>देश को अरुंधती की क्या जरुरत ??…………………..

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कल कनिष्क के पोस्ट ‘ जूते खाए अरुंधती ने ‘ पर काफी टिप्पणी की गई । कुछ ने “युवा “के कदम को सही बताया तो कुछ लोग इसे धर्म का चोला पहनाने पर जबरन उतारू दिखे । अरुंधती जैसी देश द्रोहिनी जो खुलेआम अफजल की वकालत और कश्मीर को पाकिस्तान को देने की बात कहती हो , उसका विरोध करना क्या ग़लत है ? आप लोगों के मुताबिक तो विरोध ही नही होना चाहिए । एक ने तो यहाँ तक कह डाला-” देश को अरुंधती जैसी हजारों विदुषी की जरुरत है”। अरे पाश्चात्य की दलाल की आवश्यकता इस देश को नही है । प्यार के नाम पर सेक्स की वकालत करने गई अरुंधती राय …………http://www।expressindia.com/latest-news/du-battleground-for-freedom-vs-culture/423424/ झारखण्ड के आदिवासियों के बीच जाती कुछ और बात थी । भारत को जरुरत है – दयामनी बरला की जो आदिवासियों के जन आन्दोलन को अपनी आवाज दे रही है , किशोर तिवारी की जो सालों से विदर्भ में किसानो की सेवा में लगे हैं, जी ० डी० अगरवाल की जो गंगा को बचाने के लिए प्राण त्यागने को तैयार हैं । शायद हममे से कुछ महानुभाव तो इनका नाम भी नही जानते होंगे

प्यार को संकीर्ण बनाकर सेक्स के ओछेपन में बांधने की कवायद के पीछे भी बाज़ार की ऊँगली लगती है । ये गुलाबी चड्डी और कंडोम भेजने वाले निश्चित रूप से कंडोम उत्पादक कंपनियों के दलाल हैं । प्रेम को एक दिवस की परिधि में जकड कर रखने का क्या औचित्य ? यहाँ भी बाज़ार का खेल साफ़ है । वहां प्रेम की खिलाफत नही थी बाज़ार का विरोध था । त्योहारों से परहेज नही और विरोध भी नही । मतभेद तो त्यौहार मनाने के तरीके से है । हमारे परंपरागत पर्व- त्यौहार का संचालन समाज करती है जबकि वैलेंटाइन डे बाज़ार प्रायोजित है । हमें इस अन्तर को समझना होगा । अगर इसे मनाना हीं है तो अपनी संस्कृति के अनुरूप परिवर्तित कर मनाईये । कुछ समय पूर्व कई पश्चिमी त्यौहार का नाम भी हमें पता नही था आज तो कुकुरमुत्ते की तरह फैलते जा रहें हैं । आज १ जनवरी गाँव-गाँव में नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है लेकिन देखना होगा कि उसका स्वरुप क्या है ? क्या वह ज्यों का त्यों हमने उठा लिया ? नहीं मुझे याद है आज भी जब मैं घर पर रहता था तो माँ कहती थी -‘ नहा-धो कर पूजा कर लो तब खाना मिलेगा । ‘ मंदिरों में उस दिन भी अन्य त्योहारों की भांति भजन -कीर्तन ,पूजा -अर्चना और हवन आदि होता है । आज एक पाश्चात्य पर्व हमारा हो चुका है । हमें खुशी है कोई कभी उसका विरोध तो नही करते हैं । वैलेंटाइन भी स्वीकार्य हो सकता है बशर्ते उसके चरित्र को बदलना होगा । प्यार को कमर के नीचे और घुटनों के ऊपर सीमित रखने की सोच को त्यागना होगा ।

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