तमिल चीतों के सफ़ाये में चीन की भूमिका और भारत मूक दर्शक China’s role in Tamil Tiger Eradication

जब श्रीलंका ने तमिल चीतों पर निर्णायक हमला बोलने का निर्णय लिया तब कई लोगों को आश्चर्य हुआ था, कि आखिर श्रीलंका कैसे यह कर सकेगा। लेकिन इलाके पर बारीक नज़र रखने वाले विशेषज्ञ जानते थे कि चीन का हाथ अब पूरी तरह से श्रीलंका की पीठ पर है और प्रभाकरन सिर्फ़ कुछ ही दिनों का मेहमान है। चीन की मदद से न सिर्फ़ श्रीलंका ने जफ़ना और त्रिंकोमाली पर पकड़ मजबूत कर ली बल्कि “अन्तर्राष्ट्रीय आवाजों” और “पश्चिम की चिंताओं” की परवाह भी नहीं की।

श्रीलंका के दक्षिणी तट पर, विश्व के सबसे व्यस्ततम जलमार्ग से सिर्फ़ 10 समुद्री मील दूर एक विशालकाय निर्माण कार्य चल रहा है। “हम्बनतोटा” नामक इस मछलीमार गाँव की शान्ति भारी मशीनों ने भंग की हुई है… यहाँ चीन की आर्थिक और तकनीकी मदद से एक बहुत बड़ा बन्दरगाह बनाया जा रहा है, जिसे चीन अपने हितों के लिये उपयोग करेगा।

मार्च 2007 में जब श्रीलंका और चीन की सरकारों के बीच इस बन्दरगाह को बनाने का समझौता हुआ तभी से (यानी पिछले दो साल से) चीन ने श्रीलंका को इसके बदले में हथियार, अन्य साजो-सामान की सहायता और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मनोवैज्ञानिक मदद सब कुछ दिया। असल में लगभग 1 अरब डॉलर की भारी-भरकम लागत से बनने वाले इस सैनिक-असैनिक बन्दरगाह से चीन अपने सभी जहाजों और तेल टैंकरों की मरम्मत और ईंधन की देखभाल तो करेगा ही, इस सामरिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री इलाके से सऊदी अरब द्वारा आने वाले उसके तेल पर भी नज़र रखेगा। भले ही चीन कहे कि यह एक व्यावसायिक बन्दरगाह है और श्रीलंका का इस पर पूरा नियन्त्रण होगा, लेकिन जो लोग चीन को जानते हैं वे यह जानते हैं कि चीन इस बन्दरगाह का उपयोग निश्चित रूप से क्षेत्र में अपनी सामरिक उपस्थिति दर्ज करने के लिये करेगा, और दक्षिण प्रशान्त और हिन्द महासागर में उसकी एक मजबूत उपस्थिति हो जायेगी।

इस जलमार्ग की विशिष्टता और उपयोगिता कितनी है यह इस बात से भी स्पष्ट होता है कि 1957 तक ब्रिटेन ने भी त्रिंकोमाली में अपना नौसेनिक अड्डा बनाया हुआ था और आज भी दिएगो गार्सिया में वह अमेरिका के साथ साझेदारी में एक महत्वपूर्ण द्वीप पर काबिज है। चीन की नज़र श्रीलंका पर 1990 से ही थी, लेकिन अब तमिल चीतों के सफ़ाये में मदद के बहाने से चीन ने श्रीलंका में पूरी तरह से घुसपैठ कर ली है, जब पश्चिमी देशों और भारत ने श्रीलंका को मदद देने से इंकार कर दिया तब चीन ने सभी को ठेंगे पर रखते हुए “लंका लॉजिस्टिक्स एण्ड टेक्नोलॉजीस” (जिसके मालिक श्रीलंकाई राष्ट्रपति के भाई गोतभाया राजपक्षे हैं) से श्रीलंका को खुलकर भारी हथियार दिये। अप्रैल 2007 में 40 करोड़ डॉलर के हथियारों के बाद छः F-7 विमान भी लगभग मुफ़्त में उसने श्रीलंका को दिये ताकि वह लिट्टे के हवाई हमलों से निपट सके। क्या इतना सब चीन मानवता के नाते कर रहा है? कोई मूर्ख ही यह सोच सकता है। खासकर तब, जबकि चीन ने पिछले दस साल में पाकिस्तान में ग्वादर बन्दरगाह, बांग्लादेश में चटगाँव बन्दरगाह और बर्मा में सिटवे बन्दरगाह को आधुनिक बनाने में अच्छा-खासा पैसा खर्च किया है। (खबर यहाँ देखें)

