>कंधार के शर्मनाक समर्पण के पीछे का सच, और देश का आभिजात्य वर्ग…

>Kandhar Hijack Indian Society and BJP

हाल ही में गृहमंत्री चिदम्बरम ने एक सेमिनार में कहा कि “कंधार घटना के वक्त कांग्रेस क्या करती” यह कहना बेहद मुश्किल है, क्योंकि वह स्थिति पेचीदा थी और उसमें कई प्रकार की भावनायें भी शामिल थीं, लेकिन इस सवाल से वे कन्नी काट गये कि क्या एनडीए द्वारा आतंकवादियों को छोड़ने के फ़ैसले में कांग्रेस भी शामिल नहीं थी?

आजादी के बाद भारत में सैकड़ों हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो चुके हैं, और स्वाभाविक तौर पर लगभग सभी दंगे कांग्रेस शासित राज्यों में ही हुए हैं, लेकिन जिस तरह अकेले ईसा मसीह को सलीब ढोने पर मजबूर किया गया था, उसी तरह से गुजरात के 2002 के दंगों के लिये अकेले नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदार मानकर मीडिया, सेकुलरों की गैंग(?) और तथाकथित पढ़े-लिखे लोग “रुदाली” बने हुए हैं, इस मानसिकता को सिर्फ़ “घृणित” कहना उचित नहीं है इसके लिये कोई और शब्द खोजना पड़ेगा… (इस विशेषण को नरेन्द्र मोदी और ईसा मसीह की तुलना नहीं माना जाये बल्कि उन पर पत्थर फ़ेंकने वाली हजारों मूर्खों की भीड़ पर कटाक्ष समझा जाये, जो आसानी से भारत के इतिहास के सभी दंगो को भुला चुकी है, जबकि गुजरात के दंगों को “बन्दरिया के मरे हुए बच्चे की तरह छाती से चिपकाए” हुए हैं…… मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताने भर से जिस प्रकार कई वरिष्ठ पत्रकारों(?), सेकुलरों(?) और वरिष्ठ ब्लॉगरों(?) के “पेट में मरोड़” उठी उस पर अलग से एक लेख लिखूँगा ही, लेकिन फ़िलहाल इस लेख का विषय मोदी नहीं है)… इसी प्रकार जब कभी आतंकवादियों से बातचीत या कोई समझौता होने की बात आती है तो तत्काल एनडीए के कंधे पर “कंधार” की सलीब रख दी जाती है… हालांकि कंधार की घटना और उसके बाद आतंकवादियों को छोड़ने का जो कृत्य एनडीए ने किया था उसे कभी माफ़ किया ही नहीं जा सकता (भाजपा के कट्टर से कट्टर समर्थक भी इस घटना के लिये पार्टी नेतृत्व को दोषी मानते हैं, और ध्यान रखें कि इस प्रकार की भावनाएं कांग्रेसियों में नहीं पाई जाती कि वे अपने नेतृत्व को सरेआम दोषी बतायें, खुद भाजपा वाले कंधार को अमिट कलंक मानते हैं, जबकि कांग्रेसी, सिख विरोधी दंगों और आपातकाल को भी कलंक नहीं मानते…) कहने का मतलब यह कि कंधार प्रकरण में जो भी हुआ शर्मनाक तो था ही, लेकिन इस विकट निर्णय के पीछे की घटनायें हमारे देश के “आभिजात्य वर्ग” का असली चेहरा सामने रखती हैं, (आभिजात्य वर्ग इसलिये कि नौ साल पहले एयरलाइंस में अमूमन आभिजात्य वर्ग के लोग ही सफ़र करते थे, आजकल मध्यमवर्ग की भी उसमें घुसपैठ हो गई है)… आईये देखते हैं कि कंधार प्रकरण के दौरान पर्दे के पीछे क्या-क्या हुआ, जिसके कारण भाजपा के माथे पर एक अमिट कलंक लग गया…। ऐसा नहीं है कि महान भारत के सार्वजनिक अपमान की घटनायें कांग्रेसियों के राज में नहीं हुईं, हजरत बल, चरारे-शरीफ़ प्रकरण हो या महबूबा मुफ़्ती के नकली अपहरण का मामला हो, कोई न कोई कांग्रेसी उसमें अवश्य शामिल रहा है (वीपी सिंह भी कांग्रेसी संस्कृति के ही थे), लेकिन कंधार का अपहरण प्रकरण हमेशा मीडिया में छाया रहता है और ले-देकर समूचा मीडिया, भाजपा-एनडीए के माथे पर ठीकरा फ़ोड़ता रहता है।

