>कंधार के शर्मनाक समर्पण के पीछे का सच, और देश का आभिजात्य वर्ग…

>Kandhar Hijack Indian Society and BJP

हाल ही में गृहमंत्री चिदम्बरम ने एक सेमिनार में कहा कि “कंधार घटना के वक्त कांग्रेस क्या करती” यह कहना बेहद मुश्किल है, क्योंकि वह स्थिति पेचीदा थी और उसमें कई प्रकार की भावनायें भी शामिल थीं, लेकिन इस सवाल से वे कन्नी काट गये कि क्या एनडीए द्वारा आतंकवादियों को छोड़ने के फ़ैसले में कांग्रेस भी शामिल नहीं थी?

आजादी के बाद भारत में सैकड़ों हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो चुके हैं, और स्वाभाविक तौर पर लगभग सभी दंगे कांग्रेस शासित राज्यों में ही हुए हैं, लेकिन जिस तरह अकेले ईसा मसीह को सलीब ढोने पर मजबूर किया गया था, उसी तरह से गुजरात के 2002 के दंगों के लिये अकेले नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदार मानकर मीडिया, सेकुलरों की गैंग(?) और तथाकथित पढ़े-लिखे लोग “रुदाली” बने हुए हैं, इस मानसिकता को सिर्फ़ “घृणित” कहना उचित नहीं है इसके लिये कोई और शब्द खोजना पड़ेगा… (इस विशेषण को नरेन्द्र मोदी और ईसा मसीह की तुलना नहीं माना जाये बल्कि उन पर पत्थर फ़ेंकने वाली हजारों मूर्खों की भीड़ पर कटाक्ष समझा जाये, जो आसानी से भारत के इतिहास के सभी दंगो को भुला चुकी है, जबकि गुजरात के दंगों को “बन्दरिया के मरे हुए बच्चे की तरह छाती से चिपकाए” हुए हैं…… मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताने भर से जिस प्रकार कई वरिष्ठ पत्रकारों(?), सेकुलरों(?) और वरिष्ठ ब्लॉगरों(?) के “पेट में मरोड़” उठी उस पर अलग से एक लेख लिखूँगा ही, लेकिन फ़िलहाल इस लेख का विषय मोदी नहीं है)… इसी प्रकार जब कभी आतंकवादियों से बातचीत या कोई समझौता होने की बात आती है तो तत्काल एनडीए के कंधे पर “कंधार” की सलीब रख दी जाती है… हालांकि कंधार की घटना और उसके बाद आतंकवादियों को छोड़ने का जो कृत्य एनडीए ने किया था उसे कभी माफ़ किया ही नहीं जा सकता (भाजपा के कट्टर से कट्टर समर्थक भी इस घटना के लिये पार्टी नेतृत्व को दोषी मानते हैं, और ध्यान रखें कि इस प्रकार की भावनाएं कांग्रेसियों में नहीं पाई जाती कि वे अपने नेतृत्व को सरेआम दोषी बतायें, खुद भाजपा वाले कंधार को अमिट कलंक मानते हैं, जबकि कांग्रेसी, सिख विरोधी दंगों और आपातकाल को भी कलंक नहीं मानते…) कहने का मतलब यह कि कंधार प्रकरण में जो भी हुआ शर्मनाक तो था ही, लेकिन इस विकट निर्णय के पीछे की घटनायें हमारे देश के “आभिजात्य वर्ग” का असली चेहरा सामने रखती हैं, (आभिजात्य वर्ग इसलिये कि नौ साल पहले एयरलाइंस में अमूमन आभिजात्य वर्ग के लोग ही सफ़र करते थे, आजकल मध्यमवर्ग की भी उसमें घुसपैठ हो गई है)… आईये देखते हैं कि कंधार प्रकरण के दौरान पर्दे के पीछे क्या-क्या हुआ, जिसके कारण भाजपा के माथे पर एक अमिट कलंक लग गया…। ऐसा नहीं है कि महान भारत के सार्वजनिक अपमान की घटनायें कांग्रेसियों के राज में नहीं हुईं, हजरत बल, चरारे-शरीफ़ प्रकरण हो या महबूबा मुफ़्ती के नकली अपहरण का मामला हो, कोई न कोई कांग्रेसी उसमें अवश्य शामिल रहा है (वीपी सिंह भी कांग्रेसी संस्कृति के ही थे), लेकिन कंधार का अपहरण प्रकरण हमेशा मीडिया में छाया रहता है और ले-देकर समूचा मीडिया, भाजपा-एनडीए के माथे पर ठीकरा फ़ोड़ता रहता है।

जिस वक्त काठमाण्डू-दिल्ली हवाई उड़ान सेवा IC814 का अपहरण हो चुका था, प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी दिल्ली से बाहर अपने तय दौरे पर थे। जब उनका विमान दिल्ली लौट रहा था उस समय विमान के एयरफ़ोर्स के पायलट को अपहरण की सूचना दी गई थी। चूंकि विमान हवा में था इसलिये वाजपेयी को इस घटना के बारे में तुरन्त नहीं बताया गया (जो कि बाद में विवाद का एक कारण बना)। जब शाम 7 बजे प्रधानमंत्री का विमान दिल्ली पहुँचा तब तक IC-814 के अपहरण के 1 घण्टा चालीस मिनट बीत चुके थे। वाजपेयी को हवाई अड्डे पर लेने पहुँचे थे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र, जिन्होंने तत्काल वाजपेयी को एक कोने में ले जाकर सारी स्थिति समझाई। सभी अपहरणकर्ताओं की पहचान स्थापित हो चुकी थी, वे थे इब्राहीम अतहर (निवासी बहावलपुर), शाहिद अख्तर सईद, गुलशन इकबाल (कराची), सनी अहमद काजी (डिफ़ेंस कालोनी, कराची), मिस्त्री जहूर आलम (अख्तर कालोनी, कराची), और शाकिर (सक्खर सिटी)। विमान में उस वक्त 189 यात्री सवार थे।

प्रधानमंत्री निवास पर तत्काल एक उच्च स्तरीय समिति की मीटिंग हुई, जिसमें हालात का जायजा लिया गया, वाजपेयी ने तत्काल अपने निजी स्टाफ़ को अपने जन्मदिन (25 दिसम्बर) के उपलक्ष्य में आयोजित सभी कार्यक्रम निरस्त करने के निर्देश जारी किये। उसी समय सूचना मिली कि हवाई जहाज को लाहौर में उतरने की इजाजत नहीं दी गई है, इसलिये हवाई जहाज पुनः अमृतसर में उतरेगा। अमृतसर में विमान लगभग 45 मिनट खड़ा रहा और अपहर्ता विभिन्न अधिकारियों को उसमें तेल भरने हेतु धमकाते रहे, और अधिकारी “सिर कटे चिकन” की तरह इधर-उधर दौड़ते रहे, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि इस स्थिति से निपटने के लिये क्या करना चाहिये। प्रधानमंत्री कार्यालय से राजा सांसी हवाई अड्डे पर लगातार फ़ोन जा रहे थे कि किसी भी तरह से हवाई जहाज को अमृतसर में रोके रखो…एक समय तो पूर्व सैनिक जसवन्त सिंह ने फ़ोन छीनकर चिल्लाये कि “कोई भारी ट्रक या रोड रोलर को हवाई पट्टी पर ले जाकर खड़ा कर दो…”, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ। NSG कमाण्डो को अलर्ट रहने का निर्देश दिया जा चुका था, लेकिन 45 मिनट तक अमृतसर में खड़े होने के बावजूद NSG के कमाण्डो उस तक नहीं पहुँच सके। इसके पीछे दो बातें सामने आईं, पहली कि NSG कमाण्डो को अमृतसर ले जाने के लिये सही समय पर विमान नहीं मिल सका, और दूसरी कि मानेसर से दिल्ली पहुँचने के दौरान NSG कमाण्डो ट्रैफ़िक जाम में फ़ँस गये थे, सचाई किसी को नहीं पता कि आखिर क्या हुआ था।

अपहर्ता NSG कमाण्डो से भयभीत थे इसलिये उन्होंने पायलट और यात्रियों पर दबाव बनाने के लिये रूपेन कत्याल की हत्या कर दी और लगभग खाली पेट्रोल टैंक सहित हवाई जहाज को लाहौर ले गये। लाहौर में पुनः उन्हें उतरने की अनुमति नहीं दी गई, यहाँ तक कि हवाई पट्टी की लाईटें भी बुझा दी गईं, लेकिन पायलट ने कुशलता और सावधानी से फ़िर भी हवाई जहाज को जबरन लाहौर में उतार दिया। जसवन्त सिंह ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री से बात की कि हवाई जहाज को लाहौर से न उड़ने दिया जाये, लेकिन पाकिस्तानी अधिकारी जानबूझकर मामले से दूरी बनाना चाहते थे, ताकि बाद में वे इससे सम्बन्ध होने से इन्कार कर सकें। वे यह भी नहीं चाहते थे कि लाहौर में NSG के कमाण्डो कोई ऑपरेशन करें, इसलिये उन्होंने तुरन्त हवाई जहाज में पेट्रोल भर दिया और उसे दुबई रवाना कर दिया। दुबई में भी अधिकारियों ने हवाई जहाज को उतरने नहीं दिया। जसवन्त सिंह लगातार फ़ोन पर बने हुए थे, उन्होंने यूएई के अधिकारियों से बातचीत करके अपहर्ताओं से 13 औरतों और 11 बच्चों को विमान से उतारने के लिये राजी कर लिया। रूपेन कत्याल का शव भी साथ में उतार लिया गया, जबकि उनकी नवविवाहिता पत्नी अन्त तक बन्धक रहीं और उन्हें बाद में ही पता चला कि वे विधवा हो चुकी हैं।