क्या अब किसी के कानों में खतरे की घंटी बजी? जरूर बजी, हरेक समझदार व्यक्ति इस खतरे को भाँप रहा है, सिवाय भारत की कांग्रेसी सरकार के, जिसकी विदेश नीति की विफ़लता का आलम यह है कि तिब्बत के बाद अब नेपाल के रास्ते चीन पूर्वी सीमा पर आन खड़ा हुआ है तथा देश के चारों ओर महत्वपूर्ण ठिकानों पर अपने बन्दरगाह बना चुका है। सिर्फ़ अमेरिका की चमचागिरी करना ही “विदेश नीति” नहीं होती, यह बात कौन हमारे नेताओं को समझायेगा? आखिर कब भारत एक तनकर खड़ा होने वाला देश बनेगा। तथाकथित मानवाधिकारों की परवाह किये बिना कब भारत “अपने फ़ायदे” के बारे में सोचेगा? जो कुछ चीन ने श्रीलंका में किया क्या हम नहीं कर सकते थे? बांग्लादेश और पाकिस्तान को छोड़ भी दें (क्योंकि वे इस्लामिक देश हैं) तब भी कम से कम श्रीलंका और बर्मा में भारत अपने “पैर” जमा सकता था, लेकिन हमारी सरकारों को कभी करुणानिधि का डर सताता है, कभी “मानवाधिकारवादियों” का, तो कभी “लाल झण्डे वालों” का…, देश का फ़ायदा (दूरगामी फ़ायदा) कैसे हो यह सोचने की फ़ुर्सत किसी के पास नहीं है। उधर महिन्द्रा राजपक्षे की चारों तरफ़ से मौज है, सन् 2005 से लेकर अब तक चीन उसे 1 अरब डॉलर की अतिरिक्त मदद दे चुका है, जबकि इसी अवधि में अमेरिका ने सिर्फ़ 7 करोड़ डॉलर और ब्रिटेन ने सिर्फ़ 2 करोड़ पौंड की मदद दी है। आतंकवाद से लड़ने के नाम पर राजपक्षे विश्व की सहानुभूति तो बटोर ही रहे हैं, माल भी बटोर रहे हैं। चीन ने उसे संयुक्त राष्ट्र में उठने वाली किसी भी आपत्ति पर कान न देने को कहा है, और श्रीलंका जानता है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन का वरदहस्त होने के क्या मायने हैं, इसलिये वह भारत को भी “भाव” देने को तैयार नहीं हैं, जबकि इधर भारतीय नेता खामखा मुगालते में बैठे हैं कि श्रीलंका हमारी कोई भी बात सुनेगा।

इस सारे झमेले में एक “मिशनरी/चर्च” का कोण भी है, जिसकी तरफ़ अभी बहुत कम लोगों का ही ध्यान गया है। श्रीलंका में बरसों से जारी सिंहली-तमिल संघर्ष के दौरान जिस लिट्टे का जन्म हुआ, अब वह लिट्टे पुराना लिट्टे नहीं रहा। उसके प्रमुख प्रभाकरण भी ईसाई बन चुके और कई प्रमुख ओहदेदार भी। लिट्टे अपने सदस्यों का अन्तिम संस्कार भी नहीं करने देता बल्कि उन्हें कब्र में दफ़नाया जाता है। लिट्टे की सबसे बड़ी आर्थिक और शस्त्रास्त्रों की आपूर्ति करने वाली संस्था रही “पश्चिम का एवेंजेलिकल चर्च”। चर्च (खासकर नॉर्वे, जर्मनी, स्पेन) और पश्चिम के अन्य देशों के पैसों के बल पर तमिलनाडु और उत्तरी श्रीलंका को मिलाकर एक “तमिल ईलम” बनाने की योजना थी, फ़िलहाल जिस पर चीन की मेहरबानी से पानी फ़िर गया है। गत 5 साल में चर्च का सर्वाधिक पैसा भारत में जिस राज्य में आया है वह “तमिलनाडु” है। करुणानिधि भले ही अपने-आप को नास्तिक बताते रहे हों, लेकिन गले में पीला दुपट्टा ओढ़कर भी वे सदा चर्च की मदद को तत्पर रहे हैं। शंकराचार्य की गिरफ़्तारी हो या चेन्नै हाईकोर्ट में वकीलों द्वारा किया गया उपद्रव हो, हरेक घटना के पीछे द्रमुक का हिन्दू और ब्राह्मणविरोधी रुख स्पष्ट दिखा है। जबकि चीन के लिये अपना फ़ायदा अधिक महत्वपूर्ण है, “चर्च” वगैरह की शक्ति को वह जूते की नोक पर रखता है, इसलिये उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि श्रीलंका में चल रहा संघर्ष असल में “बौद्ध” और “चर्च” का संघर्ष था। पश्चिमी देशों की श्रीलंका में मानवाधिकार आदि की “चिल्लपों” इसी कारण है कि चर्च का काफ़ी पैसा पानी में चला गया, जबकि श्रीलंका सरकार का रुख “कान पर बैठी मक्खी उड़ाने” जैसा इसलिये है, क्योंकि वह जानता है कि चीन उसके साथ है।

