मिट्टी की सौंधी खुशबू वाले मेरे पसन्दीदा गीत (भाग-2)

दिन भर की थकान उतारने के लिये, दुनियादारी के झंझटों से मुक्त होकर, गाँव की चौपाल पर रात के वक्त, मुक्त कण्ठ से जो गीत गाये जाते हैं उनमें से यह एक है। जी करता है कि बस चार-छः “सहज-सीधे” दोस्तों की महफ़िल सजी हुई हो, कहीं से एक ढोलकी मिल जाये और यह गीत कम से कम 20 बार गाया जाये तब जाकर कहीं आत्मा तृप्त हो… ऐसा अदभुत गीत है यह… गीत के बारे में विस्तार से पढ़िये, सुनिये और देखिये सागर भाई की महफ़िल में… यहाँ चटका लगायें…

>मिट्टी की सौंधी खुशबू वाले मेरे पसन्दीदा गीत… (भाग-2)

>Teesri Kasam, Raj Kapoor, Shailendra, Waheeda Rahman

सबसे पहले क्षमा चाहूँगा कि दो महीने के अम्बे अन्तराल के बाद दूसरा गीत पेश कर रहा हूँ, असल में व्यस्तता कुछ ऐसी रही कि गीतों पर लिख नहीं पाया… मिट्टी की सौंधी खुशबू वाले मेरे पसन्दीदा गीतों की श्रृंखला में यह गीत पाठकों की सेवा में पेश करना चाहता हूँ… यह गीत है 1966 में आई फ़िल्म “तीसरी कसम” का, जिसके निर्माता थे प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र। इस गीत को लिखा भी उन्होंने ही है और संगीत दिया है उनकी अटूट टीम का हिस्सा शंकर-जयकिशन ने। फ़िल्म में इसे फ़िल्माया गया है राजकपूर, वहीदा रहमान और एक्स्ट्रा कलाकारों पर, जबकि आवाज़ है मन्ना डे और साथियों की।

मजे की बात यह है कि इस गीत में बोलों के नाम पर सिर्फ़ छः से आठ पंक्तियाँ हैं, लेकिन गीत को खास बनाती है इसकी धुन और इसका संगीत। यह गीत व्यक्ति को भीतर तक मस्त कर देता है, इस गीत के इंटरल्यूड्स सुनकर उसकी तबियत फ़ड़कने लगती है। दिन भर की थकान उतारने के लिये, दुनियादारी के झंझटों से मुक्त होकर, गाँव की चौपाल पर रात के वक्त, मुक्त कण्ठ से जो गीत गाये जाते हैं उनमें से यह एक है। जी करता है कि बस चार-छः “सहज-सीधे” दोस्तों की महफ़िल सजी हुई हो, कहीं से एक ढोलकी मिल जाये और यह गीत कम से कम 20 बार गाया जाये तब जाकर कहीं आत्मा तृप्त हो… ऐसा अदभुत गीत है यह। गीत का फ़िल्मांकन भी कुछ इसी तरह की “सिचुएशन” में है कि नाचने-गाने वाली “नचनिया” यानी कि वहीदा रहमान, राजकपूर की बैलगाड़ी में सवार होकर कहीं जा रहे हैं और बीच में एक गाँव में रात्रि विश्राम के लिये गाड़ी रुकती है… तब तक फ़िल्म में भोलेभाले गाड़ीवान राजकपूर और नाचने वाली वहीदा रहमान के बीच खुले तौर पर प्रेमांकुर तो नहीं फ़ूटा है, लेकिन दोनों के मन में “कुछ-कुछ होता है” वाली भावनायें हैं, ऐसे में गीत के बोलों में “पिंजरे वाली मुनिया…” एक तरह से वहीदा रहमान की स्थिति को प्रदर्शित करते हैं कि वह नाचने वाली है लेकिन एक अदृश्य “पिंजरे” में कैद है और भोलाभाला ग्रामीण गाड़ीवाला (जिसे “चलत मुसाफ़िर” की संज्ञा दी गई है) उसे पा नहीं सकेगा… इस गीत के बोल भी उत्तरप्रदेश-बिहार के ग्रामीण बोलचाल से प्रेरित हैं, जिसे हम अवधी, भोजपुरी कुछ भी नाम दे सकते हैं… पहले यह गीत सुनिये…

मुखड़ा है- चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे पिंजड़े वाली मुनिया…

http://sagarnahar.googlepages.com/player.swf

अब इस गीत का वीडियो देखिये… जिसमें आभिजात्य वर्ग के गोरे-चिट्टे राजकपूर आपको ग्रामीण वेशभूषा में दिखाई देते हैं। राजकपूर या शैलेन्द्र चाहते तो इस गीत में मुख्य कलाकार राजकपूर ही होते, लेकिन चूंकि फ़िल्म में गाना राह चलते एक पड़ाव पर हो रहा है, इसलिये इसे एक्स्ट्रा कलाकारों पर फ़िल्माया गया है। एक्स्ट्रा कलाकारों के सम्बन्ध में एक बात कहना चाहता हूँ कि इनका भी रोल फ़िल्मों में बहुत महत्वपूर्ण होता है और कई एक्स्ट्रा कलाकारों के सम्बन्ध बड़े-बड़े फ़िल्मकारों से ऐसे बन जाते हैं कि उनकी प्रत्येक फ़िल्म में वह कलाकार छोटे-छोटे रोल्स में दिखाई दे जाते हैं। इस गीत में जो कलाकार आपको मुख्य रूप से दिखाई दे रहे हैं (इनका नाम मैं ढूँढने की कोशिश में हूँ), यह सज्जन राजकपूर की फ़िल्मों में कई बार दिखाई दिये हैं, याद कीजिये फ़िल्म “राम तेरी गंगा मैली” में जो “नकली अंधा” व्यक्ति मन्दाकिनी को कोठे पर ले जाता है, वह रोल इन्हीं कलाकार ने निभाया है… बहरहाल यह गीत आप देखें या सुनें, “ढोलकी की तर्ज के जो नायाब टुकड़े” इसमें बीच-बीच में लगातार डाले गये हैं, उससे आपकी मुंण्डी खुद-ब-खुद हिलने लगेगी… और यही होती है कालजयी गीत की पहचान…

