>एक जीवन ऐसा भी

>उगता चाँद डूबता सूरज संदीप (बदला हुआ नाम) नोएडा के एक अन्तर- राष्ट्रीय काल सेन्टर में कामकरता है ! संदीप ने बी।एस. सी की डिग्री दिल्ली यूनिवर्सिटी से ली है और सोफ्टवेयर टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा किया है ! काफी कम्पनियों के चक्करकाटने के बाद जब कही बात ना बनी तब किसी दोस्त के कहने पर संदीप ने इसकॉल सेन्टर में अप्लाई किया और अंग्रेज़ी का अच्छा ज्ञान होने के कारण उसे नौकरी भी मिल गई ! आज संदीप पिछले २ सालो से इस काल सेन्टर में काम कररहा है पैसे तो अच्छे मिलते है लेकिन संदीप कहता है ” मैं जब यहाँ आया था तब कॉलेज से निकला एक नौजवान था जिसके सपने कुछ करने के कुछ बनने के थे , लेकिन अब मैं एक अधेड़ व्यक्ति हूँ । मेरा वज़न मेरे कद से कही ज्यादा होचुका है, अब छुट्टी के दिन भी मैं रात में सो नही पाता, आँखों के पासकाले धब्बे पड़ चुके है, बाल झड़ चुके है , चेहरा बीमार सा दीखता है, औरकाम में ज़रूरत से ज्यादा प्रेशर होने के कारण झुंझलाया सा रहता हु ! बिनाबात के लोगो से लड़ ज्ञाता हूँ ! सारी- सारी रात अँगरेज़ कस्टमरों सेफ़ोन पे बात करना कभी उनसे पैसे की वसूली करना तो कभी उनकी समस्याओ कोसुलझाना, कभी उनकी अंग्रेज़ गालीयाँ सुनना तो कभी अपनी कंपनी की पॉलिसीका हवाला देते हुए उनसे पचास झूठ बोलना ” ! क्या एक आम इंसान जो रात भरयह काम करेगा और पुरा दिन सोयेगा वह नार्मल जीवन जी पायेगा ! या फिर पैसाहमारे जीवन को खोखला बनाता जा रहा है, हम पाश्चात्य संस्कृति के ओर इस कदर बढ़ रहे है कि हम अपने जीवन को भी ताक पर रख देते है !इसका परिणाम क्या होगा ? क्या हम भारत को एक नया, युवा भारत बना पाएंगे ? यासिर्फ़ अमेरिका का एक मुखौटा बन कर रह जायेंगे ! संदीप के शब्दों में “मैंने जब कॉल सेन्टर जोइन किया था तब लगा था मेरी सारी पारिवारिक औरव्यक्तिगत समस्याओ का समाधान हो जाएगा, लेकिन बजाए समाधान के मेरा सिर्फ़नुक्सान ही हुआ, ना तो मैं सेविंग ही कर पाया और नाही अपने परिवार को हीकुछ दे सका, मेरी सोशल लाइफ बिल्कुल ख़तम हो चुकी है , मैं अपने शरीर कोबरबाद कर चुका हु, मैं चाह कर भी अपने घर वालों से ठीक से बात नही करपाता, अब लगता है के मैंने दस पन्द्रह हज़ार रुपये के लिए अपने भावी औरभविष्य दोनों का ही गला घोंट दिया है “सवाल यह भी उठता है के बेरोजगार नौजवान जाए कहा, दिन की प्राइवेट हो या सरकारी नौकरियां बिना सिफारिश मिलती नही और जो मिल भी जाए तो पैसे इतने कममिलते है के परिवार तो क्या अपना ख़ुद का भी खर्चा नही चले, घूम फिर कर नई पीढी को इन कॉल संतरों में ग्लैमर, पैसा, फ्री यातायात, खाना, औरदिन की नौकरी से ज्यादा पैसे मिल जाते है और ऐसे चीजों का एक युवा को रिझा लेना लाज़मी है! फिर वो अपने जीवन, स्वास्थ, और भविष्य से हीक्यो ना खेल बैठे ! सरकार हमेशा की तरह बेबस और वही पुराने जवाबो से लैस के कुछ तो है फिर इतनी नौकरिया आए कहाँ से, जनसँख्या भी तो नियंत्रद केबाहर है ! और आख़िर में रह जाता है इस सरकारी और प्राइवेट ज़ंग में दशकों पिसता युवा जो वक्त से पहले बूढा हो जाता है, और लाचारी और बेबसीको ही अपनी किस्मत मान बैठता है !

: – कनिष्क कश्यप

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: