विवेक सिंह की वापसी :हार्दिक स्वागत

चिट्ठा चर्चा:”


विवेक सिंह ने वापसी पोस्ट बनाम चर्चा में

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मित्र प्रशान्त के बारे में विवरण दर्ज किया जिनके पैर में फ़िर से चोट लग गयी ………
व्यवहारिक तौर पर किसी के लिए यह खबर….गैरज़रूरी हो सकती है किन्तु मुझे भाई
विवेक का आध्यात्मिक-भावुक चेहरा नज़र आ रहा है
इस दौर में ऐसे लोग जो आत्म केन्द्रित न होकर सर्वे सुखिन: भवन्तु ..
का बिरवा रोप रहें हों उनको आदर देना मेरा दायित्व है

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>मिसाइल खरीद घोटाला और भारत के कांग्रेसी/मुस्लिम टीवी चैनलों की भूमिका Israeli Missile Scam India and Role of Media

>भास्कर ग्रुप के DNA अखबार द्वारा इज़राइल की कम्पनी और भारत सरकार के बीच हुए मिसाइल खरीद समझौते की खबरें लगातार प्रकाशित की जा रही हैं। बाकायदा तारीखवार घटनाओं और विभिन्न सूत्रों के हवाले से 600 करोड़ रुपये के इस घोटाले को उजागर किया गया है, जिससे राजनैतिक हलकों में उठापटक शुरु हो चुकी है, और इसके लिये निश्चित रूप से अखबार बधाई का पात्र है।

जिन पाठकों को इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है उनके लिये इस सौदे के कुछ मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं –

1) मिसाइल आपूर्ति का यह समझौता जिस कम्पनी इज़राइल एयरोस्पेस इंडस्ट्री (IAI) से किया गया है वह पहले से ही “बराक” मिसाइल घोटाले में संदिग्ध है और मामले में दिल्ली के हथियार व्यापारी(?) नंदा पर सीबीआई केस दायर कर चुकी है।

2) इस सौदे में IAI अकेली कम्पनी थी, न कोई वैश्विक टेण्डर हुआ, न ही अन्य कम्पनियों के रेट्स से तुलना की गई।

3) बोफ़ोर्स, HDW और इस प्रकार की अन्य कम्पनियों को संदेह होते ही अर्थात सीबीआई में मामला जाने से पहले ही हथियार खरीद प्रक्रिया में “ब्लैक लिस्टेड” कर दिया गया था, लेकिन इस इज़राइली फ़र्म को आज तक ब्लैक लिस्टेड नहीं किया गया है।

4) ज़मीन से हवा में मार करने वाली इसी मिसाइल से मिलती-जुलती “आकाश” मिसाइल भारत की संस्था DRDO पहले ही विकसित कर चुकी है, लेकिन किन्हीं संदिग्ध कारणों से यह मिसाइल सेना में बड़े पैमाने पर शामिल नहीं की जा रही, और इज़राइली कम्पनी कि मिसाइल खरीदने का ताबड़तोड़ सौदा कर लिया गया है।

5) इस मिसाइल कम्पनी के संदिग्ध सौदों की जाँच खुद इज़राइल सरकार भी कर रही है।

6) इस कम्पनी की एक विज्ञप्ति में कहा जा चुका है कि “अग्रिम पैसा मिल जाने से हम इस सौदे के प्रति आश्वस्त हो गये हैं…” (यानी कि काम पूरा किये बिना अग्रिम पैसा भी दिया जा चुका है)।

7) 10,000 करोड़ के इस सौदे में “बिजनेस चार्जेस” (Business Charges) के तहत 6% का भुगतान किया गया है अर्थात सीधे-सीधे 600 करोड़ का घोटाला है।

8) इस संयुक्त उद्यम में DRDO को सिर्फ़ 3000 करोड़ रुपये मिलेंगे, बाकी की रकम वह कम्पनी ले जायेगी। भारत की मिसाइलों में “सीकर” (Seeker) तकनीक की कमी है, लेकिन यह कम्पनी उक्त तकनीक भी भारत को नहीं देगी।

9) केन्द्र सरकार ने इज़राइल सरकार से विशेष आग्रह किया था कि इस सौदे को फ़िलहाल गुप्त रखा जाये, क्योंकि भारत में चुनाव होने वाले हैं।

10) सौदे पर अन्तिम हस्ताक्षर 27 फ़रवरी 2009 को बगैर किसी को बताये किये गये, अर्थात लोकसभा चुनाव की घोषणा से ठीक दो दिन पहले।

(यह सारी जानकारियाँ DNA Today में यहाँ देखें…, यहाँ देखें और यहाँ भी देखें, दी जा चुकी हैं, इसके अलावा दैनिक भास्कर के इन्दौर संस्करण में दिनांक 22 से 28 मार्च 2009 के बीच प्रकाशित हो चुकी हैं)

[Get Job in Top Companies of India]

तो यह तो हुई घोटाले में संदिग्ध आचरण और भारत में भ्रष्टाचार की जननी कांग्रेस सरकार की भूमिका, लेकिन पिछले एक-दो महीने (बल्कि जब से यह सौदा सत्ता और रक्षा मंत्रालय के गलियारे में आया तब) से हमारे भारत के महान चैनल, स्वयंभू “सबसे तेज़” चैनल, खासतौर पर गुजरात का कवरेज करने वाले “सेकुलर” चैनल, भूतप्रेत चुड़ैल और नौटंकी दिखाने वाले चैनल, “न्यूज़” के नाम पर छिछोरापन, राखी सावन्त और शिल्पा शेट्टी को दिखाने वाले चैनल…… आदि-आदि-आदि सभी चैनल कहाँ थे? क्या इतना बड़ा रक्षा सौदा घोटाला किसी भी चैनल की हेडलाइन बनने की औकात नहीं रखता? अभिषेक-ऐश्वर्या की करवा चौथ पर पूरे नौ घण्टे का कवरेज करने वाले चैनल इस खबर को एक घंटा भी नहीं दिखा सके, ऐसा क्यों? कमिश्नर का कुत्ता गुम जाने को “ब्रेकिंग न्यूज़” बताने वाले चैनल इस घोटाले पर एक भी ढंग का फ़ुटेज तक न दे सके?

