मेरा देश – मेरा वोट !! (VOTE FOR BRIGHT FUTURE)

मेरा देश – मेरा वोट !! (VOTE FOR BRIGHT FUTURE)
लेकिन किसको और क्यों…??
*जो देश की सुरक्षा के सामने कोई समझौते नहीं करे.
*जो देश में बढ़ रहे आतंकवाद को रोकने के लिए कठोर कानून बनाये.
*जो आतंकवादियों और उनको पनाह देने वालों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करे.
*जो देश में तीन करोड़ से ज्यादा घुस आये बंगलादेशी घुसपैठियों पर कार्यवाही कर देश से बाहर करे.
*जो संसद के हमलावर अफज़ल गुरु को बचाने के बजाय फांसी देकर देश के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का सम्मान करे.
*जो अल्पसंख्यकों की भलाई के नाम पर बने देश विभाजन के नए दस्तावेज सच्चर कमेटी की सिफारिशों को तुरन्त रद्द करे.
*जो युवाओं के लिए रोज़गार के नए अवसर सृजन कर बेरोजगारी दूर करे.
*जो शिक्षा के बाजारीकरण को रोककर उसे भारत केन्द्रित बनाये.
“यह मेरे अपने मुद्दे हैं, फैसला मुझे ही करना है”
वोट डालना आपका संवैधानिक अधिकार ही नहीं अपितु सच्चे राष्ट्रभक्त होने का प्रमाण भी है. आपका वोट ‘२०२० के विकसित एवं शक्तिशाली भारत’ के लिए निर्णायक साबित होगा.
राष्ट्रहित में मतदान अवश्य करें.

साभार

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>"कबीरा " का आमंत्रण … जरूर पढ़े

>कबीरा शब्द अपने आप में एक व्यापक अर्थ समेटे हुए है । मेरे ब्लॉग का नाम कबीरा खड़ा बाज़ार में रखने के पिछे एक बड़ा उद्देश्य है। “कबीर ” मात्र एक संत का नाम नही , यह अपने आप में एक बड़ी अवधारणा है । आपका नाम जो भी हो, आप अपने आप में एक पुरी प्रक्रिया हैं। कनिष्क , यानि मैं , एक पुरी प्रक्रिया है , किसी को किसी जैसा बनने के लिए उस पुरी प्रक्रिया से गुजरना होगा। … “कबीरा ” शब्द मात्र से हींजो छवि उभरती है वह किसी आन्दोलन को प्रतिबिंबित करती है ।

“कबीर” ने जीवन पर्यंत तात्कालिक सामाजिक बुराइयों पे बड़े सुलझे ढंग से प्रहार किया। कबीर स्वयं में एक क्रांति थे । जाती धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर उन्होंने सामान रूप से सभी पर कटाक्ष किया। कबीर “संचार “या आप जनसंचार कहें , की आत्मा हैं। “जनसंचार का काम सूचना देना “बड़ी हीं तुक्ष मान सिकता को दर्शाता है । “सुचना देना “और “ज्ञान देना ” दोनों में बड़ा हीं अन्तर है। परन्तु आज हमरा बौधिक स्तर इतना निक्रिस्ट हो गया है की ये फर्क समझ में नही आता। समझ में जिसे आता भी है तो वो इसके व्यापक अर्थ को जीवन में उतारना नही चाहता । किताबों से उपार्जित ज्ञान वास्तव में सुचना मात्र है। जब तक उसमे जनकल्याण और सार्थक , शुभ का उद्देश्य न छिपा हो , ज्ञान शब्द की परिभाषा पूर्ण नही होती।तभी तो आज कथित ज्ञान को पाकर भी लोग , आतंकवाद में जीवन का उद्देश्य पाले रहे हैं। मुझे हमेशा हीं इस बात का गर्व रहा की , हम भारतीय भले हीं नागरिक जीवन प्रणाली के स्तर पर , सभ्य नही रहे हों , या यूँ कहे वर्तमान विकास की परिभाषा के कसौटी पर पिछड़े रहे हों। परन्तु मानव जीवन की जीवन की सम्पूर्णता का आभास जीतना हमारी जीवन प्रणाली में मिलता है , उतना कोई और सभ्यता में नही। इस बात में मैं स्वंसे ज्यादा विश्वास करता हूँ।

