>

पिछले पोस्ट से आगे चलते हैं। बार-बार युद्ध की रत लगाये भारतीय मीडिया और अतिराष्ट्रवादी तत्वों को इस बात की भनक भी नही है किहम किस ओर बढ़ रहे हैं। भारतीय अर्थ व्यवस्था का चढ़ता ग्राफ अचानक नीचे कीओर लुढ़कता जा रहा है । निकट भविष्य मेंगहराते आर्थिक संकट का इलाज ढूंढने के बजाय हम उसे ढकने में लगे है। उसे छिपाने में अपनी उर्जा खत्म कर रहे है। इससे बड़ा खिलवाड़ क्या होगा कि हमारे प्रधानमंत्री जो ख़ुद एक अर्थशास्त्री हैं वो इस बात से निश्चिंत दिखतेहैं! आर्थिक मुद्दे पर अपनी नाकामी को दबाने कि कोशिश में उनके कारिंदे अनर्गल बयानबाजी पर उतर आए हैं । कोई करकरे के सहादत पर सवाल उठा रहा है तो कोई आतंकियों

के मांग कि बात उछल रहा है। वह रे राजनीति !जनता मरे भूख से हम चले हैं युद्ध करने !

आज हमें ये जान लेना चाहिए कि हमारा भविष्य किस बात में सुरक्षित है युद्ध में अथवा आर्थिक संकट से निपटने में? सरकार रहत कि योजनायें तो बना रही है , मीडिया में इसकी थोडी बहुत चर्चा है लेकिन देखने वाली बात ये है कि इसका फायदा किसे मिल रहा है। अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के नाम पर निजी पुन्जिदारों को मुनाफा पहुँचाया जा रहा है। सरकारी सब्सिडी को सार्वजनिक उपक्रमों में लगाने के नाम पर इन्हे सांप सूंघ जाता है । आज सार्वजनिक क्षेत्र की महत्वपूर्ण व्यवस्था कृषि और अन्य असंगठित रोजगारों के कामगारों की बदहाली किसी से छुपी नही । एक कलावती का नाम लेकर हमारे तथाकथित युवराज श्रीमान राहुल गाँधी और उनकी सरकार अपने कर्तव्यों से मुक्ति चाहती है। ये संभव नही । न जाने कितनी कलावती और कितने हल्कू पूस की रात में ठिठुर कर मर रहे होंगे ? पशुओं का चारा तक निगल जाने वाले नेताओ की सरकार से उम्मीद ही बेकार है। जिस पर देश की अर्तव्यवस्था टिकी है उस सार्वजनिक क्षेत्र को बहल करने को लेकर भला ये कैसे इमानदार हो सकते हैं । इन्हे तो चुनाव भी जितना है। अरबों का खर्चा होगा। पार्टी फंड के लिए चंदा तो यही पूंजीपति घराने देते हैं । अभी -अभी गरीबों के नाम पर सर्वजन समाज का उद्धार करने आई माया मदम के गुंडों ने इसी चंदे के खातिर तो एक इन्जिनिएर की हत्या कर दी । कभी चढ़ गुंडन की छाती पर वोट करो हाथी पर का नारा लगाने वाली पार्टी आज ख़ुद गुंडे पलने में व्यस्त है। जनता जाए खंता में इन्हे फर्क नही पड़ता। असल मुर्ख और इस सब के जिम्मेदार भी तो हम ही हैं जो बार -बार ऐसे चोरों को लोक सभा में भेजते है ,विधान सभा तथा अन्य जगहों पर राज करने की छुट दे देते हैं।

बहरहाल , जनता को समलने की जरुरत है । वक्त रहते चेत जाएये । सरकार को पूछा जाए की आख़िर जिस विध्वंसक आर्थिक मॉडल को दुनिया नकार चुकी है उसे हम क्यूँ ढो रहे हैं? अभी ज्यादा समय नही गुजरा है जब इस नव उदार वादी अर्थव्यवस्था ने अमेरिका को तबाही के कगार पर ला खड़ा किया था। आज हमें वापस कृषि क्षेत्र को जिन्दा करने की बात उठानी होगी। समय आ गया है जब भारतको किसी सांस्कृतिक, राजनितिक क्रांति के साथ साथ आर्थिक क्रांति की अति आवश्यकता है ।

4 Comments

  1. December 31, 2008 at 6:00 pm

    >नया साल आए बन के उजाला खुल जाए आपकी किस्मत का ताला|चाँद तारे भी आप पर ही रौशनी डाले हमेशा आप पे रहे मेहरबान उपरवाला ||नूतन वर्ष मंगलमय हो |

  2. January 2, 2009 at 7:44 am

    >bahut achha blog banaya h tumne. Proof ki galatiyo par thoda dhyan do. ab mai tumhare blog pe regular visit karunga. aj koi comment nhi karunga…

  3. Anonymous said,

    January 2, 2009 at 7:47 am

    >tumhara blog bahut achha h. aage mai comment bhi likhunga lekin aaj nhi Rangnath Singh

  4. January 9, 2009 at 12:46 pm

    >आज के समय में ब्लौगिंग अच्छा जरिया बन गया है अपनी बात कहने का। कम से कम इसी बहाने लगातार सोचते रहने की उम्मीद बंधती है। वरना वरना तो तुम हम जैसे लोगों के सोचने के विषय ही बदल गये हैं। अच्छी बात है कि तुम इस इलैक्टोनिक माध्यम में सक्रिय हो गये हो। औरों को भी सक्रिय करो। मेरी शुभकामनाएं हैं।


Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: