>मुस्लिम तुष्टीकरण से ज्यादा विकास पर विचार करें मुस्लिम समाज

>

१५ वीं लोकसभा का चुनाव के नतीजों से यह आभाष हो चुका है कि युग परिवर्तन के साथ-साथ लोकतंत्र में भी बदलाव होने की पूरी-पूरी संभावना है। ६२ वर्ष पूर्व भारत के चंद महानायको अर्थात नेताओं ने भारतवासियों के सहयोग से अंग्रेजों कि गुलामी की जंजीरों को तोड़ इस लोकतंत्रा का निर्माण किया और अपने आवाम की खुशी को ध्यान में रखकर संविधान का निर्माण कराया ताकि देश के हर नागरिक को समान अधिकार मिल सके। और वे अपना विकास अपने आधर पर स्वतंत्र रूप से कर पाएं ।
एक उस वक्त के नेता थे और एक आज के नेता है। दोनों में कितना अंतर आ गया है, जहां वे मर्यादित ढंग़ से अपने कार्यों को अंजाम देते, जनता के सुख-दुख से जुड़े होते, वहीं आज के नेता बिल्कुल विकृत और विपरित परिदृश्य में नजर आने लगे हैं। जनता का सुख-दुख देखना तो दूर शांति से जीने-मरने तक नहीं देते। कोई शांति से जीना चाहे तो वहां सांप्रदायिक उन्माद उत्पन्न कर देते है, जिससे उनमें असुरक्षा की भावना फैल जाती है । कोई क्षेत्रवाद के नाम पर उत्पात मचाता दिखाई देता है तो कोई जातिवाद के नाम पर। धर्म की तो कल्पना से भी परे। यहां तक की धर्म किसी और का लेकिन पैरोकार होते दूसरे धर्म का। जहां तक रही शांति से बात मरने की तो इस पर भी नेताओं ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेकनी शुरू कर दी है। शहीद मोहन चंद्र शर्मा जिनकी आत्मा आज भी व्याकुल और भटकती होगी, यह बताने के लिए कि मैं तो मर ही चुका हूं। जिसने जो किया सो किया अब मेरी आत्मा को तो शांति से जीने दो। लेकिन हमारे नेता इन्हें तो केवल सत्ता की कुर्सी का मोह है, जिसे पाकर वो स्वीस बैंक में करोड़ो की सम्पत्ति को दफना सकें । ताकि स्वीस बैंक वाले जन्नत में उनका सीट रिजर्व कर दें। वहां मखमली सेज बिछवादे। सोने-चांदी की थाली में खाने के लिए उपलब्ध् कराये, मंहगे-मंहगे आभूषण,वस्त्र का इंतजाम कर के रखवा दे साथ ही उनके भोग विलास के लिए शराब-शबाब की व्यवस्था कर दे।
वे सत्ता और पैसे की चमक में इस कदर अंधे हो चुके है कि उन्हें यह नहीं सुझता की मरने के बाद उसे एक तिनका भी नसीब न होगा साथ ले जाने के लिए। हां शास्त्रों में यह जरूर कहा गया है कि इंसान अपनी मृत्यु के बाद कर्म अवश्य ले जाता है जिसका उसके अगले जनम पर खासा असर देखने को मिलता है।
आज पूरे विश्व में आतंकवाद की समस्या है। जिसके लिए खास तौर पर मुस्लिम देश जिम्मेवार है। पाकिस्तान और तालिबान जैसे देश विशेष तौर पर इसके लिए जिम्मेवार दिखाई दे रहे है। क्योंकि वे पूरी तरह मुस्लिम राष्ट्र है। भारत की आबादी तेज रपफ्‌तार से बढ़ रही है और जैसे-जैसे ही मुसलमानों की संख्या में भी गुणात्मक वृद्धि हो रहा है। वैसे-वैसे ही देश में भी अशांति और अस्थिरता का वातावरण बढ़ता जा रहा है। आज इस देश में जो भी नेता आगे बढ़ना चाहता है वो मुस्लिम समाज को अवश्य बैसाखी बनाते हैं। वह किसी भी धर्म या जाति का हो, फ़िर चाहे उसमें सत्ता चलाने की काबिलियत हो या ना हो। वह हर वक्त उन्हें सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करता है। क्योंकि यही धर्म है जो बिल्कुल सीढ़ी के समान है क्योंकि इनमें अनेक जातियां है बावजूद ये आज भी सीढ़ीयों की तरह एक लय में पिरोये हुए है। और बेचारा यह मुस्लिम समाज बस सीढ़ियों की तरह बनकर इन चंद नेताओं के दबाव की मार को सहता और उनकी पैरों तले कुचलता रहता है।
यहीं वजह है कि मुस्लिम समाज ६१ सालों में केवल एक चुनावी ठप्पा बनकर रह गया है। सीढ़ी छाप का ठप्पा जिसके लगने मात्रा से इसका पैरोकार नेता या पार्टी सत्ता को प्राप्त कर अपना उल्लू सीध करता, सत्ता रूपी आम के मीठे रसभरे मलाई का भरपूर आनंद उठाता और गुठलियां इनकी तरफ फेक देता है । आज आजादी के ६२ वर्ष हो चुके है बावजूद देश में पिछड़ा हुआ आज कोई है तो वह मुस्लिम समाज ही है।
आज देश में मुसलमानों के मसीहा पार्टियों में कांग्रेस, राजद, सपा, लोजपा, बसपा आदि का विशेषतौर पे नाम आता है। कांग्रेस तो ६१ सालों से उनका मसीहा बनी हुई है। लेकिन विडम्बना यह रही कि विकास न तो वह मुसलमानों का कर सके न ही देश का। लेकिन उनकी इसी एक तरपफा झुकाव ने भाजपा जैसी हिन्दूत्ववादी पार्टी को जन्म देने का काम अवश्य किया है। मुसलमानों के बहुसंख्यक होने के बावजूद उसे अल्पसंख्यक बताने की होड़ ने भी भाजपा को हिन्दूत्व का नारा लगाने पर मजबूर किया है।
इस चुनाव में राजनेताओं की बयानबाजियों से तो कुछ ऐसा ही दृष्टिगत हो रहा है। आज भारत में भी पाकिस्तान की तरह आतंकवाद का खतरा बढ़ चुका है, जिससे यहां का वातावरण भी बिल्कुल अशांत हो चुका है। राजनीतिज्ञों की बयानबाजियों से आज हर शख्स घबराया हुआ है। ऐसी विकृत राजनीति में राजनीतिज्ञो की मानसिकताओं और विचारों को देखकर देश के कुछ महानायकों पर रोस भी प्रकट होता है कि देश को उन्होंने क्यों बांटा और बांटा भी तो सही रूप में क्यों नहीं। अगर पाकिस्तान को पूर्ण मुस्लिम राष्ट्र बनाया तो भारत को पूर्ण हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं? यह अन्याय भारतवासियों विशेष तौर से हिन्दुओं के साथ क्यों? लेकिन जो हुआ सो हुआ। अब इसे बदला नहीं जा सकता। हमे देश को इसी रूप में सभी को स्वीकार करने की जरूरत है।
भारत देश का धर्मनिरपेक्ष होना हमारे लिए गौरव की बात है। लेकिन डर यह लगता है कि चंद राजनीतिज्ञों की मौकापरस्ती और मुस्लिम तुस्टीकरण की वजह से यह शांतिप्रिय माना जाने वाला देश जिसका संदेश हर वक्त वसुधैब कुटुम्बकम रहा है, आने वाले वक्त में बिखराव के कटघरे में न खड़ा हो जाये। और यह तब तक जारी रहेगा जबतक आबादी के बढ़ने की रफ्‌तार तेज रहेगी और मुसलमानों में गुणात्मक संख्या में बढ़ोत्तरी होती रहेगी। वह भी उनकी विचार और शिक्षा में शून्यता के साथ।
इसलिए अब मुस्लिम समाज को विचार करने की जरूरत है कि वह विकास पर जोर दे। धर्म की राजनीति करने वालों का मुह-तोड़ जवाब दे। जो राजनीतिक दल विकास का कार्य को दरकिनार कर चुनावी सभाओं में केवल मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करता दिखाई दे, उसे वे अपने वोट की ताकत से सबक सीखाने का काम करें। वह पार्टी विशेष से ज्यादा अपने प्रतिनिधियों के चरित्र पर जोर दे। जैसा कि इस चुनाव के दौरान कई सामाजिक संगठनों एवं महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने जनता को अपने संबोधन में कहा। अगर विकास दिल्ली, गुजरात और छत्तीसगढ़ करता है तो इसका यह अर्थ नहीं कि केवल विकास हिन्दूओं का होगा बल्कि इसका लाभ मुसलमानों को भी होगा। अगर मुस्लिम और पिछड़ों का मसीहा कहे जाने वाले लालू और पासवान ने अपने शासनकाल में बिहार को पिछड़ा बना दिया तो केवल पिछड़े हुए लोगों में हिन्दू या पिछड़ा वर्ग शामिल नहीं है बल्कि बहुतायत की संख्या में इसके शिकार मुस्लिम समाज भी हुआ है। इसलिए इन तुष्टीकरण करने वाले नेताओं से आज बचने की जरूरत है। खासतौर से मुस्लिम समाज को। क्योंकि इसका लाभ न केवल मुस्लिम समाज को होगा बल्कि इससे देश की प्रगति पर भी खासा असर देखने को मिल सकेगा।
नरेन्द्र ‘निर्मल’

