>सेक्स…….. बिंदास अ…. अ..अ. …. अ बोल (भाग -२)

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दो-तीन दिन से मैं विश्विद्यालय (जामिया ) नहीं जा पा रहा हूँ । नौ और दस फ़रवरी को शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में व्यवस्था का देख रहा था । संगोष्ठी का विषय था – शिक्षा और राष्ट्र पुनर्निर्माण में छात्रों की भूमिका । वहां जामिया , जे एन यू तथा डीयू के युवा शक्ति के अलावा शिक्षकगण और कुछ प्रख्यात शिक्षाविद जिनमें श्री दीनानाथ बत्रा ,श्री धर्मेन्द्र जिज्ञासु व श्री बीएस राजपूत मौजूद थे । चर्चा के दौरान शिक्षा और राष्ट्र पुनर्निर्माण को लेकर विभिन्न विषयों पर प्रतिभागियों समेत अतिथि वक्ताओं ने भी अपनी -अपनी बात रखी । मुझे ठीक -ठीक याद नहीं , लेकिन किसी ने यौन शिक्षा पर काफी अच्छे तर्क प्रस्तुत करते हुए उसे हटाने की मांग की । आज के उत्तर आधुनिक युग में आपको ये बात बड़ी संकुचित और रुढिवादी लग सकती हैं ! ये तो मैं पिछले आलेख में कह चुका हूँ की आपको रुढियों को परिभाषित करना होगा ।

खैर ! संगोष्ठी के दौरान हीं मुझे एक ने जामिया से फ़ोन पर एक घटना की जानकारी दी जो इस प्रकार है-” हेलो , हाँ ……. जयराम , एक मजेदार बात सुन यार , ……………….तेरे डिपार्टमेंट की वो लौंडिया थी न .(नाम नहीं बताऊंगा ) ………… वही तेरी जूनियर यार ………….. अरे वही जो चार पाँच लौंडों के साथ दिन भर घुमती है । …….हुआ ये कि आज उसको जामिया गॉर्ड ने पकड़ लिया था …………अरे वो (नाम ) काला-पीला सा लड़का नहीं इधर उधर करता है उसी के साथ लगी पड़ी थी…… रूम में । …. गॉर्ड ने देखा होगा या जो भी हो बड़ा हंगामा हुआ …….. साला ………… मजा खूब आया……………. उसका होंठ से पुरा खून निकल रहा था ……. कपड़ा-उपडा भी इधर उधर था सब मजे ले रहे थे ,…………. नाटक खूब हुआ तुम रहते तब देखते ।” देखियेऔर सोचिये , हमारा समाज किस ओर जा रहा है ? पढ़ाई करने गई लड़कियां , पढने आए लड़के सारा काम छोड़ कर कक्षा में ही सेक्स कर रहे हैं । कम पढ़े -लिखे या नासमझ बच्चे नहीं ये उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्र थे । जामिया जैसी बड़ीकेन्द्रीय विश्विद्यालय में पढने वाले बच्चे ! अब आप कहीं मुझे भी श्री राम सेना वाला तथाकथित तालिबानी तो नहीं कह देंगे ? मुझे शक है। हो सकता है आप में से कुछ आज सेक्स के इस नंगेपन को आधुनिकता समझते हों ! ये सब कहीं न कहीं हमारी शिक्षा और संस्कारों को दर्शाता है । प्रथम गुरु कहलाने वाली माता आज आधुनिक ममी होती जा रही है वो भी किड्स प्ले स्कूल में बच्चे को डाल कर निश्चिंत हो जाती है। पिता जी भी डैड बन गए हैं जिन्हे बच्चा क्या करता है , क्या सीखता है अथवा उसे क्या सिखाया जा रहा है , इन बातों से कोई खास सरोकार नहीं । तब तो ऐसा ही युवा वर्ग होगा , फ़िर हम इसकी चिंता क्यूँ करते हैं ? जब सेक्स शिक्षा को स्कूलों में लागू करने , टीवी -सिनेमा आदि के माध्यम से ग़लत सही चीजों को प्रोत्साहन मिलता है , तभी हम क्यूँ खामोश रहते है । समय रहते चेतिए । आधुनिकीकरण और विकसित बनने के चक्कर में कहीं आने वाली नस्लें केवल सेक्स जैसी भोगवादी न हो जाए । इसी भोग ने सदियों से पूर्व और पाश्चात्य का भेद बना कर रखा है। दौर चाहे भूमंडलीकरण का हो या बाजारीकरण का हमें इस बात को समझना चाहिए कि भारत के चारो ओर भौगोलिक ही नहीं वरण सांस्कृतिक और संवेदनात्मक घेरा भी है । ऐड्स की आड़ लेकर(जबकि सच तो यही है किऐड्स का मूल कारण सेक्स का अज्ञान नहीं बल्कि सेक्स का अतिरेक है अर्थात अनैतिक यौन सम्बन्ध , अप्राकृतिक यौनाचार , असमय उत्तेजना आदि )आज जिस तरह से सेक्स के प्रति जागृत फैलाने के बहाने विद्यालयों से लेकर घर -घर में टीवी -सिनेमा -इंटरनेट के माध्यम से और भी बेकार की कुंठाओं को बढावा मिल रह है जो आगे चलकर घातक साबित होगा और जिसका लक्षण अभी से दिखना शुरू हो गया है । ( आगे जारी……………………….. )

1 Comment

  1. Anil said,

    February 11, 2009 at 3:23 am

    >बदलते समय के साथ हमारे युवा बदलना नहीं सीख पा रहे हैं – वे कोशिश तो भरसक कर रहे हैं, लेकिन कुछ मुद्दे छुपते-छुपाते ही परोसे जाते हैं – ऐसे मैं अनकही जिज्ञासायें उन्हें इस तरह के कदम उठाने पर मजबूर कर देती है। जरूरत है कि इन मुद्दों पर हमारे युवा खुल कर बहस करें और परिवर्तन की दिशा को प्रकाश की ओर ले जायें न कि तमस की ओर।


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