25 दिसम्बर की सुबह – विमान कंधार हवाई अड्डे पर उतर चुका है, जहाँ कि एक टूटा-फ़ूटा हवाई अड्डा और पुरानी सी घटिया विमान कंट्रोल प्रणाली है, न पानी है, न ही बिजली है (तालिबान के शासन की एक उपलब्धि)। 25 दिसम्बर की दोपहर से अचानक ही चारों ओर से प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री निवास और कार्यालय के बाहर जमा होने लगे, छाती पीटने लगे, कपड़े फ़ाड़ने लगे, नारे लगाने लगे, प्रधानमंत्री हाय-हाय, हमारे आदमियों को बचाओ… जैसे-जैसे दिन बीतता गया भीड़ और नारे बढ़ते ही गये। अमृतसर, लाहौर और दुबई में निराशा झेलने के बाद सरकार अपनी कोशिशों में लगी थी कि किसी तरह से अपहर्ताओं से पुनः सही सम्पर्क स्थापित हो सके, जबकि 7 रेसकोर्स रोड के बाहर अपहृत परिवारों के सदस्यों के साथ वृन्दा करात सबसे आगे खड़ी थीं। मुफ़्ती प्रकरण का हवाला दे-देकर मीडिया ने पहले दिन से ही आतंकवादियों की मांगें मानकर “जो भी कीमत चुकानी पड़े… बन्धकों को छुड़ाना चाहिये” का राग अलापना शुरु कर दिया था…

मुल्ला उमर और उसके विदेशमंत्री(?) मुत्तवकील से बातचीत शुरु हो चुकी थी और शुरुआत में उन्होंने विभिन्न भारतीय जेलों में बन्द 36 आतंकवादियों को छोड़ने की माँग रखी। मीडिया के दबाव के चलते एक भी वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री अपहृत व्यक्तियों के परिजनों से मिलने को तैयार नहीं था, लेकिन जसवन्त सिंह हिम्मत करके उनसे मिलने गये, तत्काल सभी लोगों ने उन्हें बुरी तरह से घेर लिया और उनके एक वाक्य भी कहने से पहले ही, “हमें हमारे रिश्तेदार वापस चाहिये…”, “आतंकवादियों को क्या चाहिये इससे हमें क्या मतलब…”, “चाहे आप कश्मीर भी उन्हें दे दो, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता…”, “मेरा बेटा है, मेरी बहू है, मेरा पति है उसमें…” आदि की चिल्लाचोट शुरु कर दी गई, जबकि जसवन्त सिंह उन्हें स्थिति की जानकारी देने गये थे कि हम बातचीत कर रहे हैं। जसवन्त सिंह ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि देशहित में जेल में बन्द आतंकवादियों को छोड़ना ठीक नहीं है, लेकिन भीड़ में से एक व्यक्ति चिल्लाया “भाड़ में जाये देश और देश का हित…”। इसके बाद जसवन्त सिंह मीडिया के लिये शास्त्री भवन में आयोजित प्रेस कांफ़्रेस में आये, लेकिन वहाँ भी नाटकीय ढंग से भीड़ घुस आई, जिसका नेतृत्व संजीव छिब्बर नाम के विख्यात सर्जन कर रहे थे। उनका कहना था कि उनके 6 परिजन हवाई जहाज में हैं, डॉ छिब्बर का कहना था कि हमें तत्काल सभी 36 आतंकवादी छोड़ देना चाहिये। वे चिल्लाये, “जब मुफ़्ती की बेटी के लिये आतंकवादियों को छोड़ा जा सकता है तो हमारे रिश्तेदारों के लिये क्यों नहीं?… उन्हें कश्मीर दे दो, कुछ भी दे दो, लेकिन हमें हमारे रिश्तेदार वापस चाहिये…”।

उसी शाम को प्रधानमंत्री कार्यालय में स्वर्गीय स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की पत्नी पहुँचीं, उन्होंने अपहृतों के रिश्तेदारों से मुलाकात कर उनसे बात करके बताने की कोशिश की कि क्यों भारत को इन खतरनाक माँगों को नहीं मानना चाहिये और इससे शहीदों का अपमान होगा, लेकिन “समाज के उन इज्जतदार लोगों” ने ताना मारा कि “खुद तो विधवा हो गई है और चाहती है कि हम भी विधवा हो जायें… ये इधर कहाँ से आई?” फ़िर भी आहूजा की पत्नी देश का सम्मान बनाये रखने के लिये खड़ी रहीं। इसी प्रकार एक और वृद्ध दम्पति भी आये जिन्होंने कहा कि हमारे बेटों ने भी भारत के लिये प्राण दिये हैं, कर्नल वीरेन्द्र थापर (जिनके बेटे लेफ़्टीनेंट कर्नल विजयन्त थापर युद्ध में शहीद हुए थे) ने खड़े होकर सभी लोगों से एकजुट होकर आतंकवादियों के खिलाफ़ होने की अपील की, लेकिन सब बेकार… उन बहरे कानों को न कुछ सुनना था, न उन्होंने सुना… (ध्यान रखिये ये वही आभिजात्य वर्ग था, जो मोमबत्ती जलाने और अंग्रेजी स्लोगन लगाये टी-शर्ट पहनने में सबसे आगे रहता है, ये वही धनी-मानी लोग थे जो भारत की व्यवस्था का जमकर शोषण करके भ्रष्टाचार करते हैं, ये वही “पेज-थ्री” वाले लोग थे जो फ़ाइव-स्टार होटलों में बैठकर बोतलबन्द पानी पीकर समाज सुधार के प्रवचन देते हैं), ऐसे लोगों का छातीकूट अभियान जारी रहा और “जिम्मेदार मीडिया(?)” पर उनकी तस्वीरें और इंटरव्यू भी… मीडिया ने दो-चार दिनों में ही जादू के जोर से यह भी जान लिया कि देश की जनता चाहती है कि “कैसे भी हो…” अपहृतों की सुरक्षित रिहाई की जाना चाहिये…

आखिर 28 दिसम्बर को सरकार और आतंकवादियों के बीच “डील फ़ाइनल” हुई, जिसके अनुसार मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद जरगर, और अहमद उमर शेख को छोड़ा जाना तय हुआ। एक बार फ़िर जसवन्त सिंह के कंधों पर यह कड़वी जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे साथ जायें ताकि अन्तिम समय पर यदि किसी प्रकार की “गड़बड़ी” हो तो वे उसे संभाल सकें। आखिर नववर्ष की संध्या पर सभी अपहृत सकुशल दिल्ली लौट आये… और भाजपा-एनडीए के सबसे बुरे अनुभव को समेटे और मीडिया द्वारा खलनायक करार दिये गये जसवन्त सिंह भी अपना बुझा हुआ सा मुँह लेकर वापस आये। इस प्रकार भारत ने अपमान का कड़वा घूँट पीकर नई सदी में कदम रखा… (जरा इस घटना की तुलना, रूस में चेचन उग्रवादियों द्वारा एक सिनेमा हॉल में बन्धक बनाये हुए बच्चों और उससे निपटने के तरीके से कीजिये, दो राष्ट्रों के चरित्र में अन्तर साफ़ नज़र आयेगा)।

इस घटना ने हमेशा की तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ सवाल खड़े किये (जवाब पाने या माँगने की परम्परा हमारे यहाँ कभी थी ही नहीं)। न ही नौ साल पहले हमने कोई सबक सीखा था, न ही दो महीने पहले हुए मुम्बई हमले के बाद कुछ सीखने को तैयार हैं। एक और कंधार प्रकरण कभी भी आसानी से मंचित किया जा सकता है, और भारत की जनता में इतनी हिम्मत नहीं लगती कि वह आतंकवादियों के खिलाफ़ मजबूती से खड़ी हो सके। हो सकता है कि एक बार आम आदमी (जो पहले ही रोजमर्रा के संघर्षों से मजबूत हो चुका है) कठोर बन जाये, लेकिन “पब संस्कृति”, “रेव-पार्टियाँ” आयोजित करने वाले नौनिहाल इस देश को सिर्फ़ शर्म ही दे सकेंगे। किसी भी प्रकार के युद्ध से पहले ही हम नुकसान का हिसाब लगाने लगते हैं, लाशें गिनने लगते हैं। पाकिस्तान के एक मंत्री ने बिलकुल सही कहा है कि भारत अब एक “बनिया व्यापारी देश” बन गया है वह कभी भी हमसे पूर्ण युद्ध नहीं लड़ सकेगा। डरपोक नेताओं और धन-सम्पत्ति को सीने से चिपकाये हुए अमीरों के इस देश में अपनी कमजोरियाँ स्वीकार करने की ताकत भी नहीं बची है… भ्रष्टाचार या आतंकवाद से लड़ना तो बहुत दूर की बात है…

सन्दर्भ, आँकड़े और घटनायें : कंचन गुप्ता (तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय के मीडिया सेल में पदस्थ पत्रकार) के लेख से…

, , , , , , , ,

Advertisements

कंधार के शर्मनाक समर्पण के पीछे का सच, और देश का आभिजात्य वर्ग…

Kandhar Hijack Indian Society and BJP

हाल ही में गृहमंत्री चिदम्बरम ने एक सेमिनार में कहा कि “कंधार घटना के वक्त कांग्रेस क्या करती” यह कहना बेहद मुश्किल है, क्योंकि वह स्थिति पेचीदा थी और उसमें कई प्रकार की भावनायें भी शामिल थीं, लेकिन इस सवाल से वे कन्नी काट गये कि क्या एनडीए द्वारा आतंकवादियों को छोड़ने के फ़ैसले में कांग्रेस भी शामिल नहीं थी?