पिछले कुछ वर्षों से इलेक्ट्रानिक मीडिया (और कुछ हद तक प्रिंट मीडिया) में एक “विशेष” रुझान देखने में आया है, वह है “सत्ताधारी पार्टी के चरणों में लोट लगाने की प्रवृत्ति”, ऐसा नहीं कि यह प्रवृत्ति पहले नहीं थी, पहले भी थी लेकिन एक सीमित मात्रा में, एक सीमित स्तर पर और थोड़ा-बहुत लोकलाज की शर्म रखते हुए। लेकिन आर्थिक उदारीकरण के बाद जैसे-जैसे पत्रकारिता का पतन होता जा रहा है, वह शर्मनाक तो है ही, चिंतनीय भी है। चिंतनीय इसलिये कि पत्रकार, अखबार या चैनल पैसों के लिये बिकते-बिकते अब “विचारधारा” के भी गुलाम बनने लगे हैं, मिशनरी-मार्क्स-मुल्ला-मैकाले और माइनो ये पाँच शक्तियाँ मिलकर मीडिया को “मानसिक बन्धक” बनाये हुए हैं, इसका सबसे सटीक उदाहरण है उनके द्वारा किये गये समाचारों का संकलन, उनके द्वारा दिखाई जाने वाली “हेडलाइन”, उनके शब्दों का चयन, उनकी तथाकथित “ब्रेकिंग न्यूज़” आदि। अमरनाथ ज़मीन विवाद के समय “वन्देमातरम” और “भारत माता की जय” के नारे लगाती हुई भीड़, मीडिया को “उग्रवादी विचारों वाले युवाओं का झुण्ड” नज़र आती है, कश्मीर में 80,000 हिन्दुओं की हत्या सिर्फ़ “हत्याकाण्ड” या कुछ “सिरफ़िरे नौजवानों”(?) का घृणित काम, जबकि गुजरात में कुछ सौ मुस्लिमों (और साथ में लगभग उतने ही हिन्दू भी) की हत्याएं “नरसंहार” हैं? क्या अब मीडिया के महन्तों को “हत्याकांड” और “नरसंहार” में अन्तर समझाना पड़ेगा? कश्मीर से बाहर किये गये साढ़े तीन लाख हिन्दुओं के बारे में कोई रिपोर्टिंग नहीं, मुफ़्ती-महबूबा की जोड़ी से कोई सवाल जवाब नहीं, लेकिन गुजरात के बारे में रिपोर्टिंग करते समय “जातीय सफ़ाया” (Genocide) शब्द का उल्लेख अवश्य करते हैं। केरल में सिस्टर अभया के बलात्कार और हत्याकाण्ड तथा उसमें चर्च की भूमिका के बारे में किसी चैनल पर कोई खबर नहीं आती, केरल में ही बढ़ते तालिबानीकरण और चुनावों में मदनी की भूमिका की कोई रिपोर्ट नहीं, लेकिन आसाराम बापू के आश्रम की खबर सुर्खियों में होती है, उस पर चैनल का एंकर चिल्ला-चिल्ला कर, पागलों जैसे चेहरे बनाकर घंटों खबरें परोसता है। सरस्वती वन्दना का विरोध कभी हेडलाइन नहीं बनता, लेकिन हवालात में आँसू लिये शंकराचार्य खूब दिखाये जाते हैं… लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या पर खामोशी, लेकिन मंगलोर की घटनाओं पर विलाप-प्रलाप…रैम्प पर चलने वाली किसी घटिया सी मॉडल पर एक घंटा कवरेज और छत्तीसगढ़ में मारे जा रहे पुलिस के जवानों पर दस मिनट भी नहीं?… ये कैसे “राष्ट्रीय चैनल” हैं भाई? क्या इनका “राष्ट्र” गुड़गाँव और नोएडा तक ही सीमित है? हिन्दुओं के साथ भेदभाव और गढ़ी गई नकली खबरें दिखाने के और भी सैकड़ों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं, लेकिन इन “रसूख”(?) वाले चैनलों को मिसाइल घोटाला नहीं दिखाई देता? इसे कांग्रेस द्वारा “अच्छी तरह से किया गया मीडिया मैनेजमेंट” कहा जाये या कुछ और, कि आजम खान द्वारा भारतमाता को डायन कहे जाने के बावजूद हेडलाइन बनते हैं “वरुण गाँधी”? कल ही जीटीवी पर एंकर महोदय दर्शकों से प्रश्न पूछ रहे थे कि पिछले 5 साल में आपने वरुण गाँधी का नाम कितनी बार सुना और पिछले 5 दिनों में आपने वरुण गाँधी का नाम कितनी बार सुन लिया? लेकिन वह ये नहीं बताते कि पिछले 5 दिनों में उन्होंने खुद ही वरुंण गाँधी का नाम हजारों बार क्यों लिया? ऐसी क्या मजबूरी थी कि बार-बार वरुण गाँधी का वही घिसा-पिटा टेप लगातार चलाया जा रहा है… यदि वरुण की खबर न दिखाये तो क्या चैनल का मालिक भूखा मर जायेगा? वरुण को हीरो किसने बनाया, मीडिया ने… लेकिन मीडिया कभी भी खुद जवाब नहीं देता, वह कभी भी खुद आत्ममंथन नहीं करता, कभी भी गम्भीरता से किसी बात के पीछे नहीं पड़ता, उसे तो रोज एक नया शिकार(?) चाहिये…। यदि मीडिया चाहे तो नेताओं द्वारा “धर्म” और उकसावे के खेल को भोथरा कर सकता है, लेकिन जब TRP नाम का जिन्न गर्दन पर सवार हो, और “हिन्दुत्व” को गरियाने से फ़ुर्सत मिले तो वह कुछ करे…

मीडिया को सोचना चाहिये कि कहीं वह बड़ी शक्तियों के हाथों में तो नहीं खेल रहा, कहीं “धर्मनिरपेक्षता”(?) का बखान करते-करते अनजाने ही किसी साजिश का हिस्सा तो नहीं बन रहा? माना कि मीडिया पर “बाज़ार” का दबाव है उसे बाज़ार में टिके रहने के लिये कुछ चटपटा दिखाना आवश्यक है, लेकिन पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धान्तों को भूलने से कैसे काम चलेगा? पत्रकार का मुख्य काम होना चाहिये “सरकार” के बखिये उधेड़ना, लेकिन भारत में उल्टा ही होता है इधर तो मीडिया विपक्ष के बखिये उधेड़ने में ही भिड़ा हुआ है… ऐसे में भला मिसाइल घोटाले पर रिपोर्टिंग क्योंकर होगी? या फ़िर ऐसा भी हो सकता है कि मीडिया को “भ्रष्टाचार” की खबर में TRP का कोई स्कोप ही ना दिखता हो… या फ़िर किसी चैनल का मालिक उसी पार्टी का राज्यसभा सदस्य हो, मंत्री का चमचा हो…। फ़िर खोजी पत्रकारिता करने के लिये जिगर के साथ-साथ थोड़ा “फ़ील्ड वर्क” भी करना पड़ता है… जब टेबल पर बैठे-बैठे ही गूगल और यू-ट्यूब के सहारे एक झनझनाट रिपोर्ट बनाई जा सकती है तो कौन पत्रकार धूप में मारा-मारा फ़िरे? कोलकाता के “स्टेट्समैन” अखबार ने कुछ दिनों पहले ही “इस्लाम” के खिलाफ़ कुछ प्रकाशित करने की “सजा”(?) भुगती है… इसीलिये मीडिया वाले सोचते होंगे कि कांग्रेस के राज में घोटाले तो रोज ही होते रहते हैं, सबसे “सेफ़” रास्ता अपनाओ, यानी हिन्दुत्व-भाजपा-संघ-मोदी को गरियाते रहो, जिसमें जूते खाने, नौकरी जाने आदि का खतरा नहीं के बराबर हो… क्योंकि एक अरब हिन्दुओं वाला देश ही इस प्रकार का “सहनशील”(???) हो सकता है…

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मिसाइल खरीद घोटाला और भारत के कांग्रेसी/मुस्लिम टीवी चैनलों की भूमिका Israeli Missile Scam India and Role of Media

भास्कर ग्रुप के DNA अखबार द्वारा इज़राइल की कम्पनी और भारत सरकार के बीच हुए मिसाइल खरीद समझौते की खबरें लगातार प्रकाशित की जा रही हैं। बाकायदा तारीखवार घटनाओं और विभिन्न सूत्रों के हवाले से 600 करोड़ रुपये के इस घोटाले को उजागर किया गया है, जिससे राजनैतिक हलकों में उठापटक शुरु हो चुकी है, और इसके लिये निश्चित रूप से अखबार बधाई का पात्र है।

जिन पाठकों को इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है उनके लिये इस सौदे के कुछ मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं –

1) मिसाइल आपूर्ति का यह समझौता जिस कम्पनी इज़राइल एयरोस्पेस इंडस्ट्री (IAI) से किया गया है वह पहले से ही “बराक” मिसाइल घोटाले में संदिग्ध है और मामले में दिल्ली के हथियार व्यापारी(?) नंदा पर सीबीआई केस दायर कर चुकी है।

2) इस सौदे में IAI अकेली कम्पनी थी, न कोई वैश्विक टेण्डर हुआ, न ही अन्य कम्पनियों के रेट्स से तुलना की गई।

3) बोफ़ोर्स, HDW और इस प्रकार की अन्य कम्पनियों को संदेह होते ही अर्थात सीबीआई में मामला जाने से पहले ही हथियार खरीद प्रक्रिया में “ब्लैक लिस्टेड” कर दिया गया था, लेकिन इस इज़राइली फ़र्म को आज तक ब्लैक लिस्टेड नहीं किया गया है।

4) ज़मीन से हवा में मार करने वाली इसी मिसाइल से मिलती-जुलती “आकाश” मिसाइल भारत की संस्था DRDO पहले ही विकसित कर चुकी है, लेकिन किन्हीं संदिग्ध कारणों से यह मिसाइल सेना में बड़े पैमाने पर शामिल नहीं की जा रही, और इज़राइली कम्पनी कि मिसाइल खरीदने का ताबड़तोड़ सौदा कर लिया गया है।

5) इस मिसाइल कम्पनी के संदिग्ध सौदों की जाँच खुद इज़राइल सरकार भी कर रही है।

6) इस कम्पनी की एक विज्ञप्ति में कहा जा चुका है कि “अग्रिम पैसा मिल जाने से हम इस सौदे के प्रति आश्वस्त हो गये हैं…” (यानी कि काम पूरा किये बिना अग्रिम पैसा भी दिया जा चुका है)।

7) 10,000 करोड़ के इस सौदे में “बिजनेस चार्जेस” (Business Charges) के तहत 6% का भुगतान किया गया है अर्थात सीधे-सीधे 600 करोड़ का घोटाला है।

8) इस संयुक्त उद्यम में DRDO को सिर्फ़ 3000 करोड़ रुपये मिलेंगे, बाकी की रकम वह कम्पनी ले जायेगी। भारत की मिसाइलों में “सीकर” (Seeker) तकनीक की कमी है, लेकिन यह कम्पनी उक्त तकनीक भी भारत को नहीं देगी।

9) केन्द्र सरकार ने इज़राइल सरकार से विशेष आग्रह किया था कि इस सौदे को फ़िलहाल गुप्त रखा जाये, क्योंकि भारत में चुनाव होने वाले हैं।

10) सौदे पर अन्तिम हस्ताक्षर 27 फ़रवरी 2009 को बगैर किसी को बताये किये गये, अर्थात लोकसभा चुनाव की घोषणा से ठीक दो दिन पहले।

(यह सारी जानकारियाँ DNA Today में यहाँ देखें…, यहाँ देखें और यहाँ भी देखें, दी जा चुकी हैं, इसके अलावा दैनिक भास्कर के इन्दौर संस्करण में दिनांक 22 से 28 मार्च 2009 के बीच प्रकाशित हो चुकी हैं)

[Get Job in Top Companies of India]

तो यह तो हुई घोटाले में संदिग्ध आचरण और भारत में भ्रष्टाचार की जननी कांग्रेस सरकार की भूमिका, लेकिन पिछले एक-दो महीने (बल्कि जब से यह सौदा सत्ता और रक्षा मंत्रालय के गलियारे में आया तब) से हमारे भारत के महान चैनल, स्वयंभू “सबसे तेज़” चैनल, खासतौर पर गुजरात का कवरेज करने वाले “सेकुलर” चैनल, भूतप्रेत चुड़ैल और नौटंकी दिखाने वाले चैनल, “न्यूज़” के नाम पर छिछोरापन, राखी सावन्त और शिल्पा शेट्टी को दिखाने वाले चैनल…… आदि-आदि-आदि सभी चैनल कहाँ थे? क्या इतना बड़ा रक्षा सौदा घोटाला किसी भी चैनल की हेडलाइन बनने की औकात नहीं रखता? अभिषेक-ऐश्वर्या की करवा चौथ पर पूरे नौ घण्टे का कवरेज करने वाले चैनल इस खबर को एक घंटा भी नहीं दिखा सके, ऐसा क्यों? कमिश्नर का कुत्ता गुम जाने को “ब्रेकिंग न्यूज़” बताने वाले चैनल इस घोटाले पर एक भी ढंग का फ़ुटेज तक न दे सके?

पिछले कुछ वर्षों से इलेक्ट्रानिक मीडिया (और कुछ हद तक प्रिंट मीडिया) में एक “विशेष” रुझान देखने में आया है, वह है “सत्ताधारी पार्टी के चरणों में लोट लगाने की प्रवृत्ति”, ऐसा नहीं कि यह प्रवृत्ति पहले नहीं थी, पहले भी थी लेकिन एक सीमित मात्रा में, एक सीमित स्तर पर और थोड़ा-बहुत लोकलाज की शर्म रखते हुए। लेकिन आर्थिक उदारीकरण के बाद जैसे-जैसे पत्रकारिता का पतन होता जा रहा है, वह शर्मनाक तो है ही, चिंतनीय भी है। चिंतनीय इसलिये कि पत्रकार, अखबार या चैनल पैसों के लिये बिकते-बिकते अब “विचारधारा” के भी गुलाम बनने लगे हैं, मिशनरी-मार्क्स-मुल्ला-मैकाले और माइनो ये पाँच शक्तियाँ मिलकर मीडिया को “मानसिक बन्धक” बनाये हुए हैं, इसका सबसे सटीक उदाहरण है उनके द्वारा किये गये समाचारों का संकलन, उनके द्वारा दिखाई जाने वाली “हेडलाइन”, उनके शब्दों का चयन, उनकी तथाकथित “ब्रेकिंग न्यूज़” आदि। अमरनाथ ज़मीन विवाद के समय “वन्देमातरम” और “भारत माता की जय” के नारे लगाती हुई भीड़, मीडिया को “उग्रवादी विचारों वाले युवाओं का झुण्ड” नज़र आती है, कश्मीर में 80,000 हिन्दुओं की हत्या सिर्फ़ “हत्याकाण्ड” या कुछ “सिरफ़िरे नौजवानों”(?) का घृणित काम, जबकि गुजरात में कुछ सौ मुस्लिमों (और साथ में लगभग उतने ही हिन्दू भी) की हत्याएं “नरसंहार” हैं? क्या अब मीडिया के महन्तों को “हत्याकांड” और “नरसंहार” में अन्तर समझाना पड़ेगा? कश्मीर से बाहर किये गये साढ़े तीन लाख हिन्दुओं के बारे में कोई रिपोर्टिंग नहीं, मुफ़्ती-महबूबा की जोड़ी से कोई सवाल जवाब नहीं, लेकिन गुजरात के बारे में रिपोर्टिंग करते समय “जातीय सफ़ाया” (Genocide) शब्द का उल्लेख अवश्य करते हैं। केरल में सिस्टर अभया के बलात्कार और हत्याकाण्ड तथा उसमें चर्च की भूमिका के बारे में किसी चैनल पर कोई खबर नहीं आती, केरल में ही बढ़ते तालिबानीकरण और चुनावों में मदनी की भूमिका की कोई रिपोर्ट नहीं, लेकिन आसाराम बापू के आश्रम की खबर सुर्खियों में होती है, उस पर चैनल का एंकर चिल्ला-चिल्ला कर, पागलों जैसे चेहरे बनाकर घंटों खबरें परोसता है। सरस्वती वन्दना का विरोध कभी हेडलाइन नहीं बनता, लेकिन हवालात में आँसू लिये शंकराचार्य खूब दिखाये जाते हैं… लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या पर खामोशी, लेकिन मंगलोर की घटनाओं पर विलाप-प्रलाप…रैम्प पर चलने वाली किसी घटिया सी मॉडल पर एक घंटा कवरेज और छत्तीसगढ़ में मारे जा रहे पुलिस के जवानों पर दस मिनट भी नहीं?… ये कैसे “राष्ट्रीय चैनल” हैं भाई? क्या इनका “राष्ट्र” गुड़गाँव और नोएडा तक ही सीमित है? हिन्दुओं के साथ भेदभाव और गढ़ी गई नकली खबरें दिखाने के और भी सैकड़ों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं, लेकिन इन “रसूख”(?) वाले चैनलों को मिसाइल घोटाला नहीं दिखाई देता? इसे कांग्रेस द्वारा “अच्छी तरह से किया गया मीडिया मैनेजमेंट” कहा जाये या कुछ और, कि आजम खान द्वारा भारतमाता को डायन कहे जाने के बावजूद हेडलाइन बनते हैं “वरुण गाँधी”? कल ही जीटीवी पर एंकर महोदय दर्शकों से प्रश्न पूछ रहे थे कि पिछले 5 साल में आपने वरुण गाँधी का नाम कितनी बार सुना और पिछले 5 दिनों में आपने वरुण गाँधी का नाम कितनी बार सुन लिया? लेकिन वह ये नहीं बताते कि पिछले 5 दिनों में उन्होंने खुद ही वरुंण गाँधी का नाम हजारों बार क्यों लिया? ऐसी क्या मजबूरी थी कि बार-बार वरुण गाँधी का वही घिसा-पिटा टेप लगातार चलाया जा रहा है… यदि वरुण की खबर न दिखाये तो क्या चैनल का मालिक भूखा मर जायेगा? वरुण को हीरो किसने बनाया, मीडिया ने… लेकिन मीडिया कभी भी खुद जवाब नहीं देता, वह कभी भी खुद आत्ममंथन नहीं करता, कभी भी गम्भीरता से किसी बात के पीछे नहीं पड़ता, उसे तो रोज एक नया शिकार(?) चाहिये…। यदि मीडिया चाहे तो नेताओं द्वारा “धर्म” और उकसावे के खेल को भोथरा कर सकता है, लेकिन जब TRP नाम का जिन्न गर्दन पर सवार हो, और “हिन्दुत्व” को गरियाने से फ़ुर्सत मिले तो वह कुछ करे…