>आतंकवादी बनाम मच्छर

>

एक मच्छर और एक आतंकवादी
दोनो की बढ़ रही है आबादी
दोनो का नाता बस खून से है
एक इंसान का खून पीता है
तो दूजा खून बहाता है।
इसलिए पीने वाला मच्छर
और बहाने वाला आतंकवादी कहलाता है
दोनों में कई समानताएं और विषमताए हैं
समानताए हैं दोनों कौम नहीं देखते
बस खून देखने की अभिलाषा होती है ।
मच्छर की मानें तो
स्वाद का मजा बराबर का आता है
मगर आतंकवादी कहते
जिहाद में सब जायज हो जाता है ।
खून जिसका भी बहे
दर्द का एहसास इंसानों को ही होता है
हाँ एक और समानता है दोनों में
दोनों छुप कर वार करने में माहिर हैं ।
सामने आकर लड़ने का कलेजा नहीं होता
एक सोते हुए व्यक्ति का जीना हराम कर देता है
तो दूसरा इतना बड़ा जख्म देता है
कि जिंदगी जीना हराम लगता है ।
जहां तक रही इनके सफाए की बात
तो आज तक मच्छर साफ नही हो पाए
तो भला इन कायरों को
कौन साफ कर पाए ।
एक ही उपाय है
सही मात्रा में लगातार
डीडीटी का छिड़काव
और दूसरा वोट के जरिए
ऐसे राजनीतिज्ञ पार्टियों का सफाया
जिन्होंने आतंकवाद को कौमी रंग देकर
इसका भरपूर लाभ चुनाव में
उठाया ।

रचनाकार :- नरेन्द्र ‘निर्मल’

>चुनाव विश्लेषण : दलित बस्तियों का वोट % ९० से खिसक कर १८-३० % पर पहुँचा

>

अभी -अभी हमारे गणतंत्र या लोकतंत्र अथवा प्रजातंत्र जो भी कहें , क्योंकि वो बस कहने भर को हमारा है बाद बाकि इसकी आत्मा अर्थात संविधान तो आयातित ही है ना , का कुम्भ समाप्त हुआ है । वैसे तो यह कुम्भ मेला कम अखाडा ज्यादा लगता है पर अखाड़े की धुल मिटटी की जगह यहाँ भ्रष्टाचार के कीचड़ उछाले जाते हैं । आशंकाओं के विपरीत कांग्रेस का २०० सीटों पर जीत कर आना और यूपीए द्वारा बहुमत से सरकार बनाये जाने पर लोग खुश नजर आ रहे है। सालों बाद बहुमत वाली सरकार का भ्रम और जीत की खुशी में जिन तथ्यों को नजरअंदाज किया गया उन पर एक निगाह डालना निहायत ही जरुरी है ।
इस चुनाव में एक महत्वपूर्ण फेरबदल दलितों के मत %में हुआ । अब तक के चुनाव में सर्वाधिक मतदान करने वाले दलित वर्ग का मत % ९० से खिसककर १८ -३० % तक पहुच गया । भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा मतदाता वर्ग के इतने कम वोट के बावजूद भी वोट% हर बार की तरह ५०- ६० % के बीच रहा । और मतदान पर बहुत ज्यादा प्रभाव नही डाल पाया । तो फिर ऐसा क्या हुआ ? दरअसल , इस मत को संतुलित करने का कार्य किया देश के पप्पू वर्ग ने जिसके लिए सरकारी और गैर गैर सरकारी संगठन पिछले २ साल से लगातार प्रचार कर रहे थे । ‘जागो रे ‘ और ‘ पप्पू वोट नही देता ‘ जैसे जुमले बच्चे -बच्चे की जुबान पर चढ़ गया था । पप्पू होने की डर से घंटों कतार में खड़े रहने की चुनौती स्वीकार कर उच्च मध्य वर्ग पहली बार घर से बाहर निकला और इन्होने अपनी सुविधाभोगी आदतों की वजह से मनमोहन सरकार की नीतियों के समर्थन में हाथ का साथ दिया । सरकार के द्वारा गठित एक जांच आयोग के अनुसार आज भी भारत की ८०% आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने को मजबूर है। और मनमोहन सरकार की विकास की पश्चिमी मॉडल को अपनाने की वजह से छोटे छोटे कस्बों तक बहुराष्ट्रीय कंपनी की पहुच से देश का एक छोटा वर्ग विकास करता रहा जिसमे अधिकतम संख्या मझोले कद वाले पूंजीपतियों की है । अगर पिछले ५ साल के कांग्रेसी कार्यकाल को देखे तो यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है की देश में आर्थिक असमानता बढ़ी है जिसका सीधा सीधा प्रभाव लोगों के जनजीवन पर पड़ा । लेकिन पप्पुओं को अपना हित देखना था । बहुराष्ट्रीय कंपनियों से मोटी रकम उन्हें तभी मिल पाती जब मनमोहन ३०% से भी कम आबादी के लिए बनाये गए आर्थिक नीतियाँ देश में लागु हो और ऐसे में सिवाय कांग्रेस के उनके पास अन्य सशक्त विकल्प मौजूद नही था । दिल्ली , उत्तर प्रदेश और हरियाणा में पप्पुओं ने बाजी पलटने में महती योगदान दिया ।

दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि कांग्रेस ने मीडिया को बहुत ही बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया। इसके जरिये सरकार के पक्ष में सकारात्मक माहौल बनने में सफलता हासिल की । चूँकि ये सत्ता में थे और इन्होने इस बात का भरपूर फायदा उठाते हुए सत्ता संसाधनों के जरिये चौकाने वाले परिणाम दिए । । वहीँ बी .जे .पी का प्रचार प्रबंधन बेहद ही खोखला साबित हुआ। बी जे पी द्वारा बंद कमरे में ऑनलाइन गतिविधयों द्वारा प्रचार कर जीत सुनिश्चित करने की योजना को अंतत: ऑफ़ लाइन होना पड़ा। जमीन से जुडी पार्टी के कार्यकर्ताओं की घटती भागीदारी ने पार्टी को अच्छा नुक्सान पहुँचाया । चुनाव अभियान में बाहर से आयात किए गए लोगों ने लुटिया डूबने का ही काम किया । किसी तरह कैडरों ने अपना वोट तो डाल दिया पर लोगों से वोट जुटाने की अपनी जिम्मेदारियों को नजरअंदाज कर दिया । प्रचार के लिए प्रसून जोशी की जिस यूटोपिया नाम की कंपनी को ठेका दिया गया था उसने अपने नाम के अनुरूप ही परिणाम भी दिए ।सीधे-साधे मनमोहन और युवा के नारों ने भी कांग्रेस के पक्ष में हवा बनाई। अगर इन पर गौर किया जाए तो यह चुनाव मनमोहन बनाम आडवाणी कम राहुल बनाम आडवाणी ज्यादा लग रहा था । इस चुनाव को बी जे पी की हार के बजाय कांग्रेस की जीत के तौर पर देखना ज्यादा बेहतर होगा । इस चुनाव में पहली बार मीडिया की मुख्यधारा का बाजारू चरित्र खुलकर सामने आया और इसने तयशुदा पैकेज पर विज्ञापन को ख़बर बनाकर बेचने की मुहीम चलायी । मीडिया पर पैनी नजर रखने वाले प्रभाष जोशी लिखते है कि चुनाव की ख़बरों का काला धंधा अख़बारों ने कोई छुपते छुपाते नही किया बल्कि खुलेआम किया और बिना किसी शर्म और झिझक के । न तो इन्हे पैसे लेने में शर्म आई न ही ख़बर बेचने में लज्जा महसूस हुई । कई समाचारपत्रों ने तो बाकायदा चुनाव कवरेज के रेट कार्ड भी छपा रखे थे ।भिन्न-भिन्न ख़बरों के लिए अलग-अलग तयशुदा राशियां ली गई । मसलन ,प्रचार अभियान के लिए ८ गुना १२ के रंगीन कवरेज के लिए ६ सादे के ४ हजार ८०० रूपये , जनसंपर्क के उतने ही कवरेज के ३० और २४ हजार ,समर्थको की अपील ९ गुना १२ के ५ और ७ हजार , जनसभा रैली के १० गुना १६ के ३० हजार , प्रायोजित साक्षात्कार ७ गुना १२ के as और ८ हजार, मांग पर विशेष कवरेज २५ गुना १६ के २५ और २० हजार, विशेष फीचर इन्नोवेशन ५१\३३ के मोल भाव से दाम तय होंगे , चुनाव चिन्ह के साथ वोट देने की अपील ८ गुना १२ के १८ से १४ हजार, प्रमुख मुद्दों पर बयान और प्रतिक्रिया के अलग, फोटो फीचर आदि के अलग , दीगर बात ये है की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी इस से अछूती नही रही । ये तो हुई चुनाव प्रचार के दौरान मीडिया कवरेज की बात लेकिन चुनाव परिणामों की घोषणा में जैसे ही कांग्रेस के बहुमत पाने की बात सामने आई मीडिया ने चीख चीख कर राहुल के युवा फैक्टर का गुणगान करना शुरू कर दिया। परिणामो के सामने आते ही ग्राफिक्स के जरिये यह दिखाना शुरू कर दिया की राहुल गाँधी जहा जहा प्रचार के लिए अपना चरण रखा वहां कांग्रेस को जीत हासिल हुआ । इस वाकये से यह स्पष्ट हो जाता है कि चुनाव प्रचार से चुनाव परिणाम आने तक वर्तमान “प्रायोजित मीडिया” ने अपने नाम के अनुरूप कार्य करते हुए व्यक्तिगत महिमामंडन कर राहुल गाँधी को जन नेता साबित करने में कोई कसार नही छोड़ा । कुछ लोग तो यह भी कहते है कि मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के चुनावी केम्पेन हेतु तथाकथित स्वघोषित नैतिकतावादी पत्रकारों ने ४० करोड़ की मांग की जिसमे ८ करोड़ रूपये ही उन्हें मिले । पूरे पैसे न देने का खामियाजा भाजपा को अपनी जनाधार वाली सीटें गंवाकर चुकानी पड़ी । इस तरह के अनेक किस्से या यूँ कहें कि ख़बरों के पीछे की ख़बर उभरकर सामने आयेगी । नैतिकता के ठेकेदारों यह चरित्र वाकई लोकतान्त्रिक ढाँचे के लिए खतरा बनकर सामने आया है । लोकतंत्र के वाच डॉग की भूमिका निर्वाह करने वाले चौथे स्तम्भ का यूँ भरभराकर गिरना दुखद है । बाजार के इस नंगे नाच में कुछ लोग ऐसे भी है खनक रास न आई और शायद उन्हीं लोगो के बदौलत मीडिया का यह घिनौना रूप आम लोगों के सामने आ सका । प्रभात ख़बर के हरिवंश नारायण ने तो बाकायदा मुख्य पृष्ट पर इस खेल का पर्दाफाश किया और इससे बचने के लिए helpline number भी जारी किया । ऐसे लोगों से थोडी बहुत आशा बची हुयी है लेकिन चुनाव का यह कुम्भ संपन्न होने के हप्ते २ हप्ते बाद भी इन चीजों की चर्चा बड़े पैमाने पर अभी भी नजर नहीं आती है । ऐसा लगता है कि देश के बौद्धिक वर्ग में एक बहुत बड़ा शून्य कायम हो गया है । आज के इस भौतिकवादी युग में सारे मूल्य आज बालू के भीत पर खड़े नजर आते है । आज के दौर में इंसान की कीमत और इंसानियत का मोल वस्तु की तुलना में गौण हो गया है। मुझे एक वाकया याद आता है । हमारे एक मित्र को एक महानगरीय पार्टी में शामिल होने का आमंत्रण मिला और उन्हें दरवाजे पर सिर्फ़ इस लिए रोक दिया गया क्योंकि उनके पास काला जूता नहीं था । पूछने पर जवाब यह दिया गया कि आपके पास काले जूते नहीं होने से ड्रेस कोड का उल्लंघन होता है ! इससे बड़ी विडंबना क्या होगी ! आदमी से ज्यादा जूतों को महत्त्व दिया गया। अंतत हमारे उक्त मित्र सड़क पर कूड़ा चुन रहे एक आदमी से जूता बदलकर पार्टी में शरीक हुए।
बहरहाल मुद्दे पर लौटते हुए प्रभाष जोशी तो मीडिया के इस गैर लोकतान्त्रिक मुनाफाखोरी को जनता के साथ धोखाधडी बताते हुए कहते है कि इन्होनें समाचार पत्र का काम छोड़ कर छापे खाने का काम किया है । जिसकी वजह से इनका रजिस्ट्रेशन रद्द कर इनको प्रिंटिंग प्रेस का पंजीयन देना चाहिए । इसी तरह जिस उम्मीदवार की जितनी खबरें छपी है उसको विज्ञापन की दर से उनके चुनाव खर्च में जोड़ा जाना चाहिए। कानून न हो तो अगली संसद को बनाना चाहिए पर इन्हीं मीडिया की बदौलत जीत कर सांसद में आए जन प्रतिनिधि से ऐसी कानून की उम्मीद करना बेकार है !

