>बाप के बाद बेटा फ़िर पोता ……………………………….

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लोकतंत्र मूर्खों का शासन होता है पर, यहाँ तो मूर्खों ने लोकतंत्र को हीं राजशाही की ओर ठेल दिया है। राजतन्त्र नहीं तो और क्या है ? गाँधी, सिंधिया, पायलट, ओबेदुल्लाह जैसे खानदान ही शासन में बचे हैं। ये तो चंद बड़े नाम हैं छोटे-छोटे स्तरपर भी कई मंत्री -सन्तरी भी बाप दादा की कुर्सी जोग रहें है। आज भी तो वही हो रहा है ,पहले ताजपोशी होती थी अब प्रक्रिया थोडी बदल गई है । सेवानिवृत होते-होते राजनेता अपने उतराधिकारी(भाई-बंधुओं) को मूर्खों की सभा में भेजते हैं ,जहाँ उनको तथाकथित छद्म लोकतान्त्रिक तरीकों से चुना जाता है

लोकतंत्र के मंदिरों में बाप,बाप के बाद बेटा, फ़िर पोता ! राजनीती का खून तो जैसे इनकी धमनियों में दौड़ता है । एक साथ दो -तीन पीढियां सत्ता का रसास्वादन कर रहीं हैं। सरकार से भी बुरे हालात हैं राजनितिक दलों के , वहां तो बगैर चुनावी ढोंग अपनाए ही वंशवादी नेतृत्व का बोझ कार्यकर्ताओं के कन्धों पर सौंप दिया जाता है । परिवारवाद के अलावा अपराधीकरण की समस्या ने सियासत के तालाव को और भी गन्दा कर दिया है । एक समय था जब नेताजी अपने कुर्सी बचाए रखने के लिए गुंडे पालने लगे । धीरे -धीरे भूमंडलीकरण के बढ़ते प्रभाव ने गुंडों की समझ भी बढाईऔर वे भी सोचने लगे – भाई ,,जब इनकी जीत हम सुनिश्चित करते हैं तो क्यूँ न नेतागिरी का शुभ कर्म भी ख़ुद से किया जाए ?सामाजिक दायरा भी बढेगा और पुलिस का भय भी ख़त्म । इस तरह” राजनीती का अपराधीकरण ,अपराध के राजनीतिकरण ” में बदल चुका है। वो कहते हैं न , आटे में नमक मिलाना पर यहाँ तो नमक में आटा मिलाने का रिवाज है।

1 Comment

  1. Mired Mirage said,

    January 29, 2009 at 10:12 am

    >समस्या तो गंभीर है।घुघूती बासूती


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