मीडिया को सोचना चाहिये कि कहीं वह बड़ी शक्तियों के हाथों में तो नहीं खेल रहा, कहीं “धर्मनिरपेक्षता”(?) का बखान करते-करते अनजाने ही किसी साजिश का हिस्सा तो नहीं बन रहा? माना कि मीडिया पर “बाज़ार” का दबाव है उसे बाज़ार में टिके रहने के लिये कुछ चटपटा दिखाना आवश्यक है, लेकिन पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धान्तों को भूलने से कैसे काम चलेगा? पत्रकार का मुख्य काम होना चाहिये “सरकार” के बखिये उधेड़ना, लेकिन भारत में उल्टा ही होता है इधर तो मीडिया विपक्ष के बखिये उधेड़ने में ही भिड़ा हुआ है… ऐसे में भला मिसाइल घोटाले पर रिपोर्टिंग क्योंकर होगी? या फ़िर ऐसा भी हो सकता है कि मीडिया को “भ्रष्टाचार” की खबर में TRP का कोई स्कोप ही ना दिखता हो… या फ़िर किसी चैनल का मालिक उसी पार्टी का राज्यसभा सदस्य हो, मंत्री का चमचा हो…। फ़िर खोजी पत्रकारिता करने के लिये जिगर के साथ-साथ थोड़ा “फ़ील्ड वर्क” भी करना पड़ता है… जब टेबल पर बैठे-बैठे ही गूगल और यू-ट्यूब के सहारे एक झनझनाट रिपोर्ट बनाई जा सकती है तो कौन पत्रकार धूप में मारा-मारा फ़िरे? कोलकाता के “स्टेट्समैन” अखबार ने कुछ दिनों पहले ही “इस्लाम” के खिलाफ़ कुछ प्रकाशित करने की “सजा”(?) भुगती है… इसीलिये मीडिया वाले सोचते होंगे कि कांग्रेस के राज में घोटाले तो रोज ही होते रहते हैं, सबसे “सेफ़” रास्ता अपनाओ, यानी हिन्दुत्व-भाजपा-संघ-मोदी को गरियाते रहो, जिसमें जूते खाने, नौकरी जाने आदि का खतरा नहीं के बराबर हो… क्योंकि एक अरब हिन्दुओं वाला देश ही इस प्रकार का “सहनशील”(???) हो सकता है…

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परसाई के शहर में व्यंग्य की परिभाषा खोजतीं खाली खोपडी


चित्र साभार


सुना है इन दिनों शहर व्यंग्य की सही और सटीक परिभाषा में उलझा हुआ है।
बवाल जी ने फोन पे पूछा – भैया ये सटायर की कोई नई परभाषा हो गई है क्या ?
अपन तो हिन्दी और साहित्य की ए बी सी डी नहीं जानते न ही ब्लागिंग की समझ है अपन में , न ही अपनी किसी ब्लागिंग के पुरोधा से ही गिलास-मंग्घे स्तर तक पहंच हैं जो कि उनकी बात का ज़बाव दे सकें सो अपन ने कहा भाई आप तो अपने बीच के लाल बुझक्कड़ हैं उनसे पूछा जाए ।
तभी हमने सड़क पर एक बैसाख नन्दन का दूसरे बैसाख नन्दन का वार्तालाप सुना {आपको समझ में नहीं आएगी उनकी आपसी चर्चा क्योंकि अपने भाई बन्दों की भाषा हम ही समझ सकतें हैं ।} आप सुनना चाहतें हैं……….?
सो बताए देता हूँ हूँ भाई लोग क्या बतिया रहे थे :
पहला :-भाई ,तुम्हारे मालिक ने ब्राड-बैन्ड ले लिया ..?
दूजा :- हाँ, कहता है कि इससे उसके बच्चे तरक्की करेंगें ?
पहला :-कैसे ,
दूजा :- जैसे हम लोग निरंतर तरक्की कर रहे हैं
पहला :-अच्छा,अपनी जैसी तरक्की
दूजा :- हाँ भाई वैसी ही ,उससे भी आगे
पहला :-यानी कि इस बार अपने को
दूजा :-अरे भाई आगे मत पूछना सब गड़बड़ हो जाएगा
पहला :-सो क्या तरक्की हुई तुम्हारे मालिक की
दूजा :- हाँ,हुई न अब वो मुझसे नहीं इंटरनेट के ज़रिए दूर तक के अपने भाई बन्दों से बात करता है। सुना हैकि वो परसाई जी से भी महान हो ने जा रहा है आजकल विश्व को व्यंग्य क्या है हास्य कहाँ है,ब्लॉग किसे कहतें हैं बता रहा है।
पहला :-कुछ समझ रहा हूँ किंतु इस में तरक्की की क्या बात हुई ?
दूजा :- तुम भी, रहे निरे इंसान के इंसान ………!!