अंत में इस चुनाव की एक अभूतपूर्व पहलु की चर्चा करना जायज समझता हूँ। विदेशी ताकतों का सीधा हस्तक्षेप बार इस चुनाव में देखने को मिला हालाँकि इस तथ्य की सबूतों के साथ पुष्टि नहीं की जा सकती । जानकारों के मुताबिक अमेरिकी राजदूत डेविड मलफोर्ड ने सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के लिए जोड़ तोड़ की राजनीति में अहम् भूमिका निभाई । तथाकथित अमेरिकी हस्तक्षेप का नमूना २००८ परमाणु डील के मसले पर वामपंथियों द्बारा साथ छोड़ देने से अल्पमत में आई संप्रग सरकार के शक्ति प्रदर्शन के दौरान भी देखने को मिला था जब सपा के अमर सिंह को अमेरिका बुलाया गया । अब वहां जाते ही कौन सी अमेरिकी घुट्टी पिलाई गई जो वापस आते ही अमर ने परमाणु करार को देशहित में मानते हुए मनमोहन सरकार को समर्थन देने का फ़ैसला कर लिया । अस्तु, चुनाव के दौरान जानबूझ कर दबाये गए इन तथ्यों के आधार पर चुनाव परिणामो को जनता का स्पष्ट जनादेश मानना शायद बेमानी होगी । देखते रहिये आगे आगे होता है क्या ? जिस दिन जनता को जन्नत की हकीकत मालुम होगी इस सरकार का जनाजा करोडो कन्धों पर निकाला जाएगा। ऐसा मैं नही भारतीय लोकतंत्र का पिछला अनुभव कहता है । जब ४०० से ज्यादा सीट लाने वाली राजीव गाँधी की सरकार को मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ सकता है तो तब की तुलना में अपनी आधी ताकत रखने वाली वर्तमान सरकार के स्थायित्व की गारंटी कौन लेगा ?

>हास्य-व्यंग…….: एक व्यंग : सियारिन और हुआं हुआं…..#links#links

>हमें आप सबों की सहायता चाहिए

>हम कुछ युवा मित्र इन छुट्टियों में एक दस्तावेज तैयार कर रहे हैं । ” भारत-संस्कृति और संभावनाएं ” . दरअसल गुलामी के पिछले २०० वर्षों में हमने खुद को भुला दिया है . भारतीय संस्कृति के संक्रमण काल की शुरुआत तो इस्लामी शासन से ही हो जाता है . लेकिन मुस्लिम शासकों ने सीधे धर्म परिवर्तन और सत्ता में रहने की कवायद में ही समय गुजर दिया . वो भारतीय जनमानस में छुपी संस्कृति के सूक्ष्म तत्वों को नहीं परख सके . जहाँ तक हुआ हमारा प्रभाव उन पर पड़ा . वहीँ अंग्रेजों के शासन काल में सीधे हमला न कर हमारे इन सूक्ष्मतम मूल्यों , हमारे मन में बसे अतीत के गौरव को धीरे -धीरे कम किया जाता रहा और आज हम लगभग शून्य की स्थिति में पहुँच गए हैं . १८५७ की क्रांति के बाद ही वो समझ गए थे कि भारतीयों kee ताकत इनकी सांस्कृतिक एकता और गौरव है . जिस मूल्यों और विचारों के दम पर ये १० हजार सालों से केवल जिन्दा नहीं बल्कि सोने की चिडियां और विश्वगुरु बन कर रहे उसे मिटाए बिना यहाँ पर राज संभव नहीं . तब उन्होंने बिलकुल सुनियोजित रूप में मनगढ़ंत सिद्धांतों के प्रचार से हमारे अन्दर हीनता का भाव पैदा करना प्रारंभ किया . बहुत जल्द ही हताशा में हमें ऐसा लगने लगा हम गलत थे और हमें पश्छिम का अनुकरण करना चाहिए . चाहे वो इंडो-आर्यन सिधांत हो या पश्चिमी मानकों -मूल्यों को कार्य व्यापार में शामिल करना . इस २०० सालों में हम स्वयं को ऐसा भूले कि आजादी के बाद भी उसका स्मरण न आया . हमने सत्ता , शासन , व्यवस्था , शिक्षा , व्यापार हर जगह उनके मोडल को नहीं भूल पाए . हम भूल गए कि चीजे सापेक्ष होती है जो देश- काल-परिस्थिति के हिसाब से संचालित होती है . परिणाम हमारे समक्ष है . आज भारतीय बौधिक जगत में भारतीय पक्ष / भारतीय दृष्टिकोण से विषय -वस्तु को देखने समझने का सर्वथा अभाव है .हमारा यह प्रयास शून्य को समाप्त करने की दिशा में एक छोटा प्रयत्न है . आज की समस्यायों और मसलों का हल भारतीय संस्कृति की परम्परा में ढूंढ़ कर नए रूप में व्याख्यायित करने का कार्य कठिन तो है पर मुश्किल नहीं . हम आज के प्रगतिशील भारतीयों को पीछे लौटने की नहीं बल्कि भविष्य की संभावनाओ को अपनी संस्कृति में खोजने की बात कर रहे हैं . स्वतंत्रता प्राप्ति के साठ सालों तक दूसरो की व्यवस्था में जी कर हम देख चुके . संविधान का साठवां वर्ष आने वाला हैं . और व्यवस्था को लेकर एक बड़ी बहस खड़ी करने की दिशा में दर्जनों विद्वत जन लगे हुए हैं . हम भी इस आन्दोलन में अपनी भूमिका , अपना योगदान चाहते हैं . आप से भी अनुरोध है हमारा साथ दें .
इसके लिए आप सम्बंधित विषयों पर अपने आलेख हमारे मेल jay.choudhary16@gmail.com पर भेजें . ताकि सम्बंधित विषय में एक अच्छा साहित्य उपलब्ध हो सके . जय हिंद जय भारत !
विषय :- परिवार व्यवस्था (सामाजिक सुरक्षा , बचपन की सहज और नैसर्गिक शिक्षा तथा संस्कृतिक मूल्यों के सन्दर्भ में )

