बहराइच – एक क्रूर मुगल आक्रांता की कब्र पर मेला? Mughal Invader Defeated by Hindu Kings in Behraich

जैसा कि पहले भी कई बार कहा जा चुका है कि वामपंथियों और कांग्रेसियों ने भारत के गौरवशाली हिन्दू इतिहास को शर्मनाक बताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है… क्रूर, अत्याचारी और अनाचारी मुगल शासकों के गुणगान करने में इन लोगों को आत्मिक सुख की अनुभूति होती है। लेकिन यह मामला उससे भी बढ़कर है, एक मुगल आक्रांता, जो कि समूचे भारत को “दारुल-इस्लाम” बनाने का सपना देखता था, की कब्र को दरगाह के रूप में अंधविश्वास और भेड़चाल के साथ नवाज़ा जाता है, लेकिन इतिहास को सुधार कर देश में आत्मगौरव निर्माण करने की बजाय हमारे महान इतिहासकार इस पर मौन हैं।

मुझे यकीन है कि अधिकतर पाठकों ने सुल्तान सैयद सालार मसूद गाज़ी के बारे में नहीं सुना होगा, यहाँ तक कि बहराइच (उत्तरप्रदेश) में रहने वालों को भी इसके बारे में शायद ठीक-ठीक पता न होगा। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं बहराइच (उत्तरप्रदेश) में “दरगाह शरीफ़”(???) पर प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के पहले रविवार को लगने वाले सालाना उर्स के बारे में…। बहराइच शहर से 3 किमी दूर सैयद सालार मसूद गाज़ी की दरगाह स्थित है, ऐसी मान्यता है(?) कि मज़ार-ए-शरीफ़ में स्नान करने से बीमारियाँ दूर हो जाती हैं (http://behraich.nic.in/) और अंधविश्वास के मारे लाखों लोग यहाँ आते हैं। सैयद सालार मसूद गाज़ी कौन था, उसकी कब्र “दरगाह” में कैसे तब्दील हो गई आदि के बारे में आगे जानेंगे ही, पहले “बहराइच” के बारे में संक्षिप्त में जान लें – यह इलाका “गन्धर्व वन” के रूप में प्राचीन वेदों में वर्णित है, ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने ॠषियों की तपस्या के लिये यहाँ एक घने जंगल का निर्माण किया था, जिसके कारण इसका नाम पड़ा “ब्रह्माइच”, जो कालांतर में भ्रष्ट होते-होते बहराइच बन गया।

अब आते हैं सालार मसूद पर… पाठकगंण महमूद गज़नवी (गज़नी) के बारे में तो जानते ही होंगे, वही मुगल आक्रांता जिसने सोमनाथ पर 16 बार हमला किया और भारी मात्रा में सोना हीरे-जवाहरात आदि लूट कर ले गया था। महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर आखिरी बार सन् 1024 में हमला किया था तथा उसने व्यक्तिगत रूप से सामने खड़े होकर शिवलिंग के टुकड़े-टुकड़े किये और उन टुकड़ों को अफ़गानिस्तान के गज़नी शहर की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में सन् 1026 में लगवाया। इसी लुटेरे महमूद गजनवी का ही रिश्तेदार था सैयद सालार मसूद… यह बड़ी भारी सेना लेकर सन् 1031 में भारत आया। सैयद सालार मसूद एक सनकी किस्म का धर्मान्ध मुगल आक्रान्ता था। महमूद गजनवी तो बार-बार भारत आता था सिर्फ़ लूटने के लिये और वापस चला जाता था, लेकिन इस बार सैयद सालार मसूद भारत में विशाल सेना लेकर आया था कि वह इस भूमि को “दारुल-इस्लाम” बनाकर रहेगा और इस्लाम का प्रचार पूरे भारत में करेगा (जाहिर है कि तलवार के बल पर)।

सैयद सालार मसूद अपनी सेना को लेकर “हिन्दुकुश” पर्वतमाला को पार करके पाकिस्तान (आज के) के पंजाब में पहुँचा, जहाँ उसे पहले हिन्दू राजा आनन्द पाल शाही का सामना करना पड़ा, जिसका उसने आसानी से सफ़ाया कर दिया। मसूद के बढ़ते कदमों को रोकने के लिये सियालकोट के राजा अर्जन सिंह ने भी आनन्द पाल की मदद की लेकिन इतनी विशाल सेना के आगे वे बेबस रहे। मसूद धीरे-धीरे आगे बढ़ते-बढ़ते राजपूताना और मालवा प्रांत में पहुँचा, जहाँ राजा महिपाल तोमर से उसका मुकाबला हुआ, और उसे भी मसूद ने अपनी सैनिक ताकत से हराया। एक तरह से यह भारत के विरुद्ध पहला जेहाद कहा जा सकता है, जहाँ कोई मुगल आक्रांता सिर्फ़ लूटने की नीयत से नहीं बल्कि बसने, राज्य करने और इस्लाम को फ़ैलाने का उद्देश्य लेकर आया था। पंजाब से लेकर उत्तरप्रदेश के गांगेय इलाके को रौंदते, लूटते, हत्यायें-बलात्कार करते सैयद सालार मसूद अयोध्या के नज़दीक स्थित बहराइच पहुँचा, जहाँ उसका इरादा एक सेना की छावनी और राजधानी बनाने का था। इस दौरान इस्लाम के प्रति उसकी सेवाओं(?) को देखते हुए उसे “गाज़ी बाबा” की उपाधि दी गई।

इस मोड़ पर आकर भारत के इतिहास में एक विलक्षण घटना घटित हुई, ज़ाहिर है कि इतिहास की पुस्तकों में जिसका कहीं जिक्र नहीं किया गया है। इस्लामी खतरे को देखते हुए पहली बार भारत के उत्तरी इलाके के हिन्दू राजाओं ने एक विशाल गठबन्धन बनाया, जिसमें 17 राजा सेना सहित शामिल हुए और उनकी संगठित संख्या सैयद सालार मसूद की विशाल सेना से भी ज्यादा हो गई। जैसी कि हिन्दुओ की परम्परा रही है, सभी राजाओं के इस गठबन्धन ने सालार मसूद के पास संदेश भिजवाया कि यह पवित्र धरती हमारी है और वह अपनी सेना के साथ चुपचाप भारत छोड़कर निकल जाये अथवा उसे एक भयानक युद्ध झेलना पड़ेगा। गाज़ी मसूद का जवाब भी वही आया जो कि अपेक्षित था, उसने कहा कि “इस धरती की सारी ज़मीन खुदा की है, और वह जहाँ चाहे वहाँ रह सकता है… यह उसका धार्मिक कर्तव्य है कि वह सभी को इस्लाम का अनुयायी बनाये और जो खुदा को नहीं मानते उन्हें काफ़िर माना जाये…”।

उसके बाद ऐतिहासिक बहराइच का युद्ध हुआ, जिसमें संगठित हिन्दुओं की सेना ने सैयद मसूद की सेना को धूल चटा दी। इस भयानक युद्ध के बारे में इस्लामी विद्वान शेख अब्दुर रहमान चिश्ती की पुस्तक मीर-उल-मसूरी में विस्तार से वर्णन किया गया है। उन्होंने लिखा है कि मसूद सन् 1033 में बहराइच पहुँचा, तब तक हिन्दू राजा संगठित होना शुरु हो चुके थे। यह भीषण रक्तपात वाला युद्ध मई-जून 1033 में लड़ा गया। युद्ध इतना भीषण था कि सैयद सालार मसूद के किसी भी सैनिक को जीवित नहीं जाने दिया गया, यहाँ तक कि युद्ध बंदियों को भी मार डाला गया… मसूद का समूचे भारत को इस्लामी रंग में रंगने का सपना अधूरा ही रह गया।

बहराइच का यह युद्ध 14 जून 1033 को समाप्त हुआ। बहराइच के नज़दीक इसी मुगल आक्रांता सैयद सालार मसूद (तथाकथित गाज़ी बाबा) की कब्र बनी। जब फ़िरोज़शाह तुगलक का शासन समूचे इलाके में पुनर्स्थापित हुआ तब वह बहराइच आया और मसूद के बारे में जानकारी पाकर प्रभावित हुआ और उसने उसकी कब्र को एक विशाल दरगाह और गुम्बज का रूप देकर सैयद सालार मसूद को “एक धर्मात्मा”(?) के रूप में प्रचारित करना शुरु किया, एक ऐसा इस्लामी धर्मात्मा जो भारत में इस्लाम का प्रचार करने आया था। मुगल काल में धीरे-धीरे यह किंवदंती का रूप लेता गया और कालान्तर में सभी लोगों ने इस “गाज़ी बाबा” को “पहुँचा हुआ पीर” मान लिया तथा उसकी दरगाह पर प्रतिवर्ष एक “उर्स” का आयोजन होने लगा, जो कि आज भी जारी है।

इस समूचे घटनाक्रम को यदि ध्यान से देखा जाये तो कुछ बातें मुख्य रूप से स्पष्ट होती हैं-

(1) महमूद गजनवी के इतने आक्रमणों के बावजूद हिन्दुओं के पहली बार संगठित होते ही एक क्रूर मुगल आक्रांता को बुरी तरह से हराया गया (अर्थात यदि हिन्दू संगठित हो जायें तो उन्हें कोई रोक नहीं सकता)

(2) एक मुगल आक्रांता जो भारत को इस्लामी देश बनाने का सपना देखता था, आज की तारीख में एक “पीर-शहीद” का दर्जा पाये हुए है और दुष्प्रचार के प्रभाव में आकर मूर्ख हिन्दू उसकी मज़ार पर जाकर मत्था टेक रहे हैं।

(3) एक इतना बड़ा तथ्य कि महमूद गजनवी के एक प्रमुख रिश्तेदार को भारत की भूमि पर समाप्त किया गया, इतिहास की पुस्तकों में सिरे से ही गायब है।

जो कुछ भी उपलब्ध है इंटरनेट पर ही है, इस सम्बन्ध में रोमिला थापर की पुस्तक “Dargah of Ghazi in Bahraich” में उल्लेख है

एन्ना सुवोरोवा की एक और पुस्तक “Muslim Saints of South Asia” में भी इसका उल्लेख मिलता है,

जो मूर्ख हिन्दू उस दरगाह पर जाकर अभी भी स्वास्थ्य और शारीरिक तकलीफ़ों सम्बन्धी तथा अन्य दुआएं मांगते हैं उनकी खिल्ली स्वयं “तुलसीदास” भी उड़ा चुके हैं। चूंकि मुगल शासनकाल होने के कारण तुलसीदास ने मुस्लिम आक्रांताओं के बारे में ज्यादा कुछ नहीं लिखा है, लेकिन फ़िर भी बहराइच में जारी इस “भेड़िया धसान” (भेड़चाल) के बारे में वे अपनी “दोहावली” में कहते हैं –

लही आँखि कब आँधरे, बाँझ पूत कब ल्याइ ।
कब कोढ़ी काया लही, जग बहराइच जाइ॥

अर्थात “पता नहीं कब किस अंधे को आँख मिली, पता नहीं कब किसी बाँझ को पुत्र हुआ, पता नहीं कब किसी कोढ़ी की काया निखरी, लेकिन फ़िर भी लोग बहराइच क्यों जाते हैं…” (यहाँ भी देखें)

“लाल” इतिहासकारों और धूर्त तथा स्वार्थी कांग्रेसियों ने हमेशा भारत की जनता को उनके गौरवपूर्ण इतिहास से महरूम रखने का प्रयोजन किया हुआ है। इनका साथ देने के लिये “सेकुलर” नाम की घृणित कौम भी इनके पीछे हमेशा रही है। भारत के इतिहास को छेड़छाड़ करके मनमाने और षडयन्त्रपूर्ण तरीके से अंग्रेजों और मुगलों को श्रेष्ठ बताया गया है और हिन्दू राजाओं का या तो उल्लेख ही नहीं है और यदि है भी तो दमित-कुचले और हारे हुए के रूप में। आखिर इस विकृति के सुधार का उपाय क्या है…? जवाब बड़ा मुश्किल है, लेकिन एक बात तो तय है कि इतने लम्बे समय तक हिन्दू कौम का “ब्रेनवॉश” किया गया है, तो दिमागों से यह गंदगी साफ़ करने में समय तो लगेगा ही। इसके लिये शिक्षण पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे। “मैकाले की अवैध संतानों” को बाहर का रास्ता दिखाना होगा, यह एक धीरे-धीरे चलने वाली प्रक्रिया है। हालांकि संतोष का विषय यह है कि इंटरनेट नामक हथियार युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, युवाओं में “हिन्दू भावनाओं” का उभार हो रहा है, उनमें अपने सही इतिहास को जानने की भूख है। आज का युवा काफ़ी समझदार है, वह देख रहा है कि भारत के आसपास क्या हो रहा है, वह जानता है कि भारत में कितनी अन्दरूनी शक्ति है, लेकिन जब वह “सेकुलरवादियों”, कांग्रेसियों और वामपंथियों के ढोंग भरे प्रवचन और उलटबाँसियाँ सुनता है तो उसे उबकाई आने लगती है, इन युवाओं (17 से 23 वर्ष आयु समूह) को भारत के गौरवशाली पृष्ठभूमि का ज्ञान करवाना चाहिये। उन्हें यह बताने की जरूरत है कि भले ही वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नौकर बनें, लेकिन उन्हें किसी से “दबकर” रहने या अपने धर्म और हिन्दुत्व को लेकर किसी शर्मिन्दगी का अहसास करने की आवश्यकता नहीं है। जिस दिन हिन्दू संगठित होकर प्रतिकार करने लगेंगे, एक “हिन्दू वोट बैंक” की तरह चुनाव में वोटिंग करने लगेंगे, उस दिन ये “सेकुलर” नामक रीढ़विहीन प्राणी देखते-देखते गायब हो जायेगा।

