>अमेरिका का मुँह तकती, गद्दारों से भरी पड़ी, पिलपिली महाशक्ति…

>Mumbai Terror Attacks India-America and Pakistan

मुम्बई हमले को एक माह होने को आया, गत एक साल में 60 से ज्यादा बम विस्फ़ोट हो चुके, संसद पर हमले को आठ साल हो गये, कारगिल हुए दस साल बीत गये, भारत नाम की कथित “महाशक्ति” लगता है कि आज भी वहीं की वहीं है। मुझे आज तक पता नहीं कि भारत को महाशक्ति (या क्षेत्रीय महाशक्ति) का नाम किसने, कब और क्यों दिया था। महाशक्ति की परिभाषा क्या होती है, इसे लेकर भी शायद विभिन्न मत होंगे, इसीलिये किसी विद्वान(?) ने भारत को महाशक्ति कहा होगा।

चीन ने अमेरिका के जासूसी विमान को अपनी सीमा का उल्लंघन करने पर उसे रोक रखा और तब तक रोक कर रखा जब तक कि अमेरिका ने नाक रगड़ते हुए माफ़ी नहीं माँग ली। रूस, चेचन अलगाववादियों पर लगातार हमले जारी रखे हुए हैं, हाल ही में जॉर्जिया के इलाके में अपने समर्थकों के समर्थन और नई सीमाओं को गढ़ने के लिये रूस ने जॉर्जिया पर भीषण हमले किये। 9/11 के बाद अमेरिका ने न ही संयुक्त राष्ट्र से औपचारिक सहमति ली, न ही किसी का समर्थन लिया, वर्षों पहले जापान ने भी यही किया था। ब्रिटेन हजारों मील दूर अपने फ़ॉकलैण्ड द्वीप को बचाने के लिये अर्जेण्टीना से भी भिड़ गया था और उसे घुटने पर बैठाकर ही युद्ध का खत्मा किया… महाशक्तियाँ ऐसी होती हैं… अलग ही मिट्टी की बनी हुई, अपने देश का स्वाभिमान बनाये रखने के लिये किसी भी हद तक जाने वाली… इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में 1971 के आधे-अधूरे ही सही भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद गत 39 वर्षों में भारत ने अब तक क्या किया है… किस आधार पर इसे कोई महाशक्ति कह सकता है? क्या सिर्फ़ इसलिये कि यह देश सबसे अधिक संख्या में “सॉफ़्टवेयर मजदूर” पैदा करता है (पहले गन्ना कटाई के लिये यहाँ से मजदूर मलेशिया, मालदीव, फ़िजी, तंजानिया, केन्या जाते थे, अब सॉफ़्टवेयर मजदूर अमेरिका जाते हैं), या महाशक्ति सिर्फ़ इसलिये कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा अपना माल खपाने के लिये यहाँ करोड़ों की संख्या में मध्यमवर्गीय मूर्ख मौजूद हैं, या इसलिये कि भारत हथियारों, विमानों का सबसे बड़ा ग्राहक है? कोई मुझे समझाये कि आखिर महाशक्ति हम किस क्षेत्र में हैं? क्या सिर्फ़ बढ़ती आर्थिक हैसियत से किसी देश को महाशक्ति कहा जा सकता है? भारत को अमेरिका बराबर की आर्थिक महाशक्ति बनने में अभी कम से कम 30 साल तो लग ही जायेंगे, फ़िलहाल हम “डॉलर” की चकाचौंध के आगे नतमस्तक हैं, फ़िर इस तथाकथित “क्षेत्रीय महाशक्ति” की सुनता या मानता कौन है? नेपाल? बांग्लादेश? श्रीलंका? म्यांमार… कोई भी तो नहीं।