>भाजपा ने पश्चिम बंगाल में वामपंथी खेमे की इज्जत बचाई… Vote Share of BJP, Left Parties and Congress in Bengal

>भाजपा को पानी पी-पीकर कोसने वालों में वामपंथी सबसे आगे रहते हैं, ये अलग बात है कि भाजपा को गरियाते-गरियाते कब वे खुद ही पूरे भारत में अप्रासंगिक हो गये उन्हें पता ही नहीं चला। लेकिन इस लेख में प्रस्तुत आँकड़े सिद्ध करते हैं कि यदि पश्चिम बंगाल में भाजपा एक “ताकत” के रूप में न उभरती तो वामपंथियों को मुँह छिपाना मुश्किल पड़ जाता। सिर्फ़ और सिर्फ़ भाजपा के कारण पश्चिम बंगाल में कांग्रेस-तृणमूल गठबन्धन को कम से कम 7 सीटों का नुकसान हुआ, जो कि वामपंथी खाते में गई, वरना लाल बन्दरों का तो पूरा “सूपड़ा” ही साफ़ हो जाता। ज़रा एक नज़र डालिये इन पर–

1) बर्दवान सीट पर सीपीएम के उम्मीदवार की जीत का अन्तर है 59,419, जबकि भाजपा उम्मीदवार को मिले 71,632 वोट, सोचिये यदि वहाँ भाजपा का उम्मीदवार ही न होता तो?

2) जलपाईगुड़ी सीट पर भाजपा के उम्मीदवार सुखबिलदास बर्मा ने 94,000 वोट लेकर कांग्रेस को नहीं जीतने दिया, यहाँ से सीपीएम का उम्मीदवार 90,000 वोट से जीता।

3) अलीपुरद्वार में आरएसपी के मनोहर टिर्की जीते 1,12,822 वोट से जबकि भाजपा को आश्चर्यजनक रूप से 1,99,843 वोट मिले और कांग्रेस हार गई।

4) बेलूरघाट सीट पर आरएसपी का उम्मीदवार बड़ी मुश्किल से 5,105 वोट से जीत पाया, जबकि भाजपा उम्मीदवार को मिले 60,000 वोट।

5) फ़ॉरवर्ड ब्लॉक का उम्मीदवार कूच बिहार सीट से 33,632 वोट से जीता, यहाँ भाजपा की झोली में 64,917 वोट आये।

6) मिदनापुर में भाकपा के प्रबोध पाण्डा, भाजपा को मिले 52,000 वोटों की बदौलत हारने से बच गये।

माकपा के स्थानीय नेता भी मानते हैं कि भाजपा के कारण हम भारी शर्मिन्दगी भरी हार से बच गये वरना कांग्रेस-ममता को लगभग 31 सीटें मिलतीं। लगभग यही आरोप ममता बैनर्जी ने भी लगाया और कहा कि भाजपा के उम्मीदवार, वामपंथी खेमे को मदद पहुँचाने के लिये खड़े हैं (हा हा हा हा)।

इस सारे घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि जो बात भाजपा के मामूली कार्यकर्ता को भी मालूम है उससे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व कैसे अनजान है, कि भाजपा को अब अकेले चुनाव लड़ना चाहिये। NDA वगैरह बकवास है, यह भाजपा की बढ़त तो रोक ही रहा है, साथ ही साथ उसे वैचारिक रूप से भ्रष्ट भी कर रहा है। “सेकुलरों” की बातों और सेकुलर मीडिया के प्रभाव में आकर भाजपा ने अपनी छवि बदलने का जो प्रयास किया है, अब सिद्ध हो चुका है कि वह प्रयास पूरी तरह से असफ़ल रहा है। सेकुलर बनने के चक्कर में भाजपा “धोबी का कुत्ता” बन गई है। आँकड़ों से स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा अकेले चुनाव लड़कर राज्य स्तर पर “तीसरी ताकत” के रूप में उभरी है, ऐसा ही समूचे देश में आसानी से किया जा सकता है। जब किसी “मेंढक” से गठबन्धन ही नहीं होगा, तो उसके फ़ुदकने का कोई असर भी नहीं होगा, तब भाजपा अपनी वैचारिक बात जनता तक ठोस रूप में पहुँचाने में कामयाब होगी। इस रणनीति का फ़ायदा दूरगामी होगा, यह करने से लगभग प्रत्येक गैर-भाजपा शासित राज्य में भाजपा दूसरी या तीसरी शक्ति के रूप में “अकेले” उभरेगी। ऐसे में स्थानीय पार्टियाँ बगैर शर्त के और स्वाभाविक रूप से भाजपा के पाले में आयेंगी क्योंकि देर-सवेर कांग्रेस या तो उन्हें “खाने” वाली है या अपने दरवाजे पर अपमानित करके खड़ा करेगी, तब ऐसी स्थानीय पार्टियों से “लोकसभा में हम और विधानसभा में तुम” की तर्ज पर समझौता किया जा सकता है, जैसा कि पश्चिम बंगाल में दार्जीलिंग सीट पर किया गया और जसवन्त सिंह तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद विजेता बने, कृष्णनगर में भी भाजपा प्रत्याशी को 1,75,283 वोट मिले। भाजपा के प्रदेश महासचिव राहुल सिन्हा कहते हैं कि “यह सफ़लता बंगाल में हमारे संगठनात्मक ढाँचे की ताकत के कारण मिली है…”। क्षेत्रीय पार्टियाँ हों या वामपंथी, ये लोग जब तक भाजपा को अपना प्रतिद्वन्द्वी नम्बर एक मानते रहेंगे, तब तक कांग्रेस मजे करती रहेगी, क्योंकि उसने बड़ी चतुराई से अपनी छवि “मध्यमार्गी” की बना रखी है और “धर्मनिरपेक्षता” नाम का ऐसा सिक्का चला दिया है कि बाकी सभी पार्टियों को मजबूरन कांग्रेस का साथ देना ही पड़ता है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सभी 42 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ी, एक सीट (दार्जीलिंग) जीती, लेकिन कम से कम दस सीटों पर उसने कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया। एक चुनाव हारने पर भाजपा को दिन-रात सलाह देने में लगे ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे भी “लाल-गढ़” में भाजपा प्रत्याशियों को मिले वोटों को देखकर हैरान होंगे, लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है, जिस तरह उत्तरप्रदेश में कांग्रेस अकेले लड़ी और जीती, भाजपा भी अकेले ही लड़े। इस बार नहीं तो अगले चुनाव में, अगले नहीं तो उसके अगले चुनाव में, जीत निश्चित मिलेगी। आज लाखों-करोड़ों लोग कांग्रेस-वामपंथियों की नीतियों से त्रस्त हो चुके हैं, उनकी भावनाओं को आवाज़ देने वाली कोई पार्टी उन्हें दिखाई नहीं दे रही, इसलिये उन्होंने कांग्रेस को ही चुन लिया, जब उनके पास एक सशक्त विकल्प मौजूद रहेगा तब वे निश्चित ही उसे चुनेंगे। लेकिन लौहपुरुष का विशेषण और कंधार जैसा शर्मनाक समर्पण तथा राम मन्दिर आंदोलन और जिन्ना की मज़ार पर जाने जैसा वैचारिक अन्तर्द्वन्द्व अब नहीं चलेगा। पश्चिम बंगाल जैसे राजनैतिक रूप से संवेदनशील, लगभग 23 सीटों पर 40% से अधिक मुस्लिम वोटरों तथा वामपंथियों द्वारा इतने वर्षों से शासित राज्य में भाजपाई उम्मीदवारों को कई जगह एक लाख से अधिक वोट मिल रहे हैं, इसका क्या अर्थ है यह मेरे जैसे छोटे से व्यक्ति को समझाने की जरूरत नहीं है।