जिस वक्त काठमाण्डू-दिल्ली हवाई उड़ान सेवा IC814 का अपहरण हो चुका था, प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी दिल्ली से बाहर अपने तय दौरे पर थे। जब उनका विमान दिल्ली लौट रहा था उस समय विमान के एयरफ़ोर्स के पायलट को अपहरण की सूचना दी गई थी। चूंकि विमान हवा में था इसलिये वाजपेयी को इस घटना के बारे में तुरन्त नहीं बताया गया (जो कि बाद में विवाद का एक कारण बना)। जब शाम 7 बजे प्रधानमंत्री का विमान दिल्ली पहुँचा तब तक IC-814 के अपहरण के 1 घण्टा चालीस मिनट बीत चुके थे। वाजपेयी को हवाई अड्डे पर लेने पहुँचे थे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र, जिन्होंने तत्काल वाजपेयी को एक कोने में ले जाकर सारी स्थिति समझाई। सभी अपहरणकर्ताओं की पहचान स्थापित हो चुकी थी, वे थे इब्राहीम अतहर (निवासी बहावलपुर), शाहिद अख्तर सईद, गुलशन इकबाल (कराची), सनी अहमद काजी (डिफ़ेंस कालोनी, कराची), मिस्त्री जहूर आलम (अख्तर कालोनी, कराची), और शाकिर (सक्खर सिटी)। विमान में उस वक्त 189 यात्री सवार थे।

प्रधानमंत्री निवास पर तत्काल एक उच्च स्तरीय समिति की मीटिंग हुई, जिसमें हालात का जायजा लिया गया, वाजपेयी ने तत्काल अपने निजी स्टाफ़ को अपने जन्मदिन (25 दिसम्बर) के उपलक्ष्य में आयोजित सभी कार्यक्रम निरस्त करने के निर्देश जारी किये। उसी समय सूचना मिली कि हवाई जहाज को लाहौर में उतरने की इजाजत नहीं दी गई है, इसलिये हवाई जहाज पुनः अमृतसर में उतरेगा। अमृतसर में विमान लगभग 45 मिनट खड़ा रहा और अपहर्ता विभिन्न अधिकारियों को उसमें तेल भरने हेतु धमकाते रहे, और अधिकारी “सिर कटे चिकन” की तरह इधर-उधर दौड़ते रहे, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि इस स्थिति से निपटने के लिये क्या करना चाहिये। प्रधानमंत्री कार्यालय से राजा सांसी हवाई अड्डे पर लगातार फ़ोन जा रहे थे कि किसी भी तरह से हवाई जहाज को अमृतसर में रोके रखो…एक समय तो पूर्व सैनिक जसवन्त सिंह ने फ़ोन छीनकर चिल्लाये कि “कोई भारी ट्रक या रोड रोलर को हवाई पट्टी पर ले जाकर खड़ा कर दो…”, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ। NSG कमाण्डो को अलर्ट रहने का निर्देश दिया जा चुका था, लेकिन 45 मिनट तक अमृतसर में खड़े होने के बावजूद NSG के कमाण्डो उस तक नहीं पहुँच सके। इसके पीछे दो बातें सामने आईं, पहली कि NSG कमाण्डो को अमृतसर ले जाने के लिये सही समय पर विमान नहीं मिल सका, और दूसरी कि मानेसर से दिल्ली पहुँचने के दौरान NSG कमाण्डो ट्रैफ़िक जाम में फ़ँस गये थे, सचाई किसी को नहीं पता कि आखिर क्या हुआ था।

अपहर्ता NSG कमाण्डो से भयभीत थे इसलिये उन्होंने पायलट और यात्रियों पर दबाव बनाने के लिये रूपेन कत्याल की हत्या कर दी और लगभग खाली पेट्रोल टैंक सहित हवाई जहाज को लाहौर ले गये। लाहौर में पुनः उन्हें उतरने की अनुमति नहीं दी गई, यहाँ तक कि हवाई पट्टी की लाईटें भी बुझा दी गईं, लेकिन पायलट ने कुशलता और सावधानी से फ़िर भी हवाई जहाज को जबरन लाहौर में उतार दिया। जसवन्त सिंह ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री से बात की कि हवाई जहाज को लाहौर से न उड़ने दिया जाये, लेकिन पाकिस्तानी अधिकारी जानबूझकर मामले से दूरी बनाना चाहते थे, ताकि बाद में वे इससे सम्बन्ध होने से इन्कार कर सकें। वे यह भी नहीं चाहते थे कि लाहौर में NSG के कमाण्डो कोई ऑपरेशन करें, इसलिये उन्होंने तुरन्त हवाई जहाज में पेट्रोल भर दिया और उसे दुबई रवाना कर दिया। दुबई में भी अधिकारियों ने हवाई जहाज को उतरने नहीं दिया। जसवन्त सिंह लगातार फ़ोन पर बने हुए थे, उन्होंने यूएई के अधिकारियों से बातचीत करके अपहर्ताओं से 13 औरतों और 11 बच्चों को विमान से उतारने के लिये राजी कर लिया। रूपेन कत्याल का शव भी साथ में उतार लिया गया, जबकि उनकी नवविवाहिता पत्नी अन्त तक बन्धक रहीं और उन्हें बाद में ही पता चला कि वे विधवा हो चुकी हैं।