फ़िलहाल तो भारत सरकार एक मूक दर्शक की भूमिका में है (जैसा कि वह अधिकतर मामलों में होती है), चाहे करुणानिधि खुलेआम तमिलनाडु में “तमिल ईलम” की स्थापना की घोषणा कर रहे हों, वाइको सरेआम “खून की नदियाँ” बहाने की बात कर रहे हों। छोटी-मोटी पार्टियाँ जनता को उकसाकर भारतीय सेना के ट्रकों को लूट रही हैं, जला रही हैं… लेकिन शायद केन्द्र की कांग्रेस सरकार करुणानिधि या जयललिता से भविष्य में होने वाले राजनैतिक समीकरण पर ध्यान टिकाये हुए है, जयललिता को पटाने में लगी है, फ़िर चाहे “देशहित” जाये भाड़ में।

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20 Comments

  1. May 8, 2009 at 11:36 am

    जो देश अपनी जमीन गवाँ कर गर्व करता हो उससे यह आशा करना की वह पचास साल आगे की सोचते हुए दुनिया पर दबदबा बनाए, मूर्खता होगी. भारत चीन के आगे इस मामले में कहीं नहीं टिकता. भारत का लोकतंत्र और उसमें हर मौहल्ले की अपनी पार्टी भारी पड़ रही है. एक पार्टी का शासन अनिवार्य हो गया है. मगर हम भारतीय सदा बँटे रहे….प्रभाकरण के ईसाई बनाने की जानकारी नहीं थी.

  2. May 8, 2009 at 11:43 am

    बिल्कुल ही नई जानकारियाँ मिलीं। अगर भारत का यही रवैया रहा तो वो दिन दूर नहीं जब चीन सब तरफ़ से भारत पर भाईगिरी करने लगेगा।

  3. May 8, 2009 at 11:52 am

    चीन चारों ओर से भारत को घेर रहा है. श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल. सब पर चीन का प्रभुत्व बढ़ रहा है. खैर, हमारे रणनीतिकार भी सक्रिय तो हैं लेकिन थोड़ा देर से सक्रिय होते हैं. जैसे अभी नेपाल में हुआ है.

  4. May 8, 2009 at 12:13 pm

    @ संजय बेंगाणी जी – प्रभाकरण और उसके बेटे चार्ल्स के ईसाईकरण के बारे में और अधिक जानकारी के लिये देखें… http://www.christianaggression.org/item_display.php?type=ARTICLES&id=1112887194 नॉर्वे के चर्च और लिट्टे के सम्बन्धों हेतु इस लिंक को देखें http://www.tamilcanadian.com/page.php?cat=52&id=165 तथा यह भी http://www.sinhaya.com/NorwayAndLTTE.htm

  5. RAJ said,

    May 8, 2009 at 12:19 pm

    CHINA IS PLANNING TO MAKE HIS GOVERNMENT IN INDIA LIKE IN NEPALFOR THIS THEY ARE BLINDLY SUPPORTING COMMUNISTS IN INDIA. INDIANS ALWAYS LOSE EVERYTHING BECOUSE OF INTERNAL ISSUES CHINESE KNEW THIS FACT VERY WELL AND THERE PLANNER HAVE DONE WELL TO DEVIDE INDIAN POLITICIANS AND INDIA’S NEIGBOURING COUNTRIES.A WEAK GOVERNMENT IN THE CENTER WILL BE UNABLE TO FACE ANY CHALLENGE FROM ANY FRONT.THEY WILL BE DEPENDENT ONLY ON AMERICA THEY WILL NOT BE ABLE TO DO ANYTHING FOR INDIA.THIS IS THE TIME FOR ALL PARTIES TO THINK SERIOUSLY ABOUT THESE FACTORS AND MAKE VERY STRONG STRATEGY TO TACKLE THIS ISSUE.THANKS TO SURESH JI FOR THIS ARTICLE.

  6. RAJ said,

    May 8, 2009 at 12:19 pm

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  7. RAJ said,

    May 8, 2009 at 12:19 pm

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  8. May 8, 2009 at 5:09 pm

    भारत के लिए बड़ी खतरनाक स्थितियां निर्मित हो रही हैं. हमें भी पहली बार पता चला है की प्रभाकरन ईसाई बन गया है. लिंक भी देख लिया. बहुत ही आभार.

  9. May 8, 2009 at 6:53 pm

    बहुत ही महत्वपूणॆ विषय की तरफ आपने ध्यान दिलाया है। तय तौर पर हमारी सुस्ती हम पर भारी पड़ेगी। रोचक ढंग से लिखा गया आपका आलेख अच्छा लगा।

  10. May 8, 2009 at 8:02 pm

    भारत घर के अन्दर तो दुश्मनो से जूझ रहा ही है बाहर भी चारो ओर से घिर रहा है।पता नही कब जागेंगे यंहा के खेवनहार नेता।

  11. May 9, 2009 at 1:51 am

    सुरेश्जी, सच बात तो यह है कि स्थिति कहीं अधिक गंभीर है। कांग्रेस समर्थक आम हिन्दू भ्रम में जी रहा है,वास्तविकता से दूर। सोनिया की किचन कैबिनेट में क्रिश्चियन्स का बोलबाला है। ए.के.एन्थोनी.वीरप्पा मोइली,टाम बडक्कन,एडुअर्ड फलेरियो,वी जार्ज आदि। खुद एन्टोनियो माइनो,राल विंची और मिसेज वाड्रा तो हैं ही। मुझे शक है कि गोवा से लेकर सम्पूर्ण दक्षिण भारत मे तथा उत्तर पश्चिम में चर्च का कोई एक धड़ा जरूर है जो नक्सलवादियों,माओवादियों और साम्यवादियों की धन आदि के अतिरिक्त भी मदद कर रहा है। फिर मार्क्स,लेनिन हीगल क्या हिन्दू थे? आखिर इस चुनाव में केरल में चे ग्वेरा के पोस्टर क्यों लगे थे? साम्यवादी कोई धर्म नहीं मानते हैं। राष्ट्रधर्म की तो बात ही क्या। लाटीविया,एन्टोनिया और लिथुआनिय़ा ( सम्भवतः १९२८ में) रूस के कब्जे में कैसे आये थे? जब दुनिया भर में हंगामा हुआ तो यह सफाई दी गयी थी कि वहाँ की कम्युनिष्ट पार्टी ने हस्तक्षेप करनें के लिए बुलाया था। इस प्रकार वह रूस में शामिल किया गया था। भारत के कम्युनिस्ट क्या करेंगे???

  12. May 9, 2009 at 8:11 am

    नेहरू जी ने कश्मीर गंवाया, शास्त्री जी को मजबूर किया गया ताशकन्द के समय, इन्दिरा गांधी ने एक लाख को बन्दी बनाने के बाद शिमला में सबकुछ खो दिया, कारगिल के बाद अटल बिहारी भी पाकिस्तान को सबक नहीं सिखा पाये, इस समय मन्नू भैया एन्ड कम्पनी गाल बजा रही है कि पाकिस्तान पर नैतिक विजय मिली. कोई नीति है ही नहीं इस देश में सत्ता पाने के अतिरिक्त. बीच वाले (माफ करें) को क्या कहा जाता है, वही है भारतीय राजनीतिबाजों की दशा. निरीह, लुंजपुंज.