आजादी के बाद भारत में सैकड़ों हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो चुके हैं, और स्वाभाविक तौर पर लगभग सभी दंगे कांग्रेस शासित राज्यों में ही हुए हैं, लेकिन जिस तरह अकेले ईसा मसीह को सलीब ढोने पर मजबूर किया गया था, उसी तरह से गुजरात के 2002 के दंगों के लिये अकेले नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदार मानकर मीडिया, सेकुलरों की गैंग(?) और तथाकथित पढ़े-लिखे लोग “रुदाली” बने हुए हैं, इस मानसिकता को सिर्फ़ “घृणित” कहना उचित नहीं है इसके लिये कोई और शब्द खोजना पड़ेगा… (इस विशेषण को नरेन्द्र मोदी और ईसा मसीह की तुलना नहीं माना जाये बल्कि उन पर पत्थर फ़ेंकने वाली हजारों मूर्खों की भीड़ पर कटाक्ष समझा जाये, जो आसानी से भारत के इतिहास के सभी दंगो को भुला चुकी है, जबकि गुजरात के दंगों को “बन्दरिया के मरे हुए बच्चे की तरह छाती से चिपकाए” हुए हैं…… मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताने भर से जिस प्रकार कई वरिष्ठ पत्रकारों(?), सेकुलरों(?) और वरिष्ठ ब्लॉगरों(?) के “पेट में मरोड़” उठी उस पर अलग से एक लेख लिखूँगा ही, लेकिन फ़िलहाल इस लेख का विषय मोदी नहीं है)… इसी प्रकार जब कभी आतंकवादियों से बातचीत या कोई समझौता होने की बात आती है तो तत्काल एनडीए के कंधे पर “कंधार” की सलीब रख दी जाती है… हालांकि कंधार की घटना और उसके बाद आतंकवादियों को छोड़ने का जो कृत्य एनडीए ने किया था उसे कभी माफ़ किया ही नहीं जा सकता (भाजपा के कट्टर से कट्टर समर्थक भी इस घटना के लिये पार्टी नेतृत्व को दोषी मानते हैं, और ध्यान रखें कि इस प्रकार की भावनाएं कांग्रेसियों में नहीं पाई जाती कि वे अपने नेतृत्व को सरेआम दोषी बतायें, खुद भाजपा वाले कंधार को अमिट कलंक मानते हैं, जबकि कांग्रेसी, सिख विरोधी दंगों और आपातकाल को भी कलंक नहीं मानते…) कहने का मतलब यह कि कंधार प्रकरण में जो भी हुआ शर्मनाक तो था ही, लेकिन इस विकट निर्णय के पीछे की घटनायें हमारे देश के “आभिजात्य वर्ग” का असली चेहरा सामने रखती हैं, (आभिजात्य वर्ग इसलिये कि नौ साल पहले एयरलाइंस में अमूमन आभिजात्य वर्ग के लोग ही सफ़र करते थे, आजकल मध्यमवर्ग की भी उसमें घुसपैठ हो गई है)… आईये देखते हैं कि कंधार प्रकरण के दौरान पर्दे के पीछे क्या-क्या हुआ, जिसके कारण भाजपा के माथे पर एक अमिट कलंक लग गया…। ऐसा नहीं है कि महान भारत के सार्वजनिक अपमान की घटनायें कांग्रेसियों के राज में नहीं हुईं, हजरत बल, चरारे-शरीफ़ प्रकरण हो या महबूबा मुफ़्ती के नकली अपहरण का मामला हो, कोई न कोई कांग्रेसी उसमें अवश्य शामिल रहा है (वीपी सिंह भी कांग्रेसी संस्कृति के ही थे), लेकिन कंधार का अपहरण प्रकरण हमेशा मीडिया में छाया रहता है और ले-देकर समूचा मीडिया, भाजपा-एनडीए के माथे पर ठीकरा फ़ोड़ता रहता है।

जिस वक्त काठमाण्डू-दिल्ली हवाई उड़ान सेवा IC814 का अपहरण हो चुका था, प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी दिल्ली से बाहर अपने तय दौरे पर थे। जब उनका विमान दिल्ली लौट रहा था उस समय विमान के एयरफ़ोर्स के पायलट को अपहरण की सूचना दी गई थी। चूंकि विमान हवा में था इसलिये वाजपेयी को इस घटना के बारे में तुरन्त नहीं बताया गया (जो कि बाद में विवाद का एक कारण बना)। जब शाम 7 बजे प्रधानमंत्री का विमान दिल्ली पहुँचा तब तक IC-814 के अपहरण के 1 घण्टा चालीस मिनट बीत चुके थे। वाजपेयी को हवाई अड्डे पर लेने पहुँचे थे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र, जिन्होंने तत्काल वाजपेयी को एक कोने में ले जाकर सारी स्थिति समझाई। सभी अपहरणकर्ताओं की पहचान स्थापित हो चुकी थी, वे थे इब्राहीम अतहर (निवासी बहावलपुर), शाहिद अख्तर सईद, गुलशन इकबाल (कराची), सनी अहमद काजी (डिफ़ेंस कालोनी, कराची), मिस्त्री जहूर आलम (अख्तर कालोनी, कराची), और शाकिर (सक्खर सिटी)। विमान में उस वक्त 189 यात्री सवार थे।

प्रधानमंत्री निवास पर तत्काल एक उच्च स्तरीय समिति की मीटिंग हुई, जिसमें हालात का जायजा लिया गया, वाजपेयी ने तत्काल अपने निजी स्टाफ़ को अपने जन्मदिन (25 दिसम्बर) के उपलक्ष्य में आयोजित सभी कार्यक्रम निरस्त करने के निर्देश जारी किये। उसी समय सूचना मिली कि हवाई जहाज को लाहौर में उतरने की इजाजत नहीं दी गई है, इसलिये हवाई जहाज पुनः अमृतसर में उतरेगा। अमृतसर में विमान लगभग 45 मिनट खड़ा रहा और अपहर्ता विभिन्न अधिकारियों को उसमें तेल भरने हेतु धमकाते रहे, और अधिकारी “सिर कटे चिकन” की तरह इधर-उधर दौड़ते रहे, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि इस स्थिति से निपटने के लिये क्या करना चाहिये। प्रधानमंत्री कार्यालय से राजा सांसी हवाई अड्डे पर लगातार फ़ोन जा रहे थे कि किसी भी तरह से हवाई जहाज को अमृतसर में रोके रखो…एक समय तो पूर्व सैनिक जसवन्त सिंह ने फ़ोन छीनकर चिल्लाये कि “कोई भारी ट्रक या रोड रोलर को हवाई पट्टी पर ले जाकर खड़ा कर दो…”, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ। NSG कमाण्डो को अलर्ट रहने का निर्देश दिया जा चुका था, लेकिन 45 मिनट तक अमृतसर में खड़े होने के बावजूद NSG के कमाण्डो उस तक नहीं पहुँच सके। इसके पीछे दो बातें सामने आईं, पहली कि NSG कमाण्डो को अमृतसर ले जाने के लिये सही समय पर विमान नहीं मिल सका, और दूसरी कि मानेसर से दिल्ली पहुँचने के दौरान NSG कमाण्डो ट्रैफ़िक जाम में फ़ँस गये थे, सचाई किसी को नहीं पता कि आखिर क्या हुआ था।

अपहर्ता NSG कमाण्डो से भयभीत थे इसलिये उन्होंने पायलट और यात्रियों पर दबाव बनाने के लिये रूपेन कत्याल की हत्या कर दी और लगभग खाली पेट्रोल टैंक सहित हवाई जहाज को लाहौर ले गये। लाहौर में पुनः उन्हें उतरने की अनुमति नहीं दी गई, यहाँ तक कि हवाई पट्टी की लाईटें भी बुझा दी गईं, लेकिन पायलट ने कुशलता और सावधानी से फ़िर भी हवाई जहाज को जबरन लाहौर में उतार दिया। जसवन्त सिंह ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री से बात की कि हवाई जहाज को लाहौर से न उड़ने दिया जाये, लेकिन पाकिस्तानी अधिकारी जानबूझकर मामले से दूरी बनाना चाहते थे, ताकि बाद में वे इससे सम्बन्ध होने से इन्कार कर सकें। वे यह भी नहीं चाहते थे कि लाहौर में NSG के कमाण्डो कोई ऑपरेशन करें, इसलिये उन्होंने तुरन्त हवाई जहाज में पेट्रोल भर दिया और उसे दुबई रवाना कर दिया। दुबई में भी अधिकारियों ने हवाई जहाज को उतरने नहीं दिया। जसवन्त सिंह लगातार फ़ोन पर बने हुए थे, उन्होंने यूएई के अधिकारियों से बातचीत करके अपहर्ताओं से 13 औरतों और 11 बच्चों को विमान से उतारने के लिये राजी कर लिया। रूपेन कत्याल का शव भी साथ में उतार लिया गया, जबकि उनकी नवविवाहिता पत्नी अन्त तक बन्धक रहीं और उन्हें बाद में ही पता चला कि वे विधवा हो चुकी हैं।

