>हर सुबह अँधेरा ही हाथ आता है …………..बस एक उम्मीद है ……..कभी तो खत्म होगा ये …..

>अभी महीनाभर पहले ,मुंबई का आतंकी नाच हम सब ने देखा और अब शीतयुद्ध का मजा ले रहे हैं । घर में,नुक्कड़ पर, चाय- पान की दुकानों पर ,दफ्तरों में अर्थात यत्र तत्र सर्वत्र भारत- पाकिस्तान के मध्य संभावित युद्ध के चर्चे हैं । कुछ का कहना है हमला तो होना ही चाहिए , आख़िर भारतीय लोकतंत्र पर धावा बोला है सालों ने । कोई कब तक बर्दास्त करेगा ?एक बारी तो आर-पार की लडाई हो ही जाए जो होगा भुगत लेंगे । कई राष्ट्रीय स्तरके नेता जी तो यहाँ तक कहते हैं कि परमाणु युद्ध हो, युद्ध के बाद की दुनिया बड़ी ही खुबसूरत होगी । बुद्धिजीवी लोग कहते हैं -ये सब सरकार को सोचना हैं। परन्तु , इन छद्म बहरूपियों को कौन अक्ल बाँटे? कैसा युद्ध और किससे युद्ध, पहले तय तो हो जाने दो। बाहरके दुश्मनों से मुकाबला कंरने के पूर्व घर तो ठीक कर लो । अपने घर की हालत किसी से छिपी नही है । भ्रष्टाचार रूपी विषाणु लोकतंत्र के राग-राग में फैलता जा रहा है । बेरोक-टोक । न तो उसके पास प्रतिरोध की ताकत बची है और न ही उसे बचाने का कोई प्रयत्न ही हो रहा है। बस बार -बार इलाज के नाम पर आश्वासन की गोलियां दी जाती है । आख़िर कब तक एक बीमार, दयनीय और जर्जर व्यवस्था यु चलती रहेगी ? हम गर्व करते हैं अपने लोकतंत्र पर। कहते हैं -हमारा गणतंत्र अभी शैशवावस्था में है, अरे इस विषाणु जनित महामारी के चपेट में कब बुढापा आ जाए पता भी न चलता है। अब, जबकि बुढापा आ ही गया है तो आत्मा कब इस बहरी ढांचे को छोड़ जायेगी कहना मुश्किल है? इसबीमारी ने देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली को कहा पंहुचा दिया है इसका बयां शब्दों में कर पाना असंभव है । क्या -क्या बताये , किस किस कमी का बखान करें? सारी खामियों में एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात है-‘कमियों को दूर करने की इच्छाशक्ति का अभाव , भ्रष्टाचार की इस बीमारी से लड़ने की दृढ़ता का अभाव’। आज ६० -६१ वर्षों बाद भी हम रोटी , कपड़ा ,और माकन के झंझट में पड़े है , ऊपर से ये बीमारी । कुछ लोग इसके उलट परिवर्तन की बात चिल्ला-चिल्ला कर बताने में जुटे हैं। एक ओर ये भी सच है बदलाव तो आया , भूमंडलीकरण के दौर में पुरी दुनिया एक होने जा रही है, बाजारवाद ने मानव को उपभोक्ता में बदल दिया है, सुचना क्रांति ने घर-घर टी वीऔर इन्टरनेट पंहुचा दिया है! भारत में भी आजादी के बाद एक खास वर्ग ने तरक्की की है। चंद उधोगपति और भ्रष्ट नेताओ का ये वर्ग दिनों दिन आमिर होते गए ,गरीबों की गरीबी बढती ही गई। सारे जगत में भारतीयों की धूम मची हैं ऐसी आधी सच्ची आधी झूठी ख़बर हर दिन मीडिया में प्रसारित होती हैं । हो भी क्यों न , मीडिया की प्रगति के पीछे भी तो बाजारवाद ही है। चंद लोगो की सफलता आज पुरे देश का विकास कहलाता है। बार-बार सुनते -सुनता हम भी ऐसा ही मानने लगे हैं । बहरहाल, एक बार फिर मीडिया का वही जालसाज चेहरा नजर आया है। युद्ध की sambhawna बता- बता कर भय को bechna भी आज patrakarita है। याद रहे समाज को yatharth बोध कराने wala aayina आज beimaan हो गया है। choro से बचाने wala chaukidar आज unhi के हाथ bik गया है। सब ओर bebsi और lachari । कुछ mahanubhav तो इस को भी subh sanket mante हैं। उनको तो बस एक बार पुरी barbadi की आस है। शायद किसी से सुन लिया होगा कि हर andheri रात के बाद एक sawera होता है। हम भी उसी सवेरे की आस में roj रात आँख band करते हैं पर हर सुबह वही andhera हाथ आता है।

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