मुस्लिम आक्रांता की कब्र हेतु 25 लाख और हिन्दू राजा का स्मारक उपेक्षित… लानत भेजो ऐसी "शर्मनिरपेक्षता" पर

Muslim Invaders, Indian History, King Hemu, Ibrahim Lodi

क्या आपने इब्राहीम लोदी का नाम सुना है? ज़रूर सुना होगा… क्या आपने हेमचन्द्र विक्रमादित्य (हेमू) का नाम सुना है? क्या कहा – याद नहीं आ रहा? इतनी आसानी से याद नहीं आयेगा… असल में हमें, बाबर, हुमायूं, अकबर, शाहजहाँ, औरंगज़ेब आदि के नाम आसानी से याद आ जाते हैं, लेकिन हेमचन्द्र, सदाशिवराव पेशवा, पृथ्वीराज चौहान आदि के नाम तत्काल दिमाग में या एकदम ज़ुबान पर नहीं आते… ऐसा क्यों होता है, इसका जवाब बेहद आसान है – हमारी मैकाले आधारित और वामपंथी शिक्षा प्रणाली ने हमारा “ब्रेन वॉश” किया हुआ है।

सबसे पहले ऊपर दिये गये दोनों राजाओं का संक्षिप्त परिचय दिया जाये… इब्राहीम लोदी कौन था? इब्राहीम लोदी एक मुस्लिम घुसपैठिया था जिसने मेवाड़ पर आक्रमण किया था और राणा सांगा के हाथों पराजित हुआ था। इब्राहीम लोदी के बाप यानी सिकन्दर लोदी ने कुरुक्षेत्र के पवित्र तालाब में हिन्दुओं के डुबकी लगाने पर रोक लगाई थी, और हिमाचल में ज्वालामुखी मन्दिर को ढहा दिया था, उसने बोधन पंडित की भी हत्या करवा दी थी, क्योंकि पंडित ने कहा था कि सभी धर्म समान हैं। इब्राहीम लोदी का दादा बहोल लोदी अफ़गानिस्तान से आया था और उसने दिल्ली पर कब्जा कर लिया था। ऐसे महान(?) वंश के इब्राहीम लोदी की कब्र के रखरखाव और मरम्मत के लिये केन्द्र और हरियाणा सरकार ने गत वर्ष 25 लाख रुपये स्वीकृत किये हैं, जबकि रेवाड़ी स्थित हेमू के स्मारक पर एक मस्जिद का अतिक्रमण हो रहा है।

अब जानते हैं राजा हेमू (1501-1556) के बारे में… “राजा हेमू” जिनका पूरा नाम हेमचन्द्र था, हरियाणा के रेवाड़ी से थे। इतिहासकार केके भारद्वाज के शब्दों में “हेमू मध्यकालीन भारत का ‘नेपोलियन’ कहा जा सकता है”, यहाँ तक कि विन्सेंट स्मिथ जिन्होंने समुद्रगुप्त को भी नेपोलियन कहा था, मानते थे कि हेमू को भी भारतीय नेपोलियन कहा जाना चाहिये। हुमायूं के पतन के बाद हेमचन्द्र ने बंगाल से युद्ध जीतना शुरु किया और बिहार, मध्यप्रदेश होते हुए आगरा तक पहुँच गया। हेमचन्द्र ने लगातार 22 युद्ध लड़े और सभी जीते। आगरा को जीतने के बाद हेमचन्द्र ने दिल्ली कूच किया और 6 अक्टूबर 1556 को दिल्ली भी जीत लिया था, तथा उन्हें दिल्ली के पुराने किले में “विक्रमादित्य” के खिताब से नवाज़ा गया। 5 नवम्बर 1556 को अकबर के सेनापति बैरम खान की विशाल सेना से पानीपत में उसका युद्ध हुआ। अकबर और बैरम खान युद्ध भूमि से आठ किमी दूर थे और एक समय जब हेमचन्द्र जीतने की कगार पर आ गया था, दुर्भाग्य से आँख में तीर लगने की वजह से वह हाथी से गिर गया और उसकी सेना में भगदड़ मच गई, जिससे उस युद्ध में वह पराजित हो गये। अचेतावस्था में शाह कुलीन खान उसे अकबर और बैरम खान के पास ले गया, अकबर जो कि पहले ही “गाज़ी” के खिताब हेतु लालायित था, उसने हेमू का सिर धड़ से अलग करवा दिया और कटा हुआ सिर काबुल भेज दिया, जबकि हेमू का धड़ दिल्ली के पुराने किले पर लटकवा दिया… हेमू की मौत के बाद अकबर ने हिन्दुओं का कत्लेआम मचाया और मानव खोपड़ियों की मीनारें बनीं, जिसका उल्लेख पीटर मुंडी ने भी अपने सफ़रनामे में किया है… (ये है “अकबर महान” की कुछ करतूतों में से एक)।

एक तरह से देखा जाये तो हेमचन्द्र को अन्तिम भारतीय राजा कह सकते हैं, जिसके बाद भारत में मुगल साम्राज्य और मजबूत हुआ। ऐसे भारतीय योद्धा राजा को उपेक्षित करके विदेश से आये मुस्लिम आक्रांता को महिमामण्डित करने का काम इतिहास की पुस्तकों में भी किया जाता है। भारत के हिन्दू राजाओं और योद्धाओं को न तो उचित स्थान मिला है न ही उचित सम्मान। मराठा पेशवा का साम्राज्य कर्नाटक से अटक (काबुल) तक जा पहुँचा था… पानीपत की तीसरी लड़ाई में सदाशिवराव पेशवा, अहमदशाह अब्दाली के हाथों पराजित हुए थे। भारत में कितनी इमारतें या सड़कें सदाशिवराव पेशवा के नाम पर हैं? कितने स्टेडियम, नहरें और सड़कों का नाम हेमचन्द्र की याद में रखा गया है? जबकि बाबर, हुमायूँ के नाम पर सड़कें तथा औरंगज़ेब के नाम पर शहर भी मिल जायेंगे तथा इब्राहीम लोदी की कब्र के रखरखाव के लिये 25 लाख की स्वीकृति? धर्मनिरपेक्षता नहीं विशुद्ध “शर्मनिरपेक्षता” है ये…।

धर्मनिरपेक्ष(?) सरकारों और वामपंथी इतिहासकारों का यह रवैया शर्मनाक तो है ही, देश के नौनिहालों का आत्म-सम्मान गिराने की एक साजिश भी है। जिन योद्धाओं ने विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ़ बहादुरी से युद्ध लड़े और देश के एक बड़े हिस्से में अपना राज्य स्थापित किया उनका सम्मानजनक उल्लेख न करना, उनके बारे में विस्तार से बच्चों को न पढ़ाना, उन पर गर्व न करना एक विकृत समाज के लक्षण हैं, और यह काम कांग्रेस और वामपंथियों ने बखूबी किया है।

इतिहास की दो महत्वपूर्ण घटनायें यदि न हुई होतीं तो शायद भारत का इतिहास कुछ और ही होता – 1) यदि राजा पृथ्वीराज चौहान सदाशयता दिखाते हुए मुहम्मद गोरी को जिन्दा न छोड़ते (जिन्दा छोड़ने के अगले ही साल 1192 में वह फ़िर वापस दोगुनी शक्ति से आया और चौहान को हराया), 2) यदि हेमचन्द्र पानीपत का युद्ध न हारता तो अकबर को यहाँ से भागना पड़ता (सन् 1556) (इतिहास से सबक न सीखने की हिन्दू परम्परा को निभाते हुए हम भी कई आतंकवादियों को छोड़ चुके हैं और अफ़ज़ल अभी भी को जिन्दा रखा है)। फ़िर भी बाहर से आये हुए आक्रांताओं के गुणगान करना और यहाँ के राजाओं को हास्यास्पद और विकृत रूप में पेश करना वामपंथी “बुद्धिजीवियों” का पसन्दीदा शगल है। किसी ने सही कहा है कि “इतिहास बनाये नहीं जाते बल्कि इतिहास ‘लिखे’ जाते हैं, और वह भी अपने मुताबिक…”, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक सच्चाई कभी न पहुँच सके… इस काम में वामपंथी इतिहासकार माहिर हैं, जबकि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण में… इसीलिये अकबर और औरंगज़ेब का गुणगान करने वाले लोग भारत में अक्सर मिल ही जाते हैं… तथा शिवाजी की बात करना “साम्प्रदायिकता” की श्रेणी में आता है…

जाते-जाते एक बात बताईये, आपके द्वारा दिये गये टैक्स का पैसा इब्राहीम लोदी जैसों की कब्र के रखरखाव के काम आने पर आप कैसा महसूस करते हैं?