  13. May 9, 2009 at 8:28 am

    चीन जिन दिनों बंदरगाह बन रहा था, उनदिनों हमारी सरकार यह साबित करने में लगी हुई थी कि राम थे ही नहीं. मतलब राम-सेतु भी नहीं था. हलफनामा टाइप हो रहा था उनदिनों.डिएगो गार्सिया में पहले ब्रिटेन और अब अमेरिका की मौजूदगी है. उसके बाद भी हम ये सरकार राम-सेतु तोड़ने में लगी रही. हम चीन द्बारा चारों तरफ से घेर लिए गए हैं. क्या नेपाल की तरफ से, क्या पाकिस्तान की तरफ से, क्या बांग्लादेश की तरफ से. जिन दिनों यह सबकुछ हो रहा था उन दिनों हमारी सरकार की बैशाखी कौन था, यह भी तो देखिये.इस सरकार ने पॉँच साल केवल तिकड़म करते हुए काट दिए. कैसे बचेगी, केवल यही मेहनत करते गुजर गए पांच साल. समर्थन देने वालों ने सरकार की विदेश नीति का निर्धारण किया. नटवर सिंह जैसे लोग विदेश मंत्री रहे. जिस देश की विदेश नीति का निर्धारण सरकार को समर्थन देने वाले दल करेंगे उसका हाल यही होगा.अरब देश के शासकों के बारे में सुना है कि जब उन्हें लगता कि वे युद्ध में हार जायेंगे तो वे अपने ही शहर के शहर नष्ट कर देते. इस सरकार की हालत उन्ही शासकों के जैसे हो गई है.

  14. May 9, 2009 at 9:43 am

    शिव भाई सुरेश जी , आप लोग कैसी अजीब अजीब सी बाते कर रहे है ? किन से उम्मीद बांध रहे है आप देश भक्ती की ? मेरे भाई अपने दिमाक से इस तरह की गलतफ़हमिया मत पालिये. नेता अपने कल एक लिये विदेशी बैकॊ मे पैसा और विदेशो के रहने की वयवस्था मे अगाध प्रेम और समर्पण भाव से लगे है स्थिती खराब होते ही ये वहा चले जायेगे यहा चीन शासन करे का पाकिस्तान इन्हे कंहा फ़रक पडना है . ये तो हमे ही सोचना है और रही बात इन आंखो पर तथाकथित सेकुलरता का चंशमा लगाये अधकचरे बुद्वीजिवियो की तो चिंता ना कीजीये ये तब चाटुकारिता के तमाम मिथको को तोडकर खुद को जयचंदो के अग्रगामी वंशज सिद्व करते हुये मजे लूट रहे होंगे

  15. Shastri said,

    May 9, 2009 at 6:00 pm

    “यहाँ चीन की आर्थिक और तकनीकी मदद से एक … “यह तो भारत के लिये बहुत खतरे की बात है!!पिरभाकरन के ईसाई बनने की बात नहीं सुनी थी. क्या यह वाकई में सच है ?सस्नेह — शास्त्रीहिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती हैhttp://www.Sarathi.info

  16. May 10, 2009 at 3:07 pm

    http://janokti.blogspot.com/2009/05/blog-post_03.htmlsuresh jee jara is link par jarur aayen ………………niche ek aur link de rha hoon