रही बात वामपंथियों की तो उन्हें भाजपा का शुक्र मनाना चाहिये कि उनकी कम से कम 6-7 सीटें भाजपा के कारण ही बचीं, वरना इज्जत पूरी लुट ही गई थी, लेकिन वे ऐसा करेंगे नहीं। रस्सी तो जल गई है, मगर……

(खबर का मूल स्रोत यहाँ है)

, , , , , , , ,

भाजपा ने पश्चिम बंगाल में वामपंथी खेमे की इज्जत बचाई… Vote Share of BJP, Left Parties and Congress in Bengal

भाजपा को पानी पी-पीकर कोसने वालों में वामपंथी सबसे आगे रहते हैं, ये अलग बात है कि भाजपा को गरियाते-गरियाते कब वे खुद ही पूरे भारत में अप्रासंगिक हो गये उन्हें पता ही नहीं चला। लेकिन इस लेख में प्रस्तुत आँकड़े सिद्ध करते हैं कि यदि पश्चिम बंगाल में भाजपा एक “ताकत” के रूप में न उभरती तो वामपंथियों को मुँह छिपाना मुश्किल पड़ जाता। सिर्फ़ और सिर्फ़ भाजपा के कारण पश्चिम बंगाल में कांग्रेस-तृणमूल गठबन्धन को कम से कम 7 सीटों का नुकसान हुआ, जो कि वामपंथी खाते में गई, वरना लाल बन्दरों का तो पूरा “सूपड़ा” ही साफ़ हो जाता। ज़रा एक नज़र डालिये इन पर–

1) बर्दवान सीट पर सीपीएम के उम्मीदवार की जीत का अन्तर है 59,419, जबकि भाजपा उम्मीदवार को मिले 71,632 वोट, सोचिये यदि वहाँ भाजपा का उम्मीदवार ही न होता तो?

2) जलपाईगुड़ी सीट पर भाजपा के उम्मीदवार सुखबिलदास बर्मा ने 94,000 वोट लेकर कांग्रेस को नहीं जीतने दिया, यहाँ से सीपीएम का उम्मीदवार 90,000 वोट से जीता।

3) अलीपुरद्वार में आरएसपी के मनोहर टिर्की जीते 1,12,822 वोट से जबकि भाजपा को आश्चर्यजनक रूप से 1,99,843 वोट मिले और कांग्रेस हार गई।

4) बेलूरघाट सीट पर आरएसपी का उम्मीदवार बड़ी मुश्किल से 5,105 वोट से जीत पाया, जबकि भाजपा उम्मीदवार को मिले 60,000 वोट।

5) फ़ॉरवर्ड ब्लॉक का उम्मीदवार कूच बिहार सीट से 33,632 वोट से जीता, यहाँ भाजपा की झोली में 64,917 वोट आये।

6) मिदनापुर में भाकपा के प्रबोध पाण्डा, भाजपा को मिले 52,000 वोटों की बदौलत हारने से बच गये।

माकपा के स्थानीय नेता भी मानते हैं कि भाजपा के कारण हम भारी शर्मिन्दगी भरी हार से बच गये वरना कांग्रेस-ममता को लगभग 31 सीटें मिलतीं। लगभग यही आरोप ममता बैनर्जी ने भी लगाया और कहा कि भाजपा के उम्मीदवार, वामपंथी खेमे को मदद पहुँचाने के लिये खड़े हैं (हा हा हा हा)।

इस सारे घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि जो बात भाजपा के मामूली कार्यकर्ता को भी मालूम है उससे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व कैसे अनजान है, कि भाजपा को अब अकेले चुनाव लड़ना चाहिये। NDA वगैरह बकवास है, यह भाजपा की बढ़त तो रोक ही रहा है, साथ ही साथ उसे वैचारिक रूप से भ्रष्ट भी कर रहा है। “सेकुलरों” की बातों और सेकुलर मीडिया के प्रभाव में आकर भाजपा ने अपनी छवि बदलने का जो प्रयास किया है, अब सिद्ध हो चुका है कि वह प्रयास पूरी तरह से असफ़ल रहा है। सेकुलर बनने के चक्कर में भाजपा “धोबी का कुत्ता” बन गई है। आँकड़ों से स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा अकेले चुनाव लड़कर राज्य स्तर पर “तीसरी ताकत” के रूप में उभरी है, ऐसा ही समूचे देश में आसानी से किया जा सकता है। जब किसी “मेंढक” से गठबन्धन ही नहीं होगा, तो उसके फ़ुदकने का कोई असर भी नहीं होगा, तब भाजपा अपनी वैचारिक बात जनता तक ठोस रूप में पहुँचाने में कामयाब होगी। इस रणनीति का फ़ायदा दूरगामी होगा, यह करने से लगभग प्रत्येक गैर-भाजपा शासित राज्य में भाजपा दूसरी या तीसरी शक्ति के रूप में “अकेले” उभरेगी। ऐसे में स्थानीय पार्टियाँ बगैर शर्त के और स्वाभाविक रूप से भाजपा के पाले में आयेंगी क्योंकि देर-सवेर कांग्रेस या तो उन्हें “खाने” वाली है या अपने दरवाजे पर अपमानित करके खड़ा करेगी, तब ऐसी स्थानीय पार्टियों से “लोकसभा में हम और विधानसभा में तुम” की तर्ज पर समझौता किया जा सकता है, जैसा कि पश्चिम बंगाल में दार्जीलिंग सीट पर किया गया और जसवन्त सिंह तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद विजेता बने, कृष्णनगर में भी भाजपा प्रत्याशी को 1,75,283 वोट मिले। भाजपा के प्रदेश महासचिव राहुल सिन्हा कहते हैं कि “यह सफ़लता बंगाल में हमारे संगठनात्मक ढाँचे की ताकत के कारण मिली है…”। क्षेत्रीय पार्टियाँ हों या वामपंथी, ये लोग जब तक भाजपा को अपना प्रतिद्वन्द्वी नम्बर एक मानते रहेंगे, तब तक कांग्रेस मजे करती रहेगी, क्योंकि उसने बड़ी चतुराई से अपनी छवि “मध्यमार्गी” की बना रखी है और “धर्मनिरपेक्षता” नाम का ऐसा सिक्का चला दिया है कि बाकी सभी पार्टियों को मजबूरन कांग्रेस का साथ देना ही पड़ता है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सभी 42 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ी, एक सीट (दार्जीलिंग) जीती, लेकिन कम से कम दस सीटों पर उसने कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया। एक चुनाव हारने पर भाजपा को दिन-रात सलाह देने में लगे ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे भी “लाल-गढ़” में भाजपा प्रत्याशियों को मिले वोटों को देखकर हैरान होंगे, लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है, जिस तरह उत्तरप्रदेश में कांग्रेस अकेले लड़ी और जीती, भाजपा भी अकेले ही लड़े। इस बार नहीं तो अगले चुनाव में, अगले नहीं तो उसके अगले चुनाव में, जीत निश्चित मिलेगी। आज लाखों-करोड़ों लोग कांग्रेस-वामपंथियों की नीतियों से त्रस्त हो चुके हैं, उनकी भावनाओं को आवाज़ देने वाली कोई पार्टी उन्हें दिखाई नहीं दे रही, इसलिये उन्होंने कांग्रेस को ही चुन लिया, जब उनके पास एक सशक्त विकल्प मौजूद रहेगा तब वे निश्चित ही उसे चुनेंगे। लेकिन लौहपुरुष का विशेषण और कंधार जैसा शर्मनाक समर्पण तथा राम मन्दिर आंदोलन और जिन्ना की मज़ार पर जाने जैसा वैचारिक अन्तर्द्वन्द्व अब नहीं चलेगा। पश्चिम बंगाल जैसे राजनैतिक रूप से संवेदनशील, लगभग 23 सीटों पर 40% से अधिक मुस्लिम वोटरों तथा वामपंथियों द्वारा इतने वर्षों से शासित राज्य में भाजपाई उम्मीदवारों को कई जगह एक लाख से अधिक वोट मिल रहे हैं, इसका क्या अर्थ है यह मेरे जैसे छोटे से व्यक्ति को समझाने की जरूरत नहीं है।