लेख के कुछ स्रोत – http://www.hindujagruti.org तथा विकीपीडिया से

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मुस्लिम आक्रांता की कब्र हेतु 25 लाख और हिन्दू राजा का स्मारक उपेक्षित… लानत भेजो ऐसी "शर्मनिरपेक्षता" पर

Muslim Invaders, Indian History, King Hemu, Ibrahim Lodi

क्या आपने इब्राहीम लोदी का नाम सुना है? ज़रूर सुना होगा… क्या आपने हेमचन्द्र विक्रमादित्य (हेमू) का नाम सुना है? क्या कहा – याद नहीं आ रहा? इतनी आसानी से याद नहीं आयेगा… असल में हमें, बाबर, हुमायूं, अकबर, शाहजहाँ, औरंगज़ेब आदि के नाम आसानी से याद आ जाते हैं, लेकिन हेमचन्द्र, सदाशिवराव पेशवा, पृथ्वीराज चौहान आदि के नाम तत्काल दिमाग में या एकदम ज़ुबान पर नहीं आते… ऐसा क्यों होता है, इसका जवाब बेहद आसान है – हमारी मैकाले आधारित और वामपंथी शिक्षा प्रणाली ने हमारा “ब्रेन वॉश” किया हुआ है।

सबसे पहले ऊपर दिये गये दोनों राजाओं का संक्षिप्त परिचय दिया जाये… इब्राहीम लोदी कौन था? इब्राहीम लोदी एक मुस्लिम घुसपैठिया था जिसने मेवाड़ पर आक्रमण किया था और राणा सांगा के हाथों पराजित हुआ था। इब्राहीम लोदी के बाप यानी सिकन्दर लोदी ने कुरुक्षेत्र के पवित्र तालाब में हिन्दुओं के डुबकी लगाने पर रोक लगाई थी, और हिमाचल में ज्वालामुखी मन्दिर को ढहा दिया था, उसने बोधन पंडित की भी हत्या करवा दी थी, क्योंकि पंडित ने कहा था कि सभी धर्म समान हैं। इब्राहीम लोदी का दादा बहोल लोदी अफ़गानिस्तान से आया था और उसने दिल्ली पर कब्जा कर लिया था। ऐसे महान(?) वंश के इब्राहीम लोदी की कब्र के रखरखाव और मरम्मत के लिये केन्द्र और हरियाणा सरकार ने गत वर्ष 25 लाख रुपये स्वीकृत किये हैं, जबकि रेवाड़ी स्थित हेमू के स्मारक पर एक मस्जिद का अतिक्रमण हो रहा है।

अब जानते हैं राजा हेमू (1501-1556) के बारे में… “राजा हेमू” जिनका पूरा नाम हेमचन्द्र था, हरियाणा के रेवाड़ी से थे। इतिहासकार केके भारद्वाज के शब्दों में “हेमू मध्यकालीन भारत का ‘नेपोलियन’ कहा जा सकता है”, यहाँ तक कि विन्सेंट स्मिथ जिन्होंने समुद्रगुप्त को भी नेपोलियन कहा था, मानते थे कि हेमू को भी भारतीय नेपोलियन कहा जाना चाहिये। हुमायूं के पतन के बाद हेमचन्द्र ने बंगाल से युद्ध जीतना शुरु किया और बिहार, मध्यप्रदेश होते हुए आगरा तक पहुँच गया। हेमचन्द्र ने लगातार 22 युद्ध लड़े और सभी जीते। आगरा को जीतने के बाद हेमचन्द्र ने दिल्ली कूच किया और 6 अक्टूबर 1556 को दिल्ली भी जीत लिया था, तथा उन्हें दिल्ली के पुराने किले में “विक्रमादित्य” के खिताब से नवाज़ा गया। 5 नवम्बर 1556 को अकबर के सेनापति बैरम खान की विशाल सेना से पानीपत में उसका युद्ध हुआ। अकबर और बैरम खान युद्ध भूमि से आठ किमी दूर थे और एक समय जब हेमचन्द्र जीतने की कगार पर आ गया था, दुर्भाग्य से आँख में तीर लगने की वजह से वह हाथी से गिर गया और उसकी सेना में भगदड़ मच गई, जिससे उस युद्ध में वह पराजित हो गये। अचेतावस्था में शाह कुलीन खान उसे अकबर और बैरम खान के पास ले गया, अकबर जो कि पहले ही “गाज़ी” के खिताब हेतु लालायित था, उसने हेमू का सिर धड़ से अलग करवा दिया और कटा हुआ सिर काबुल भेज दिया, जबकि हेमू का धड़ दिल्ली के पुराने किले पर लटकवा दिया… हेमू की मौत के बाद अकबर ने हिन्दुओं का कत्लेआम मचाया और मानव खोपड़ियों की मीनारें बनीं, जिसका उल्लेख पीटर मुंडी ने भी अपने सफ़रनामे में किया है… (ये है “अकबर महान” की कुछ करतूतों में से एक)।

एक तरह से देखा जाये तो हेमचन्द्र को अन्तिम भारतीय राजा कह सकते हैं, जिसके बाद भारत में मुगल साम्राज्य और मजबूत हुआ। ऐसे भारतीय योद्धा राजा को उपेक्षित करके विदेश से आये मुस्लिम आक्रांता को महिमामण्डित करने का काम इतिहास की पुस्तकों में भी किया जाता है। भारत के हिन्दू राजाओं और योद्धाओं को न तो उचित स्थान मिला है न ही उचित सम्मान। मराठा पेशवा का साम्राज्य कर्नाटक से अटक (काबुल) तक जा पहुँचा था… पानीपत की तीसरी लड़ाई में सदाशिवराव पेशवा, अहमदशाह अब्दाली के हाथों पराजित हुए थे। भारत में कितनी इमारतें या सड़कें सदाशिवराव पेशवा के नाम पर हैं? कितने स्टेडियम, नहरें और सड़कों का नाम हेमचन्द्र की याद में रखा गया है? जबकि बाबर, हुमायूँ के नाम पर सड़कें तथा औरंगज़ेब के नाम पर शहर भी मिल जायेंगे तथा इब्राहीम लोदी की कब्र के रखरखाव के लिये 25 लाख की स्वीकृति? धर्मनिरपेक्षता नहीं विशुद्ध “शर्मनिरपेक्षता” है ये…।

धर्मनिरपेक्ष(?) सरकारों और वामपंथी इतिहासकारों का यह रवैया शर्मनाक तो है ही, देश के नौनिहालों का आत्म-सम्मान गिराने की एक साजिश भी है। जिन योद्धाओं ने विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ़ बहादुरी से युद्ध लड़े और देश के एक बड़े हिस्से में अपना राज्य स्थापित किया उनका सम्मानजनक उल्लेख न करना, उनके बारे में विस्तार से बच्चों को न पढ़ाना, उन पर गर्व न करना एक विकृत समाज के लक्षण हैं, और यह काम कांग्रेस और वामपंथियों ने बखूबी किया है।