मुम्बई हमलों के बाद मनमोहन सिंह जी ने देश को सम्बोधित किया था। एक परम्परा है, किसी भी बड़े हादसे के बाद प्रधानमंत्री देश को सम्बोधित करते हैं सो उन्होंने भी रस्म-अदायगी कर दी। इतने बड़े हमले के बाद राष्ट्र को सम्बोधन करते समय अमूमन कुछ “ठोस बातें या विचार” रखे जाते हैं, लेकिन सीधे-सादे प्रधानमंत्री उस वक्त भी सीधे-सादे बने रहे और माफ़ी माँगते नज़र आये। अपने सम्बोधन में उन्होंने मुख्यतः तीन बातें कही थीं, उन्होंने आतंकवादियों को धमकी की भाषा भी बड़े मक्खन लगाने वाले अन्दाज़ में दी। उन्होंने कहा कि 1) “हम आतंकवादी गुटों और उनके आकाओं को मिलने वाली आर्थिक मदद को रोकेंगे”, 2) देश में घुसने वाले हरेक संदिग्ध व्यक्ति को रोकने के उपाय किये जायेंगे, 3) हम आतंक फ़ैलाने वालों, उनकी मदद करने वालों और उन्हें पनाह देने वालों का पीछा करेंगे और उन्हें इस कृत्य की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी… सुनने में यह बातें कितनी अच्छी लगती हैं ना!!! 9/11 के बाद लगभग इसी से मिलती-जुलती बातें जॉर्ज बुश ने अपने राष्ट्र के नाम सम्बोधन में कही थीं, और दुनिया ने देखा कि कम से कम आखिरी दो मुद्दों पर उन्होंने गम्भीरता से काम किया है और कुछ अर्थों में सफ़ल भी हुए… यह होती है महाशक्ति की पहचान। इसके विपरीत भारत में क्या हो रहा है, बातें, बातें, बातें, समीक्षायें, मीटिंग्स, लोकसभा और राज्यसभा में बहसें, नतीजा……फ़िलहाल जीरो।

संदिग्ध गुटों को आर्थिक मदद मिलने के मुद्दे पर बस इतना ही कहा जा सकता है कि ISI और SIMI या अल-कायदा किसी बैंक या वित्तीय संस्थान के भरोसे अपना संगठन नहीं चलाते हैं, उनकी अपनी खुद की अलग अर्थव्यवस्था है, अफ़ीम, तस्करी, नकली नोटों, ड्रग्स और अवैध हथियारों की खरीद-फ़रोख्त से बनाई हुई। यकीन न आता हो तो उत्तर भारत की बैंकों की शाखाओं से निकलते 500 के नकली नोटों की बढ़ती घटनाओं पर गौर कीजिये, एक छोटे शहर के छोटे व्यापारी से 500 और 1000 के नोटों का लेन-देन कीजिये, पता चल जायेगा कि अर्थव्यवस्था से विश्वास डिगाने में महाशक्ति कामयाब हुई या ISI? और आतंकवादी देश में वैध रास्तों से तो घुसते नहीं हैं, उनके लिये मुम्बई-कोंकण के समुद्र तटों से लेकर, नेपाल, बांग्लादेश तक की सीमायें खुली हुई हैं, उन्हें कैसे रोकेंगे?

“हम आतंकवादियों का पीछा करेंगे और उन्हें सबक सिखाया जायेगा…” अब तो सभी जान गए हैं कि यह सिवाय “खोखली” धमकी के अलावा कुछ और नहीं है। विश्व देख रहा है कि भारत की सरकार अफ़ज़ल को किस तरह गोद में बैठाये हुए है और बात कर रहे हैं “पीछा करने की”… जिस प्रकार किसी हत्या के मुजरिम को कहा जाये कि आप हत्यारे को ढूँढने में पुलिस की मदद कीजिये उस प्रकार हमारे प्रधानमंत्री ने हमले के बाद ISI के मुखिया को भारत बुलावा भेजा था, क्या है यह सब? दुर्भाग्य यह है कि विपक्ष भी मजबूती से अपनी बात रखने में सक्षम नहीं है, उसके कंधे पर भी संसद पर हमला और कंधार के भूत सवार हैं। NDA ने ही संसद पर हमले के बाद सेनाओं को खामख्वाह छह महीने तक पाकिस्तान की सीमाओं पर तैनात रखा था, जिसका नतीजा सिर्फ़ इतना हुआ कि उस कवायद में भारत के करोड़ों रुपये खर्च हो गये।

अब पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिये पूरा देश उतावला है, तो हमारे नेता और पार्टियाँ सिर्फ़ शब्दों की जुगाली करने में लगे हुए हैं। श्री वैद्यनाथन जी ने पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिये कुछ उपाय सुझाये थे – जैसे कि

1) पाकिस्तान से निर्यात होने वाले मुख्य जिंसों जैसे बासमती चावल और कालीन आदि को भारत से निर्यात करने के लिये शून्य निर्यात कर लगाया जाये या भारी सबसिडी दी जाये ताकि पाकिस्तान का निर्यात बुरी तरह मार खाये।

2) जो प्रमुख देश (ब्राजील, जर्मनी और चीन) पाकिस्तान को हथियार सप्लाई करते हैं, उन्हें स्पष्ट शब्दों में बताया जाना चाहिये कि पाकिस्तान को शस्त्र देने से हमारे आपसी सम्बन्ध दाँव पर लग सकते हैं और इन देशों की कम्पनियों को भारत में निवेश सम्बन्धी “धमकियाँ” देनी चाहिये, ताकि वे अपनी-अपनी सरकारों को समझा सकें कि पाकिस्तान से सम्बन्ध रखना ठीक नहीं है, भारत से सम्बन्ध रखने में फ़ायदा है।

3) जिस प्रकार चीन में पेप्सी-कोक के आगमन के साथ ही वहाँ हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों की खबरें दबा दी गई, उसी प्रकार भारत को अपने विशाल “बाजार” को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिये।

4) पाकिस्तानी कलाकारों, क्रिकेट खिलाड़ियों को भारत प्रवेश से वंचित करना होगा ताकि दाऊद द्वारा जो पैसा फ़िल्मों और क्रिकेट में लगाया जा रहा है, उसमें उसे नुकसान उठाना पड़े।

5) भारत की कोई भी सॉफ़्टवेयर कम्पनी पाकिस्तान से जुड़ी किसी भी कम्पनी को अपनी सेवायें न दे, यदि हम सॉफ़्टवेयर में महाशक्ति हैं तो इस ताकत का देशहित में कुछ तो उपयोग होना चाहिये।

वैद्यनाथन जी ने और भी कई उपाय सुझाये हैं, लेकिन एक पर भी भारत सरकार ने शायद अभी तक विचार नहीं किया है। जो लोग युद्ध विरोधी हैं उन्हें भी यह उपाय मंजूर होना चाहिये, क्योंकि आखिर पेट पर लात पड़ने से शायद उसे अकल आ जाये। लगभग यही उपाय कश्मीर समस्या के हल के लिये भी सुझाये गये थे। भारत द्वारा कश्मीर और पाकिस्तान को जोर-शोर से प्रचार करके यह जताना चाहिये कि “हम हैं, हमारी मदद है, हमारे से सम्बन्ध बेहतर हैं तो उनकी रोटी चलेगी…वरना”, लेकिन यह इतनी सी बात भी खुलकर कहने में हमारे सेकुलर गद्दारों को पसीना आ रहा है।