25 दिसम्बर की सुबह – विमान कंधार हवाई अड्डे पर उतर चुका है, जहाँ कि एक टूटा-फ़ूटा हवाई अड्डा और पुरानी सी घटिया विमान कंट्रोल प्रणाली है, न पानी है, न ही बिजली है (तालिबान के शासन की एक उपलब्धि)। 25 दिसम्बर की दोपहर से अचानक ही चारों ओर से प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री निवास और कार्यालय के बाहर जमा होने लगे, छाती पीटने लगे, कपड़े फ़ाड़ने लगे, नारे लगाने लगे, प्रधानमंत्री हाय-हाय, हमारे आदमियों को बचाओ… जैसे-जैसे दिन बीतता गया भीड़ और नारे बढ़ते ही गये। अमृतसर, लाहौर और दुबई में निराशा झेलने के बाद सरकार अपनी कोशिशों में लगी थी कि किसी तरह से अपहर्ताओं से पुनः सही सम्पर्क स्थापित हो सके, जबकि 7 रेसकोर्स रोड के बाहर अपहृत परिवारों के सदस्यों के साथ वृन्दा करात सबसे आगे खड़ी थीं। मुफ़्ती प्रकरण का हवाला दे-देकर मीडिया ने पहले दिन से ही आतंकवादियों की मांगें मानकर “जो भी कीमत चुकानी पड़े… बन्धकों को छुड़ाना चाहिये” का राग अलापना शुरु कर दिया था…

मुल्ला उमर और उसके विदेशमंत्री(?) मुत्तवकील से बातचीत शुरु हो चुकी थी और शुरुआत में उन्होंने विभिन्न भारतीय जेलों में बन्द 36 आतंकवादियों को छोड़ने की माँग रखी। मीडिया के दबाव के चलते एक भी वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री अपहृत व्यक्तियों के परिजनों से मिलने को तैयार नहीं था, लेकिन जसवन्त सिंह हिम्मत करके उनसे मिलने गये, तत्काल सभी लोगों ने उन्हें बुरी तरह से घेर लिया और उनके एक वाक्य भी कहने से पहले ही, “हमें हमारे रिश्तेदार वापस चाहिये…”, “आतंकवादियों को क्या चाहिये इससे हमें क्या मतलब…”, “चाहे आप कश्मीर भी उन्हें दे दो, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता…”, “मेरा बेटा है, मेरी बहू है, मेरा पति है उसमें…” आदि की चिल्लाचोट शुरु कर दी गई, जबकि जसवन्त सिंह उन्हें स्थिति की जानकारी देने गये थे कि हम बातचीत कर रहे हैं। जसवन्त सिंह ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि देशहित में जेल में बन्द आतंकवादियों को छोड़ना ठीक नहीं है, लेकिन भीड़ में से एक व्यक्ति चिल्लाया “भाड़ में जाये देश और देश का हित…”। इसके बाद जसवन्त सिंह मीडिया के लिये शास्त्री भवन में आयोजित प्रेस कांफ़्रेस में आये, लेकिन वहाँ भी नाटकीय ढंग से भीड़ घुस आई, जिसका नेतृत्व संजीव छिब्बर नाम के विख्यात सर्जन कर रहे थे। उनका कहना था कि उनके 6 परिजन हवाई जहाज में हैं, डॉ छिब्बर का कहना था कि हमें तत्काल सभी 36 आतंकवादी छोड़ देना चाहिये। वे चिल्लाये, “जब मुफ़्ती की बेटी के लिये आतंकवादियों को छोड़ा जा सकता है तो हमारे रिश्तेदारों के लिये क्यों नहीं?… उन्हें कश्मीर दे दो, कुछ भी दे दो, लेकिन हमें हमारे रिश्तेदार वापस चाहिये…”।

उसी शाम को प्रधानमंत्री कार्यालय में स्वर्गीय स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की पत्नी पहुँचीं, उन्होंने अपहृतों के रिश्तेदारों से मुलाकात कर उनसे बात करके बताने की कोशिश की कि क्यों भारत को इन खतरनाक माँगों को नहीं मानना चाहिये और इससे शहीदों का अपमान होगा, लेकिन “समाज के उन इज्जतदार लोगों” ने ताना मारा कि “खुद तो विधवा हो गई है और चाहती है कि हम भी विधवा हो जायें… ये इधर कहाँ से आई?” फ़िर भी आहूजा की पत्नी देश का सम्मान बनाये रखने के लिये खड़ी रहीं। इसी प्रकार एक और वृद्ध दम्पति भी आये जिन्होंने कहा कि हमारे बेटों ने भी भारत के लिये प्राण दिये हैं, कर्नल वीरेन्द्र थापर (जिनके बेटे लेफ़्टीनेंट कर्नल विजयन्त थापर युद्ध में शहीद हुए थे) ने खड़े होकर सभी लोगों से एकजुट होकर आतंकवादियों के खिलाफ़ होने की अपील की, लेकिन सब बेकार… उन बहरे कानों को न कुछ सुनना था, न उन्होंने सुना… (ध्यान रखिये ये वही आभिजात्य वर्ग था, जो मोमबत्ती जलाने और अंग्रेजी स्लोगन लगाये टी-शर्ट पहनने में सबसे आगे रहता है, ये वही धनी-मानी लोग थे जो भारत की व्यवस्था का जमकर शोषण करके भ्रष्टाचार करते हैं, ये वही “पेज-थ्री” वाले लोग थे जो फ़ाइव-स्टार होटलों में बैठकर बोतलबन्द पानी पीकर समाज सुधार के प्रवचन देते हैं), ऐसे लोगों का छातीकूट अभियान जारी रहा और “जिम्मेदार मीडिया(?)” पर उनकी तस्वीरें और इंटरव्यू भी… मीडिया ने दो-चार दिनों में ही जादू के जोर से यह भी जान लिया कि देश की जनता चाहती है कि “कैसे भी हो…” अपहृतों की सुरक्षित रिहाई की जाना चाहिये…

आखिर 28 दिसम्बर को सरकार और आतंकवादियों के बीच “डील फ़ाइनल” हुई, जिसके अनुसार मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद जरगर, और अहमद उमर शेख को छोड़ा जाना तय हुआ। एक बार फ़िर जसवन्त सिंह के कंधों पर यह कड़वी जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे साथ जायें ताकि अन्तिम समय पर यदि किसी प्रकार की “गड़बड़ी” हो तो वे उसे संभाल सकें। आखिर नववर्ष की संध्या पर सभी अपहृत सकुशल दिल्ली लौट आये… और भाजपा-एनडीए के सबसे बुरे अनुभव को समेटे और मीडिया द्वारा खलनायक करार दिये गये जसवन्त सिंह भी अपना बुझा हुआ सा मुँह लेकर वापस आये। इस प्रकार भारत ने अपमान का कड़वा घूँट पीकर नई सदी में कदम रखा… (जरा इस घटना की तुलना, रूस में चेचन उग्रवादियों द्वारा एक सिनेमा हॉल में बन्धक बनाये हुए बच्चों और उससे निपटने के तरीके से कीजिये, दो राष्ट्रों के चरित्र में अन्तर साफ़ नज़र आयेगा)।

इस घटना ने हमेशा की तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ सवाल खड़े किये (जवाब पाने या माँगने की परम्परा हमारे यहाँ कभी थी ही नहीं)। न ही नौ साल पहले हमने कोई सबक सीखा था, न ही दो महीने पहले हुए मुम्बई हमले के बाद कुछ सीखने को तैयार हैं। एक और कंधार प्रकरण कभी भी आसानी से मंचित किया जा सकता है, और भारत की जनता में इतनी हिम्मत नहीं लगती कि वह आतंकवादियों के खिलाफ़ मजबूती से खड़ी हो सके। हो सकता है कि एक बार आम आदमी (जो पहले ही रोजमर्रा के संघर्षों से मजबूत हो चुका है) कठोर बन जाये, लेकिन “पब संस्कृति”, “रेव-पार्टियाँ” आयोजित करने वाले नौनिहाल इस देश को सिर्फ़ शर्म ही दे सकेंगे। किसी भी प्रकार के युद्ध से पहले ही हम नुकसान का हिसाब लगाने लगते हैं, लाशें गिनने लगते हैं। पाकिस्तान के एक मंत्री ने बिलकुल सही कहा है कि भारत अब एक “बनिया व्यापारी देश” बन गया है वह कभी भी हमसे पूर्ण युद्ध नहीं लड़ सकेगा। डरपोक नेताओं और धन-सम्पत्ति को सीने से चिपकाये हुए अमीरों के इस देश में अपनी कमजोरियाँ स्वीकार करने की ताकत भी नहीं बची है… भ्रष्टाचार या आतंकवाद से लड़ना तो बहुत दूर की बात है…

सन्दर्भ, आँकड़े और घटनायें : कंचन गुप्ता (तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय के मीडिया सेल में पदस्थ पत्रकार) के लेख से…

, , , , , , , ,

>क्या गाँधी के विचारों के नाम पर निठारी के नर-पिशाचों को छोड़ने की भूल से हजारों कोहली और पंधेर को जन्म नही देंगे ??????