इतिहास की दो महत्वपूर्ण घटनायें यदि न हुई होतीं तो शायद भारत का इतिहास कुछ और ही होता – 1) यदि राजा पृथ्वीराज चौहान सदाशयता दिखाते हुए मुहम्मद गोरी को जिन्दा न छोड़ते (जिन्दा छोड़ने के अगले ही साल 1192 में वह फ़िर वापस दोगुनी शक्ति से आया और चौहान को हराया), 2) यदि हेमचन्द्र पानीपत का युद्ध न हारता तो अकबर को यहाँ से भागना पड़ता (सन् 1556) (इतिहास से सबक न सीखने की हिन्दू परम्परा को निभाते हुए हम भी कई आतंकवादियों को छोड़ चुके हैं और अफ़ज़ल अभी भी को जिन्दा रखा है)। फ़िर भी बाहर से आये हुए आक्रांताओं के गुणगान करना और यहाँ के राजाओं को हास्यास्पद और विकृत रूप में पेश करना वामपंथी “बुद्धिजीवियों” का पसन्दीदा शगल है। किसी ने सही कहा है कि “इतिहास बनाये नहीं जाते बल्कि इतिहास ‘लिखे’ जाते हैं, और वह भी अपने मुताबिक…”, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक सच्चाई कभी न पहुँच सके… इस काम में वामपंथी इतिहासकार माहिर हैं, जबकि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण में… इसीलिये अकबर और औरंगज़ेब का गुणगान करने वाले लोग भारत में अक्सर मिल ही जाते हैं… तथा शिवाजी की बात करना “साम्प्रदायिकता” की श्रेणी में आता है…

जाते-जाते एक बात बताईये, आपके द्वारा दिये गये टैक्स का पैसा इब्राहीम लोदी जैसों की कब्र के रखरखाव के काम आने पर आप कैसा महसूस करते हैं?

लेख के कुछ स्रोत – http://www.hindujagruti.org तथा विकीपीडिया से

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मुस्लिम आक्रांता की कब्र हेतु 25 लाख और हिन्दू राजा का स्मारक उपेक्षित… लानत भेजो ऐसी "शर्मनिरपेक्षता" पर

Muslim Invaders, Indian History, King Hemu, Ibrahim Lodi

क्या आपने इब्राहीम लोदी का नाम सुना है? ज़रूर सुना होगा… क्या आपने हेमचन्द्र विक्रमादित्य (हेमू) का नाम सुना है? क्या कहा – याद नहीं आ रहा? इतनी आसानी से याद नहीं आयेगा… असल में हमें, बाबर, हुमायूं, अकबर, शाहजहाँ, औरंगज़ेब आदि के नाम आसानी से याद आ जाते हैं, लेकिन हेमचन्द्र, सदाशिवराव पेशवा, पृथ्वीराज चौहान आदि के नाम तत्काल दिमाग में या एकदम ज़ुबान पर नहीं आते… ऐसा क्यों होता है, इसका जवाब बेहद आसान है – हमारी मैकाले आधारित और वामपंथी शिक्षा प्रणाली ने हमारा “ब्रेन वॉश” किया हुआ है।

सबसे पहले ऊपर दिये गये दोनों राजाओं का संक्षिप्त परिचय दिया जाये… इब्राहीम लोदी कौन था? इब्राहीम लोदी एक मुस्लिम घुसपैठिया था जिसने मेवाड़ पर आक्रमण किया था और राणा सांगा के हाथों पराजित हुआ था। इब्राहीम लोदी के बाप यानी सिकन्दर लोदी ने कुरुक्षेत्र के पवित्र तालाब में हिन्दुओं के डुबकी लगाने पर रोक लगाई थी, और हिमाचल में ज्वालामुखी मन्दिर को ढहा दिया था, उसने बोधन पंडित की भी हत्या करवा दी थी, क्योंकि पंडित ने कहा था कि सभी धर्म समान हैं। इब्राहीम लोदी का दादा बहोल लोदी अफ़गानिस्तान से आया था और उसने दिल्ली पर कब्जा कर लिया था। ऐसे महान(?) वंश के इब्राहीम लोदी की कब्र के रखरखाव और मरम्मत के लिये केन्द्र और हरियाणा सरकार ने गत वर्ष 25 लाख रुपये स्वीकृत किये हैं, जबकि रेवाड़ी स्थित हेमू के स्मारक पर एक मस्जिद का अतिक्रमण हो रहा है।

अब जानते हैं राजा हेमू (1501-1556) के बारे में… “राजा हेमू” जिनका पूरा नाम हेमचन्द्र था, हरियाणा के रेवाड़ी से थे। इतिहासकार केके भारद्वाज के शब्दों में “हेमू मध्यकालीन भारत का ‘नेपोलियन’ कहा जा सकता है”, यहाँ तक कि विन्सेंट स्मिथ जिन्होंने समुद्रगुप्त को भी नेपोलियन कहा था, मानते थे कि हेमू को भी भारतीय नेपोलियन कहा जाना चाहिये। हुमायूं के पतन के बाद हेमचन्द्र ने बंगाल से युद्ध जीतना शुरु किया और बिहार, मध्यप्रदेश होते हुए आगरा तक पहुँच गया। हेमचन्द्र ने लगातार 22 युद्ध लड़े और सभी जीते। आगरा को जीतने के बाद हेमचन्द्र ने दिल्ली कूच किया और 6 अक्टूबर 1556 को दिल्ली भी जीत लिया था, तथा उन्हें दिल्ली के पुराने किले में “विक्रमादित्य” के खिताब से नवाज़ा गया। 5 नवम्बर 1556 को अकबर के सेनापति बैरम खान की विशाल सेना से पानीपत में उसका युद्ध हुआ। अकबर और बैरम खान युद्ध भूमि से आठ किमी दूर थे और एक समय जब हेमचन्द्र जीतने की कगार पर आ गया था, दुर्भाग्य से आँख में तीर लगने की वजह से वह हाथी से गिर गया और उसकी सेना में भगदड़ मच गई, जिससे उस युद्ध में वह पराजित हो गये। अचेतावस्था में शाह कुलीन खान उसे अकबर और बैरम खान के पास ले गया, अकबर जो कि पहले ही “गाज़ी” के खिताब हेतु लालायित था, उसने हेमू का सिर धड़ से अलग करवा दिया और कटा हुआ सिर काबुल भेज दिया, जबकि हेमू का धड़ दिल्ली के पुराने किले पर लटकवा दिया… हेमू की मौत के बाद अकबर ने हिन्दुओं का कत्लेआम मचाया और मानव खोपड़ियों की मीनारें बनीं, जिसका उल्लेख पीटर मुंडी ने भी अपने सफ़रनामे में किया है… (ये है “अकबर महान” की कुछ करतूतों में से एक)।

एक तरह से देखा जाये तो हेमचन्द्र को अन्तिम भारतीय राजा कह सकते हैं, जिसके बाद भारत में मुगल साम्राज्य और मजबूत हुआ। ऐसे भारतीय योद्धा राजा को उपेक्षित करके विदेश से आये मुस्लिम आक्रांता को महिमामण्डित करने का काम इतिहास की पुस्तकों में भी किया जाता है। भारत के हिन्दू राजाओं और योद्धाओं को न तो उचित स्थान मिला है न ही उचित सम्मान। मराठा पेशवा का साम्राज्य कर्नाटक से अटक (काबुल) तक जा पहुँचा था… पानीपत की तीसरी लड़ाई में सदाशिवराव पेशवा, अहमदशाह अब्दाली के हाथों पराजित हुए थे। भारत में कितनी इमारतें या सड़कें सदाशिवराव पेशवा के नाम पर हैं? कितने स्टेडियम, नहरें और सड़कों का नाम हेमचन्द्र की याद में रखा गया है? जबकि बाबर, हुमायूँ के नाम पर सड़कें तथा औरंगज़ेब के नाम पर शहर भी मिल जायेंगे तथा इब्राहीम लोदी की कब्र के रखरखाव के लिये 25 लाख की स्वीकृति? धर्मनिरपेक्षता नहीं विशुद्ध “शर्मनिरपेक्षता” है ये…।