25 दिसम्बर की सुबह – विमान कंधार हवाई अड्डे पर उतर चुका है, जहाँ कि एक टूटा-फ़ूटा हवाई अड्डा और पुरानी सी घटिया विमान कंट्रोल प्रणाली है, न पानी है, न ही बिजली है (तालिबान के शासन की एक उपलब्धि)। 25 दिसम्बर की दोपहर से अचानक ही चारों ओर से प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री निवास और कार्यालय के बाहर जमा होने लगे, छाती पीटने लगे, कपड़े फ़ाड़ने लगे, नारे लगाने लगे, प्रधानमंत्री हाय-हाय, हमारे आदमियों को बचाओ… जैसे-जैसे दिन बीतता गया भीड़ और नारे बढ़ते ही गये। अमृतसर, लाहौर और दुबई में निराशा झेलने के बाद सरकार अपनी कोशिशों में लगी थी कि किसी तरह से अपहर्ताओं से पुनः सही सम्पर्क स्थापित हो सके, जबकि 7 रेसकोर्स रोड के बाहर अपहृत परिवारों के सदस्यों के साथ वृन्दा करात सबसे आगे खड़ी थीं। मुफ़्ती प्रकरण का हवाला दे-देकर मीडिया ने पहले दिन से ही आतंकवादियों की मांगें मानकर “जो भी कीमत चुकानी पड़े… बन्धकों को छुड़ाना चाहिये” का राग अलापना शुरु कर दिया था…

मुल्ला उमर और उसके विदेशमंत्री(?) मुत्तवकील से बातचीत शुरु हो चुकी थी और शुरुआत में उन्होंने विभिन्न भारतीय जेलों में बन्द 36 आतंकवादियों को छोड़ने की माँग रखी। मीडिया के दबाव के चलते एक भी वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री अपहृत व्यक्तियों के परिजनों से मिलने को तैयार नहीं था, लेकिन जसवन्त सिंह हिम्मत करके उनसे मिलने गये, तत्काल सभी लोगों ने उन्हें बुरी तरह से घेर लिया और उनके एक वाक्य भी कहने से पहले ही, “हमें हमारे रिश्तेदार वापस चाहिये…”, “आतंकवादियों को क्या चाहिये इससे हमें क्या मतलब…”, “चाहे आप कश्मीर भी उन्हें दे दो, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता…”, “मेरा बेटा है, मेरी बहू है, मेरा पति है उसमें…” आदि की चिल्लाचोट शुरु कर दी गई, जबकि जसवन्त सिंह उन्हें स्थिति की जानकारी देने गये थे कि हम बातचीत कर रहे हैं। जसवन्त सिंह ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि देशहित में जेल में बन्द आतंकवादियों को छोड़ना ठीक नहीं है, लेकिन भीड़ में से एक व्यक्ति चिल्लाया “भाड़ में जाये देश और देश का हित…”। इसके बाद जसवन्त सिंह मीडिया के लिये शास्त्री भवन में आयोजित प्रेस कांफ़्रेस में आये, लेकिन वहाँ भी नाटकीय ढंग से भीड़ घुस आई, जिसका नेतृत्व संजीव छिब्बर नाम के विख्यात सर्जन कर रहे थे। उनका कहना था कि उनके 6 परिजन हवाई जहाज में हैं, डॉ छिब्बर का कहना था कि हमें तत्काल सभी 36 आतंकवादी छोड़ देना चाहिये। वे चिल्लाये, “जब मुफ़्ती की बेटी के लिये आतंकवादियों को छोड़ा जा सकता है तो हमारे रिश्तेदारों के लिये क्यों नहीं?… उन्हें कश्मीर दे दो, कुछ भी दे दो, लेकिन हमें हमारे रिश्तेदार वापस चाहिये…”।