हाँ तो…. आज का कबीर , यानि संचार बाज़ार में खड़ा है । बाज़ार के हाथ का पिठ्ठू बनकर । एसे हजारों उदहारण मिल जायेंगे जब “पत्रकारिता ” पैसों की रखैल बन , उनके इशारे पर ठुमके लगाती है। चाहे वह , ऐड्स को लेकर उठाया गया बवाल हो , आयोडिन युक्त नमक का मामला हो या गत वर्ष के महाप्रलय पर दिखने जाने वाला नाटक । सब के पीछे एक सोची समझी , फुल –प्लान्ड साजिश है । मिडिया का बाज़ार आब चंद बड़े महाराथिओं के इशारे पर चलता हैं। विश्व की दस बड़ी कम्पनियो का पुरे विश्व के संचार तंत्र पे कब्ज़ा है । अंदाजा लगना मुश्किल नही कि ,इनमे से अधिकांश अमेरिका कि कंपनिया हैं, जैसे “टाइम वार्नर ” रयुपर्ट मर्डोक साहब या वाल्ट डिज़नी । इन दसो कम्पनिओं ने एक बड़ी रणनीति के तहत , एक दुसरे के हितों को देखते हुए , बड़ा शेयर खरीद रखा है । ताकि कोई किसी का अहित न कर सके । सभी के वेंचर एक दुसरे में हैं।

संचार के तीन प्रमुख साधन , टी वी , टेलीफोन और इंटरनेट ..आज कल एक हीं साथ इसीलिए उतरा जा रहा है , ताकि आपके पुरे संचार प्रक्रिया को नियंत्रीत किया जा सके। इस बाज़ार में इतनी बड़ी-बड़ी मछलियाँ हैं कि हमारे छोटे झींगा कि क्या बिसात ?

हाँ , जब कभी ये, छोटी झींगा मछली किसी बड़े मछली के रस्ते में रोड़ा बनती नज़र आती है तो अपने मानवधिकार , लेबर कानून या पर्यावरण के मुद्दे को लेकर इनपर केस ठोक, इनका बेडागर्क कर दिया जाता है। तब या तो ये झींगा, उस दानव कंपनी का अधिपत्य स्वीकार कर लेती है , उसका पिठ्ठू बन जाती है , या मटियामेट हो जाती है । तभी तो आज आपको मुफ्त में अखबार दिए जा रहे है , और तो और पढने के पैसे भी मिलते हैं , अभी भारत में ऐसा नही है। परन्तु आपको तब आश्चर्य नही होना चाहिए , जब कल आप मुफ्त में टी वी बाटते देख लें ।

इस विषय को लेकर मैं बड़ी गहरी चिंता में हूँ। और मैंने व्यापक शोध- परख के बाद ” कबीर” को लक्ष्य बनाया है। इसी उद्देश्य से अच्छे और सामान सोच रखने वालों को इकठ्ठा करने के लिए ब्लॉग जगत में कदम रखा। पूर्ण रूप से भारत में अश्था रखने वाला और भारत को पाश्चात्य द्वारा सुनियोजित सांकृतिक आतंकवाद से युद्घ लड़ने का उद्देश्य हीं अब जीवन धारा को नियंत्रित करेगा ।

“कबीर ” को केन्द्र में रख कर एक सच्ची, जीवंत पत्रकारिता करने का उदेश्य है। फिलहाल हम एक ई-जर्नल से शुरुआत करते हैं। इसमे आप जैसे ब्लोग्गर्स का स्वागत है । आप नेतृत्व सम्भाल कर इस बड़े लक्ष्य के आगे , बौने बने कनिष्क का मार्गदर्शन करें । हमारी योजना जून महीने से , इस ई- जर्नल शुरु करने की है । इसके लिए पुरी योजना को अन्तिम रूप दिया जा रहा है , और कई गणमान्य व्यक्तिओं का अपेक्षा अनुसार सहयोग भी मिल रहा है ।

आपके इस अभियान को और व्यापक बनने के लिए हमने एक वेब- portal http://www.swarajtv.com/ की सुरुआत कर दी है । ये आपकी स्वर को और बुलंदी प्रदान करेगी।

कबीर भी इस स्थिति से वाकिफ थे , तभी तो उन्होंने वर्षों पहले कह दिया

“कबीरा खड़ा बाज़ार में लिए लुकाठी हाथ
जो घर जारो आपनो, हो लो हमरे साथ …..”

please mail me your opinion to greatkanishka@gmail.com , या विषय पर कोई सवाल सुझाव या आपति हो , तो भी आपका स्वागत है।

>रफी साहब संगीतकार भी थे?

>बड़ा अजीब सा प्रश्न है ना? लेकिन क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि इतने गुणी गायक और संगीत के इतने बड़े ज्ञाता मुहम्मद रफी साहब ने किसी फिल्म में संगीत क्यों नहीं दिया। ये प्रश्न मेरे मन में बरसों से था और आखिरकार गुजरात समाचार के वरिष्ठ हास्य लेखक अशोक दवे की रफी साहब के गाये गैर फिल्मी सूचि से पता चला कि रफी साहब ने कुछ गानों में संगीत भी दिया है।
सूचि में चार गानों के नाम दिये हैं वे निम्न है।

  1. उठा सुराही
  2. दूर से आये थे साकी सुनके
  3. घटा है बाग है मय है सुबह है जाम है
  4. चले आ रहे हैं वो ज़ुल्फ़ें बिखेरे

मैने अपना संग्रह संभाला तो पता चला कि उठा सुराही वाला गाना तो अपने पास है, पर ऑडियो क्वालिटी थोड़ी उन्नीस है सो नेट पर खोजा और आखिरकार ईस्निप्स पर ये गीत मिल भी गया।

तो पस्तुत है मुहम्मद रफी साहब द्वारा संगीतबद्ध गैर फिल्मी गीत उठा सुराही ये शीश…..

http://fb.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/note_player.swf
utha surahi yeh.mp…

रफी साहब संगीतकार भी थे?

बड़ा अजीब सा प्रश्न है ना? लेकिन क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि इतने गुणी गायक और संगीत के इतने बड़े ज्ञाता मुहम्मद रफी साहब ने किसी फिल्म में संगीत क्यों नहीं दिया। ये प्रश्न मेरे मन में बरसों से था और आखिरकार गुजरात समाचार के वरिष्ठ हास्य लेखक अशोक दवे की रफी साहब के गाये गैर फिल्मी सूचि से पता चला कि रफी साहब ने कुछ गानों में संगीत भी दिया है।
सूचि में चार गानों के नाम दिये हैं वे निम्न है।

  1. उठा सुराही
  2. दूर से आये थे साकी सुनके
  3. घटा है बाग है मय है सुबह है जाम है
  4. चले आ रहे हैं वो ज़ुल्फ़ें बिखेरे

मैने अपना संग्रह संभाला तो पता चला कि उठा सुराही वाला गाना तो अपने पास है, पर ऑडियो क्वालिटी थोड़ी उन्नीस है सो नेट पर खोजा और आखिरकार ईस्निप्स पर ये गीत मिल भी गया।

तो पस्तुत है मुहम्मद रफी साहब द्वारा संगीतबद्ध गैर फिल्मी गीत उठा सुराही ये शीश…..