रही बात वामपंथियों की तो उन्हें भाजपा का शुक्र मनाना चाहिये कि उनकी कम से कम 6-7 सीटें भाजपा के कारण ही बचीं, वरना इज्जत पूरी लुट ही गई थी, लेकिन वे ऐसा करेंगे नहीं। रस्सी तो जल गई है, मगर……

(खबर का मूल स्रोत यहाँ है)

, , , , , , , ,

>मुम्बईया नीली फिल्मों को ऑस्कर जरुर मिलना चाहिए

>

पिछले दिनों परीक्षाओं में व्यस्त होने के कारण अख़बार ढंग से पढ़ पाना संभव नही हो पता रहा । आज पुराने जनसत्ता के अंको को पलट रहा था तो राज किशोर और के ० विक्रम सिंह के बीच मकबूल फ़िदा हुसैन की विवादित पेंटिग को लेकर चल रही बहस पर नजर टिक गई । महीनोंसे सुप्त पड़े मुद्दे को इस बहस ने एक बार फ़िर सेकुलरों के लिए मसाला तैयार कर दिया है । अब फ़िर तीन -चार महीने तक इस मुद्दे पर कलम घसीटी हो सकती है । मैं तो यही मानता हूँ ऐसे मुद्दों को जितनी कम तूल दी जाए बेहतर होगा । हुसैन की कुछ पेंटिंग्स मैंने भी देखी हैं जिसे के ० विक्रम सिंह , राजेन्द्र यादव , अरुंधती राय आदि सेकुलर लोग कला का उत्कृष्ट नमूना बताते हुए उसकी तुलना खजुराहो की नायाब कला कृतियों से करते हैं । पिछले वर्ष एक मुस्लिम बहुल विश्विद्यालय के समारोह में राजेंद्र यादव ने माँ सरस्वती वाली विवादित पेंटिंग का अर्थ समझाते हुए कहा था – ” पेंटिंग में सरस्वती जो विद्या का प्रतीक हैं उसके साथ एक राक्षस नुमा व्यक्ति को संभोगरत दिखाया है अर्थात सरस्वती यानि विद्या या शिक्षा का सम्भोग आज बाजार कर रहा है । ” और इस तरह उस चित्र की कितनी साफगोई से बचा ले गए राजेंद्र यादव जी । वहीँ पर मैंने उनसे पूछा था -“महोदय क्या यह चित्र संभोगरत होने के बजायकिसी और थीम से नही बनाई जा सकती थी ? जैसा आपने अर्थ स्पष्ट किया उस आधार पर कई तरीके हो सकते थे यह दिखने के लिए मसलन राक्षस माँ सरस्वती यानि शिक्षा की साडी खिंच रहा होता आदि- आदि । और अगर नग्नता हीं कलासौन्दर्य की कसौटी है तो मुम्बईया नीली फिल्मों को जरुर आस्कर मिलना चाहिए ! ” दरअसल ये अकेले इनकी समस्या नही है। आज कलाकार से ज्यादा समीक्षक हो गए हैं जो अनाप शनाप अर्थ निकल कर किसी भी कलाकृति अथवा रचना की व्याख्या कर देते हैं , जबकि व्याख्या का अधिकार को दर्शक का होना चाहिए । कला समीक्षकों को लक्ष्य कर बनाई गई एक शोर्ट फ़िल्म देखी थी ।” फ़िल्म में एक बेहद कंगाल आदमी रहता है जिसकी झोपडी के पास अमीरों के फार्म हॉउस हैं । उन्ही फार्म हाउसों में से एक में रहने वाली एक बेहद खुबसूरत महिला से वो प्रेम करता है । अपनी गरीबी की हालत समझते हुए वो कुछ भी बोलने में संकोच करता है । हर रोज साहस करता है पर कुछ कह नही पाता। औरों से नजरें बचा कर उसे कनखियों से देखना यही उसका कम रहता है । एक दिन वह काफी दुखी था । वो अपनी महबूबा को एक उपहार देकर दिल की बात बताना चाहता है । लेकिन उसके पास देने के लिए कुछ भी नही । अपनी फटेहाली से नाराज और व्यथित होकर वो उपहार की तलाश में जंगल की और चलता है । जंगल में थोडी दूर जाने पर उसे सुखा हुआ मानव मल (विष्ठा ) दिकाई देता है जिसे वो उठा कर ले आता है और सीसे की एक बर्तन में डाल कर उस महिला को दे आता है । महिला उसे अपने टेबल पर सजा कर रख देती है । इन बातो से बेखर महिला समझती है ये कोई नायाब चीज है । शाम को एक पार्टी होती है महिला के घर पर लोग-बाग़ उस चीज को देख कर आकर्षित होते हैं और पूछते हैं क्या है । वो नही बता पति पर कहती है मुझे उस झोपडे में रहने वाले ने उपहार में दी है । अब इन कला पारखियों की दृष्टि तो देखिये मानव के सूखे मल में इन्हे एक उत्कृष्ट कलाकृति नजर आती है । इनका पागलपन इस कदर होता है की उस व्यक्ति को धुंध कर उससे इसी तरह के और उपहारों की मांग की जाती है । तो कोई उस व्यक्ति के साथ हिस्सेदारी में इसका व्यापार करना चाहता है । हालत ये हो जाती है किलोगों को सच्चाई बताने से डरने कि वजह से उस व्यक्ति को ८-१० लोग भाड़े पर रखना पड़ता है जो इस उपहार का उत्पादन कर सकें । “ मेरा ख्याल है पर इस कहानी से के ० विक्रम और राजेंद्र यादव सरीखे व्याख्या करने वाले समीक्षकों की असलियत समझ में आ गई होगी ।