उसी शाम को प्रधानमंत्री कार्यालय में स्वर्गीय स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की पत्नी पहुँचीं, उन्होंने अपहृतों के रिश्तेदारों से मुलाकात कर उनसे बात करके बताने की कोशिश की कि क्यों भारत को इन खतरनाक माँगों को नहीं मानना चाहिये और इससे शहीदों का अपमान होगा, लेकिन “समाज के उन इज्जतदार लोगों” ने ताना मारा कि “खुद तो विधवा हो गई है और चाहती है कि हम भी विधवा हो जायें… ये इधर कहाँ से आई?” फ़िर भी आहूजा की पत्नी देश का सम्मान बनाये रखने के लिये खड़ी रहीं। इसी प्रकार एक और वृद्ध दम्पति भी आये जिन्होंने कहा कि हमारे बेटों ने भी भारत के लिये प्राण दिये हैं, कर्नल वीरेन्द्र थापर (जिनके बेटे लेफ़्टीनेंट कर्नल विजयन्त थापर युद्ध में शहीद हुए थे) ने खड़े होकर सभी लोगों से एकजुट होकर आतंकवादियों के खिलाफ़ होने की अपील की, लेकिन सब बेकार… उन बहरे कानों को न कुछ सुनना था, न उन्होंने सुना… (ध्यान रखिये ये वही आभिजात्य वर्ग था, जो मोमबत्ती जलाने और अंग्रेजी स्लोगन लगाये टी-शर्ट पहनने में सबसे आगे रहता है, ये वही धनी-मानी लोग थे जो भारत की व्यवस्था का जमकर शोषण करके भ्रष्टाचार करते हैं, ये वही “पेज-थ्री” वाले लोग थे जो फ़ाइव-स्टार होटलों में बैठकर बोतलबन्द पानी पीकर समाज सुधार के प्रवचन देते हैं), ऐसे लोगों का छातीकूट अभियान जारी रहा और “जिम्मेदार मीडिया(?)” पर उनकी तस्वीरें और इंटरव्यू भी… मीडिया ने दो-चार दिनों में ही जादू के जोर से यह भी जान लिया कि देश की जनता चाहती है कि “कैसे भी हो…” अपहृतों की सुरक्षित रिहाई की जाना चाहिये…

आखिर 28 दिसम्बर को सरकार और आतंकवादियों के बीच “डील फ़ाइनल” हुई, जिसके अनुसार मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद जरगर, और अहमद उमर शेख को छोड़ा जाना तय हुआ। एक बार फ़िर जसवन्त सिंह के कंधों पर यह कड़वी जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे साथ जायें ताकि अन्तिम समय पर यदि किसी प्रकार की “गड़बड़ी” हो तो वे उसे संभाल सकें। आखिर नववर्ष की संध्या पर सभी अपहृत सकुशल दिल्ली लौट आये… और भाजपा-एनडीए के सबसे बुरे अनुभव को समेटे और मीडिया द्वारा खलनायक करार दिये गये जसवन्त सिंह भी अपना बुझा हुआ सा मुँह लेकर वापस आये। इस प्रकार भारत ने अपमान का कड़वा घूँट पीकर नई सदी में कदम रखा… (जरा इस घटना की तुलना, रूस में चेचन उग्रवादियों द्वारा एक सिनेमा हॉल में बन्धक बनाये हुए बच्चों और उससे निपटने के तरीके से कीजिये, दो राष्ट्रों के चरित्र में अन्तर साफ़ नज़र आयेगा)।

इस घटना ने हमेशा की तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ सवाल खड़े किये (जवाब पाने या माँगने की परम्परा हमारे यहाँ कभी थी ही नहीं)। न ही नौ साल पहले हमने कोई सबक सीखा था, न ही दो महीने पहले हुए मुम्बई हमले के बाद कुछ सीखने को तैयार हैं। एक और कंधार प्रकरण कभी भी आसानी से मंचित किया जा सकता है, और भारत की जनता में इतनी हिम्मत नहीं लगती कि वह आतंकवादियों के खिलाफ़ मजबूती से खड़ी हो सके। हो सकता है कि एक बार आम आदमी (जो पहले ही रोजमर्रा के संघर्षों से मजबूत हो चुका है) कठोर बन जाये, लेकिन “पब संस्कृति”, “रेव-पार्टियाँ” आयोजित करने वाले नौनिहाल इस देश को सिर्फ़ शर्म ही दे सकेंगे। किसी भी प्रकार के युद्ध से पहले ही हम नुकसान का हिसाब लगाने लगते हैं, लाशें गिनने लगते हैं। पाकिस्तान के एक मंत्री ने बिलकुल सही कहा है कि भारत अब एक “बनिया व्यापारी देश” बन गया है वह कभी भी हमसे पूर्ण युद्ध नहीं लड़ सकेगा। डरपोक नेताओं और धन-सम्पत्ति को सीने से चिपकाये हुए अमीरों के इस देश में अपनी कमजोरियाँ स्वीकार करने की ताकत भी नहीं बची है… भ्रष्टाचार या आतंकवाद से लड़ना तो बहुत दूर की बात है…

सन्दर्भ, आँकड़े और घटनायें : कंचन गुप्ता (तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय के मीडिया सेल में पदस्थ पत्रकार) के लेख से…

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