धर्मनिरपेक्ष(?) सरकारों और वामपंथी इतिहासकारों का यह रवैया शर्मनाक तो है ही, देश के नौनिहालों का आत्म-सम्मान गिराने की एक साजिश भी है। जिन योद्धाओं ने विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ़ बहादुरी से युद्ध लड़े और देश के एक बड़े हिस्से में अपना राज्य स्थापित किया उनका सम्मानजनक उल्लेख न करना, उनके बारे में विस्तार से बच्चों को न पढ़ाना, उन पर गर्व न करना एक विकृत समाज के लक्षण हैं, और यह काम कांग्रेस और वामपंथियों ने बखूबी किया है।

इतिहास की दो महत्वपूर्ण घटनायें यदि न हुई होतीं तो शायद भारत का इतिहास कुछ और ही होता – 1) यदि राजा पृथ्वीराज चौहान सदाशयता दिखाते हुए मुहम्मद गोरी को जिन्दा न छोड़ते (जिन्दा छोड़ने के अगले ही साल 1192 में वह फ़िर वापस दोगुनी शक्ति से आया और चौहान को हराया), 2) यदि हेमचन्द्र पानीपत का युद्ध न हारता तो अकबर को यहाँ से भागना पड़ता (सन् 1556) (इतिहास से सबक न सीखने की हिन्दू परम्परा को निभाते हुए हम भी कई आतंकवादियों को छोड़ चुके हैं और अफ़ज़ल अभी भी को जिन्दा रखा है)। फ़िर भी बाहर से आये हुए आक्रांताओं के गुणगान करना और यहाँ के राजाओं को हास्यास्पद और विकृत रूप में पेश करना वामपंथी “बुद्धिजीवियों” का पसन्दीदा शगल है। किसी ने सही कहा है कि “इतिहास बनाये नहीं जाते बल्कि इतिहास ‘लिखे’ जाते हैं, और वह भी अपने मुताबिक…”, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक सच्चाई कभी न पहुँच सके… इस काम में वामपंथी इतिहासकार माहिर हैं, जबकि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण में… इसीलिये अकबर और औरंगज़ेब का गुणगान करने वाले लोग भारत में अक्सर मिल ही जाते हैं… तथा शिवाजी की बात करना “साम्प्रदायिकता” की श्रेणी में आता है…

जाते-जाते एक बात बताईये, आपके द्वारा दिये गये टैक्स का पैसा इब्राहीम लोदी जैसों की कब्र के रखरखाव के काम आने पर आप कैसा महसूस करते हैं?

लेख के कुछ स्रोत – http://www.hindujagruti.org तथा विकीपीडिया से

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जबलपुर का मौसम ब्लागिया मौसम

इन दिनों जबलपुर का मौसम ब्लागिया होता जा रहा है. जिन लोगो की सूची यहाँ है उसके अलावा भी ब्लॉगर जी होंगे मुझे जानकारी है कुछ ज्ञात कुछ विख्यात भी जिनके नाम इधर छपे हैं उनके लिए सादर आग्रह का ट्रक भेज दिया है की वे सभी लोग नियमित रूप से भले दस लाइन लिखे लिखें ज़रूर नहीं तो नूह की नौका डोल जाएगी .

· !! लाल और बवाल — जुगलबन…

· aahuti · baar-baardekho

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· शब्द विहंग

· सव्यसाची

· हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर

· मेरे मुहल्ले का नुक्कड़

· Meri Rachnaye-Prem Farrukha…

ब्लागिंग को ऐसो नसा भए सब लबरा मौन

पत्नी से पूँछें पति –हम आपके कौन ?’

>सुन्दरता के सभी शिकारी: तलत महमूद

>1950 में बनी और दिलीप कुमार- नरगिस अभिनीत फिल्म जोगन (Jogan) दिलीप- नरगिस के अभिनय के अलावा मधुर गीतों के कारण भी बहुत ही लोकप्रिय हुई। इस फिल्म में संगीतकार बुलो सी रानी ने मीरा बाई के भजनों को बहुत ही सुन्दर धुनों में ढ़ाला था। सुन्दर धुन के साथ अगर गीतादत्त (रॉय) की आवाज मिल जाये तो गीत कितने सुन्दर बनेंगे; सहज ही कल्पना की जा सकती है।
इस फिल्म में सभी गाने नरगिस पर फिल्माये गये हैं, स्वाभाविक है कि वे गीतादत्त ने ही गाये होंगे परन्तु आज जो गीत मैं आपको सुनवाने जा रहा हूँ उसे तलत महमूद ने गाया है। यह गीत फिल्म में पार्श्‍व में बजता है।

http://sagarnahar.googlepages.com/player.swf

Download Link

शिकारी, शिकारी
सुन्दरता के सभी शिकारी
कोई नहीं है पुजारी
सुन्दरता के सभी शिकारी

महल-दोमहलों बीच खड़ी कोई
चन्द्रकिरन सी नारी
छल से बल से
छल से बल से तन-मन-जोबन
लूटे हाय शिकारी
सुन्दरता के सभी शिकारी

बाग-बगीचों खिली कली तो आया वहीं शिकारी
देख-देख जी भरा न उसका चुन ली कलियाँ सारी
सुन्दरता के सभी शिकारी

बन-उपवन में सुन्दर हिरनी दौड़-दौड़ के हारी
देख के कंचन काया उसकी पीछे पड़ा शिकारी
सुन्दरता के सभी शिकारी
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सुन्दरता के सभी शिकारी: तलत महमूद

1950 में बनी और दिलीप कुमार- नरगिस अभिनीत फिल्म जोगन (Jogan) दिलीप- नरगिस के अभिनय के अलावा मधुर गीतों के कारण भी बहुत ही लोकप्रिय हुई। इस फिल्म में संगीतकार बुलो सी रानी ने मीरा बाई के भजनों को बहुत ही सुन्दर धुनों में ढ़ाला था। सुन्दर धुन के साथ अगर गीतादत्त (रॉय) की आवाज मिल जाये तो गीत कितने सुन्दर बनेंगे; सहज ही कल्पना की जा सकती है।
इस फिल्म में सभी गाने नरगिस पर फिल्माये गये हैं, स्वाभाविक है कि वे गीतादत्त ने ही गाये होंगे परन्तु आज जो गीत मैं आपको सुनवाने जा रहा हूँ उसे तलत महमूद ने गाया है। यह गीत फिल्म में पार्श्‍व में बजता है।

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शिकारी, शिकारी
सुन्दरता के सभी शिकारी
कोई नहीं है पुजारी
सुन्दरता के सभी शिकारी

महल-दोमहलों बीच खड़ी कोई
चन्द्रकिरन सी नारी
छल से बल से
छल से बल से तन-मन-जोबन
लूटे हाय शिकारी
सुन्दरता के सभी शिकारी

बाग-बगीचों खिली कली तो आया वहीं शिकारी
देख-देख जी भरा न उसका चुन ली कलियाँ सारी
सुन्दरता के सभी शिकारी

बन-उपवन में सुन्दर हिरनी दौड़-दौड़ के हारी
देख के कंचन काया उसकी पीछे पड़ा शिकारी
सुन्दरता के सभी शिकारी
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