utha surahi yeh.mp…

>जग कहता मैं हूं अंधी-मैं कहती अंधा जग सारा: मन्नाडे द्वारा संगीतबद्ध एक और गीत

>आपको याद होगा मैने पिछले साल आपको मन्नाडे द्वारा संगीतबद्ध एक मधुर गीत “भूल सके ना हम तुझे”
सुनवाया था। उस गीत से पता चलता है कि मन्नाडे कितने गुणी, कितने विद्वान कलाकार हैं। गायक होने के साथ वे कितने बढ़िया संगीतकार मन्नादा हैं हमें पता ना था।
ओर्कुट में मेरी एक मित्र हैं रिचा विनोद! वे हिन्दी गीतों की बहुत बड़ी संग्राहक होने के साथ बहुत बड़ी प्रशंसिका हैं। बहुत सारे पुराने गाने उनके विशाल संग्रह में है। मैने मेल से यह गीत रिचाजी को भेजा था, तो मेल के प्रत्युतर में रिचाजी ने मुझे मन्नादा के संगीतबद्ध दो गीत और भेज दिये। बंदा तो खुश खुश!!
वे दो गीत निम्न है
जग कहता है मैं हूं अंधी- गीतकार प्यारे लाल संतोषी- फिल्म नैना 1953 और नहीं मालूम कि पिया जब से मिले तुम गीतकार कवि प्रदीप_ फिल्म चमकी। दूसरे गीत की ऑडियो क्वालिटी इतनी खास नहीं है और गाना का संगीत -गीत भी औसत सा ही है, परन्तु जग कहता मैं अंधी गीत बहुत ही मधुर है और ऑडियो भी ठीक है सो मुझे लगा यह गीत आपको भी सुनवाना चाहिये।
इस सुन्दर गीत को भेजने के लिये रिचा जी का बहुत बहुत धन्यवाद।

http://sagarnahar.googlepages.com/player.swf
Download Link: Jag Kehta Hai Mai Andhi_Lata_MannaDey_PLSantoshi_Naina1953.mp3

http://fb.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/note_player.swf
Jag Kehta Hai Mai …

जग कहता है मैं हूं अंधी
मैं कहती अंधा जग सारा
मैने ज्योत जगा ली उनकीऽऽ
खोकर आंखों का उजियारा

दूनिया ना देखूं में
देखूं तो है दिनराती
मैं देखूं…

ओ मेरे तनमन, ओ मेरे जीवन
ओ मेरे साथी
देखूं तो दिन राती, मैं देखूं…

आंखों वाले अंधे हैं वोऽऽ
जो खुद को पहचान ना पाये-२
मैं तुमको पहचान गई रे-२
जगा प्रीत की बाती
मैं देखूं तो है दिन राती, मैं देखूं…

अपने अपने रंग में दुनियाऽऽ
अपना अपना राग सुनाये-२
अपनी लगन का ले एक तारा
तेरे गीत नित गाती
मैं देखूं तो है दिन राती, मैं देखूं…

जग कहता मैं हूं अंधी-मैं कहती अंधा जग सारा: मन्नाडे द्वारा संगीतबद्ध एक और गीत

आपको याद होगा मैने पिछले साल आपको मन्नाडे द्वारा संगीतबद्ध एक मधुर गीत “भूल सके ना हम तुझे”
सुनवाया था। उस गीत से पता चलता है कि मन्नाडे कितने गुणी, कितने विद्वान कलाकार हैं। गायक होने के साथ वे कितने बढ़िया संगीतकार मन्नादा हैं हमें पता ना था।
ओर्कुट में मेरी एक मित्र हैं रिचा विनोद! वे हिन्दी गीतों की बहुत बड़ी संग्राहक होने के साथ बहुत बड़ी प्रशंसिका हैं। बहुत सारे पुराने गाने उनके विशाल संग्रह में है। मैने मेल से यह गीत रिचाजी को भेजा था, तो मेल के प्रत्युतर में रिचाजी ने मुझे मन्नादा के संगीतबद्ध दो गीत और भेज दिये। बंदा तो खुश खुश!!
वे दो गीत निम्न है
जग कहता है मैं हूं अंधी- गीतकार प्यारे लाल संतोषी- फिल्म नैना 1953 और नहीं मालूम कि पिया जब से मिले तुम गीतकार कवि प्रदीप_ फिल्म चमकी। दूसरे गीत की ऑडियो क्वालिटी इतनी खास नहीं है और गाना का संगीत -गीत भी औसत सा ही है, परन्तु जग कहता मैं अंधी गीत बहुत ही मधुर है और ऑडियो भी ठीक है सो मुझे लगा यह गीत आपको भी सुनवाना चाहिये।
इस सुन्दर गीत को भेजने के लिये रिचा जी का बहुत बहुत धन्यवाद।