>

पिछले साल इसी दिन “गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता ” विषय पर एक गोष्ठी में गया था । चर्चा में मूल उद्येश्य से भटके वक्तागण वही पुरानी घिसी-पिटी बातें को लेकर गाँधी गुणगान में लगे थे । बात होनी चाहिए थी किआज २१ वीं सदी में गांधीवाद कितना प्रासंगिक है ? लेकिन पुरी चर्चा से ये मुद्दा ही गायब था । क्या कीजियेगा हमारे यहाँ शुरू से इस महिमामंडन कि परम्परा रही है! जीवन पर्यंत इश्वर में अविश्वास रखने वाले बुद्ध की प्रतिमा आज उतने ही आडम्बर के साथ पूजी जाती है! गाँधी जो ख़ुद जीवन भर ऐसी चीजों का विरोध करते रहे आज उनके चेले उनके विचारों पर गोबर डाल रहे हैं ! गाँधी जिस राम का नाम लेते-लेते जहाँ से चले गए आज उसी राम का नाम लेने से उनके चेले घबराते हैं! विडंबना ही है साहब !आजीवन गाँधी स्वदेशी – स्वदेशी रटते रहे आज उनके छद्म अनुयायी विदेशी कंपनियों को भारत को लुटने का लाइसेंस दोनों हाथों से बाँट रहे हैं! अब कितनी बात बताऊँ इन गांधीवादियों की सुन-सुन कर पक जायेंगे आप ।
तो अब वापस चलते हैं गोष्ठी में । गोष्ठी में ७-८ प्रतिभागी बोल कर जा चुके थे । लगभग बापू के हर सिद्धांत सत्य ,अहिंसा और भाईचारा वगैरह-वगैरह सभी पर लम्बी -लम्बी बातें फेंकी जा चुकी थी । आगे एक छात्रा ने बोलते हुए कहा कि आज बापू के सिद्धांत कई तरह से प्रासंगिक है । क्षमा ,दया ,प्रेम और अहिंसा के सहारे समाज को बदला जा सकता है। समाज में बढ़ते अमानवीय कृत्यों को बापू के रस्ते पर चल कर ही रोका जा सकता है । अपने गाँधी -दर्शन के प्रेम में या शायद श्रोताओं का ध्यान खींचने के लिए व्यावहारिकता को ताक पर रख कर अंत में कह गई कि अगर निठारी कांड के अभियुक्तों को छोड़ दिया जाए तो उनको सुधार जा सकता है । सुनते ही मेरे अन्दर खलबली सी मच गई ।{ मैं ठहरा, गाँधी नही गांधीवाद का विरोधी ।मेरी नजर में गाँधी एक सफल राजनेता अवश्य हैं लेकिन उनके विचारों ( उनके व्यक्तिगतachchhi aadaton को छोड़ कर) से मेरा कोई सरोकार नही है । }main भी आयोजक के पास पहुँचा और २ मिनट का समय माँगा , संयोग से मिल भी गई । मैंने कहा – में कोई शायर या विचारक नही जो शेरो-शायरी और बड़ी -बड़ी बातों /नारों सच को झूट और झूट को सच बता सकूँ । मैं तो केवल कुछ पूछना चाहता हूँ आप सब से । क्या गाँधी के विचारों के नाम पर निठारी के नर -पिशाचों को छोड़ने की भूल कर हम और हजारों सुरेन्द्र & मोनिदर सिंह पंधेर को जन्म नही देंगे ?क्या आप एक भी ऐसे देश का नाम बता सकते हैं जहाँ आज अहिंसा को राजकीय धर्म बनाया गया और वहां अपराध नही है ? नही बल्कि जिस देश में (चीन तथा अरब देशो
आदि में)जुर्म के खिलाफ कड़ी से कड़ी सज़ा का प्रावधान है अपराध भी वहीँ कम हैंहकीकत से जी मत चुराइए । एक सवाल और जानना चाहूँगा कि अगर किसी लड़की / महिला के साथ बलात्कार हो रहा हो अथवा कोशिश कि जा रही हो तब क्या वो गाँधी के तस्वीर को याद करेगी ? क्या वो एक बार बलात्कारहो जाने पर दोबारा उन दरिंदो के सामने अपने को पेश करेगी ?या फ़िर अपने बचाव में हिंसा का सहारा लेगी ? इस उदाहरण से मैंने यह साबित करना चाह कि दूसरा गाल बढ़ाने वाली गाँधी के सिद्धांत हर जगह लागु नही हो सकते । और कब तक हम गाँधी – गाँधी चिल्लाते रहेंगे ?आज देश को विश्व को नए गाँधी , नए मार्क्स की जरुरत है , नए विचारों को आगे लाना होगा ताकि हम भी आगे जा सकें ।

>भविष्य की कृषि खतरे में …..

>सभ्यता के आरभ से ही ” कृषि ” मानव की तीन जीवनदायनी आधारभूत आवश्यकताओं में से एक -भोजन की आपूर्ति के लिए अपरिहार्य बना हुआ है । कृषि के अलावा ज्ञान-विज्ञान , अध्यात्म ,चिकित्सा आदि -इत्यादि मानवीय जीवन से जुड़े हर क्षेत्र में हर दिन नव चेतना फ़ैल रही है , हर दिन कुछ नई बातें सामने आ रहीं हैं। ऐसा नही की ये सब एक दिन में हो गया बल्कि ऐसा होने में सदियाँ बीत गई । जीवन जीने की जद्दोजहद में पशुवत मांसभक्षण करने वाला मनुष्य कब शाकाहारी हो गया इसका ठीक- ठीक अनुमान लगना मुश्किल है।कालांतर में धीरे-धीरे कंदमूल खाकर भरण -पोषण करने वाला आदिमानव खेती करने लगा । सैकडों -हजारों वर्षों के मेहनत के बाद आज खेती -बड़ी अर्थात कृषि का ये उन्नत रूप हमारे समक्ष है।लेकिन आज के इस वैज्ञानिक -बाजारवादी युग में जब समूची दुनिया को एक बाज़ार बनाने की तयारी रही है , कृषि का भविष्य खतरे में दिखता है । भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहाँ ७० %आबादी खेती के सहारे जीवन गुजारा करती है, वहां सरकारी उदासीनता के कारणआज सार्वजनिक क्षेत्र की महत्वपूर्ण व्यवस्था कृषि और अन्य असंगठित रोजगारों के कामगारों की बदहाली किसी से छुपी नही । एक कलावती का नाम लेकर हमारे तथाकथित युवराज श्रीमान राहुल गाँधी और उनकी सरकार अपने कर्तव्यों से मुक्ति चाहती है। ये संभव नही । न जाने कितनी कलावती और कितने हल्कू पूस की रात में ठिठुर कर मर रहे होंगे ? पशुओं का चारा तक निगल जाने वाले नेताओ की सरकार से उम्मीद ही बेकार है। जिस पर देश की अर्तव्यवस्था टिकी है उस सार्वजनिक क्षेत्र को बहल करने को लेकर भला ये कैसे इमानदार हो सकते हैं !
सरकारी उदासीनता , विज्ञान के दुरूपयोग और ज्यादा मुनाफाखोरी की आदत ने भविष्य की खेती को दावपर लगा दिया है । संवर्धित बीजों और रासायनिक उर्वरको के माध्यम से बहुराष्ट्रीय कंपनिया किसानो को नजदीक के फायदे का सपना दिखाकर बरगला रही हैं। परंपरागत खेती में किसान अपने ही खेत के बीजो का इस्तेमाल करते थे अब अधिक पैदावार के लोभ में बाजार से ख़रीदे संवर्धित बीजो से एक बार ही खेती की जा सकती है , हालाँकि अभी भारत में ये चलन कम है । परन्तु गरीब -अनपढ़ किसानो को अभी से इस सब के बारे में जानलेना चाहिए ताकि भविष्य में सतर्क रहा जा सके । कभी हरित-क्रांति को जन्म देने वाली waigyanik पद्धति आज कृषकों और कृषि का विनाश करने पर उतारू है । पिछले ५० सालों में कृषि का जो विकास हुआ वो शायद २००० सालों में भी नही हुआ था । इस विकास का मुख्या आधार विज्ञान के ज्ञान का प्रयोग है। नई तकनीक के कारण खेती के स्वरुप में अपेक्षित बदलाव तो आया पर बाजार के बढ़ते प्रभाव ने यहाँ भी प्रतिकूल असर डाला । अपनी-अपनी दुकान चलाने में न तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों को और न ही देश के कर्णधार नेताओं को इसकी चिंता है । ऊपर से जनसँख्या का बढ़ते दवाब से कृषियोग्य भूमि पर कंक्रीट का जाल बढ़ताही जा रहा है । भूमि कम पड़ रही है ,उपज बढ़ने के दवाब में किसान अधिक से अधिक रासायनिक उर्वरको का अँधा-धुंध उपयोग करते हैं ।हमारे देश में सन ५७ में मुश्किल से दो हजार तन रासायनिकखादों और कीटनाशकों कि खपत थी जो कि बढ़ कर दो लाख तन का आंकडा छुने वाला है । परिणाम स्वरुप jamin की उर्वरा शक्ति नगण्य होती जा रही है ।घनी खेती कि वजह से पैदावार में वृद्धि तो होती है पर कई बड़ी मुश्किलें भी खड़ी है । इस समय भारत में करीब १४०० लाख हेक्टेयर धरती पर खेती हो रही है । बहुत कोशिश करने पर इसमे ४०० लाख हेक्टेयर भूमि जोड़ी जा सकती है । परन्तु इसके लिए हमें जंगलो को काटना पड़ेगा।और ऐसा करना व्यावहारिक नही है। भूमि उसर होती जा रही है, भूमिगत जलस्तर घटता जा रहा है ,वायुमंडल दूषित हो रहा है, कुल मिलकर संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि कृषि का संकट(या मानवीय जीवन पर खतरा ) गहराता जा रहा है और जिसे कोई समझने को तैयार नही । भविष्य में ऐसे यत्नों की जरुरत है जिनके द्वारा कृषि के भविष्य पर मंडराते बादलों को टला जा सके ।नई राहें खोजी जाए कि उपज भी बढे अर्थात जनसँख्या के सामने अन्न का संकट न हो और ऊपर बतलाई गई मुश्किलें भी khatm हो सके और इसके लिए तीन महत्वपूर्ण क़दमों को उठाने पर सरकार को विचार करना चाहिए । प्रथम, संवर्धित बीजों के व्यापार अथवा प्रयोग पर प्रतिबन्ध । दूसरा , रासायनिक उर्वरको और घटक कीटनाशकों के बरक्स नए विकल्पों जैसे जैविक खाद आदि को लेकर किसानो को जागरूक करना । तीसरा , अधिक से अधिक खेती लायक जमीं को बनाये रखना और ऐसा उपाय खोजना जिससे प्रति इकाई उपज को बढाया जा सके लेकिन वो उपाय सुरक्षित हो ।