गीत के बोल इस प्रकार से हैं…

चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे
पिंजड़े वाली मुनिया…
1) उड़-उड़ बैठी हलवैया दुकनिया…
बरफ़ी के सब रस ले लिया रे
पिंजड़े वाली मुनिया…

हे हे हे हे हे होय रामा हा…

2) उड़-उड़ बैठी बजजवा दुकनिया हा
कपड़ा के सब रस ले लिया रे
पिंजड़े वाली मुनिया हा

हे हे हे हे हे जियो-जियो, होय रामा

3) उड़-उड़ बैठी पनवड़िया दुकनिया
बीड़ा के सब रस ले लिया रे
पिंजड़े वाली मुनिया…

– सुरेश चिपलूनकर

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मिट्टी की सौंधी खुशबू वाले मेरे पसन्दीदा गीत… (भाग-2)

Teesri Kasam, Raj Kapoor, Shailendra, Waheeda Rahman

सबसे पहले क्षमा चाहूँगा कि दो महीने के अम्बे अन्तराल के बाद दूसरा गीत पेश कर रहा हूँ, असल में व्यस्तता कुछ ऐसी रही कि गीतों पर लिख नहीं पाया… मिट्टी की सौंधी खुशबू वाले मेरे पसन्दीदा गीतों की श्रृंखला में यह गीत पाठकों की सेवा में पेश करना चाहता हूँ… यह गीत है 1966 में आई फ़िल्म “तीसरी कसम” का, जिसके निर्माता थे प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र। इस गीत को लिखा भी उन्होंने ही है और संगीत दिया है उनकी अटूट टीम का हिस्सा शंकर-जयकिशन ने। फ़िल्म में इसे फ़िल्माया गया है राजकपूर, वहीदा रहमान और एक्स्ट्रा कलाकारों पर, जबकि आवाज़ है मन्ना डे और साथियों की।

मजे की बात यह है कि इस गीत में बोलों के नाम पर सिर्फ़ छः से आठ पंक्तियाँ हैं, लेकिन गीत को खास बनाती है इसकी धुन और इसका संगीत। यह गीत व्यक्ति को भीतर तक मस्त कर देता है, इस गीत के इंटरल्यूड्स सुनकर उसकी तबियत फ़ड़कने लगती है। दिन भर की थकान उतारने के लिये, दुनियादारी के झंझटों से मुक्त होकर, गाँव की चौपाल पर रात के वक्त, मुक्त कण्ठ से जो गीत गाये जाते हैं उनमें से यह एक है। जी करता है कि बस चार-छः “सहज-सीधे” दोस्तों की महफ़िल सजी हुई हो, कहीं से एक ढोलकी मिल जाये और यह गीत कम से कम 20 बार गाया जाये तब जाकर कहीं आत्मा तृप्त हो… ऐसा अदभुत गीत है यह। गीत का फ़िल्मांकन भी कुछ इसी तरह की “सिचुएशन” में है कि नाचने-गाने वाली “नचनिया” यानी कि वहीदा रहमान, राजकपूर की बैलगाड़ी में सवार होकर कहीं जा रहे हैं और बीच में एक गाँव में रात्रि विश्राम के लिये गाड़ी रुकती है… तब तक फ़िल्म में भोलेभाले गाड़ीवान राजकपूर और नाचने वाली वहीदा रहमान के बीच खुले तौर पर प्रेमांकुर तो नहीं फ़ूटा है, लेकिन दोनों के मन में “कुछ-कुछ होता है” वाली भावनायें हैं, ऐसे में गीत के बोलों में “पिंजरे वाली मुनिया…” एक तरह से वहीदा रहमान की स्थिति को प्रदर्शित करते हैं कि वह नाचने वाली है लेकिन एक अदृश्य “पिंजरे” में कैद है और भोलाभाला ग्रामीण गाड़ीवाला (जिसे “चलत मुसाफ़िर” की संज्ञा दी गई है) उसे पा नहीं सकेगा… इस गीत के बोल भी उत्तरप्रदेश-बिहार के ग्रामीण बोलचाल से प्रेरित हैं, जिसे हम अवधी, भोजपुरी कुछ भी नाम दे सकते हैं… पहले यह गीत सुनिये…

मुखड़ा है- चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे पिंजड़े वाली मुनिया…