जन्‍म दिवस पर स्‍वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर

महाराष्‍ट्र के नासिक जिलें में मगूर नामक गाँव में दामोदर सावरकर एवं राधा वाई के यहॉं 28 मई 1883 को विनायक का जन्‍म हुआ।बचपन में माता पिता महाभारत, रामायण, शिवाजी और राणाप्रताप केविषय में बताते रहते थे। उन्‍होने मित्रमेला नाम की संस्‍था बचपन में ही बनाई थी और इसके द्वारा क्रान्तिकारी गतिविधियों का प्रचार करते थे। कक्षा 10 उत्‍तीर्ण करने के पश्‍चात कविताएँ लिखने लगे। तिलक जी से परिचय होने के पश्चात सन् 1905 में विदेशी वस्‍त्रो की होली जलाई। बी0ए0 में अध्‍ययन के पश्चात सशस्‍त्र क्रान्ति के लिये अभिनव भारत नाम की संस्‍था बनाई।

6 जून 1906 को कानून की पढ़ाई के लिये लंदन गये , वहाँ इण्डिया सोसाइटी बनाई। मेजिनी का जीवन चरित्र और सिखों का स्‍फूर्तिदायक इतिहास नामक ग्रंथ लिखा। 1908 में मराठी भाषा में 1857 का स्‍वातंत्र्य समर लिखा और यह जब्‍त कर ली गई। इन्‍ही की प्रेरणासे मदन लाल धींगरा ने कर्जन वायली की हत्‍या कर दी गई। सन् 1906 में ही राजेश दामोदर सावरकर को लेल भेजा गया और सावरकर बन्‍धुओं की सारी सम्‍पत्ति जब्‍त कर ली गई। कुछ दिनो बाद इग्‍लैंड से पेरिस गये और वहाँ से पुन: लंदन पहुँचने पर अपनी भाभी मृत्‍युपत्र नामक मराठी काव्‍य लिखा।

सावरकर जी को जलयान द्वारा भारत लाये जाते समय फ्रांस के निकट जहाज के आते ही शौचालय से छेकर समुद्र में कूद पड़े परन्‍तु पुन: पकडे पकड़े गये । बम्‍बई की विशेष अदालत ने आजन्‍म कारावास की सजा दी और काले पानी के लिये आंडमान भेज दिया गया। इसी जेल में उनके बड़़े भाई भी बंद थे। जेल में रह कर कमला गोमान्‍तक और रिहोच्‍छ्वास काव्य लिखा।

10 वर्ष बाद 1921 में अण्‍डमान जेल से लाकर रत्‍नागिरि जेल में उन्‍हे बंद कर दिया गया। यहाँ हिन्‍दुत्‍व, हिन्‍दूपदपादशाही, उ:श्राप, उत्‍तरक्रियासठयस्‍त्र, संयस्‍त खड्ग आदि ग्रंथ लिखे। हिन्‍दू महासभा की स्‍थापना कर शुद्धि का बिगुल फूका और हिन्‍दी भाषा का प्रचार किया। 10 मई 1934 को यहाँ से वे मुक्त हुये।

महात्‍मा गांधी की हत्‍या होने पर उन्‍हे पुन: बंदी बनाया गया। फरवरी 1949 को ससम्‍मान मुक्त हुये। 20 फरवरी 1966 को वह देशभक्त बीर संसार से विदा हो गया।

पर्यावरण की सुरक्षा करना आपका और हम सबका नैतिक दायित्व है

ॐ श्री गणेशाय नमः

प्रिय मित्रो/बहिनों और भाइओ

आगे समाचार यह है कि यहाँ सब शेष कुशल है और इश्वर से प्राथना करत है कि आप सभी कुशल मंगल होंगे. मोडा-मोढी अच्छे से गरमी की छुट्टी मनात होंगे या घरवाली के साथ तुम्हारी ससुराल गयेन हुइए और मौजा मौजा करत हुइए. भैय्या इ साल तो गरमी गजब को रंग दिखात है. आसमान तो दहाड़ने लगे है और शहर के उपर बादलो की जमात भी दिखाई दें लगी है और लगत है कै अबकी अगले हफ्ते तक पानी आ जाहे.

हाँ बरसात आ रही है सो मोरे दिमाग में जा बात आई कि लगे हाथो बरसात में अपन भी पर्यावरण की सुरक्षा का संकल्प ले. जगह इसकी अलग जगावे कै अबकी बरस से हम पौधे खूब लगावे और इसकी देखरेख और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल ले नाइ तो शुद्ध हवा जब अपनी अलगी पीढी को न मिलहे तो वे सबई अपनी पीढी को गली बकहे जा अच्छी तरह से अबे से समझ लो का समझे ? हाँ बड्डे जा मेरो सन्देश अपनी पंचायत में भी कहके सुना दई . उखो मजनून नीचे लिख रहो हूँ…

मित्रो स्वागत समारोहो मे पुष्पो का जमकर उपयोग किया जाता है. हँसते फूलो को हम साथी पौधो से अलग कर हम पर्यावरण को नुक़सान तो पहुंचाते है और प्राकृतिक सौंदर्य को क्षति पहुंचाते है फिर स्वागत समारोह के बाद इन फूलो को बेदर्दी से कूड़ेदान मे हम सबई फेक देत है. जैसा कि आपको मालूम है ग्लोबल वार्मिंग के कारण मानव जीवन ख़तरे मे है अब पर्यावरण को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी आपकी और हम सबकी है.

मित्रो मेरा एक सुझाव है कि जब भी कोई स्वागत समारोह हो या कोई अतिथि का सम्मान करना हो तो आप पुष्प मालाओ, पुष्प गुच्च की जगह अतिथि को एक पौधा भेट करे और हाथ जोड़कर निवेदन करे कि आप इस पौधे की सुरक्षा और सरक्षण करे यह आपकी नैतिक ज़िम्मेदारी है और पर्यावरण की सुरक्षा हेतु यह कार्य नितांत मानव के कल्याण के लिए आवश्यक है. भविष्य मे जब अतिथि को भेट किया गया पौधा बढ़ता आप देखेगे तो आपका मन प्रफुल्लित हो उठेगा. कृपया संकल्प ले कि हम मुस्कुराते फूलो को न तोडेंगे और कभी प्रकृति के सौंदर्य से खिलवाड़ नही करेगे और इस तरह से आप स्वागत समारोहो मे फूल मालाओ की जगह अतिथि को एक पौधा प्रदान करेगे और अतिथि को पर्यावरण की सुरक्षा करने का संदेश भी देंगे. हाँ अपने जन्मदिन के अवसर पर भी पौधा जरुर लगाए और जन्मदिन को यादगार बनाए.

मोरी फोटो जन्मदिन पे पौधारोपण करत भये.

अखीर में भैय्या जा चिठ्ठी हर बरसात आवे के पहले मै अपनो खो लिख देत हूँ . जा मेरी चिठ्ठी तुमखो पुन्य के कारज से लिख रहा हूँ. चलो अब चिठ्ठी बंद करत हूँ काय से आज से हमें भी अपनी बगिया सजाना संभारना है. खर पतवार भी साफ करने है.

पर्यावरण की सुरक्षा करना आपका और हम सबका नैतिक दायित्व है.
जय राम जी की

« Older entries