>यही बहार है, दुनिया को भूल जाने की, खुशी मनाने की- लताजी का एक और मधुर गीत

>लताजी की आवाज की एक खास बात पर आपने ध्यान दिया होगा, जब वे कोई वियोग, दुखी: या दर्द भरा गीत गाती है तो उनके स्वर में बहुत दर्द सुनाई देता है मानो लता जी उस गीत के भावों को अपने मन में चित्रित कर गाती है। ठीक इसी तरह लता जी के गाये शोख, मस्ती भरे गीतों में उनके स्वरों में यही भाव साफ सुनाई देता है।
आज जो गीत मैं सुनवाने जा रहा हूँ, आप ध्यान से सुनेंगे तो पायेंगे मानों लता जी एक अल्हड़ युवती की तरह नाचती- इठलाती- मचलती हुई गा रही हों।
मैने पहले भी कहा था कि पता नहीं कैसे इतने मधुर गीत रेडियो- टीवी पर सुनाई नहीं देते! आईये आज इसी श्रेणी में बड़े दिनों के बाद लताजी का एक और मधुर और दुर्लभ गीत सुना रहा हूँ। पता नहीं लता जी के गाये इस तरह के और कितने गीत होंगे जो हमारे लिये अनसुने ही हैं।
यह गीत लताजी ने फिल्म रागरंग Raagrang (1952)के लिये गाया था। गीत को संगीत दिया है रोशन ने और गीतकार हैं कैफ़ इरफ़ानी।

http://sagarnahar.googlepages.com/player.swf

Download Link
ला ला ला लाऽ
यही बहार है, यही बहार हैऽ
यही बहार है दुनिया को भूल जाने की
खुशी मनाने की
यही घडी है जवानी के गुनगुनाने की
हाँ, मुस्कुराने की

ये प्यारे प्यारे नज़ारे ये ठंडी ठंडी हवा
ये हल्का हल्का नशा
ये काली काली घटाओं की मस्त मस्त अदा
ये कोयलों की सदा
मचल के आ गयी, रुत मस्तियाँ लुटाने की
झूम जाने की।
यही बहार हैऽऽ

कली कली से ये भंवरे ने मुस्कुरा के कहा
नज़र मिला के कहा
नज़र से काम न निकला तो गुदगुदा के कहा
गले लगा के कहा
किया है प्यार तो, किया है प्यार तोऽ
किया है प्यार तो परवा न कर ज़माने की
हँसी उडाने की
यही बहार है…

ओ ओ ओऽऽऽऽ
जो टूटता है रुबांऽऽऽऽ
जो टूटता है रुबां, उसको टूट जाने दे
मेरे शबाब को जी भर के गीत गाने दे
हाँ, गीत गाने दे-२
तड़प उठी हैं, तड़प उठी हैंऽ
तड़प उठी हैं तमन्नाएं झूम जाने की
हाँ, लगी बुझाने की

यही बहार है, दुनिया को भूल जाने की, खुशी मनाने की- लताजी का एक और मधुर गीत

लताजी की आवाज की एक खास बात पर आपने ध्यान दिया होगा, जब वे कोई वियोग, दुखी: या दर्द भरा गीत गाती है तो उनके स्वर में बहुत दर्द सुनाई देता है मानो लता जी उस गीत के भावों को अपने मन में चित्रित कर गाती है। ठीक इसी तरह लता जी के गाये शोख, मस्ती भरे गीतों में उनके स्वरों में यही भाव साफ सुनाई देता है।
आज जो गीत मैं सुनवाने जा रहा हूँ, आप ध्यान से सुनेंगे तो पायेंगे मानों लता जी एक अल्हड़ युवती की तरह नाचती- इठलाती- मचलती हुई गा रही हों।
मैने पहले भी कहा था कि पता नहीं कैसे इतने मधुर गीत रेडियो- टीवी पर सुनाई नहीं देते! आईये आज इसी श्रेणी में बड़े दिनों के बाद लताजी का एक और मधुर और दुर्लभ गीत सुना रहा हूँ। पता नहीं लता जी के गाये इस तरह के और कितने गीत होंगे जो हमारे लिये अनसुने ही हैं।
यह गीत लताजी ने फिल्म रागरंग Raagrang (1952)के लिये गाया था। गीत को संगीत दिया है रोशन ने और गीतकार हैं कैफ़ इरफ़ानी।

Download Link
ला ला ला लाऽ
यही बहार है, यही बहार हैऽ
यही बहार है दुनिया को भूल जाने की
खुशी मनाने की
यही घडी है जवानी के गुनगुनाने की
हाँ, मुस्कुराने की

ये प्यारे प्यारे नज़ारे ये ठंडी ठंडी हवा
ये हल्का हल्का नशा
ये काली काली घटाओं की मस्त मस्त अदा
ये कोयलों की सदा
मचल के आ गयी, रुत मस्तियाँ लुटाने की
झूम जाने की।
यही बहार हैऽऽ

कली कली से ये भंवरे ने मुस्कुरा के कहा
नज़र मिला के कहा
नज़र से काम न निकला तो गुदगुदा के कहा
गले लगा के कहा
किया है प्यार तो, किया है प्यार तोऽ
किया है प्यार तो परवा न कर ज़माने की
हँसी उडाने की
यही बहार है…

ओ ओ ओऽऽऽऽ
जो टूटता है रुबांऽऽऽऽ
जो टूटता है रुबां, उसको टूट जाने दे
मेरे शबाब को जी भर के गीत गाने दे
हाँ, गीत गाने दे-२
तड़प उठी हैं, तड़प उठी हैंऽ
तड़प उठी हैं तमन्नाएं झूम जाने की
हाँ, लगी बुझाने की

>बाप के बाद बेटा फ़िर पोता ……………………………….

>

लोकतंत्र मूर्खों का शासन होता है पर, यहाँ तो मूर्खों ने लोकतंत्र को हीं राजशाही की ओर ठेल दिया है। राजतन्त्र नहीं तो और क्या है ? गाँधी, सिंधिया, पायलट, ओबेदुल्लाह जैसे खानदान ही शासन में बचे हैं। ये तो चंद बड़े नाम हैं छोटे-छोटे स्तरपर भी कई मंत्री -सन्तरी भी बाप दादा की कुर्सी जोग रहें है। आज भी तो वही हो रहा है ,पहले ताजपोशी होती थी अब प्रक्रिया थोडी बदल गई है । सेवानिवृत होते-होते राजनेता अपने उतराधिकारी(भाई-बंधुओं) को मूर्खों की सभा में भेजते हैं ,जहाँ उनको तथाकथित छद्म लोकतान्त्रिक तरीकों से चुना जाता है

लोकतंत्र के मंदिरों में बाप,बाप के बाद बेटा, फ़िर पोता ! राजनीती का खून तो जैसे इनकी धमनियों में दौड़ता है । एक साथ दो -तीन पीढियां सत्ता का रसास्वादन कर रहीं हैं। सरकार से भी बुरे हालात हैं राजनितिक दलों के , वहां तो बगैर चुनावी ढोंग अपनाए ही वंशवादी नेतृत्व का बोझ कार्यकर्ताओं के कन्धों पर सौंप दिया जाता है । परिवारवाद के अलावा अपराधीकरण की समस्या ने सियासत के तालाव को और भी गन्दा कर दिया है । एक समय था जब नेताजी अपने कुर्सी बचाए रखने के लिए गुंडे पालने लगे । धीरे -धीरे भूमंडलीकरण के बढ़ते प्रभाव ने गुंडों की समझ भी बढाईऔर वे भी सोचने लगे – भाई ,,जब इनकी जीत हम सुनिश्चित करते हैं तो क्यूँ न नेतागिरी का शुभ कर्म भी ख़ुद से किया जाए ?सामाजिक दायरा भी बढेगा और पुलिस का भय भी ख़त्म । इस तरह” राजनीती का अपराधीकरण ,अपराध के राजनीतिकरण ” में बदल चुका है। वो कहते हैं न , आटे में नमक मिलाना पर यहाँ तो नमक में आटा मिलाने का रिवाज है।

>हिन्दुओं और मुसलमानों को यहूदियों से सीखना चाहिये… (भाग-2)