हमें प्रत्येक दुष्प्रचार का जवाब खुलकर देना चाहिये, वरना हो सकता है कि किसी दिन एकाध “गधे की दरगाह” पर भी हिन्दू सिर झुकाते हुए मिलें…

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28 Comments

  1. संजय बेंगाणी said,

    May 5, 2009 at 9:08 am

    हिन्दुओं का संगठीत होना एक विलक्षण घटना है. पहली बार जानी.

    दो बातें.

    हिन्दु संगठीत हो सकता है.

    हिन्दु मूर्ख है.

  2. Shastri said,

    May 5, 2009 at 9:37 am

    प्रिय सुरेश,

    इस आलेख को पढ कर मन को बडा सकून मिला.

    दोचार बाते:

    1. कोई हिन्दु किसी मजार पर जाये, या कोई मुस्लिम शिवलिंग के सामने माथा टेके, यह मेरेआपके लिये कोई समस्या नहीं होनी चाहिये, खास कर उस व्यक्ति के लिये जो अद्वैत दर्शन का पालन करता है.

    2. जहां तक भारतीय इतिहास की बात है, इसे उन लोगों ने लिखा है जो मन से और आत्मा से कभी भारतीय नहीं रहे हैं. अत: भारत के “असली” इतिहास को अब लोगों के समक्ष लाना जरूरी है.

    इस लेख मिली प्रेरणा के कारण दो दिनों में सारथी पर एक और लेख प्रस्तुत कर दूंगा.

    सस्नेह — शास्त्री

  3. Chinmay said,

    May 5, 2009 at 9:56 am

    लेख अच्छा है , तकरीबन सभी सूफ़ी पीर , फकीर जेहादी सुल्तानों , बादशाहों की जासूसी करते थे. ख्वाजा ग़रीब नवाज अजमेर वाले असल में सुल्तान मोहम्मद घोरी के लिए ख़ुफ़िया जानकारियाँ एकत्रित करते थे. यह स्पष्ट रूप से एस . एस रिज़वी की किताब आ हिस्टरी ऑफ सुफ़ीसम इन इंडिया, वॉल्यूम. 1 (मुंशीराम मनोहरलाल, 1978, प. 117) में लिखा है जहाँ जवाहर ए फरीदी का उल्लेख है जिसमे इस बारे में तफ़सील से बताया गया है

  4. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said,

    May 5, 2009 at 11:10 am

    आँखें खोलने वाला आलेख। आपको यह अभियान आगे बढ़ाने के लिए हमारी शुभकामनाएं। आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।

    मैने पूर्वी उत्तरप्रदेश के नेपाली सीमा से सटे बहाराइच व अन्य जिलों में कुछ लोगों को बहरैची उपनाम (surname) लगाए देखा था। ये किसी एक जाति के नहीं थे। बल्कि किसी भी जाति वर्ग में पाये जा सकते हैं। मैने जब इस टाइटिल के बारे में पूछा तो पता चला कि सन्तानहीन दम्पति ‘बहाराइच वाले पीर बाबा’ के आशीर्वाद से जब सन्तान सुख पा लेते हैं तो उस सन्तान को ‘बहरैची’ कहा जाता है।

    इस अन्धविश्वास की जड़ें कितनी गहरी हैं, यह सोचकर मन हैरत से भर जाता है।

  5. संजय बेंगाणी said,

    May 5, 2009 at 11:20 am

    चिनमय ने झटाकेदार बात कही है.

  6. भारतीय नागरिक - Indian Citizen said,

    May 5, 2009 at 11:46 am

    पहली बार हिन्दुओं के शानदार संगठन के बारे में पढ़ने को मिला. बात बराबरी की होना तो दूर यहां तो धर्मनिरपेक्षी हिन्दुओं को तीसरे दर्जे का नागरिक बनाने पर आमादा हैं.

  7. ऋषभ कृष्ण said,

    May 5, 2009 at 11:51 am

    सुरेश जी साधुवाद,
    इतिहास की कंदराओं से जो कुछ आप निकालकर ला रहे हैं, वो श्लाघनीय है. केवल इतिहासकार ही नहीं, उस समय के मुस्लिम शासकों ने भी पूरी कोशिश की कि जूते खाकर यहाँ से भागे या बीच मैदान में पीटे गए अपने पूर्वजों को महान बना दिया जाये. लेकिन आपने सही कहा, आज का युवा हिन्दू मूर्ख नहीं है. वो इतिहास को समझता है. एक बात शास्त्री जी से भी, किसी मजार एक आगे सर झुकाने में हिन्दुओं को ऐतराज़ नहीं है, लेकिन उस मजार में सोये शख्स की सीरत भी तो इस लायक हो. शायद आपको मालूम होगा कि सोमनाथ एक विध्वंस की नींव ईरान से आये एक पीर ने डाली थी. क्या उसकी भी इबादत करनी चाहिए. उम्मीद है कि सुरेश जी एक लेख उस पर भी लिखेंगे. ज़रूरी है वरना सुरेश जी एक ही शब्दों में किसी दिन हिन्दू गधे की मजार पर भी सर झुकाते दिखेंगे.

  8. जी.के. अवधिया said,

    May 5, 2009 at 12:01 pm

    सुरेश जी,

    आप बहुत अच्छी जानकारियाँ दे रहे हैं। वास्तव में हमारे देश के इतिहास को बहुत कुछ तोड़ा मरोड़ा गया है। झूठा इतिहास, जिसमें सच्चाइयों को छुपाया गया हो, पढ़ना और पढ़ाना शिक्षा का अपमान करना है।

    आज जितने भी प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारक हैं उनके विषय में बताया जाता है कि किसी न किसी मुस्लिम शासक के द्वारा बनवाये गये थे। तो क्या मुगलों के भारत आने के पहले क्या भारत में कोई भी दर्शनीय भवन नहीं था। मैं तो श्री पी.एन. ओक से पूर्णतः सहमत हूँ कि मुस्लिम शासकों ने यहाँ के पहले से ही बने हुये विशाल भव्य भवनों को अपने अधिकार में कर के अपना ठप्पा लगा दिया।

    चलिये देखें कि आपके लेखों का कितना प्रभाव होता है और हिन्दुओं में जागृति आती है या नहीं। मैं ऐसा केवल इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि आज के हिन्दुओं के दिमाग में वही शिक्षा कूट कूट कर भरी हुई है जिसे कि मैकाले देना चाहता था और इसे निकालने में अच्छा खासा समय लगेगा।

    मैं कामना करता हूँ कि आपके लेखों से जागृति होने लगे। वे श्री ओक की रचनाओं के समान नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर न रह जायें।

  9. चंद्रभूषण said,

    May 5, 2009 at 12:05 pm

    प्यारे भाई, अपनी साइट पर जो भी चाहे लिखें लेकिन अनपढ़ों की तरह न लिखें तो हर किसी को यहां आना अच्छा लगेगा। मुगल नाम की कोई चीज ही 1500 से पहले नहीं हुआ करती थी। यह शब्द बाबर और उसके वंशजों को मंगोलों,तुर्कों, तातारियों आदि से अलगाने के लिए सोलहवीं सदी में शायद उन्हीं में से किसी की पहल ईजाद किया गया था। भारत पर हमला करने वाला हर मुस्लिम शासक मंगोल नहीं था, न ही वे एक इलाके से आए थे। तुर्कों, पठानों और मुगलों के बीच आपस की भीषण लड़ाइयां थीं, वे अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले हजारों-हजार मील दूर के लोग थे। इस्लाम के अलावा उनके बीच कुछ भी साझा नहीं था और इस्लाम का प्रसार उनमें से कुछ के ही एजेंडे पर हुआ करता था।

  10. इष्ट देव सांकृत्यायन said,

    May 5, 2009 at 12:23 pm

    जो काम मैकाले और डायर ने किया था, उसी को गान्धी और नेहरू ने आगे बढ़ाया है. पर अब तो भाजपा के भी बाप हो गान्धी जी.

  11. आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said,

    May 5, 2009 at 1:27 pm

    आपके द्वारा दी गई इस सम्यक जानकारी के लिए आभार

  12. Kashif Arif said,

    May 5, 2009 at 2:35 pm

    सुरेश जी, आपने जो जानकारी दी वो हमें कहीं नहीं मिली उसके लिए धन्यवाद . मैं भी आपको कुछ बातें बताना चाहूँगा :-

    १. इस्लाम में पक्की कब्र बनाना मना है, हमारे रसूल की हदीस है की “क़यामत के दिन एक कब्र में से सत्तर मुर्दे उठाये जायेंगे” इस लिहाज़ से मजार का कोई मतलब ही नहीं बनता है..

    २. कुरान में साफ़ – साफ़ लिखा है की ऐसा कोई काम मत करो जिससे किसी को तकलीफ हो और तुम्हारा फायदा हो… अगर किसी को तकलीफ पंहुचा कर तुम्हे कोई भी फायदा होता है चाहे वो माली हो या कोई भी वो तुम पर हराम है…इसी वजह से ब्याज के काम को मना किया गया है..

    ३. कुरान में लिखा है की तलवार के जोर पे इस्लाम कुबूल मत करवाओ क्यूंकि इबादत दिल से होती तलवार के जोर से नहीं….लेकिन अगर कुछ लोग ऐसा सोचते हैं तो वो गलत सोचते हैं और शायद उन्होंने कुरान को समझ कर नहीं पढ़ा….

  13. Suresh Chiplunkar said,

    May 5, 2009 at 3:30 pm

    @ चन्द्र भूषण जी – मैं “अनपढ़” ही भला, मुझे ऐसा ही रहने दें प्लीज़, ज्यादा पढ़-लिख गया तो “सेकुलर” बन जाउंगा… और सेकुलर कैसे होते हैं यह इसी लेख में दो बार बताया है…
    =======
    @ काशिफ़ भाई – कुरान की कई “महान” व्याख्यायें इस्लामी विद्वानों ने विभिन्न जगहों पर दी हैं, लगता है कि उनमें से कुछ का उदाहरण अगले लेख में देना पड़ेगा…। आप कहते हैं कि इस्लाम में पक्की कब्र बनाना मना है, यानी ताजमहल में बनी हुई जो भी “चीज़” है, वह बेकार है? या फ़िर शाहजहाँ पागल अथवा काफ़िर था… तथा भारत भर में बनी हुई लाखों दरगाह, मज़ार आदि सब बकवास हैं? जितने उच्च विचार आपने कुरान में से गिनाये हैं क्या आप वाकई मानते हैं कि वर्तमान समय में मुस्लिम देश, संगठन, व्यक्ति उसे वैसा ही पालन करते हैं?
    =========
    @ संजय बेंगाणी जी – “विलक्षण घटना” इसलिये कहा, क्योंकि इससे पहले महमूद गजनवी द्वारा किये गये कई आक्रमणों के दौरान हिन्दू राजा संगठित नहीं हुए… “हिन्दू मूर्ख हैं” इसलिये कहा क्योंकि जो कौम गंधार से सिमटते-सिमटते पाकिस्तान, फ़िर कश्मीर और नेपाल से लतिया दी गई हो, वह इन्हीं मूर्खताओं का नतीजा है…
    =========

  14. dinesh dhawan said,

    May 5, 2009 at 3:46 pm

    वल्लाह कासिफ आरिफ़ इतने तो भोले नहीं दिखते हो,
    “इस्लाम में पक्की कब्र बनाना मना है” ताजमहल से लेकर फतेहपुर तक की कब्रे मैंने तो सारी की सारी पक्की और संगमरमर से तामीर शुदा देखीं? क्या ये सारे के सारे मुसलमान नहीं थे या इन्हें आपके रसूल की हदीस का इलहाम नहीं था?

    “इस्लाम कुबूल मत करवाओ क्यूंकि इबादत दिल से होती तलवार के जोर से नहीं..” गुरु गोविन्द सिंह के नाबालिग बच्चों को इस्लाम न मानने के कारण दीवार के अन्दर क्यों चिनवा दिया गया था?

    क्या तुमने कुरआन को पढ़ कर अर्थ समझने की कोशिश भी की है या बस तोता रटंत की है?

    Quran tells Muslims to kill the disbelievers wherever they find them (Q. 2:191), to murder them and treat them harshly (Q. 9:123), slay them (Q. 9:5), fight with them, (Q. 8: 65 ) even if they are Christians and Jews, humiliate them and impose on them a penalty tax (Q. 9: 29). Quran takes away the freedom of belief from all humanity and tell clearly that no other religion except Islam is accepted (Q. 3: 85). It relegates those who disbelieve in Quran to hell (Q. 5:10), calls them najis (filthy, untouchable, impure) (Q. 9: 28). It orders its followers to fight the unbelievers until no other religion except Islam is left (Q. 2: 193). It says that the non-believers will go to hell and will drink boiling water (Q. 14: 17).

    It asks the Muslims to slay or crucify or cut the hands and feet of the unbelievers, that they be expelled from the land with disgrace and that “they shall have a great punishment in world hereafter” (Q.5: 34). “As for the disbelievers”, it says that “for them garments of fire shall be cut and there shall be poured over their heads boiling water whereby whatever is in their bowls and skin shall be dissolved and they will be punished with hooked iron rods” (Q. 22: 9). Quran prohibits a Muslim to befriend a non-believer even if that non-believer is the father or the brother of that Muslim (Q. 9: 23), (Q. 3: 28). Quran asks the Muslims to “strive against the unbelievers with great endeavor (Q. 25: 52), be stern with them because they belong to hell (Q. 66: 9). The holy Prophet demanded his follower to “strike off the heads of the disbelievers”; then after making a “wide slaughter among them, carefully tie up the remaining captives” (Q. 47: 4). As for women the book of Allah says that they are inferior to men and their husbands have the right to scourge them if they are found disobedient (Q. 4:34). It teaches that women will go to hell if they are disobedient to their husbands (Q. 66:10). It maintains that men have an advantage over the women (Q. 2:228). It not only denies the women’s equal right to their inheritance (Q. 4:11-12), it also regards them as imbeciles and decrees that their witness is not admissible in the court (Q. 2:282).

    क्या यहां सब सेकूलरियों जैसे बेबकूफ बसते हैं जो राष्ट्रवादियों को तालिबानी कहें और आतंकवादियों की ओर से आंखे मूंद लें?

  15. Suresh Chiplunkar said,

    May 5, 2009 at 3:54 pm

    दिनेश धवन जी धन्यवाद, मैं भी इसी से मिलता-जुलता ही कुछ कहने वाला था…। चन्द्रभूषण जी अवश्य समझ गये होंगे, जिन्हें लगता है कि इस्लाम का प्रसार “कुछ ही” हमलावरों के एजेण्डे में था, आखिर चन्द्रभूषण साहब पढ़े-लिखे जो ठहरे… 🙂

  16. mahashakti said,

    May 5, 2009 at 4:01 pm

    बेहतरीन लेख,

    ए आर रहमान आज इसलिये हमारे बीच है कि किसी दरगाह को उनकी माता श्री पर मन्‍नत मान आई थी। आज भी अनेके हिन्‍दू मजार की शक्ति पर ज्‍यादा विश्वास करते है अपनी शक्ति पर नही। यह विडम्‍बना ही है।

  17. Anil Pusadkar said,

    May 5, 2009 at 7:42 pm

    लगे रहो भाऊ,कभी तो आंख खुलेगी सेक्यूलरो की और कभी तो जागेगा हिंदू। आपकी कोशिश एक दिन रंग लाये यही शुभकामनाएं है हमारी।

  18. सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said,

    May 6, 2009 at 4:03 am

    सुरेश जी सच बात यह है कि मुस्लिम आक्रान्ताओं नें दोहरी नीति सदैव अपनायी है। एक तरफ वो सूफी हजरात को भेजते रहे जिनका काम स्थापित आस्था मूल्यों से हिन्दुओं को ड़िगाना रहा है और पीछे से जिहादी सेना ऎसे ड़िगी आस्था वालों पर आक्रमण कर राज्य स्थापित कर लेती थी। सूफी हज़रात की इन करतूतों का ही परिणाम था जिसके चलते कशमीर का इस्लामीकरण हुआ। वस्तुतः सूफी हज़रात इस्लामी सेना के हरावल दस्ते के रूप में सदैव इस्तेमाल किये जाते रहे हैं।

    क़ासिफ भाई कह रहे हैं कि इस्लाम में मज़ार की मुमानियत है मनाही है तो क्या मुस्लमानों में अजमेर शरीफ या अन्य दरगाहों पर न जानें का प्रचार करेंगे। तन्त्र,मन्त्र,जादू,टोना आदि की इस्लाम में मनाही है और फितना कह कर दुत्कारा गया है। जबकि दरगाहों पर यही सब आम है।

    दर अस्ल हज़रत मुहम्मद साहब के समय अरब के जो हालात थे उसमे उन्होंने जो प्रयास किये शायद ठीक ही थे। किन्तु उनके न रहनें और उनके नवासों की हत्या के बाद इस्लाम ऎसे हाथों में चला गया जिसका उद्देश्य धर्म की आँड़ में जेहाद के नाम पर तलवार और खूँरेजी से राज्य विस्तार करना था। जो शायद हजरत मुहम्मद साहब का भी उद्देश्य नहीं था। वो तो आपस में लड़ते हुए ७२ कबीलों को एक कर शांति की स्थापना करना चाहते थे।

  19. पंगेबाज said,

    May 6, 2009 at 4:46 am

    वाह शानदार लेख जानदार लेख . और इस बार तो कमाल हो गया कसाब के पैरोकार ्सेकुलर साहबान कही और फ़ुरसतिया रहे है यहा चक्कर नही मारा ?. हमने सबको कबूल किया जिन्होने हमे डराया धमकाया मार पीटा या हम से हारे तभी महमूद गजनी इत्ती बार वापस लौटा .लेकिन कोई मुझे बतादे हमारे यहा के किस संत को विधर्मियो ने स्वीकार किया ? हमतो चर्च मे भी चले जाते है मजारो पर भी मस्जिद मे भी . और इसी सेकुलर आदत के चलते हमारी हालत ये हो गई है कि हर ऐरा गैरा नत्थूई खैरा हमे राय देने और पददलित करने की हिमाकत कर बैठता है. अब हमे वाकई तालीबान बन कर दिखाना होगा लेकिन यहूदयो जैसा . जिसे तालीबान कहने की हिम्मत जुटाना भी मुश्किल है.