अब इस गीत का वीडियो देखिये… जिसमें आभिजात्य वर्ग के गोरे-चिट्टे राजकपूर आपको ग्रामीण वेशभूषा में दिखाई देते हैं। राजकपूर या शैलेन्द्र चाहते तो इस गीत में मुख्य कलाकार राजकपूर ही होते, लेकिन चूंकि फ़िल्म में गाना राह चलते एक पड़ाव पर हो रहा है, इसलिये इसे एक्स्ट्रा कलाकारों पर फ़िल्माया गया है। एक्स्ट्रा कलाकारों के सम्बन्ध में एक बात कहना चाहता हूँ कि इनका भी रोल फ़िल्मों में बहुत महत्वपूर्ण होता है और कई एक्स्ट्रा कलाकारों के सम्बन्ध बड़े-बड़े फ़िल्मकारों से ऐसे बन जाते हैं कि उनकी प्रत्येक फ़िल्म में वह कलाकार छोटे-छोटे रोल्स में दिखाई दे जाते हैं। इस गीत में जो कलाकार आपको मुख्य रूप से दिखाई दे रहे हैं (इनका नाम मैं ढूँढने की कोशिश में हूँ), यह सज्जन राजकपूर की फ़िल्मों में कई बार दिखाई दिये हैं, याद कीजिये फ़िल्म “राम तेरी गंगा मैली” में जो “नकली अंधा” व्यक्ति मन्दाकिनी को कोठे पर ले जाता है, वह रोल इन्हीं कलाकार ने निभाया है… बहरहाल यह गीत आप देखें या सुनें, “ढोलकी की तर्ज के जो नायाब टुकड़े” इसमें बीच-बीच में लगातार डाले गये हैं, उससे आपकी मुंण्डी खुद-ब-खुद हिलने लगेगी… और यही होती है कालजयी गीत की पहचान…

गीत के बोल इस प्रकार से हैं…

चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे
पिंजड़े वाली मुनिया…
1) उड़-उड़ बैठी हलवैया दुकनिया…
बरफ़ी के सब रस ले लिया रे
पिंजड़े वाली मुनिया…

हे हे हे हे हे होय रामा हा…

2) उड़-उड़ बैठी बजजवा दुकनिया हा
कपड़ा के सब रस ले लिया रे
पिंजड़े वाली मुनिया हा

हे हे हे हे हे जियो-जियो, होय रामा

3) उड़-उड़ बैठी पनवड़िया दुकनिया
बीड़ा के सब रस ले लिया रे
पिंजड़े वाली मुनिया…

– सुरेश चिपलूनकर

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पालने से पालकी तक

“पालने से पालकी तक बेटियों का सुदृढ़ जीवन सफल जीवन “

पालने और पालकी को

सजाने की

समझ जो है – “बेहतर है….!”

ज़िन्दगी बेटियों की

भी संवारी जाए तो अच्छा !!

पालने में दुलारो खूब

बिटिया को “बेहतर है….!”

ज्ञान-साहस से सजी बिटिया

बिदा की जाए तो अच्छा ..

>An Open Proposal for Raj Thackerey

>

This is a wonderful post in favour of RAJ Thackerey .have a look We all should support Raj , if that ******** can agree to the following points.
1. We should teach our kids that if he is second in class, don’t study harder.. just beat up
the student coming first and throw him out of the school
2. Parliament should have only Delhiites as it is located in Delhi
3. Prime-minister, president and all other leaders should only be from Delhi
4. No Hindi movie should be made in Bombay. Only Marathi.
5. At every state border, buses, trains, flights should be stopped and staff changed
to local men
6. All Maharashtrians working abroad or in other states should be sent back as they are SNATCHING employment from Locals
7. Lord Shiv, Ganesha and Parvati should not be worshiped in our state as they belong to north (Himalayas)
8. Visits to Taj Mahal should be restricted to people from UP only
9. Relief for farmers in Maharashtra should not come from centre because that is the money collected as Tax from whole of India, so why should it be given to someone in Maharashtra?
10. Let’s support kashmiri Militants because they are right to killing and injuring innocent people for benifit of there state and community……
11. Let’s throw all MNCs out of Maharashtra, why should they earn from us? We will open our own Maharashtra Microsoft, MH Pepsi and MH Marutis of the world .
12. Let’s stop using cellphones, emails, TV, foreign Movies and dramas. James Bond should speak Marathi
13. We should be ready to die hungry or buy food at 10 times higher price but should not accept imports from other states
14. We should not allow any industry to be setup in Maharashtra because all machinery comes from outside
15. We should STOP using local trains… Trains are not manufactured by Marathi manoos and Railway Minister is a Bihari
16. Ensure that all our children are born, grow, live and die without ever stepping out of Maharashtra, then they will become true Marathi’s
from dinershehse

>हिन्दुओं और मुसलमानों को यहूदियों से सीखना चाहिये… (भाग-1)

>Muslims-Hindus Take a Lesson from Jews

विश्व की कुल आबादी में से यहूदियों की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है, जिसमें से लगभग 70 लाख अमेरिका में रहते हैं, 50 लाख यहूदी एशिया में, 20 लाख यूरोप में और बाकी कुछ अन्य देशों में रहते हैं… कहने का मतलब यह कि इज़राईल को छोड़कर सभी देशों में वे “अल्पसंख्यक” हैं। दूसरी तरफ़ दुनिया में मुस्लिमों की संख्या लगभग दो अरब है जिसमें से एक अरब एशिया में, 40 करोड़ अफ़्रीका में, 5 करोड़ यूरोप में और बाकी के सारे विश्व में फ़ैले हुए हैं, इसी प्रकार हिन्दुओं की जनसंख्या लगभग सवा अरब है जिसमें लगभग 80 करोड़ भारत में व बाकी के सारे विश्व में फ़ैले हुए हैं… इस प्रकार देखा जाये तो विश्व का हर पाँचवा व्यक्ति मुसलमान है, प्रति एक हिन्दू के पीछे दो मुसलमान और प्रति एक यहूदी के पीछे सौ मुसलमान का अनुपात बैठता है… बावजूद इसके यहूदी लोग हिन्दुओं या मुसलमानों के मुकाबले इतने श्रेष्ठ क्यों हैं? क्यों यहूदी लोग इतने शक्तिशाली हैं?