>Muslims-Hindus Take a Lesson from Jews

इस लेख के पहले भाग का मकसद सिर्फ़ यहूदियों का गुणगान करना नहीं है, बल्कि यह सोचना है कि आखिर यहूदी इतने शक्तिशाली, बुद्धिमान और मेधावी क्यों हैं? ध्यान से सोचने पर उत्तर मिलता है – “शिक्षा”। इतनी विशाल जनसंख्या और दुनिया के सबसे मुख्य ऊर्जा स्रोत पेट्रोल पर लगभग एकतरफ़ा कब्जा होने के बावजूद मुसलमान इतने कमजोर और पिछड़े हुए क्यों हैं? ऑर्गेनाईज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉन्फ़्रेंस यानी OIC के 57 सदस्य देश हैं, उन सभी 57 देशों में कुल मिलाकर 600 विश्वविद्यालय हैं, यानी लगभग तीस लाख मुसलमानों पर एक विश्वविद्यालय। अमेरिका में लगभग 6000 विश्वविद्यालय हैं और भारत में लगभग 9000। सन् 2004 में एक सर्वे किया गया था, जिसमें से टॉप 500 विश्वविद्यालयों की सूची में मुस्लिम देशों की एक भी यूनिवर्सिटी अपना स्थान नहीं बना सकी। संयुक्त राष्ट्र से सम्बन्धित एक संस्था UNDP ने जो डाटा एकत्रित किया है उसके मुताबिक ईसाई बहुल देशों में साक्षरता दर 90% से अधिक है और 15 से अधिक ईसाई देश ऐसे हैं जहाँ साक्षरता दर 100% है। दूसरी तरफ़ सभी मुस्लिम देशों में कुल साक्षरता दर 40% के आसपास है, और 57 मुस्लिम देशों में एक भी देश या राज्य ऐसा नहीं है जहाँ की साक्षरता दर 100% हो (हमारे यहाँ सिर्फ़ केरल में 90% के आसपास है)। साक्षरता के पैमाने के अनुसार ईसाई देशों में लगभग 40% साक्षर विश्वविद्यालय तक पहुँच जाते हैं जबकि मुस्लिम देशों में यही दर सिर्फ़ 2% है। मुस्लिम देशों में प्रति दस लाख व्यक्तियों पर 230 वैज्ञानिक हैं, जबकि अमेरिका में यह संख्या 4000 और जापान में 5000 है। मुस्लिम देश अपनी कुल आय (GDP) का सिर्फ़ 0.2 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करते हैं, जबकि ईसाई और यहूदी 5% से भी ज्यादा।

एक और पैमाना है प्रति 1000 व्यक्ति अखबारों और पुस्तकों का। पाकिस्तान में प्रति हजार व्यक्तियों पर कुल 23 अखबार हैं, जबकि सिंगापुर जैसे छोटे से देश में यह संख्या 375 है। प्रति दस लाख व्यक्तियों पर पुस्तकों की संख्या अमेरिका में 2000 और मिस्त्र में 20 है। उच्च तकनीक उत्पादों के निर्यात को यदि पैमाना मानें पाकिस्तान से इनका निर्यात कुल निर्यात का सिर्फ़ 1.5 प्रतिशत है, सऊदी अरब से निर्यात 0.3% और सिंगापुर से 58% है।

निष्कर्ष निकालते समय मुसलमानों की बात बाद में करेंगे, पहले हमें अपनी गिरेबान में झाँकना चाहिये। 1945 में दो अणु बम झेलने और विश्व बिरादरी से लगभग अलग-थलग पड़े जापान और लगभग हमारे साथ ही आजाद हुए इज़राइल आज शिक्षा के क्षेत्र में भारत के मुकाबले बहुत-बहुत आगे हैं। आजादी के साठ सालों से अधिक के समय में भारत में प्राथमिक शिक्षा का स्तर और स्कूलों की संख्या जिस रफ़्तार से बढ़ना चाहिये थी वह नहीं बढ़ाई गई। आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कृति के मेल से जो शिक्षा पैदा होना चाहिये वह जानबूझकर नहीं दी गई, आज भी स्कूलों में मुगलों और अंग्रेजों को महान दर्शाने वाले पाठ्यक्रम ही पढ़ाये जाते हैं, बचपन से ही ब्रेन-वॉश करके यह बताने की कोशिश होती है कि भारतीय संस्कृति नाम की कोई बात न कभी थी, न है। शुरु से ही बच्चों को “अपनी जड़ों” से काटा जाता है, ऐसे में पश्चिम की दुनिया को जिस प्रकार के “पढ़े-लिखे नौकर” चाहिये थे वैसे ही पैदा हो रहे हैं, और यहाँ से देश छोड़कर जा रहे हैं।

भारत के लोग आज भी वही पुराना राग अलापते रहते हैं कि “हमने शून्य का आविष्कार किया, हमने शतरंज का आविष्कार किया, हमने ये किया था, हमारे वेदों में ये है, हमारे ग्रंथों में वो है, हमने दुनिया को आध्यात्म सिखाया, हमने दुनिया को अहिंसा का संदेश दिया, हम विश्व-गुरु हैं… आदि-आदि। हकीकत यह है कि गीता के “कर्म” के सिद्धान्त को जपने वाले देश के अधिकांश लोग खुद ही सबसे अकर्मण्य हैं, भ्रष्ट हैं, अनुशासनहीन और अनैतिक हैं। लफ़्फ़ाजी को छोड़कर साफ़-साफ़ ये नहीं बताते कि सन् 1900 से लेकर 2000 के सौ सालों में भारत का विश्व के लिये और मानवता को क्या योगदान है? जिन आईआईएम और आईआईटी का ढिंढोरा पीटते हम नहीं थकते, वे विश्व स्तर पर कहाँ हैं, भारत से बाहर निकलने के बाद ही युवा प्रतिभाएं अपनी बुद्धिमत्ता और मेधा क्यों दिखा पाती हैं? लेकिन हम लोग सदा से ही “शतुरमुर्ग” रहे हैं, समस्याओं और प्रश्नों का डटकर सामना करने की बजाय हम हमेशा ऊँची-नीची आध्यात्मिक बातें करके पलायन का रास्ता अपना लेते हैं (ताजा उदाहरण मुम्बई हमले का है, जहाँ दो महीने बीत जाने बाद भी हम दूसरों का मुँह देख रहे हैं, मोमबत्तियाँ जला रहे हैं, गाने गा रहे हैं, हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं, भाषण दे रहे हैं, आतंकवाद के खिलाफ़ शपथ दिलवा रहे हैं, गरज यह कि “कर्म” छोड़कर सब कुछ कर रहे हैं)। हमारी मूल समस्या यह है कि “राष्ट्र” की अवधारणा ही जनता के दिमाग में साफ़ नहीं है, साठ सालों से शिक्षा प्रणाली भी एक “कन्फ़्यूजन” की धुंध में है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज तक हम “हिन्दू” नहीं बन पाये हैं, यानी जैसे यहूदी सिर्फ़ और सिर्फ़ यहूदी है चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में हो, जबकि हम ब्राह्मण हैं, बनिये हैं, ठाकुर हैं, दलित हैं, उत्तर वाले हैं, दक्षिण वाले हैं, सब कुछ हैं लेकिन “हिन्दू” नहीं हैं। हालांकि मूलभूत शिक्षा और तकनीकी के मामले में हम इस्लामिक देशों से काफ़ी आगे हैं, लेकिन क्या हम उनसे तुलना करके खुश होना चाहिये? तुलना करना है तो अपने से ज्यादा, अपने से बड़े से करनी चाहिये…

संक्षेप में इन सब आँकड़ों से क्या निष्कर्ष निकलता है… कि मुस्लिम देश इसलिये पिछड़े हैं क्योंकि वे शिक्षा में पिछड़े हुए हैं, वे अपनी जनसंख्या को आधुनिक शिक्षा नहीं दिलवा पाते, वे “ज्ञान” आधारित उत्पाद पैदा करने में अक्षम हैं, वे ज्ञान को अपनी अगली पीढ़ियों में पहुँचाने और नौनिहालों को पढ़ाने की बजाय हमेशा यहूदियों, ईसाईयों और हिन्दुओं को अपनी दुर्दशा का जिम्मेदार ठहराते रहते हैं। सारा दिन अल्लाह और खुदा चीखने से कुछ नहीं होगा, शिविर लगाकर जेहादी पैदा करने की बजाय शिक्षा का स्तर बढ़ाना होगा, हवाई जहाज अपहरण और ओलम्पिक में खिलाड़ियों की हत्या करवाने की बजाय अधिक से अधिक बच्चों और युवाओं को शिक्षा देने का प्रयास होना चाहिये। सारी दुनिया में इस्लाम का ही राज होगा, अल्लाह सिर्फ़ एक है, बाकी के मूर्तिपूजक काफ़िर हैं जैसी सोच छोड़कर वैज्ञानिक सोच अपनानी होगी। सभी मुस्लिम देशों को खुद से सवाल करना चाहिये कि मानव जीवन और मानवता के लिये उन्होंने क्या किया है? उसके बाद उन्हें दूसरों से इज्जत हासिल करने की अपेक्षा करना चाहिये। इजराईल और फ़िलीस्तीन के बीच चल रहे युद्ध और समूचे विश्व में छाये हुए आतंकवाद के मद्देनज़र बेंजामिन नेतान्याहू की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि “यदि अरब और मुसलमान अपने हथियार रख दें तो हिंसा खत्म हो जायेगी और यदि यहूदियों ने अपने हथियार रख दिये तो इज़राइल खत्म हो जायेगा…”।

[सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ फ़ारुख सलीम (फ़्री लांस पत्रकार, इस्लामाबाद)]

, , , , , , , ,

हिन्दुओं और मुसलमानों को यहूदियों से सीखना चाहिये… (भाग-2)