  20. Dikshit Ajay K said,

    May 6, 2009 at 5:28 am

    सुरेश भाई,

    आप ने इस लेख मैं १ स्थान पर जेहाद शब्द का प्रयोग कीया है. मुझे इस पर एतराज़ है. असल मैं जेहाद का मतलब धर्मयुद्ध होता है, जो की जन कल्याण के लिए लरा जाता है, न की अनधिकार किसी के घर (देश) मैं घुस कर उस की समपट्टी, जीवन मूल्यों और मान्यताओं को नस्त भ्रस्त कर शास्त्र के जोर पर अपनी विचार धरा को मनवाना .

  21. Chinmay said,

    May 6, 2009 at 10:46 am

    जेहादी सुल्तानों, काम पीपासु बादशाहों के बारे में “हैरत अंगेज़” जानकारी से भरा एक लेख मैने भी अपने ब्लॉग पर लिखा है . कृपया पढ़ें और अपनी टिप्पणियाँ दें. धन्यवाद.

    http://bharatbhumiyugeyuge.blogspot.com/

  22. 'sammu' said,

    May 6, 2009 at 1:45 pm

    सुरेश जी आप्से कुच्छ बातोन से सहमत हून कुछ से नहीन .जैसे गज़्नी या उस्के लुटेरे साथी मुघल नहीन थे .
    मन्गोल तो बाद मे मुसल्मान बने . लेकिन यह अकाद्मीय माम्ला है इससे लुतेरोन और धर्मान्धोन के चरित्र पर कोयी फ़र्क नहीन पडता . इस्लाम मे एक और बात है , कहता कुछ है दिखाता कुछ बताता कुछ .अप्नी पराजयोन के निशान मिता डाल्ता है और जै को अलन्क्रित करता है .बहराइच के सत्य को हम अवध के लोग हमेशा जानते रहे हैन .जो आप्ने कहा वह सही है .
    लेकिन पूरे इतिहास मे सभी जेताओन ने यही किया और इस्लामि तरीकोन मे यह जायज करार दिया जात है . सच तो यह है कि भारत के इतिहास को अन्ग्रेजोन ने भी अपने ही स्वार्थोन के लिये लिखा और विडम्बना येह है कि हम वही पढ पढा रहे हैन अभी तक .इस्मे कोयी दो रये नहीन कि वाम पन्थी भी इतिहास वैसा बताना चाह्ते हैन जहान कोय्र्यी भी राश्ट्रवाद का निशान न रह सके . यह भी उन्के धूर्त तरीके का अन्ग है .
    लेकिन अगर तठश्थ इतिहास का लेखन हो तो यह भी सच मिलेगा कि ’ शस्त्र शाश्त्र और सम्पत्ति ’ के कुचक्री शड्यन्त्र से इतिहास भरा पडा है और वह हर देश काल मे अधिक्तर हुआ है आज भी हो रहा है आम आदमी के खिलाफ़ .
    ज्यादा कहने की यहान सम्भाव्ना नहीन इस लिये सिर्फ़ एक सुभाशित से काम चला रहा हून .

    विद्या विवादाय धनम मदाय शक्तिम परेषाम परिपीडनाय
    एतज विपरीतह साधवह ग्यानाय दानाय च रक्छणाय.
    (क्रिपया सर्वत्र मेरी वर्जनी की भूलोन को माफ़ करेन ,अभी थीक से नागरी मे लिप्यान्तरण की कम्पुतीय निपुणता मे ’साक्छर’ नहीन हो पाय हून .)

  23. पंकज बेंगाणी said,

    May 10, 2009 at 6:20 am

    हिन्दू कभी संगठीत नहीं हो सकते! क्योंकि यह जीन मे ही नही है, और मार खाना इनकी आदत है, और गुलामी मे जीना इनकी पहचान.

  24. khursheed said,

    May 11, 2009 at 7:25 am

    @ dinesh

    In Rig veda Book 10 Hymn 86 verse 13 says “indra will eat thy bulls, thy dear oblation that effecteth much. Supreme is Indra over all" These verses indicates that Indra, a god of vedic age, used to eat meat.

    Also another god of vedic age, Agni, is referred to as "flesh-eater' in vedas. For example, in Rig Veda bock 10 Hymn 16 verse 10 it is said I choose as god for Father-worship Agni, FLESH Eater, who hath past within your dwellings".

    In RigVeda Vivah sukta book 10 Hymn 85 verse 13, it mentions that during marriage ceremony the guests were fed with the meat. it says “in Magha days are oxen slain, in Arjunis they wed the bride"

    Atherva veda book 9 Hymn 4 verses 37-38-39 gives _expression that cow's milk and cow's meat are most tasty among all other foods. It says "The man should not eat before the guest who is Brahmin versed in holy lore When the guest hath eaten he should eat. Now the sweet est portion, the produce of cow, milk or flesh, that verily he should not eat (before the guest)"

    If you read Mahabharata Shanti Parva chapter 29, a story of greatness of a king called Rantideva is described It is said that he was very rich and generous, and used to feed thousands of guests. The paragraph reads as follows “All the vessels and the plates, in Rantideva's palace, for holding food and other articles, all the jugs and other pots, the pan and plates and cups, were of gold. On those nights during which the guests used to live in Rantideva's abode, twenty thousand and one hundred kine {cows} had to be slaughtered. Yet even on such occasions, the cooks, decked in ear-rings, used to proclaim (amongst those that sat for supper) “There is abundant of soup, take as much as you wish, but of flesh we have not as much today as on former occasions" This shows that even after slaughtering 20,100 cows, meat used to fall short on some occasions.

    Many more quotations can be given where non-vegetarian food is given preference compared to vegetarian food. For example,

    Mahabharata Anushashan Parva chapter 88 narrates the discussion between Dharmaraj Yudhishthira and Pitamah Bhishma about what food one should offer to Piths (ancestors) during the Shraddha (ceremony of dead) to keep them satisfied Paragraph reads as follows "Yudhishthirn said, "0 thou of great puissance, tell me what that object is which, if dedicated to the pitris (dead ancestors), become inexhaustible! What Havi, again, (if offered) lasts for all time? What, indeed, is that which (if presented) becomes eternal?”