प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आईन्स्टीन एक यहूदी थे, प्रसिद्ध मनोविज्ञानी सिगमण्ड फ़्रायड, मार्क्सवादी विचारधारा के जनक कार्ल मार्क्स जैसे अनेकों यहूदी, इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं जिन्होंने मानवता और समाज के लिये एक अमिट योगदान दिया है। बेंजामिन रूबिन ने मानवता को इंजेक्शन की सुई दी, जोनास सैक ने पोलियो वैक्सीन दिया, गर्ट्र्यूड इलियन ने ल्यूकेमिया जैसे रोग से लड़ने की दवाई निर्मित की, बारुच ब्लूमबर्ग ने हेपेटाइटिस बी से लड़ने का टीका बनाया, पॉल एल्हरिच ने सिफ़लिस का इलाज खोजा, बर्नार्ड काट्ज़ ने न्यूरो मस्कुलर के लिये नोबल जीता, ग्रेगरी पिंकस ने सबसे पहली मौखिक गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार किया, विल्लेम कॉफ़ ने किडनी डायलिसिस की मशीन बनाई… इस प्रकार के दसियों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं जिसमें यहूदियों ने अपनी बुद्धिमत्ता और गुणों से मानवता की अतुलनीय सेवा की है।

पिछले 105 वर्षों में 129 यहूदियों को नोबल पुरस्कार मिल चुके हैं, जबकि इसी अवधि में सिर्फ़ 7 मुसलमानों को नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से चार तो शान्ति के नोबल हैं, अनवर सादात और यासर अराफ़ात(शांति पुरस्कार??) को मिलाकर और एक साहित्य का, सिर्फ़ दो मेडिसिन के लिये हैं। इसी प्रकार भारत को अब तक सिर्फ़ 6 नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से एक साहित्य (टैगोर) और एक शान्ति के लिये (मदर टेरेसा को, यदि उन्हें भारतीय माना जाये तो), ऐसे में विश्व में जिस प्रजाति की जनसंख्या सिर्फ़ दशमलव दो प्रतिशत हो ऐसे यहूदियों ने अर्थशास्त्र, दवा-रसायन खोज और भौतिकी के क्षेत्रों में नोबल पुरस्कारों की झड़ी लगा दी है, क्या यह वन्दनीय नहीं है?

मानव जाति की सेवा सिर्फ़ मेडिसिन से ही नहीं होती, और भी कई क्षेत्र हैं, जैसे पीटर शुल्ट्ज़ ने ऑप्टिकल फ़ायबर बनाया, बेनो स्ट्रॉस ने स्टेनलेस स्टील, एमाइल बर्लिनर ने टेलीफ़ोन माइक्रोफ़ोन, चार्ल्स गिन्सबर्ग ने वीडियो टेप रिकॉर्डर, स्टैनली मेज़ोर ने पहली माइक्रोप्रोसेसर चिप जैसे आविष्कार किये। व्यापार के क्षेत्र में राल्फ़ लॉरेन (पोलो), लेविस स्ट्रॉस (लेविस जीन्स), सर्गेई ब्रिन (गूगल), माइकल डेल (डेल कम्प्यूटर), लैरी एलिसन (ओरेकल), राजनीति और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में येल यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष रिचर्ड लेविन, अमरीकी सीनेटर हेनरी किसींजर, ब्रिटेन के लेखक बेंजामिन डिज़रायली जैसे कई नाम यहूदी हैं। मानवता के सबसे बड़े प्रेमी, अपनी चार अरब डॉलर से अधिक सम्पत्ति विज्ञान और विश्व भर के विश्वविद्यालयों को दान करने वाले जॉर्ज सोरोस भी यहूदी हैं। ओलम्पिक में सात स्वर्ण जीतने वाले तैराक मार्क स्पिट्ज़, सबसे कम उम्र में विंबलडन जीतने वाले बूम-बूम बोरिस बेकर भी यहूदी हैं। हॉलीवुड की स्थापना ही एक तरह से यहूदियों द्वारा की गई है ऐसा कहा जा सकता है, हैरिसन फ़ोर्ड, माइकल डगलस, डस्टिन हॉफ़मैन, कैरी ग्राण्ट, पॉल न्यूमैन, गोल्डी हॉन, स्टीवन स्पीलबर्ग, मेल ब्रुक्स जैसे हजारों प्रतिभाशाली यहूदी हैं।

इसका दूसरा पहलू यह है कि हिटलर द्वारा भगाये जाने के बाद यहूदी लगभग सारे विश्व में फ़ैल गये, वहाँ उन्होंने अपनी मेहनत से धन कमाया, साम्राज्य खड़ा किया, उच्च शिक्षा ग्रहण की और सबसे बड़ी बात यह कि उस धन-सम्पत्ति पर अपनी मजबूत पकड़ बनाये रखी, तथा उसे और बढ़ाया। शिक्षा का उपयोग उन्होंने विभिन्न खोज करने में लगाया। जबकि इसका काला पहलू यह है कि अमेरिका स्थित हथियार निर्माता कम्पनियों पर अधिकतर में यहूदियों का कब्जा है, जो चाहती है कि विश्व में युद्ध होते रहें ताकि वे कमाते रहें। जबकि मुस्लिमों को शिक्षा पर ध्यान देने की बजाय, आपस में लड़ने और विश्व भर में ईसाईयों से, हिन्दुओं से मूर्खतापूर्ण तरीके से लगातार सालों-साल लड़ने में पता नहीं क्या मजा आता है? यहूदियों का एक गुण (या कहें कि दुर्गुण) यह भी है कि वे अपनी “नस्ल” की शुद्धता को बरकरार रखने की पूरी कोशिश करते हैं, अर्थात यहूदी लड़के/लड़की की शादी यहूदी से ही हो अन्य धर्मावलम्बियों में न हो इस बात का विशेष खयाल रखा जाता है, उनका मानना है कि इससे “नस्ल शुद्ध” रहती है (इसी बात पर हिटलर उनसे बुरी तरह चिढ़ा हुआ भी था)।