Muslims-Hindus Take a Lesson from Jews

इस लेख के पहले भाग का मकसद सिर्फ़ यहूदियों का गुणगान करना नहीं है, बल्कि यह सोचना है कि आखिर यहूदी इतने शक्तिशाली, बुद्धिमान और मेधावी क्यों हैं? ध्यान से सोचने पर उत्तर मिलता है – “शिक्षा”। इतनी विशाल जनसंख्या और दुनिया के सबसे मुख्य ऊर्जा स्रोत पेट्रोल पर लगभग एकतरफ़ा कब्जा होने के बावजूद मुसलमान इतने कमजोर और पिछड़े हुए क्यों हैं? ऑर्गेनाईज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉन्फ़्रेंस यानी OIC के 57 सदस्य देश हैं, उन सभी 57 देशों में कुल मिलाकर 600 विश्वविद्यालय हैं, यानी लगभग तीस लाख मुसलमानों पर एक विश्वविद्यालय। अमेरिका में लगभग 6000 विश्वविद्यालय हैं और भारत में लगभग 9000। सन् 2004 में एक सर्वे किया गया था, जिसमें से टॉप 500 विश्वविद्यालयों की सूची में मुस्लिम देशों की एक भी यूनिवर्सिटी अपना स्थान नहीं बना सकी। संयुक्त राष्ट्र से सम्बन्धित एक संस्था UNDP ने जो डाटा एकत्रित किया है उसके मुताबिक ईसाई बहुल देशों में साक्षरता दर 90% से अधिक है और 15 से अधिक ईसाई देश ऐसे हैं जहाँ साक्षरता दर 100% है। दूसरी तरफ़ सभी मुस्लिम देशों में कुल साक्षरता दर 40% के आसपास है, और 57 मुस्लिम देशों में एक भी देश या राज्य ऐसा नहीं है जहाँ की साक्षरता दर 100% हो (हमारे यहाँ सिर्फ़ केरल में 90% के आसपास है)। साक्षरता के पैमाने के अनुसार ईसाई देशों में लगभग 40% साक्षर विश्वविद्यालय तक पहुँच जाते हैं जबकि मुस्लिम देशों में यही दर सिर्फ़ 2% है। मुस्लिम देशों में प्रति दस लाख व्यक्तियों पर 230 वैज्ञानिक हैं, जबकि अमेरिका में यह संख्या 4000 और जापान में 5000 है। मुस्लिम देश अपनी कुल आय (GDP) का सिर्फ़ 0.2 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करते हैं, जबकि ईसाई और यहूदी 5% से भी ज्यादा।

एक और पैमाना है प्रति 1000 व्यक्ति अखबारों और पुस्तकों का। पाकिस्तान में प्रति हजार व्यक्तियों पर कुल 23 अखबार हैं, जबकि सिंगापुर जैसे छोटे से देश में यह संख्या 375 है। प्रति दस लाख व्यक्तियों पर पुस्तकों की संख्या अमेरिका में 2000 और मिस्त्र में 20 है। उच्च तकनीक उत्पादों के निर्यात को यदि पैमाना मानें पाकिस्तान से इनका निर्यात कुल निर्यात का सिर्फ़ 1.5 प्रतिशत है, सऊदी अरब से निर्यात 0.3% और सिंगापुर से 58% है।

निष्कर्ष निकालते समय मुसलमानों की बात बाद में करेंगे, पहले हमें अपनी गिरेबान में झाँकना चाहिये। 1945 में दो अणु बम झेलने और विश्व बिरादरी से लगभग अलग-थलग पड़े जापान और लगभग हमारे साथ ही आजाद हुए इज़राइल आज शिक्षा के क्षेत्र में भारत के मुकाबले बहुत-बहुत आगे हैं। आजादी के साठ सालों से अधिक के समय में भारत में प्राथमिक शिक्षा का स्तर और स्कूलों की संख्या जिस रफ़्तार से बढ़ना चाहिये थी वह नहीं बढ़ाई गई। आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कृति के मेल से जो शिक्षा पैदा होना चाहिये वह जानबूझकर नहीं दी गई, आज भी स्कूलों में मुगलों और अंग्रेजों को महान दर्शाने वाले पाठ्यक्रम ही पढ़ाये जाते हैं, बचपन से ही ब्रेन-वॉश करके यह बताने की कोशिश होती है कि भारतीय संस्कृति नाम की कोई बात न कभी थी, न है। शुरु से ही बच्चों को “अपनी जड़ों” से काटा जाता है, ऐसे में पश्चिम की दुनिया को जिस प्रकार के “पढ़े-लिखे नौकर” चाहिये थे वैसे ही पैदा हो रहे हैं, और यहाँ से देश छोड़कर जा रहे हैं।

भारत के लोग आज भी वही पुराना राग अलापते रहते हैं कि “हमने शून्य का आविष्कार किया, हमने शतरंज का आविष्कार किया, हमने ये किया था, हमारे वेदों में ये है, हमारे ग्रंथों में वो है, हमने दुनिया को आध्यात्म सिखाया, हमने दुनिया को अहिंसा का संदेश दिया, हम विश्व-गुरु हैं… आदि-आदि। हकीकत यह है कि गीता के “कर्म” के सिद्धान्त को जपने वाले देश के अधिकांश लोग खुद ही सबसे अकर्मण्य हैं, भ्रष्ट हैं, अनुशासनहीन और अनैतिक हैं। लफ़्फ़ाजी को छोड़कर साफ़-साफ़ ये नहीं बताते कि सन् 1900 से लेकर 2000 के सौ सालों में भारत का विश्व के लिये और मानवता को क्या योगदान है? जिन आईआईएम और आईआईटी का ढिंढोरा पीटते हम नहीं थकते, वे विश्व स्तर पर कहाँ हैं, भारत से बाहर निकलने के बाद ही युवा प्रतिभाएं अपनी बुद्धिमत्ता और मेधा क्यों दिखा पाती हैं? लेकिन हम लोग सदा से ही “शतुरमुर्ग” रहे हैं, समस्याओं और प्रश्नों का डटकर सामना करने की बजाय हम हमेशा ऊँची-नीची आध्यात्मिक बातें करके पलायन का रास्ता अपना लेते हैं (ताजा उदाहरण मुम्बई हमले का है, जहाँ दो महीने बीत जाने बाद भी हम दूसरों का मुँह देख रहे हैं, मोमबत्तियाँ जला रहे हैं, गाने गा रहे हैं, हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं, भाषण दे रहे हैं, आतंकवाद के खिलाफ़ शपथ दिलवा रहे हैं, गरज यह कि “कर्म” छोड़कर सब कुछ कर रहे हैं)। हमारी मूल समस्या यह है कि “राष्ट्र” की अवधारणा ही जनता के दिमाग में साफ़ नहीं है, साठ सालों से शिक्षा प्रणाली भी एक “कन्फ़्यूजन” की धुंध में है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज तक हम “हिन्दू” नहीं बन पाये हैं, यानी जैसे यहूदी सिर्फ़ और सिर्फ़ यहूदी है चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में हो, जबकि हम ब्राह्मण हैं, बनिये हैं, ठाकुर हैं, दलित हैं, उत्तर वाले हैं, दक्षिण वाले हैं, सब कुछ हैं लेकिन “हिन्दू” नहीं हैं। हालांकि मूलभूत शिक्षा और तकनीकी के मामले में हम इस्लामिक देशों से काफ़ी आगे हैं, लेकिन क्या हम उनसे तुलना करके खुश होना चाहिये? तुलना करना है तो अपने से ज्यादा, अपने से बड़े से करनी चाहिये…

संक्षेप में इन सब आँकड़ों से क्या निष्कर्ष निकलता है… कि मुस्लिम देश इसलिये पिछड़े हैं क्योंकि वे शिक्षा में पिछड़े हुए हैं, वे अपनी जनसंख्या को आधुनिक शिक्षा नहीं दिलवा पाते, वे “ज्ञान” आधारित उत्पाद पैदा करने में अक्षम हैं, वे ज्ञान को अपनी अगली पीढ़ियों में पहुँचाने और नौनिहालों को पढ़ाने की बजाय हमेशा यहूदियों, ईसाईयों और हिन्दुओं को अपनी दुर्दशा का जिम्मेदार ठहराते रहते हैं। सारा दिन अल्लाह और खुदा चीखने से कुछ नहीं होगा, शिविर लगाकर जेहादी पैदा करने की बजाय शिक्षा का स्तर बढ़ाना होगा, हवाई जहाज अपहरण और ओलम्पिक में खिलाड़ियों की हत्या करवाने की बजाय अधिक से अधिक बच्चों और युवाओं को शिक्षा देने का प्रयास होना चाहिये। सारी दुनिया में इस्लाम का ही राज होगा, अल्लाह सिर्फ़ एक है, बाकी के मूर्तिपूजक काफ़िर हैं जैसी सोच छोड़कर वैज्ञानिक सोच अपनानी होगी। सभी मुस्लिम देशों को खुद से सवाल करना चाहिये कि मानव जीवन और मानवता के लिये उन्होंने क्या किया है? उसके बाद उन्हें दूसरों से इज्जत हासिल करने की अपेक्षा करना चाहिये। इजराईल और फ़िलीस्तीन के बीच चल रहे युद्ध और समूचे विश्व में छाये हुए आतंकवाद के मद्देनज़र बेंजामिन नेतान्याहू की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि “यदि अरब और मुसलमान अपने हथियार रख दें तो हिंसा खत्म हो जायेगी और यदि यहूदियों ने अपने हथियार रख दिये तो इज़राइल खत्म हो जायेगा…”।

[सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ फ़ारुख सलीम (फ़्री लांस पत्रकार, इस्लामाबाद)]

, , , , , , , ,

>मिट्टी की सौंधी खुशबू वाले मेरे पसन्दीदा गीत (भाग-2)

>दिन भर की थकान उतारने के लिये, दुनियादारी के झंझटों से मुक्त होकर, गाँव की चौपाल पर रात के वक्त, मुक्त कण्ठ से जो गीत गाये जाते हैं उनमें से यह एक है। जी करता है कि बस चार-छः “सहज-सीधे” दोस्तों की महफ़िल सजी हुई हो, कहीं से एक ढोलकी मिल जाये और यह गीत कम से कम 20 बार गाया जाये तब जाकर कहीं आत्मा तृप्त हो… ऐसा अदभुत गीत है यह… गीत के बारे में विस्तार से पढ़िये, सुनिये और देखिये सागर भाई की महफ़िल में… यहाँ चटका लगायें…

« Older entries