    "Bhisma said, Listen to me, 0 Yudhishthira, what those Havis are which persons conversant with the rituals of the Shraddha (the ceremony of dead) regard as suitable in view of Shraddha and what the fruits are that attach to each. With sesame seeds and rice and barley and Masha and water and roots and fruits, if given at Shraddhas, the pitris, 0 king, remain gratified for the period of a month. With fishes offered at Shraddha, the pitris remain gratified for a period of two months. With the muflon they remain gratified for three months and with the hare for four months, with the flesh of the goat for five months, with the bacon (meat of pig) for six months, and with the flesh of birds for seven. With venison obtained from those deer that are called Prishata, they remain gratified for eight months, and with that obtained form the Ruru for nine months, and with the meat of Gavaya for ten months. With the meat of the buffalo their gratification lasts for eleven months. With beef presented at the Shraddha, their gratification, it is said, lasts for a full year. Payesa mixed with ghee is as much acceptable to the pitris as beef. With the meat of Vadhrinasa (a large bull) the gratification of pitris lasts for twelve years. The flesh of rhinoceros, offered to the pitris on anniversaries of the lunar days on which they died, becomes inexhaustible. The potherb called Kalaska, the petals of Kanchana flower, and meat of (red) goat also, thus offered, prove inexhaustible.

    So but natural if you want to keep your ancestors satisfied forever, you should serve them the meat of red goat.
    Same message is repeated in Manu Smruti Chapter 3 verses 266 to 272. In Shraddha (ceremony of dead) even Brahmjn priests are expected to eat meat. Manu Smruti instructs Hindus to serve non-vegetarian food to priests i.e. Brahmins. It says in Chapter 3 verses 226 and 227 “Purified and with a concentrated mind, he should put down on the ground before (those priests) seasoned foods like soups and vegetables and also milk, yogurt, clarified butter, honey and various foods that are eaten and enjoyed, roots and fruits, tasty meats, and fragrant water.

    Hindu scriptures not only allow non-vegetarian food but at few places it makes it compulsory for Hindus to eat non-vegetarian food. If anyone refuses non vegetarian food, he will have to face consequences according Hindu Scriptures, In Vishnu Dharmottar Puran book 1 chapter 140 verses 49 & 50 says "Those who do not eat meat served in the ceremony of dead (Shraddha), will go to hell (narak)"

    But when a man who is properly engaged in a ritual does not eat meat, after his death he will become a sacrificial animal during twenty-one rebirths"

    This verse says those who don't eat meat will become sacrificial animals in next twenty-one rebirths. It not only says that a person will become an animal but says will become “sacrificial animal" meaning others will sacrifice him.

  25. khursheed said,

    May 11, 2009 at 2:22 pm

    @Dinesh
    Black Laws against the Women – Casteism and Degration of Women

    1. Every woman must be loyal, faithful. obedient honorable to her husband even if he is blind, deaf, dumb, old, physically handicapped, debauchel or, gambler and neglects his wife and lives with his concubine(s). If the husband is unhappy, it would be the fault of his wife. If he cries, she should cry. If he laughs she should laugh. She can only answer humbly to his question. She should not on her own put any question. She should eat only after her husband eats. If he is beating she should not react, but fall on his feet and beg him to pardon her, and kiss his hands and pacify him. If the husband dies she should burn herself to death on his funeral pyre and go along with him to the other world and serve him there in this manner. (Padma Purana)

    2. Women are fickle minded. Never believe them. Friendship with a women is just like friendship with a wolf. (Rig-Veda 8-33-7)

    3. A virtuous woman is one who dies on the funeral pyre of her dead husband and avails the privilege of serving her husband in the other world. (Atharva Veda 18-3-1)

    4. Woman is the source of sorrow. At birth she makes her mother weep. At the time of the puberty she makes her parents weep. At the time of the marriage she makes all her family members and relatives weep. In youth she commits lot of blunders and brings bad name to the entire family, relatives and Varna. She tortures the hearts of her parents, husband and other family members. She is called ‘DARIKA’ because she is source of sorrow to all.

    (Aithareya Brahmana)
    5. Women are liers, corrupt, greedy, and unvirtuous. (Manu II 1)

    6. Even for a woman, the performance of the sanskaras are necessary and they should be performed. But they should be performed without uttering the Veda Mantras.” (Manu II. 60)

    7. It is the nature of women to seduce men in this (world); the wise are never unguarded in the company of males. (Manu II. 213)

    8. For women are able to lead astray in (this) world not only a fool, but even a learned man, and (to make) him a slave of desire and anger.” (Manu II.214)

    9. One should not sit in a lonely place with one’s mother, sister or daughter, for the senses are powerful, and master even a learned man.” (Manu II. 215)

    10. A Brahmin male by virtue of his birth becomes the first husband of all women in the universe. (Manu III. 14)

    11. Women not care for beauty, nor is their attention fied on age; (thinking); (it is though that) he is a man, they give themselves to the handsome and to the ugly. (Manu IV. 14)

    12. By a girl, by a young woman, or even by an aged one, nothing must be done independently, even in her own house.” (Manu IV. 147)

    13. In childhood a female must be subject to her father, in youth to her husband, when her lord is dead to her sons; a woman must never be independent. (Manu IV. 148)

    14. She must not seek to separate herself from her father, husband or son; by leaving them. She would make them both (her own and her husband’s) family incompatible. (Manu IV. 149)

    15. A Brahman must never eat food given at a sacrifice performed by a woman. (Manu IV. 205)

    16. Sacrifices performed by women are inauspicious and not acceptable to god. They should therefore be avoided. (Manu IV. 206)

    17. A girl must be under the care of her father . . . in youth under the care of the husband and in old age under the care of her sons. But she should never be free and independent. (Manu V. 148)

    18. She must always be cheerful, clever in management of her household affairs, careful in cleaning her utensils and economical in expenditure. (Manu V. 150)

    19. Him to whom her father may give her, or her brother with the father’s permission, she shall obey as long as he lives and when he is dead, must not insult his memory. (Manu V. 151)

    20. The husband who wedded her with sacred mantras is always a source of happiness to his wife, both in season and out of season, in this world and in the next. (Manu V1. 53)

    21. Though destitute or virtuous, or seeking pleasure elsewhere, or devoid of good qualities, yet a husband must be constantly worshipped as a god by a faithful wife. (Manu V. 154)

    22. No sacrifice, no vow, no fast must be performed by women, apart from their husbands. If a wife obeys her husband, she will for that reason alone be exalted in heaven. (Manu V. 155)

    23. At her pleasure let her (i.e. widow) enunciate her body, by living voluntarily on pure flowers, roots and fruits, but let her not when her lord is deceased, even pronounce the name of another man. (Manu V. 157)