(भाग-2 में जारी रहेगा…)

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हिन्दुओं और मुसलमानों को यहूदियों से सीखना चाहिये… (भाग-1)

Muslims-Hindus Take a Lesson from Jews

विश्व की कुल आबादी में से यहूदियों की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है, जिसमें से लगभग 70 लाख अमेरिका में रहते हैं, 50 लाख यहूदी एशिया में, 20 लाख यूरोप में और बाकी कुछ अन्य देशों में रहते हैं… कहने का मतलब यह कि इज़राईल को छोड़कर सभी देशों में वे “अल्पसंख्यक” हैं। दूसरी तरफ़ दुनिया में मुस्लिमों की संख्या लगभग दो अरब है जिसमें से एक अरब एशिया में, 40 करोड़ अफ़्रीका में, 5 करोड़ यूरोप में और बाकी के सारे विश्व में फ़ैले हुए हैं, इसी प्रकार हिन्दुओं की जनसंख्या लगभग सवा अरब है जिसमें लगभग 80 करोड़ भारत में व बाकी के सारे विश्व में फ़ैले हुए हैं… इस प्रकार देखा जाये तो विश्व का हर पाँचवा व्यक्ति मुसलमान है, प्रति एक हिन्दू के पीछे दो मुसलमान और प्रति एक यहूदी के पीछे सौ मुसलमान का अनुपात बैठता है… बावजूद इसके यहूदी लोग हिन्दुओं या मुसलमानों के मुकाबले इतने श्रेष्ठ क्यों हैं? क्यों यहूदी लोग इतने शक्तिशाली हैं?

प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आईन्स्टीन एक यहूदी थे, प्रसिद्ध मनोविज्ञानी सिगमण्ड फ़्रायड, मार्क्सवादी विचारधारा के जनक कार्ल मार्क्स जैसे अनेकों यहूदी, इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं जिन्होंने मानवता और समाज के लिये एक अमिट योगदान दिया है। बेंजामिन रूबिन ने मानवता को इंजेक्शन की सुई दी, जोनास सैक ने पोलियो वैक्सीन दिया, गर्ट्र्यूड इलियन ने ल्यूकेमिया जैसे रोग से लड़ने की दवाई निर्मित की, बारुच ब्लूमबर्ग ने हेपेटाइटिस बी से लड़ने का टीका बनाया, पॉल एल्हरिच ने सिफ़लिस का इलाज खोजा, बर्नार्ड काट्ज़ ने न्यूरो मस्कुलर के लिये नोबल जीता, ग्रेगरी पिंकस ने सबसे पहली मौखिक गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार किया, विल्लेम कॉफ़ ने किडनी डायलिसिस की मशीन बनाई… इस प्रकार के दसियों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं जिसमें यहूदियों ने अपनी बुद्धिमत्ता और गुणों से मानवता की अतुलनीय सेवा की है।

पिछले 105 वर्षों में 129 यहूदियों को नोबल पुरस्कार मिल चुके हैं, जबकि इसी अवधि में सिर्फ़ 7 मुसलमानों को नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से चार तो शान्ति के नोबल हैं, अनवर सादात और यासर अराफ़ात(शांति पुरस्कार??) को मिलाकर और एक साहित्य का, सिर्फ़ दो मेडिसिन के लिये हैं। इसी प्रकार भारत को अब तक सिर्फ़ 6 नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से एक साहित्य (टैगोर) और एक शान्ति के लिये (मदर टेरेसा को, यदि उन्हें भारतीय माना जाये तो), ऐसे में विश्व में जिस प्रजाति की जनसंख्या सिर्फ़ दशमलव दो प्रतिशत हो ऐसे यहूदियों ने अर्थशास्त्र, दवा-रसायन खोज और भौतिकी के क्षेत्रों में नोबल पुरस्कारों की झड़ी लगा दी है, क्या यह वन्दनीय नहीं है?

मानव जाति की सेवा सिर्फ़ मेडिसिन से ही नहीं होती, और भी कई क्षेत्र हैं, जैसे पीटर शुल्ट्ज़ ने ऑप्टिकल फ़ायबर बनाया, बेनो स्ट्रॉस ने स्टेनलेस स्टील, एमाइल बर्लिनर ने टेलीफ़ोन माइक्रोफ़ोन, चार्ल्स गिन्सबर्ग ने वीडियो टेप रिकॉर्डर, स्टैनली मेज़ोर ने पहली माइक्रोप्रोसेसर चिप जैसे आविष्कार किये। व्यापार के क्षेत्र में राल्फ़ लॉरेन (पोलो), लेविस स्ट्रॉस (लेविस जीन्स), सर्गेई ब्रिन (गूगल), माइकल डेल (डेल कम्प्यूटर), लैरी एलिसन (ओरेकल), राजनीति और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में येल यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष रिचर्ड लेविन, अमरीकी सीनेटर हेनरी किसींजर, ब्रिटेन के लेखक बेंजामिन डिज़रायली जैसे कई नाम यहूदी हैं। मानवता के सबसे बड़े प्रेमी, अपनी चार अरब डॉलर से अधिक सम्पत्ति विज्ञान और विश्व भर के विश्वविद्यालयों को दान करने वाले जॉर्ज सोरोस भी यहूदी हैं। ओलम्पिक में सात स्वर्ण जीतने वाले तैराक मार्क स्पिट्ज़, सबसे कम उम्र में विंबलडन जीतने वाले बूम-बूम बोरिस बेकर भी यहूदी हैं। हॉलीवुड की स्थापना ही एक तरह से यहूदियों द्वारा की गई है ऐसा कहा जा सकता है, हैरिसन फ़ोर्ड, माइकल डगलस, डस्टिन हॉफ़मैन, कैरी ग्राण्ट, पॉल न्यूमैन, गोल्डी हॉन, स्टीवन स्पीलबर्ग, मेल ब्रुक्स जैसे हजारों प्रतिभाशाली यहूदी हैं।