Download Link: Jag Kehta Hai Mai Andhi_Lata_MannaDey_PLSantoshi_Naina1953.mp3

Jag Kehta Hai Mai …

जग कहता है मैं हूं अंधी
मैं कहती अंधा जग सारा
मैने ज्योत जगा ली उनकीऽऽ
खोकर आंखों का उजियारा

दूनिया ना देखूं में
देखूं तो है दिनराती
मैं देखूं…

ओ मेरे तनमन, ओ मेरे जीवन
ओ मेरे साथी
देखूं तो दिन राती, मैं देखूं…

आंखों वाले अंधे हैं वोऽऽ
जो खुद को पहचान ना पाये-२
मैं तुमको पहचान गई रे-२
जगा प्रीत की बाती
मैं देखूं तो है दिन राती, मैं देखूं…

अपने अपने रंग में दुनियाऽऽ
अपना अपना राग सुनाये-२
अपनी लगन का ले एक तारा
तेरे गीत नित गाती
मैं देखूं तो है दिन राती, मैं देखूं…

>सब ताज उछाले जायेंगे

>जब जुल्मो-सितम के कोहे-गरां



रुई की तरह उड़ जायेंगे



हम महकूमों के पांव तले



ये धरती धड़ -धड़ धड़केगी



और अहले -हकम के सर ऊपर



जब बिजली कड़ -कड़ कड़केगी



हम देखेंगे …………………….



सब ताज उछाले जायेंगे



सब तख्त गिराए जायेंगे



हम देखेंगे ………….



लाजिम है कि हम देखेंगे ……………………….



“फैज़ अहमद फैज़ “

>धर्मनिरपेक्षता के मायने ……………..

>

अपूर्वानंद का एक आलेख ” शुभ संकेत नहीं “१५ अप्रैल की जनसत्ता में पढ़ा । वचन भंग के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा कठोर दंड न देने की केवल और केवल एक घटना( बाबरी मस्जिद विध्वंस पर कल्याण सिंह को कठोर सजा न देना ) का जिक्र किया गया है । कावेरी के पानी बटवारे को लेकर उच्चतम न्यायालय के आदेशों की धज्जियाँ उडाने वाली राज्य सरकारों के निर्णय क्या भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत हैं ? लेखक सलवा-जुडूम और विनायक सेन को लेकर चिंतित हैं लेकिन नक्सलियों के हाथों मारे जाने वाले परिवारों के प्रति कोई संवेदना प्रकट नही करते ? केन्द्रीय पुलिस बल में तैनात मेरे एक सहपाठी को नक्सलियों ने मौत के घाट उतर दिया । अब उसकी विधवा और मासूम बच्ची का क्या होगा ? ऐसी हजारों नक्सल पीड़ित बेबाओं और मजलूमों के बारे में लेखक ने कभी दो शब्द भी लिखे हों मुझे याद नही आता । लेखक उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा अवयस्क मुस्लिम छात्र के दाढ़ी रखने और तालिबानीकरण के बीच रिश्ते खोजने का तो उल्लेख करते हैं , लेकिन इस मुद्दे को नही उठाते कि बारहवीं तक सामान शिक्षा एक सामान हो । वे इस पर भी नही बोलते कि ग्यारहवीं के छात्र के दाढ़ी रखने का क्या तुक है? धर्मनिरपेक्षता केवल वरुण गाँधी की टिप्पणी , गुजरात दंगों और विनायक सेन तक सीमित नही है ।