  17. May 10, 2009 at 3:11 pm

    कांग्रेसी सरकार की विदेश निति खोखली रही है इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए ! तिब्बत के मसले को ही देखें तो नेहरु से लेकर मनमोहन तक सभी लुंज -पुंज ही रहे हैं . बहुत से लोग प्राय: कहा करते हैं कि तिब्बत की आजादी की लड़ाई तिब्बतियों को तिब्बत के भीतर रह कर ही लड़नी होगी। पिछले 60 सालों में 10 लाख तिब्बती चीनी सेना द्वारा मारे जा चुके हैं। जो कौम आजादी की लड़ाई नहीं लड़ती उसके 10 लाख लोग मारे नहीं जाते। केवल दलाई लामा की जय कहने पर चीन की जेलों में 5 से लेकर 10 सालों तक नारकीय यातना भोगनी पड़ती है। और हजारों तिब्बती यह भोग रहे हैं। 60 सालों के चीनी प्रयत्नों के बावजूद मठों से जब चीवर धारण किये भिक्षु धम्म का जय घोष करते हुए निकलते हैं तो उन्हें गोली खानी पड़ती है। आज तिब्बत के हर मठ में ऐसे भिक्षुओं की सूची मिल जायेगी जो धम्म के लिए शहीद हो गये। तिब्बत की स्वतंत्रता की लड़ाई वास्तव में धर्म और अधर्म की लड़ाई है। भारत अपने पूरे इतिहास में धर्म का ध्वज वाहक रहा है। वैसे भी तिब्बत और भारत की संस्कृति, इतिहास और आस्था एक समान है। उसके तीर्थ सांझे हैं और उसके प्रतीक सांझे हैं। तिब्बत की पराजय भारतीय संस्कृति की पराजय ही होगी। तिब्बत की पराजय धर्म की पराजय मानी जायेगी। यह अधर्म की जीत होगी। शास्त्रों में कहा गया है धर्म उसी की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करते हैं। तिब्बत तो धर्म की रक्षा के लिए लड़ रहा है। परन्तु भारत सरकार क्या कर रही है। क्या उसने धर्म का रास्ता छोड़ दिया है। आज जब तिब्बत भारत के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन कर रहा है तो भारत सरकार को भी धर्म के रास्ते पर चल कर तिब्बत के पक्ष में खड़े होना चाहिए। तिब्बत के साथ खड़े होने में भारत का अपना स्वार्थ भी है। क्योंकि तिब्बत की स्वतंत्रता से ही भारत की सुरक्षा जुड़ी हुई है। परन्तु भारत को तिब्बत का साथ इस लिए नहीं देना चाहिए कि इसमें उसका अपना स्वार्थ है यदि ऐसा किया तो यह अनैतिक हो जायेगा। भारत को तिब्बत का साथ इसलिए देना है कि यह धर्म का युद्व है। 21 वीं शताब्दी के प्रवेशद्वार पर ही भारत को यह घोषित करना होगा कि भविष्य के लिए वह धर्म का रास्ता चुनता है या उन्हीं पश्चिमी शक्तियों का पिछलग्गू बनता है जो राजनीति को धर्म नीति नहीं बल्कि स्वार्थ नीति मानते हैं। विश्व इतिहास में भारत की पहचान इसी धर्म नीति के कारण रही है। उसे अपनी इस पहचान को पुन: स्थापित करना होगा। तिब्बत इसकी कसौटी है और तिब्बतियों द्वारा कृतज्ञता ज्ञापन सोये भारत को जगाने का एक और उपक्रम है। जाग मछन्दर गोरख आया।

  18. khursheed said,

    May 11, 2009 at 6:53 am

    चीन मुद्दे पर भारत का जितना नुकसान भाजपा सरकार ने किया उतना किसी सरकार ने नहीं किया. जिस तिब्बत को लेकर भारत पचास साल से चीन को घेरता चला आ रहा था, सन २००३ में वाजपेयी ने चीन में जाकर उस मुद्दे की हवा निकल दी. ज़रा इसको भी पढ़े. The Japan TimesWednesday, July 09, 2003NEW DELHI – Seeking to placate longtime rival China, India has subtlyshifted its stand on Tibet in a way to clearly recognize the Chineseannexation of “the roof of the world,” delighting Beijing but raisingquestions about New Delhi’s diplomatic game-plan and spurring concern amongTibetan exiles.Indian Prime Minister Atal Bihari Vajpayee made one-sided bargains inBeijing recently to showcase as a success a visit that would probably be hislast major foreign tour before he gets absorbed in state and nationalelections at home. The Chinese leadership ably exploited Vajpayee’s desirefor a successful visit to extract concessions that present India as willingto accept a secondary role in a China-dominated Asia.

  19. cmpershad said,

    May 13, 2009 at 7:43 pm

    सब से पहले यह सोचना चाहिए कि जिस देश में हम रह रहे हैं, उसे खण्डित करने कि योजना क्या उचित है? यदि ईलम मिल भी जाता, तो दूसरा हत्यार यह होता कि तमिलनाडू भी इस में मिला दिया जाय। वसे भी, आज भी तमिलनाडु में उनके लिए हृदय में जगह है!! तो, भारत को खतरा घर के चिरागों से ही बहुत है!!

  20. July 28, 2009 at 5:30 pm

    सुरेश जी आपने बिलकुल सही लिखा है , ये खबर मैंने कहीं और भी पढ़ी थी | अच्छा किया हिंदी मैं ये जानकारी जुताई | ये बात सत-प्रतिशत सच है की प्रभाकरण क्रिश्चियन बन गया था | पर अधिसंख्यक जनता ये लेख पढ़ कर भी प्रभाकरन को क्रिश्चियन नहीं मानेगी | भाइयों प्रभाकरन के बेटे का नाम चार्ल्स अंटोनी था, कोई हिन्दू अपने बेटे का नाम चार्ल्स अंटोनी रखेगा क्या ? फिर भी नहीं समझेंगे, और समझ भी लिए तो क्या नहीं मानंगे हम पढ़े लिखे secular जो ठहरे |


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