इसका दूसरा पहलू यह है कि हिटलर द्वारा भगाये जाने के बाद यहूदी लगभग सारे विश्व में फ़ैल गये, वहाँ उन्होंने अपनी मेहनत से धन कमाया, साम्राज्य खड़ा किया, उच्च शिक्षा ग्रहण की और सबसे बड़ी बात यह कि उस धन-सम्पत्ति पर अपनी मजबूत पकड़ बनाये रखी, तथा उसे और बढ़ाया। शिक्षा का उपयोग उन्होंने विभिन्न खोज करने में लगाया। जबकि इसका काला पहलू यह है कि अमेरिका स्थित हथियार निर्माता कम्पनियों पर अधिकतर में यहूदियों का कब्जा है, जो चाहती है कि विश्व में युद्ध होते रहें ताकि वे कमाते रहें। जबकि मुस्लिमों को शिक्षा पर ध्यान देने की बजाय, आपस में लड़ने और विश्व भर में ईसाईयों से, हिन्दुओं से मूर्खतापूर्ण तरीके से लगातार सालों-साल लड़ने में पता नहीं क्या मजा आता है? यहूदियों का एक गुण (या कहें कि दुर्गुण) यह भी है कि वे अपनी “नस्ल” की शुद्धता को बरकरार रखने की पूरी कोशिश करते हैं, अर्थात यहूदी लड़के/लड़की की शादी यहूदी से ही हो अन्य धर्मावलम्बियों में न हो इस बात का विशेष खयाल रखा जाता है, उनका मानना है कि इससे “नस्ल शुद्ध” रहती है (इसी बात पर हिटलर उनसे बुरी तरह चिढ़ा हुआ भी था)।

(भाग-2 में जारी रहेगा…)

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हिन्दुओं और मुसलमानों को यहूदियों से सीखना चाहिये… (भाग-1)

Muslims-Hindus Take a Lesson from Jews

विश्व की कुल आबादी में से यहूदियों की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है, जिसमें से लगभग 70 लाख अमेरिका में रहते हैं, 50 लाख यहूदी एशिया में, 20 लाख यूरोप में और बाकी कुछ अन्य देशों में रहते हैं… कहने का मतलब यह कि इज़राईल को छोड़कर सभी देशों में वे “अल्पसंख्यक” हैं। दूसरी तरफ़ दुनिया में मुस्लिमों की संख्या लगभग दो अरब है जिसमें से एक अरब एशिया में, 40 करोड़ अफ़्रीका में, 5 करोड़ यूरोप में और बाकी के सारे विश्व में फ़ैले हुए हैं, इसी प्रकार हिन्दुओं की जनसंख्या लगभग सवा अरब है जिसमें लगभग 80 करोड़ भारत में व बाकी के सारे विश्व में फ़ैले हुए हैं… इस प्रकार देखा जाये तो विश्व का हर पाँचवा व्यक्ति मुसलमान है, प्रति एक हिन्दू के पीछे दो मुसलमान और प्रति एक यहूदी के पीछे सौ मुसलमान का अनुपात बैठता है… बावजूद इसके यहूदी लोग हिन्दुओं या मुसलमानों के मुकाबले इतने श्रेष्ठ क्यों हैं? क्यों यहूदी लोग इतने शक्तिशाली हैं?

प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आईन्स्टीन एक यहूदी थे, प्रसिद्ध मनोविज्ञानी सिगमण्ड फ़्रायड, मार्क्सवादी विचारधारा के जनक कार्ल मार्क्स जैसे अनेकों यहूदी, इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं जिन्होंने मानवता और समाज के लिये एक अमिट योगदान दिया है। बेंजामिन रूबिन ने मानवता को इंजेक्शन की सुई दी, जोनास सैक ने पोलियो वैक्सीन दिया, गर्ट्र्यूड इलियन ने ल्यूकेमिया जैसे रोग से लड़ने की दवाई निर्मित की, बारुच ब्लूमबर्ग ने हेपेटाइटिस बी से लड़ने का टीका बनाया, पॉल एल्हरिच ने सिफ़लिस का इलाज खोजा, बर्नार्ड काट्ज़ ने न्यूरो मस्कुलर के लिये नोबल जीता, ग्रेगरी पिंकस ने सबसे पहली मौखिक गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार किया, विल्लेम कॉफ़ ने किडनी डायलिसिस की मशीन बनाई… इस प्रकार के दसियों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं जिसमें यहूदियों ने अपनी बुद्धिमत्ता और गुणों से मानवता की अतुलनीय सेवा की है।

पिछले 105 वर्षों में 129 यहूदियों को नोबल पुरस्कार मिल चुके हैं, जबकि इसी अवधि में सिर्फ़ 7 मुसलमानों को नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से चार तो शान्ति के नोबल हैं, अनवर सादात और यासर अराफ़ात(शांति पुरस्कार??) को मिलाकर और एक साहित्य का, सिर्फ़ दो मेडिसिन के लिये हैं। इसी प्रकार भारत को अब तक सिर्फ़ 6 नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से एक साहित्य (टैगोर) और एक शान्ति के लिये (मदर टेरेसा को, यदि उन्हें भारतीय माना जाये तो), ऐसे में विश्व में जिस प्रजाति की जनसंख्या सिर्फ़ दशमलव दो प्रतिशत हो ऐसे यहूदियों ने अर्थशास्त्र, दवा-रसायन खोज और भौतिकी के क्षेत्रों में नोबल पुरस्कारों की झड़ी लगा दी है, क्या यह वन्दनीय नहीं है?

मानव जाति की सेवा सिर्फ़ मेडिसिन से ही नहीं होती, और भी कई क्षेत्र हैं, जैसे पीटर शुल्ट्ज़ ने ऑप्टिकल फ़ायबर बनाया, बेनो स्ट्रॉस ने स्टेनलेस स्टील, एमाइल बर्लिनर ने टेलीफ़ोन माइक्रोफ़ोन, चार्ल्स गिन्सबर्ग ने वीडियो टेप रिकॉर्डर, स्टैनली मेज़ोर ने पहली माइक्रोप्रोसेसर चिप जैसे आविष्कार किये। व्यापार के क्षेत्र में राल्फ़ लॉरेन (पोलो), लेविस स्ट्रॉस (लेविस जीन्स), सर्गेई ब्रिन (गूगल), माइकल डेल (डेल कम्प्यूटर), लैरी एलिसन (ओरेकल), राजनीति और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में येल यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष रिचर्ड लेविन, अमरीकी सीनेटर हेनरी किसींजर, ब्रिटेन के लेखक बेंजामिन डिज़रायली जैसे कई नाम यहूदी हैं। मानवता के सबसे बड़े प्रेमी, अपनी चार अरब डॉलर से अधिक सम्पत्ति विज्ञान और विश्व भर के विश्वविद्यालयों को दान करने वाले जॉर्ज सोरोस भी यहूदी हैं। ओलम्पिक में सात स्वर्ण जीतने वाले तैराक मार्क स्पिट्ज़, सबसे कम उम्र में विंबलडन जीतने वाले बूम-बूम बोरिस बेकर भी यहूदी हैं। हॉलीवुड की स्थापना ही एक तरह से यहूदियों द्वारा की गई है ऐसा कहा जा सकता है, हैरिसन फ़ोर्ड, माइकल डगलस, डस्टिन हॉफ़मैन, कैरी ग्राण्ट, पॉल न्यूमैन, गोल्डी हॉन, स्टीवन स्पीलबर्ग, मेल ब्रुक्स जैसे हजारों प्रतिभाशाली यहूदी हैं।

इसका दूसरा पहलू यह है कि हिटलर द्वारा भगाये जाने के बाद यहूदी लगभग सारे विश्व में फ़ैल गये, वहाँ उन्होंने अपनी मेहनत से धन कमाया, साम्राज्य खड़ा किया, उच्च शिक्षा ग्रहण की और सबसे बड़ी बात यह कि उस धन-सम्पत्ति पर अपनी मजबूत पकड़ बनाये रखी, तथा उसे और बढ़ाया। शिक्षा का उपयोग उन्होंने विभिन्न खोज करने में लगाया। जबकि इसका काला पहलू यह है कि अमेरिका स्थित हथियार निर्माता कम्पनियों पर अधिकतर में यहूदियों का कब्जा है, जो चाहती है कि विश्व में युद्ध होते रहें ताकि वे कमाते रहें। जबकि मुस्लिमों को शिक्षा पर ध्यान देने की बजाय, आपस में लड़ने और विश्व भर में ईसाईयों से, हिन्दुओं से मूर्खतापूर्ण तरीके से लगातार सालों-साल लड़ने में पता नहीं क्या मजा आता है? यहूदियों का एक गुण (या कहें कि दुर्गुण) यह भी है कि वे अपनी “नस्ल” की शुद्धता को बरकरार रखने की पूरी कोशिश करते हैं, अर्थात यहूदी लड़के/लड़की की शादी यहूदी से ही हो अन्य धर्मावलम्बियों में न हो इस बात का विशेष खयाल रखा जाता है, उनका मानना है कि इससे “नस्ल शुद्ध” रहती है (इसी बात पर हिटलर उनसे बुरी तरह चिढ़ा हुआ भी था)।

(भाग-2 में जारी रहेगा…)

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>गणतंत्र दिवस आने वाला है……………………

>कल क्रमिक भूख हड़ताल का ३५ वां दिन था । दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति दफ्तर के बाहरएक छोटे से टेंट में संस्कृत के छात्र धरने पर बैठे थे । उपवास कर रहे दो लोगो ही हालत कुछ ठीक नही थी । हम पहुंचे तो थे उनका साथ देने, होसला बढ़ाने , लकिन वहां की परिस्थितियों ने अन्दर से झकझोर दिया । आज के समय में गांधीगिरी कर रहे इन युवा छात्रों-छात्राओं की बात सुनने वाला कोई नही था । महिना बीत गया धरना प्रदर्शन और उपवास करते -करते विश्वविद्यालय प्रशासन की छोडिये छात्र संघ का कोई अधिकारी भी नही आया । बात-चित में हड़ताल का नतृत्व कर रही किरण ने बताया तीन-चार बार बुलाने पर भी डूसु अध्यक्ष नुपुर शर्मा या अन्य कोई नही आया। वह रे वह गणतंत्र ! २६ जनवरी आने ही वाला है । देश भर में तिरंगा फहराएगा , देश को उचाईयों पर ले जाने के लोकलुभावन वादे होंगे ………..पर हकीक़त सबके सामने है…………. दिल्ली इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी में छात्र हितों की अनदेखी हो रही है । इससे तो अच्छा है किजामिया के तर्ज पर दिल्ली विश्विद्यालय भी चुनाव पर पाबन्दी लगा दे । अरे, जब छात्र संघ के लोग भी छात्र हित से कटे हैं तो ऐसे प्रतिनिधियों का चयन किस लिए? दिल्ली विश्वविद्यालय के घटिया राजनीती ने छात्र राजनीती को निम्न स्तर तक ही पहुचाया है ……. हमेशा केवल कवि सम्मलेन ,सेमिनार अथवा फालतू के मसलों पर हो हंगामा करना …………
जैसे यहाँ कि पहचान है …… , । अगर ऐसा नही है तो कोई भी संगठन अब तक इनके साथ क्यूँ नही …..?
इस सवाल का जबाब ढूंढने के दौरान धरने पर बैठी एक छात्रा ने कहा -” क्योंकि हम संस्कृत के छात्र हैं “।
बात भी सही है यहीं, इसी जगह पर यदि कोई उर्दू या अरेबिक के छात्र होते तो न जाने कितने संगठन अल्पसंख्यक के नाम पर चिल्लम-चिल्ली करते ! !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