रमेश कुमार दुबे

>फागुन के दिन चार रे: आशाताई की आवाज और राग होरी सिन्धूरा

>आशाताई ने अपनी गायिकी में जो जो प्रयोग किये उनमें से कई हमने देखे- सुने हैं। संजय भाई पटेल जी ने हमें आशाजी की आवाज में मियां की मल्हार में एक तराना सुनाया था जिसे आज भी मैं कई बार सुनता रहता हूँ। आज मैं आशाजी के एक नये प्रयोग के बारे में बता रहा हूँ।
मीराबाई के प्रभाव से हिन्दी फिल्म जगत की कोई गायिका अछूती नहीं रह सकी। भारत रत्‍न एम. एस सुब्बुलक्ष्मी, लताजी, वाणी जयराम के अलावा कई गायिकाओं ने मीराबाई को गाया, तो भला आशाताई कैसे अछूती रहती!

मीराबाई की सहज समाधि पर आधारित इस रचना को सुनिये| आपको यूं महसूस होने लगेगा मानो आपके सामने आशाजी नहीं खुद मीराबाई अपने हाथों में इकतारा लेकर बजाती हुई झूम रही हो।

http://sagarnahar.googlepages.com/player.swf

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फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
बिन करताल पखावज बाजै अणहदकी झणकार रे।
बिन सुर राग छतीसूं गावै रोम रोम रणकार रे॥
सील संतोखकी केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे॥ ( ये पद प्रस्तुत गीत/भजन में नहीं है।)
घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे।
मीराके प्रभु गिरधर नागर चरणकंवल बलिहार रे॥

चलते चलते.. यही गीत आशाताई की ही आवाज में एक और दूसरे राग में- दूसरे रंग में सुनिये, साथ ही मीराबाई के अन्य भजन आशाताई कि आवाज में यहां सुनिये

श्रीमती मीना बातिश की आवाज में यहां सुनिये

फागुन के दिन चार रे: आशाताई की आवाज और राग होरी सिन्धूरा

आशाताई ने अपनी गायिकी में जो जो प्रयोग किये उनमें से कई हमने देखे- सुने हैं। संजय भाई पटेल जी ने हमें आशाजी की आवाज में मियां की मल्हार में एक तराना सुनाया था जिसे आज भी मैं कई बार सुनता रहता हूँ। आज मैं आशाजी के एक नये प्रयोग के बारे में बता रहा हूँ।
मीराबाई के प्रभाव से हिन्दी फिल्म जगत की कोई गायिका अछूती नहीं रह सकी। भारत रत्‍न एम. एस सुब्बुलक्ष्मी, लताजी, वाणी जयराम के अलावा कई गायिकाओं ने मीराबाई को गाया, तो भला आशाताई कैसे अछूती रहती!

मीराबाई की सहज समाधि पर आधारित इस रचना को सुनिये| आपको यूं महसूस होने लगेगा मानो आपके सामने आशाजी नहीं खुद मीराबाई अपने हाथों में इकतारा लेकर बजाती हुई झूम रही हो।


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फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
बिन करताल पखावज बाजै अणहदकी झणकार रे।
बिन सुर राग छतीसूं गावै रोम रोम रणकार रे॥
सील संतोखकी केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे॥ ( ये पद प्रस्तुत गीत/भजन में नहीं है।)
घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे।
मीराके प्रभु गिरधर नागर चरणकंवल बलिहार रे॥

चलते चलते.. यही गीत आशाताई की ही आवाज में एक और दूसरे राग में- दूसरे रंग में सुनिये, साथ ही मीराबाई के अन्य भजन आशाताई कि आवाज में यहां सुनिये

श्रीमती मीना बातिश की आवाज में यहां सुनिये

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