और सबसे बड़ी दिक्कत अरुंधती रॉय, अब्दुल रहमान अन्तुले, लालू-पासवान जैसे सेकुलर हैं, जिनके बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता कि वे किस तरफ़ हैं? पाकिस्तान से भिड़ने से पहले इन जैसे सेकुलर लोगों से पार पाना अधिक जरूरी है। असल में भारत के “सिस्टम” में किसी की जवाबदेही किसी भी स्तर पर नहीं है, जब तक यह नहीं बदला जायेगा तब तक कोई ठोस बदलाव नहीं होने वाला। प्रधानमंत्री से जवाब माँगने से पहले खुद सोचिये कि क्या आपने मनमोहन सिंह को चुना था? नहीं, उन्हें तो मैडम ने चुना था आप पर शासन करने के लिये, फ़िर वे किसे जवाबदेह होंगे? सारा देश इस समय गुस्से, अपमान और क्षोभ से भरा हुआ है, और उधर संसद में हमारे बयानवीर रोजाना नये-नये बयान दिये जा रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र से गुहार लगाई जा रही है, जबकि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान जाकर उसे आतंकवाद से लड़ने के नाम पर 6 मिलियन पाऊण्ड की मदद दे दी। इधर जनता त्रस्त है कि अब कहने का वक्त गुजर चुका, कुछ करके दिखाईये जनाब… उधर पाकिस्तान में एक चुटकुला आम हो चला है कि “जब पचास-पचास कोस दूर गाँव में बच्चा रात को रोता है तो माँ कहती है कि बेटा सो जा, सो जा नहीं तो प्रणब मुखर्जी का एक और बयान आ जायेगा…” और बच्चा इस बात पर हँसने लगता है। कुल मिलाकर स्थिति यह बन रही है कि एक पिलपिली सी “महाशक्ति”, बच्चों की तरह अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, संयुक्त राष्ट्र से शिकायत कर रही है कि “ऊँ, ऊँ, ऊँ… देखो, देखो अंकल वो पड़ोस का बच्चा मुझे फ़िर से मारकर भाग गया… अब मैं क्या करूँ, अंकल मैं आपको सबूत दे चुका हूँ कि वही पड़ोसी मुझे रोजाना मारता रहता है…” अंकल को क्या पड़ी है कि वे उस शैतान बच्चे को डाँटें (दिखावे के लिये एकाध बार डाँट भी देते हैं), लेकिन अन्ततः उस शैतान बच्चे से निपटना तो रोजाना पिटने वाले बच्चे को ही है, कि “कम से कम एक बार” उसके घर में घुसकर जमकर धुनाई करे, फ़िर अंकल भी साथ दे देंगे…

फ़िलहाल आशा की एक किरण आगामी लोकसभा चुनाव हैं, जिसमें कांग्रेस को अपना चेहरा बचाने के लिये कोई न कोई कठोर कदम उठाने ही पड़ेंगे, क्योंकि वोटों के लिये कांग्रेस “कुछ भी” कर सकती है, और दोनो हाथों में लड्डू रखने की उसकी गन्दी आदत के कारण कोई कदम उठाने से पहले ही अन्तुले, दिग्विजय सिंह को भी “दूसरी तरफ़” तैनात कर दिया है… हो सकता है कि कांग्रेस एक मिनी युद्ध के लिये सही “टाईमिंग” का इंतजार कर रही हो, क्योंकि यदि युद्ध हुआ तो लोकसभा के आम चुनाव टल जायेंगे, तब तक कश्मीर में चुनाव निपट चुके होंगे और यदि उसके बाद अफ़ज़ल को फ़ाँसी दे दी जाये और पाकिस्तान पर हमला कर दिया जाये तो कांग्रेस के दोनो हाथों में लड्डू और दिल्ली की सत्ता होगी… जैसी कि भारत की परम्परा रही है कि हरेक बड़े निर्णय के पीछे राजनीति होती है, वैसा ही कुछ युद्ध के बारे में होने की सम्भावना है और “पीएम इन वेटिंग” सदा वेटिंग में ही रह जायें। रही आम जनता, तो उसे बिके हुए मीडिया के तमाशे से आसानी से बरगलाया जा सकता है…

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1 Comment

  1. Vics said,

    September 19, 2010 at 5:54 pm

    >Sir apne bilkul sahi lika hai lekin apko ye Newspaper me likna chahiye taki India ye sab pad sake aur Politicians se jabardasti kara sake


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