अब मामले के दूसरे पहलु पर चलते हैं कि आख़िर ये धरना किसलिए हो रहा है? इस बारे में बताते हुए किरण कहती है -” आज जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा अपने अधिकारों का दुरूपयोग किया जा रहा है तब हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना पड़ेगा । यहाँ अधिकार और कर्तव्य का साथ -साथ उल्लेख आवश्यक है , दरअसल जिस अधिकार कीबात करते हैं उसके लिए लड़ना भी हमारा ही कर्तव्य है ।
आज विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा केन्द्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षा हेतु प्रदत्त अनुदान राशिः छात्रो तक नही पहुँच पा रही है । उच्च शिक्षा में आकर्षण के बावजूद छात्र विरोधी नीतियाँ बनाई जा रही हैं। एम् ० फिल ० व पी ० एच ० डी० में सीटों की संख्या कम कर दी गई । जबकि आवश्यकता इस बात की है कि एम०ए ० तथा एम०एस० सी ० की कक्षाओं में हुए नामांकन के आधार पर ही एम् ०फ़िल० की सीटें उपलब्ध हो और साथ के बाद सीधे ही पी० एच० डी ० में पंजीकरण का प्रावधान हो ।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एम० फ़िल० व पी० एच० डीके शोध कर्ताओं के किए शोधवृत्ति की स्वीकृति दे राखी है ,परन्तु इस की संख्या निर्धारण के समस्त अधिकार विश्वविद्यालय प्रशासन को दे दिया गया है । अपने इसी शक्ति का दुरूपयोग करते हुए प्रशासन ने मात्र २५% छात्रों को ही शोध वृत्ति देने का निश्चय किया और इसे कानूनी जमा भी पहना दिया है। एक ओर पुनः नए वेतन आयोग की मांग हो रही है तो दूसरी तरफ़ छात्रों को दी जाने वाली फैलोशिप पर भी विश्वविद्यालय प्रशासन गिद्ध दृष्टि जमाये है। “
बहरहाल, उच्च शिक्षा में फैले भ्रष्टाचार के विरुद्ध संस्कृत-शास्त्र रक्षार्थ संघर्ष समिति के बैनर तले आंदोलनरत इन छात्रों की बात कब तक सुनी जाती इसका इन्तेजार है ……………………………………………………………………………………………..

अल्‍लाह इ‍स्‍लामिक देशो से नाराज है इसलिये ज्‍यादा बच्‍चे भारत में पैदा कर रहे है

मुस्लिम सम्‍प्रदाय में अल्‍लाह को सर्वोपरि माना जाता है,और अल्‍लाह को सर्वोपरि माना भी जाना चाहिये। किन्‍तु अक्‍सर देखने में आता है कि मुस्लिम कठमुल्‍लाओं के चलते देश का मुसलमान पंथ भटकाव के रास्‍ते पर नज़र आता है। मुस्लिम सम्‍प्रदाय आज अपनी रूढियों को त्‍यागने को मुखर नही हो रहा है। इस्‍लाम में यह धारणा देखने में आती है कि दूसरे धर्म को मानने वाले मारे जाने योग्‍य होते है। भारत को माता कहने से अल्‍लाह नाराज हो जायेगे। इस्‍लाम में इस प्रकार की धारण उपाजने वाले कठमुल्‍ले ये भूल जाते है। अल्‍लाह ने भारत में मुसलमानों को इसलिये जन्‍म दिया है ताकि समस्‍त भारतीयों द्वारा अपने जाने वाले रीति रिवाजों को को अपनाओं न कि देश की छाती पर मूँग दलने का काम करें।

अगर अल्‍लाह को मुसलमानों के द्वारा भारत को माता कहे जाने पर अपत्ति होती। अल्‍लाह शायद ही किसी मुस्लिम को भारत में जन्‍म देते। क्‍योकि भारत में जन्‍म लेने पर भारत को माता कहना पढ़ जाता है। तो अल्‍लाह मुस्लिमो को सिर्फ मुस्लिमों को मुस्लिम देशो में ही जन्‍म देते, पर अल्‍लाह ने ऐसा नही किया। आज भारत विश्‍व का सबसे बड़ा अल्‍लाह की इबादत करने वाला देश है, तो अल्‍लाह को किस लिये भारत को माता कहने पर आपत्ति होगी। आज मुस्लिमो पर जितने कड़े कानून इस्‍लामिक देशो में है शायद उतना भारत में नही। अब कठ मुल्‍ले यही कहेगे कि अल्‍लाह इ‍स्‍लामिक देशो से नाराज है इसलिये ज्‍यादा बच्‍चे भारत में पैदा कर रहे है।

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