    24. But a widow, who from a wish to bear children, slights her deceased husband by marrying again, brings disgrace on herself here below, and shall be excluded from the seat of her lord (in heaven). (Manu V. 161)

    25. Responsibly the father who gives not (his daughter) in marriage at the proper time. (Manu IX. 4)

    26. A woman must always maintain her virtue and surrender her body to her husband only, ever if she is married off to an ugly person or even a leper. (Manu IX. 14)

    27. Through their passion for men, through their mutable temper, through their natural heartlessness, they become disloyal towards their husbands, however, carefully they may be guarded in this (world). (Manu IX. 15)

    28. Knowing their disposition, which the Lord of Creatures laid in them at the creation, to be such, (every) man should most strenuously exert himself to guard them. (Manu IX. 16)

    29. When creating them, Manu allotted to women (a love of their) bed, (of heart) seat and (of) ornament, impure desires, wrath, dishonesty, malice, and bad conduct. (Manu IX. 17)

    30. Killing of a woman, a Shudra or an atheist is not sinful. Woman is an embodiment of the worst desires, hatred, deceit, jealousy and bad character. Women should never be given freedom. (Manu IX. 17 and V. 47, 147)

    31. Women have no right to study the Vedas. That is why their Sanskars are performed without Veda Mantras. women have no knowledge of religion because they have no right to know the Vedas. The uttering of Veda Mantras, they are as unclean as untruth is.” (Manu IX. 18)

    32. All women are born of sinful wombs. (Bhagavad-Gita IX 32)

    33. The husband is declared to be one with the wife, which means there could be no separation once a woman is married. (Manu IX. 45)

    34. Neither by sale nor by repudiation is a wife released from her husband. (Manu IX. 46)

    35. To a distinguished, handsome suitor of equal caste should she have not attained (the proper age) (i.e. although she may not have reached puberty). (Manu IX. 88)

    36. A wife, a son and a slave, they three are declared to have no property: the wealth which they earn is (acquired)for him to whom they belong. (Manu IX. 416)

    37. None of the acts of women can be taken as good and reasonable. (Manu X.4)

    38. Day and night women must be kept in dependence by males (of their families), and, if they attach themselves to sexual enjoyments, they must be kept under one’s control. (Manu XI2)

    39. Her father protects (her) in childhood, her husband protects (her) in youth, and her sons protect (her) in old age; a woman is never fit for independence.” (Manu XI. 3)

    40. Women must particularly be guarded against evil inclinations, however trifling (they may appear); for, if they are not guarded, they will bring sorrow on to families.” (Manu XI. 5)

    41. Considering that the highest duty of all castes even weak husbands (must) scribe to guard their wives. (Manu XI. 6)

    42. A woman shall not perform the daily sacrifices prescribed by the Vedas. Then according to IX.37 if she does it, she will go to hell. (Manu XI. 36)1, 2, 3, 4 From- Casteism: The Eighth Worst Wonder by Dr. S. L. Virdi, Pages-39-43)

    Vedas

    No one is to argue critically about vedas because religion has originated from them. Any nastika (non-believer) or critic of the Vedas, who “insults” them on the basis of logic, is worthy of being socially boycotted by “noble” persons. Women, that is, even women belonging to Brahmin, Kshatriya and Vaishya varna are not entitled to upanayan and the study of the Vedas. For them, marriage is equivalent to upanayan and service of their husbands is equivalent to the study of the Vedas in the gurukul. Even if the husband is morally degraded, engaged in an affair with another woman and is devoid of knowledge and other qualities, the wife must treat him like a god. A widower is allowed to remarry but a widow is not. Besides, women are not considered fit for being free and independent. They are to be protected in their childhood by father, in youth by husband and in old age by son. They should never be allowed by their guardians to act independently. A woman must never do anything even inside her home without the consent of her father, husband and son respectively. She must remain in control of her father in childhood, of husband in youth and of son after the death of her husband

  26. Kashif Arif said,

    May 19, 2009 at 4:15 am

    @ सुरेश जी, मै मानता हुं कि जो कुरान मे लिखा है उस पर बहुत कम लोग अमल करते है इसकी सबसे बडी वजह हमारी कौम का कम पढा लिखा होना है, वो लोग कुरान को समझ कर नही पढते है और जो लोग मज़ारो पर जाते है उन लोगो मे से ३५ से ४० प्रतिशत लोगो ने कुरान पढा ही नही है….मै बहुत जल्द अपने ब्लोग पर कुरान के हिन्दी अनुवाद .MP3 फोरमेट मे लगाने वाला हूं,

    =======
    @ दीनॆश धवन जी, आपने जो कुरान की आयतें यहा दी है मै मानता हु कि यह कुरान की है लेकिन ये आयते आज से १४०० साल पहले उतरी थी, तब सारी दुनिया मुसल्मानो की दुश्मन थी, आपने सिर्फ़ आयत का मतलब जाना है उसके नाज़िल होने की वजह नही, हर आयत एक खास हालात मे नाज़िल हुई थी,

    =======

    @ सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ जी, जैसा आपने कहा मै अपनी कोशिश कर रहा हु कि मै जितने लोगो को बता सकता हू उतनो को बताता हू, मैने अपने ब्लोग पर भी इस बारे मे लिखा है, आप यह पोस्ट देख सकते है, http://hamarahindustaan.blogspot.com/2009/01/blog-post_02.html

  27. mohit sharma said,

    June 29, 2009 at 4:06 am

    Priya Suresh Ji,
    Man ati prasanna ho gaya apka lekh padh kar, mai hamesha sochta raha hoo ki jo hamaari sanskriti aur virasat ko nuksaan pahuchaate hai hum unhi logo ki tareef karte nahi thakte, aur bina soche samjhe kisi par bhi vishwaas karne lagte hai.Kya sahi hai aur kua galat ye janna bahut zarori hai.Maine kai baar itihaas ki kitaabo me padha hai, ki kis tarah dusre aakrantaon ne hamaare mandiron ko toda hamaari poojniya vastuon ko rond dala aur hum unhi ki ibadat karne lage. Hame hakikat se waakif karwaane ke liye koti koti dhanywaad.Mai hamesha aapse aise hi shaandaar lekho ki apeksha karungaa.

    Aapka abhari
    Anil Mistri

  28. Rakesh Singh - राकेश सिंह said,

    July 28, 2009 at 7:20 pm

    सुरेश जी आप हिन्दुओं का आँख खोलने का काम कर रहे हैं | लगे रहिये |


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