कब वे
देश मैं फैले आतंकवाद का समर्थन करने लगे…..आप के विचार से क्या किया है ताज पर
हमले करके इन आतंकवादियों ने….साध्वी के हमले का बदला ही तो लिया है
….अल्पसंख्यकों पर हमलों का बदला ही तो लिया है(ये भी उन्होने चैनल वालों को फोन
करके ही बताया है…क्यों कि वे ही इन मजलूमों की आवाज को आप जैसे बुद्धिजीवियों तक
पहुंचा सकें ….जो गला फाङ फाङ कर फिर ये बता सकें कि देखों मैं तो एक धर्म पर
विश्वास न करने वाला मिस्टैकनली बोर्न हिंदु हूं….और देखो ये लोग जो कर रहे हैं
बिचारे इनके पास करने के लिए औऱ कुछ नहीं बल्कि इन्होने तो ये सब करना ही था
)

वैसे हो सकता है आपका शर्म करने का क्राईटैरिया कुछ अलग हो……मुझे तो तब भी
शर्म आ रही थी जब साध्वी को …हिंदु को …बदनाम करने के चक्कर मैं मीडिया बार बार
बिना साबित हुई चीजों को बार बार दिखा रहा था औऱ ये साबित करने मैं लगा था कि
आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद नहीं होता …ये हिंदु होता है और मुसलमान भी होता
है…….इसलिए यदि कोई आतंकवादी घटना हो तब सोचे कि किसने की और फिर ये निश्चित
करें कि क्या करना है….
मुझे तो आज भी उतना ही दुख है ..गुस्सा है…आक्रोश है……और
इस सब के लिए कुछ करने की जबर्दस्त इच्छा है….बिना ये सोचे की वे हमलावर हिंदु थे
या मुसलमान…..वे सिर्फ आतंकवादी नहीं हैं बल्कि देश के दुश्मन हैं……मेरे
दुश्मन है…भारत माता के दुश्मन हैं(एनी आब्जेक्शन)

….ये बिना सोचे समझे ..विना पूरी पोस्ट पढे….बिना उसका सार समझे आपको शर्म
आनी चाहिये या मुझे सोचने का विषय है…श्री हेमंत करकरे की शहादत के बारे मैं शायद
आपसे कुछ ज्यादा ही गंभीर हूं मैं…..मेरी पोस्ट की अंतिम पंक्तियों मैं उनकी
शहादत को नमन किया गया हैं……..

प्रिय मित्रो,
सादर नमस्कार,
मैं तरुण जोशी नारद पुनः आप सभी की सेवा मैं उपस्थित हूँ, मित्रों मैं अपने समूह की एक web site बनाकर समर्पित करना चाहता हूँ. कृपया कर सभी मित्र गण अपने बारे में सुचनाये मुझे भिजवाने की कृपा करे,मेरा e mail id है ceo-operations@in.com , सभी पाठक भी अपने फीड बैक भेजे.
तरुण जोशी ” नारद”

भला हो डैक्कन मुजाहिदीन का ….मेरा नाम नहीं लिया…..

बंबई मैं आतंकी हमला फिर हुआ आज तक का सर्वाधिक भीषण हमला…और ये पूरे गुस्से मैं किया गया खूब बम फोङे गये और दबाके खून बहाया गया….बाकायदा चैनलों को नाम भेजकर नाम बताया गया….अब आप सोचेंगे कि क्या कारण रहा होगा कि वे लोग इतने गुस्से मैं थे…अरे भई सीधी सी बात है..खरचा वो करें और ए टी एस फैमस दूसरों को कर रहा है ..वो भी फोकट मैं.
गुस्सें गुस्से मैं उन्होने उस काचरे के बीज को भी निपटा दिया हेमंत करकरे साहब को …कि इसी शख्स का किया धरा है ये सब.
भला हो डैक्कन मुजाहिदीन का कि उन्होने बजरंग दल या अभिनव भारत का या विहिप का नाम नहीं लिया नहीं तो ये हमारे बुद्धु बक्से वाले भौंपु अब तक ये आरती सुना सुना कर कानों को फोङ डालते और सुबह के अखबार मैं बम विस्फोट की जगह सुर्खियों मैं हिंदुवादी ताकतों पर प्रतिबंध की खबरें मुख पृष्ठ की शोभा बढा रही होती.

हेंमंत करकरे आतंकवादियों से लङते हुए शहीद हुए मेरा उनकों अन्य पुलिस वालों को और जितने भी लोग इस देशद्रोही आतंकी कार्यवाही मैं मारे गये उनको सबको शत् शतम नमन

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